Sunday, November 20, 2016

सेवा की कसौटी


     गुरुभक्ति या सद्गुरु सेवा का मार्ग आध्यात्मिक प्रगति का पथ है। यह जीव को उसके शिखर तक पहुंचाने का एक मात्र उपकरण है। जीव का यथार्थ उद्देश्य विश्वपति सन्त सद्गुरु के स्वरुप में लीन हो जाना है। इस ध्येय की पूर्त्ति के लिये जीव को अपनी पूर्व मलिनता की दशा को छोड़कर नवीन निर्मल दशा में आना होता है। दूसरे शब्दों में जीव की काया पलट होती है। जीव की पूर्वावस्था अज्ञानमयी दशा है। इस रुप में जीव अपने स्वरुप से भूला हुआ है। अब क्योंकि वह अपनी वास्तविक दशा में लौटना चाहता है इसलिये उसे अपनी वर्तमान दुर्दशा से किनारा करना होगा। यही जीव का काया-कल्प है। इसी को ही आत्मिक उन्नति कहते हैं। जीव प्रकृति से ही आत्मिक उत्कर्ष का अभिलाषी है और उसके लिये उचित साधन सन्त सद्गुरु की सेवा-भक्ति और प्रेम है। सन्त सद्गुरु की सेवा ही जीव की मलिनता को साफ करने की एक उत्तम कसौटी है। जैसे कि सन्तों का वचन हैः-
                सतगुरु की सेवा गाखड़ी सिरु दीजे आपु गवाइ।
                सबदि मरहि फिरि ना मरहि, ता सेवा पवै सभ थाइ।।
                पारस परसिऐ पारसु होवै, सचि रहे लिव लाइ।
                जिसु पूरबि होवै लिखिआ, तिसु सतिगुरु मिलै प्रभु आइ।।
                नानक गणतै सेवकु ना मिलै जिसु बखसे सो पवै थाइ।।
                                      गुरुवाणी सोरठ महला-3 पृ. 649
""सन्त सतगुरु की सेवा एक कसौटी है। इस कसौटी पर खरा उतरने के लिये सन्त सद्गुरु की सेवा में अपने आप को मिटा देना चाहिये। जो जीव सद्गुरु के शब्द में मिट जाते हैं वे फिर जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते और उनकी की हुई सेवा सफल हो जाती है। जिस तरह लोहा पारसमणि के साथ छू जाने से सोना बन जाता है। जीव भी इसी तरह सत्य स्वरुप पारस रुप सन्त सद्गुरु से प्रेम के तार जोड़ लेने पर स्वयं भी उनकी भाँति पारस ही हो जाता है। जिन जीवों के विगत जन्मों के शुभ संस्कार अति प्रबल होते हैं उन्हीं को ही सन्त सद्गुरुदेव जी से भेंट होती है। विशेष बात यह है कि सेवक अपने गुणों के बलबूते पर मालिक के रुप में कभी लीन नहीं हो सकता अपितु जिन जीवों पर सन्त सद्गुरु की विशेष दया और
कृपा होती है उन्हीं की कमाई फलवती सिद्ध होती है। वे ही जीव निजधाम में पहुँच सकते हैं।''
     यह है सन्त सद्गुरु की सेवा का चमत्कार। इसे हर एक जीव नहीं समझ सकता। सन्त महापुरुषों ने स्पष्ट रुप में सब कुछ रख दिया है कि सद्गुरु की सेवा की कसौटी पर चढ़े बिना जीव परमपद की प्राप्ति नहीं कर सकता क्योंकि जब तक वह इस कसौटी पर पूरा नहीं उतरता वह दया और कृपा का पात्र नहीं बन सकता। पात्र बने बिना कोई वस्तु किसी को नहीं दी जाती। जीव को सन्त सद्गुरु की दया व कृपा को पाने के लिये अर्हता प्राप्त करनी है। वह दया या कृपा कोई अलग वस्तु नहीं वह यही सन्त सद्गुरु की निष्काम सेवा ही है। जीवों को अपनी सेवा में लगाना ही उनकी सबसे बड़ी कृपा और अनुकम्पा है। जिस सेवक पर यह कृपा उतरती है उसका कल्याण होने में कोई सन्देह नहीं।
     संसार में यह प्रचलन है कि किसी वस्तु को जो विकृत अवस्था में है सुधारना हो तो उसे किसी उपकरण के द्वारा निर्मल किया जाता है। उदाहरणतः किसी धातु को विमल करना हो तो उसे कसौटी पर चढ़ाया जाता है। इसी तरह जीव को भी मोह ममता आदि दोषों से छुड़ाने के लिये सद्गुरु की निष्काम सेवा ही एक मात्र प्रतीकार है। किसी वस्तु को जब पहले से अधिक सुन्दर रुप में देखना है तो वहां किसी न किसी उपकरण की आवश्यकता होगी ही।
                ता हम चू कलम सिर न नही दर तह कारद।
                हरगिज़  बसरे  अंगुश्त  निगारे  न  रसी।।
                ता शाना सिफत सिर न नही, दर तह आरा।
