Thursday, September 29, 2016

वर्तमान समय की कद्र करो


     जो समय बीत चुका है, उसको स्मरण न करो, जो आने वाला है उसकी चिंता न करो; जो समय चल रहा है उसी में ही मन से नाम-सुमिरण, तन से शुभकर्म करते चलो। इससे यह जीवन भी आनन्द से व्यतीत होगा और परलोक भी संवर जायेगा।
     इस वचन में जीवन की सफलता और अनन्त सुख समाया हुआ है। संसार की ओर दृष्टिपात करने पर हम पायेंगे कि लाखों-करोड़ों व्यक्ति बीती हुई बातों को स्मरण कर-करके उनकी ही चिंता में वर्तमान समय को भी व्यर्थ कर देते हैं और लाखों-करोड़ों व्यक्ति भविष्य की चिंताओं के बोझ तले दबे रहते हैं। मनुष्य को उचित है कि भूत और भविष्य की चिंता त्याग कर वर्तमान समय का लाभ उठाये। सत्पुरुषों का कथन हैः-    गुज़श्ता ख़्वाब व आयंदा ख़्याल अस्त।
                ग़नीमत दां हम र्इं दम के हाल अस्त।।
अर्थः-बीता हुआ समय स्वप्न और आने वाला विचार के समान है। लाभदायक और उत्तम समय तो वही है जो आज हमारे पास है। इसीलिये इन वचनों में यह फरमाया गया है कि भूत और भविष्य के व्यर्थ बोझ में न दब कर वर्तमान समय की कद्र करो और इसी में ही अपना काम संवार लो। इसी एक वचन पर आचरण करने से करोड़ों जीव दुःख और चिंताओं के बोझ से मुक्त होकर सुखी बन जाते हैं।
     जब कोई मनुष्य शरीर त्याग देता है तो आम बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि ""अमुक व्यक्ति गुज़र गया।'' गुज़र गया का अर्थ है जो अब नहीं रहा। इसलिये जो गुज़र जाता है उसे या तो कब्रा में गाड़ दिया जाता है या चिता में रखकर जला दिया जाता है अथवा जल में बहा दिया जाता है। तनिक सोचो यदि कोई शव को कब्रा से निकाल कर गले लगाने का यत्न करे तो सिवा दुर्गन्ध और रोग के उसके पल्ले और क्या पड़ेगा? ऐसे ही जो व्यक्ति बीते हुये समय को अथवा बीती हुई बातों को बार-बार स्मरण कर अर्थात् उनसे चिपक कर वर्तमान समय को बिना सुमिरण के व्यर्थ गंवा दे और माया के संस्कारों को ह्मदय में स्थान दे तो ऐसे व्यक्ति के बारे में सत्पुरुष ये फरमाते हैंः-
                निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा।
                आवै जाइ भवाईऐ बहु जोनि नचा।। गुरुवाणी मारू म.-5
निर्भय बनाने वाली वस्तु थी नाम, उसे तो भुला दिया और माया के पदार्थों से सुरति जोड़ ली। ऐसा मनुष्य बार-बार आएगा और जाएगा, बार-बार अनेक योनियों में नाचता फिरेगा; भाव यह कि जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहेगा।
     सन्त फरमाते हैं कि एक ओर तो नाम-सुमिरण है और दूसरी ओर माया की रचना है। जो मनुष्य नाम को भुला कर माया का सुमिरण करता है, वह स्वयं को दुःखों में डालता है और शत्रुता एवं वैर-विरोध की अग्नि में जलता रहता है। ऐसे मनुष्यों की संसार में कमी नहीं है जो कहते हैं कि वर्षों पहले की बात है अमुक व्यक्ति ने मेरे साथ दुव्र्यवहार किया था और मुझे अपशब्द कहकर मेरे साथ अशिष्टता से पेश आया था। वे बातें मुझे भूली नहीं हैं। अब विचार करो कि जिसके ह्मदय में ऐसी ऐसी दुःख देने वाली, द्वेषपूर्ण एवं ह्मदय में चुभने वाली बातें घर किये हों,उसके ह्मदय में सुखदायी वस्तु ""नाम'' कहां टिक  सकता है? वह तो बला लेने की युक्तियां सोचता रहेगा। इस नियम का उसे पता ही नहीं कि दूसरे को दुःख तब पहुँचाया जा सकता है जब पहले अपने भीतर दुःख का विचार उत्पन्न करके अपने आपको दुःख की अग्नि में जलाया जाता है। माचिस की तीली दूसरे को जलाने से पूर्व स्वयं को जलाती है।
     द्रौपदी ने दुर्योधन से इतना ही तो कहा था कि ""अन्धे की अन्धी सन्तान''परन्तु इन शब्दों को दुर्योधन ने ह्मदय में रख लिया और क्रोध के वश होकर प्रतिज्ञा कर ली कि मैने इन शब्दों का प्रतिकार लेना है और इसी कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ जिसमें करोड़ों व्यक्तियों के प्राण चले गये। यदि दुर्योधन के ह्मदय में नाम का निवास होता तो उस व्यंग्य को भूल जाता और उसे ह्मदय में स्थान न देता और न ही इतना रक्तपात होता। इसीलिये सत्पुरुष सदैव यही उपदेश करते आये हैं कि सिवा मालिक के नाम के और कोई बात ह्मदय में न रखो।  सभे गलां बिसरनु इको विसरि न जाउ।।
श्री गुरुनानक देव जी फरमाते हैं कि अन्य सब बातों को भुला दो किन्तु एक मालिक का नाम कभी न भूलने पाये। नाम एक ऐसी औषधि है जिसके प्रयोग करने से मनुष्य दुःखों और कष्टों से बच जाता है। प्रभु के सुमिरण से ही दुःखों का विनाश होता है तभी तो सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
                सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ।
                कलि कलेस तन माहि मिटावउ।।   गुरुवाणी सुखमनी
अर्थात् मालिक के नाम का सुमिरण करो और सुमिर-सुमिर कर सुख की प्राप्ति कर लो और कलिकाल के कष्ट-क्लेश तन में से दूर कर दो।
     एक प्रसिद्ध लेखक लिखता है कि हस्तपतालों में जितने रोगी आते हैं, उनमें से आधे से अधिक तो चिंताओं के कारण ही बीमार पड़ते हैं और उनके मन पर भूत और भविष्य का अत्याधिक बोझ होता है। इसी कारण उन्हें नसों का रोग, रक्तचाप आदि हो जाते हैं और यही रोग घुन बनकर उनके जीवन को चट कर जाते हैं।
     एक महात्मा जी एक स्थान पर प्रतिदिन सत्संग किया करते थे। काफी संगत वहां सत्संग श्रवण करने के लिये एकत्र हो जाया करती थी। एक दिन कोई नया व्यक्ति सत्संग श्रवण करने आया और उसने महात्मा जी से प्रश्न किया कि इन सत्संगियों में से कौन सा मनुष्य सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है? महात्मा जी ने सामने बैठे हुये एक सत्संगी की ओर संकेत करके फरमाया कि यह सत्संगी सदैव आनन्द में रहता है। उसने पुनः प्रश्न किया को कौन से गुण के आधार पर यह भाग्यशाली व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है? महात्मा जी ने उत्तर दियाः-
                बीती को चितवै नहिं, आगे करे न शोक।
                वर्तमान में वरत रहे, सत्संगी निर्दोष।।
     इसमें यही गुण है कि बीती को स्मरण नहीं करता और भविष्य की चिंता नहीं करता। वर्तमान को ध्यान में रखकर निरंतर भक्तिमार्ग पर आगे पग बढ़ाता हुआ यह सत्संगी सदैव सुखी और प्रसन्न जीवन व्यतीत करता है। अन्य और भी जितने सत्संगी यहां आया करते हैं अथवा इस समय बैठे हैं, सब में शनैः शनै, उन्नति हो रही है और इस उपर्लिखित बात को ध्यान में रखकर उस पर आचरण करने का सब प्रयत्न कर रहे हैं। जितना जितना इनका आचरण है, उतना-उतना इनको सुख भी प्राप्त है। दुःख तो उनकी दशा पर है जो वर्तमान को भुला कर भूत एवं भविष्य की चिंताओं में खोये रहते हैं, जैसे कथन हैः-
                किनी माज़ी मन में किनी मुस्तकबाल।
                हैफ़ तिनां दे हाल पर जिन भुलाया हाल।।
प्रश्न करने वाले ने हाथ जोड़ कर विनय की-महाराज! एक प्रार्थना मेरी भी सुन लीजिये कि मुझे ईष्र्या का रोग अत्यन्त व्याकुल करता है किसी को अपने से अच्छा खाता-पीता अथवा प्रसन्न जीवन व्यतीत करता देखूं तो मेरे मन में बड़ी जलन उत्पन्न होती है। मुझे भी कोई ऐसा हितकर उपदेश देने की कृपा करें जिससे मेरा जीवन सुधर जाये।
     महात्मा जी ने फरमाया-भैया! ये वस्तुयें तो प्रत्येक को अपने-अपने प्रारब्ध के अनुसार ही मिलती हैं। सत्य पूछो तो इन वस्तुओं में रखा ही क्या है? सत्पुरुषों ने सत्य ही फरमाया हैः-
                जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत।
                कहि नानक थिरु न रहै जिउ बालू की भीत।।
आत्मिक उन्नति का सम्बन्ध इन वस्तुओं से कदापि नहीं है। प्रारब्ध अनुसार जैसी भी प्राप्त हो उसी में ही प्रसन्न रहना चाहिये। किसी ने क्या ही सुन्दर बात कितने साधारण शब्दों में कही हैः-
                किसी की किस्मत में हैं लड्डू पेड़े खाने को।
                तेरी किस्मत में गर छोले खुशी से तू चबाता जा।।
                हैं किस्मत में किसी की मोटर गाड़ियां चढ़ने को।
                तुम्हारी किस्मत में पैदल खुशी से पांव बढ़ाता जा।।
                चला चल चला चल का चक्र चल रहा दिन रात।
                चलते को तू चलाता जा गुज़रते को भूलाता जा।।
इस उपदेश को सुन कर उस नये सत्संगी भक्त ने महात्मा जी को बहुत धन्यवाद दिया। अपने जीवन को इस उपदेश के सांचे में ढालने से उसने भी कुछ ही दिनों में सच्चा सुख प्राप्त कर लिया। सचमुच ही उसका जीवन संवरने और सुधरने लगा।
     सन्तों का उपदेश है कि ""तुम्हारा यह कर्तव्य नहीं है कि कल की चिंता में आज की शक्ति को भी व्यय कर दो। कल भी जब आज का रुप धारण कर लेगा। तब उसका सत्कार करना।'' सत्पुरुषों के एक-एक वचन में लोक-परलोक का सम्मान और सच्चा सुख समाया हुआ है। जो भी उनके श्री वचनों पर आचरण करता है, वही सच्चे सुख को प्राप्त करता है। इसमें किसी देश अथवा जाति का कोई प्रश्न नहीं है; भारतीय हो अथवा विदेशी, हिन्दू हो अथवा मुसलमान, अंग्रेज़ हो अथवा पारसी, इससे प्रत्येक को एक समान लाभ पहुंचता है। इसलिये हम भी यदि उपर्लिखित श्री वचन के मार्गदर्शन में उस पर आचरण करते हुये अपने जीवन की यात्रा तय करेंगे तो निश्चय ही हम यह जीवन-यात्रा भी आनन्दपूर्वक तय करेंगे और अपना परलोक भी संवार लेंगे। ऐसा ही वरदान श्री सद्गुरुदेव जी ने अपने श्री पवित्र वचन में फरमा दिया है।

