Friday, December 30, 2016

भवसागर से पार कैसे हों?


                तुलसी  ममता  राम सों ,  समता सब संसार।
                राग न रोष न दोष दुःख, दास भये भवपार।।
यह कथन सन्त तुलसीदास जी का है कि ऐ मानव! यदि तुझे इस भवसागर से पार उतरना है तो यह काम कर-तुझे यदि ममता करनी ही है तो केवल उस परमपिता परमात्मा से कर और इस संसार के प्रति तेरी दृष्टि समता भरी हो। प्राणिमात्र को समानता के भाव से देखने का प्रयत्न कर। भवसागर से पार उतरने की यदि तेरे मन में उत्कट उत्कण्ठा हो तो अपने ह्मदय पटल पर से इन नीचे लिखे अवगुणों को दूर कर-वे कौन से दोष हैं? 1.राग,2. रोष, 3.दोष, 4. दुःख। इनको हटाने के साथ साथ तुझे दास्य भाव अपनाना होगा-सेवक बनकर अपने में से अभिमान का नाश करना होगा-तब जाकर तू भवजल निधि से पार हो जाएगा। तुझे उस दशा में फिर चौरासी के चक्र में नहीं आना होगा-जन्म मरण की उपाधियां तुझसे सर्वदा के लिये छूट जाएंगी। ये हैं अमोघ साधन जन्म-मरण की उपाधियों से मुक्त होने के।अब हम श्री तुलसीदास जी के इस दोहे के आन्तरिक भाव को सुस्पष्ट करने का प्रयत्न करते हैंः-
ममता राम सों-सबसे पहला धर्म जो एक मोक्षाभिलाषी का होना चाहिये वह है अपने इष्टदेव के प्रति ममता का रखना। सदा मन में इस विचार का रहना कि यदि कोई "मेरा' है तो वह केवल मेरे इष्टदेव ही हैं और कोई नहीं। मैं "मेरा' शब्द का प्रयोग मात्र उन्हीं के लिये ही कर सकता हूँ। मुझे उनके ही श्री चरणों में अपनी ममता की सारी पोटली उड़ेल देनी है जगत् के लाखों ही भोगैश्वर्य के सामान हैं और वे मुझे मेरे प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त भी होने हैं, मैने उनका चाहे अथवा अनचाहे सेवन भी करना है किन्तु मुझे उनमें ममता नहीं रखनी होगी। मेरी भावना उनके प्रति यह होनी चाहिये कि वे सब पदार्थ मेरे लिये हैं किन्तु मेरे नहीं हैं।यदि वे मेरे होते तो मेरा उनके मिलने पर उनके बिछुड़ने पर पूरा पूरा नियंत्रण होता। मैं जब चाहता वे मुझे मिलते और जब तक मैं उन्हें अपने से विदा होने के लिये न कहता तो वे मुझ से पृथक् न होते।  किन्तु ऐसा नियम प्रकृति का है नहीं।
     "ममता' का सरल अर्थ् है "मन का घना लगाव'- मन का लगाव अस्वाभाविक नहीं है। मन अवश्य ही कहीं लगाव लगा लेता है। अब यह सात्त्विकी बुद्धि पर निर्भर है कि वह मन के लगाव को किस वस्तु के साथ लगाना चाहती है। ममता उसी पदार्थ के साथ होगी जिसके प्रति यह हमारा मन अत्यधिक लालायित होगा। एक सच्चा गुरुमुख जो अपने परब्राहृ रुप श्री सद्गुरुदेव जी को नयनों में बसाये रहता है और उन्हें ह्मदय के सिंहासन पर प्रतिष्ठित किये हुए है उसके लिये जगत् और जगत् के मिथ्या पदार्थ नगण्य से हो जाते हैं। वह उनमें केवल उनके रचियता की झांकी देख पाता है।
श्री परमहँसअवतार श्री तीसरी पादशाही जी महाराज के श्री वचन हैं कि ""ऐ गुरुमुखों! अपने और हमारे बीच में किसी को नहीं आने दो।'' गुरुमुख का लक्षण ही यही है कि जैसे चकोर की आँखों में चाँद, चातक के ध्यान में स्वांति बूंद रमा करती है वैसे ही गुरुमुख के नयनों में सद्गुरुदेव ही समाये होते हैं जैसे किः-             गुरुमुख गुरु चितवत रहे ,  जैसे  मनी भुवंग।
