Tuesday, November 1, 2016

जिह्वा पर नियंत्रण


     सत्पुरुषों का वचन हैः-दीपक झोला पवन का, नर का झोला नार।
                         साध झोला वचन का, बोले नहीं विचार।।
     जलते हुये दीपक को वायु का झोंका बुझा देता है और उसके प्रकाश को अंधकार में बदल देता है। जिस व्यक्ति की चित्तवृत्ति स्त्रियों की ओर लग जाती है, वह नाम-सुमिरण के मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता। इस पर सन्तवाणी में फरमान है-जहां काम तहां नाम नहीं। काम और नाम का आपस में  मेल ही नहीं है।इसी प्रकार उस साधु की भी सम्पूर्ण साधनायें व्यर्थ चली जाती हैं जो कि बिना विचारे अर्थात् बिना तोले बोल देता है। और यह भी निश्चित है कि जो लोग बहुत बोलने के आदी होते हैं उनसे प्रायः भूल-चूक भी हो जाती है। कई बार शीघ्रता में गलत और अनुचित शब्द भी मुख से निकल जाते हैं। जिनको चुप रहने की आदत है, वे प्रायः ऐसी भूल चूक और गलत शब्द कहने से बचे रहते हैं। भाव यह कि बहुत बोलने वाले के लिये गलती से बचना इतना सुगम नहीं जितना कि चुप रहने वाले के लिये सुगम है।
     इसलिये जिसको विचार हो कि मैं जहां तक सम्भव गलती से बचता रहूं और आत्मिक मार्ग में मैं दिन प्रतिदिन अग्रसर होता जाऊं उसे चाहिये कि अपनी चित्तवृत्ति को अन्दर की ओर प्रवृत करे और प्रत्येक बात को तोल कर मुख से निकाले ताकि सुनने वालों का दिल न दुखे। सन्तों के इस उपदेश को सदैव स्मरण रखोः-
                ज़ुबां  बेमहल  खोलना  ऐब है ,  अज़ीज़ो  बहुत  बोलना  ऐब है।।
                ज़ुबां अपनी हद में है बेशक ज़ुबां, बढ़े एक नुक़्ता तो है यह ज़िआं।।
     प्रियवर! बिना अवसर बोलना बहुत बड़ा अवगुण है। हर समय बोलते रहना भी एक प्रकार का अवगुण है। कम बोलने वाली जिह्वा ही वास्तव में जिह्वा है। एक बिन्दु बढ़ जाने से ज़बां (जिह्वा) शब्द ज़िआं बन जाता है। जिसका अर्थ हानि है। ज़बां और ज़िआं के शब्द लिखने में उर्दू में केवल एक ही बिन्दु का अन्तर है। इसलिये मनुष्य को बोलचाल में संयम बर्तना चाहिये।
   कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि जो काम एक शब्द से हो सके उसको व्यर्थ ही लम्बा करके उसकी व्याख्या दस शब्दों में करेंगे। उसके विपरीत बुद्धिमान व्यक्ति दस शब्दों वाली बात का आशय एक ही शब्द में प्रकट कर देता है। मितभाषी एवं गम्भीर व्यक्ति के एक ही शब्द में इतनी शक्ति और प्रभाव होता है जितना अधिक बोलने वाले के दस शब्दों में भी नहीं होता। किन्तु मितभाषी भी तो वही बन सकता है और खामोशी से प्यार भी वही रख सकता है जिसके घट में सद्गुरु के शब्द की लगन होती है। जिसकी सुरति सद्गुरु के शब्द में जुड़ी रहकर आत्म-आनन्द को प्राप्त करती रही है, ऐसा व्यक्ति आवश्यकता के बिना कदापि नहीं बोलता। वह सत्पुरुषों के इस वचन का पाबंद रहता हैः-
