Friday, November 11, 2016

आत्म-समर्पण


      आत्म-समर्पण का शाब्दिक अर्थ है-अपने को अन्य को सौंप देना। सांसारिक दृष्टिकोण से जब दो विरोधी व्यक्तियों अथवा पक्षों में से कोई एक व्यक्ति अथवा पक्ष अन्य व्यक्ति अथवा पक्ष के समक्ष अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है तो यह कहा जाता है कि उसने विजयी पक्ष के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया है। ऐसे आत्म-समर्पण में एक बात ध्यान देने योग्य है कि पराजित पक्ष यद्यपि अपनी हार को दृष्टिगत रखकर और उसे अपरिहार्य समझ कर शरीर से स्वयं को विजयी पक्ष के समक्ष समर्पित कर देता है, परन्तु मन से वह कभी भी आत्म-समर्पण नहीं करता। उसका मन भीतर ही भीतर विद्रोही बना रहता है। शरीर से तो वह विवश होकर आत्म-समर्पण अवश्य करता है, परन्तु मन से वह आत्म-समर्पण कदापि नहीं करता। किन्तु भक्ति-परमार्थ के दृष्टिकोण से यदि हम इस शब्द की विवेचना करें तो हम स्थिति को पूर्णतः भिन्न पायेंगे। भक्ति-मार्ग में आत्म-समर्पण का अर्थ है अपने इष्टदेव के चरण कमलों में स्वयं को पूर्णतया समर्पित कर देना। इसमें साधक अथवा सेवक अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु के चरणों में केवल अपना तन ही समर्पित नहीं करता प्रत्युत् मन और बुद्धि भी अर्पण कर देता है। वह अपनी समस्त कामनाओं और इच्छाओं को, मन के समस्त संकल्प-विकल्पों को इष्टदेव सन्त सद्गुरु की पवित्र श्री आज्ञा मौज में लय कर देता है और यह सब वह किसी विवशता के कारण नहीं करता। प्रत्युत ऐसा करके वह अपने को परम सौभाग्यवन्त समझता है क्योंकि वह जानता है कि इष्टदेव सन्त सद्गुरु के चरण कमलों में आत्म-समर्पण करने में ही उसका हित है, इसी में उसका परम कल्याण है और इसी में उसके जीवन की सार्थकता है। आत्म-समर्पण करने को भक्ति-मार्ग में शरणागत होना भी कहते हैं। सन्त सद्गुरु के चरणों में पूर्ण आत्म-समर्पण में ही अपना परम कल्याण समझ कर साधक अपने इष्टदेव का ह्मदय से अनुगामी बन जाता है। वह उन्हीं की श्री आज्ञा मौज के सांचे में अपने जीवन को ढाल लेता है; मनमति को हस्तक्षेप नहीं करने देता। ऐसे सेवक के लिये ही कहा जाता है कि उसने पूर्ण आत्म-समर्पण किया है और ऐसी अवस्था में ही वह सच्चे अर्थों में शरणागत समझा जाता है।
     संसार में चारों ओर काल और माया की प्रबलता है। काल और माया ने सम्पूर्ण सृष्टि को अपने बलशाली पंजों में दबोच रखा है। इनका काम ही यही है कि जीव को मोह-ममता की ऋंखलाओं में जकड़ कर उसे चौरासी लाख योनियों के गहरे गर्त में ढकेलें ताकि वह अपनेअंशी मालिक से मिलाप न कर सके और सदा-सर्वदा उनकी अधीनता में ही रहे। जीव का मन भी जो जन्मों-जन्मों से काल और माया के पंजे में आया हुआ है, इन्हीं के रंग में रंग गया है। वह भी जीव का शत्रु बन कर जीव को इनके पंजे में फँसाये रखने का यत्न करता है। जैसे समुद्र में लहरें उठती ही रहती हैं, वैसे ही मनुष्य के मन में भी प्रत्येक पल संकल्प उठते ही रहते हैं। संकल्पों से मन कभी खाली नहीं रहता। ये संकल्प जीव के लिये एक प्रकार का जाल है। इन संकल्पों के माध्यम से ही काल और माया जीवात्मा को अपना शिकार बनाते हैं। ये संकल्प ही संस्कार बन कर जीव के लिये बीज का रुप धारण कर लेते हैं जो उसे नीच योनियों में भटकाते हैं। अतएव साधक के लिये परम आवश्यक है कि वह उन संकल्पों-उन कामनाओं के जाल से मुक्त हो जिनके कारण उसे बार-बार आवागमन का चक्र काटना पड़ता है। आम संसार तो काल और माया के धोखे में आकर मन को ही अपना मित्र समझ रहा है और उसके कहने पर चल कर