हमारे इष्टदेव,ह्मदय सम्राट, युग पुरुष,श्री परमहँस अद्वैत मत के पंचम रूहानी जानशीन श्रीश्री 108श्री हुज़ूर सतगुरु देव दाता दयाल जी का आज 91 वाँ (2016) अवतरित दिवस है आज के इस शुभअवतरित दिवस की सबको लाखों लाख मुबारिकवाद हो। मैं अपनी तरफ से और सभी गुरुमुखों की तरफ से श्री परमहँस महान विभूतियों के श्री चरण कमलों में एवम् श्री हुज़ूर सतगुरु देव दाता दयाल जी के श्री चरण कमलों में शुभ कामनाओं के साथ लाखों लाख मुबारिकबाद अर्पित करता हूँ। तुम जियो हज़ारों साल के साल के दिन हों पचास हज़ार ये हमारी है आरज़ू।
सन्त महापुरुषों का सृष्टि में अवतार संसार में भूले भटके जीवों को सन्मार्ग दर्शाने के लिये,उन्हें काल और माया की कैद से छुड़ाकर दुःखी से सुखी बनाने के लिये ही होता है। वे अपने भक्तों की खातिर कभी राम,कभी कृष्ण,कभी श्री गुरुनानक,के रूपों में हर युग युग में प्रकट हुआ करते हैं। इस वर्तमान युग में भी श्री परमहँस महान विभुतियों के रूप में प्रकट हुये हैं। इसी परम्परा केअनुसार ही आज के दिन बीस सितम्बर सन् ईस्वी 1926 सोमवार के शुभ दिन गाँव रायपुर कलाँ,तहसील अजनाला,जिला अमृतसर, पँजाब में श्री परमहँस दयाल जी के पंचम स्वरूप श्री हुज़ूर सतगुरुदेव दाता दयाल जी महाराज अवतरित हुये। आप प्रथम बार सन्1942ई. में श्री मान महात्मा दयानन्द जी के साथ श्री आनन्दपुर श्री दर्शन के लिये आये। श्री सतगुरु देव श्री तीसरी पातशाही जी के पावन श्री दर्शन करते ही आपको आत्मानुभूति हुई। श्री सतगुरुदेव श्री तीसरी पातशाही जी ने कृपा दृष्टि करते हुए आपको समीप बैठाकर विधीवत नाम अभ्यास की युक्ति बताई। सन् 1942 से 1952 तक प्रति वर्ष,वर्ष में दो बार श्री दर्शन के लियेआते रहे। 4जून1953 को श्री चरणों में विनय कर सर्वस्व समर्पण कर स्थाई रूप से शरणागत हो गये। 2 सितम्बर 1956 को श्री तीसरी पातशाही जी महाराज जी ने आपको साधु वेष प्रदान किया। कुछ समय पश्चात् आपके पिता श्री, श्री दर्शन के लिये श्री आनन्दपुर आये। उन्होंने सतगुरुदेव महाराज जी के श्री चरणों में विनय की कि प्रभो यह तो धन धान्य, ऐश्वर्य सम्पदा सबको त्याग कर फकीर बन गया है।
श्रीगुरुमहाराज जी ने फरमाया हमने तो इन्हें सब सम्पदाओं का मालिक बना दिया है। इस रहस्य को किसकी बुद्धि थी जो समझ सके। केवल एक लीला का रूप समझकर इस रहस्य पर विचार ही न किया जो श्री वचन अनुसार आज सब पर प्रकट है। श्री श्री 108 श्री सतगुरुदेव श्री चौथी पातशाही जी की श्री आज्ञा शिरोधार्य करते हुए 10 जून 1970र्इं. शुभ दिन बुधवार श्री परमहँस अद्वैत मत के लासानी श्री आनन्दपुर दरबार के रूहानी तख्त पर श्री पंचम पातशाही जी के स्वरूप में विराजमान हुए।