                कह कबीर बिसरै नहीं, यह गुरुमुख को अंग।।
गुरुमुख को अपने मालिक का ध्यान इस तरह रहना चाहिये जैसे मणि वाले सर्प को अपनी मणि का रहता है-वह एक पल भी उस मणि से पृथक् नहीं हो सकता। सत्पुरुषों के वचन तो ये थे कि ऐ जीव! तुझे संसार के पदार्थों का सेवन करने का स्वतन्त्र अधिकार है किन्तु उन्हें पाकर उनमें आसक्त न हो जाना। अपनी ममता उनमें न कर लेना-नहीं तो वे पदार्थ सदा ही तेरे मन को अशान्त-दुःखी और चंचल बनाये रखेंगे। संसार के पदार्थों अथवा बन्धु बान्धवों से ममता नहीं करनी-जगत् को समभाव से यथायोग्य बत्र्ताव करके जीवन बिताना है।
     प्रायः संसार में यह चर्चा रहती है कि हमने गुरु धारण कर लिया है। अब प्रश्न हो सकता है कि गुरु धारण करना क्या होता है? गुरुदेव को धारण करना-बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिये उच्चकोटि की साधना करनी पड़ती है। वह साधना क्या है? साधना नाम इसका है कि जो गुण अपने प्राणप्रिय इष्टदेव जी में हैं उन गुणों को धीरे धीरे उनकी निष्काम सेवा, श्रद्धा पूर्वक आराधना, प्रेम सहित उनके दर्शन, उनका विमल सत्संग श्रवण और उनके कृपापूर्वक प्रदान किये हुए नाम मन्त्र की कमाई करना इन उपायों का अवलम्बन करने से श्री भगवान की पवित्र छवि के आन्तरिक दर्शन अन्तर्जगत् में हो जाते हैं। इस प्रकार परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव जी को जिसने अपना बना लिया उसने मानो विश्व को ही अपना कर लिया। करुणासिन्धु महाप्रभु स्वयमेव जीवों को अपने स्वरुप और स्वभाव का वर्णन गीता जी में यों करते हैंः-
     अब उस ब्राहृस्वरुप अपने परिपूर्ण इष्टदेव के उपासक को अपने जीवन में इन दो गुणों को उतारने का पूर्ण प्रयास करना ही चाहिये। जिस प्रकार भगवान किसी प्रकार के दोष से युक्त नहीं हैं उपासक को भी अपने चरित्र को सब प्रकार के दोषों से खाली करना चाहिये। जैसे उपास्यदेव समदर्शी हैं प्रत्येक के साथ उनका व्यवहार वैसा ही होता है जैसा कि वह साधक है। उनका सदा यह प्रयत्न रहता है कि करोड़ों ही जीवो में से एक भी ऐसा न निकले जो यह कह सके कि मुझ पर तो मेरे भगवान की कृपा दृष्टि है नहीं। पूर्ण सद्गुरुदेव जी सभी की आत्माओं में स्थित हैं, रोम रोम में रमे हुए हैं।
    जिस आराधक के आराध्यदेव समदर्शी हों और सब प्रकार के दोषों से सर्वथा रहित हों तो क्या उनका श्रद्धालु सेवक अपने को उन जैसा बनाने की भरपूर कोशिश न करे? शिष्य अथवा गुरुमुख का सदा यही ध्येय होना चाहिये कि मुझ में ऐसे दिव्य गुण एकत्र होते चले जाये कि जिनके द्वारा मैं अपने इष्टदेव जी की हार्दिक प्रसन्नता का पात्र बनता हुआ उनमें एकाकार हो जाऊं। गुरुमुख को संसार की प्रत्येक वस्तु उस परमईश्वरीय सत्ता से ओत  प्रोत हुई दिखाई देनी चाहिये। वह विश्व के तिनके तक की भी निन्दा न करे। उसके भगवत्प्रेम से पूर्ण ह्मदय में आठोंपहर यही भावना काम करती हो कि जब कि वह मेरा मालिक सर्वत्र विराजमान है इसलिये मुझे हर एक वस्तु के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखे। जैसे किः-