Friday, September 23, 2016

शुभ जन्म दिवस 20 सितम्बर 1926


     हमारे इष्टदेव,ह्मदय सम्राट, युग पुरुष,श्री परमहँस अद्वैत मत के पंचम रूहानी जानशीन श्रीश्री 108श्री हुज़ूर सतगुरु देव दाता दयाल जी का आज 91 वाँ (2016) अवतरित दिवस है आज के इस शुभअवतरित दिवस की सबको लाखों लाख मुबारिकवाद हो। मैं अपनी तरफ से और सभी गुरुमुखों की तरफ से श्री परमहँस महान विभूतियों के श्री चरण कमलों में एवम् श्री हुज़ूर सतगुरु देव दाता दयाल जी के श्री चरण कमलों में शुभ कामनाओं के साथ लाखों लाख मुबारिकबाद अर्पित करता हूँ। तुम जियो हज़ारों साल के साल के दिन हों पचास हज़ार ये हमारी है आरज़ू।
     सन्त महापुरुषों का सृष्टि में अवतार संसार में भूले भटके जीवों को सन्मार्ग दर्शाने के लिये,उन्हें काल और माया की कैद से छुड़ाकर दुःखी से सुखी बनाने के लिये ही होता है। वे अपने भक्तों की खातिर कभी राम,कभी कृष्ण,कभी श्री गुरुनानक,के रूपों में हर युग युग में प्रकट हुआ करते हैं। इस वर्तमान युग में भी श्री परमहँस महान विभुतियों के रूप में प्रकट हुये हैं। इसी परम्परा केअनुसार ही आज के दिन बीस सितम्बर सन् ईस्वी 1926 सोमवार के शुभ दिन गाँव रायपुर कलाँ,तहसील अजनाला,जिला अमृतसर, पँजाब में श्री परमहँस दयाल जी के पंचम स्वरूप श्री हुज़ूर सतगुरुदेव दाता दयाल जी महाराज अवतरित हुये। आप प्रथम बार सन्1942ई. में श्री मान महात्मा दयानन्द जी के साथ श्री आनन्दपुर श्री दर्शन के लिये आये। श्री सतगुरु देव श्री तीसरी पातशाही जी के पावन श्री दर्शन करते ही आपको आत्मानुभूति हुई। श्री सतगुरुदेव श्री तीसरी पातशाही जी ने कृपा दृष्टि करते हुए आपको समीप बैठाकर विधीवत नाम अभ्यास की युक्ति बताई। सन् 1942 से 1952 तक प्रति वर्ष,वर्ष में दो बार श्री दर्शन के लियेआते रहे। 4जून1953 को श्री चरणों में विनय कर सर्वस्व समर्पण कर स्थाई रूप से शरणागत हो गये। 2 सितम्बर 1956 को श्री तीसरी पातशाही जी महाराज जी ने आपको साधु वेष प्रदान किया। कुछ समय पश्चात् आपके पिता श्री, श्री दर्शन के लिये श्री आनन्दपुर आये। उन्होंने सतगुरुदेव महाराज जी के श्री चरणों में विनय की कि प्रभो यह तो धन धान्य, ऐश्वर्य सम्पदा सबको त्याग कर फकीर बन गया है।
     श्रीगुरुमहाराज जी ने फरमाया हमने तो इन्हें सब सम्पदाओं का मालिक बना दिया है। इस रहस्य को किसकी बुद्धि थी जो समझ सके। केवल एक लीला का रूप समझकर इस रहस्य पर विचार ही न किया जो श्री वचन अनुसार आज सब पर प्रकट है। श्री श्री 108 श्री सतगुरुदेव श्री चौथी पातशाही जी की श्री आज्ञा शिरोधार्य करते हुए 10 जून 1970र्इं. शुभ दिन बुधवार श्री परमहँस अद्वैत मत के लासानी श्री आनन्दपुर दरबार के रूहानी तख्त पर श्री पंचम पातशाही जी के स्वरूप में विराजमान हुए।
     जिस भक्ति प्रेम और परमार्थ आध्यात्म के वृक्ष का बीज साक्षात परब्राहृ सतगुरुदेव श्री परमहँस दयाल जी श्री प्रथम पातशाही जी ने बोया और उस अंकुरित पौधे को श्री सतगुरुदेव श्री दूसरी पातशाही जी ने श्री आनन्दपुर में लगाया और उस भक्ति प्रेम और परमार्थ के पौधे को श्री परमहँस अवतार सतगुरुदेव श्री तीसरी पातशाही एवम् श्री चौथी पातशाही जी नेअपने दिव्य विग्रह की एक एक बूँद से सींचकर बड़ा किया उस भक्ति प्रेम व आध्यात्म के वृक्ष की शाखाएें श्री परमहँस दयाल जी के पंचम स्वरूप श्री हुज़ूर सतगुरु दाता दयाल जी केअनथक प्रयास से आज विश्व के कौने कौने तक फैल रही हैं। जिसकी विशाल शीतल और सुखद छाया में आकर संसार के लाखों दुःखी संतप्त जीव शाश्वत आनन्द और सच्ची शान्ति को प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना रहे हैं और इस वृक्ष पर लगे पाँच प्रकार के अमर फल (श्रीआरती पूजा, सतसंग,सेवा,दर्शन और सुमिरण ध्यान)जिसे श्री हुज़ूर सतगुरुदेव दाता दयाल जी अपनी असीम कृपा से मुक्त हस्त से सभी को बाँट रहे हैं। सब की झोलियां भर रहे हैं।और जिसे प्राप्त करके लाखों जीव अमर पदवी को प्राप्त करने में संलग्न हैं।
    विश्व के हर कौने कौने में हम जीवों के कल्याण के लिये श्री परमहँस
अद्वैत मन्दिरों का निर्माण कराके श्री हुज़ूर सतगुरुदेव दाता दयाल जी ने हम पर जो महान उपकार का कार्य किया है वह किसी से छिपा हुआ नहीं है। सतगुरुदेव जी के इन महान उपकारों का जीव ऋण नहीं चुका सकता। श्री सतगुरु देव जी की महिमा अपरम्पार है इनकी महिमा का वर्णन कर सकना मानव बुद्धि से परे है मानव बुद्धि में इतनी सामथ्र्य नहीं जो सतगुरु देव जी की महिमा का वर्णन कर सके। जिन प्रेमियों ने सतगुरु देव जी की महिमा का कुछ कुछ अनुभव किया है उन्होंनें इसे इन शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया है।
खूबियाँआपकी क्या क्या गिनवायें आपकी किस किस अदा पर बलि जायें।
आपकी हर लीला हमारा दिल लुभाती हैआपकी हरमौज पर क्यों न मिट जायें।
एक दफतर भी कम है कागज़ का ज़िक्र आपका लिखने पर गर आयें।
समुन्द्र स्याही का भर लें कलमों के ढेर लगवायें।
मुख में ज़ुबाने लाखों हों लिखने को फरिश्ते बिठलायें।
तो भी खत्म न होगा पावन वर्णनआपका। गर कलम पर कलम तोड़ते जायें।
एक बार जो भी आपके सामने आया आपका ही होकर जाता है।
एक बार जो आपसे हमकलाम हुआ उम्र भर आपके गीत गाता है।
चाँद तारों में आफताब हैं आप सच पूछो तो लाज़वाब हैं आप।।
     हम अति सौभाग्यशाली हैं जो हमें श्री हुज़ूर सतगुरुदेव दाता दयाल जी के पावन दर्शन,भक्ति प्रेम औरआध्यात्म के वृक्ष की सुखद शीतल छाया में बैठने का सौभाग्य प्राप्त है हमारा कर्तव्य है कि श्री हुज़ूर के सुन्दर मनोहर छवि को अपने ह्मदय में बसाते हुए उनकी असीम कृपा से प्राप्त पाँचों अमर फलों का श्रद्धा भक्ति से सेवन करते हुए अपने जीवन को सुखी बनायें और अमर पदवी को प्राप्त करके परलोक सँवार लें।

