Thursday, September 8, 2016

गुरु और शिष्य का प्यार आत्मिक है


     सद्गुरु का सेवक के साथ सच्चा आत्मिक प्यार होता है। यह एक अद्वितीय प्यार है। जिसने गुरु की आज्ञा मान कर ऐसा प्यार प्राप्त किया, वही जीव संसार में बड़भागी है।
     प्यार तो संसार में माता-पिता के साथ भी होता है और अन्य सम्बन्धियों के साथ भी यथायोग्य होता ही है, परन्तु इन सबके प्रेम-प्यार का आधार शरीर ही है। चूँकि शरीर स्वयं ही आधारहीन और नश्वर है, इस कारण ये सबके सब प्रेम-प्यार को सन्तों सत्पुरुषों और ग्रन्थकारों ने मोह के नाम से सम्बोधित किया है और ऐसे प्यार अर्थात् मोह को आत्मा के लिये बंधन का कारण भी बतलाया है।
     सन्त सत्पुरुषों का अर्थात् सद्गुरु का शिष्य एवं सेवक के साथ जो सहानुभूति व प्यार है, वह आत्मिक प्यार है; वे सेवक की भलाई चाहते हैं। इस प्यार में स्वार्थ की गन्ध भी नहीं है। सद्गुरु की जितनी भी रचना होती है, सेवक की आत्मा को शुद्ध पवित्र और निर्मल बनाने के लिये होती है। गुरु हैं धोबी के समान और शिष्य है कपड़ा। नाम के साबुन से उसे धोकर साफ सुथरा बना देते हैं। उसकी आत्मा पर पड़े हुये जन्म-जन्म के मोह माया के धब्बे मिटा कर उसे मालिक के धाम में शोभा पाने के योग्य बना देते हैं। इस संसार मे मनुष्य को जितने कष्टों का सामना करना पड़ता है, उन सबका कारण भी सुरति अथवा अन्तःकरण का मलीन होना है। अन्य शब्दों में यूँ कहा जायेगा कि यदि मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल अर्थात् पवित्र हो तो किसी प्रकार का कष्ट उसके सम्मुख नहीं आयेगा।
      सांसारिक सम्बन्धी अपना-अपना प्यार एवं सहानुभूति जतलाते हुये साफ-सुथरे और चमकीले वस्त्र तो पहनाते हैं, शारीरिक शुद्धता और पवित्रता के साधन भी उपलब्ध कर देते हैं, परन्तु शारीरिक पवित्रता और सुन्दर वस्त्रों के पहनने से दुःख और कष्टों के आधार का अन्त नहीं होता, क्योंकि आत्मा पर मोह-माया और ममता के दाग़-धब्बों की जो मैल चढ़ी हुई है जब तक वह मैल दूर न होगी,दुःखों का अन्त होना असम्भव है। सत्पुरुषों ने स्पष्ट फरमाया हैः-
                उज्जल  पहिरे  कापड़े ,  पान  सुपारी  खाहिं ।
                सो इक गुरु की भक्ति बिनु, बाँधे जमपुर जाहिं।।
     नाम की कमाई किये बिना आत्मिक पवित्रता प्राप्त नहीं होती। जब तक आत्मा पवित्र निर्मल न होगी, वह कुल मालिक से मिल नहीं सकती अर्थात् आत्मा-परमात्मा का मेल नहीं हो सकता। परमात्मा में मिलकर एक हुये बिना जीवात्मा चौरासी के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता और जीव के दुःखों की निवृत्ति नहीं हो सकती। यदि गुरु की भक्ति और नाम की कमाई करने से मन निर्मल हो जाये तो जीवात्मा को वह आनन्द प्राप्त होता है जिसका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि मालिक स्वयं उसके पीछे-पीछे फिरते हैंः-
                कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु।
                पाछे लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर।।
