Saturday, March 26, 2016

अमर जीवन

अमर जीवन
वास्तव में यदि देखा जाये तो वही सुन्दर संयोग, वही स्वर्णिम अवसर आप लोगों को मिला हुआ है। सत्पुरुषों की शरण संगति में आकर झूठे ख्यालात, नश्वर पदार्थों का मोह, अज्ञान व भ्रम इन्सान के दिल से दूर हो जाता है। मालिक का सच्चा नाम और भक्ति अन्तर में वास करती है; क्योंकि यहाँ चर्चा ही सच्चे नाम की होती है। चारों ओर वातावरण ही उसी प्रकार का बना होता है।
इन्सान के अन्दर सच्चा नाम बस जाय और मिथ्या ख्याल दूर हो जायें------इसीलिए ही सत्पुरुषों ने श्री आनन्दपुर दरबार की रचना की है और ऐसे साधन बना दिये हैं जिनको अपनाकर मार्ग से भटकाने वाले मोह ममता के झूठे ख्याल हट जायें। मालिक के ध्यान की ओर लगें। सत् वस्तु मालिक की भक्ति और नाम में जुड़ जायें। महापुरुषों ने ऐसे साधन बना दिए। सच्चे दरबार की सेवा और सत्संग का अवसर उन लोगों को मिलता है जिनके पूर्बले संस्कार और नेक कमाई हो।
संसार में इन्सान किसलिए आया? इससे आम दुनिया गुमराह है। वे यह नहीं समझते कि शरीर किसी विशेष प्रयोजन के लिए मिला हुआ है। देखा-देखी चलते जा रहे हैं। हर समय दुनिया की संगत, माया के ख्याल, धन-पदार्थ इकट्ठा कर लूँ, कुटुम्ब-परिवार बढ़ा लूँ, मान मर्तबा मिल जाय------इसी में गलतान रहते हैं। शारीरिक सुखों की प्राप्ति को ही अपना समझ रखा है, इसके अतिरिक्त विदित ही नहीं कि मानुष जीवन किस विशेष लक्ष्य--पूर्ति हेतु मिला है।
क्या जन्म-जन्मांतरों तक चौरासी लाख योनि में रूह कष्ट उठाती रहे-----यही लक्ष्य था। पुरातन मायावी ख्याल जो जन्मों से दबे हुए थे, उनसे छुटकारा पाने के लिए मानुष-देही मिली थी। इस जन्म में सत्पुरुषों की संगति में आकर वह आत्मज्ञान प्राप्त करे जिससे मुक्ति मिले, जन्म-मरण के चक्र से आज़ाद हो जाये। आज़ादी किस से प्राप्त हो सकती है? इसके दिल में जन्म-जन्मों के विषय-विकारों के ख्याल भरे हुए हैं, उनसे छुटकारा मिल जाए------इसका नाम आज़ाद होना है; इसी का नाम मुक्ति है। जब इन्सान के दिल से विषय विकार निकल जाते हैं तो मालिक का सच्चा नाम बस जाता है। जबतक आन्तरिक मलीनता दूर नहीं होती, पवित्रता नहीं आती तब तक मालिक का सच्चा नाम व भक्ति स्थान नहीं पा सकती। पवित्रता कब आती है, जब सत्पुरुषों की संगति प्राप्त होती है।
हजारों, लाखों, करोड़ों लोग सत्पुरुषों के संयोग से वंचित विषय विकारों में जीवन व्यर्थ गंवा रहे हैं। विरले भाग्यशाली गुरुमुखजन जिनके पूर्बले संस्कार होते हैं उन्हें सत्पुरुषों की संगति प्राप्त होती है। ऐसा अवसर व संयोग जिसको मिल जाता है, वे लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस लाभ का अनुमान नहीं लगाया जा सकता तथा मूल्य व कीमत नहीं आंकी जा सकती। मानव-जन्म को पाकर भगवान की भक्ति करके मालिक से जा मिले, कितना लाभ है। दूसरी ओर मालिक की भक्ति से विहीन होकर नीच योनि प्राप्त कर ले------यह कितना नुकसान है। इस हानि लाभ का पता कब चलता है, जब इन्सान सत्पुरुषों की संगति में आता है। एक ओर तो कितना लाभ है और दूसरी ओर कितना नुकसान। जब यह समझ आ जाती है तो फिर नुकसान की ओर नहीं जाता। नुकसान में दुःख और लाभ में सुख और अमर पदवी मिलती है, यह भक्ति का लाभ है।
विचार करना है कि मानुष-जन्म कितना कीमती है। जब इन्सान इसके बदले में कीमती वस्तु खरीदे तो उसकी कीमत पड़ जायेगी और वह सुखी हो जायेगा। यदि न·ार और अस्थायी वस्तुयें खरीदेगा तो दुःख मिलेगा। महापुरुषों का कथन है------