Tuesday, September 20, 2016

सच्चाई से भक्ति करो


""जो मनुष्य सच्चाई से भक्ति करता है उसकी भक्ति स्वीकृत होती है और जो छल-कपट से भक्ति करता है वह मानो अपने आप को धोखा देता है।''
     परमात्मा के दरबार में सच्ची नियत पर ही पूर्ण प्रसन्नता मिलती है वहां छल-कपट अर्थात् (कहना और करना कुछ और) करने वाला मनुष्य उस प्रसन्नता से वञ्चित रह जाता है। अतएव श्री सद्गुरु दरबार में प्रायः चतुर-चपल लोग भक्ति का लाभ बहुत कम उठाते हैं और वह भी बहुत देर से। किन्तु सच्चे और सरल पुरुष श्रद्धा के कारण उस भक्ति के धन को बहुत जल्दी पा लेते हैं। जैसे किः-
                दिलहु   मुहबति    जिन्ह   सेई   सचिआ ।।
                जिन्ह मनि होरु मुखि होरु सि कांढे कचिआ।। (वाणी शेख फरीद जी)
संसार में दोनों प्रकार के मनुष्य पाये जाते हैं-एक सत्य के पुजारी जो काया-माया को झूठ समझकर सच के ऊपर हँसते हँसते प्राणों को होम देते हैं-उनके मन की धारा पूर्ण रुप से सत्य की ओर बहती है। ऐसों को राज्य का लोभ दिया गया और प्राणों से हाथ धो लेने का भय दिखाया गया परन्तु वे झूठ की ओर नहीं झुके। ऐसे लोग यद्यपि शारीरिक रुप से संसार में नहीं हैं परन्तु उनकी कीर्ति अमर है। वे क्योंकि सत्य में समा कर सत्य रुप बन गये।
     बहुधा गुरुद्वारों में अरदास के समय चार साहिबजादों और चालीस मुक्तों के शुभ नाम दोहराये जाते हैं। उनके नाम सुनते ही लोगों के ह्मदयों में प्रेम व भक्ति के भाव सहसा ही उभर आते हैं। इसका हेतु यह है कि उन्होने निष्कपट और निश्छल होकर भक्ति के पथ पर बलिदान दिये हैं। यदि उनके मन की भावना असत्य की ओर होती तो फिर वे प्रलोभन में पड़कर अपनी प्राणाहुति न देते क्योंकि वे ही लोग बड़ी बड़ी पदवियां उन्हें देने को तैयार थे जिन्होने उनकी जान ले ली। ऐसी ऐसी सत्यमूर्तियां अपने उदाहरण आप हैं और वे उपदेश दे गई हैं कि भक्ति की राह में काया और माया की आहुति भी देनी पड़े तो संकोच न करो और अपनी सुरति पर सांसारिक मोह का कलंक न लगने दो।
     कोई बाहर से भेष तो बनाये भक्ति का और अन्दर से अपनी सुरति को शरीर और शारीरिक सम्बन्धों में जोड़े रखे तो वह वस्तुतः बड़ी भारी हानि में जा रहा होता है। ऐसे मनुष्यों की दशा पर महापुरुषों का अत्यन्त दुःख भरी वेदना होती है इसलिये कि उन्होने ऐसा दुर्लभ समय मिलने पर भी लाभ प्राप्ति की अपेक्षा उलटा हानि ही उठायी।
                दूलन गुरु तें विषै बस, कपट करहिं जे लोग।
                निर्फल तिन की सेव है, निर्फल तिनका जोग।।
सन्त दूलनदास जी कथन करते हैं-जो लोग विषय विकारों के वश में होकर अपने गुरु से कपट करते हैं
उनकी भक्ति सेवा और यौगिक साधना सब निष्फल हो जाती है। उस का फल कोई नहीं मिलता। दीवार का झुकाव जिधर होगा वह उधर ही गिरेगी। इसी तरह मनुष्य की सुरति का झुकाव जिस ओर होगा वह अन्त में वहां ही समाएगी।
     इब्रााहीम बादशाह का प्रसंग प्रसिद्ध है कि वह एक दिन अपने नादान बच्चे को गोद में बिठा कर प्यार करने लगा था कि उसी समय आकाशवाणी हुई कि""ऐ इब्रााहीम! तू या तो मेरे से प्यार कर या अपने बेटे के प्यार को मन में रख एक ह्मदय में दो प्यार कदापि नहीं समा सकते।''
     यह सुनते ही उसने मालिक के चरणों में क्षमा मांगी और हर ओर से अपनी सुरति को समेट कर पूरे का पूरा ध्यान परमेश्वर के स्मरण में लगा दिया। भाव यह कि जब उसने अपनी चित्तवृत्ति को शरीर और शारीरिक सम्बन्धियों से तोड़कर प्रभु चरणों में जोड़ दिया तब वह सच्चा फकीर कहलाया। जब भक्त नामदेव जी का निराला छप्पड़ भगवान बना गये तो बड़े बड़े अमीर पड़ोसियों ने उसे देखकर दांतों तले उंगलि दबा ली। वे सब चकित होकर नामदेव जी से पूछने लगे कि किस बढ़ई ने तुम्हारा ऐसा भव्य छप्पड़ बनाया है? हमें उसका पता बता दो तो हम उसे दुगुनी मज़दूरी देने को तैयार हैंः-
                पाड़ पड़ौसणि पूछिले नामा कापहि छानि छवाई हो।
                तोपहि दुगणी मज़ूरी दैहउ मोकउ वेढी देहु बताई हो।।
नामदेव जी ने उत्तर दियाः-  बेढी प्रीति मज़ूरी माँगै जउ कऊ छानि छवावै हो।।
                         लोग कुटुम्ब सभउ ते तोरै, तउ आपन बेढी आवै हो।।
वह कहने लगे कि वह बढ़ई प्रीति की मज़दूरी मांगता है जो कोई भी उससे छान (छप्पड़) बनवाना चाहे उसे अपने कुटुम्ब परिवार से मोह के तार तोड़ने पड़ेंगे तब वह अपने आप आयेगा। जब तक मन में लोगों का प्यार होगा वह बढ़ई किसी तरह नहीं आवेगा। जो लोग यह आशा रखते हैं कि नाता तो निभायेंगे संसारी लोगों से और प्रीति जोड़ेंगे परमात्मा से, उनको आज ही यह निश्चय कर लेना चाहिये कि वे ऐसी भ्रान्त धारणा को छोड़ दें। परमेश्वर ऐसे अनजान नहीं हैं अपितु वे तोः-
                घर घट के पट पट की जानत। भले-बुरे की पीर पहचानत।।
चाहे कोई मुख से कुछ भी न बोले किन्तु मन के अन्दर संकल्प के उठते ही जब कि वह अन्तर्यामी तुरन्त जान लेते हैं तो उनके साथ धोखा कैसे हो सकेगा।यदि संसार का मोह रखने से भक्ति की प्राप्ति हो सकती तो अर्जुन से भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ऐसा क्यों कथन करतेः-
                सर्वंधर्मान्   परित्यज्य,   मामेकं  शरणं व्रज।
                अहन्त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
जब श्री गुरु नानकदेव जी के मोदखाने का लेखा जोखा हुआ और लाभ निकला तो उनसे पूछा गया कि यह रुपया कैसे खरच किया जाय तो उन्होने उत्तर दिया कि साधु-संगत की सेवा में यह सारी राशि उठा दो-यद्यपि उनके घर में उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चे विद्यमान थे। उन्हें एक पैसा भी नहीं दिलवाया। इसके विपरीत जो लोग अपनी तन की कमाई को केवल अपने स्वार्थ में और मोह-माया के पीछे व्यय कर देते हैं परिणाम स्वरुप वे अपने आप को नीच योनियों का शिकार बना देते हैं।
                बहु परपञ्च करि पर धनु लेआवै। सुत दारा पहि आनि लुटावै।।
                मन  मेरे भूले कपटु  न कीजै ।  अंति निबेरा जिअ पहि लीजै।।
इसी प्रकार के वचन श्री सुखमनी साहिब में भी आये हैंः-
वे लोग ऐसा घाटे का सौदा करते हैं अपनी तो हानि करते ही हैं अपने साथ कुटुम्बियों को भी डुबोते हैं। लोभ के वश में आकर आँखें होते हुए भी अन्धों का सा बत्र्ताव करते हैं। उनको झूठ मधु के समान मीठा लगता है।        कूड़ मिठा कूड़ माखिउ कूड़ डोवे पूरु।।
जिन गुरुमुखों को सत्पुरुषों की चरण-शरण में आकर सत्य असत्य की परख हो जाती है वे आत्मिक लाभ-हानि को समक्ष रखकर ऐसे कुमति के शिकार नहीं होते। वे झूठों का पल्ला नहीं पकड़ते। वे सबके सब उनसे विलग हो जायें तो भी उन्हें परवाह नहीं होती। उनको केवल सत्य का आधार होता है। वे अनन्य भक्त होते हैं और उनका योग क्षेम सब प्रभु पर होता है।
      आज भी गुरु दरबार में ऐसे दृढ़ संकल्प वालों की कमी नहीं है। जो एक सद्गुरु देव सत्य स्वरुप से प्रीति जोड़कर अन्य सबके सब नाते तोड़ कर अपने आपसे एक भक्ति का आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। श्री सद्गुरु देव भी अदृश्य रुप से उनके अंग-संग रहते हैं तथा उनके समस्त कार्य स्वयं सँवारते हैं। सन्त सद्गुरु यथा सम्भव जीव की भलाई चाहते हैं। जीव को चाहे बाह्र रुप में इस बात का ज्ञान हो या न हो-परन्तु निदान वह इस रहस्य को जान जाता है। जैसा किः-अधोलिखित घटना से स्पष्ट है-
     श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी "देशमेश' महाराज ने एक दिन आज्ञा दी कि यह जो अपार सम्पत्ति हमारे पास पड़ी है उसे नदी में बहा दिया जाय। उन सेवकों में कई सिक्ख जो पैसे को बड़ा महत्त्व देते थे वे गुरु महाराज जी की माता जी के निकट गये और निवेदन किया कि यह धन हमें दिलवा दो-श्री माता जी ने श्री गुरु महाराज जी से प्रार्थना की कि यह तुम्हारे शिष्य अति निर्धन हैं। इस धन को नदी में फैंकने की अपेक्षा इन्हें ही दे दो। श्री गुरु महाराज जी ने उत्तर दिया कि माता जी!हम तुम्हें कहें कि चार आने का विष लेकर हमारे भोजन में डाल दो तो क्या तुम ऐसा कर दोगी? माता जी ने उत्तर दिया कि बेटा!यह तो मैं कभी भी न करुँ। इस पर श्री दशमेश जी बोले-तो यह काम मुझ से भी नहीं हो सकता। ये क्योंकि मेरे आत्मिक बालक हैं। यह धर्मार्थ धन इनकी भक्ति की घोर हानि करेगा। इससे यह बहुत अच्छा है कि ये लोग भक्ति भजन करें चाहे इन्हें अत्यन्त कठिनाई से जीवन निर्वाह करना पड़े। इसमें इनका परम कल्याण है। यह सुनकर माता जी अवाक् हो गर्इं। भक्ति के मार्ग पर सच्चाई की नितान्त आवश्यकता है। रामायण में भगवान श्री रामचन्द्र जी ने स्पष्ट कथन किया हैः-
                निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
ऐ सुग्रीव! जो निर्मल मन वाले भक्त हैं वे ही मुझे पाते हैं। मुझे क्योंकि छल-कपट और परदोष दर्शन अच्छा नहीं लगता। इसलिये मलिन मन वाला पुरुष परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकता यह सच्चाई प्रकट होती है। भक्ति करने वालों को भक्ति के इस प्रमुख लक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिये।
                बिन छल विश्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।।
इन लक्षणों से युक्त पुरुष राम भगवान में ऐसे एकाकार हो जाता है जैसे दूध में पानी। यदि उस दूध में कपट रुपी खटाई डाली जाये तो दूध और पानी अलग-अलग हो जाता है।
                जल पय सरिस बिकाय, देखो प्रीति की रीति भली।
                तुरत विलग हो जाय कपट खटाई परत ही।।
कपट पूर्ण भक्ति निभ नहीं सकती। एक दिन चलेगी-दो दिन चल जायेगी-वर्ष-दो वर्ष चलेगी अन्ततोगत्वा सारा भेद खुल जायेगा। उघड़ेहु अन्त न होइ निभाहू। कालनेमि जिमि रावण राहू।।
कालनेमि रावण, और राहू राक्षस ने अपने आपको बहुत ही छुपाने का प्रयत्न किया किन्तु अन्त में प्रकट हो ही गये। उन्हें अपने दुष्कर्मों का फल बुरा ही मिला। इन उदाहरणों से हमें शिक्षा लेनी चाहिये कि सत्य को अपने आंचल में दृढ़ता से बाँधे। आरम्भ में चाहे कितनी आपदाएं झेलनी पड़ें यह हो सकता है किन्तु अन्त में "सत्यमेव जयते' अर्थात् सत्य की ही जीत होती है।
     इसलिये हमें श्री गुरु महाराज जी सावधान करते हैं कि ऐसा छल-कपट भरा काम ही न करो जिससे तुम्हें पछताना और धोखा खाना पड़े। हमारा कत्र्तव्य है कि अपने परम पिता, सच्चे हितकारी परोपकारी श्री सद्गुरुदेव भगवान का वचन शिरोधार्य कर सन्मार्ग पर दृढ़चित्त होकर पग बढ़ाते चलें जिससे अन्त में सत्य में समा कर सच्चे आनन्द को प्राप्त कर लें।

