Tuesday, November 15, 2016

ज्ञान मार्ग-भक्ति मार्ग


     एक दिन ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग पर प्रकाश डालते हुये श्री वचन हुए कि ऐसा कहा जाता है किः- ""ज्ञान का पन्थ कृपाण की धारा'' अर्थात् ज्ञान मार्ग अत्यन्त कठिन है तथा भक्ति मार्ग अथवा प्रेममार्ग अत्यन्त सरल एवं सुगम है। किन्तु सुगम हो अथवा कठिन, मनुष्य ज्ञानमार्ग में स्वयं का जीवन रखकर ज्ञान को तो साध सकता है, परन्तु भक्तिमार्ग चाहे सुगम ही सही, जो व्यक्ति स्वयं को जीवित समझता है, वह इस मार्ग में पग धरने के योग्य ही नहीं। प्रेमाभक्ति का मार्ग उसी के लिये है जो स्वयं को मृतक समझ ले और सिर को हथेली पर रख कर आवे।
भक्ति का रस्ता नहीं तलवार की ये धार है, वही  इस  पर चल  सके जो  सिर से  खेले पार है।
काम कमज़ोरों का इस रस्ता पर चलने का नहीं, कदम जो धर कर दिखावे पहलवां हुशियार है।।
प्रेमाभक्ति का मार्ग तलवार की धार पर चल कर तय करना पड़ता है। जो सिर-धड़ की बाज़ी लगाकर चले,वही इस मार्ग पर पग रख सकता है। जिनके चित्त में संसार के विचार तथा काम, क्रोध, लोभ, मोहादि भरे हुये हैं, वे दुर्बल चित्त हैं; वे इस मार्ग पर कदापि पग नहीं रख सकते। जो शारीरिक एवं ऐन्द्रिक कामनाओं का गला घोंट कर भक्ति मार्ग में पग रखता है, वही वस्तुतः शूरवीर और सचेत है। वह सासंारिकता की दृष्टि से मृत है, परन्तु आध्यात्मिक जगत् में जीवन पाता है। सांसारिकता की दृष्टि से यह निराला मार्ग है।  भगता की चाल निराली।।
                चाला निराली भगताह केरी बिखम मारगि चलणा।
                लबु लोभ अंहकारु तजि त्रिसना बहुतु नाही बोलणा।।
                खंनिअहु तिखी वालहु निकी एतु मारगि जाणा।
                गुर परसादी जिन्हीं आप तजिआ हरि वासना समाणी।।
                कहै नानकु चाल भगता जगहु जुगु निराली।। (गुरुवाणी)
     मालिक के प्रेमियों-भक्तों की चाल निराली हुआ करती है। कौन सा निरालापन हुआ करता है भक्तों की चाल में? यही कि वे अत्यन्त कठिन मार्ग पर चलते हैं। लोभ, अहंकार, तृष्णा आदि को त्याग कर वे सदैव मौन रहते हैं और तलवार की धार से तीव्र और बाल से भी सूक्ष्म भक्ति-मार्ग पर चलते हैं। गुरु-कृपा से जिन्होंने अहंता एवं अहंकार को तिलांजलि देकर सम्पूर्ण कामनाओं को समाप्त कर दिया है, ऐसे भक्तजन ही इस भक्ति मार्ग पर चल सकते हैं। श्री गुरु नानकदेव जी फरमाते हैं कि प्रत्येक युग में भक्तों की चाल आम संसारियों से निराली हुआ करती है।
     श्री महाराज जी ने फरमाया कि भक्ति-मार्ग में अहंकार को तो जड़मूल से काटना पड़ता है। भक्त को अपने प्रीतम की प्रसन्नता ही हर समय अभीष्ट होती है। यदि यह बात हो सके तो फिर उसके लिये भक्ति करना सुगम है। वह पल के पल में अपने प्रीतम की प्रसन्नता को प्राप्त कर लेता है। इस मार्ग में मुख्य साधन ध्यान है अर्थात् सेवक हर समय अपने इष्टदेव परिपूर्ण सन्त सद्गुरु का ध्यान दृढ़ करता रहे। उन की भली-बुरी अथवा सत्य-असत्य बातों की ओर तनिक ध्यान न दे। यह नहीं कि जब तक वे तुम्हारी हां में हां मिलाते रहे तब तक तो तुम प्रसन्न और यदि तनिक सी बात उन्होने तुम्हारी इच्छा के विपरीत कह दी अथवा कोई कार्य रुचि के विपरीत कर दिया तो तुरन्त गिरावट में पड़ गये। जब यह स्थिति है प्रेम कैसा? तुम तो उन्हें अपना मालिक और परमेश्वर समझ कर उनका ध्यान करते हो और उनसे प्रेम करते हो, फिर ऐसी बातों का उनके मार्ग में आना कब उचित है?