                ज्ञान रतन की कोठरी, चुप करि दीजै ताल।
                पारख आगे खोलिये, कुंजी बचन रसाल।।
     परमसन्त श्री कबीर साहिब फरमाते हैं कि ऐ जीव! तेरे अन्दर ज्ञान के रत्नों से भरी हुई कोठरी विद्यमान है। उस पर मौनता का ताला लगा दे। जब कोई पारखू मिले तब मधुर शब्दों की चाबी लगा कर खोलना। जो लोग स्थान-स्थान पर बिना आवश्यकता के अपारखुओं के समक्ष वचनों के हीरे-रतन बिखेरते रहते हैं, वह अपनी अनमोल पूंजी व्यर्थ में नष्ट करते रहते हैं क्योंकि वस्तु की कद्र तो पारखुओं के पास ही हुआ करती है। इसलिये सत्पुरुषों का फरमान उचित है कि अपनी जिह्वा पर मौनता का ताला लगा दो। जब कोई पारखू और श्रद्धावान मिले तब उस ताले में मधुर वचनों की कुँजी डाल कर खोलो।
अर्थात् मौनता को जब भी तोड़ो तो मधुर वचन बोलो। कटु वचन बोलने की अपेक्षा चुप रहना लाख गुणा श्रेष्ठ और लाभदायक है। किसी ने सच कहा है कि ""जब मिलेगा पारखू, लेगा महंगे मोल।''
     अफलातून जैसा चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति मौनव्रत तोड़ने के कारण ही तो मारा गया। यदि वह यमदूतों के चापलूसी भरे शब्द ""कि अफलातून! तूने कमाल कर दिया, परन्तु एक दोष तो रह गया।'' को सुनकरअपनी मौनता भंग न करता और ""कौनसा'' का शब्द जिह्वा से न निकालता तो शायद यमदूतों के पंजे से बच जाता। इस प्रमाण से सिद्ध होता है कि पहले बात को तोलो फिर मुंह से बोलो। बिना विचारे बोलने से चुप रहना लाभदायक है। एक फकीर का कथन हैः-सुख़न गुफ़्ता सीम अस्त नागुफ़्ता ज़र।।
     अभिप्राय यह कि जो बात मुख से निकल गई उसका मूल्य चांदी पड़ा। यदि मुख के अन्दर ही रह जाती तो वह सोना होती। किन्तु इसका अर्थ कोई यह न समझे कि संसार में गूंगा बनकर रहना चाहिये, अपितु सत्पुरुषों का उपदेश यह है कि मनुष्य मध्यम मार्ग अपनाये। उनका कथन हैः-
                अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
                अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
     जैसे वर्षा ऋतु में वर्षा कदापि न हो तो भी फसल न होगी और यदि सीमा से अधिक वर्षा हो जाये तो भी फसल सड़ जायेगी, वैसे ही समयानुसार उचित शब्द न बोलना और बिना आवश्यकता के व्यर्थ ही अधिक बोलते रहना अत्यन्त हानिकारक है। आवश्यकतानुसार थोड़े शब्द बोलने से दूसरे का भला हो जाता है। बिना आवश्यकता के बोलने से झगड़ा-फसाद भी हो सकता है।