Friday, September 16, 2016

आज्ञा में ही सिद्धी है


""जिस सेवक ने अपने विचार को ईश्वर की मौैज व आज्ञा के साथ मिला दिया तो उसी के विचार को सब देवता और सकल शक्तियाँ पूरा करने का प्रयत्न करती हैं और कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती। इसके विपरीत जो अपनी इच्छा के अनुसार चला वह शून्य का शून्य रहा।''
     सद्गुरु के इन वचनों का जो पालन करता है उसकी रक्षा नियम-निर्माता स्वयं करता है। सच्चे सद्गुरु के दरबार में अधिकारी सेवक को इसी शिक्षा के सीखने का अवसर मिलता है। श्री रामचन्द्र जी को जब भगवान वशिष्ठ जी ज्ञानोपदेश कर रहे थे तो रह रह कर वे शंका करने लगे और निरर्थक वाद-विवाद में समय गँवाने लगे। तब श्री वसिष्ठ जी ने उनसे पूछा-""कि तुम ज्ञानी हो या अज्ञानी? यदि तुम ज्ञानवान हो तो मुझे तुम्हें उपदेश करने की आवश्यकता ही नहीं है यदि तुम अज्ञानी हो तो हमारे वचन सुनो और सत्य सत्य कर उन्हें मानों। इस तरह धीरे धीरे सारा भेद तुम पर अपने आप पर खुल जाएगा और सब प्रश्नों के उत्तर तुम्हें स्वयं मिल जाएँगे। ज्यों ज्यों हमारे वचनों के द्वारा प्रकाश अन्दर जाएगा वैसे वैसे आध्यात्मिक ज्योति बढ़ती जाएगी।
     जब श्री रामचन्द्र जी ने उनके कथनानुसार अपने मन को उन के वचनों से मिलाया सब भ्रम और संशय अपने आप  ही जाते रहे और उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त हो गई जिसके आगे सम्पूर्ण शक्तियां झुककर सेवा करने लगीं।
     अवतारी पुरुषों ने भी इस नियम का परिपालन किया और हमें अपने आचरण से सिखाया। जैसे कि भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ने गीता के तीसरे अध्याय के 21वे श्लोक में कथन किया है।
                यद्यदाचरति  श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो  जनः।
                स यत्प्रमाणं कुरुते, लोकस्तदनु वत्र्तते।।
""यद्यपि इन अवतारों को कोई कर्म का बन्धन नहीं होता तो भी नियम को स्थिर रखने के लिये अपनी मौज से सब कर्म करते हैं जिससे सर्व साधारण को बड़ा लाभ होता है क्योंकि वे बड़ों का ही अनुकरण करते हैं।'' कई बार श्री गुरु महाराज जी कथन किया करते थे कि तुम अपूर्ण से पूर्ण बनने के लिये ही यहाँ आए हो। जैसे जैसे आज्ञा को मानकर सेवा करोगे तुम्हारा अधूरापन दूर होता जाएगा और तुम अपने आप ही अपने को निर्बल से बलवान एवं दुःखी से सुखी पाओगे। तुम्हारे अन्तर में ज्ञान की ज्योति जलती जाएगी और सद्गुरुदेव जी का बहुमूल्य आत्मिक धन तुम्हारे अन्दर स्वतः आ जाएगा जिससे तुम दास से स्वामी बन जाओगे। आशाएं तुम्हें नहीं सताएंगी।
                जिस जन अपना हुकम मनाइया। सरब थोक नानक तिन पाया।।
श्री सतगुरुदेव जी अपनी दात(कृपादृष्टि) श्री आज्ञा में लपेट कर अपने सेवकों को प्रदान करते हैं।
                वाणी  गुरु  गुरु  है  वाणी  विच  वाणी अमृतसारे।
                गुरुवाणी कहै सेवक जन मानै परतख गुरु निसतारे।।
जिस जिसने भी आज्ञा को सीस पर रखा, उसी ने सब कुछ प्राप्त कर लिया और जिसने उस आज्ञा को अपने मन से तोलने का प्रयत्न किया वह और भी भ्रम में पड़ गया वह खाली का खाली रह गया। यही कारण है कि उस एक ही दरबार में से उस ही गुरुदेव जी से कोई रुपये का रुपया लाभ उठाता है, कोई एक पैसे का भी नहीं उठा पाता। श्री गुरुवाकः-इकना ते रंग चढ़ गया इक रह गये अमन अमान।।
जिन्होंने सद्गुरुदेव जी के वचनों पर विश्वास रखा वे भक्ति धन से मालामाल हो गये। जिन्होंने गुरु वचनों की कोई परवाह न की वे भक्ति का लाभ उठाने से वंचित रह गये।
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     राजा जन्मेजय परीक्षित का पुत्र और अर्जुन के तनय अभिमन्यु का पोता था। उसने ब्रााहृणों के कहने पर नागयज्ञ किया जिसमें अनेकों नाग मर गये। क्योंकि उसके पिता महाराज परीक्षित तक्षक सर्प के डसने से मरे थे,और वह इस यज्ञ के द्वारा उसका बदला ले रहे थे। उस यज्ञ में महर्षि वेदव्यास जी भी उपस्थित थे। राजा ने उनसे पूछा कि हमारे पूर्व पुरुषों ने जुआ क्यों खेला था? संग्राम करके इतने वीरों और विद्वानों का नाश क्यों कर दिया था? उन्हें क्यों किसी विद्वान ने न रोका? वेदव्यास जी ने उत्तर दिया कि भावी बड़ी प्रबल होती है।उसे बड़े बड़े महापुरुषों ने भी सिर पर धारण किया है। यह सुनकर भी जन्मेजय राजा को विश्वास न हुआ। वह बोला कि जब मनुष्य को ज्ञात भी हो कि यह काम बुरा है, फिर वह काम करे ही क्यों? वेदव्यास जी त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने कहा कि आज हम तुम्हें सावधान करते हैं कि तुम्हारे पास किसी देश के सौदागर अच्छे अच्छे घोड़े लेकर बेचने को आएंगे। परन्तु तुम उनसे घोड़े न खरीदना। किन्तु होगा ऐसे कि तुम वे घोड़े खरीद लोगे। यदि खरीद भी लो तो उनमें से सफेद रंग का घोड़ा जिसके कान काले हों उसे मत खरीदना। परन्तु तुम उसे भी खरीद लोगे। यदि खरीद भी लो तो उसपर सवार न होना। परन्तु करोगे सही। यदि सवारी करो भी तो दक्षिण दिशा की ओर न जाना। परन्तु तुम अवश्य जाओगे। यदि उधर तुम्हारा जाना हो भी तो वहाँ से किसी स्त्री को अपने साथ न लाना। अगर उसे तुम अपने घर में भी ले आओ तो उसे अपनी रानी न बनाना। परन्तु तुम उसे अपनी पत्नी भी बनाओगे। अगर ऐसा भी कर लो तो उसके कहने में आकर ब्रााहृणों का नाश न कराना। परन्तु तुम उसका कहना मानकर ब्रााहृणों का वध करा दोगे। इस घोर पातक के कारण तुम्हें कुष्ठ रोग हो जायेगा।
     चिरकाल बीत जाने से होनहार ने उससे ऋषि की सभी बातें भुलवा दीं। इससे जो होनहार था वह हो गया। ब्रााहृणों की हत्या के परिणाम-स्वरुप उसे कोढ़ हो गया। तब उसने श्री वेदव्यास जी को स्मरण किया और उनके आने पर यह निवेदन किया कि, सत्पुरुषों का वचन वस्तुतः ही अटल होता है। मैने विश्वास न करने से बुरा फल पाया। अब आप कृपा कर मुझे इस दारुण रोग से छुटकारा दिला दो। वेदव्यास जी ने कथन किया कि आप मुझसे महाभारत की कथा सुनो-उसे जितना तुम सत्य सत्य मानते जाओगे उतना तुम्हारा कोढ़ भी मिटता जाएगा। जहाँ तुम कथा में कोई संशय करोगे कि ऐसा तो नहीं हो सकता, तो शेष कोढ़ शरीर में रह जाएगा। राजा जन्मेजय सत्य सत्य करके कथा सुनते गये।साथ ही साथ कोढ़ भी मिटता गया। जब यह प्रसंग आया कि भीमसेन इतने बलवान थे कि हाथियों को घुमा घुमाकर आकाश में उछाल देते थे,जो आज तक भी नीचे नहीं गिरे। जन्मेजय ने कहा कि यह असम्भव है। उसी समय वेदव्यास जी ने मन्त्रोच्चारण करके जल की चुल्ली आकाश में फैंकी तो गगन मण्डल में गजराज घूमते हुए दृष्टिगोचर हुए। परन्तु उसका कोढ़ वहीं का वहीं रह गया। वह अब दूर होने से रह गया।
     इन दृष्टान्तों से सिद्ध होता है कि जो भी प्राणी महापुरुषों की मौज के अनुसार उतरे हुए वचनों को सच सच कर मन में धारण नहीं करता, वह अति दुःख पाता है, और जो मनमति को एक ताक पर रख कर उनके वचनों को शिरोधार्य करता है उसके पास सुख संपदा की कोई कमी नहीं रहती।