     ऊपर वर्णन हुआ है कि भक्ति मार्ग में मृतक होना अथवा सिर हथेली पर रखना होता है। इसका अर्थ यह है कि अपने इष्टदेव के ध्यान में इस प्रकार लीन होना पड़ता है कि अपने शरीर तक की सुधि न रहे; अपने में अहंता आदि की गन्ध भी न रहे।
                तू दरौ-गुम शौ विसाल र्इं अस्तोबस। तू मबाश असला कमाल र्इं अस्तोबस।।
     ऐ जिज्ञासु! तू अपने मालिक के ध्यान में पूर्णतः लीन हो जा, क्योंकि इसी का नाम ही योग है। और तू स्वयं को मिटा दे, भक्ति-मार्ग में बस यही पूर्णता है। भक्ति की महिमा का वर्णन करते हुये भगवान श्री राम लक्ष्मण जी से कथन करते हैंः-
                सो सुतंत्र अवलंब न आना ।  तेहि  आधीन ग्यान बिग्याना।।
                भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलई जो संत होर्इंँ अनुकूला।।
     अर्थः-भक्ति स्वतंत्र है, उसको किसी अन्य साधन के सहारे की अपेक्षा नहीं। ज्ञान-विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम तथा सुख की मूल है, परन्तु तभी प्राप्त होती है जब सन्त महापुरुष जीव पर दयाल हो जायें।
     एक दिन गुरु भक्ति के भेद तथा साधन आदि को समझाने के लिये श्री वचन हुये कि प्रेमाभक्ति में तीन वस्तुओं की आवश्यकता होती है-प्रेमी, प्रेम और प्रीतम अर्थात् इष्टदेव कुल मालिक, मालिक के दर्शन एवं योग के मार्ग में जो आवरण हैं उन्हें दूर करने के लिये साधन बतलाते हुये फरमायाः-     उदाहरण को समझने के लिये सूर्य को मालिक की भांति समझो। कुल मालिक भी सृष्टि की उत्पत्ति और उसका प्रलय ऐसे ही करता है जैसे सूर्य जल को सुखाता भी है और बरसाता भी है। सूर्य मंडल की दृष्टि से सूर्य एकदेशीय भी है और प्रकाश एवं ऊष्णता के विचार से सर्वदेशीय भी। इसी प्रकार मालिक भी एक देशीय एवं सर्वदेशीय है।
     सूर्य को देखने के मार्ग में दो प्रकार का अवरोध अथवा आवरण होता है। एक तो बादल का तथा अन्य अपने दृष्टिदोष का जैसे आँख में मोतियाबिंद,जाला अथवा फूला आदि। बादल का आवरण तो वायु से हटता है अर्थात् यदि वायु वेग से चले तो बादल हट जाये और सूर्य दृष्टिगोचर होने लगे। इसी प्रकार घट में अपने मालिक के दर्शन के मार्ग में जो मल-विक्षेप के आवरण पड़े हैं वह सहज प्राणायाम और अजपाजाप के अभ्यास से हट सकते हैं। किन्तु आँख में जो देखने का दोष है अर्थात् जो मोतियाबिंद आदि का आवरण पड़ा हुआ है, वह योग्य चिकित्सक के उपचार से दूर होता है और सूर्य दिखलाई देने लगता है। इसी प्रकार घट में भी जो अज्ञान-आवरण पड़ा हुआ है, वह परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के ज्ञान की युक्ति से उठता है। अर्थात् जब शिष्य दृढ़ विश्वास से सत्पुरुषों के उपदेश को श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है तो उसके घट में प्रेमाभक्ति की ज्योति जगमाग उठती है। तब आत्मा रुपी सूर्य प्रत्यक्ष दिखाई देने लगता है। किन्तु जैसे बादल और दृष्टिदोष-इन दोनों के विद्यमान होते हुये भी सूर्य की गर्मी एवं ताप से उसका होना सिद्ध होता है अर्थात् उसके अस्तित्व से कोई इनकार नहीं कर सकता,उसी प्रकार मल-विक्षेप आवरण के होते हुये भी