कंचन तजना सहज है, सहज त्रिया का नेह।
मान बड़ाई ईष्र्या दुरलभ तजनी येह।।
अर्थः-फरमाते हैं कि सोने, चांदी और स्त्री के प्रेम का त्याग करना सुगम है। इनका त्याग करना इतना कठिन नहीं, जितना कि मान,बड़ाई और ईष्र्या का त्याग करना कठिन है। सोने, चांदी तथा स्त्री का त्यागना अर्थात् धन-सम्पत्ति एवं ऐन्द्रिक सुख भोगों के लोभ का त्यागना सरल नहीं। बहुत कम लोग ही इनका त्याग कर पाते हैं, परन्तु ऐसे त्यागियों की अपेक्षा ऐसे व्यक्ति और भी कम मिलते हैं जिन्होने मान,बड़ाई और ईष्र्या का त्याग किया हो। मान, बड़ाई और ईष्र्या भयानक अवगुण है जो मनुष्य को न केवल बड़ों की कृपा से वंचित रखता है, अपितु असभ्य भी बना देता है। ईष्र्या-द्वेष के रोग में ग्रस्त होकर ही एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करता है, क्योंकि दूसरे देश की प्रगति उससे सहने नहीं होती; परिणामस्वरुप लाखों व्यक्ति युद्ध में मारे जाते हैं। यह तो हुई संसारी लोगों की बात। किन्तु सन्तों सत्पुरुषों के संसर्ग में रहने वाले जिज्ञासुओं में भी किसी किसी के अन्दर यह अवगुण पाया जाता है। ईष्र्या-द्वेष के कारण वे लोग भी सत्पुरुषों की संगति और भक्ति का पूरा-पूरा लाभ उठाने में वंचित रह जाते हैं।
इतिहास साक्षी है कि श्री गुरु अंगददेव जी महाराज जब श्री गुरुनानकदेव जी के उत्तराधिकारी नियुक्त हुये तो लाखों व्यक्तियों ने उनकी सेवा और सम्मान करके पारमार्थिक लाभ प्राप्त किया, परन्तु कुछ व्यक्ति ऐसे भी थे जो आपसे ईष्र्या-द्वेष रखने के कारण पारमार्थिक लाभ से वंचित रह गये। यह प्राकृतिक नियम है कि जिस मन में ईष्र्या-द्वेष का निवास होगा, वहां श्रद्धा विश्वास नहीं रह सकते और जहां श्रद्धा विश्वास न हो, वहां सुख का निवास नहीं होता।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।। 4/40
अर्थः-विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है। श्रद्धाहीन की बुद्धि संशयात्मक होने के कारण चंचल हो जाती है। वह न तो इस लोक में शान्ति से रहता है और न परलोक में ही उसे सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है। सत्पुरुषों का फरमान हैः-
जब धारै कोऊ बैरी मीतु। तब लगु निहचलु नाही चितु।।
गुरु की शरण में जाने का लाभ तो उस गुरुमुख ने ही प्राप्त किया, जिसने गुरु-शब्द की कमाई करके अपने मन को चंचल से निश्चल बना लिया। शास्त्र का वाक हैः-
चंचलं चित्तं भवेत् जीवः। स्थिरं चित्तं भवेत् शिवः।।
अर्थः-जिसका मन चंचल है, वह साधारण जीव है और जिसका मन स्थिर हो गया है, वह शिव स्वरुप है। ऐसा परिवर्तन लाने के लिये ही मनुष्य सन्त सत्पुरुषों की शरण-संगति में जाता है। सत्पुरुषों की शरण-संगति में रहकर भी जिसके मन में मित्र-शत्रु का विचार विद्यमान रहा, उसने मानो अपना समय व्यर्थ किया। उसने अपने मन पर सत्संग और नाम का रंग चढ़ने ही नहीं दिया, वरना सत्संग और शब्दाभ्यास के प्रताप से उसका मन अवश्यमेव निश्चल हो जाता, उसके अन्दर से मित्र-शत्रु की भावना नष्ट हो जाती और उसे सबमें अपने मालिक का स्वरुप दिखाई देता।
इतनी महान हानि से बचाने के लिये ही श्री गुरुमहाराज जी ने अपने वचन का प्रकाश देकर हम सब पर अत्यन्त कृपा की है। यदि हमने श्री वचन "किसी से ईष्र्या-द्वेष न करना' का सहारा लेकर अर्थात्
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उस पर आचरण करके मन को निर्मल बना लिया, तो बुरी बलाओं से बच जायेंगे और हमारा गुरु-शरण में आना भी सार्थक हो जायेगा तथा जीवन भी सुखमय बन जायेगा। इसके विपरीत यदि हमने मनमति पर चल कर उस सुखदायी और कल्याणकारी वचन की अवज्ञा की, तो हमारा अमूल्य जीवन और अमूल्य समय जो अत्यन्त सौभाग्य से प्राप्त हुआ है, व्यर्थ हो जायेगा। यदि हमने सद्गुरु-शरण में आकर सत्संग के प्रताप से मायिक विचारों का त्याग किया है, संसार और सांसारिक पदार्थों से कुछ किनारा किया है, परन्तु इस त्याग करने का अहंकार हमारे मन में विद्यमान है, तो फिर हमने सत्संगति से कोई लाभ न उठाया, प्रत्युत उलटा घाटे में चले गये। सत्पुरुषों की वाणी हमें सावधान करती हैः-
माया तजी तो क्या भया, मान तजा नहिं जाय।
मान बड़े मुनिवर गले, मान सबन को खाय।।
