ज़रा सोचो जिन्हें इस अनमोल वस्तु का
भान नहीं, ज्ञान नहीं, वे भाग्यहीन हैं। आप जो सत्पुरुषों की संगति में
बैठे हो कितने भाग्यशाली हो। ऐसे गुरुमुख संसार में रहते हुए, नाम और भक्ति में चित्त लगाते हैं तथा अपने जीवन
को सुखी बना लेते हैं। उनको ऐसा फार्मूला मिल गया है कि सत्पुरुषों के द्वारा उन्हें समझ आ
जाती है। उनके वचनों पर आचरण कर साधन अपनाते हैं और अपने जीवन को सुखी बना लेते
हैं।
।। दोहा ।।
सत समरथ तें राखि मन, करिय जगत के काम।
जगजीवन यह मन्त्र है, सदा सूख बिसराम ।।
सन्त जगजीवन दास जी
यद्यपि संसार में रहो, संसार के काम-काज करो तथापि कर्तव्य समझ कर।
उनसे दिल नहीं लगाना। सुरति को मालिक के ध्यान में जोड़ना है। जब यह मालिक के चरणों
में जुड़ी रहेगी तो सुख ही सुख प्राप्त होगा। इस तरह जो अपना जीवन बनाते हैं, संसार में रहते हुए भी सदा सुखी हो जाते हैं।
यहां भी सुखी रहते हैं और पलोक भी संवार लेते हैं। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी
महाराज ने गीता में अर्जुन को उपदेश किया है------
काम दे अन्जाम लेकिन उसमें आगुश्ता
न हो ।
राहते दिल है मुयस्सर बेतमन्ना शख्स
को ।।
ऐ जीव! तू संसार में किसी विशेष
लक्ष्य को लेकर आया है। जो अपने लक्ष्य को सम्मुख रखकर अन्य कार्य कर्तव्यमात्र
समझकर करता है। उन्हें दिल में स्थान न देकर लक्ष्य की ओर उन्मुख होता है अर्थात्
मालिक की भक्ति को ह्मदय में बसाता है,
उस इन्सान को
आन्तरिक शान्ति व सच्चा सुख मिल जाता है। क्योंकि उसके दिल में दुनिया की कामना नहीं
होती।
इसप्रकार गुरुमुख जीवन व्यतीत करते
हैं। सत्पुरुषों के आदेशानुसार उनकी मौज और आज्ञा के सांचे में जीवन ढालते हैं।
अपना जीवन भी सुखमय बना लेते हैं,
ज़िन्दगी से
पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करते हैं और जीवन के लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेते हैं।
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