जो समय बीत चुका है, उसको स्मरण न करो, जो आने वाला है उसकी चिंता न करो; जो समय चल रहा है उसी में ही मन से नाम-सुमिरण, तन से शुभकर्म करते चलो। इससे यह जीवन भी आनन्द से व्यतीत होगा और परलोक भी संवर जायेगा।
इस वचन में जीवन की सफलता और अनन्त सुख समाया हुआ है। संसार की ओर दृष्टिपात करने पर हम पायेंगे कि लाखों-करोड़ों व्यक्ति बीती हुई बातों को स्मरण कर-करके उनकी ही चिंता में वर्तमान समय को भी व्यर्थ कर देते हैं और लाखों-करोड़ों व्यक्ति भविष्य की चिंताओं के बोझ तले दबे रहते हैं। मनुष्य को उचित है कि भूत और भविष्य की चिंता त्याग कर वर्तमान समय का लाभ उठाये। सत्पुरुषों का कथन हैः- गुज़श्ता ख़्वाब व आयंदा ख़्याल अस्त।
ग़नीमत दां हम र्इं दम के हाल अस्त।।
अर्थः-बीता हुआ समय स्वप्न और आने वाला विचार के समान है। लाभदायक और उत्तम समय तो वही है जो आज हमारे पास है। इसीलिये इन वचनों में यह फरमाया गया है कि भूत और भविष्य के व्यर्थ बोझ में न दब कर वर्तमान समय की कद्र करो और इसी में ही अपना काम संवार लो। इसी एक वचन पर आचरण करने से करोड़ों जीव दुःख और चिंताओं के बोझ से मुक्त होकर सुखी बन जाते हैं।
जब कोई मनुष्य शरीर त्याग देता है तो आम बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि ""अमुक व्यक्ति गुज़र गया।'' गुज़र गया का अर्थ है जो अब नहीं रहा। इसलिये जो गुज़र जाता है उसे या तो कब्रा में गाड़ दिया जाता है या चिता में रखकर जला दिया जाता है अथवा जल में बहा दिया जाता है। तनिक सोचो यदि कोई शव को कब्रा से निकाल कर गले लगाने का यत्न करे तो सिवा दुर्गन्ध और रोग के उसके पल्ले और क्या पड़ेगा? ऐसे ही जो व्यक्ति बीते हुये समय को अथवा बीती हुई बातों को बार-बार स्मरण कर अर्थात् उनसे चिपक कर वर्तमान समय को बिना सुमिरण के व्यर्थ गंवा दे और माया के संस्कारों को ह्मदय में स्थान दे तो ऐसे व्यक्ति के बारे में सत्पुरुष ये फरमाते हैंः-
निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा।
आवै जाइ भवाईऐ बहु जोनि नचा।। गुरुवाणी मारू म.-5
निर्भय बनाने वाली वस्तु थी नाम, उसे तो भुला दिया और माया के पदार्थों से सुरति जोड़ ली। ऐसा मनुष्य बार-बार आएगा और जाएगा, बार-बार अनेक योनियों में नाचता फिरेगा; भाव यह कि जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहेगा।
सन्त फरमाते हैं कि एक ओर तो नाम-सुमिरण है और दूसरी ओर माया की रचना है। जो मनुष्य नाम को भुला कर माया का सुमिरण करता है, वह स्वयं को दुःखों में डालता है और शत्रुता एवं वैर-विरोध की अग्नि में जलता रहता है। ऐसे मनुष्यों की संसार में कमी नहीं है जो कहते हैं कि वर्षों पहले की बात है अमुक व्यक्ति ने मेरे साथ दुव्र्यवहार किया था और मुझे अपशब्द कहकर मेरे साथ अशिष्टता से पेश आया था। वे बातें मुझे भूली नहीं हैं। अब विचार करो कि जिसके ह्मदय में ऐसी ऐसी दुःख देने