                आत्मौपम्येन सर्वत्र, समं पश्यति योऽर्जुन।
                सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।। 6/32
""ऐ अर्जुन! जो उपासक प्रत्येक प्राणी के सुख व दुःख को अपना सुख वा दुःख जानता है और सभी में एक समान आदर और प्रेम रखता है किसी प्राणी को सताता नहीं वह योगी मेरा परम भक्त हैं।''

ऐसा समदर्शी सच्चा गुरुमुख ही समस्त चराचर विश्व को आत्मा का ही विस्तार समझता है उसके लिये जगत् में द्वैत भाव नहीं रह जाता। वह सम्पूर्ण जीवों से किसी प्रकार की घृणा न करता हुआ सबके लिए अपने ह्मदय में मंगल कामना रखता है।
     ब्राहृनिष्ठ सन्त सत्पुरुष सदा ही निःस्पृह होते हैं। उन्हें संसार से कुछ भी प्रयोजन शेष नहीं रह जाता। वह स्वयं ही ब्राहृस्वरुप,सच्चिदानन्द और सर्वसमर्थ होते हैं। उन्हें प्रत्येक अणु में उस परमात्म सत्ता की ही प्रतीति होती है। वे अपने गुरुमुख सेवकों को भी यह वरदान दिया चाहते हैं कि वे भी ब्राहृ दृष्टि रखने लग जायें जिससे संसार में से भय-कलह-कल्पना-अशान्ति और राग-द्वेष की भावनाओं की इति श्री हो जाये।
      भव से पार होने के लिये तीन कत्र्तव्यों का परिपालन करना अनिवार्य है।
1.तुलसी ममता राम सोंः-अर्थात् परमात्मा अथवा अपने आराध्यदेव भगवान् के प्रति मन में ममता भरी हो अर्थात् साधक अपने प्रेम की तारों को इष्टदेव के चरणों में सुदृढ़ होकर बाँध दे। वह अपने उपास्य देव भगवान् सगुण साकार सन्त सद्गुरुदेव जी में ही उस निराकार-निर्गुण ब्राहृ को प्रत्यक्ष विराजमान होता हुआ देखा करे। अपने ह्मदय की सारी गुत्थियों को उनके सदुपदेश-सेवा और भजनाभ्यास के द्वारा सुलझा कर अपने शरीर-मन-बुद्धि और चित्त को उन्हें समर्पित करदे। जो मन की ममता देह में, इन्द्रियों में, मन-बुद्धि में और सांसारिक बन्धु बान्धवों में अटकी हुई है उसे सब ओर से तोड़ ले और पूर्ण रुप से अपने इष्टदेव जी का ही बन जाय। अपने संकल्प विकल्पों को भी उनके हवाले कर दे फिर भवसागर अपने आप ही ऐसे शुष्क हो जाएगा जिस प्रकार प्रचण्ड-ग्रीष्म काल में छोटी नदियां और सरोवर स्वयं सूख जाते हैं। इसका कारण यह कि सांसारिक पदार्थों और मोह ममता के सम्बन्धों के द्वारा आने वाली कलुषित एवं विषैली भावनाएं उसके मन-बुद्धि और चित्त को चंचल न कर सकेंगी। मन की सारी धारा सन्त सद्गुरुदेव जी की प्रसन्नता को हासिल करने में ही लीन होगी। इसका परिणाम यह होगा कि जीव के मानस सरोवर में भगवान का ध्यान, उनकी रुचिर वचनावलि, उनकी सेवा में दिया हुआ समय, उनके नामाभ्यास की साधना और उनकी ही की हुई आरति-इन सभी शुभ कार्यों की सुगन्धि धीरे धीरे व्याप्त हो जाएगी और साधक अपने इस जीवन में सद्गुरुदेव जी की श्री मौज और आज्ञा के अनुसार किये हुये निष्काम कर्मों का फल अपने भगवान की हार्दिक