।। दोहा ।।
सब कोई वणजे खार खल, हीरा कोई न लेय ।
हीरा  लेवे  जौहरी, जो  मांगै  सो  देय ।।
सारा संसार खार खल अर्थात् तुच्छ पदार्थों का खरीददार है। जिस मनुष्य ने मानव-तन के बदले तुच्छ पदार्थ विषय-विकारों को खरीदकर यूँ ही गँवा दिया तो क्या लाभ हुआ? हीरा रूपी भक्ति कोई विरले ही खरीदते हैं जिन्हें इसकी समझ आ जाती है। वे अनमोल भक्ति रूपी हीरे के बदले नश्वर पदार्थ तो क्या, शरीर न्यौछावर करने से नहीं घबराते। क्योंकि शरीर तो नश्वर है, नश्वर चीज़ के बदले सच्ची चीज़ प्राप्त कर ली।
जैसे पहले कहा गया है------"हीरा परखे जौहरी, जो मांगे सो देय'------जिसको यह समझ आ जाती है वह हर प्रकार से कुर्बानी करता है। सच्चे हीरे को प्राप्त करके अमर जीवन और अमर पदवी को प्राप्त कर लेता है। मालिक से एकाकार हो जाता है, सही अर्थों में जो मनुष्य का लक्ष्य है। दुनिया में धन कमा लिया, पदवी प्राप्त कर ली, कलाप्रवीण बन गया, यह किसी काम नहीं आता। जाते समय सब कुछ यहीं छोड़ जाता है उलटा अपने लिए चौरासी खरीद कर लेता है। अच्छा तो यह है कि इन्सान सुजाग हो जाए, उसे यह विदित हो जाए कि मेरी भलाई का काम कौनसा है, शान्ति का मार्ग क्या है। सत्पुरुषों की संगति में आकर झूठे ख्यालों को दिल से निकाल दे, सच्ची वस्तु को दिल में स्थान दे, सत् की कमाई ही सच्ची पूँजी है, यही साथ जायेगी; दूसरी कमाई साथ नहीं जायेगी। दुनिया के सब सामान यहीं रह जायेंगे।
साथ  जायेगा  तेरे  बस  प्रभु  का  नाम  ही।
जिस  दुनिया  को  तू  समझा  है  अपना,
 दर   हकीकत   है   नफ़ी ।।
मालिक की भक्ति और सच्चे नाम की कमाई सत्पुरुषों की संगति से प्राप्त होती है। कोई चाहे कि मालिक के नाम को और दुनिया के सामान------दोनों को इकट्ठा कर लूँ-----यह दोनों चीज़ें इकट्ठी नहीं रह सकतीं।
।। दोहा ।।
जहां काम तहँ नाम नहिं, जहां नाम नहिं काम ।
कहैं कबीर दोऊ न मिलैं, रवि रजनी इक ठाम ।।
                परमसन्त श्री कबीर साहब जी
जिसके दिल में मालिक का सच्चा नाम व भक्ति वास करती है वहां दुनियावी इच्छायें नहीं ठहर सकतीं। जहां झूठी इच्छायें होंगी वहां नाम नहीं रह सकता। एक दिल में एक ही चीज़ बस सकती है। रात-दिन एक समय में इकट्ठे नहीं रह सकते। महापुरुषों ने यह एक प्रमाण दिया है। इसीतरह दोनों चीज़ें एक दिल में इकट्ठी नहीं टिक सकतीं। जहां नाम होगा, वहां झूठी इच्छायें नहीं होंगी।
यह इच्छायें ही दुःख का कारण हैं। नरक में ले जाती   हैं। सच्ची खाहिश मालिक से मिलाती है व सुखदायी होती है। महापुरुषों ने जो रास्ता बतलाया है वह सच्ची शान्ति का है। वे मार्ग बतलाते भी हैं और आचरण भी कराते हैं।
महापुरुषों ने जो नियम बनाये हैं, सच्ची मुक्ति दिलाने वाले हैं। मालिक से मिलाने वाले हैं। भजन-अभ्यास, सेवा-सत्संग, दर्शन-ध्यान------ये सब नियम इन्सान के अन्दर सच को बसानेवाले और झूठ को निकालनेवाले हैं। मानुष-जन्म का क्या लाभ है, उसको अपने सम्मुख रखे और महापुरुषों के आदेशानुसार साधन अपनाए व मानुष-जन्म को सफल बना ले। लक्ष्य को पूरा करके अपना नाम अमर कर ले, अमर पदवी को पा ले। यही जीवन का लक्ष्य है, इसीलिए ही इन्सान संसार में आया है। इसी को ही पूर्ण करना है, इसी में ही इसकी भलाई निहित है।