वाली, द्वेषपूर्ण एवं ह्मदय में चुभने वाली बातें घर किये हों,उसके ह्मदय में सुखदायी वस्तु ""नाम'' कहां टिक सकता है? वह तो बला लेने की युक्तियां सोचता रहेगा। इस नियम का उसे पता ही नहीं कि दूसरे को दुःख तब पहुँचाया जा सकता है जब पहले अपने भीतर दुःख का विचार उत्पन्न करके अपने आपको दुःख की अग्नि में जलाया जाता है। माचिस की तीली दूसरे को जलाने से पूर्व स्वयं को जलाती है।
द्रौपदी ने दुर्योधन से इतना ही तो कहा था कि ""अन्धे की अन्धी सन्तान''परन्तु इन शब्दों को दुर्योधन ने ह्मदय में रख लिया और क्रोध के वश होकर प्रतिज्ञा कर ली कि मैने इन शब्दों का प्रतिकार लेना है और इसी कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ जिसमें करोड़ों व्यक्तियों के प्राण चले गये। यदि दुर्योधन के ह्मदय में नाम का निवास होता तो उस व्यंग्य को भूल जाता और उसे ह्मदय में स्थान न देता और न ही इतना रक्तपात होता। इसीलिये सत्पुरुष सदैव यही उपदेश करते आये हैं कि सिवा मालिक के नाम के और कोई बात ह्मदय में न रखो। सभे गलां बिसरनु इको विसरि न जाउ।।
श्री गुरुनानक देव जी फरमाते हैं कि अन्य सब बातों को भुला दो किन्तु एक मालिक का नाम कभी न भूलने पाये। नाम एक ऐसी औषधि है जिसके प्रयोग करने से मनुष्य दुःखों और कष्टों से बच जाता है। प्रभु के सुमिरण से ही दुःखों का विनाश होता है तभी तो सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ।
कलि कलेस तन माहि मिटावउ।। गुरुवाणी सुखमनी
अर्थात् मालिक के नाम का सुमिरण करो और सुमिर-सुमिर कर सुख की प्राप्ति कर लो और कलिकाल के कष्ट-क्लेश तन में से दूर कर दो।
एक प्रसिद्ध लेखक लिखता है कि हस्तपतालों में जितने रोगी आते हैं, उनमें से आधे से अधिक तो चिंताओं के कारण ही बीमार पड़ते हैं और उनके मन पर भूत और भविष्य का अत्याधिक बोझ होता है। इसी कारण उन्हें नसों का रोग, रक्तचाप आदि हो जाते हैं और यही रोग घुन बनकर उनके जीवन को चट कर जाते हैं।
एक महात्मा जी एक स्थान पर प्रतिदिन सत्संग किया करते थे। काफी संगत वहां सत्संग श्रवण करने के लिये एकत्र हो जाया करती थी। एक दिन कोई नया व्यक्ति सत्संग श्रवण करने आया और उसने महात्मा जी से प्रश्न किया कि इन सत्संगियों में से कौन सा मनुष्य सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है? महात्मा जी ने सामने बैठे हुये एक सत्संगी की ओर संकेत करके फरमाया कि यह सत्संगी सदैव आनन्द में रहता है। उसने पुनः प्रश्न किया को कौन से गुण के आधार पर यह भाग्यशाली व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है? महात्मा जी ने उत्तर दियाः-
बीती को चितवै नहिं, आगे करे न शोक।
वर्तमान में वरत रहे, सत्संगी निर्दोष।।