चौरासी का चक्र क्रय कर रहा है, किन्तु साधक, जिसने भक्ति-पथ पर अपना पग बढ़ाया है और जिसे सत्पुरुषों की शुभ संगति के फलस्वरुप इस बात की समझ आ गई है, वह काल और माया के पंजे से मुक्त होने का हर सम्भव प्रयास करता है। प्रश्न यह है कि क्या साधक अपने प्रयास से और अपने बल-बूते पर ऐसे शक्तिशाली शत्रुओं पर जिनके समक्ष देवा-देवता भी पानी मांगते हैं, विजय प्राप्त कर सकता है? जीव ठहरा अपूर्ण; उसकी शक्ति सीमित है; उसका बल परिमित है। उसमें इतनी सामथ्र्य नहीं कि वह काल-माया का सामना कर सके। जीव जल की बूँद के समान शक्तिशाली है, परन्तु वही बूंद जब समुद्र में  मिलकर समुद्र रुप बन जाती है तो बड़ी-बड़ी शिलाओं से टकराने की शक्ति रखती है। इसी प्रकार साधक अथवा सेवक भी जब अपना सर्वस्व, अपना अस्तित्व परिपूर्ण सन्त सद्गुरु जो कि सर्वशक्तिमान हैं, सर्वाधार हैं, अपरिमित बल के रुाोत हैं, में लय कर देता है; अपने को पूर्णतः उन्हीं पर निर्भर और आश्रित कर देता है, तब सन्त सद्गुरु सेवक के ह्मदय में आ विराजते हैं और उसके जीवन की बागडोर संभाल लेते हैं। जिस सेवक के जीवन-रथ की बागडोर परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के हाथों में हो, जिसके सिर पर सर्वशक्तिमान सन्त सद्गुरु का वरद हस्त हो और जिसके संरक्षक वे स्वयं हो, काल और माया उस सेवक की छाया से भी दूर भागते हैं। परिणामस्वरुप ऐसा सेवक सदा-सर्वदा के लिये निर्भय हो जाता है।
     महाभारत युद्ध के पूर्व की बात है। युद्ध के लिये जब कौरव और पाण्डव अपना-अपना पक्ष सुदृढ़ करने में संलग्न थे, तो एक दिन दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही भगवान श्री कृष्ण से सहायता मांगने के लिये गये। दुर्योधन पहले पहुँचा, परन्तु जिस समय वह वहां पहुँचा उस समय भगवान श्री कृष्ण विश्राम में थे। दुर्योधन उनके सिरहाने की ओर बैठ गया और उनके जागने की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ समय पश्चात अर्जुन भी वहाँ पहुँचा और भगवान को विश्राम में देखकर उनके चरणों में बैठ गया। जब भगवान श्री कृष्ण विश्राम से उठे तो उनकी दृष्टि सीधी अर्जुन पर पड़ी। भगवान बोले-अर्जुन! तुम कब आये? अर्जुन के उत्तर देने से पूर्व ही दुर्योधन बोल उठा-अर्जुन से पहले मैं आया हूँ, इसलिये आपको मेरे पक्ष का समर्थन करना चाहिए। आप कृपया युद्ध में मेरा समर्थन करें।
      भगवान् ने फरमाया-दुर्योधन! तुम निस्सन्देह पहले आये होगे, परन्तु मैने चूंकि पहले अर्जुन को देखा है, इसलिये सहायता मांगने का पहला अधिकार उसी का है। चूंकि तुम दोनों ही मेरे द्वार पर आए हो, इसलिए मैं दोनों की सहायता करुँगा। एक ओर मैं रहूँगा, परन्तु इस शर्त के साथ कि मैं युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊँगा और दूसरी ओर मेरी चतुरंगिणी सेना होगी। चयन का पहला अधिकार अर्जुन का है, इसलिए अर्जुन इन दोनों में से जिसको चाहे चुन सकता है।
     यह सुनते ही दुर्योधन उदास हो गया। उसने सोचा कि अर्जुन तो श्री कृष्ण की चतुरंगिणी सेना का ही चयन करेगा और मेरे भाग्य में आएँगे शस्त्र-हीन श्री कृष्ण। वह भला प्रेमी भक्तों के ह्मदय की अवस्था को क्या समझ सकता था! उसे क्या पता था कि प्रेमी की दृष्टि में अपने इष्टदेव की तुलना में चौदह भुवनों का राज्य भी तुच्छ होता है और यह तो थोड़ी सी सेना ही थी।