जिस भक्ति प्रेम और परमार्थ आध्यात्म के वृक्ष का बीज साक्षात परब्राहृ सतगुरुदेव श्री परमहँस दयाल जी श्री प्रथम पातशाही जी ने बोया और उस अंकुरित पौधे को श्री सतगुरुदेव श्री दूसरी पातशाही जी ने श्री आनन्दपुर में लगाया और उस भक्ति प्रेम और परमार्थ के पौधे को श्री परमहँस अवतार सतगुरुदेव श्री तीसरी पातशाही एवम् श्री चौथी पातशाही जी नेअपने दिव्य विग्रह की एक एक बूँद से सींचकर बड़ा किया उस भक्ति प्रेम व आध्यात्म के वृक्ष की शाखाएें श्री परमहँस दयाल जी के पंचम स्वरूप श्री हुज़ूर सतगुरु दाता दयाल जी केअनथक प्रयास से आज विश्व के कौने कौने तक फैल रही हैं। जिसकी विशाल शीतल और सुखद छाया में आकर संसार के लाखों दुःखी संतप्त जीव शाश्वत आनन्द और सच्ची शान्ति को प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना रहे हैं और इस वृक्ष पर लगे पाँच प्रकार के अमर फल (श्रीआरती पूजा, सतसंग,सेवा,दर्शन और सुमिरण ध्यान)जिसे श्री हुज़ूर सतगुरुदेव दाता दयाल जी अपनी असीम कृपा से मुक्त हस्त से सभी को बाँट रहे हैं। सब की झोलियां भर रहे हैं।और जिसे प्राप्त करके लाखों जीव अमर पदवी को प्राप्त करने में संलग्न हैं।
विश्व के हर कौने कौने में हम जीवों के कल्याण के लिये श्री परमहँस
अद्वैत मन्दिरों का निर्माण कराके श्री हुज़ूर सतगुरुदेव दाता दयाल जी ने हम पर जो महान उपकार का कार्य किया है वह किसी से छिपा हुआ नहीं है। सतगुरुदेव जी के इन महान उपकारों का जीव ऋण नहीं चुका सकता। श्री सतगुरु देव जी की महिमा अपरम्पार है इनकी महिमा का वर्णन कर सकना मानव बुद्धि से परे है मानव बुद्धि में इतनी सामथ्र्य नहीं जो सतगुरु देव जी की महिमा का वर्णन कर सके। जिन प्रेमियों ने सतगुरु देव जी की महिमा का कुछ कुछ अनुभव किया है उन्होंनें इसे इन शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया है।
खूबियाँआपकी क्या क्या गिनवायें आपकी किस किस अदा पर बलि जायें।
आपकी हर लीला हमारा दिल लुभाती हैआपकी हरमौज पर क्यों न मिट जायें।
एक दफतर भी कम है कागज़ का ज़िक्र आपका लिखने पर गर आयें।
समुन्द्र स्याही का भर लें कलमों के ढेर लगवायें।
मुख में ज़ुबाने लाखों हों लिखने को फरिश्ते बिठलायें।
तो भी खत्म न होगा पावन वर्णनआपका। गर कलम पर कलम तोड़ते जायें।
एक बार जो भी आपके सामने आया आपका ही होकर जाता है।
एक बार जो आपसे हमकलाम हुआ उम्र भर आपके गीत गाता है।
चाँद तारों में आफताब हैं आप सच पूछो तो लाज़वाब हैं आप।।
हम अति सौभाग्यशाली हैं जो हमें श्री हुज़ूर सतगुरुदेव दाता दयाल जी के पावन दर्शन,भक्ति प्रेम औरआध्यात्म के वृक्ष की सुखद शीतल छाया में बैठने का सौभाग्य प्राप्त है हमारा कर्तव्य है कि श्री हुज़ूर के सुन्दर मनोहर छवि को अपने ह्मदय में बसाते हुए उनकी असीम कृपा से प्राप्त पाँचों अमर फलों का श्रद्धा भक्ति से सेवन करते हुए अपने जीवन को सुखी बनायें और अमर पदवी को प्राप्त करके परलोक सँवार लें।
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