                बोलत बोलत बढहि विकारा। बिनु बोले किआ करहि बीचारा।।
अर्थः-परमसन्त श्री कबीर साहिब गुरुवाणी में वर्णन करते हैं कि अधिक बोलने से कई बार विवाद बढ़ जाता है, परन्तु बोले बिना भी तो वास्तविकता का विचार नहीं मिलता। उत्तम यह है कि सत्पुरुषों, विचारवानों की संगति में रहकर बोलने का ढंग सीखना चाहिये। विचार के तराजू में वाणी को तोल कर बोलने वाला लोक-परलोक में सुखी रहता है। सत्पुरुषों के वचन इस प्रकार प्रकाश देते हैंः-
                बानी तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल।
                हीरा तो दामों मिलै, शब्द का तोल न मोल।।
     प्रकृति की ओर से मनुष्य को जो बोलने का अधिकार मिला हुआ है, यह एक दुर्लभ और मूल्यवान् रत्न है, यदि कोई सौभाग्यशाली सत्पुरुषों की संगति में जाकर उसके प्रयोग का ढंग सीख ले अर्थात् बोलने की युक्ति जिसे आ जाये तो वह व्यक्ति बहुत अधिक मालदार हो सकता है, क्योंकि हीरे-जवाहर तो दाम से मिल जाते हैं, परन्तु सत्पुरुषों का शब्द किसी भी मूल्य से नहीं मिल सकता। यह जब भी मिलेगा, उनकी कृपा से मिलेगा। हीरे का मूल्य लगाया जा सकता है, परन्तु शब्द के मूल्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसलिये सत्पुरुष उपदेश करते हैं किः-हिये तराजू तोल के, तब मुख बाहर खोल।। अर्थात् जब भी बोले, पहले मन में अच्छी प्रकार सोच समझ लो कि बोलने में क्या लाभऔर क्या हानि है? इस प्रकार जो लाभ-हानि का अनुमान लगाकर और भलीभांति सोच-विचार कर बोलता है,तो वह सौभाग्यशाली सदैव सम्मान और सुख से जीवन व्यतीत करता है। जो बिना तोल के जैसा आया बोल दिया, उनका जीवन सदैव फ़साद और अशान्ति का शिकार बना रहता है।
     एक भिखारी था जो भीख मांग कर गुज़ारा करता था चूँकि वह गुरु-शब्द से खाली था, अतएव उसका मन सदा चंचल बना रहता था। इस कारण जिह्वा पर भी उसे नियंत्रण नहीं था। एक दिन भीख मांगने गया तो उसे भीख में चावल और मूँग की दाल मिली। ले गया एक बुढ़िया के पास। उसे कहा कि मुझे इस चावल दाल की खिचड़ी पका दो। बुढ़िया ने आग जलाई और चावल-दाल को देगची मे डाल कर चूल्हे पर पकने को धर दिये। जितनी देर तक खिचड़ी बने, उतनी देर तक भी उस भिखारी से चुप न बैठा गया। मन और जिह्वा पर नियंत्रण तो था नहीं, सोचने लगा कि यह वृद्धा अकेली रहती है इसकी गुज़र कैसे होती होगी? अऩ्ततः बुढ़िया से पूछ ही लिया कि तुम्हारी गुज़र-बसर कैसे होती है? बुढ़िया ने कहा कि मेरे पास एक भैंस है, उसका दूध बेचकर अपना पेट पालती हूँ। भिखारी बोला-तुम्हारे घर का द्वार तंग दिखाई देता है,कहीं तुम्हारी भैंस इसमें फँस कर मर गई तो तुम क्या करोगी?