Sunday, September 11, 2016

सच्चा सेवक


""वैसे तो गुरु दरबार में सैंकड़ों ही नहीं अपितु सहरुाों सेवक आया करते हैं और कई रहते भी हैं परन्तु वही सेवक सद्गुरु दरबार से सही लाभ उठा सकता है जो सेवक अपने विकारों को हटाने का और सुख-दुःख को समान जानने का यत्न भी साथ साथ जारी रखता है। परन्तु ये दोनों गुण जीव में उस समय स्वयमेव आ जाते हैं जब कि वह गुरुवाणी के नीचे लिखे शब्द पर आचरण करता है।
सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊत्तम बानी।।
गाविआ सुणिआ तिन का हरि थाइ पावै जिन सतिगुर कीआगिआ सति सति करि मानी।
                                              धनासरी महला-4
फरीदा दुखु सुखु इकु करि दिल ते लाहि विकारु।
अलह भावै सो भला तां लभी दरबारु।। (वानी बाबा शेख फरीद)
जो सेवक गुरु दरबार में रहता हुआ भी कभी सुखी कभी दुःखी होता है और मनमति पर चलता है उसे चाहिये कि इस महापुरुषों की वाणी का सहारा लेकर सच्चा सेवक बनने का प्रयत्न करे और अपने जीवन को सफल बनाये।
     यह तो संसारी लोगों में देखा जाता है कि वे सुखी-दुःखी हुआ करते हैं। कहीं से मान-बड़ाई मिल गई तो फूले न समाये और कहीं अपमान हुआ तो मुँह फुलाकर बैठ गये। यदि गुरु के सेवक का भी यही बर्ताव रहा तो सन्त उसे सेवक कोटि में नहीं गिनते। गुरुवाणी का वाक्य हैः-
                ""मान अभिमान मंधे सो सेवक नाहीं''
 इन वचनों से हम अपने मन की दशा को तोल सकते हैं कि क्या हम भी मान के अभिमान में प्रसन्न और अपमान में अप्रसन्न होते हैं? अर्थात् हम सुखी-दुःखी होते हैं या नहीं। मुझे एक सेवक की बात याद आ गई वह कह रहा था कि हमें चालीस वर्ष व्यतीत हो गये गुरु दरबार की सेवा करते करते किन्तु महाखेद होता है कि हमारा मान इतना भी नहीं जितना कि दो वर्ष सेवा करने वाले का होता है। यह कहते कहते उसने आगे कह दिया कि मुझे ऐसी बात सोचते सोचते रात भर नींद भी नहीं आती और सदा यही चिन्ता बनी रहती है।
     ऐसी दशा में यदि हम विवेक की आँख खोलकर देखें तो सेवकपने से हम लाखों कोस दूर पड़े हैं क्योंकि जो अखण्ड सुख पाने का एक सेवक को अधिकार है उसकी इच्छा या माँग तो हम करते ही नहीं और मिथ्या मानापमान में ही सुरति उलझी रही तो जिस तत्त्व की परख के लिये सन्त सद्गुरु देव जी की चरण-शरण में आये थे उसको हमने न पहचाना। हम पहचान भी कैसे सकते थे जब कि हम दुःख-सुख से न्यारे तो हुए न थे। तत्त्व की पहचान तो तब होगी जब किः-
                सुख-दुःख दोनों सम करि जानै और मान अपमाना।
                हरख  सोग  ते रहै अतीता तिन जग तत पछाना।।
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तत्त्व की परीक्षा करने के लिये सत्पुरुषों ने ये लक्षण बतलाये हैं कि वह सुख-दुःख, मानापमान में सम रहे और हर्ष-शोक से न्यारा रहे। हमारे श्री गुरुदेव जी महाराज की भी यही मौज है कि ""ऐ मेरे प्यारे सेवको! तुम इस द्वन्द्व भरी माया से ऊपर आ जाओ क्योंकि मेरा स्थान वहां ही है जहां सुख-दुःख की गति नहीं है वहां पहुँचने के लिये तुम्हें लकड़ी या लोहे की सीढ़ी काम न आएगी अपितु शब्द की सीढ़ी पर पाँव जमा जमाकर ऊपर चढ़ते चलो।'' परमसन्त श्री कबीर साहिब जी भी अपने सेवकों को यही समझा रहे हैंः-
                हम वासी वा देस के, जहँ जाति वरन कुल नाहिं।
                सबद  मिलावा  होत  है ,  देह मिलावा नाहिं ।।
यह गुरु-सेवक का मिलाप शब्द को पकड़ कर ही तो हो सकता है। शब्द वस्तुतः क्या है? सर्वश्रेष्ठ प्रधान शब्द तो सद्गुरु का वचन है। गुरुमहाराज जी के पीछे तो ऋद्धियाँ सिद्धियां घूमती ही रहती हैं जो सेवक उनके द्वार की सेवा सच्चे मन से करता है और उनके वचनों का पालन करता है उसके पास भी धन-पदार्थ की कोई कमी नहीं रहती। परन्तु जो सेवक इन सब पदार्थों को गुरु-कृपा से आया हुआ समझकर इनकी मोह-ममता में न फँसता हुआ अपने आप को विषय-विकारों से न्यारा रखता है वह गुरु-कृपा का पात्र बन जाता है। इसके विपरीत दूसरा जो इन पदार्थों को अपनी योग्यता से अर्जित किया हुआ मान कर भोग-विलास के अधीन हो जाता है वह अपनी आत्मा पर दारुण अत्याचार करता है। कारण-फँसना बड़ा सुगम है किन्तु छूटना अति कठिन है गुरुवाणी के वचन हैंः-
                फासन की विधि सभु कोउ जानै छूटन की इकु कोई।।
                कहि  कबीर  रामु  रिदै विचारै सूतकु तिनै न होई।।
                                   (गुरु वाणी-गौड़ी कबीर जी पृ.331)
बड़े बड़े बुद्धिमानों को मन ऐसा चकमा देता है कि इस जन्म में तो क्या वे जन्म जन्मान्तरों तक दुःखी रहते हैं और उनकी जग तृष्णा नहीं मिटती। एक उपहास है कि एक सूरदास नदी के किनारे बैठ कर मिठाई खा रहा था। सूर्यग्रहण का दिन था। किसी सज्जन ने उसे कहा कि और सूरदास! तुम सूर्यग्रहण के समय क्यों खा रहे हो? उसने प्रत्युत्तर दिया कि भाई! हमारे लिये तो बारहों महीने सूर्यग्रहण ही है। यही मनोवृत्ति मनमुखों की समझनी चाहिये। वाणी इसी का समर्थन करती हैः-
                मनमुख  मन  अजित  है  दूजै  लगै जाइ।
                तिसनो सुख सुपनै नहीं दुखे दुख विहाइ।।
चञ्चल मन ही महान शत्रु है। वह मनुष्य को आशाओं की डोरी में बाँधकर बन्दर की भाँति नचाता रहता है। इस मनमति के कारण ही जगत् में दुःख ही दुःख छाया हुआ है। इस दुःख रुपी रोग के मूल कारण को तो कोई पकड़ता नहीं ऊपर ऊपर से ही उपचार किया जाता है-इसलिये रोग दिन दिन बढ़ता जाता है।
      उपाख्यान है-एक मछली बेचने वाला किसी गन्धी की दुकान के पास से गुज़र रहा था। दो चार दुकानें और भी इत्र फुलेल बेचने वालों की थीं। ज्यों ही उसे उनकी उग्र गन्ध आई उसका सिर लगा चकराने क्योंकि उसका दिमाग तो मछली का दुर्गन्ध का आदी था और वह बाज़ार में ही गिर पड़ा। किसी ने कहा कि यह कमज़ोरी के कारण गिर गया है। दूसरा बोला इसे मिरगी का दौरा पड़ गया है। उसे सचेत करने के लिये बढ़िया बढ़िया इत्र और सुगन्धित द्रव्य सुँघाये गये किन्तु उस पर कोई प्रभाव न हुआ। उसकी दशा और बिगड़ती गई-सच है ""मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की'' इस पर एक मनुष्य उसकी बिरादरी वालों के पास गया और उन्हें सारा हाल कह सुनाया। वहां एक वयोवृद्ध बैठा हुआ था। उसने पूछा कि वह कौन सी जगह गिर गया है? उस व्यक्ति ने कहा कि गन्धी बाज़ार में। वह वृद्ध मनुष्य एक ही
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क्षण में सारी बात को समझ गया। वह बोला कि उसके मस्तिष्क को उग्र सुगन्ध ने ही बिगाड़ दिया है। वह उठा और एक अत्यन्त दुर्गन्ध से भरी मछली अपनी कमीज़ में छुपा कर उस व्यक्ति के साथ वहां पहुँचा। उसने वह मरी हुई मछली उसकी नाक पर रख दी। दो मिनट में वह व्यक्ति उठ खड़ा हुआ।
     इसी तरह जो पुरुष रोग के निदान को समझ लेता है वही रोग का सफल इलाज कर सकता है। सन्त सतगुरुदेव जी इसी प्रकार जीवों के दुःख की जड़ को ही काट देते हैं। भाव यह कि गुरुमति के धारण करने से ही दुःखों का अन्त हो जाता है नहीं तो प्रायः लोग अपनी मनमति के अनुसार चलकर ह्मदय रुपी क्षेत्र में अपने आप ही दुःख रुपी बीज बोते हैं और खेत के पक जाने पर उसके विषैले फल खाकर रोते हैं। ""करदन ए खेस-आमदन-ए पेश-खुद करता रा-इलाज-ए नेस्त।''अर्थात् अपना किया हुआ अपने आगे आया। अपने किये का इलाज नहीं है अपने किये हुए कर्म का फल स्वयं ही काटना पड़ता है।        मन मुख दुख का खेत है, दुख बीजे दुख खाइ।
                दुख विच जंमै दुख मरै , हउमै करत विहाई ।।
                            गुरुवाणी-रामकली महला. 3 पृ.947
मनमुखों की जीवन कहानी दुःख से आरम्भ होती है। दुःख में ही कटती है और उसका अन्त भी दुःख में होता है। वे स्वप्न में भी सुख का मुँह नहीं देखते। उनकी पीठ सदा ही विश्वपिता की ओर रहती है। वे संसार के पदार्थों में ही सुख की खोज करते हैं। उन्हें सांसारिक भौगैश्वर्य कितना ही प्राप्त हो जाय। धन सम्पदा कितनी संचित कर ले, उस ऐश्वर्य से सुख-सामग्री तो खरीद सकते हैं परन्तु निश्चिन्त नींद नहीं मिल सकती। नरम-नरम बिछोने भी उन मनमुखों को काँटे की न्यार्इं चुभेंगे। इसी प्रकार अजीर्णता के होने से वे ही स्वादिष्ट व्यञ्जन उनके लिये विषवत् सिद्ध होंगे। ऐसे ही नाम व भक्ति के बिना जितने भी भोग हैं सबके सब दुःख दायक बन जाते हैं। मनमति को अपनाकर मनुष्य आप ही धन पदार्थों का संग्रह करता है और पीछे वे पदार्थ ही उसके लिये पश्चात्ताप करने का कारण बन जाते हैं। ऐसा मनमुखी जीव सर्वदा व्याकुल रहता है। जैसे किः-
                अन्दरि कपटु सदा दुखु है। मनमुख ध्यानु न लागै।
                दुख विचि कार कमावणी। दुखु वरतै दुखु आगै।।
                                  राग बिलावल-महला 4. पृ. 851
जो लोग मनमति से चलते हैं वे अपने किये हुए कर्मों का फल स्वयं पाते हैं उनकी चाल यह होती है कि जिस सुखदाता प्रभु को ह्मदय मन्दिर में बिठलाना था उसे तो ऊपर ऊपर से याद करते हैं और जिन सांसारिक पदार्थों से बाहर की आवश्यकताओं को पूरा करना था उन्हें अपने मन में बसाते हैं। ऐसी बेढंगी चाल का फल एक दिन उनके सामने आता है।
     उदाहरण के रुप में यदि कोई वैद्य किसी रोगी को जिन चीज़ों के सेवन से रोके और वह रोगी वैद्य के कहने की उपेक्षा करके उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग करता रहे वह नीरोग नहीं हो सकता चाहे वह लाखों दवाइयाँ खाता रहे और वैद्य जी को झूठ मूठ पथ्य करने का चकमा भी देता रहे परन्तु अन्दर गये हुए पदार्थ अर्थात् कुपथ्य एक न एक दिन अपना प्रभाव दिखायेगा ही।
     सर्वसमर्थ परमेश्वर तो अन्तर्यामी हैं उनसे कोई क्या छुपायेगा? जो कोई उनसे छल-कपट करेगा वह अवश्य दुःख का भागी बनेगा। यदि हमें दुःख से छुटकारा पाने की इच्छा है तो ऊपर लिखे हुए श्रीवचन में जो तीन युक्तियाँ बतलाई गई हैं उनको क्रियान्वित करेंगे तो सद्गुरुदेव के दरबार में जो विशुद्ध परमार्थ एवं अध्यात्म  का दरबार है पहुँचकर उनके दरबारी कहलाएँगे।  वे तीन  युक्तियां जिन पर  आचरण करने से
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मनुष्य सच्चा दरबारी बन सकता है ये हैं- 1. विकारों से बच कर रहे। क्योंकि काम-क्रोधादि विकार ही निर्विकार प्रभु के दरबार में ऐसे जाने नहीं देते जिस तरह कोई गले में पत्थर बाँधकर सागर तरना चाहे। विकार भरी सुरति कामनाओं के कीच से सनी हुई सत्य खण्ड की ओर उड़ान नहीं भर सकती।
2. वह सुख-दुःख में समान रहे। 3. मालिक की रज़ा में राज़ी रहे-यह भी एक ऐसा अनुपम गुण है। इसके होने से कोई भी दुःख सामने आएगा वह सुख में बदल जायेगा इसके लिये जो वचन सत्पुरुषों ने ऊपर कथन किये हैं किः-गाविआ सुणिआ तिन का हरि थाइ पावै।
                 जिन सतिगुर की आगिआ सति सति करि मानी।
जो इस वचन को अन्तर में धारण करेगा वही उनके सर्वोत्तम दरबार में पहुँच कर अपने जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त करेगा और वही सच्चा सेवक कहलाने के योग्य है।