     कितनी ऊंची दात है सद्गुरुदेव जी की; जिनके बख़्शे हुये नाम के प्रताप से अर्थात् गुरु-शब्द के प्रताप से जब गुरुमुख सेवक का मन निर्मल हो जाता है तो स्वयं मालिक उसकी रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेते हैं। विचार करने की बात है कि जिसका रखवाला और रक्षक स्वयं कुल मालिक हो, उसको कैसा भय अथवा कैसा अभाव? वह तो महाराजा हो गया। सन्त सद्गुरु बिना स्वार्थ ऐसा उपकार करते हैं। सेवक के साथ सद्गुरु के प्यार का कितना सच्चा प्रमाण है। उसे कुछ से कुछ बना देते हैं।
                साध संगि मलु लाथी। पारब्राहृु भइओ साथी।।
सन्त सद्गुरु की नेक और पवित्र संगति की कृपा से जब मनुष्य का मन और चित्त अर्थात् अन्तःकरण निर्मल हो जाता है तब परब्राहृ परमेश्वर अर्थात् कुल मालिक उसके संगी-साथी बन जाते हैं।
     भाई गुरुदास जी श्रेष्ठ सेवकों में से थे। जब श्रीगुरुमहाराज जी ने उनकी सुरति में अर्थात् अन्तःकरण में थोड़ा सा अहंकार का धब्बा देखा तो उसके धोने का तत्काल ही प्रबन्ध किया। यद्यपि उन्हें घोड़ों की आवश्यकता थी या नहीं थी, परन्तु उनकी सुरति की पवित्रता के लिये घोड़े खरीदने की रचना रचाई। "सूरजप्रकाश' नाम के ग्रन्थ में यह पूर्ण इतिहास लिखा हुआ है। भाई गुरुदास जी की सुरति को पवित्र निर्मल करने के लिये घोड़े खरी़द करने की रचना पर लाखों रुपये व्यय कर दिये। अन्त में भाई गुरुदास जी के मन का अभिमान चकनाचूर हो गया तो उन्होंने सद्गुरु देव जी के चरणों में गिर कर क्षमा मांगी और भविष्य में दीनभाव अपनाया।
     राजा जनक ने शुकदेव जी की अज्ञानता की मैल धोने के लिये कितनी रचना की! भाँति-भांति से बाज़ारों को सजवाया। उन्हें दूध का भरा कटोरा देकर कहा कि जनकपुरी का चक्र लगाकर आओ, परन्तु खबरदार! इस कटोरे में से एक बूँद भी न गिरने पाये वरना सैनिक जो तुम्हारे साथ होंगे तुम्हारा सिर काट देंगे। पूरी की पूरी सुरति हाथ पर रखे दूध के कटोरे में जमा कर बाज़ार के बीचों-बीच चक्र लगाकर जब शुकदेव जी वापिस आये, तो जनक जी ने पूछा-शुकदेव! बाज़ार में क्या देखा? शुकदेव जी ने उत्तर दिया-भगवन्! मैने तो कुछ भी नहीं देखा, क्योंकि मेरी पूरी सुरति कटोरे में एकाग्र हो चुकी थी। तब राजा जनक ने उन्हें समझा-बुझाकर फरमाया कि जिनकी सुरति इसी प्रकार शब्द में जुड़ी रहती है, वे संसार में रहकर भी न्यारे रहते हैं। तुम भी इसी प्रकार न्यारे एवं निर्लेप रहा करो। सत्पुरुष जनक जी महाराज के सत्संग के वचनों को सुनकर शुकदेव जी का मोह-अज्ञान व संशय-भ्रम सब नष्ट हो गये। उन्होंने श्रद्धा-भावना से उनकी शरण ली और नाम दान पाकर कृतकृत्य हो गये।
     इसी प्रकार आज भी श्री आनन्दपुर दरबार में श्री परमहंसों की ओर से रचाई गई जो रचना देखने में आती है, वह सब सेवकों की मन की सफाई और उनकी सुरति को पवित्र निर्मल बनाकर शब्द से मिलाने के योग्य बनाने के लिये रची गई है। सब सेवक अपने इष्टदेव सन्तसद्गुरु की मौज से योग्य सेवा कर रहे हैं। इस प्रकार सेवा करने से सेवकों के मन की घड़त अथवा निरख परख होती रहती है। कोई प्रेस में, कोई वर्कशाप में, कोई स्कूल और कोई अस्पताल आदि में आज्ञानुसार सेवा कर रहा है। उन सबका ध्येय एक ही है कि अन्तःकरण की मैल दूर हो और सुरति पवित्र-निर्मल होकर शब्द में जुड़ जाये। उदाहरणार्थ मुझे आज्ञा