Thursday, March 24, 2016

अमर जीवन

विक्रमी संवत् के दिन नव वर्ष का नया दिन मनाया जाता है। हज़ारों वर्ष गुज़र गये राजा विक्रमादित्य को गये हुए, परन्तु उसके नाम से हर वर्ष सम्वत् मनाया जाता है। किसलिए और किस कारण सम्वत् मनाया जाता है? इस अवधि के मध्य हज़ारों लाखों इन्सान इस दुनिया में आये और चले गये। उस समय में बड़े-बड़े राजा, अमीर, धनाढ¬, निर्धन सभी हुए परन्तु प्रत्येक को स्मरण नहीं किया जाता। याद किसकी होती है? जो अपना नाम अमर कर जाता है। अमर पदवी किससे मिलती है? अमर वस्तु को दिल में बसाने से। अमर वस्तु से नेह लगाने से ही अमर पदवी मिलती है। तभी वह अमर जीवन कहलाता है। आरिफ़ों का क़ौल है----
।। शेअर ।।
बस नाम वर बज़ेरे ज़मीं दफ़न करदा अन्द ।
कज़ हस्ती अश बरूये ज़मीं यक निशां नमाँद ।।
ज़िन्दां अस्त नामे फरोख नौशेरवाँ बा अदल ।
अगरचे  बसे  गुज़श्त  नौशेरवाँ  ना  माँद ।।
बड़े-बड़े राजा महाराजा गुज़र गये, उनका दुनिया में कोई नामोनिशान भी नहीं है। परन्तु हज़ारों वर्ष गुज़र गये, एक नौशेरवां बादशाह का नाम ज़िन्दा है, विक्रमादित्य का नाम अमर है, किस कारण से दोनों का नाम अमर है? उन्होंने परोपकार के अनेकानेक कार्य किये, भक्ति की कमाई की, सच्चे नाम को दिल में बसाया जोकि नित्य, सत् और अमर है। इन्सान जिसका ध्यान करता है, जिसे दिल में स्थान देता है वही रूप बन जाता है, उसे वही पदवी मिल जाती है।
इन्सान क्यों जन्म-मरण के चक्कर में पड़ता है? क्यों चौरासी लाख योनियां भोगता है? वह न·ार चीज़ों को दिल में बसाता है, उसमें मन लगाता है। क्योंकि वे स्वयं न·ार एवं क्षणभंगुर हैं, इसीलिए उनका भी नाश हो जाता है और इन्सान का भी नामो-निशान मिट जाता है, इसीलिए ही जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। सौभाग्य एवं पुण्य संस्कारों से यदि सत्पुरुषों की संगति मिल जाती है तो इन्सान के दिल से मिथ्या पदार्थों का मोह, न·ार सामानों की आसक्ति तथा उनके ख़्याल हटकर सत्, चित्, आनन्द और अमर वस्तु का ख्याल दिल में बस जाता है। इसी से अमर जीवन मिलता है, इसी से अमर पदवी को पाता है।
अब जैसे आपने विक्रमी संवत् का नया वर्ष मनाया है। कईयों के दिल में ख्याल उठता होगा कि उसका नाम अमर क्यों है, और किसी का क्यों नहीं हो सकता? आपने कितने इतिहास पढ़े होंगे। सन्त, महापुरुष, भक्त------जिन्होंने भी मालिक की भक्ति और नाम में दिल लगाया, उनके ही जीवन और नाम अमर हो गये। उन्होंने अमर पदवी पाई।