प्रसन्नता के रुप में स्वयं प्राप्त कर लेगा। इसके अतिरिक्त गुरुमुख साधक का जो समय केवल सांसारिक काम-काज में खर्च होता था और उसमें संसार की कलह-कल्पनाएं मन को और दूषित कर दे सकती थीं। वह अब सागर से पार करने वाले कार्यों में बाधक ना हो पायेंगी। कितना बड़ा लाभ ले लिया एक गुरुमुख जीव ने। ममता को अपने मालिक के लिये सुरक्षित रखना चाहिये। चौबीस घण्टों की दिनचर्या में विशेष करके अपने सन्त सद्गुरु देव जी का ही स्मरण चले। बाहर के कार्यों को भी शरीर-मन और बुद्धि के द्वारा सम्पन्न करना है किन्तु अन्तह्र्मदय में मालिक की मीठी मीठी स्मृति रहना ही चाहिये। ऐसी ममता मनुष्य को आवागमन के चक्र से छुड़ाने वाली है। सन्तों के वचन हैंः-
                 सुमिरण की सुधि यों करै, ज्यों गागर पनिहार।।
                हालै  डोलै  सुरति  में,  कहै  कबीर  विचार।।
पनिहारिनें सिर पर घड़े उठाये बातों का आनन्द लेती हुई घर की ओर बढ़ती चली जाती हैं परन्तु उनके अन्तर्मन में एक यह भावना भी काम कर रही होती है कि हमारे सिर पर रखे हुए घड़ों का सन्तुलन कहीं बिगड़ न जाये नहीं तो सारा हमारा जल ले आने का श्रम निष्फल हो जायेगा। इसी तरह सन्त सद्गुरुदेव जी का अनन्य उपासक एक साधक उनकी आज्ञा के तार में बंधा हुआ व्यावहारिक कार्य प्रसन्न चित्त होकर करता है किन्तु उसके ह्मदय की तलहटी में यह भी गूँज उठा करती है कि मेरा यह कार्य भी परम इष्टदेव जी की प्रसन्नता के लिये ही है । इसे कहते हैं ""तुलसी ममता राम सों''।
     इसके विपरीत मनमुख के मनके टुकड़ों को संसार की मिथ्या माया रुपी चील झपट कर ले जाती है और मनमुख के हाथ में सिवाय कष्ट क्लेश चिन्ता और कल्पनाओं के और कुछ भी नहीं आता जबकि गुरुमुख का किया हुआ सारा श्रम सफल हो जाता है क्योंकि उसके इष्टदेव सन्त सद्गुरु उसकी कमाई को अपने पास सुरक्षित रखते हैं। उस गुरुमुख की जीवन-नैय्या की पतवार विश्वपति के हाथों में है।
2.समता सब संसारः-भव से पार होने के लिये संसार के प्रति एक सच्चे उपासक का दृष्टिकोण समता का होना चाहिये। भक्त साधक ही संसार मे समता की नौका पर सवार होकर भवसागर से अपने प्राणेश सन्त सद्गुरुदेव जी की अकारण कृपा से पार हो जाते हैं। परिपूर्ण सद्गुरुदेव जी के अनन्य भक्त को यह समूचा जगत् बड़ा ही प्रिय लगता है। वह हर किसी से प्यार का ही लेने-देन रखता है। कारण यह क्योंकि उसके अपने मालिक जो ऐसे हैं। उन्हें कभी किसी जीव से घृणा-द्वेष अथवा अप्रीति नहीं होती। श्री भगवान के वचन हैंः- ""समोऽहं सर्वभूतेषु, न में द्वेष्योऽस्ति न प्रियः'' 9/29
ऐ अर्जुन! मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ-मुझे न कोई प्रिय है और न अप्रिय है। इसी प्रकार सच्चा भक्त भी न किसी वस्तु या व्यक्ति से राग रखता है और न द्वेष ही। संसार मे समभाव से विचरण करने वाले पुरुष के अन्दर द्वन्द्व भावनाओं को कोई स्थान नहीं। ऐसा साधक ही आत्मा के साक्षात्कार का उत्तम अधिकारी बन सकता है।