Thursday, September 8, 2016

गुरु और शिष्य का प्यार आत्मिक है


     सद्गुरु का सेवक के साथ सच्चा आत्मिक प्यार होता है। यह एक अद्वितीय प्यार है। जिसने गुरु की आज्ञा मान कर ऐसा प्यार प्राप्त किया, वही जीव संसार में बड़भागी है।
     प्यार तो संसार में माता-पिता के साथ भी होता है और अन्य सम्बन्धियों के साथ भी यथायोग्य होता ही है, परन्तु इन सबके प्रेम-प्यार का आधार शरीर ही है। चूँकि शरीर स्वयं ही आधारहीन और नश्वर है, इस कारण ये सबके सब प्रेम-प्यार को सन्तों सत्पुरुषों और ग्रन्थकारों ने मोह के नाम से सम्बोधित किया है और ऐसे प्यार अर्थात् मोह को आत्मा के लिये बंधन का कारण भी बतलाया है।
     सन्त सत्पुरुषों का अर्थात् सद्गुरु का शिष्य एवं सेवक के साथ जो सहानुभूति व प्यार है, वह आत्मिक प्यार है; वे सेवक की भलाई चाहते हैं। इस प्यार में स्वार्थ की गन्ध भी नहीं है। सद्गुरु की जितनी भी रचना होती है, सेवक की आत्मा को शुद्ध पवित्र और निर्मल बनाने के लिये होती है। गुरु हैं धोबी के समान और शिष्य है कपड़ा। नाम के साबुन से उसे धोकर साफ सुथरा बना देते हैं। उसकी आत्मा पर पड़े हुये जन्म-जन्म के मोह माया के धब्बे मिटा कर उसे मालिक के धाम में शोभा पाने के योग्य बना देते हैं। इस संसार मे मनुष्य को जितने कष्टों का सामना करना पड़ता है, उन सबका कारण भी सुरति अथवा अन्तःकरण का मलीन होना है। अन्य शब्दों में यूँ कहा जायेगा कि यदि मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल अर्थात् पवित्र हो तो किसी प्रकार का कष्ट उसके सम्मुख नहीं आयेगा।
      सांसारिक सम्बन्धी अपना-अपना प्यार एवं सहानुभूति जतलाते हुये साफ-सुथरे और चमकीले वस्त्र तो पहनाते हैं, शारीरिक शुद्धता और पवित्रता के साधन भी उपलब्ध कर देते हैं, परन्तु शारीरिक पवित्रता और सुन्दर वस्त्रों के पहनने से दुःख और कष्टों के आधार का अन्त नहीं होता, क्योंकि आत्मा पर मोह-माया और ममता के दाग़-धब्बों की जो मैल चढ़ी हुई है जब तक वह मैल दूर न होगी,दुःखों का अन्त होना असम्भव है। सत्पुरुषों ने स्पष्ट फरमाया हैः-
                उज्जल  पहिरे  कापड़े ,  पान  सुपारी  खाहिं ।
                सो इक गुरु की भक्ति बिनु, बाँधे जमपुर जाहिं।।
     नाम की कमाई किये बिना आत्मिक पवित्रता प्राप्त नहीं होती। जब तक आत्मा पवित्र निर्मल न होगी, वह कुल मालिक से मिल नहीं सकती अर्थात् आत्मा-परमात्मा का मेल नहीं हो सकता। परमात्मा में मिलकर एक हुये बिना जीवात्मा चौरासी के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता और जीव के दुःखों की निवृत्ति नहीं हो सकती। यदि गुरु की भक्ति और नाम की कमाई करने से मन निर्मल हो जाये तो जीवात्मा को वह आनन्द प्राप्त होता है जिसका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि मालिक स्वयं उसके पीछे-पीछे फिरते हैंः-
                कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु।
                पाछे लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर।।
     कितनी ऊंची दात है सद्गुरुदेव जी की; जिनके बख़्शे हुये नाम के प्रताप से अर्थात् गुरु-शब्द के प्रताप से जब गुरुमुख सेवक का मन निर्मल हो जाता है तो स्वयं मालिक उसकी रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेते हैं। विचार करने की बात है कि जिसका रखवाला और रक्षक स्वयं कुल मालिक हो, उसको कैसा भय अथवा कैसा अभाव? वह तो महाराजा हो गया। सन्त सद्गुरु बिना स्वार्थ ऐसा उपकार करते हैं। सेवक के साथ सद्गुरु के प्यार का कितना सच्चा प्रमाण है। उसे कुछ से कुछ बना देते हैं।
                साध संगि मलु लाथी। पारब्राहृु भइओ साथी।।
सन्त सद्गुरु की नेक और पवित्र संगति की कृपा से जब मनुष्य का मन और चित्त अर्थात् अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तब परब्राहृ परमेश्वर अर्थात् कुल मालिक उसके संगी-साथी बन जाते हैं।
     भाई गुरुदास जी श्रेष्ठ सेवकों में से थे। जब श्रीगुरुमहाराज जी ने उनकी सुरति में अर्थात् अन्तःकरण में थोड़ा सा अहंकार का धब्बा देखा तो उसके धोने का तत्काल ही प्रबन्ध किया। यद्यपि उन्हें घोड़ों की आवश्यकता थी या नहीं थी, परन्तु उनकी सुरति की पवित्रता के लिये घोड़े खरीदने की रचना रचाई। "सूरजप्रकाश' नाम के ग्रन्थ में यह पूर्ण इतिहास लिखा हुआ है। भाई गुरुदास जी की सुरति को पवित्र निर्मल करने के लिये घोड़े खरी़द करने की रचना पर लाखों रुपये व्यय कर दिये। अन्त में भाई गुरुदास जी के मन का अभिमान चकनाचूर हो गया तो उन्होंने सद्गुरु देव जी के चरणों में गिर कर क्षमा मांगी और भविष्य में दीनभाव अपनाया।
     राजा जनक ने शुकदेव जी की अज्ञानता की मैल धोने के लिये कितनी रचना की! भाँति-भांति से बाज़ारों को सजवाया। उन्हें दूध का भरा कटोरा देकर कहा कि जनकपुरी का चक्र लगाकर आओ, परन्तु खबरदार! इस कटोरे में से एक बूँद भी न गिरने पाये वरना सैनिक जो तुम्हारे साथ होंगे तुम्हारा सिर काट देंगे। पूरी की पूरी सुरति हाथ पर रखे दूध के कटोरे में जमा कर बाज़ार के बीचों-बीच चक्र लगाकर जब शुकदेव जी वापिस आये, तो जनक जी ने पूछा-शुकदेव! बाज़ार में क्या देखा? शुकदेव जी ने उत्तर दिया-भगवन्! मैने तो कुछ भी नहीं देखा, क्योंकि मेरी पूरी सुरति कटोरे में एकाग्र हो चुकी थी। तब राजा जनक ने उन्हें समझा-बुझाकर फरमाया कि जिनकी सुरति इसी प्रकार शब्द में जुड़ी रहती है, वे संसार में रहकर भी न्यारे रहते हैं। तुम भी इसी प्रकार न्यारे एवं निर्लेप रहा करो। सत्पुरुष जनक जी महाराज के सत्संग के वचनों को सुनकर शुकदेव जी का मोह-अज्ञान व संशय-भ्रम सब नष्ट हो गये। उन्होंने श्रद्धा-भावना से उनकी शरण ली और नाम दान पाकर कृतकृत्य हो गये।
     इसी प्रकार आज भी श्री आनन्दपुर दरबार में श्री परमहंसों की ओर से रचाई गई जो रचना देखने में आती है, वह सब सेवकों की मन की सफाई और उनकी सुरति को पवित्र निर्मल बनाकर शब्द से मिलाने के योग्य बनाने के लिये रची गई है। सब सेवक अपने इष्टदेव सन्तसद्गुरु की मौज से योग्य सेवा कर रहे हैं। इस प्रकार सेवा करने से सेवकों के मन की घड़त अथवा निरख परख होती रहती है। कोई प्रेस में, कोई वर्कशाप में, कोई स्कूल और कोई अस्पताल आदि में आज्ञानुसार सेवा कर रहा है। उन सबका ध्येय एक ही है कि अन्तःकरण की मैल दूर हो और सुरति पवित्र-निर्मल होकर शब्द में जुड़ जाये। उदाहरणार्थ मुझे आज्ञा हुई कि तुम लेख लिखो। मेरा क्या अस्तित्व जो मैं लेख लिख सकूँ। काम करने वाले तो वे आप हैं, परन्तु बड़ाई सेवक को देते हैं। यही तो उनके पवित्र प्यार का प्रमाण है। उनकी आज्ञा का पालन करने से हमारी आत्मिक उन्नति का साधन निकल आता है वरना हर प्रकार की वाणियां सन्तों सत्पुरुषों ने पहले ही फरमा रखी हैं और उनके शिक्षाप्रद जीवन चरित्र ग्रन्थों में अंकित हैं। सब काम उनकी कृपा-दृष्टि से हो रहे हैं। जो सेवक आज्ञा को शिरोधार्य कर लेता है तो गुप्त रुप में मालिक आप ही उसके भीतर विराजमान होकर सब कार्य स्वयं ही करते हैं। यह एक ऐसा पारमार्थिक भेद है जिसको वे कृपालु मालिक स्वयं ही जानते हैं वरना लेखनी की क्या शक्ति जो लिख सके अथवा जिह्वा की क्या सामथ्र्य कि वर्णन कर सके।
     जिन-जिन महापुरुषों ने अपने सद्गुरुदेव की सेवा-टहल और उनकी आज्ञा मानकर सब कुछ प्राप्त किया है, उन्होंने अपना अनुभव अपनी पवित्र वाणियों में भी लिख दिया है ताकि अन्य लोग भी उनके चरण-चिन्हों पर चल कर अपने जीवन को सफल बना सकें। उदाहरणार्थ श्री गुरु अमरदास जी श्री तीसरी पादशाही जी के जीवन चरित्र से आम सत्संगी भली प्रकार अभिज्ञ होंगे कि उन्होने वृद्धावस्था में भी कितनी सच्चाई और लगन से अपने गुरुदेव गुरु अंगददेव जी महाराज की सेवा की। वे अपने आचरणमय जीवन से लोगों को लाभान्वित करने के लिये अपने जीवन का अनुभव इस प्रकार वर्णन करते हैं।
      सतिगुरु सेवे ता सभ किछु पाए।। जेही मनसा करि लागै तेहा फलु पाए।।
      सतिगुरु दाता सभना वथू का पूरै भागि मिलावणिआ।।
     फरमाते हैं कि जो मनुष्य हार्दिक भावना से अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु की सेवा करता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। जिस प्रकार की भावना होगी,वैसा ही फल भी पायेगा। सद्गुरुदेव तो सब वस्तुओं अर्थात् भक्ति, मुक्ति, मानसिक शान्ति, शाश्वत आनन्द, नित्य सुख आदि के प्रदाता हैं। जो सौभाग्यवान् हैं वे ही अपने सन्त सद्गुरु से मिल कर सच्चा आनन्द प्राप्त करते हैं। अब विचार करो कि ऐसी शक्ति क्या किसी शारीरिक सम्बन्धी में भी है जो मन की आशाओं को पूरा कर सके? जबकि वे स्वयं ही असमर्थ हैं और स्वार्थीं हैं; वे दूसरों की क्योंकर सहायता कर सकते हैं? गुरुवाणी का वाक हैः-
                कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढ़ाई।
                कोई काहू को नहीं सभ देखी ठोकि बजाइ।।
श्री गुरुनानकदेव जी सांसारिक मित्रों के सम्बन्ध में फरमाते हैंः-
                कामणि लोड़ै सुइनारुपा मित्र लुड़ेनि सुखाधाता।
                नानक पाप करे तिन कारणि जासी जमपुरि बाधाता।।
संसारियों के प्रेम-प्यार का फल यही मिला कि यमलोक में बाँधा गया। यह सामथ्र्य किसी सांसारिक सम्बन्धी में नहीं है कि वह जीव को यमराज के हाथों से मुक्ति दिला सके, किन्तु सन्तों की दयादृष्टि से जीव यम की मार से बच सकता है। इसलिये कहा हैः- करि सेवा तूं साध की हो काटीऐ जम जालु।।
      यह शक्ति परमसाध और पूर्ण सन्त सद्गुरु की निष्काम सेवा में है जो यम की फांस को काटकर सेवक को मोक्ष पदवी का अधिकारी बना देती है और जन्म जन्म के दुःख और भूख को मिटा देती है; क्योंकि परिपूर्ण सन्त सद्गुरु परब्राहृ का साक्षात् स्वरुप होते हैं और वे सर्वकला समर्थ होते हैं जो चाहें सो कर सकते हैं। परन्तु सेवक अपने मालिक की मौज में सदैव प्रसन्न रहते हैंः-
                करि सेवा पारब्राहृ गुर भुख रहै न काई।।
                सगल मनोरथ पुंनिआ अमरापदु पाई।।
     संसार में प्रत्येक मनुष्य लाभ का काम करना चाहता है और किसी न किसी की सेवा भी करनी ही पड़ती है, परन्तु मनुष्य को इस बात की जांच-पड़ताल करके अनुमान लगाना चाहिये कि लाभ किस में है। सन्त सेवा में अथवा सम्बन्धियों की सेवा में? जिसमें लाभ देखे, उनकी सेवा शौक और लगन से करे, शेष सबकी सेवा कत्र्तव्य पालन का विचार रखकर बिना किसी लगाव के करे। जो मनुष्य सन्त सद्गुरु की सेवा निष्काम भाव से करता है, उसका क्या फल प्राप्त होता है? वाणी में वर्णन हैः-
                सेवा करत होइ निहकामी।। तिस कउ होत परापति सुआमी।।
     भाई लहणा जी ने श्री गुरुनानकदेव जी की ह्मदय और निष्काम भाव से सेवा की। उसका फल यह हुआ कि वे दूसरी पादशाही श्री गुरु अंगददेव जी के पवित्र नाम से प्रसिद्ध हुये। इस प्रकार के अनेेकों उदाहरण ग्रन्थों में भरे पड़े हैं कि जिन्होंने महापुरुष की पदवी पाई, उन्होने अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरुओं की सेवा से ही पाई। इधर संसारियों के प्रेम और उनकी सेवा का क्या फल मिलता है, तनिक विचार करना चाहिये। सत्पुरुषों की वाणियों द्वारा पता चलता है कि वे सब तो स्वार्थी हैं। जब उनका स्वार्थ सिद्ध नहीं होता तो साथ ही छोड़ देते हैं, जैसे फरमान हैः-
                दारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ लागे।।
                जब ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे।।
     सत्पुरुष फरमाते हैं कि स्त्री, मित्र, पुत्र और सम्बन्धी तब तक तुम्हारे साथ प्यार, एवं सहानुभूति रखते हैं जब तक तुम्हारे पास धन है अथवा तुम उनके लिये कमा सकते हो। जब धन और बल नहीं रहा तो उनके प्यार का रुख भी बदल जायेगा। इसलिये जिन सौभाग्यशाली गुरुमुख विचारवानों का सत्पुरुषों की वाणियों पर विश्वास है और उन पर आचरण करते हुये गुरु-शब्द और नाम की कमाई में लगे हुये हैं, वे संसार में रहकर भी कमल के समान निर्लेप रहते हैं और अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु के सच्चे प्यार को प्राप्त करने के अधिकारी बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें सत्संग द्वारा यह ज्ञात हो जाता है कि सन्त सद्गुरु की सेवा करने से जीव के दोनों लोक सँवर जाते हैं। गुरुवाणी का वाक हैः-
                सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूँ सुख सारु।
                ऐथै मिलनि वडिआईआ दरगह मोख दुआरु।।
      लोक और परलोक के सुखों में जो सार सुख है, वह सद्गुरु के सेवक को गुरु-सेवा के द्वारा प्राप्त होता है। श्री गुरु अर्जुनदेव जी महाराज ने दो प्रकार की सेवा का फल इस प्रकार वर्णन किया हैः-
                दूजी सेवा जीवनु बिरथा। कछु न होई है पूरन अरथा।।
                माणस सेवा खरी दुहेली। साध की सेवा सदा सुहेली।।

