Friday, September 2, 2016

वास्तविक ध्येय


     संसार में आम सांसारिक जीवों को यह समझ बहुत कम होती है कि जीवन किसलिये प्राप्त हुआ है अथवा हम किस उद्देश्य की पूर्ति के लिये संसार में आये हैं? वह कौन सी वस्तु है जिसकी प्राप्ति के लिये उत्तम मानुष जीवन प्रदान किया गया है? इन सब बातों की जानकारी प्रायः सबको नहीं होती और न ही लोग इन प्रश्नों का हल ढूँढने का प्रयत्न करते हैं। जिस प्रकार और जिस दशा में भी जीवन व्यतीत हो रहा है, आम लोग उसी के अनुसार जीवन व्यतीत करते जा रहे हैं। सांसारिक जंजाल में फँसे रहने के कारण चाहे जीवन परेशानी और दुःख में बीत रहा है, अनन्त चिन्तायें जीव को सताती रहती है, परन्तु यह विचार बहुत कम आता है कि इन सब परेशानियों और कष्टों से छुटकारा प्राप्त करने का ढंग सोचें। प्रायः यह भी प्रत्येक मनुष्य नहीं सोच सकता कि जीवन इसी प्रकार दुःख और कष्ट में व्यतीत होता रहेगा अथवा कोई ऐसा भी उपाय है जिससे दुःख चिन्तायें दूर होकर सुख का संास लिया जा सके। आम संसार की यही दशा हो रही है कि देखा-देखी एक दूसरे के पीछे जा रहे हैं अर्थात् जो एक मनुष्य कर रहा है दूसरे भी उसकी देखा-देखी वही करने लगते हैं, इस प्रकार संसारी लोग वही पुरानी लकीर पीट रहे हैं। बिना सोचे समझे एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं कोई यह सोचने और समझने का कष्ट नहीं करता कि इसका क्या कारण है कि सब यत्न और साधन करते हुये भी हम लोग दुःखों में फंसे हुये हैं और इससे मुक्ति क्यों नहीं मिल सकती।
     वैसे यदि पूछा जाये तो सब यही कहते हैं कि हम अपना काम कर रहे हैं, परन्तु फिर प्रश्न उठता है कि जब अपना काम कर रहे हैं तो दुःखी और परेशान क्यों हैं? जिन सासंारिक धन्धों को वे अपना काम कहते हैं क्या ये उनके किसी काम आयेंगे भी? उदाहरणार्थ एक मनुष्य को धन कमाने की धुन सवार है-वह इसी सोच विचार में दिन-रात रहता है कि अधिक से अधिक धन एकत्र कर लूँ। यदि वह इच्छानुसार धन कमा भी ले तो उसे कहां व्यय करता है, शरीर और इन्द्रियों की कामनाओं में अथवा शारीरिक रिश्ते-नातों के लिये ही वह उस धन का प्रयोग करता है अथवा फिर संसार के नश्वर पदार्थों और सांसारिक सुखों में ही धन को व्यय करता है और जबकि ये सब वस्तुयें जिन पर उसने धन व्यय किया अनित्य और नश्वर हैं। तो उसका धन किस काम आया? क्या उससे आत्मा की भी कुछ भलाई हुई? नहीं।
     एक अन्य मनुष्य है, वह मान-बड़ाई और पद का इच्छुक है और दिन-रात उसी के पीछे लगा हुआ है। प्रयत्न करने पर यदि उसे सम्मान एवं पद प्राप्त भी हो जाये तो वह भी तो शरीर तक ही सीमित है, जब यह शरीर ही नहीं रहेगा तब वह मान-बड़ाई किसकी हुई? शरीर के साथ वह भी नष्ट हो गई। क्या शारीरिक सम्मान प्राप्त होने से मालिक के दरबार में सम्मान प्राप्त हो सकता है? कदापि नहीं। तब फिर यह अपनी वस्तु कहां हुई?