    ""एक दिन अर्जुन ने भगवान से पुनः प्रार्थना की कि मुझे उस गीतामृत के सदुपदेशों का पान करा दो। उस समय आपने ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य और निष्काम कर्मयोग के अति मधुर, शान्तिदायक और रुचिकर वचन सुनाये थे परन्तु उस समय मेरे चित्त के विचलित हो जाने के कारण मुझे भूल से गये हैं।''
     श्री भगवान ने कहाः-""हे अर्जुन! वह समय ही और था-उस समय हमारे चित्त में बड़े गहरे एवं गोपनीय ज्ञान की तरंगें उछल रही थीं। हमने तुम्हें शुक्ल और कृष्णगति के रहस्यों का भी बोध कराया था-अब वह सब कुछ दोहराया न जा सकेगा।'' हां-एक परमसिद्ध ब्रााहृण में जो ब्राहृलोक से इस धराधाम पर उतरे थे और महर्षि काश्यप में जो मोक्षपद के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तर हुये थे उनका सार तुम्हें सुनाता हूँ जिससे तुम्हारे चित्त को परम शान्ति मिलेगी। काश्यप जी ने उस सिद्ध पुरुष से यह प्रश्न किया कि-ब्रााहृण! भवसागर से पार उतरने का क्या उपाय है?
ब्रााहृणः-जो मनुष्य सुख और दुःख दोनों को अनित्य, शरीर को अपवित्र वस्तुओं का समुदाय और मृत्यु को कर्म का फल समझता है तथा सुख के रुप में जो कुछ भी प्रतीत होता है उसे दुःख ही दुःख मानता है वह इस घोर तथा दुस्तर सागर से पार हो जाता है।
काश्यपः-संसार के बन्धन से मुक्त कौन होता है?
सिद्ध ब्रााहृणः-काश्यप! 1. जो मनुष्य (स्थूल, सूक्ष्म, और कारण) शरीरों में से क्रमपूर्वक पूर्व, पूर्व का अभिमान छोड़कर कुछ भी चिन्तन नहीं करता और मौन भाव में रहकर सबके एकमात्र अधिष्ठान परब्राहृ सद्गुरु परमाात्मा में लीन रहता है, वही संसार-बन्धन से मुक्त होता है।
2. जो नियम परायण और पवित्र रहकर सब प्राणियों के प्रति अपने जैसा व्यवहार करता है, जिसके भीतर सम्मान पाने की इच्छा नहीं है तथा जो अभिमान से दूर रहता है वह सर्वथा मुक्त ही है।
3. जो किसी के द्रव्य का लोभ नहीं रखता, किसी का तिरस्कार नहीं करता, जिसके मन पर द्वन्द्वों का प्रभाव नहीं पड़ता और जिस के चित्त की आसक्ति दूर हो गई है वह सर्वथा मुक्त ही है।
4. जो किसी भी कर्म का कत्र्ता नहीं बनता, जिसके मन में कोई कामना नहीं है, जो इस जगत् को अश्वत्थ
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अर्थात अनित्य समझता है तथा जो सदा इसे जन्म-जरा और मृत्यु से युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्य में लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषों पर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने सकल बन्धनों का नाश कर देता है।
5. जिसकी दृष्टि में आत्मा पांचभौतिक गुणों से हीन, निराकार, कारणरहित तथा निर्गुण होते हुए भी (माया के सम्न्बन्ध से) गुणों का भोक्ता मात्र है, वह मुक्त हो जाता है।
ये हैं संक्षिप्त रुप से बताये हुए लक्षण उस मोक्षालिभाषी पुरुष के जो भव से पार हो जाया करता है।
अब हम आते हैं गोसार्इं तुलसीदास जी के दोहे की दूसरी पंक्ति मेंः-
""राग न रोष न दोष दुःख, दास भये भवपार।''
