""जो मनुष्य सच्चाई से भक्ति करता है उसकी भक्ति स्वीकृत होती है और जो छल-कपट से भक्ति करता है वह मानो अपने आप को धोखा देता है।''
परमात्मा के दरबार में सच्ची नियत पर ही पूर्ण प्रसन्नता मिलती है वहां छल-कपट अर्थात् (कहना और करना कुछ और) करने वाला मनुष्य उस प्रसन्नता से वञ्चित रह जाता है। अतएव श्री सद्गुरु दरबार में प्रायः चतुर-चपल लोग भक्ति का लाभ बहुत कम उठाते हैं और वह भी बहुत देर से। किन्तु सच्चे और सरल पुरुष श्रद्धा के कारण उस भक्ति के धन को बहुत जल्दी पा लेते हैं। जैसे किः-
दिलहु मुहबति जिन्ह सेई सचिआ ।।
जिन्ह मनि होरु मुखि होरु सि कांढे कचिआ।। (वाणी शेख फरीद जी)
संसार में दोनों प्रकार के मनुष्य पाये जाते हैं-एक सत्य के पुजारी जो काया-माया को झूठ समझकर सच के ऊपर हँसते हँसते प्राणों को होम देते हैं-उनके मन की धारा पूर्ण रुप से सत्य की ओर बहती है। ऐसों को राज्य का लोभ दिया गया और प्राणों से हाथ धो लेने का भय दिखाया गया परन्तु वे झूठ की ओर नहीं झुके। ऐसे लोग यद्यपि शारीरिक रुप से संसार में नहीं हैं परन्तु उनकी कीर्ति अमर है। वे क्योंकि सत्य में समा कर सत्य रुप बन गये।
बहुधा गुरुद्वारों में अरदास के समय चार साहिबजादों और चालीस मुक्तों के शुभ नाम दोहराये जाते हैं। उनके नाम सुनते ही लोगों के ह्मदयों में प्रेम व भक्ति के भाव सहसा ही उभर आते हैं। इसका हेतु यह है कि उन्होने निष्कपट और निश्छल होकर भक्ति के पथ पर बलिदान दिये हैं। यदि उनके मन की भावना असत्य की ओर होती तो फिर वे प्रलोभन में पड़कर अपनी प्राणाहुति न देते क्योंकि वे ही लोग बड़ी बड़ी पदवियां उन्हें देने को तैयार थे जिन्होने उनकी जान ले ली। ऐसी ऐसी सत्यमूर्तियां अपने उदाहरण आप हैं और वे उपदेश दे गई हैं कि भक्ति की राह में काया और माया की आहुति भी देनी पड़े तो संकोच न करो और अपनी सुरति पर सांसारिक मोह का कलंक न लगने दो।
कोई बाहर से भेष तो बनाये भक्ति का और अन्दर से अपनी सुरति को शरीर और शारीरिक सम्बन्धों में जोड़े रखे तो वह वस्तुतः बड़ी भारी हानि में जा रहा होता है। ऐसे मनुष्यों की दशा पर महापुरुषों का अत्यन्त दुःख भरी वेदना होती है इसलिये कि उन्होने ऐसा दुर्लभ समय मिलने पर भी लाभ प्राप्ति की अपेक्षा उलटा हानि ही उठायी।
दूलन गुरु तें विषै बस, कपट करहिं जे लोग।
निर्फल तिन की सेव है, निर्फल तिनका जोग।।
सन्त दूलनदास जी कथन करते हैं-जो लोग विषय विकारों के वश में होकर अपने गुरु से कपट करते हैं
उनकी भक्ति सेवा और यौगिक साधना सब निष्फल हो जाती है। उस का फल कोई नहीं मिलता। दीवार का झुकाव जिधर होगा वह उधर ही गिरेगी। इसी तरह मनुष्य की सुरति का झुकाव जिस ओर होगा वह अन्त में वहां ही समाएगी।
इब्रााहीम बादशाह का प्रसंग प्रसिद्ध है कि वह एक दिन अपने नादान बच्चे को गोद में बिठा कर प्यार करने लगा था कि उसी समय आकाशवाणी हुई कि""ऐ इब्रााहीम! तू या तो मेरे से प्यार कर या अपने बेटे के प्यार को मन में रख एक ह्मदय में दो प्यार कदापि नहीं समा सकते।''
यह सुनते ही उसने मालिक के चरणों में क्षमा मांगी और हर ओर से अपनी सुरति को समेट कर पूरे का पूरा ध्यान परमेश्वर के स्मरण में लगा दिया। भाव यह कि जब उसने अपनी चित्तवृत्ति को शरीर और शारीरिक सम्बन्धियों से तोड़कर प्रभु चरणों में जोड़ दिया तब वह सच्चा फकीर कहलाया। जब भक्त नामदेव जी का निराला छप्पड़ भगवान बना गये तो बड़े बड़े अमीर पड़ोसियों ने उसे देखकर दांतों तले उंगलि दबा ली। वे सब चकित होकर नामदेव जी से पूछने लगे कि किस बढ़ई ने तुम्हारा ऐसा भव्य छप्पड़ बनाया है? हमें उसका पता बता दो तो हम उसे दुगुनी मज़दूरी देने को तैयार हैंः-