     इसी प्रकार सम्पत्ति आदि सब वस्तुएँ नाशवान हैं। इन सबका साथ केवल इसी संसार तक और इसी शरीर तक ही है। यही दशा अन्य सासंारिक पदार्थों की है। ये सब केवल शरीर और इन्द्रियों से सम्बन्धित पदार्थ हैं। इनमें मनुष्य का अपना कुछ भी नहीं। ये आत्मा के किसी काम नहीं आ सकते। इनके प्राप्त करने को जो अपना काम कहता है, वह बहुत भारी गलती कर रहा है। शरीर एवं इन्द्रियों का काम भला अपना काम क्योंकर हुआ?
     इसी प्रकार आम मनुष्य भूल और गलतफ़हमी में फंसा हुआ है। जो वास्तव में अपनी वस्तु है, उसकी पहचान नहीं कर सका और जिसे अपना काम समझा वह सब नष्ट हो गया। शरीर भी नष्ट हो गया और शरीर से सम्बन्ध रखने वाले सब पदार्थ भी नष्ट हो गये। इसी प्रकार संसारी मनुष्य एक दूसरे का अन्धाधुन्ध अनुसरण करते हुये जीवन की यात्रा पूरी कर रहे हैं, परन्तु यह ज्ञात नहीं कि वास्तविक मंज़िल कहां है और उस तक पहुंचने का मार्ग कौन सा है?
     आम मनुष्य की इस दुःखभरी दशा को देखकर और संसारियों को परेशान देखकर महापुरुषों को उनकी दशा पर करुणा हो आती है। वह अपना विरद संभालते हैं और जीवों को दुःख के चंगुल से मुक्त कराकर उन्हें सच्चे सुख का मार्ग बतलाते हैं और जतलाते हैं कि जिन कामों को तुम अपना समझ रहे हो ये तुम्हारे अपने काम नहीं हैं, वे तो केवल काल की बेगार हैं और जिनको तुम मेरा-मेरा करके मान रहे हो, वे भी तुम्हारे अपने नहीं और न कभी अपने बन सकते हैं। जिसे तुम अपनी मंज़िल समझ रहे हो, वह तुम्हारी मंज़िल नहीं है। तुम्हारे जीवन का ध्येय कुछ और है जिसे समझने की आवश्यकता है।
     विचार करने की बात है कि मनुष्य किस कद्र धोखे में फंसा हुआ है कि बहुमूल्य जीवन का समय बीता जा रहा है और वह अपने ध्येय से असावधान है। ये मूल्यवान समय यूंही व्यतीत हो जाता है और मनुष्य समझ नहीं पाता कि मेरा वास्तविक काम और जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? मनुष्य संसार में आया तो था एक विशेष ध्येय को लेकर परन्तु यहां संसारियों की संगत में और उनकी देखा-देखी करने से अपना काम भूल गया है और इस पर संसार का रंग चढ़ गया है। महापुरुष बार-बार समझाते हैं कि तू वह काम कर जो तेरे लिये कल्याणकारी हो और सुखदायी हो। जिस काम के करने के लिये जीवन प्राप्त हुआ है उसी के करने में ही भलाई है। परन्तु कितने दुःख का विषय है कि आम मनुष्य उस उद्देश्य को न पहचान कर पूरा जीवन शरीर और इन्द्रियों के अधीन रहकर नष्ट कर देता है।
     ग्रन्थों, शास्त्रों और सत्पुरुषों के उपदेश से यहां पता चलता है कि यह मानुष-जीवन अत्यन्त मूल्यवान है और अत्यन्त सौभाग्य से प्राप्त हुआ है। तो फिर इतने मूल्यवान जीवन को पाकर इसके बदले मूल्यवान वस्तु क्यों न प्राप्त की जाये? यह मूल्यवान समय क्या बार-बार प्राप्त होने वाला है? यदि अनित्य और असत् सांसारिक वस्तुओं के लोभ में इस मूल्यवान जन्म को खो दिया तो फिर जब समय हाथ से निकल जायेगा तो परिणाम में पछतावा और दुःख ही पल्ले पड़ेगा। इस प्रकार मानुष-जन्म के अत्यन्त मूल्यवान हीरे को कौड़ियों के मोल गंवा देना कोई साधारण हानि नहीं