Monday, March 21, 2016

जिह घट सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु।।

महापुरुष फ़रमाते हैं------
जिह घट सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु।।
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ।।
जिस इन्सान के दिल में मालिक की याद है, वह मुक्त है, आजाद है और सुखरूप है। ऐसे मानुष का दर्जा बहुत ऊँचा है। उस मानुष अर्थात् हरि कुल मालिक में कोई अन्तर नहीं। यह सच कर जानो कि उनका दर्जा एक ही है। वह इन्सान ई·ार का रूप हो जाता है। केवल करना यह है कि अपने दिल से विषय विकारों के अधम ख्यालों को निकालना है और मालिक की याद के वचारों को दिल में बसाना होगा। यह कोई लम्बा चौड़ा काम नहीं, केवल यही काम करना है। मन के रुख़ को बदलना है। कहीं जंगलों अथवा पहाड़ों में जाने की ज़रूरत नहीं। मन के ख्यालों का कांटा बदल दो। मन के ख़्याल कहां परिवर्तित होते हैं, केवल सत्पुरुषों की संगति में मन का कांटा बदला जा सकता है। संगति का प्रभाव भारी होता है। जैसा संग वैसा रंग। सत्पुरुषों का फ़रमान है------
।। दोहा ।।
जिन जैसी संगत करी, तिन तैसो फल लीन ।
कदली सीप भुजंग मुख, बूँद एक गुण तीन ।।
स्वांति नक्षत्र की बूँद ने जैसी संगति की वैसा ही रूप धारण कर लिया। अगर सीप के मुँह में गिरी तो चमकीला मोती बन गई। वही बूँद यदि केले के फूल पर गिरी तो कपूर बन गई और यदि सांप के मुँह में जा पड़ी तो विष बन गई। एक ही बूँद ने अलग अलग संगति से क्रमश: रूप धारण कर लिया। यह है संगति का प्रभाव।
आपने सुना होगा कि वाल्मीकि डाकू था। मार्ग चलते यात्रियों को लूटता भी था और जानलेवा भी बना हुआ था। अपने स्वार्थ के लिए लोगों को दुःख देता था। जब सन्तों की संगति में आया तो वही डाकू बाल्मीकि ऋषि बन गया। यदि कोई ख़्यालों को पलटना चाहता है और उन्नति करना चाहता है तो सत्पुरुषों की संगति आवश्यक है। सत्पुरुषों की संगति बड़े भाग्यों से मिलती है, प्रत्येक को यह सौभाग्य नहीं मिलता। जीव के जब पूर्व पुण्य उदित होते हैं तो सत्पुरुषों की संगति का संयोग बनता है।
बड़े भाग्यों से मानुष देही मिली व सत्पुरुषों का संग मिला। अब हर एक का कर्तव्य हो जाता है कि सच्ची उन्नति करे। दुनियावी एवं शारीरिक उन्नति शरीर के नष्ट होने के साथ मिट जाती है। आत्मोन्नति शा·ात रहेगी। यह जीव को ईश्वर से मिलायेगी। इसलिए सत्पुरुषों की संगति में नसीहत मिलती है कि भले संसार में रहो लेकिन मालिक की याद को दिल में बसाये रखो। अन्य ख़्यालों को दिल में स्थान मत दो। भक्तिवाले ख़्यालों को बढ़ाओ। सुखी वही रहेगा जिसका मन शान्त हो। शान्ति मालिक की याद से ही प्राप्त होगी और इसी को ही प्राप्त करना है।
जब शरीर नश्वर है और इसे कूच कर जाना है, यदि यह इस संसार में भी दुःखी रहा तो आगे इसको सुख कैसे मिलेगा? आगे भी वही फल मिलेगा अर्थात् दुःख ही मिलेगा। सुख के साधन सब गुरुमुखों को प्राप्त हैं। भजनाभ्यास, सेवा, सत्संग और दर्शन-ध्यान------इन नियमों को आचरण में लाना है। यह सब साधन जीव को सुखी बनाने वाले हैं।
इसलिये मानुष-जन्म मिला है। जीव गलतफ़हमी में पड़कर माया की ओर चला जाता है। पहले की कमाई भी व्यर्थ चली जाती है और जीव भी जन्मों तक चौरासी की यन्त्रणायें सहन करता है। ऐसा कर्म कर चलो जिससे आत्मा बन्धन से छूट जाय, मालिक से मिलकर एक हो जाय यही जीवन का लक्ष्य है। जीव को पूरा लाभ तभी हो सकता है यदि महापुरुषों के उपदेशानुसार भक्ति के साधनों को अपनाये। पुन: स्वयं ही अनुभव करेगा कि शान्ति मिल गई है। मृत्योपरान्त शान्ति, सुख तुम्हारे साथ जायेगा; यही सच्ची उन्नति है।