हुई कि तुम लेख लिखो। मेरा क्या अस्तित्व जो मैं लेख लिख सकूँ। काम करने वाले तो वे आप हैं, परन्तु बड़ाई सेवक को देते हैं। यही तो उनके पवित्र प्यार का प्रमाण है। उनकी आज्ञा का पालन करने से हमारी आत्मिक उन्नति का साधन निकल आता है वरना हर प्रकार की वाणियां सन्तों सत्पुरुषों ने पहले ही फरमा रखी हैं और उनके शिक्षाप्रद जीवन चरित्र ग्रन्थों में अंकित हैं। सब काम उनकी कृपा-दृष्टि से हो रहे हैं। जो सेवक आज्ञा को शिरोधार्य कर लेता है तो गुप्त रुप में मालिक आप ही उसके भीतर विराजमान होकर सब कार्य स्वयं ही करते हैं। यह एक ऐसा पारमार्थिक भेद है जिसको वे कृपालु मालिक स्वयं ही जानते हैं वरना लेखनी की क्या शक्ति जो लिख सके अथवा जिह्वा की क्या सामथ्र्य कि वर्णन कर सके।
     जिन-जिन महापुरुषों ने अपने सद्गुरुदेव की सेवा-टहल और उनकी आज्ञा मानकर सब कुछ प्राप्त किया है, उन्होंने अपना अनुभव अपनी पवित्र वाणियों में भी लिख दिया है ताकि अन्य लोग भी उनके चरण-चिन्हों पर चल कर अपने जीवन को सफल बना सकें। उदाहरणार्थ श्री गुरु अमरदास जी श्री तीसरी पादशाही जी के जीवन चरित्र से आम सत्संगी भली प्रकार अभिज्ञ होंगे कि उन्होने वृद्धावस्था में भी कितनी सच्चाई और लगन से अपने गुरुदेव गुरु अंगददेव जी महाराज की सेवा की। वे अपने आचरणमय जीवन से लोगों को लाभान्वित करने के लिये अपने जीवन का अनुभव इस प्रकार वर्णन करते हैं।
      सतिगुरु सेवे ता सभ किछु पाए।। जेही मनसा करि लागै तेहा फलु पाए।।
      सतिगुरु दाता सभना वथू का पूरै भागि मिलावणिआ।।
     फरमाते हैं कि जो मनुष्य हार्दिक भावना से अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु की सेवा करता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। जिस प्रकार की भावना होगी,वैसा ही फल भी पायेगा। सद्गुरुदेव तो सब वस्तुओं अर्थात् भक्ति, मुक्ति, मानसिक शान्ति, शाश्वत आनन्द, नित्य सुख आदि के प्रदाता हैं। जो सौभाग्यवान् हैं वे ही अपने सन्त सद्गुरु से मिल कर सच्चा आनन्द प्राप्त करते हैं। अब विचार करो कि ऐसी शक्ति क्या किसी शारीरिक सम्बन्धी में भी है जो मन की आशाओं को पूरा कर सके? जबकि वे स्वयं ही असमर्थ हैं और स्वार्थीं हैं; वे दूसरों की क्योंकर सहायता कर सकते हैं? गुरुवाणी का वाक हैः-
                कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढ़ाई।
                कोई काहू को नहीं सभ देखी ठोकि बजाइ।।
श्री गुरुनानकदेव जी सांसारिक मित्रों के सम्बन्ध में फरमाते हैंः-
                कामणि लोड़ै सुइनारुपा मित्र लुड़ेनि सुखाधाता।
                नानक पाप करे तिन कारणि जासी जमपुरि बाधाता।।
संसारियों के प्रेम-प्यार का फल यही मिला कि यमलोक में बाँधा गया। यह सामथ्र्य किसी सांसारिक सम्बन्धी में नहीं है कि वह जीव को यमराज के हाथों से मुक्ति दिला सके, किन्तु सन्तों की दयादृष्टि से जीव यम की मार से बच सकता है। इसलिये कहा हैः- करि सेवा तूं साध की हो काटीऐ जम जालु।।
