Sunday, January 1, 2017

स्वार्थ और परमार्थ


     संसार में दो चीज़ें चलती हैं-एक स्वार्थ और दूसरा परमार्थ। स्वार्थ का सम्बन्ध संसार के साथ तथा हमारे शरीर के साथ है, जबकि परमार्थ का सम्बन्ध हमारी आत्मा और परलोक के साथ है। मनुष्य संसार में क्यों आया और उसके जीवन का क्या लक्ष्य है? प्रायः यही देखने में आता है कि यदि किसी ने अपना मकान बना लिया और साथ ही मान प्रतिष्ठा भी प्राप्त कर ली, खाने पीने के सामान भी मिल गये, तो वह समझने लग जाता है कि मेरा जीवन सफल हो गया। यदि यह बात ठीक है तो प्रश्न उठता है कि क्या अपने रहने के लिये आवश्यकता अनुसार एक चिड़िया अपना घर नहीं बना लेती? क्या चूहा अपने रहने के लिये बिल नहीं खोद लेता? चींटी भी अपना घर बना लेती है और उसमें अपने शरीर के पालन-पोषण का सामान एकत्र कर रखती है। साधारण से साधारण जीव भी अपने पेट पालने की समझ रखता है। यदि मनुष्य ने भी संसार में आकर यही कुछ काम किया तो इसके आने का विशेष लाभ ही क्या है? मनुष्य योनि को श्रेष्ठ प्राणी कहा गया है अर्थात् संसार में जितने भी चर अथवा अचर प्राणी हैं, उन सबमें से ये श्रेष्ठ है। इन सब से बढ़कर होने पर मनुष्य ने कौन सा विशेष काम किया? एक फकीर का कथन है-
       वक्त गुज़रां है मेहर गुज़र जाता है।
         इनसान आता है और आ के मर जाता है।।
             है जिन्दाए-जावेद वही नेक अंजाम।
                जो आके दुनियां में कुछ काम भी कर जाता है।।
समय पल-पल घड़ी-घड़ी करके व्यतीत हो रहा है। मनुष्य संसार में आया और चला गया। समय आया और गुज़र गया तथा बाद मे मनुष्य का नामोनिशान मिट गया, परन्तु वही जीव सदैव के लिये जीवित है जिसका नाम शुभ कर्मों से कायम हो गया, जिसको लोग अच्छी दृष्टि से देखें।
     देखने में तो सब लोग संसार में काम कर रहे हैं, परन्तु देखना यह है कि जिस विशेष कार्य करने के लिये मनुष्य संसार में आया था, वह हो रहा है अथवा समय यूंही व्यर्थ बीतता जा रहा है। इस अचेतता से जगाने के लिये महापुरुष संसार में आते हैं और जीवों को चेतावनी देते हैं कि जाग कर अपना वास्तविक काम करो। यह चेतावनी केवल सन्तों के सत्संग में ही मिल सकती है। सत्संग में पहुँच कर मनुष्य को अपने काम की समझ आती है। सन्तों के सिवा मनुष्य को कोई भी अपना काम नहीं जतला सकता।
     जीव का अपना काम तो है परमार्थ अर्थात् आत्मा का कल्याण। स्वार्थ तो सभी योनियां कर रही हैं, जिनका सम्बन्ध केवल शरीर और संसार के साथ है। मनुष्य के ज़िम्मे तो परमार्थ का काम है जो इसने करना है। परमार्थ से भाव है अपनी आत्मा का मालिक से मिलाप कराना। यदि यह काम नहीं किया तो मनुष्य ने कुछ भी नहीं किया। इस हिसाब से परमार्थी जीवों के शरीर का कितना मुल्य है। जो आत्मायें स्वयं अपना भी कल्याण करती हैं और उनके द्वारा अनेकों आत्माओं का कल्याण भी होता है, ऐसी आत्मायें धन्यवाद के योग्य हैं। संसार में अनेक छत्रपति राजा और महाराजा हो गुज़रे। आज हम उनका जब स्मरण करते हैं तो क्या हमारा सिर श्रद्धा के साथ झुक जाता है? ऐसा नहीं होता। वे नमस्कार करने के योग्य इसलिये नहीं होते कि संसार में आकर उन्होंने स्वार्थ का ही काम किया। इसके विपरीत भक्त लोग धन करके गरीब थे, परन्तु उन्होंने परमार्थ का ही काम किया। निःसन्देह उनको संसार से अलोप हुये लाखों वर्ष बीत गये हैं, परन्तु जब उनकी याद आती है अथवा हम उनकी वाणियां ग्रन्थों में पढ़ते हैं तो हमारा सिर श्रद्धा से झुक जाता है। इतिहास बतलाता है कि परमसन्त श्री कबीर साहिब के घर सदैव साधु आया जाया करते थे, परन्तु दशा यह थी कि प्रातः का आटा घर है तो सांय का नहीं होता था। इसी प्रकार भक्त नामदेव, भक्त रैदास, शबरी भीलनी-जितने भी भक्त एवं सन्त संसार में हुये प्रायः सभी धन करके गरीब थे, परन्तु थे वे परमार्थी। उनके वचन जब हम सुनते हैं अथवा उनके निष्काम श्रेष्ठ कर्मों का स्मरण हो आता है तो श्रद्धा रुपी गर्दन स्वाभाविक ही झुक जाती है।