Tuesday, March 15, 2016

वास्तविक उन्नति



संसार में हरेक मनुष्य जिस श्रेणी अथवा स्तर का हो, जैसे भी उसके ख्याल हैं, अपने ख्यालानुसार संसारी कामों में उन्नति चाहता है। कोई भी एक ही परिस्थिति में नहीं रह सकता, उत्तरोत्तर उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहता है, ऊपर उठना चाहता है। उदाहरणतया एक विद्यार्थी जो अभी स्कूल में पढ़ता है उसकी अभिलाषा होती है कि मैं बी.ए. अथवा एम.ए. की डिग्री प्राप्त करूँ। उसके बाद और भी ऊँचा उठूँ और उच्च स्तर पर पहुँचूं। निर्धन की इच्छा होती है कि धनवान बन जाऊँ। कलर्क चाहता है कि बड़ा अधिकारी बन जाऊँ। अभिप्राय यह कि प्रत्येक इन्सान के दिल में उन्नति करने की अभिलाषा लगी रहती है, चाहे बच्चा है या बूढ़ा, स्त्री है या पुरुष, जवान अथवा कोई भी हो एक ही अवस्था में रहना पसन्द नहीं करता।
प्रत्येक प्राणी ऊँचा दर्जा प्राप्त करना चाहता है। परन्तु देखना यह है कि इन्सान किस चीज़ की उन्नति चाहता है? संसारी पदार्थ मिल जायें, बड़ा पद मिल जाये, धन अथवा विद्या की प्राप्ति हो जाय------ये सब मायावी सामान हैं। मान-प्रतिष्ठा-पद की इच्छा केवल शरीर तक ही सीमित है। जब शरीर चला गया तो इसको क्या मिला? विद्या, धन व अन्य सामान शरीर के लिए हैं। शरीर बिनस जाने पर ये भी बिनस गये। इनकी उन्नति शरीर तक सीमित रही और नष्ट हो गई। यह उन्नति हुई या अवनति। महापुरुषों की दृष्टि से देखा जाय तो इसने अपने अन्दर ऐसे ख्याल पैदा कर लिये जिससे पतन की ओर चला गया। जिस दर्जा से उठकर मानव-तन पाया था, इससे ऊपर उठता तो उन्नति थी। यह तो उलटा चौरासी की ओर चला गया। महापुरुषों का कथन है-----
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ।।
नानक नामु समालि तूँ सो दिन नेड़ा आइओइ ।।
                                  गुरुवाणी
कभी पशु, प्रेत, पेड़, पर्वत, पक्षी आदि बनकर चौरासी की नीच योनियों में भरमता रहा। चौरासी लाख योनियों के बाद मानुष का दर्जा प्राप्त किया। अब अपने अन्दर मायावी ख्यालात भर लिए, दुनियावी उन्नति को उन्नति समझना, आत्मा की उन्नति तो नहीं है। झूठे मायावी ख्यालों से चौरासी खरीदी तो इसका पतन हो गया। उन्नति किससे होती है? आत्मा से ऊपर का स्तर परमात्मा का है। निम्न स्तर पशु-पक्षी नीच योनियों का है। यदि इसके ख्याल विषयों की ओर जाते हैं तो नीचे का दर्जा अर्थात् चौरासी लाख योनि खरीद ली। यदि ख्याल भक्ति की ओर जाते हैं        तो ऊँचा दर्जा प्राप्त कर लिया। अब यह अपने ख्यालों पर निर्भर है कि जिसतरह के चाहे ख्याल अन्दर भरे। महापुरुषों का कथन है----
एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मन ।।
जैसे सूकरु सुआन नानक मानो ताहि तन ।।
                                 गुरुवाणी
यदि मालिक की भक्ति व याद दिल में नहीं है, भगवान की ओर इन्सान का मुख नहीं तो निश्चय ही पतन होगा। ई·ार कहां रहता है? यदि किसी छोटे बच्चे से भी पूछा जाए कि कौन ऊँचा है तो वह ऊपर की ओर अँगुली करता है अर्थात् ई·ार ही बड़ा है। ऊँचाई की ओर इन्सान तब जा सकता है जब उसकी ओर रुख़ करेगा। वरना सन्त फ़रमाते हैं------""जैसे सूकरु सुआन नानक मानो ताहि तन।'' यदि भक्ति नहीं की तो सूअर और कुत्ते अर्थात् पशु का दर्जा मिलता है। यह है इन्सान की उन्नति से अवनति का मार्ग। यह है मायावी ख्यालों का परिणाम। यदि उन्नति करनी       है  तो भक्ति को दिल में बसाना होगा। मालिक की याद में दिल लगाना होगा, फिर उन्नति होगी। पुन: देखो कि क्या दर्जा मिलता है।