है। इसका अनुमान विचारवान ही लगा सकते हैं। एक ओर तो सत्पुरुषों के वचनों को मानकर यदि जीव नाम और भक्ति की कमाई कर लेता है तो जिस ध्येय के लिये संसार में आया था उसे पूरा कर लेता है अर्थात् बिछुड़ी हुई आत्मा को मालिक से मिला कर परमानन्द को पा लेता है। यह इतना बड़ा लाभ है जिसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता। दूसरी ओर यदि सन्तों सत्पुरुषों के वचन से जीव लापरवाही करता है और संसार की देखा-देखी माया के पदार्थों के पीछे लगा रहता है तो मूल्यवान मानुष-जीवन भी नष्ट हो जाता है और अन्त में चौरासी लाख योनि में जा पड़ता है। यह कितनी बड़ी हानि है। कितने दुःख की बात है कि उत्तम श्रेणी के मानुष-जीव को खोकर नीच योनियों में चला गया।
     महापुरुषों की शरण-संगत जिन्हें सौभाग्य से प्राप्त हो जाती है तो सत्संग के प्रताप से उन्हें यह समझ आ जाती है कि हमारा लाभ किस बात में और हानि किस में है? संसारियों की दुःखभरी दशा और माया में फंसने के भयजनक परन्तु शिक्षाप्रद परिणाम को देखकर वे सोचते हैं कि कहीं हमारा भी वैसा ही अन्त न हो, इसलिये वे सच्चाई और भक्ति का मार्ग अपनाते हैं। क्योंकि आम संसार का ध्यान केवल शरीर और इन्द्रियों के सुखों की ओर है अतः देखा देखी अन्य लोग भी उसी मार्ग पर चलते जा रहे हैं। परन्तु महापुरुषों के उपदेशों के प्रकाश में देखा जाये तो यह मार्ग गलत है। मनुष्य के अपने जीवन का अनुभव भी यही बतलाता है कि शरीर एवं इन्द्रियों के धन्धों में लगे रहने से सच्ची शान्ति और सच्चा आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता। संसार के सब पदार्थ इच्छानुसार पा लेने और इतनी आयु तक दिन-रात खोज करने के पश्चात भी मन को शान्ति प्राप्त नहीं हुई तो इससे यही सिद्ध होता है कि जिस मार्ग पर मनुष्य चल रहा है वह सही नहीं है। और जिस लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, वह लक्ष्य वास्तविक नहीं है। केवल संसारियों की देखा देखी उस मार्ग पर चल पड़ा है और उन्हीं की तरह संसार के पीछे दौड़ा जा रहा है क्योंकि इस मार्ग पर चलने वाले अधिक हैं। परन्तु महापुरुषों का कथन है कि परिणाम तो इसका दुःख ही दुःख और अशान्ति ही अशान्ति है, फिर यह मार्ग क्योंकि सही हुआ? नहीं, मानुष-जन्म का ध्येय यह नहीं है। यह वास्तविक लक्ष्य नहीं है और यह मनुष्य का अपना काम नहीं है। जिस ध्येय की पूर्ति के लिये मनुष्य संसार में आया था उसे समझा नहीं-अपने वास्तविक काम को जाना नहीं। जो गुरुमुख और विचारवान हैं वे जानते हैं कि शारीरिक आवश्यकतायें तो पशु भी पूरी कर लेते हैं। केवल शरीर और इन्द्रियों की कामनाओं को पूरा करना तो मानुष-जन्म के बड़प्पन का चिन्ह नहीं है। मनुष्य की बड़ाई तो किसी और ही बात में हैं। सत्पुरुषों का कथन हैः-
                निद्रा,  भोजन,  भोग,  भय  पशु  पुरुष  समान।
                नरन ज्ञान निज अधिकता, ज्ञान बिना पशु जान।।
अर्थः-नींद, खाना-पीना एवं इन्द्रियों के भोग आदि, इन सबमें पशु और मनुष्य समान हैं अर्थात् दोनों ही इन्हें प्राप्त करते हैं, परन्तु मनुष्य की बड़ाई एवं महत्ता तो केवल आत्म-ज्ञान से है और यदि मनुष्य ने आत्म-ज्ञान प्राप्त नहीं किया तो उसे भी पशु जानना चाहिये।