      यह शक्ति परमसाध और पूर्ण सन्त सद्गुरु की निष्काम सेवा में है जो यम की फांस को काटकर सेवक को मोक्ष पदवी का अधिकारी बना देती है और जन्म जन्म के दुःख और भूख को मिटा देती है; क्योंकि परिपूर्ण सन्त सद्गुरु परब्राहृ का साक्षात् स्वरुप होते हैं और वे सर्वकला समर्थ होते हैं जो चाहें सो कर सकते हैं। परन्तु सेवक अपने मालिक की मौज में सदैव प्रसन्न रहते हैंः-
                करि सेवा पारब्राहृ गुर भुख रहै न काई।।
                सगल मनोरथ पुंनिआ अमरापदु पाई।।
     संसार में प्रत्येक मनुष्य लाभ का काम करना चाहता है और किसी न किसी की सेवा भी करनी ही पड़ती है, परन्तु मनुष्य को इस बात की जांच-पड़ताल करके अनुमान लगाना चाहिये कि लाभ किस में है। सन्त सेवा में अथवा सम्बन्धियों की सेवा में? जिसमें लाभ देखे, उनकी सेवा शौक और लगन से करे, शेष सबकी सेवा कत्र्तव्य पालन का विचार रखकर बिना किसी लगाव के करे। जो मनुष्य सन्त सद्गुरु की सेवा निष्काम भाव से करता है, उसका क्या फल प्राप्त होता है? वाणी में वर्णन हैः-
                सेवा करत होइ निहकामी।। तिस कउ होत परापति सुआमी।।
     भाई लहणा जी ने श्री गुरुनानकदेव जी की ह्मदय और निष्काम भाव से सेवा की। उसका फल यह हुआ कि वे दूसरी पादशाही श्री गुरु अंगददेव जी के पवित्र नाम से प्रसिद्ध हुये। इस प्रकार के अनेेकों उदाहरण ग्रन्थों में भरे पड़े हैं कि जिन्होंने महापुरुष की पदवी पाई, उन्होने अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरुओं की सेवा से ही पाई। इधर संसारियों के प्रेम और उनकी सेवा का क्या फल मिलता है, तनिक विचार करना चाहिये। सत्पुरुषों की वाणियों द्वारा पता चलता है कि वे सब तो स्वार्थी हैं। जब उनका स्वार्थ सिद्ध नहीं होता तो साथ ही छोड़ देते हैं, जैसे फरमान हैः-
                दारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ लागे।।
                जब ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे।।
     सत्पुरुष फरमाते हैं कि स्त्री, मित्र, पुत्र और सम्बन्धी तब तक तुम्हारे साथ प्यार, एवं सहानुभूति रखते हैं जब तक तुम्हारे पास धन है अथवा तुम उनके लिये कमा सकते हो। जब धन और बल नहीं रहा तो उनके प्यार का रुख भी बदल जायेगा। इसलिये जिन सौभाग्यशाली गुरुमुख विचारवानों का सत्पुरुषों की वाणियों पर विश्वास है और उन पर आचरण करते हुये गुरु-शब्द और नाम की कमाई में लगे हुये हैं, वे संसार में रहकर भी कमल के समान निर्लेप रहते हैं और अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु के सच्चे प्यार को प्राप्त करने के अधिकारी बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें सत्संग द्वारा यह ज्ञात हो जाता है कि सन्त सद्गुरु की सेवा करने से जीव के दोनों लोक सँवर जाते हैं। गुरुवाणी का वाक हैः-
                सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूँ सुख सारु।
                ऐथै मिलनि वडिआईआ दरगह मोख दुआरु।।
      लोक और परलोक के सुखों में जो सार सुख है, वह सद्गुरु के सेवक को गुरु-सेवा के द्वारा प्राप्त होता है। श्री गुरु अर्जुनदेव जी महाराज ने दो प्रकार की सेवा का फल इस प्रकार वर्णन किया हैः-
                दूजी सेवा जीवनु बिरथा। कछु न होई है पूरन अरथा।।
                माणस सेवा खरी दुहेली। साध की सेवा सदा सुहेली।।