Thursday, March 10, 2016

आत्म कल्याण



ज़रा सोचो जिन्हें इस अनमोल वस्तु का भान नहीं, ज्ञान नहीं, वे भाग्यहीन हैं। आप जो सत्पुरुषों की संगति में बैठे हो कितने भाग्यशाली हो। ऐसे गुरुमुख संसार में रहते हुए, नाम और भक्ति में चित्त लगाते हैं तथा अपने जीवन को सुखी बना लेते हैं। उनको ऐसा फार्मूला मिल गया है        कि सत्पुरुषों के द्वारा उन्हें समझ आ जाती है। उनके वचनों पर आचरण कर साधन अपनाते हैं और अपने जीवन को सुखी बना लेते हैं।
।। दोहा ।।
सत समरथ तें राखि मन, करिय जगत के काम।
जगजीवन यह मन्त्र है, सदा सूख बिसराम ।।
                          सन्त जगजीवन दास जी
यद्यपि संसार में रहो, संसार के काम-काज करो तथापि कर्तव्य समझ कर। उनसे दिल नहीं लगाना। सुरति को मालिक के ध्यान में जोड़ना है। जब यह मालिक के चरणों में जुड़ी रहेगी तो सुख ही सुख प्राप्त होगा। इस तरह जो अपना जीवन बनाते हैं, संसार में रहते हुए भी सदा सुखी हो जाते हैं। यहां भी सुखी रहते हैं और पलोक भी संवार लेते हैं। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी महाराज ने गीता में अर्जुन को उपदेश किया है------
काम दे अन्जाम लेकिन उसमें आगुश्ता न हो ।
राहते दिल है मुयस्सर बेतमन्ना शख्स को ।।
ऐ जीव! तू संसार में किसी विशेष लक्ष्य को लेकर आया है। जो अपने लक्ष्य को सम्मुख रखकर अन्य कार्य कर्तव्यमात्र समझकर करता है। उन्हें दिल में स्थान न देकर लक्ष्य की ओर उन्मुख होता है अर्थात् मालिक की भक्ति को ह्मदय में बसाता है, उस इन्सान को आन्तरिक शान्ति व सच्चा सुख मिल जाता है। क्योंकि उसके दिल में दुनिया की कामना नहीं होती।
इसप्रकार गुरुमुख जीवन व्यतीत करते हैं। सत्पुरुषों के आदेशानुसार उनकी मौज और आज्ञा के सांचे में जीवन ढालते हैं। अपना जीवन भी सुखमय बना लेते हैं, ज़िन्दगी से पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करते हैं और जीवन के लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेते हैं।

Wednesday, March 9, 2016

आत्म-कल्याण की सम्पदा




सारे संसार की हालत को देखा जाए तो वह दुःख, ग़म, कष्ट-क्लेश और चिन्ताओं से घिरा हुआ है। प्रत्येक इन्सान को कोई न कोई दुःख, ग़म, चिन्ता लगी हुई है। जबकि उसका प्रयत्न एवं पुरुषार्थ इसीलिए है कि मैं दुःखों से छुटकारा पा लूँ और ऐसे सुख को पा लूँ जिसके पीछे कोई दुःख, ग़म और चिन्ता न हो। उसकी यह अभिलाषा होते हुए भी कि मैं जीवन प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत करूँ, मेरा जीवन आनन्द एवं खुशियों से भरपूर हो, उस का यह ख्याल पूरा नहीं होता। वह सुख उसे मिलता नहीं अपितु दुःख, चिन्ता और कष्टों से घिरा रहता है।
अब विचार किया जाये कि एक इन्सान ने इच्छा तो सुख की की परन्तु मिलता उसे दुःख है------इसका क्या कारण है? कारण इसका एक ही है कि चाहना तो सुख की है परन्तु मन के ख्याल ऐसे पदार्थों को चाहते हैं जिन में सुख नाममात्र को भी नहीं या वे पदार्थ मांगता है जो न·ार, अस्थायी व क्षणभंगुर हैं।