     अब विचार करो कि एक सेवा तो अकारथ जाये; जीवन भी नष्ट हो जाये, कोई काम भी सिद्ध न होवे और बहुत कुछ करने धरने पर भी दुःख ही पल्ले पड़े। दूसरी ओर साधु सत्पुरुषों की, की हुई सेवा भी सफल हो और मनुष्य का जन्म भी सुधर जाये; यह कितना लाभ है? सत्पुरुष फरमाते हैंः-
                जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई।
                ओह आपि तरिआ कुटंब सिउ सभु जगतु तराई।।
   सन्त सत्पुरुषों का कितना उपकार है जीव पर कि वे उसे सच्चे प्रेम के रंग में रंग कर जहाज़ के समान बना देते हैं। वह स्वयं तो सद्गुरु के आत्मिक प्यार में सराबोर होकर भवसागर से पार हो ही जाता है, साथ ही दूसरों को भी पार उतारने वाला बन जाता है। भाई मंझ का इतिहास इस बात की साक्षी देता है कि सत्पुरुषों की निष्काम् भाव से सच्चाई के साथ सेवा-भक्ति करने से भाई मंझ सद्गुरु के प्रेम-प्यार का अधिकारी बन गया, स्वयं भी तर गया और दूसरों को तारने वाला भी बना। उसके सम्बन्ध में सत्पुरुषों ने अपने पवित्र मुखारविन्द से फरमायाः-
                मंझ प्यारा गुरु दा, गुरु मंझ प्यारा।
                मंज गुरु का बोहिथा, जग लंघनहारा।।
      भाई मंझ के उपर्लिखित उदाहरण को पढ़-सुन कर आज भी कितने ही निर्बल मन वाले सेवकों का प्यार दृढ़ हो जाता है। किन्तु इसमें कोई शक नहीं कि सन्त सद्गुरु का प्यार जगत के प्यार से अनोखा और निराला हुआ करता है। भाई मंझ भक्त जब सद्गुरु के प्रेम में मतवाला हुआ तो साहूकार से निर्धन हो गया। सासंारिक दृष्टि से तो वह हानि में चला गया, परन्तु वास्तविकता कुछ और है। वह आराम को त्याग कर दिन-रात गुरु दरबार की सेवा में व्यस्त रहता। यद्यपि प्रकट में सद्गुरु -प्रेम से वंचित था परन्तु आन्तरिक रुप में उसे मालिक का सच्चा प्यार प्राप्त था, तभी तो वह दृढ़ विश्वास से पग आगे ही बढ़ाता गया; कभी मन में निर्बलता नहीं आने दी। अन्ततः परमार्थ के ध्येय में सफल होकर सद्गुरु के सच्चे प्यार का अधिकारी हुआ।
     सन्त सद्गुरुओं से निष्कामता से प्यार करने वाले गुरुमुख सेवकों को भाग्यशाली कहा गया है। हमें भी उसी प्रकार का अवसर प्राप्त है। अमली कार्यवाही करके हम भी लाभ उठा लें। केवल बातें बनाने से तो हाथ-पल्ले कुछ पड़ेगा नहीं। पहले भी जिन्होने गुरु-दरबार की सेवा की, उन्हीं को फल मिला। उनके इतिहासों का अध्ययन करने से हमें इतना लाभ अवश्य है कि उनसे शिक्षा ग्रहण कर हम भी निष्काम भाव से और पूरी लगन से सद्गुरु दरबार की सेवा करें, अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरुदेव की आज्ञा और मौज में चल कर उनका सच्चा प्रेम-प्यार प्राप्त करें, स्वयं को मालिक के सच्चे प्रेम-प्यार का पात्र बना लें और उनका सच्चा आत्मिक प्यार पाकर दोनों लोक संवार लें।
      समय के सन्त सद्गुरु की सेवा करने से मनुष्य को सम्पूर्ण सुखों का सार सुख प्राप्त होता है। उस सार सुख का प्रताप यह है कि उसे इस लोक में भी मान और सच्चा आनन्द प्राप्त होता है और आगे मालिक के धाम में भी उज्जवल मुख होकर मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है।