     ये शरीर और इन्द्रियों के सुख तो पशुओं को भी प्राप्य हैं, फिर यदि मनुष्य भी इन्हीं सुखों में फंसा रहा तो उसकी महानता क्या हुई? मनुष्य की महत्ता और महानता इसी में है कि उस सर्वोच्च वस्तु को प्राप्त करे जो कि निम्न श्रेणी की योनियों में प्राप्त नहीं हो सकती। वह क्या है? वह केवल आत्म-ज्ञान है। अन्य योनियां इसी कारण निम्न श्रेणी की मानी जाती हैं कि वे आत्म कल्याण के साधन से वंचित हैं। उन्हें वह उच्च श्रेणी की समझ अथवा ज्ञान प्राप्त नहीं। यह ज्ञान और विवेक केवल मनुष्य को प्राप्त हो सकता है और केवल सत्पुरुषों के सत्संग से ही प्राप्त हो सकता है, जिसे पाकर वह अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है, वरना अन्य बातों में तो फिर मनुष्य और पशु में अन्तर ही क्या था? सत्पुरुषों का कथन है कि भक्ति के बिना मनुष्य पशुओं का दर्ज़ा रखता हैः-
                एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मन।
                जैसे सूकरु सुआन नानक मानो ताहि तन।। (गुरुवाणी)
अर्थः-जिस मनुष्य के ह्मदय में मालिक की सच्ची भक्ति की लगन नहीं है, श्री गुरुनानकदेव जी फरमाते हैं कि उसका शरीर पशुओं के समान है क्योंकि भक्ति से भूलकर वह भी पशुओं के समान केवल शरीर और इन्दिर्यों के रसों में ही फंसा हुआ है।
     भक्ति से वंचित होने के कारण मनुष्य को पशु-देह में जन्म लेना पड़ा, तो यह कितना अनर्थ हुआ? मनुष्य ने स्वयं ही अपनी आत्मा पर अन्याय किया कि उत्तम श्रेणी का मानुष-जीवन प्राप्त करके पशुओं के काम किये और पशु-देह में चला गया, यह कितनी बड़ी हानि है? इस हानि का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता।
       दुःख की बात तो यह है कि जिस मालिक ने उच्च श्रेणी का मानुष-जीवन प्रदान किया, उसके उपकार को ही मनुष्य न समझ सका। कोई किसी को मामूली सी वस्तु दे दे तो उसका भी कितना उपकार मानते हैं? मालिक ने तो इतना बड़ा उपकार किया है कि मूल्यवान जीवन प्रदान कर दिया। मनुष्य को चाहिये कि कृतघ्न न बने और मालिक के उपकार का कम से कम इतना बदला तो दे कि उसका कृतज्ञ रहे और ऐसा काम करे कि मानुष-जीवन के बदले मानुष-जीवन तो प्राप्त करे, पशुओं का दर्ज़ा तो प्राप्त न करे। मालिक तो मनुष्य से यही चाहता है कि मनुष्य केवल मेरा ध्यान करे और फिर देखे कि उसे कितना ऊँचा दर्ज़ा प्राप्त हो जाता है। परन्तु यह मनुष्य की कृतघ्नता और दुर्भाग्य ही कहा जायेगा यदि वह मालिक को याद न करके शरीर एवं इन्द्रियों का दास बनना स्वीकार करे।
     जो गुरुमुखजन सत्पुरुषों की शऱण-संगत में आ गये हैं, उनके बड़े ऊँचे संस्कार हैं, उन्हें वास्तविकता की सूझ-बूझ और परख प्राप्त हो गई है वरना आम संसारी मनुष्य को वास्तविकता की समझ सरलता से आती नहीं। संसारी मनुष्य तो बस एक दूसरे की देखा-देखी करने को ठीक समझते हैं। उनका विचार है कि जब सब संसार यही कुछ कर रहा है तो यही ठीक होगा। अतएव वे एक दूसरे का अन्धाधुन्ध अनुसरण ही करते हैं। चाहे ऐसा करने में बार-बार दुःख, चिंता आदि क्यों न प्राप्त हों फिर भी उसी को ठीक समझते हैं।