                हरगिज़ बसरे ज़ुलफ, निगारे न रती।। (शेख सादी साहिब)
""जब तक तू कलम की न्यार्इं अपना सिर छुरी के नीचे नहीं रखेगा हरगिज़ अपने प्रियतम की अंगुली तक न पहुँच पायेगा और जब तक कंघी की न्यार्इं अपना सिर आरी के नीचे नहीं देगा और अंग अंग को चिरा नहीं देगा इष्टदेव के केशों तक कदापि नहीं  पहुंच पायेगा।''अतएव यदि आत्मिक उनन्ति की उच्चकोटि पर पहुँचना है तो सन्त सद्गुरु की सेवा रुपी कसौटी को स्वीकार करना ही होगा। सन्तों के वचन हैंः-
                सेवक  सेवा  में  रहै ,  अनत  कहूँ  नहि  जाय।
                दुःख सुख सब सिर पर सहै,कहैं कबीर समझाय।।
                सेवक  फल  मांगे  नहीं ,  सेव करै दिन रात।
                कहैं कबीर ता दास पर , काल करै नहीं घात।।
निष्कर्ण यह कि जो जीव सच्चे मन से परमार्थ और ब्राहृविद्या के अभिलाषी हों और जिन्हें मोह ममता के बन्धनों से विमुक्त होना है उनका धर्म है कि वे प्राणपण से सन्त सद्गुरु की सेवा, उनकी भक्ति और उनके पवित्र प्रेम में अपने मन को लगायें। सद्गुरु की मौज को और उनके सब प्रकार के व्यवहार को ह्मदय से स्वीकार करें और अपना कल्याण कर लेवें।
     श्री दरबार की सेवा करते हुए अपने दिल में किसी प्रकार की इच्छा मत रखो। अपने आप को सयाना मत समझो अपितु सदा अपने आपको अयाना समझो। जब कभी कृपा करके श्री सद्गुरुदेव जी कुछ समझावें या ताड़ना करें तो हमें उनकी बातें प्रिय लगनी चाहियें।
                जे गुरु झिड़के ता मीठा लागै।।
यह तो श्री सद्गुरुदेव जी की अपार कृपा समझो जो वे तुम्हें अपना जानकर तुम्हारे दोष दूर कर देते हैं। दरबार से तुम्हें चाहे अधिक प्राप्त हो या कम जो कुछ भी प्राप्त हो उसी में प्रसन्न रहो। यह प्रण कर लो कि शरीर चाहे छूट जाये परन्तु भक्ति-प्रेम के नाते को मैं नहीं तोड़ूंगा। श्री सद्गुरुदेव जी जैसे भी रखें, उसी अवस्था में प्रसन्न रहकर सदैव उनका गुणगान करता रहूंगा और उनके दासों का दास बनकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करने का ही प्रयत्न करता रहूँगा। तुम सदैव यही प्रार्थना करते रहना कि हे श्री सद्गुरुदेव! मेरी करनी की ओर न देखते हुये अपने श्री चरण कमलों में ठौर दीजिये।
     जिनको भक्ति रुपी अमोलक रत्न की पहचान होगी वही इसकी प्राप्ति के लिये त्यागऔर प्रयत्न करते हैं। श्री दरबार में सबसे छोटा बनकर रहना और सबकी भली-बुरी बातों को सहन करना-इसके लिये महान त्याग की आवश्यकता होती है। ऐसा त्याग कर सकना प्रत्येक मनुष्य का काम नहीं। विचारवानों का कथन है कि मानुष तन पाकर भी जिसने भक्ति न की समझो उसने अपना हीरे जैसा मानुष तन व्यर्थ गंवा दिया क्योंकि आत्मिक शान्ति देने वाला और लोक तथा परलोक में सहायक भक्ति के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। जब भक्ति इतनी मूल्यवान वस्तु है तो वह चाहे किसी मूल्य पर भी मिले, सस्ती समझनी चाहिये। संसार के धक्के खाने से तो गुरु घर के धक्के खाकर भी गुरु घर में पड़े रहने में ही हमारा कल्याण और हमारी बुद्धिमत्ता है।
     हनुमान जी भगवान श्री राम जी के अति प्रिय थे। एक बार उनकी अनुपस्थिति में अऩ्य सेवकों ने राय करके सब सेवायें आपस में बाँट लीं और हनुमान जी के लौटने पर कहने लगे कि खबरदार! आप किसी सेवा को हाथ मत लगाना। यह स्थिति देखकर हनुमान जी ने न तो अपना दिल ही खट्टा किया और न उनसे किसी प्रकार का झगड़ा ही किया। उन्होने तुरन्त अपने लिये एक छोटी सी सेवा ढूँढ ली। आप दिन भर भगवान के श्री चरणों में बैठकर उनका मुख निहारते रहे। जब कभी भगवान उबासी (जम्भाई) लेते तो आप चुटकी बजा देते। भगवान श्री राम चूंकि हनुमान जी से सदैव प्रसन्न रहते थे अतः उन्होने ऊपर से तो सेवकों से कुछ न कहा, परन्तु भीतर ही भीतर ऐसी लीला रचाई कि हनुमान जी की अनुपस्थिति में लगातार ऐसी उबासियां लीं कि मुख बन्द ही न होने पाये। अब तो सब सेवक बहुत घबराये और हनुमान जी के पास दौड़े गये। जिन्होने हनुमान जी की अपेक्षा करनी चाही थी, वही उनके आगे हाथ जोड़कर मिन्नतें करने लगे। हनुमान जी आये तो उबासियां बन्द हुर्इं और भक्त की जय जयकार हुई। हनुमान जी ने भी भगवान श्री राम जी की सेवा करके सच्चे सुख को पाया।