संसार की अवस्था को ध्यानपूर्वक देखने पर ज्ञात होगा कि उच्च पद पर पहुँचे हुए व्यक्ति भी ईष्र्या-द्वेष के कारण आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। ईष्र्या-द्वेष का रोग बड़े-बड़े शूरवीरों को सद्गुरु के शब्द और नाम से भुलाकर चिंताओं के चक्र में डाल देता है और मालिक की महिमा गायन करने की अपेक्षा दूसरों की निन्दा करने का अवगुण उनके मन में भर देता है। ऐसा मनुष्य सही मार्ग से भटक कर कुमार्ग पर चल पड़ता है। ऐसे व्यक्तियों के विषय में ही सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिसदा कदे न होवी भला।।
ओसदे आखिऐ कोई न लगै नित ओजाड़ी पूकारे खला।।
जिसु अंदरि चुगली चुगलो वजै कीता करतिआ ओसदा सभु गइआ।।(गुरुवाणी,गउड़ी का वार म.-4)
कितनी हानि हो गई उस एक दोष के कारण! उसका जीवन भक्तिधन से हीन हो गया और उसकी परिश्रम से की हुई भक्ति की कमाई सब व्यर्थ चली गई। विचार करो कि यदि हम इस अवगुण(ईष्र्या-द्वेष) को मन से निकाल दें और भजन-भक्ति के काम में संलग्न रहें तो हमारा कितना लाभ है कि भक्ति भी प्राप्त हो जाये और जीवन भी सफल हो जाये। इस महान् लाभ-हानि को दृष्टि में रखकर विचारवान् जिज्ञासु को इस बात पर बार बार विचार करना चाहिये और मन में दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिये कि आज से न तो किसी की निंदा-चुगली करेंगे तथा न ही किसी से ईष्र्या-द्वेष करेंगे और इन बुराइयों की गंदगी अपने अन्दर कदापि एकत्र नहीं होने देंगे।
इतिहास साक्षी है कि जब भक्त नरसी जी केदार राग में भगवान् की महिमा का गायन करते थे, तो भगवान के गले की माला नरसी जी के गले में आ पड़ती थी। भक्त जी का ऐसा पवित्र प्रेम देखकर सहरुाों व्यक्ति उनके अनुयायी बन गये और उनकी महिमा का बखान करने लगे। भक्त नरसी जी का ऐसा सम्मान देखकर ईष्र्यालु दुष्टों से सहन न हो सका, जैसे फरमान हैः-
निंदक दुसट वडिआई वेखि न सकनि ओन्हा पराइआ भला न सुखाई।।
किआ होवै किस ही की झख मारी जा सचे सिउ बणि आई ।। (बिलावल की वार म.-4)
उन निंदकों ने राजा के पास जाकर उनकी चुगली की कि यह सब आडम्बर है। राजा ने भक्त नरसी जी को बुलवाया और उनसे भजन गाने की प्रार्थना की। भजन गाने पर भगवान के गले की माला नरसी जी के गले में आ पड़ी। राजा ने जब इस सच्चाई को अपनी आंखों से देख लिया, तो निंदकों को राजा के सम्मुख बहुत लज्जित होना पड़ा। सच्चाई देखकर राजा भी भक्त जी का शिष्य हो गया और इस प्रकार उनकी महिमा पहले से भी अधिक हो गई। इसी पर सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
तिन्ह की बखीली कोई किआ करे जिनका अंगु करे मेरा हरि करतारा।। गुरुवाणी, सूही म.-4
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जिन्हा अंतरि गुरमुखि प्रीति है तिन्ह हरि रखणहारा राम राजे।।
तिन्ह की निंदा कोई किआ करे जिन्ह हरि नामु पिआरा।।
जिन्ह हरि सेती मनु मानिआ सभ दुसट झख मारा।।
जन नानक नामु धिआइआ हरि रखणहारा।। (गुरुवाणी, आसा म.-4)
जिनके अन्दर ईष्र्या-द्वेष का निवास हो जाता है, उन लोगों की समझ और सब कार्यवाही उलटी हुआ करती है, इसी कारण उनको अपने कर्मों का फल भी उलटा ही मिलता है। ईष्र्या-द्वेष का अंधकार जब आँखों पर छा जाता है, तो सत्पुरुषों के ज्ञान का प्रकाश और उनके गुणों का चमत्कार जीव को दिखाई नहीं देता। पाण्डवों की सच्चाई तथा भगवान कृष्ण का तेज और उनकी महिमा-क्या दुर्योधन को अच्छे लगते थे? कदापि नहीं।
मतवादी जानै नहीं , ततवादी की बात।
सूरज उगा उल्लुओं, गिनी अंधियारी रात।।
दूसरों की उन्नति देखकर ईष्र्या-द्वेष की अग्नि में जलना महान दोष है। जो व्यक्ति इस दोष से बच जाता है, वही परमार्थ में सिद्धि प्राप्त कर सकता है। सत्पुरुष सदैव यही उपदेश करते हैं कि तुम किसी का बुरा न सोचो। जो तुम्हारे लिये बुरा सोचेगा वह अपना ही बुरा करेगा, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। प्रकृति की ओर से प्रत्येक मनुष्य को अपनी करनी का फल अवश्यमेव मिलता है। अतएव हमारा कत्र्तव्य है कि दूसरों को उन्नति करते देख कर प्रसन्न हों और जहां तक हो सके बुरों के साथ भी भलाई करें। यही सच्चे सेवकों के लक्षण होते हैं। यदि हमारे अन्दर सच्चे सेवकों जैसे गुण होंगे तो सन्त सद्गुरु की हम पर सदैव कृपा रहेगी जिससे हमारा जीवन संवर जायेगा।
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