जब मनुष्य मृत्यु एवं जीवन की समस्याओं से दो-चार होता है और अनेक कार्यों मे विवशता एवं अधीनता की अनुभूति करता है, तब उसे मालिक के अस्तित्व एवं उसकी विद्यमानता का अनुभव होता है और निस्सन्देह उसके अस्तित्व एवं उसकी शक्ति को मानना पड़ता है। किन्तु इस प्रकार मान लेने पर भी गुरु की सहायता के बिना मनुष्य कुछ लाभ नहीं उठा सकता। जैसे उपवन में पुष्प खिले हुये हैं, परन्तु उनकी सुगन्धि तो भली प्रकार से तभी आयेगी जब कोई व्यक्ति पुष्प को तोड़कर और नासिका से लगाकर उसके सूँघने की युक्ति बता दे; अथवा कहीं एक शीशी में इत्र रखा हुआ है, परन्तु जब
तक कोई व्यक्ति उस इत्र में से रुई के फूहे को भिगो कर शरीर और वस्त्रों में लगाने की युक्ति न समझा दे, तब तक उसकी सुगन्धि से पूर्णरुपेण लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार कुल मालिक की विद्यमानता भी परिपूर्ण सन्त सद्गुरु की सहायता के बिना लाभदायक नहीं हो सकती।
      जैसे बादल के दूर होने के लिये अनुकूल वायु की प्रतीक्षा करनी पड़ती है और आँख के ठीक होने के लिये डाक्टर का उपकार मानना पड़ता है और उसके कहे अनुसार चलना पड़ता है, उसी प्रकार भजन-भक्ति के मार्ग में भी परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के पवित्र अस्तित्व से प्रेम करना पड़ता है, उनका भी उपकार मानना पड़ता है और उनकी पवित्र मौज अनुसार चलना पड़ता है। हठधर्मी से यदि कोई मनुष्य गुरु, महात्मा और मालिक के अस्तित्व को न माने तो दूसरी बात है, किन्तु उसे भी दुःख-कष्ट आदि अनेक कार्यों में जब विवशता एवं असमर्थता की अनुभूति होती है, तब वह अनुभूति उससे भी मालिक, सद्गुरु और महात्माओं के अस्तित्व और उनके आशीर्वाद तथा उनकी सहायता की आवश्यकता को मनवा कर छोड़ती है और उसे भी स्वीकार करना पड़ता है कि वस्तुतः सत्पुरुषों के आशीर्वाद और उनकी सहायता की जीव को प्रत्येक समय और प्रत्येक स्थान पर अर्थात् लोक-परलोक में आवश्यकता होती है।
    एक दिवस श्री परमहँस दयाल जी की सेवा में बाई योगानन्द जी ने करबद्ध विनय की कि श्री महाराज जी! मीरां बाई जी और व्रज की गोपियों में से कौन उत्तम है? मेरे विचार में तो मीरांबाई जी का पद उच्च है क्योंकि उन्होंने तो भगवान् श्री कृष्ण को देखा भी नहीं और अदृश्य प्रेम में ही इस पद को पहुँच गर्इं। और गोपियों को प्रेम हो जाना तो कोई विशेष बात नहीं क्योंकि उन्होने तो भगवान श्री कृष्ण की शोभा एवं लीलाओं को अपने नेत्रों से देखा था। श्री महाराज जी ने फरमायाः-यह बात नहीं है। पद तो गोपियों का ही बड़ा है। गोपियाँ भगवान श्री कृष्ण के साथ आम लोगों के समान मिलजुल कर रहती थीं, उनके प्रत्येक व्यवहार को प्रसन्नतापूर्वक सहन करती थीं और उनकी कठोर से कठोर बात पर भी क्रोधित तथा रुष्ट नहीं होती थीं। भगवान श्री कृष्ण यद्यपि आम मनुष्यों की भांति उनके मध्य रहते-सहते और खाते-पीते थे, परन्तु फिर भी वे उनको महा- योगेश्वर और सोलह कला सम्पूर्ण अवतार समझ कर उनसे प्रेम करती थीं।