     श्री गुरु अर्जुनदेव जी को जब श्री गुरु रामदास जी ने लाहौर भेज दिया तो पृथी चन्द जो आपके ज्येष्ठ भ्राता थे और आपसे ईष्र्या करते थे को अवसर मिल गया। उसने यह प्रचार करना आरम्भ कर दिया कि मैं ही श्री सद्गुरुदेव जी का कृपा-पात्र हूँ। अर्जुनदेव जी तो उनके दिल से उतरे हुए हैं। ऐसा करके उसने कई लोगों को अपने पक्ष में कर लिया। कुछ लोगों ने जब श्री गुरु अर्जुनदेव जी से सब हाल जाकर बताया कि पृथीचन्द कहता है कि गुरु के दास तो हम हैं, तब आपने उत्तर दिया कि हम तो उसके दासों के भी दास बनकर भक्ति कर लेंगे और उसी में सच्चा सुख समझेंगे। आपने यह शब्द पढ़कर सुनायाः-          जन की कीनी आपि सहाइ, सुखु पाइआ लगि दासह पाइ।
                आपु गइआ ता आपहि भए, कृपा निधान की सरनी पए।।
अन्त में उन्हीं लोगों ने कहा कि वास्तव में जो नीचा होना जानता है अर्थात् जिसमें अहंकार का लेशमात्र नहीं होता, वही एक दिन ऊँचा बनता है। सच्चाई से गुरु-शरण लेने मे ही सच्चा लाभ है।
     जिन दिनों गुरु रामदास जी जो गुरु दरबार की सेवा करते थे उन्हीं दिनों की बात है कि एक बार उनके गांव के कुछ लोग वहां आये और आपके सामने ही आपस में बातें करने लगे कि देखो, अब कैसे साध बन बैठे हैं। कुछ दिन पहले तक जब ये व्यवहार में फँसे थे तो न जाने कितने झूठ बोलते थे। उनकी बातें सुन कर आपने ये शब्द पढ़े।
                हम  अपराध  पाप बहु  कीने करि  दुसटी  चोर चुराइआ।
                अब नानक सरणागति आए, हरि राखहु लाज हरि भाइआ।। गुरुवाणी गौड़ी म.-4
भाइयो! आपकी सब बातें सत्य हैं। यह सब महिमा मेरे श्री गुरु महाराज जी की है जिन्होने दया करके मुझ जैसे अपराधी को भी अपनी चरण-शरण में रखकरअपनी अपार कृपा से सच्चा साध बनाया है। लोहे का कोई मूल्य नहीं होता, परन्तु पारस से छूकर वह मूल्यवान बन जाता है, वह स्वर्ण बन जाता है। फिर उसे कोई लोहा नहीं कहता। हम भी जब से श्री गुरु महाराज जी की शरण में आये हैं, तब से उन्होने अपने नाम को देखकर हमारी लाज रख ली है। यह सुनकर वे लोग बहुत लज्जित हुए और चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। जितने भी महापुरुष कमाई वाले हुए हैं, उन्होने कभी भी अपनी महिमा नहीं की। उन्होने सदैव अपने श्री सद्गुरुदेव जी की महिमा का ही गान किया। श्री गुरु अर्जुनदेव जी के वचन हैंः-
                कहु नानक हम नीच करना, सरणी परे की राखहु सरमा।।
एक और स्थान पर वे फरमाते हैंः-
                मूरख  मुगध  अनाथ  चंचल  बलहीन  नीच अजाणा।
                बिनवन्ति नानक सरणि तेरी रखि लेहु आवण जाणा।।
भक्ति की अमूल्य दात को पाने के लिये उन्होने कितनी नम्रता धारण की। इसी कसौटी से हम अपनी निरख-परख करें कि हमारे भीतर कितनी नम्रता और सहनशीलता है। जितने अधिक ये गुण हमारे भीतर होंगे, उतनी ही अधिक हमें शान्ति प्राप्त होगी। चाहे हम केवल पांच दिनों से सेवा कर रहे हों अथवा पचास बरसों से। संसार की दृष्टि में हम चाहे मामूली सेवक हों या बड़े से बड़े। प्रकृति हर एक को अपनी अपनी भावना का फल देती है। इसलिये श्री गुरु महाराज जी हमें आज्ञा देते हैं कि जिन कर्मों के करने से गुरुमुख की भक्ति बढ़ती हो, दृढ़ विश्वास से वही कर्म करके पूर्बले मलीन संस्कारों के फल को दग्ध करना है। ऐसा करने से निश्चित रुप से तुम भक्ति के अनमोल धन को प्राप्त करोगे।

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