     रावण और विभीषण दोनों सगे भाई थे। रावण स्वार्थी और विभीषण परमार्थी था। दोनों का परिणाम भी भिन्न भिन्न है। दशहरे के दिन लोग रावण का पुतला बनाकर उसको आग लगा कर आनन्द मनाते हैं और मिठाईयां बांटते हैं। कितनी प्रभुता का मालिक था रावण, परन्तु भक्ति परमार्थ की उसमें बू भी नहीं थी। विभीषण तीन कपड़ों में लंका को छोड़ कर भगवान राम की शरण में गया, केवल परमार्थ के लिये। आज उसे लोग श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं तथा उसका नाम श्रद्धा से लेते हैं।
     परमार्थी जीव जिन्होंने अपना कल्याण भी किया और साथ में दूसरों के कल्याण में भी सहायक बने, ऐसे जीवों के शरीरों का मूल्य सन्तों के दरबार में तथा मालिक के दरबार में भी उन जीवों से कई दर्ज़े बढ़कर है जिन्होने केवल स्वार्थ ही कमाया। ऐसे परमार्थी जीव जो सदा परमार्थ में प्रवृत्त रहते हैं, उनका अपने परमार्थी शरीर की रक्षा करना भी परमार्थ में ही सम्मिलित है। इसी विषय में काकभुशुण्डि जी और गरुड़ जी का संवाद जो रामायण में आया है, उसमें गरुड़ जी प्रश्न करते हैं कि हे स्वामिन्! आपका शरी़र कौवे का है। कौवा वैसे भी नीच पक्षी माना गया है। जब आपकी कमाई इतनी है कि आप अपनी इच्छा अनुसार शरीर बदल सकते हैं तो आपने कौवे के शरीर को क्यों रखा हुआ है। गरुड़ जी ने इस प्रकार कई प्रश्न काकभुशुण्डि जी के सामने बड़ी श्रद्धा पूर्वक रखे। जिनका उत्तर काकभुशुण्डि जी ने बड़ी नीति के अनुसार दिया। सत्संग का आनन्द भी तभी आता है जब गरुड़ जैसे श्रोता और काकभुशुण्डि जैसे वक्ता हों। जब श्रोता वक्ता के समक्ष श्रद्धा के साथ कोई प्रश्न रखता है जिसको वह स्वयं नहीं जानता और समझने का इच्छुक है, तब वक्ता को भी यह पता चलता है कि श्रोता कितनी सावधानी वचन सुन रहा है और कितनी उसमें योग्यता है। काकभुशुण्डि जी उत्तर देते हैंः-
                राम भगति एहि तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।
                तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु वेद भजन नहिं वरना।।
     अर्थः-चूंकि मुझे इसी शरीर से मेरे ह्मदय में मालिक की भक्ति उत्पन्न हुई, इसी से हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है। मेरा मरण अपनी इच्छा पर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता, क्योंकि वेदों ने वर्णन किया है कि शरीर के बिना भजन नहीं होता।
     कथा हैः-तीसरी पादशाही श्री गुरु अमरदास जी को वृद्धावस्था में गुरु-गद्दी मिली। एक बार एक मुसलमान दरवेश उनके दर्शनों को आये, देखा तो वे भजनाभ्यास में लीन थे। फकीर जी प्रतीक्षा में बैठ गये कि जब वे भजन से उठेंगे तो वार्तालाप करेंगे। कुछ देर वे पश्चात जब श्री गुरु अमरदास जी भजन से उठे तो उन मुसलमान दरवेश ने प्रश्न किया-महाराज! अब तो आप पदवी के मालिक हैं, अब आपको भजन करने की क्या आवश्यकता है? श्री गुरु अमरदास जी ने एक प्रमाण देकर समझाया कि एक ग़रीब मनुष्य को मिट्टी छानने की आदत थी। वह किसी न किसी मार्ग पर बैठ कर प्रतिदिन मिट्टी छाना करता था। एक दिन उसको मिट्टी में से लाल मिल गया, जो लाखों के मूल्य का था। लाल को पाकर वह धनवान तो बन गया, परन्तु मिट्टी छानने के काम को उसने फिर भी न छोड़ा। किसी ने पूछा भाई! अब तो तुम सेठ बन गये हो, अब मिट्टी किसलिये छानते हो? उत्तर मिला कि मिट्टी से मुझे लाल मिला है, इसलिये मेरा इसके साथ प्यार है।