     बुढ़िया को यह बात अच्छी न लगी, बोली-ऐसे अशुभ वचन मत बोलो, वरना अधपके चावल दाल लेकर अपना रास्ता नापो। भिखारी ने अऩुनय-विनय की और चुप बैठने का वचन दिया। किन्तु उसका चंचल मन बिना शब्द के ताले के चुप न रह सका। कठिनता से एक मिनट बीता तो फिर पूछा कि तुम अकेली हो अथवा तुम्हारी कोई सन्तान भी है? माई बोली- मेरा एक लड़का है मोटर ड्राइवरी का काम सीख रहा है। भिखारी बोला-मोटर दुर्घटना हो जाय और तुम्हारा लड़का मर जाये तो क्या करोगी? माई से उसकी बात सहन न हो सकी। अधपकी खिचड़ी की देगची उतार कर बोली-यह लो अपनी खिचड़ी और तत्काल नौ दो ग्यारह हो जाओ। उसके पास बर्तन तो था ही नहीं, चादर की झोली में खिचड़ी डलवाई और अपने भाग्य को कोसता हुआ वहां से चल दिया। मार्ग में चावलों की मांड बहती जा रही थी। किसी ने पूछा कि यह क्या बह रहा है? भिखारी बोला-यह मेरे मुख से निकले हुये कटु वचनों का परिणाम है, जो मेरी झोली में पड़ा हुआ है, वही बह रहा है। गुरुवाणी में वचन है किः-सहु वे जीआ अपणा कीआ। ऐ जीव! अपनी करनी का फल भोग। और यह वास्तविकता है कि सब लोगों को अपने किये हुए कर्मों का अर्थात् मन, वचन और कर्म का फल भोगना पड़ता है; प्रत्येक को अपनी जिह्वा का फल चखना पड़ता है। प्रकृति किसी के साथ पक्षपात नहीं करती।
                कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहि सो तस फल चाखा।।
     मालिक ने जगत में कर्म को ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल पाता है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं कि जो लोग कटु वचन बोलने के आदी हैं, वे मानो जिह्वा पर तलवार बाँध रखते हैं और दूसरों का दिल दुखाकर उनकी आत्मा को हानि पहुँचाते हैं। इसलिये सत्पुुरुषों इन वचनों में हमें चेतावनी देकर सावधान किया है कि सदैव मधुर वाणी से भक्ति भरी वार्तालाप करो। इस प्रकार के वार्तालाप का फल सदैव शुभ और सुखदायक होता है। वह तुम्हें भी सुखी करेगा। सद्गुरु सच्चे पादशाह जैसा जीव का हितकारी अन्य कोई नहीं हो सकता। यदि हम उनके मार्गदर्शन में चलकर और उनके फरमान को शिरोधार्य कर अपने पुराने स्वभाव को बदल देंगे, तो कौड़ी से हीरा बन जायेंगे।
     देखो!द्रोपदी ने दुर्योधन को बिना तोले दो-चार शब्द ही तो कहे थे-अंधे का अन्धा बेटा, परन्तु इन शब्दों का कितना भयानक परिणाम निकला? इतनी महान् लाभ-हानि है जिह्वा पर नियंत्रण रखने और न रखने में। इस भारी लाभ-हानि को दृष्टि में रखते हुये श्री सद्गुरुदेव भगवान हमें सदैव संयम में रहने और अपनी जिह्वा पर नियन्त्रण रखने का उपदेश फरमाया करते हैं।
     और यह भी ध्यान रखो कि मुख से दो प्रकार के कार्य हुआ करते हैं अथवा जिह्वा दो प्रकार के काम करती है-एक बोलना और दूसरा खाना। जो लोग भोजन भी आवश्यकतानुसार करते हैं, वे लोग स्वास्थ्य जैसी अमूल्य नेमत के अधिकारी बनते हैं। इसके विपरीत जो लोग स्वादिष्ट पदार्थों के लोभ में आकर आवश्यकता से अधिक खा जाते हैं, वे बदहज़मी का शिकार होकर स्वास्थ्य जैसी अमूल्य वस्तु से हाथ धो बैठते हैं।   मिठा करिकै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु।।