पाड़ पड़ौसणि पूछिले नामा कापहि छानि छवाई हो।
तोपहि दुगणी मज़ूरी दैहउ मोकउ वेढी देहु बताई हो।।
नामदेव जी ने उत्तर दियाः- बेढी प्रीति मज़ूरी माँगै जउ कऊ छानि छवावै हो।।
लोग कुटुम्ब सभउ ते तोरै, तउ आपन बेढी आवै हो।।
वह कहने लगे कि वह बढ़ई प्रीति की मज़दूरी मांगता है जो कोई भी उससे छान (छप्पड़) बनवाना चाहे उसे अपने कुटुम्ब परिवार से मोह के तार तोड़ने पड़ेंगे तब वह अपने आप आयेगा। जब तक मन में लोगों का प्यार होगा वह बढ़ई किसी तरह नहीं आवेगा। जो लोग यह आशा रखते हैं कि नाता तो निभायेंगे संसारी लोगों से और प्रीति जोड़ेंगे परमात्मा से, उनको आज ही यह निश्चय कर लेना चाहिये कि वे ऐसी भ्रान्त धारणा को छोड़ दें। परमेश्वर ऐसे अनजान नहीं हैं अपितु वे तोः-
घर घट के पट पट की जानत। भले-बुरे की पीर पहचानत।।
चाहे कोई मुख से कुछ भी न बोले किन्तु मन के अन्दर संकल्प के उठते ही जब कि वह अन्तर्यामी तुरन्त जान लेते हैं तो उनके साथ धोखा कैसे हो सकेगा।यदि संसार का मोह रखने से भक्ति की प्राप्ति हो सकती तो अर्जुन से भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ऐसा क्यों कथन करतेः-
सर्वंधर्मान् परित्यज्य, मामेकं शरणं व्रज।
अहन्त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
जब श्री गुरु नानकदेव जी के मोदखाने का लेखा जोखा हुआ और लाभ निकला तो उनसे पूछा गया कि यह रुपया कैसे खरच किया जाय तो उन्होने उत्तर दिया कि साधु-संगत की सेवा में यह सारी राशि उठा दो-यद्यपि उनके घर में उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चे विद्यमान थे। उन्हें एक पैसा भी नहीं दिलवाया। इसके विपरीत जो लोग अपनी तन की कमाई को केवल अपने स्वार्थ में और मोह-माया के पीछे व्यय कर देते हैं परिणाम स्वरुप वे अपने आप को नीच योनियों का शिकार बना देते हैं।
बहु परपञ्च करि पर धनु लेआवै। सुत दारा पहि आनि लुटावै।।
मन मेरे भूले कपटु न कीजै । अंति निबेरा जिअ पहि लीजै।।
इसी प्रकार के वचन श्री सुखमनी साहिब में भी आये हैंः-
वे लोग ऐसा घाटे का सौदा करते हैं अपनी तो हानि करते ही हैं अपने साथ कुटुम्बियों को भी डुबोते हैं। लोभ के वश में आकर आँखें होते हुए भी अन्धों का सा बत्र्ताव करते हैं। उनको झूठ मधु के समान मीठा लगता है। कूड़ मिठा कूड़ माखिउ कूड़ डोवे पूरु।।
जिन गुरुमुखों को सत्पुरुषों की चरण-शरण में आकर सत्य असत्य की परख हो जाती है वे आत्मिक लाभ-हानि को समक्ष रखकर ऐसे कुमति के शिकार नहीं होते। वे झूठों का पल्ला नहीं पकड़ते। वे सबके सब उनसे विलग हो जायें तो भी उन्हें परवाह नहीं होती। उनको केवल सत्य का आधार होता है। वे अनन्य भक्त होते हैं और उनका योग क्षेम सब प्रभु पर होता है।
आज भी गुरु दरबार में ऐसे दृढ़ संकल्प वालों की कमी नहीं है। जो एक सद्गुरु देव सत्य स्वरुप से प्रीति जोड़कर अन्य सबके सब नाते तोड़ कर अपने आपसे एक भक्ति का आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। श्री सद्गुरु देव भी अदृश्य रुप से उनके अंग-संग रहते हैं तथा उनके समस्त कार्य स्वयं सँवारते हैं। सन्त सद्गुरु यथा सम्भव जीव की भलाई चाहते हैं। जीव को चाहे बाह्र रुप में इस बात का ज्ञान हो या न हो-परन्तु निदान वह इस रहस्य को जान जाता है। जैसा किः-अधोलिखित घटना से स्पष्ट है-