यह उदाहरण देकर श्री गुरु अमरदास जी ने फरमाया-फकीर सार्इं! मुझपर जो अपने सद्गुरुदेव जी की कृपा हुई है, वह इसी सेवा-भजन के कारण ही हुई है। और आपको यह भी ज्ञात हो कि सत्पुरुषों की सेवा भी दो प्रकार की है-एक सूक्ष्म और दूसरी स्थूल। स्थूल सेवा वह है जो आज्ञा और मौज अनुसार शरीर द्वारा की जाती है और सूक्ष्म सेवा वह है जो उनकी पवित्र मौज में सुरत-साधना की जाती है। हम इन दिनों उनके पवित्र आदेश अनुसार हर समय सुरत-साधना का अभ्यास किया करते हैं। इससे हमें उनकी दैवी प्रसन्नता प्राप्त होती रहती है। यही कारण है कि हमें भजनाभ्यास से प्यार है। यह सुनकर उस दरवेश ने श्री गुरु महाराज जी के चरणों में सिर झुकाकर नमस्कार किया। काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी को पुनः उपदेश करते हैंः-        पाट कीट तें होइ, तेहि तें पाटंबर रुचिर।
                कृमि पालइ सबु कोई, परम अपावन प्राण सम।।
अर्थः-रेशम कीड़े से होता है; उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसी से उस परम अपवित्र कीड़े को भी सब कोई प्राणों के समान पालते हैं।
      इन प्रमाणों से यह सिद्ध हो जाता है कि मनुष्य का वास्तविक काम है परमार्थ करना अर्थात् अपनी आत्मा का कल्याण करना और दूसरों के कल्याण में सहायता करना। ऐसे परमार्थी शरीर अमूल्य हैं। परमार्थ का काम सन्तों के बिना और कोई सिखा भी नहीं सकता। सन्तों के पास जाकर सत्संग सुनना, उसपर आचरण करना और दूसरों के सुनाना भी परमार्थ है। कई लोग ऐसा भी कहते हैं कि सत्संग सुनना तो सरल है, परन्तु दूसरों को सुनाना कठिन है।
     एक बार एक जिज्ञासु श्री गुरु महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी के दर्शनों को आया। जब वह प्रेमी आज्ञा पाकर घर जाने लगा तो श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि तुम बाहर सत्संग-उपदेश का भी काम किया करो। प्रेमी ने उत्तर दिया-महाराज! मैं तो अनपढ़ हूँ? पोथी पढ़ना भी नहीं जानता, दूसरों को कैसे सत्संग सुना सकता हूँ? श्री गुरु महाराज जी ने मुस्करा कर ये वचन फरमाये-सत्संग इसका नाम नहीं कि पोथी ही पढ़कर सुनाई जावे। तुम सेवा करते हो, भजन करते हो, दर्शन करते हो, तुम्हारा जीवन आचरणमय है। बस,यही बातें दूसरों को सुनाया करो। यही वास्तव में सत्संग है, सत्संग इसके अतिरिक्त कोई और वस्तु नहीं है। सत्संग का अर्थ है स्वयं आचरण करना और दूसरों को सुनाना। यदि आपका जीवन आचरणमय है तो चाहे आप न भी बोलें, दूसरों पर अवश्य ही प्रभाव पड़ेगा। सदैव खरबूज़े को देखकर खरबूज़ा रंग पकड़ता है। जिसका जीवन आचरणमय है, वह स्वयं भी तरेगा और अनेकों को तारने वाला बनेगा। जैसे वर्णन हैः-
                जिनी नामु धिआइया गए मसकति घालि।
                नानक ते मुख उजले केती छुटी नालि।।