     अर्जुन ने विनय की-प्रभो! मुझे तो केवल आपकी आवश्यकता है। आप अपनी सेना दुर्योधन को दे दें। यह सुनते ही दुर्योधन की प्रसन्नता का तो ठिकाना न रहा। उसका कार्य स्वयमेव ही सिद्ध हो गया था। उसे तो श्री कृष्ण की सेना की ही आवश्यकता था। वह अर्जुन को मूर्ख समझने लगा जिसने विशाल सेना का त्याग करके श्री कृष्ण का चयन किया था। जब दुर्योधन भगवान् श्री कृष्ण से आज्ञा लेकर चला गया तो एकान्त होते ही भगवान ने अत्यन्त प्रेम से अर्जुन से पूछा- अर्जुन! यह तुमने क्या किया? तुमने सेना छोड़कर मुझको क्यों चुना जबकि मैने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की है? अर्जुन ने विनय की-प्रभो! मुझे आपकी सेना की नहीं आपकी आवश्यकता है। मैं चाहता हूँ कि युद्ध में आप मेरे रथ के सारथि बनें; मेरे रथ की बागडोर आपके हाथों में हो।
     यदि पारमार्थिक दृष्टि से देखा जाये तो अर्जुन ने अपने रथ की बागडोर ही भगवान् के हाथ में नहीं
दी, अपितु अपने जीवन की बागडोर ही उनके हाथों में सौंप दी। उसने अन्य सभी आश्रयों का त्याग कर के केवल भगवान श्री कृष्ण की कृपा की ओर दृष्टिपात किया और इसका परिणाम भी सब को विदित ही है कि युद्ध में विजय अर्जुन की ही हुई।
     संसार में रहते हुये सेवक अथवा साधक को भी काल और माया के साथ जो युद्ध करना है उसके लिये उसे परिपूर्ण सन्त सद्गुरु की सहायता की प्रत्येक पल आवश्यकता है। काल और माया पर विजय प्राप्त करना साधक के अपने वश की बात नहीं। इसके लिये उसे भी अर्जुन की भाँति अपने जीवन की बागडोर सन्त सद्गुरु के सशक्त हाथों में सौंपनी होगी, वे चाहे जैसे जीव के जीवन-रथ को चलावें। भक्ति-परमार्थ के साधनों पर दृढ़ता से चलना, मार्ग की बाधाओं और कठिनाइयों का सामना करना तथा काल-माया की घातों से बचना सन्त सद्गुरु की संनिधि में ही सम्भव है। सन्त सद्गुरु के सारथि हुये बिना जीव के लिये इस युद्ध में विजय प्राप्त करना नितान्त असम्भव है।
     आम जीव जो मन-माया के धोखे में आया हुआ है, उसकी सम्पूर्ण कार्यवाही मनमति के अनुसार होती है। वह अपने बल, बुद्धि और चतुराई पर भरोसा करता है। वास्तव में जीव की अहंता, उसकी बुद्धि और चतुराई आदि ही उसकी अधोगति का कारण हैं। ये ही जीव को मालिक से मिलने नहीं देते। जब जीव मालिक पर निर्भर न करके, उनका आश्रय ग्रहण न करके अपनी बल-बुद्धि पर निर्भर करता है तभी वह निराश्रय हो जाता है और काल-माया उस पर हावी हो जाते हैं तथा उसे अपने बंधन में जकड़ लेते हैं जिसके परिणामस्वरुप उसे जन्मों जन्मों तक नीच योनियों में घूमते हुये नाना प्रकार के दुःख कष्ट झेलने पड़ते हैं। किन्तु यदि जीव अपनी अहंता, बुद्धि तथा चतुराई तथा अपने बल को ताक पर रखकर परिपूर्ण सन्त सद्गुरु को सर्वशक्तिमान्, परमहितैषी और परम सुह्मद समझ कर अपने अन्तःकरण और शरीर को उनके समर्पित कर देता है, अन्य सभी आश्रयों का त्याग करके केवल उनके सौहार्द की ओर दृष्टिपात करता है, तो ऐसे सेवक के सम्पूर्ण अभावों की पूर्ति स्वयमेव हो जाती है और उसके मार्ग के समस्त अवरोध दूर हो जाते हैं। ऐसा सेवक यही समझता है कि मुझ में कुछ भी शक्ति नहीं है, सन्त सद्गुरु ही मेरे ह्मदय-मन्दिर में विराजमान होकर सब प्रकार की शक्ति प्रदान करके मेरे द्वारा अपनी मौज अऩुसार समस्त कर्म करवा रहे हैं। में इन सभी का कर्ता नहीं हूँ, मैं तो केवल निमित्त मात्र हूं, करन-करावनहार तो कुल मालिक सन्त सद्गुरु स्वयं ही हैं। ऐसा सेवक ही सच्चे अर्थों में शरणागत कहलाने का अधिकारी है।
     जीवन-यात्रा में शारीरिक दुःख-सुख तो आते ही रहते हैं सच्चा, शरणागत सेवक शारीरिक दुःखों-कष्टों के आने पर पथ से विचलित नहीं होता, अपितु प्रहलाद की भाँति उन्हें इष्टदेव का प्रसाद समझकर उन्हें सहर्ष स्वीकार करता है। प्रह्लाद को उसके पिता द्वारा कितने कष्ट दिये गये, परन्तु वह अपने पथ से तनिक भी न डगमगाया क्योंकि उसे अपने इष्टदेव की शक्ति और सामथ्र्य पर तथा उनके द्वारा सहायता और रक्षा का पूर्ण विश्वास था। फलस्वरुप उसका बाल भी बांका न हुआ।