     अब विचार करो कि एक सेवा तो अकारथ जाये; जीवन भी नष्ट हो जाये, कोई काम भी सिद्ध न होवे और बहुत कुछ करने धरने पर भी दुःख ही पल्ले पड़े। दूसरी ओर साधु सत्पुरुषों की, की हुई सेवा भी सफल हो और मनुष्य का जन्म भी सुधर जाये; यह कितना लाभ है? सत्पुरुष फरमाते हैंः-
                जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई।
                ओह आपि तरिआ कुटंब सिउ सभु जगतु तराई।।
   सन्त सत्पुरुषों का कितना उपकार है जीव पर कि वे उसे सच्चे प्रेम के रंग में रंग कर जहाज़ के समान बना देते हैं। वह स्वयं तो सद्गुरु के आत्मिक प्यार में सराबोर होकर भवसागर से पार हो ही जाता है, साथ ही दूसरों को भी पार उतारने वाला बन जाता है। भाई मंझ का इतिहास इस बात की साक्षी देता है कि सत्पुरुषों की निष्काम् भाव से सच्चाई के साथ सेवा-भक्ति करने से भाई मंझ सद्गुरु के प्रेम-प्यार का अधिकारी बन गया, स्वयं भी तर गया और दूसरों को तारने वाला भी बना। उसके सम्बन्ध में सत्पुरुषों ने अपने पवित्र मुखारविन्द से फरमायाः-
                मंझ प्यारा गुरु दा, गुरु मंझ प्यारा।
                मंज गुरु का बोहिथा, जग लंघनहारा।।
      भाई मंझ के उपर्लिखित उदाहरण को पढ़-सुन कर आज भी कितने ही निर्बल मन वाले सेवकों का प्यार दृढ़ हो जाता है। किन्तु इसमें कोई शक नहीं कि सन्त सद्गुरु का प्यार जगत के प्यार से अनोखा और निराला हुआ करता है। भाई मंझ भक्त जब सद्गुरु के प्रेम में मतवाला हुआ तो साहूकार से निर्धन हो गया। सासंारिक दृष्टि से तो वह हानि में चला गया, परन्तु वास्तविकता कुछ और है। वह आराम को त्याग कर दिन-रात गुरु दरबार की सेवा में व्यस्त रहता। यद्यपि प्रकट में सद्गुरु -प्रेम से वंचित था परन्तु आन्तरिक रुप में उसे मालिक का सच्चा प्यार प्राप्त था, तभी तो वह दृढ़ विश्वास से पग आगे ही बढ़ाता गया; कभी मन में निर्बलता नहीं आने दी। अन्ततः परमार्थ के ध्येय में सफल होकर सद्गुरु के सच्चे प्यार का अधिकारी हुआ।
     सन्त सद्गुरुओं से निष्कामता से प्यार करने वाले गुरुमुख सेवकों को भाग्यशाली कहा गया है। हमें भी उसी प्रकार का अवसर प्राप्त है। अमली कार्यवाही करके हम भी लाभ उठा लें। केवल बातें बनाने से तो हाथ-पल्ले कुछ पड़ेगा नहीं। पहले भी जिन्होने गुरु-दरबार की सेवा की, उन्हीं को फल मिला। उनके इतिहासों का अध्ययन करने से हमें इतना लाभ अवश्य है कि उनसे शिक्षा ग्रहण कर हम भी निष्काम भाव से और पूरी लगन से सद्गुरु दरबार की सेवा करें, अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरुदेव की आज्ञा और मौज में चल कर उनका सच्चा प्रेम-प्यार प्राप्त करें, स्वयं को मालिक के सच्चे प्रेम-प्यार का पात्र बना लें और उनका सच्चा आत्मिक प्यार पाकर दोनों लोक संवार लें।
      समय के सन्त सद्गुरु की सेवा करने से मनुष्य को सम्पूर्ण सुखों का सार सुख प्राप्त होता है। उस सार सुख का प्रताप यह है कि उसे इस लोक में भी मान और सच्चा आनन्द प्राप्त होता है और आगे मालिक के धाम में भी उज्जवल मुख होकर मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है।

No comments:

Post a Comment