     इसीलिये कहा जाता है कि महापुरुषों के सत्संग में जिसको वास्तविकात का ज्ञान प्राप्त हो जाये उसके बड़े भाग्य हैं। यदि मनुष्य सत्संग के प्रताप से असल-नकलऔर सत्य-असत्य में अन्तर करना सीख जाये तो अपना काम बना ले और जीवन को संवार ले। क्योंकि जब तक वास्तविकता का ज्ञान ही प्राप्त न हो, सही मार्ग कैसे प्राप्त होगा? सत्संग में ही पता चलता है कि जीवन का वास्तविक ध्येय मालिक का भजन-सुमिरण है। यही भजन-सुमिरण ही मनुष्य का वास्तविक काम है। वरना अन्य सूरत में यदि कोई संसार के बड़े-बड़े काम भी कर ले तो उनसे आत्मा को क्या लाभ? वे तो केवल शरीर और इन्द्रियों के लिये हैं और उनसे केवल शरीर और इन्द्रियों को ही क्षणिक सुख प्राप्त हो सकता है। वास्तविक काम क्या है सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
                अवरि काज तेरै कितै न काम। मिलु साध संगति भजु केवल नाम।।
अर्थः-ऐ मनुष्य! अन्य सब सांसारिक काम-धंधे तेरे किसी काम आने वाले नहीं। तेरा अपना काम तो केवल यही है कि सन्तों की शरण-संगत में मालिक के नाम की कमाई कर।
     मालिक के धाम में जब जायेगा तो वहां यह कोई नहीं पूछेगा कि संसार में तुमने कितना धन एकत्र किया, कितनी सम्पत्ति बनाई और कितना ऊंचा दर्ज़ा प्राप्त किया अथवा कितने तुम्हारे सम्बन्धी आदि थे? अपितु यह पूछेंगे कि मालिक के सुमिरण-ध्यान में कितना समय दिया, नाम की कमाई और भजन में जीवन के कितने स्वांस व्यय किये। वहां यही कुछ पूछा जायेगा और इसी पर निर्णय होगा।
     इसलिये जो गुरुमुख हैं वे सदैव अपने काम की ओर ध्यान देते हैं। संसार में रहते हुये और संसार के काम-काज करते हुये भी गुरुमुखों की सुरति मालिक के चरणों में रहती है और उनका ध्यान अपने वास्तविक ध्येय को पूर्ण करने में लगा रहता है।
     सत्पुरुषों की संगत में सच्चे नाम की कमाई करने का यह जो अनमोल और दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है, गुरुमुख और विचारवान इस अवसर का पूरा लाभ प्राप्त करते हैं और नाम-भक्ति का कमाई करके, जीवन के एक-एक पल को मालिक के सुमिरण ध्यान में व्यय करके मालिक की समीपता और प्रसन्नता प्राप्त कर लेते हैं और जीवन के वास्तविक ध्येय को पूरा करके अपना जीवन सुधार लेते हैं। यही अपना वास्तविक ध्येय है और इसी में जीवन की सफलता है।

1 comment:

  1. गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि,हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ और मैं ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति का, मैं ही सभी प्राणियों के जीवन का और मैं ही सभी प्राणियों की मृत्यु का कारण हूँ। कहने का तात्पर्य यह है कि सभी प्राणियों के आदि, मध्य और अंत में भगवान ही हैं।
    गीता सनातन धर्म का पवित्र पुस्तक है यदि आप इसे सत्य समझते हैं तो तय मानिए सभी जीव का प्राण,भगवान श्री कृष्ण से संयुक्त हैं।

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