     किन्तु मीरांबाई जी के साथ ऐसा कहां हुआ? मूर्तिपूजन को तो इसीलिये प्रारम्भ किया गया क्योंकि लोग चेतन की पूजा करने की सामथ्र्य एवं योग्यता नहीं रखते। मन ने चाहा तो मूर्ति पर दो सेर दूध चढ़ा दिया, नहीं चाहा तो नहीं चढ़ाया; वह न कुछ बोलती है न चालती है। उसका ध्यान सुगम है, परन्तु चेतन की भक्ति तथा उसका ध्यान करना अत्यन्त कठिन है।
                निर्गुन रुप  सुलभ अति ,  सगुन जान  नहिं कोइ।
                सुगम अगम नाना चरित, सुनिमुनि मन भ्रम होइ।।
     अर्थः-निर्गुण रुप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझ में आ जाने वाला) है, परन्तु (गुणातीत दिव्य) सगुणरुप को कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान के अनेक प्रकार के सुगम तथा अगम चरित्रों को सुन कर ऋषियों-मुनियों का मन भी भ्रमित हो जाता है। चेतनरुप की भक्ति को इसलिये कठिन कहा गया है कि वे आम मनुष्यों की भाँति लोगों के मध्य रहते और खाते-पीते हैं, बीमार भी होते हैं और कभी-कभी दुःखी भी दिखलाई देते हैं। उनकी कुल चेष्टा और कार्यवाही आम मनुष्यों की सी होती है। उनको अवसर देखकर कठोर बात भी कहनी पड़ती है। यह सब देखकर उनके कुछ सेवक उनसे रुष्ट भी हो जाते हैं और उनकी प्रत्येक बात को सहन करना असम्भव हो जाता है, इसलिये उन पर निश्चय होना कठिन है। किन्तु गोपियां हर समय भगवान् के ध्यान में इस प्रकार तन्मय रहती थीं जैसे सत्पुरुषों ने वर्णन किया हैः-    सत समरथ तें राखि मन, करिये जगत को काम।
            जगजीवन यह मंत्र है ,  सदा सुक्ख बिसराम ।।
वे संसार के कार्य-व्यवहार करती हुई भी ह्मदय में भगवान् के पवित्र नाम को सदैव जपती रहती थीं। और यही दशा सच्चे जिज्ञासुओं की भी होती है। यद्यपि वे प्रकट में संसार के कार्य-व्यवहार में उलझे रहते हैं, परन्तु उनकी आन्तरिक लगन हर समय मालिक के नाम-सुमिरण में रहती है। उनकी प्रशंसा में वर्णन हैः-
हैं  कान लग े मुर्शिदे-कामिल की  तरफ , नूरे-उरफां  है मोजज़न  दिल  की  तरफ।
हंगामा-ए-हस्ती में है सालिक की नज़र, और अहकामे-तरीक़त के मसाइल की तरफ।।
गो  मजमा-ए-हस्ती  में घिरा  रहता है ,  मगर मुर्शिद  के इशारों पे फ़िदा रहता है।।
दुनियां  के  तरानों  से  जिसे  साज़  नहीं , उस  हर्फ से  कान  आशना रहता है।।
अर्थः-सच्चे भक्त के कान हर समय परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के वचन सुनने की प्रतीक्षा में रहते हैं और उसके ह्मदय में ब्राहृज्ञान का प्रकाश झलकता रहता है। यद्यपि वह बाह्रदृष्टि से संसार के बखेड़ों में फँसा हुआ है, परन्तु साथ-साथ वह भक्ति के नियमों पर भी दृढ़ रहता है। देखने में वह निस्सन्देह सांसारिक कार्य-व्यवहार में गहरा फँसा हुआ है, किन्तु गुरु का तनिक सा संकेत पाते ही उन पर प्राण न्यौछावर करने को तत्पर रहता है। संसार के राग-रंग से उसे कुछ भी लगाव नहीं होता। उसके कानों में तो वही शब्द (जो उसे गुरु ने पढ़ाया है) हर समय गूंजता रहता है। उसे मालिक और मृत्यु सदैव स्मरण रहते हैं, इसलिये वह संसार में रहता हुआ भी अलिप्त एवं न्यारा रहता है। इसलिये हमारे विचार में तो सगुण साकार की पूजा करने वाले भक्त का पद ही उच्च है।

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