इसमें यही गुण है कि बीती को स्मरण नहीं करता और भविष्य की चिंता नहीं करता। वर्तमान को ध्यान में रखकर निरंतर भक्तिमार्ग पर आगे पग बढ़ाता हुआ यह सत्संगी सदैव सुखी और प्रसन्न जीवन व्यतीत करता है। अन्य और भी जितने सत्संगी यहां आया करते हैं अथवा इस समय बैठे हैं, सब में शनैः शनै, उन्नति हो रही है और इस उपर्लिखित बात को ध्यान में रखकर उस पर आचरण करने का सब प्रयत्न कर रहे हैं। जितना जितना इनका आचरण है, उतना-उतना इनको सुख भी प्राप्त है। दुःख तो उनकी दशा पर है जो वर्तमान को भुला कर भूत एवं भविष्य की चिंताओं में खोये रहते हैं, जैसे कथन हैः-
किनी माज़ी मन में किनी मुस्तकबाल।
हैफ़ तिनां दे हाल पर जिन भुलाया हाल।।
प्रश्न करने वाले ने हाथ जोड़ कर विनय की-महाराज! एक प्रार्थना मेरी भी सुन लीजिये कि मुझे ईष्र्या का रोग अत्यन्त व्याकुल करता है किसी को अपने से अच्छा खाता-पीता अथवा प्रसन्न जीवन व्यतीत करता देखूं तो मेरे मन में बड़ी जलन उत्पन्न होती है। मुझे भी कोई ऐसा हितकर उपदेश देने की कृपा करें जिससे मेरा जीवन सुधर जाये।
महात्मा जी ने फरमाया-भैया! ये वस्तुयें तो प्रत्येक को अपने-अपने प्रारब्ध के अनुसार ही मिलती हैं। सत्य पूछो तो इन वस्तुओं में रखा ही क्या है? सत्पुरुषों ने सत्य ही फरमाया हैः-
जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत।
कहि नानक थिरु न रहै जिउ बालू की भीत।।
आत्मिक उन्नति का सम्बन्ध इन वस्तुओं से कदापि नहीं है। प्रारब्ध अनुसार जैसी भी प्राप्त हो उसी में ही प्रसन्न रहना चाहिये। किसी ने क्या ही सुन्दर बात कितने साधारण शब्दों में कही हैः-
किसी की किस्मत में हैं लड्डू पेड़े खाने को।
तेरी किस्मत में गर छोले खुशी से तू चबाता जा।।
हैं किस्मत में किसी की मोटर गाड़ियां चढ़ने को।
तुम्हारी किस्मत में पैदल खुशी से पांव बढ़ाता जा।।
चला चल चला चल का चक्र चल रहा दिन रात।
चलते को तू चलाता जा गुज़रते को भूलाता जा।।
इस उपदेश को सुन कर उस नये सत्संगी भक्त ने महात्मा जी को बहुत धन्यवाद दिया। अपने जीवन को इस उपदेश के सांचे में ढालने से उसने भी कुछ ही दिनों में सच्चा सुख प्राप्त कर लिया। सचमुच ही उसका जीवन संवरने और सुधरने लगा।
सन्तों का उपदेश है कि ""तुम्हारा यह कर्तव्य नहीं है कि कल की चिंता में आज की शक्ति को भी व्यय कर दो। कल भी जब आज का रुप धारण कर लेगा। तब उसका सत्कार करना।'' सत्पुरुषों के एक-एक वचन में लोक-परलोक का सम्मान और सच्चा सुख समाया हुआ है। जो भी उनके श्री वचनों पर आचरण करता है, वही सच्चे सुख को प्राप्त करता है। इसमें किसी देश अथवा जाति का कोई प्रश्न नहीं है; भारतीय हो अथवा विदेशी, हिन्दू हो अथवा मुसलमान, अंग्रेज़ हो अथवा पारसी, इससे प्रत्येक को एक समान लाभ पहुंचता है। इसलिये हम भी यदि उपर्लिखित श्री वचन के मार्गदर्शन में उस पर आचरण करते हुये अपने जीवन की यात्रा तय करेंगे तो निश्चय ही हम यह जीवन-यात्रा भी आनन्दपूर्वक तय करेंगे और अपना परलोक भी संवार लेंगे। ऐसा ही वरदान श्री सद्गुरुदेव जी ने अपने श्री पवित्र वचन में फरमा दिया है।