यदि विचार करके देखा जाय जो पदार्थ न·ार, अस्थायी और बिछुड़ जाने वाले हैं यदि उनसे सुख प्राप्त होता है तो यह आवश्यक है कि उनके बिछुड़ने से दुःख होगा। अब संसार में कौनसी वस्तु है जो बिछुड़ने वाली नहीं अथवा अमर व शा·ात है? इन दोनों का निर्णय करने से सुख-दुःख का निर्णय भी हो जाता है। इसका सही निर्णय क्या होगा? क्या दुनियादारों की संगति में अथवा साधारण लोगों के मन के ख्यालों के अनुसार कोई कहे कि मैं निर्णय कर लूँ, अपनी इच्छित वस्तु सुख को पा लूँ------यह नहीं हो सकता। क्योंकि इन्सान की दौड़धूप जहाँ तक है, वह सब माया है। माया के जितने भी पदार्थ हैं सब न·ार हैं। जहाँं तक भी इन्सान की दृष्टि जाती है, सब न·ार और अस्थायी वस्तुएँ हैं। फ़कीरों के वचन हैं------
आकबत   चीज़े   कि   दारी   नज़र ।
फ़ानी अन्द फ़ानी शवद र्इं सरबसर ।।
जहां तक भी इन्सान की दृष्टि जाती है, धरती से आसमान तक दुनिया के जितने भी पदार्थ हैं सब न·ार होंगे। यह दृढ़ वि·ाास रखो, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। जड़ अथवा चेतन------सभी दृश्यमान पदार्थ न·ार हैं। इन्सान चाहे कि मैं इन पदार्थों में सच्चा सुख पा लूँ------ऐसा नहीं हो सकता। फिर इसे सच्ची एवं सुख देनेवाली वस्तु के विषय में कौन बतलायेगा अथवा यह विचार कहां से मिलेगा? जिन्होंने अपने जीवन में आचरण से अनुभव किया, सच्चा सुख प्राप्त किया, वही इन्सान को सच्चा सुख प्रदान कर सकेगा। वे सन्त महापुरुष हैं जिन्होंने अपने जीवन में वह चीज़ प्राप्त की है जो सत् व नित्य है। उन्होंने ही सच्चा सुख पाया है। उनकी यह वाणी है कि तू भी यदि सुखी रहना चाहता है तो किस चीज़ की चाहना कर?
जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ।।
कहु नानक सुन रे मना दुरलभ मानुख देह ।।
                                  गुरुवाणी
सन्त तुलसीदास जी भी अपनी वाणी में फ़रमाते हैं-
श्रुति  पुरान  सब  ग्रंथ  कहाहीं ।
रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ।।
सारांश तो एक ही है कि राम की शरण में आ जाओ। उनकी भक्ति और मालिक के नाम को दिल में बसाने से इन्सान सदा सुखी हो जाता है, फिर उसको ज़रा भी दुःख नहीं होता। अब यह सुख कहां से मिलेगा? विचार करो कि क्या यह वस्तु दुनिया के बाज़ार में या देश-विदेश में मिलेगी? ऐसा कौनसा सामान है जो सुख देनेवाला है और दुनिया में मिल सके। सुख तो इन्सान के अपने दिल के अन्दर है। आन्तरिक सुख की प्राप्ति से इन्सान सुखी हो जाता है तथा दिल में शान्ति होने से सुख की अनुभूति हो सकती है।
सुख बाहर कहीं नहीं बल्कि अन्दर की वस्तु है। यह कैसे मिलेगी? जब मालिक का नाम दिल में बस जायेगा और दुःखदायी ख्याल सर्वथा निकल जायेंगे। प्रभु की भक्ति अन्दर बस जायेगी तो इन्सान सुखी हो जायेगा। यह देखना है कि यह सुख क्या प्रत्येक इन्सान को मिल सकता है? क्या प्रत्येक प्राणी इसका खरीददार है अथवा हरेक के भाग्य में है? यदि इन्सान सच्चे सुख का खरीददार है तो सर्वप्रथम सत्पुरुषों की संगति प्राप्त होनी चाहिए। जब तक सत्पुरुषों की संगति नहीं मिलती, संशय भ्रम दूर नहीं हो सकते। मिथ्या ख्याल दिल से नहीं निकल सकते। अमर सुख की प्राप्ति सत्पुरुषों की संगति में ही मिलती है। सत्पुरुषों के वचन हैं------
बड़े   भाग   पाइब  सतसंगा ।
बिनही  प्रयास  होहिं  भवभंगा ।।
जब इन्सान के भाग्य उदित होते हैं तब उसे सत्पुरुषों की संगति मिलती है। तब इन्सान की सम्पूर्ण चिन्तायें, दुःख, दर्द व क्लेश दूर हो जाते हैं।