Friday, September 2, 2016

वास्तविक ध्येय


     संसार में आम सांसारिक जीवों को यह समझ बहुत कम होती है कि जीवन किसलिये प्राप्त हुआ है अथवा हम किस उद्देश्य की पूर्ति के लिये संसार में आये हैं? वह कौन सी वस्तु है जिसकी प्राप्ति के लिये उत्तम मानुष जीवन प्रदान किया गया है? इन सब बातों की जानकारी प्रायः सबको नहीं होती और न ही लोग इन प्रश्नों का हल ढूँढने का प्रयत्न करते हैं। जिस प्रकार और जिस दशा में भी जीवन व्यतीत हो रहा है, आम लोग उसी के अनुसार जीवन व्यतीत करते जा रहे हैं। सांसारिक जंजाल में फँसे रहने के कारण चाहे जीवन परेशानी और दुःख में बीत रहा है, अनन्त चिन्तायें जीव को सताती रहती है, परन्तु यह विचार बहुत कम आता है कि इन सब परेशानियों और कष्टों से छुटकारा प्राप्त करने का ढंग सोचें। प्रायः यह भी प्रत्येक मनुष्य नहीं सोच सकता कि जीवन इसी प्रकार दुःख और कष्ट में व्यतीत होता रहेगा अथवा कोई ऐसा भी उपाय है जिससे दुःख चिन्तायें दूर होकर सुख का संास लिया जा सके। आम संसार की यही दशा हो रही है कि देखा-देखी एक दूसरे के पीछे जा रहे हैं अर्थात् जो एक मनुष्य कर रहा है दूसरे भी उसकी देखा-देखी वही करने लगते हैं, इस प्रकार संसारी लोग वही पुरानी लकीर पीट रहे हैं। बिना सोचे समझे एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं कोई यह सोचने और समझने का कष्ट नहीं करता कि इसका क्या कारण है कि सब यत्न और साधन करते हुये भी हम लोग दुःखों में फंसे हुये हैं और इससे मुक्ति क्यों नहीं मिल सकती।
     वैसे यदि पूछा जाये तो सब यही कहते हैं कि हम अपना काम कर रहे हैं, परन्तु फिर प्रश्न उठता है कि जब अपना काम कर रहे हैं तो दुःखी और परेशान क्यों हैं? जिन सासंारिक धन्धों को वे अपना काम कहते हैं क्या ये उनके किसी काम आयेंगे भी? उदाहरणार्थ एक मनुष्य को धन कमाने की धुन सवार है-वह इसी सोच विचार में दिन-रात रहता है कि अधिक से अधिक धन एकत्र कर लूँ। यदि वह इच्छानुसार धन कमा भी ले तो उसे कहां व्यय करता है, शरीर और इन्द्रियों की कामनाओं में अथवा शारीरिक रिश्ते-नातों के लिये ही वह उस धन का प्रयोग करता है अथवा फिर संसार के नश्वर पदार्थों और सांसारिक सुखों में ही धन को व्यय करता है और जबकि ये सब वस्तुयें जिन पर उसने धन व्यय किया अनित्य और नश्वर हैं। तो उसका धन किस काम आया? क्या उससे आत्मा की भी कुछ भलाई हुई? नहीं।
     एक अन्य मनुष्य है, वह मान-बड़ाई और पद का इच्छुक है और दिन-रात उसी के पीछे लगा हुआ है। प्रयत्न करने पर यदि उसे सम्मान एवं पद प्राप्त भी हो जाये तो वह भी तो शरीर तक ही सीमित है, जब यह शरीर ही नहीं रहेगा तब वह मान-बड़ाई किसकी हुई? शरीर के साथ वह भी नष्ट हो गई। क्या शारीरिक सम्मान प्राप्त होने से मालिक के दरबार में सम्मान प्राप्त हो सकता है? कदापि नहीं। तब फिर यह अपनी वस्तु कहां हुई?
     इसी प्रकार सम्पत्ति आदि सब वस्तुएँ नाशवान हैं। इन सबका साथ केवल इसी संसार तक और इसी शरीर तक ही है। यही दशा अन्य सासंारिक पदार्थों की है। ये सब केवल शरीर और इन्द्रियों से सम्बन्धित पदार्थ हैं। इनमें मनुष्य का अपना कुछ भी नहीं। ये आत्मा के किसी काम नहीं आ सकते। इनके प्राप्त करने को जो अपना काम कहता है, वह बहुत भारी गलती कर रहा है। शरीर एवं इन्द्रियों का काम भला अपना काम क्योंकर हुआ?
     इसी प्रकार आम मनुष्य भूल और गलतफ़हमी में फंसा हुआ है। जो वास्तव में अपनी वस्तु है, उसकी पहचान नहीं कर सका और जिसे अपना काम समझा वह सब नष्ट हो गया। शरीर भी नष्ट हो गया और शरीर से सम्बन्ध रखने वाले सब पदार्थ भी नष्ट हो गये। इसी प्रकार संसारी मनुष्य एक दूसरे का अन्धाधुन्ध अनुसरण करते हुये जीवन की यात्रा पूरी कर रहे हैं, परन्तु यह ज्ञात नहीं कि वास्तविक मंज़िल कहां है और उस तक पहुंचने का मार्ग कौन सा है?
     आम मनुष्य की इस दुःखभरी दशा को देखकर और संसारियों को परेशान देखकर महापुरुषों को उनकी दशा पर करुणा हो आती है। वह अपना विरद संभालते हैं और जीवों को दुःख के चंगुल से मुक्त कराकर उन्हें सच्चे सुख का मार्ग बतलाते हैं और जतलाते हैं कि जिन कामों को तुम अपना समझ रहे हो ये तुम्हारे अपने काम नहीं हैं, वे तो केवल काल की बेगार हैं और जिनको तुम मेरा-मेरा करके मान रहे हो, वे भी तुम्हारे अपने नहीं और न कभी अपने बन सकते हैं। जिसे तुम अपनी मंज़िल समझ रहे हो, वह तुम्हारी मंज़िल नहीं है। तुम्हारे जीवन का ध्येय कुछ और है जिसे समझने की आवश्यकता है।
     विचार करने की बात है कि मनुष्य किस कद्र धोखे में फंसा हुआ है कि बहुमूल्य जीवन का समय बीता जा रहा है और वह अपने ध्येय से असावधान है। ये मूल्यवान समय यूंही व्यतीत हो जाता है और मनुष्य समझ नहीं पाता कि मेरा वास्तविक काम और जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? मनुष्य संसार में आया तो था एक विशेष ध्येय को लेकर परन्तु यहां संसारियों की संगत में और उनकी देखा-देखी करने से अपना काम भूल गया है और इस पर संसार का रंग चढ़ गया है। महापुरुष बार-बार समझाते हैं कि तू वह काम कर जो तेरे लिये कल्याणकारी हो और सुखदायी हो। जिस काम के करने के लिये जीवन प्राप्त हुआ है उसी के करने में ही भलाई है। परन्तु कितने दुःख का विषय है कि आम मनुष्य उस उद्देश्य को न पहचान कर पूरा जीवन शरीर और इन्द्रियों के अधीन रहकर नष्ट कर देता है।
     ग्रन्थों, शास्त्रों और सत्पुरुषों के उपदेश से यहां पता चलता है कि यह मानुष-जीवन अत्यन्त मूल्यवान है और अत्यन्त सौभाग्य से प्राप्त हुआ है। तो फिर इतने मूल्यवान जीवन को पाकर इसके बदले मूल्यवान वस्तु क्यों न प्राप्त की जाये? यह मूल्यवान समय क्या बार-बार प्राप्त होने वाला है? यदि अनित्य और असत् सांसारिक वस्तुओं के लोभ में इस मूल्यवान जन्म को खो दिया तो फिर जब समय हाथ से निकल जायेगा तो परिणाम में पछतावा और दुःख ही पल्ले पड़ेगा। इस प्रकार मानुष-जन्म के अत्यन्त मूल्यवान हीरे को कौड़ियों के मोल गंवा देना कोई साधारण हानि नहीं है। इसका अनुमान विचारवान ही लगा सकते हैं। एक ओर तो सत्पुरुषों के वचनों को मानकर यदि जीव नाम और भक्ति की कमाई कर लेता है तो जिस ध्येय के लिये संसार में आया था उसे पूरा कर लेता है अर्थात् बिछुड़ी हुई आत्मा को मालिक से मिला कर परमानन्द को पा लेता है। यह इतना बड़ा लाभ है जिसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता। दूसरी ओर यदि सन्तों सत्पुरुषों के वचन से जीव लापरवाही करता है और संसार की देखा-देखी माया के पदार्थों के पीछे लगा रहता है तो मूल्यवान मानुष-जीवन भी नष्ट हो जाता है और अन्त में चौरासी लाख योनि में जा पड़ता है। यह कितनी बड़ी हानि है। कितने दुःख की बात है कि उत्तम श्रेणी के मानुष-जीव को खोकर नीच योनियों में चला गया।
     महापुरुषों की शरण-संगत जिन्हें सौभाग्य से प्राप्त हो जाती है तो सत्संग के प्रताप से उन्हें यह समझ आ जाती है कि हमारा लाभ किस बात में और हानि किस में है? संसारियों की दुःखभरी दशा और माया में फंसने के भयजनक परन्तु शिक्षाप्रद परिणाम को देखकर वे सोचते हैं कि कहीं हमारा भी वैसा ही अन्त न हो, इसलिये वे सच्चाई और भक्ति का मार्ग अपनाते हैं। क्योंकि आम संसार का ध्यान केवल शरीर और इन्द्रियों के सुखों की ओर है अतः देखा देखी अन्य लोग भी उसी मार्ग पर चलते जा रहे हैं। परन्तु महापुरुषों के उपदेशों के प्रकाश में देखा जाये तो यह मार्ग गलत है। मनुष्य के अपने जीवन का अनुभव भी यही बतलाता है कि शरीर एवं इन्द्रियों के धन्धों में लगे रहने से सच्ची शान्ति और सच्चा आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता। संसार के सब पदार्थ इच्छानुसार पा लेने और इतनी आयु तक दिन-रात खोज करने के पश्चात भी मन को शान्ति प्राप्त नहीं हुई तो इससे यही सिद्ध होता है कि जिस मार्ग पर मनुष्य चल रहा है वह सही नहीं है। और जिस लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, वह लक्ष्य वास्तविक नहीं है। केवल संसारियों की देखा देखी उस मार्ग पर चल पड़ा है और उन्हीं की तरह संसार के पीछे दौड़ा जा रहा है क्योंकि इस मार्ग पर चलने वाले अधिक हैं। परन्तु महापुरुषों का कथन है कि परिणाम तो इसका दुःख ही दुःख और अशान्ति ही अशान्ति है, फिर यह मार्ग क्योंकि सही हुआ? नहीं, मानुष-जन्म का ध्येय यह नहीं है। यह वास्तविक लक्ष्य नहीं है और यह मनुष्य का अपना काम नहीं है। जिस ध्येय की पूर्ति के लिये मनुष्य संसार में आया था उसे समझा नहीं-अपने वास्तविक काम को जाना नहीं। जो गुरुमुख और विचारवान हैं वे जानते हैं कि शारीरिक आवश्यकतायें तो पशु भी पूरी कर लेते हैं। केवल शरीर और इन्द्रियों की कामनाओं को पूरा करना तो मानुष-जन्म के बड़प्पन का चिन्ह नहीं है। मनुष्य की बड़ाई तो किसी और ही बात में हैं। सत्पुरुषों का कथन हैः-
                निद्रा,  भोजन,  भोग,  भय  पशु  पुरुष  समान।
                नरन ज्ञान निज अधिकता, ज्ञान बिना पशु जान।।
अर्थः-नींद, खाना-पीना एवं इन्द्रियों के भोग आदि, इन सबमें पशु और मनुष्य समान हैं अर्थात् दोनों ही इन्हें प्राप्त करते हैं, परन्तु मनुष्य की बड़ाई एवं महत्ता तो केवल आत्म-ज्ञान से है और यदि मनुष्य ने आत्म-ज्ञान प्राप्त नहीं किया तो उसे भी पशु जानना चाहिये।
     ये शरीर और इन्द्रियों के सुख तो पशुओं को भी प्राप्य हैं, फिर यदि मनुष्य भी इन्हीं सुखों में फंसा रहा तो उसकी महानता क्या हुई? मनुष्य की महत्ता और महानता इसी में है कि उस सर्वोच्च वस्तु को प्राप्त करे जो कि निम्न श्रेणी की योनियों में प्राप्त नहीं हो सकती। वह क्या है? वह केवल आत्म-ज्ञान है। अन्य योनियां इसी कारण निम्न श्रेणी की मानी जाती हैं कि वे आत्म कल्याण के साधन से वंचित हैं। उन्हें वह उच्च श्रेणी की समझ अथवा ज्ञान प्राप्त नहीं। यह ज्ञान और विवेक केवल मनुष्य को प्राप्त हो सकता है और केवल सत्पुरुषों के सत्संग से ही प्राप्त हो सकता है, जिसे पाकर वह अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है, वरना अन्य बातों में तो फिर मनुष्य और पशु में अन्तर ही क्या था? सत्पुरुषों का कथन है कि भक्ति के बिना मनुष्य पशुओं का दर्ज़ा रखता हैः-
                एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मन।
                जैसे सूकरु सुआन नानक मानो ताहि तन।। (गुरुवाणी)
अर्थः-जिस मनुष्य के ह्मदय में मालिक की सच्ची भक्ति की लगन नहीं है, श्री गुरुनानकदेव जी फरमाते हैं कि उसका शरीर पशुओं के समान है क्योंकि भक्ति से भूलकर वह भी पशुओं के समान केवल शरीर और इन्दिर्यों के रसों में ही फंसा हुआ है।
     भक्ति से वंचित होने के कारण मनुष्य को पशु-देह में जन्म लेना पड़ा, तो यह कितना अनर्थ हुआ? मनुष्य ने स्वयं ही अपनी आत्मा पर अन्याय किया कि उत्तम श्रेणी का मानुष-जीवन प्राप्त करके पशुओं के काम किये और पशु-देह में चला गया, यह कितनी बड़ी हानि है? इस हानि का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता।
       दुःख की बात तो यह है कि जिस मालिक ने उच्च श्रेणी का मानुष-जीवन प्रदान किया, उसके उपकार को ही मनुष्य न समझ सका। कोई किसी को मामूली सी वस्तु दे दे तो उसका भी कितना उपकार मानते हैं? मालिक ने तो इतना बड़ा उपकार किया है कि मूल्यवान जीवन प्रदान कर दिया। मनुष्य को चाहिये कि कृतघ्न न बने और मालिक के उपकार का कम से कम इतना बदला तो दे कि उसका कृतज्ञ रहे और ऐसा काम करे कि मानुष-जीवन के बदले मानुष-जीवन तो प्राप्त करे, पशुओं का दर्ज़ा तो प्राप्त न करे। मालिक तो मनुष्य से यही चाहता है कि मनुष्य केवल मेरा ध्यान करे और फिर देखे कि उसे कितना ऊँचा दर्ज़ा प्राप्त हो जाता है। परन्तु यह मनुष्य की कृतघ्नता और दुर्भाग्य ही कहा जायेगा यदि वह मालिक को याद न करके शरीर एवं इन्द्रियों का दास बनना स्वीकार करे।
     जो गुरुमुखजन सत्पुरुषों की शऱण-संगत में आ गये हैं, उनके बड़े ऊँचे संस्कार हैं, उन्हें वास्तविकता की सूझ-बूझ और परख प्राप्त हो गई है वरना आम संसारी मनुष्य को वास्तविकता की समझ सरलता से आती नहीं। संसारी मनुष्य तो बस एक दूसरे की देखा-देखी करने को ठीक समझते हैं। उनका विचार है कि जब सब संसार यही कुछ कर रहा है तो यही ठीक होगा। अतएव वे एक दूसरे का अन्धाधुन्ध अनुसरण ही करते हैं। चाहे ऐसा करने में बार-बार दुःख, चिंता आदि क्यों न प्राप्त हों फिर भी उसी को ठीक समझते हैं।
     इसीलिये कहा जाता है कि महापुरुषों के सत्संग में जिसको वास्तविकात का ज्ञान प्राप्त हो जाये उसके बड़े भाग्य हैं। यदि मनुष्य सत्संग के प्रताप से असल-नकलऔर सत्य-असत्य में अन्तर करना सीख जाये तो अपना काम बना ले और जीवन को संवार ले। क्योंकि जब तक वास्तविकता का ज्ञान ही प्राप्त न हो, सही मार्ग कैसे प्राप्त होगा? सत्संग में ही पता चलता है कि जीवन का वास्तविक ध्येय मालिक का भजन-सुमिरण है। यही भजन-सुमिरण ही मनुष्य का वास्तविक काम है। वरना अन्य सूरत में यदि कोई संसार के बड़े-बड़े काम भी कर ले तो उनसे आत्मा को क्या लाभ? वे तो केवल शरीर और इन्द्रियों के लिये हैं और उनसे केवल शरीर और इन्द्रियों को ही क्षणिक सुख प्राप्त हो सकता है। वास्तविक काम क्या है सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
                अवरि काज तेरै कितै न काम। मिलु साध संगति भजु केवल नाम।।
अर्थः-ऐ मनुष्य! अन्य सब सांसारिक काम-धंधे तेरे किसी काम आने वाले नहीं। तेरा अपना काम तो केवल यही है कि सन्तों की शरण-संगत में मालिक के नाम की कमाई कर।
     मालिक के धाम में जब जायेगा तो वहां यह कोई नहीं पूछेगा कि संसार में तुमने कितना धन एकत्र किया, कितनी सम्पत्ति बनाई और कितना ऊंचा दर्ज़ा प्राप्त किया अथवा कितने तुम्हारे सम्बन्धी आदि थे? अपितु यह पूछेंगे कि मालिक के सुमिरण-ध्यान में कितना समय दिया, नाम की कमाई और भजन में जीवन के कितने स्वांस व्यय किये। वहां यही कुछ पूछा जायेगा और इसी पर निर्णय होगा।
     इसलिये जो गुरुमुख हैं वे सदैव अपने काम की ओर ध्यान देते हैं। संसार में रहते हुये और संसार के काम-काज करते हुये भी गुरुमुखों की सुरति मालिक के चरणों में रहती है और उनका ध्यान अपने वास्तविक ध्येय को पूर्ण करने में लगा रहता है।
     सत्पुरुषों की संगत में सच्चे नाम की कमाई करने का यह जो अनमोल और दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है, गुरुमुख और विचारवान इस अवसर का पूरा लाभ प्राप्त करते हैं और नाम-भक्ति का कमाई करके, जीवन के एक-एक पल को मालिक के सुमिरण ध्यान में व्यय करके मालिक की समीपता और प्रसन्नता प्राप्त कर लेते हैं और जीवन के वास्तविक ध्येय को पूरा करके अपना जीवन सुधार लेते हैं। यही अपना वास्तविक ध्येय है और इसी में जीवन की सफलता है।