Sunday, September 11, 2016

सच्चा सेवक


""वैसे तो गुरु दरबार में सैंकड़ों ही नहीं अपितु सहरुाों सेवक आया करते हैं और कई रहते भी हैं परन्तु वही सेवक सद्गुरु दरबार से सही लाभ उठा सकता है जो सेवक अपने विकारों को हटाने का और सुख-दुःख को समान जानने का यत्न भी साथ साथ जारी रखता है। परन्तु ये दोनों गुण जीव में उस समय स्वयमेव आ जाते हैं जब कि वह गुरुवाणी के नीचे लिखे शब्द पर आचरण करता है।
सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊत्तम बानी।।
गाविआ सुणिआ तिन का हरि थाइ पावै जिन सतिगुर कीआगिआ सति सति करि मानी।
                                              धनासरी महला-4
फरीदा दुखु सुखु इकु करि दिल ते लाहि विकारु।
अलह भावै सो भला तां लभी दरबारु।। (वानी बाबा शेख फरीद)
जो सेवक गुरु दरबार में रहता हुआ भी कभी सुखी कभी दुःखी होता है और मनमति पर चलता है उसे चाहिये कि इस महापुरुषों की वाणी का सहारा लेकर सच्चा सेवक बनने का प्रयत्न करे और अपने जीवन को सफल बनाये।
     यह तो संसारी लोगों में देखा जाता है कि वे सुखी-दुःखी हुआ करते हैं। कहीं से मान-बड़ाई मिल गई तो फूले न समाये और कहीं अपमान हुआ तो मुँह फुलाकर बैठ गये। यदि गुरु के सेवक का भी यही बर्ताव रहा तो सन्त उसे सेवक कोटि में नहीं गिनते। गुरुवाणी का वाक्य हैः-
                ""मान अभिमान मंधे सो सेवक नाहीं''
 इन वचनों से हम अपने मन की दशा को तोल सकते हैं कि क्या हम भी मान के अभिमान में प्रसन्न और अपमान में अप्रसन्न होते हैं? अर्थात् हम सुखी-दुःखी होते हैं या नहीं। मुझे एक सेवक की बात याद आ गई वह कह रहा था कि हमें चालीस वर्ष व्यतीत हो गये गुरु दरबार की सेवा करते करते किन्तु महाखेद होता है कि हमारा मान इतना भी नहीं जितना कि दो वर्ष सेवा करने वाले का होता है। यह कहते कहते उसने आगे कह दिया कि मुझे ऐसी बात सोचते सोचते रात भर नींद भी नहीं आती और सदा यही चिन्ता बनी रहती है।
     ऐसी दशा में यदि हम विवेक की आँख खोलकर देखें तो सेवकपने से हम लाखों कोस दूर पड़े हैं क्योंकि जो अखण्ड सुख पाने का एक सेवक को अधिकार है उसकी इच्छा या माँग तो हम करते ही नहीं और मिथ्या मानापमान में ही सुरति उलझी रही तो जिस तत्त्व की परख के लिये सन्त सद्गुरु देव जी की चरण-शरण में आये थे उसको हमने न पहचाना। हम पहचान भी कैसे सकते थे जब कि हम दुःख-सुख से न्यारे तो हुए न थे। तत्त्व की पहचान तो तब होगी जब किः-
                सुख-दुःख दोनों सम करि जानै और मान अपमाना।
                हरख  सोग  ते रहै अतीता तिन जग तत पछाना।।
71
तत्त्व की परीक्षा करने के लिये सत्पुरुषों ने ये लक्षण बतलाये हैं कि वह सुख-दुःख, मानापमान में सम रहे और हर्ष-शोक से न्यारा रहे। हमारे श्री गुरुदेव जी महाराज की भी यही मौज है कि ""ऐ मेरे प्यारे सेवको! तुम इस द्वन्द्व भरी माया से ऊपर आ जाओ क्योंकि मेरा स्थान वहां ही है जहां सुख-दुःख की गति नहीं है वहां पहुँचने के लिये तुम्हें लकड़ी या लोहे की सीढ़ी काम न आएगी अपितु शब्द की सीढ़ी पर पाँव जमा जमाकर ऊपर चढ़ते चलो।'' परमसन्त श्री कबीर साहिब जी भी अपने सेवकों को यही समझा रहे हैंः-
                हम वासी वा देस के, जहँ जाति वरन कुल नाहिं।
                सबद  मिलावा  होत  है ,  देह मिलावा नाहिं ।।