Wednesday, March 2, 2016

बुद्धिमान गुरुमुख जन

विचार करके देखा जाए, वही सयाने, बुद्धिमान और चतुर हैं जिनके दिल में ऐसी सच्ची लगन, ऐसी ऊँची भावना उत्पन्न होती है। वे मालिक की भक्ति को पाकर जीवन को सार्थक और सफल बना लेते हैं। उन्हें ही सच्ची वस्तु भक्ति प्राप्त है। वही भाग्यवान और संस्कारी हैं जो इसे प्राप्त करने के प्रयत्न में निरत रहते हैं।
इस अनुपम भक्ति को गुरुमुख ही प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। दुनिया में अनेकों इन्सान हैं जो अपने कामों में मन के ख्यालानुसार गलतान हैं। उनकी सुरति मायावी धन्धों में इसतरह लिप्त है कि उनको यह ख्याल ही नहीं आता कि भक्ति भी कोई चीज़ है जिसे पाना मनुष्य का कर्तव्य है। संसार में रहते हुए तथा कार्य व्यवहार करते हुए प्रत्येक मनुष्य दुःखी व परेशान है। फिर भी वे भक्ति की चाहना नहीं करते, चूँकि उनके इतने ऊँचे संस्कार नहीं हैं कि वे मालिक की अनन्य भक्ति के इच्छुक हों।
यह इन्सान के कई जन्मों के शुभ संस्कार होते हैं, पूर्व जन्मों की कमाई होती है जिससे उनके दिल में भक्ति की लगन जागरूक होती है कि मैं मालिक की भक्ति करूँ। पहले वे भी संसार में रहते थे और दुनियादार थे परन्तु अब वे गुरुमुख हैं। संसार में रहते हुए उनके ख़्यालों और गुरुमुख बनने के बाद ख्यालों में कितना अन्तर आ गया है। बाहरी वेष-भूषा, खान-पान व कार्य-व्यवहार चाहे एक सामान नज़र आते हैं परन्तु अन्तरीव तौर पर उनके ख्याल और विचार भिन्न भिन्न है। संसारियों की हार्दिक तीव्र इच्छा धन-           पदार्थ, मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करने की होती है परन्तु गुरुमुखों के दिल में यह इच्छा नहीं होती। उनके दिल में एक ही लगन होती है कि सत्पुरुषों की संगति मिले, उनके दर्शन प्राप्त हों तो सेवा का सौभाग्य मिल जाय। नाम-भजन की कमाई का सुअवसर मिले------यही गुरुमुखों के ख़्याल और विचार होते हैं। कुदरत की ओर से उनका ऐसा प्रबन्ध भी हो जाता है।
इन्सान जिस प्रकार के ख्याल उठाता है, कुदरत की ओर से वैसा प्रबन्ध भी हो जाता है। जैसा धरती में बीज बोया जाता है, वैसा ही उगता है। गुरुमुखों के दिल में भक्ति की प्राप्ति का ख्याल उत्पन्न हुआ, कुदरत ने वैसा प्रबन्ध कर दिया। गुरुमुख मालिक की भक्ति करके लक्ष्य को पूर्ण कर लेता है।
सत्पुरुषों की संगति में आने से ज्ञान का प्रकाश मिलता है जिससे इन्सान को वास्तविक अर्थों में निरख-परख और हानि-लाभ का पता चलता है कि भक्ति करने में भारी लाभ और न करने में काफ़ी हानि है। मानुष-जन्म इसीलिए मिला था कि इन्सान भक्ति करके अपने कुल मालिक भगवान से मिल जाए। वह यही अवसर है कोई और नहीं। मानव-तन में यही काम करना है। यह कोई साधारण काम नहीं जिसे इन्सान छोड़ दे या यह अवसर दूसरी बार मिल जायेगा। यदि थोड़ा नुकसान हो तो पूरा हो सकता था। न ऐसा अवसर दोबारा मिलना है और न ही यह घाटा पूरा हो सकता है। यदि इन्सान भक्ति से वंचित रहा और इस तन की कीमत न पहचानी तो मानव-जन्म से गिरकर चौरासी लाख योनि भुगतनी पड़ेगी। महापुरुषों का कथन है------
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ।।
नानक नामु समालि तूँ सो दिनु नेड़ा आइओइ ।।
                                    गुरुवाणी
चौरासी लाख योनियों के बाद यह मानुष-जन्म मिला है। इसको पाकर यदि नाम की कमाई नहीं की तो वह दिन समीप आ रहा है जबकि पुन: चौरासी में जाना पड़ेगा। कुदरत ने अनमोल देह प्रदान की, यदि इस समय में अपना कार्य न किया, लक्ष्य की प्राप्ति न की तथा भक्ति का साधन न अपनाया तो इन्सान को इसका बदला चुकाना पड़ेगा। महापुरुषों ने जो नियम निर्धारित किये हैं, यदि उनपर यह चलेगा तो जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। यदि इन्सान का मन विषय-विकारों में रमा रहा, सारा जीवन इसी में ही व्यतीत कर दिया तो अवश्य ही नुकसान होगा। परन्तु यदि भक्ति में लग गया तो ऐसा सुख व आनन्द एवं दर्जा मिलेगा जिससे मोक्षपद की प्राप्ति होगी और आत्मा मालिक से एकाकार हो जायेगी। महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। चौपाई ।।
जिमि  थल  बिनु जल रहि  नसकाई।
कोटि  भांति  कोउ  करै  उपाई ।।
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई ।
रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ।।
                        श्रीरामचरितमानस
जैसे ज़मीन के बिना पानी नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकार के यत्न कर ले। ऐ गरुड़ जी! इसीप्रकार मोक्ष का सुख मालिक की भक्ति के बिना नहीं मिल सकता। अर्थात् जहां पर भक्ति होगी, वहीं पर सच्चा सुख होगा, अन्यत्र नहीं। इसीलिए भक्तिवान ही चतुर सयाने होते हैं। गुरुमुख ही सोच सकते हैं कि भक्ति करने और न करने में कितना लाभ व कितनी हानि है। गुरुमुखों को साधन प्राप्य हैं, जो कि अत्यन्त सरल हैं। इनका भलीभांति परिपालन करके लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं। तथा भगवान से एकाकार होकर जीवन को सार्थक कर सकते हैं।
यह सुअवसर भाग्यशाली गुरुमुखों को मिला हुआ है। सत्पुरुषों की संगति एवं संयोग उपलब्ध है और भक्ति के सुगम नियम निर्धारित हैं जिनको अपनाने से जीव अपने कार्य को सिद्ध कर सकता है। गुरुमुख इन नियमों का पालन करते हुए अपने जीवन को सफल बना लेते हैं और जन्म को सार्थक कर लेते हैं।