     एक सेठ का लड़का खाने-पीने का बहुत शौकीन था। बहुत खाने के कारण उसकी तोंद फूल गई और बदहज़मी के रोग में ग्रस्त होकर शय्या पर पड़ गया। डॉक्टर ने उसके लिये यह उपचार बतलाया कि उसे तीन दिन तक उपवास कराओ; केवल नींबू का रस पानी में डाल कर देते रहो। इस उपचार से उसके स्वास्थ्य की आशा हो सकती है,अन्य कोई साधन नहीं। दो दिन तक उसने डॉक्टर के परामर्श पर आचरण किया और सिवा पानी और नींबू के रस के और कुछ न खाया-पिया। इस उपचार से उसकी शारीरिक अवस्था में काफी परिवर्तन हो गया और वह अच्छी तरह चलने-फिरने योग्य हो गया। किन्तु तीसरे दिन उससे न रहा गया। अपनी मां से केक-पेस्ट्री खाने को मांग ली और मां ने भी बच्चे की ममता में फँस कर उसे दे दी, परिणामस्वरुप रोग ज़ोर पकड़ गया। डॉक्टर को बुलाया गया। उसने आते ही पहला प्रश्न यही किया कि क्या इसको कुछ खिलाया गया? उन्होने साफ साफ बतला दिया कि केक-पेस्ट्री खिलाई है। डॉक्टर ने टंडी सांस भरकर कहा कि खेद! अब इसका रोग ला-इलाज हो गया। अब इसके उपचार में काफी दिन लगेंगे और यह सदैव का रोगी बना रहेगा। यदि जिह्वा पर नियन्त्रण रखता और एक दिन और उपवास रख लेता, तो स्वास्थ्य जैसे अमूल्य पदार्थ का मज़ा लूटता और सारी आयु उचित रुप से खाता पीता रहता और आनन्ददायक जीवन व्यतीत कर सकता। इतना भेद है जिह्वा को नियंत्रण में रखने और न रखने में! और इस भेद को सन्त सत्पुरुष ही सही रुप में जानते हैं। इसी कारण वे जीव को सदैव संयम में रहने का उपदेश फरमाया करते हैं ताकि जीव दुःखरहित जीवन व्यतीत कर सके।
                युक्ताहारविहारस्य   युक्तचेष्टस्य   कर्मसु ।
                युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। 6/17
     अर्थः-""दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।'' किन्तु यह अवस्था-इस प्रकार का रहन-सहन सत्पुरुषों के बतलाये हुये शब्द की कमाई और उनके वचनानुसार आचरण करने से ही प्राप्त होती है। जो भाग्यशाली गुरुमुख गुरु-शब्द अर्थात् नाम का रसपान करते हैं, वे सांसारिक रसों में नहीं उलझते। सांसारिक रस उनकी दृष्टि में फीके पड़ जाते हैं और उन्हें संसार के दुःख-सुख व्याकुल नहीं कर सकते। वे संसार के उतार-चढ़ाव को प्रसन्नतापूर्वक सहन करते हैं। मालिक का हाथ सदैव उनकी सहायता करता है।
     एक महात्मा ध्यानमग्न अवस्था में बैठे थे। एकाएक उनके मुख से एक आह निकल गई। एक गुरुमुख शिष्य ने कारण पूछा तो उन्होने बतलाया कि थोड़ी दूरी पर एक साधु भजन कर रहा था। कुछ शरारती लोग उसे व्यर्थ ही परेशान कर रहे थे। अब तक वह चुप रहकर उनकी सब बातों को सहन करता रहा। उसकी सहायता के लिये आकाश से एक तलवार उतर रही थी, परन्तु उसने अपनी मौनता भंग कर दी और अपशब्दों का प्रयोग करने लगा। इसी कारण वह दैवी सहायता से वंचित हो गया। यह देखकर हमें अत्यन्त खेद हुआ। यदि वह मौन न तोड़ता, तो दैवी हाथ, जो उसकी सहायता को आ रहा था, उससे वंचित न रहता।
      ऊपर के लेख से प्रकट होता है कि जो लोग जिह्वा को नियंत्रण में रखते हैं, वे मालिक के कृपामात्र बन जाते हैं। उनकी सहायता मालिक स्वयं करते हैं। हमारा भी कत्र्तव्य है कि गुरुमहाराज जी के वचनों का परिपालन करके मालिक की कृपा के अधिकारी बनें और उनके शुभ आशीर्वाद को प्राप्त करके अपना लोक और परलोक सफल बनायें और इस वचन को सदैव स्मरण रखें कि कम खाने और कम बोलने अर्थात् मीठा बोलने और नम्रता से पेश आने वाला मनुष्य सदा सुखी और शान्त रहता है।

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