     जिन्होंने नाम की कमाई की, उन पर कठिनाईयां और कष्ट भी आये। उनका मुकाबिला करते हुये भी वे अपने काम में लगे रहे। परिणाम यह हुआ कि उनका मुख परलोक में उज्जवल हुआ और लोक में कीर्ति छा गई। वे स्वयं भी तर गये और कई लोग भी उनकी संगत में आकर तर गये।
      जीव काल और माया के बंधन में जन्म-जन्मान्तरों से आया हुआ दुःखी और परेशान है। महापुरुष परमार्थ-स्वरुप होते हैं। वे जीवों को इस बन्धन से मुक्त कराने तथा उन्हें सुख एवं शान्ति प्रदान करने के लिये ही प्रत्येक युग में अवतार धारण करते हैं और हमारे मध्य आ जाते हैं। जब एक दुर्बल मनुष्य दलदल में फँस जावे तो एक अन्य शक्तिशाली मनुष्य यदि उसे बाहर निकालना चाहे, तो उसे भी दलदल में प्रवेश करना पड़ता है। दूर खड़े होकर आवाज़ लगाने से ही दुर्बल व्यक्ति दलदल से बाहर नहीं निकल सकेगा। ठीक इसी प्रकार संसार भी दलदल की भांति अथवा जेल के समान है जिसमें अज्ञानी जीव काल एवं माया की कैद में हैं। सन्त सद्गुरु जो धुर देश के वासी होते हैं, वहां से उतर कर संसार की कैदखाने से जीवों को मुक्त कराने के लिये आ जाते हैं। जो भी उनका पल्ला दृढ़ता से पकड़ लेता है, वह सहज ही इस बंदीगृह से मुक्त हो जाता है।
                हेच नकुशद नफ़स रा जुज़ ज़ुल्ले-पीर।
                दामने आँ नफ़स कुश रा सख़्तगीर।।
      पूर्ण सन्त सद्गुरु के बिना कोई भी नफ़स अर्थात् मन को वश में नहीं कर सकता। इसलिये ऐ जिज्ञासु! तू पूर्ण सन्त सद्गुरु का पल्ला दृढ़ता के साथ पकड़ ले। अर्थात सन्त सद्गुरु के वचनों की दृढ़ता से पालना कर और कमाई कर।
      कथा हैः-छटी पाद्शाही श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी के समय के शासक ने किसी कारण ग्वालियर के किले में नज़रबन्द कर दिया। न जाने इसमें मालिक का क्या भेद था, इसको तो स्वयं महापुरुष ही जानते हैं। उसी किले में रियासतों के 52 राजे भी बादशाह ने पहले से कैद कर रखे थे। उनको जब महापुरुषों की संगत प्राप्त हुई तो वे सब उनके श्रद्धालु बन गये, और सभी राजे उनके शिष्य हो गये और उनके सत्संग से लाभ उठाने लगे।
                सन्त नदी जल मेंघला, चलें विहंगम चाल।
                रज्जब जहां जहां पग धरें, तहां तहां करें निहाल।।
     कुछ समय के पश्चात् श्री गुरु महाराज जी की रिहाई का निर्देश हुआ। श्री गुरु महाराज जी ने बादशाह को सन्देश भेजा कि हम तभी बाहर जावेंगे जब इन 52 राजाओं को भी स्वतंत्र किया जाये। श्री गुरु महाराज जी का सन्देश पाकर बादशाह ने कहला भेजा कि किले में से बाहर निकलने समय जो भी आपका पल्ला पकड़ लेगा, वह आपके साथ रिहा हो सकता है। श्री गुरु महाराज जी ने एक बहुत बड़ा 52 कलियों वाला चोला सिलवा कर पहन लिया। सभी राजाओं ने एक-एक कली हाथ से पकड़ ली और इस प्रकार सबके सब राजे श्री गुरु महाराज जी के साथ रिहा हो गये। इसी प्रकार जो जीव भी अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु का आंचल दृढ़ता से पकड़ लेता है, अर्थात् उनके शब्द को दृढ़ता से पकड़ लेता है, वह भी उस शब्द के सहारे मोह माया की कैद से सहज में ही छूट जाता है।
      इसका नाम है परमार्थ। सन्त महापुरुष परमार्थ रुप होते हैं और दूसरों को परमार्थी बनाते हैं। जिसने परमार्थ कर लिया, उसने सब कुछ कर लिया। उसका संसार में आना सफल है। धन्य हैं ऐसे जीव और धन्य है उनकी कमाई जो सद्गुरु की चरण शरण में आकर स्वयं भी तरें और दूसरों को तारने वाले बनें। यही मनुष्य जन्म का सच्चा लाभ और वास्तविक उद्देश्य है।

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