यह गुरु-सेवक का मिलाप शब्द को पकड़ कर ही तो हो सकता है। शब्द वस्तुतः क्या है? सर्वश्रेष्ठ प्रधान शब्द तो सद्गुरु का वचन है। गुरुमहाराज जी के पीछे तो ऋद्धियाँ सिद्धियां घूमती ही रहती हैं जो सेवक उनके द्वार की सेवा सच्चे मन से करता है और उनके वचनों का पालन करता है उसके पास भी धन-पदार्थ की कोई कमी नहीं रहती। परन्तु जो सेवक इन सब पदार्थों को गुरु-कृपा से आया हुआ समझकर इनकी मोह-ममता में न फँसता हुआ अपने आप को विषय-विकारों से न्यारा रखता है वह गुरु-कृपा का पात्र बन जाता है। इसके विपरीत दूसरा जो इन पदार्थों को अपनी योग्यता से अर्जित किया हुआ मान कर भोग-विलास के अधीन हो जाता है वह अपनी आत्मा पर दारुण अत्याचार करता है। कारण-फँसना बड़ा सुगम है किन्तु छूटना अति कठिन है गुरुवाणी के वचन हैंः-
                फासन की विधि सभु कोउ जानै छूटन की इकु कोई।।
                कहि  कबीर  रामु  रिदै विचारै सूतकु तिनै न होई।।
                                   (गुरु वाणी-गौड़ी कबीर जी पृ.331)
बड़े बड़े बुद्धिमानों को मन ऐसा चकमा देता है कि इस जन्म में तो क्या वे जन्म जन्मान्तरों तक दुःखी रहते हैं और उनकी जग तृष्णा नहीं मिटती। एक उपहास है कि एक सूरदास नदी के किनारे बैठ कर मिठाई खा रहा था। सूर्यग्रहण का दिन था। किसी सज्जन ने उसे कहा कि और सूरदास! तुम सूर्यग्रहण के समय क्यों खा रहे हो? उसने प्रत्युत्तर दिया कि भाई! हमारे लिये तो बारहों महीने सूर्यग्रहण ही है। यही मनोवृत्ति मनमुखों की समझनी चाहिये। वाणी इसी का समर्थन करती हैः-
                मनमुख  मन  अजित  है  दूजै  लगै जाइ।
                तिसनो सुख सुपनै नहीं दुखे दुख विहाइ।।
चञ्चल मन ही महान शत्रु है। वह मनुष्य को आशाओं की डोरी में बाँधकर बन्दर की भाँति नचाता रहता है। इस मनमति के कारण ही जगत् में दुःख ही दुःख छाया हुआ है। इस दुःख रुपी रोग के मूल कारण को तो कोई पकड़ता नहीं ऊपर ऊपर से ही उपचार किया जाता है-इसलिये रोग दिन दिन बढ़ता जाता है।
      उपाख्यान है-एक मछली बेचने वाला किसी गन्धी की दुकान के पास से गुज़र रहा था। दो चार दुकानें और भी इत्र फुलेल बेचने वालों की थीं। ज्यों ही उसे उनकी उग्र गन्ध आई उसका सिर लगा चकराने क्योंकि उसका दिमाग तो मछली का दुर्गन्ध का आदी था और वह बाज़ार में ही गिर पड़ा। किसी ने कहा कि यह कमज़ोरी के कारण गिर गया है। दूसरा बोला इसे मिरगी का दौरा पड़ गया है। उसे सचेत करने के लिये बढ़िया बढ़िया इत्र और सुगन्धित द्रव्य सुँघाये गये किन्तु उस पर कोई प्रभाव न हुआ। उसकी दशा और बिगड़ती गई-सच है ""मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की'' इस पर एक मनुष्य उसकी बिरादरी वालों के पास गया और उन्हें सारा हाल कह सुनाया। वहां एक वयोवृद्ध बैठा हुआ था। उसने पूछा कि वह कौन सी जगह गिर गया है? उस व्यक्ति ने कहा कि गन्धी बाज़ार में। वह वृद्ध मनुष्य एक ही
72
क्षण में सारी बात को समझ गया। वह बोला कि उसके मस्तिष्क को उग्र सुगन्ध ने ही बिगाड़ दिया है। वह उठा और एक अत्यन्त दुर्गन्ध से भरी मछली अपनी कमीज़ में छुपा कर उस व्यक्ति के साथ वहां पहुँचा। उसने वह मरी हुई मछली उसकी नाक पर रख दी। दो मिनट में वह व्यक्ति उठ खड़ा हुआ।
     इसी तरह जो पुरुष रोग के निदान को समझ लेता है वही रोग का सफल इलाज कर सकता है। सन्त सतगुरुदेव जी इसी प्रकार जीवों के दुःख की जड़ को ही काट देते हैं। भाव यह कि गुरुमति के धारण करने से ही दुःखों का अन्त हो जाता है नहीं तो प्रायः लोग अपनी मनमति के अनुसार चलकर ह्मदय रुपी क्षेत्र में अपने आप ही दुःख रुपी बीज बोते हैं और खेत के पक जाने पर उसके विषैले फल खाकर रोते हैं। ""करदन ए खेस-आमदन-ए पेश-खुद करता रा-इलाज-ए नेस्त।''अर्थात् अपना किया हुआ अपने आगे आया। अपने किये का इलाज नहीं है अपने किये हुए कर्म का फल स्वयं ही काटना पड़ता है।        मन मुख दुख का खेत है, दुख बीजे दुख खाइ।