तीसरी उपाय भवजलनिधि से पार उतरने का यह है कि वह साधक इन दोषों से सर्वथा मुक्त होना चाहिये। राग-रोष (खीझना) दोष-दृष्टि और दुःख (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) अर्थात् शरीर के प्रकृती के एवं मन के परिताप-इन सब दोषों से जो रहित हो वह भवनिधी को तर जाने का पात्र है।
     अन्त में एक और गुण की चर्चा भी सन्त तुलसीदास जी कर देते हैं कि मुक्ति के अभिलाषी साधक में दास्यभाव कूट कूटकर भरा होना चाहिये। यदि ह्मदय में दासता,दीनता और गरीबी अथवा खाकसारी नहीं है तो भी उसमें से ऊपर से गिनाये हुए दुर्गुण दूर नहीं हो सकते। और उस साधक से भवनिधि से पार नहीं हुआ जा सकता।
      भगवान् श्री कृष्ण अपने प्रिय सखा अर्जुन को उस सिद्ध ब्रााहृण और काश्यप मुनि का संवाद सुनाते हुए आगे कथन करते हैं कि उस ब्रााहृण ने काश्यप को वे योगसाधन भी बतलाये जिनके अपनाने से जीव भव से सहजरुप में पार हो जाता है। इस सुरत-शब्द-योग के साधन से जीव में राग (लगाव) रोष बात बात में खीझ उठना-दूसरों के दोषों पर निगाह रखना और किसी प्रकार के सुख-दुःख का अनुभव करना-ये सारे दुर्गुण स्वयमेव शान्त हो जायेंगे और जीव सच्चे अर्थों में "दास' बनने के प्रयत्नों में पूर्णतया सफल हो जायेगा।
सिद्ध ब्रााहृण ने कहा कि हे काश्यप! अब मैं उस सर्वोत्तम योग का वर्णन करुंगा जिससे कोई भी पुण्यात्मा सहजभाव से आत्म साक्षात्कार कर लेता है। सबसे पूर्व तो उस आत्मदर्शन के उत्सुक योगशील पुरुष को परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव जी की पुनीत चरण-शरण ग्रहण कर लेनी चाहिये। बिना उनकी प्राप्ति के यह जीव कभी भी अपने मन की अटपटी चालों को समझने में स्वयं सफल न होगा। निराकार मन यद्यपि कोई आकार-प्रकार नहीं रखता परन्तु परिसूक्ष्म आत्मा के दर्शनों की अभिलाषा इसकी कभी पूर्ण न होगी जब तक यह सगुण साकार ब्राहृस्वरुप सन्तसद्गुरुदेव जी के गुप्त मन्त्र नाम से परिचित न हो जायेगा। वह नाम-मन्त्र ही इसके मन के भीतर बैठे हुए छः प्रबल रिपुओं को जिनके नाम ये हैं ""काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार और मात्सर्य अर्थात् ईष्र्या'' साँप सुँघाने में समर्थ है। सन्त सद्गुरु ही परब्राहृ हैं-सन्त रुप में इसी हेतु ही अवतरित होते हैं कि अभ्यास-परायण जीवों के मन को सुनिर्मल कर दें। वो इस देवदुर्लभ मानुष देह में आई हुई आत्मा को फिर से भवसागर की उत्ताल तरंगों में उतराता हुआ नहीं देख सकते। गुरुमुख बनना एक निर्वाण पद के अभिलाषी को अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि कलि-कुटिल मन रुपी महानाग को शब्द रुपी गारूड़ी मन्त्र देकर वशीभूत करना केवल सन्त सत्पुरुष ही जानते हैं। ""शब्द बिना साधू नहीं-द्रव्य बिना नहिं साह।'' धन सम्पत्ति के बिना कब कोई सेठ कहलाया इसी तरह जिस साधु ने शब्द की कमाई नहीं की वह अभी साधना-पथ में है। परमपद का इच्छुक सद्गुरुदेव जी की पावन शरण लेकर उनसे शब्द मन्त्र की दीक्षा ले ले। उसकी प्रचण्ड साधना करे। सन्त सद्गुरुदेव जी की आज्ञा और मौज के