     एक बात सेवक के लिये और भी विचारणीय है कि जब सेवक ने अपना सर्वस्व सन्त सद्गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया तो फिर सेवक का तन-मन सब सद्गुरु का हो गया, सेवक का अब उनसे क्या सम्बन्ध? वे सेवक को जिस अवस्था में रखे, उसे तो प्रत्येक अवस्था में मालिक की मौज में प्रसन्न रहना चाहिये। उसके ह्मदय से तो हर समय यही शब्द निकलने चाहियें¬-
                आप की  जिसमें हो  रज़ा  वह हाल अच्छा।
                आपकी जिसमें हो खुशी वह ख़्याल अच्छा।।
     स्वयं के जीवन में यदि कभी शारिरिक दुःख-कष्ट आ भी जायें तो मालिक की रज़ा समझ कर सेवक को घबराना नहीं चाहिये। वस्तुतः इनके द्वारा सेवक के मन की स्थिरता की परीक्षा होती है कि वह भक्ति की किस मंज़िल पर पहुंचा है। दुःखों-कष्टों के आने पर सच्चे सेवक की सुरति मालिक में लीन रहने के कारण उसे ये दुःख-कष्ट भासते नहीं। सेवक जब तक स्वयं को इष्टदेव के पवित्र अस्तित्व में पूर्णतः लय नहीं कर देता, तब तक उसे काल-माया का भय बना ही रहता है। काल-माया तो हर समय सतर्क हैं और इस घात में है कि उन्हें तनिक-सा भी अवसर प्राप्त हो और वे जीव पर आक्रमण करके उसे अपने अधीन कर लें। सेवक ने मन के धोखे में आकर यदि तनिक सा भी श्री आज्ञा-मौज की सीमा-रेखा से बाहर पग रखा कि शत्रुओं ने उसे आश्रयहीन समझ कर आक्रमण किया। इसलिये जीव को चाहिये कि अपने मन, अपनी बुद्धि तथा चतुराई को पूर्णतः परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के चरणों में लय कर दे। अपने आपको उनके स्वरुप में गुम कर दे। ऐसा करने से उसकी भी वही अवस्था होगी जो बूंद की सागर में मिल कर होती है अर्थात् पूर्ण में मिलकर सेवक भी पूर्ण हो जायेगा, परिणामस्वरुप काल और माया की उसके समक्ष दाल नहीं गल पायेगी। इसीलिये सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
                तू  दरो  गुम शौ  विसाल र्इं अस्तो-बस।
                तू मबाश असला कमाल र्इं अस्तो-बस।।
     अर्थः-""ऐ जीव! तू स्वयं को मालिक के स्वरुप में गुम करदे, यही मालिक से मिलन है। तू मध्य में कदापि न रह केवल मालिक ही रह जाये, तभी तू पूर्णता को प्राप्त होगा।"" इसलिये सेवक को उचित है कि सन्त सद्गुरु के चरण कमलों में पूर्ण आत्म-समपर्ण करके केवल उन्हीं की कृपा का सहारा ले। ऐसा करने से उसके मार्ग की समस्त बाधायें दूर हो जायेंगी और वह हर प्रकार से सुखी जीवन व्यतीत करता हुआ परमशान्ति और शाश्वत आनन्द की प्राप्ति कर लेगा।
                सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।
     अर्थः-""जो मछलियां अथाह जल में हैं वे सुखी हैं जैसे श्री हरि की शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती।'' जो मछलियां समुद्र की गहराई में रहती हैं वे सुखी रहती हैं, परन्तु जो अपने को प्रकट करके समुद्र की सतह पर तैरती हैं, वे ही मछुये के जाल में फंसती हैं। इसी प्रकार जो जीव अपने भरोसे पर, अपनी बल-बुद्धि पर इतराते हैं, वे ही काल-माया के जाल में फंसते हैं। किन्तु जो मालिक की चरण-शरण में चले जाते हैं, उन्हें काल-माया का भय नहीं रहता और इनसे निर्भय होकर सुखमय और शान्तिमय जीवन व्यतीत करते हैं। सौभाग्यशाली हैं वे जीव जो इस प्रकार का जीवन व्यतीत कर रहें हैं।

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