                दुख विच जंमै दुख मरै , हउमै करत विहाई ।।
                            गुरुवाणी-रामकली महला. 3 पृ.947
मनमुखों की जीवन कहानी दुःख से आरम्भ होती है। दुःख में ही कटती है और उसका अन्त भी दुःख में होता है। वे स्वप्न में भी सुख का मुँह नहीं देखते। उनकी पीठ सदा ही विश्वपिता की ओर रहती है। वे संसार के पदार्थों में ही सुख की खोज करते हैं। उन्हें सांसारिक भौगैश्वर्य कितना ही प्राप्त हो जाय। धन सम्पदा कितनी संचित कर ले, उस ऐश्वर्य से सुख-सामग्री तो खरीद सकते हैं परन्तु निश्चिन्त नींद नहीं मिल सकती। नरम-नरम बिछोने भी उन मनमुखों को काँटे की न्यार्इं चुभेंगे। इसी प्रकार अजीर्णता के होने से वे ही स्वादिष्ट व्यञ्जन उनके लिये विषवत् सिद्ध होंगे। ऐसे ही नाम व भक्ति के बिना जितने भी भोग हैं सबके सब दुःख दायक बन जाते हैं। मनमति को अपनाकर मनुष्य आप ही धन पदार्थों का संग्रह करता है और पीछे वे पदार्थ ही उसके लिये पश्चात्ताप करने का कारण बन जाते हैं। ऐसा मनमुखी जीव सर्वदा व्याकुल रहता है। जैसे किः-
                अन्दरि कपटु सदा दुखु है। मनमुख ध्यानु न लागै।
                दुख विचि कार कमावणी। दुखु वरतै दुखु आगै।।
                                  राग बिलावल-महला 4. पृ. 851
जो लोग मनमति से चलते हैं वे अपने किये हुए कर्मों का फल स्वयं पाते हैं उनकी चाल यह होती है कि जिस सुखदाता प्रभु को ह्मदय मन्दिर में बिठलाना था उसे तो ऊपर ऊपर से याद करते हैं और जिन सांसारिक पदार्थों से बाहर की आवश्यकताओं को पूरा करना था उन्हें अपने मन में बसाते हैं। ऐसी बेढंगी चाल का फल एक दिन उनके सामने आता है।
     उदाहरण के रुप में यदि कोई वैद्य किसी रोगी को जिन चीज़ों के सेवन से रोके और वह रोगी वैद्य के कहने की उपेक्षा करके उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग करता रहे वह नीरोग नहीं हो सकता चाहे वह लाखों दवाइयाँ खाता रहे और वैद्य जी को झूठ मूठ पथ्य करने का चकमा भी देता रहे परन्तु अन्दर गये हुए पदार्थ अर्थात् कुपथ्य एक न एक दिन अपना प्रभाव दिखायेगा ही।
     सर्वसमर्थ परमेश्वर तो अन्तर्यामी हैं उनसे कोई क्या छुपायेगा? जो कोई उनसे छल-कपट करेगा वह अवश्य दुःख का भागी बनेगा। यदि हमें दुःख से छुटकारा पाने की इच्छा है तो ऊपर लिखे हुए श्रीवचन में जो तीन युक्तियाँ बतलाई गई हैं उनको क्रियान्वित करेंगे तो सद्गुरुदेव के दरबार में जो विशुद्ध परमार्थ एवं अध्यात्म  का दरबार है पहुँचकर उनके दरबारी कहलाएँगे।  वे तीन  युक्तियां जिन पर  आचरण करने से
73
मनुष्य सच्चा दरबारी बन सकता है ये हैं- 1. विकारों से बच कर रहे। क्योंकि काम-क्रोधादि विकार ही निर्विकार प्रभु के दरबार में ऐसे जाने नहीं देते जिस तरह कोई गले में पत्थर बाँधकर सागर तरना चाहे। विकार भरी सुरति कामनाओं के कीच से सनी हुई सत्य खण्ड की ओर उड़ान नहीं भर सकती।
2. वह सुख-दुःख में समान रहे। 3. मालिक की रज़ा में राज़ी रहे-यह भी एक ऐसा अनुपम गुण है। इसके होने से कोई भी दुःख सामने आएगा वह सुख में बदल जायेगा इसके लिये जो वचन सत्पुरुषों ने ऊपर कथन किये हैं किः-गाविआ सुणिआ तिन का हरि थाइ पावै।
                 जिन सतिगुर की आगिआ सति सति करि मानी।
जो इस वचन को अन्तर में धारण करेगा वही उनके सर्वोत्तम दरबार में पहुँच कर अपने जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त करेगा और वही सच्चा सेवक कहलाने के योग्य है।

No comments:

Post a Comment