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी "देशमेश' महाराज ने एक दिन आज्ञा दी कि यह जो अपार सम्पत्ति हमारे पास पड़ी है उसे नदी में बहा दिया जाय। उन सेवकों में कई सिक्ख जो पैसे को बड़ा महत्त्व देते थे वे गुरु महाराज जी की माता जी के निकट गये और निवेदन किया कि यह धन हमें दिलवा दो-श्री माता जी ने श्री गुरु महाराज जी से प्रार्थना की कि यह तुम्हारे शिष्य अति निर्धन हैं। इस धन को नदी में फैंकने की अपेक्षा इन्हें ही दे दो। श्री गुरु महाराज जी ने उत्तर दिया कि माता जी!हम तुम्हें कहें कि चार आने का विष लेकर हमारे भोजन में डाल दो तो क्या तुम ऐसा कर दोगी? माता जी ने उत्तर दिया कि बेटा!यह तो मैं कभी भी न करुँ। इस पर श्री दशमेश जी बोले-तो यह काम मुझ से भी नहीं हो सकता। ये क्योंकि मेरे आत्मिक बालक हैं। यह धर्मार्थ धन इनकी भक्ति की घोर हानि करेगा। इससे यह बहुत अच्छा है कि ये लोग भक्ति भजन करें चाहे इन्हें अत्यन्त कठिनाई से जीवन निर्वाह करना पड़े। इसमें इनका परम कल्याण है। यह सुनकर माता जी अवाक् हो गर्इं। भक्ति के मार्ग पर सच्चाई की नितान्त आवश्यकता है। रामायण में भगवान श्री रामचन्द्र जी ने स्पष्ट कथन किया हैः-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
ऐ सुग्रीव! जो निर्मल मन वाले भक्त हैं वे ही मुझे पाते हैं। मुझे क्योंकि छल-कपट और परदोष दर्शन अच्छा नहीं लगता। इसलिये मलिन मन वाला पुरुष परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकता यह सच्चाई प्रकट होती है। भक्ति करने वालों को भक्ति के इस प्रमुख लक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिये।
बिन छल विश्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।।
इन लक्षणों से युक्त पुरुष राम भगवान में ऐसे एकाकार हो जाता है जैसे दूध में पानी। यदि उस दूध में कपट रुपी खटाई डाली जाये तो दूध और पानी अलग-अलग हो जाता है।
जल पय सरिस बिकाय, देखो प्रीति की रीति भली।
तुरत विलग हो जाय कपट खटाई परत ही।।
कपट पूर्ण भक्ति निभ नहीं सकती। एक दिन चलेगी-दो दिन चल जायेगी-वर्ष-दो वर्ष चलेगी अन्ततोगत्वा सारा भेद खुल जायेगा। उघड़ेहु अन्त न होइ निभाहू। कालनेमि जिमि रावण राहू।।
कालनेमि रावण, और राहू राक्षस ने अपने आपको बहुत ही छुपाने का प्रयत्न किया किन्तु अन्त में प्रकट हो ही गये। उन्हें अपने दुष्कर्मों का फल बुरा ही मिला। इन उदाहरणों से हमें शिक्षा लेनी चाहिये कि सत्य को अपने आंचल में दृढ़ता से बाँधे। आरम्भ में चाहे कितनी आपदाएं झेलनी पड़ें यह हो सकता है किन्तु अन्त में "सत्यमेव जयते' अर्थात् सत्य की ही जीत होती है।
इसलिये हमें श्री गुरु महाराज जी सावधान करते हैं कि ऐसा छल-कपट भरा काम ही न करो जिससे तुम्हें पछताना और धोखा खाना पड़े। हमारा कत्र्तव्य है कि अपने परम पिता, सच्चे हितकारी परोपकारी श्री सद्गुरुदेव भगवान का वचन शिरोधार्य कर सन्मार्ग पर दृढ़चित्त होकर पग बढ़ाते चलें जिससे अन्त में सत्य में समा कर सच्चे आनन्द को प्राप्त कर लें।
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