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अनुसार चलने को ही अपना मुख्य धर्म माने, अपने मन का योग उनके ही श्री चरणारविन्दों से कर दे। यह है वास्तविक सहजयोग। इसे ही गीता के चौथे अध्याय में राजयोग कहा गया है-इसके लिये साधक को इतनी विनय अवश्य कर लेनी चाहिये कि ""ऐ मेरे परब्राहृ सन्त सद्गुरुदेव जी! मुझे सर्वदा ही अपने चरण कमलों का दास बनाओ। दास बनने में ही असीम सुख है-परमशान्ति है और है दिव्य आनन्द।''
     सन्त तुलसीदास जी ने भी इस दोहे के अन्तिम चरण में "दास पद का प्रयोग बड़ी कुशलता से किया है-"दास भये भवपार' अर्थात् दास बनने पर ही भवपार हुआ जा सकता है। दास भाव एक ऐसा उज्जवल रत्न है जो एक भक्त की सारी साधना को अलौकिक ज्यति से भर देता है। साधक सब कुछ करता हुआ भी अपने को अकत्र्ता मानता है-कत्र्तृत्व के अभिमान को झटकाते रहना ही गुरु भक्ति की अन्तिम मंज़िल पर पहुँचना है।
     अपने में "दासता' की भावना को उतार लेना बड़ा ही उच्चतम काम है। दासभाव में अभिमान का लेशमात्र भी शेष नहीं रह जाता। अहन्ता का परित्याग न करना है भवसागर में बने रहना है। श्री तीसरी पादशाही जी फरमाया करते थे कि ""गुण देखो तो हम में देखो और दोष देखो तो अपने में''-मनुष्य क्या है दोषों, अवगुणों और त्रुटियों का पुतला। जीव बुद्धि में पूर्णता आ ही नहीं सकती। जीव भाव को समूल काटने के लिये अत्यावश्यक है कि जीव हर समय अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु देव जी के द्वार पर पड़ा रहे और आठों पहर यही विनय करे किः- दीनता ही भक्त का ऋंगार है।
करता केरे बहुत गुण, औगुण कोई नाहिं। जे दिल खोजौं आपणा, तौ सब औगुण मुझ माहिं।।
तुम तो समरथ साँइयां, दृढ़ करि पकरो बाहिं।।  धुर ही लै पहुँचाइयो , जनि छाँड़ो मग माहिं।।
""आप सर्वकला समर्थ परिपूर्ण इष्टदेव हो मेरे-आप सकल गुणों के अक्षय भण्डार हो-आपमें कोई भी अवगुण हो ही नहीं सकता। मेरे देव! सम्पूर्ण दोष तो मेरे ही इस अन्तर्मन में खचाखच भरें हैं-एक भी गुण ढूँढ नहीं मिलता।''
      ""आप परम शक्तिमान हैं मेरे प्राणेश्वर! मेरी भुजा को बड़ा दृढ़ता से थाम लीजिए-और मुझे परमपद तक पहुँचा दें, मार्ग में न छोड़ देना-अपने आप अकेले बिना आपका सहारा लिये भवसागर से निकल जाना मेरी शक्ति से बाहर है।''
     सार यह कि भवसागर से पार होने के लिये इन अंगों का परिपालन करना अत्यावश्यक है-1. अपने परमाराध्यदेव के चरणारविन्दों में गहरी ममता हो। 2. जगत् के जीवों के साथ समता का भाव रखकर सारा कार्य-व्यवहार करे। 3. अन्तःकरण में राग-रोष-दोष और दुःख में से किसी का भी बीज न हो और अन्त में साधक पुरुष में दास भाव का होना अनिवार्य है। हम भी इस कल्याण चाहने वाले पथ पर पग रख कर भवजलनिधि से पार हो जायें।

1 comment:

  1. बहुत ही उपादेय लेख। अनेक मानसिक जिज्ञासाओं के सरल सरल समाधान पथ यहां उन्मोचित किया गया है। लेखक तथा सभी संश्लिष्ट महानुभवों को सश्रद्धः नमन।

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