Saturday, March 26, 2016

अमर जीवन

अमर जीवन
वास्तव में यदि देखा जाये तो वही सुन्दर संयोग, वही स्वर्णिम अवसर आप लोगों को मिला हुआ है। सत्पुरुषों की शरण संगति में आकर झूठे ख्यालात, नश्वर पदार्थों का मोह, अज्ञान व भ्रम इन्सान के दिल से दूर हो जाता है। मालिक का सच्चा नाम और भक्ति अन्तर में वास करती है; क्योंकि यहाँ चर्चा ही सच्चे नाम की होती है। चारों ओर वातावरण ही उसी प्रकार का बना होता है।
इन्सान के अन्दर सच्चा नाम बस जाय और मिथ्या ख्याल दूर हो जायें------इसीलिए ही सत्पुरुषों ने श्री आनन्दपुर दरबार की रचना की है और ऐसे साधन बना दिये हैं जिनको अपनाकर मार्ग से भटकाने वाले मोह ममता के झूठे ख्याल हट जायें। मालिक के ध्यान की ओर लगें। सत् वस्तु मालिक की भक्ति और नाम में जुड़ जायें। महापुरुषों ने ऐसे साधन बना दिए। सच्चे दरबार की सेवा और सत्संग का अवसर उन लोगों को मिलता है जिनके पूर्बले संस्कार और नेक कमाई हो।
संसार में इन्सान किसलिए आया? इससे आम दुनिया गुमराह है। वे यह नहीं समझते कि शरीर किसी विशेष प्रयोजन के लिए मिला हुआ है। देखा-देखी चलते जा रहे हैं। हर समय दुनिया की संगत, माया के ख्याल, धन-पदार्थ इकट्ठा कर लूँ, कुटुम्ब-परिवार बढ़ा लूँ, मान मर्तबा मिल जाय------इसी में गलतान रहते हैं। शारीरिक सुखों की प्राप्ति को ही अपना समझ रखा है, इसके अतिरिक्त विदित ही नहीं कि मानुष जीवन किस विशेष लक्ष्य--पूर्ति हेतु मिला है।
क्या जन्म-जन्मांतरों तक चौरासी लाख योनि में रूह कष्ट उठाती रहे-----यही लक्ष्य था। पुरातन मायावी ख्याल जो जन्मों से दबे हुए थे, उनसे छुटकारा पाने के लिए मानुष-देही मिली थी। इस जन्म में सत्पुरुषों की संगति में आकर वह आत्मज्ञान प्राप्त करे जिससे मुक्ति मिले, जन्म-मरण के चक्र से आज़ाद हो जाये। आज़ादी किस से प्राप्त हो सकती है? इसके दिल में जन्म-जन्मों के विषय-विकारों के ख्याल भरे हुए हैं, उनसे छुटकारा मिल जाए------इसका नाम आज़ाद होना है; इसी का नाम मुक्ति है। जब इन्सान के दिल से विषय विकार निकल जाते हैं तो मालिक का सच्चा नाम बस जाता है। जबतक आन्तरिक मलीनता दूर नहीं होती, पवित्रता नहीं आती तब तक मालिक का सच्चा नाम व भक्ति स्थान नहीं पा सकती। पवित्रता कब आती है, जब सत्पुरुषों की संगति प्राप्त होती है।
हजारों, लाखों, करोड़ों लोग सत्पुरुषों के संयोग से वंचित विषय विकारों में जीवन व्यर्थ गंवा रहे हैं। विरले भाग्यशाली गुरुमुखजन जिनके पूर्बले संस्कार होते हैं उन्हें सत्पुरुषों की संगति प्राप्त होती है। ऐसा अवसर व संयोग जिसको मिल जाता है, वे लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस लाभ का अनुमान नहीं लगाया जा सकता तथा मूल्य व कीमत नहीं आंकी जा सकती। मानव-जन्म को पाकर भगवान की भक्ति करके मालिक से जा मिले, कितना लाभ है। दूसरी ओर मालिक की भक्ति से विहीन होकर नीच योनि प्राप्त कर ले------यह कितना नुकसान है। इस हानि लाभ का पता कब चलता है, जब इन्सान सत्पुरुषों की संगति में आता है। एक ओर तो कितना लाभ है और दूसरी ओर कितना नुकसान। जब यह समझ आ जाती है तो फिर नुकसान की ओर नहीं जाता। नुकसान में दुःख और लाभ में सुख और अमर पदवी मिलती है, यह भक्ति का लाभ है।
विचार करना है कि मानुष-जन्म कितना कीमती है। जब इन्सान इसके बदले में कीमती वस्तु खरीदे तो उसकी कीमत पड़ जायेगी और वह सुखी हो जायेगा। यदि न·ार और अस्थायी वस्तुयें खरीदेगा तो दुःख मिलेगा। महापुरुषों का कथन है------
।। दोहा ।।
सब कोई वणजे खार खल, हीरा कोई न लेय ।
हीरा  लेवे  जौहरी, जो  मांगै  सो  देय ।।
सारा संसार खार खल अर्थात् तुच्छ पदार्थों का खरीददार है। जिस मनुष्य ने मानव-तन के बदले तुच्छ पदार्थ विषय-विकारों को खरीदकर यूँ ही गँवा दिया तो क्या लाभ हुआ? हीरा रूपी भक्ति कोई विरले ही खरीदते हैं जिन्हें इसकी समझ आ जाती है। वे अनमोल भक्ति रूपी हीरे के बदले नश्वर पदार्थ तो क्या, शरीर न्यौछावर करने से नहीं घबराते। क्योंकि शरीर तो नश्वर है, नश्वर चीज़ के बदले सच्ची चीज़ प्राप्त कर ली।
जैसे पहले कहा गया है------"हीरा परखे जौहरी, जो मांगे सो देय'------जिसको यह समझ आ जाती है वह हर प्रकार से कुर्बानी करता है। सच्चे हीरे को प्राप्त करके अमर जीवन और अमर पदवी को प्राप्त कर लेता है। मालिक से एकाकार हो जाता है, सही अर्थों में जो मनुष्य का लक्ष्य है। दुनिया में धन कमा लिया, पदवी प्राप्त कर ली, कलाप्रवीण बन गया, यह किसी काम नहीं आता। जाते समय सब कुछ यहीं छोड़ जाता है उलटा अपने लिए चौरासी खरीद कर लेता है। अच्छा तो यह है कि इन्सान सुजाग हो जाए, उसे यह विदित हो जाए कि मेरी भलाई का काम कौनसा है, शान्ति का मार्ग क्या है। सत्पुरुषों की संगति में आकर झूठे ख्यालों को दिल से निकाल दे, सच्ची वस्तु को दिल में स्थान दे, सत् की कमाई ही सच्ची पूँजी है, यही साथ जायेगी; दूसरी कमाई साथ नहीं जायेगी। दुनिया के सब सामान यहीं रह जायेंगे।
साथ  जायेगा  तेरे  बस  प्रभु  का  नाम  ही।
जिस  दुनिया  को  तू  समझा  है  अपना,
 दर   हकीकत   है   नफ़ी ।।
मालिक की भक्ति और सच्चे नाम की कमाई सत्पुरुषों की संगति से प्राप्त होती है। कोई चाहे कि मालिक के नाम को और दुनिया के सामान------दोनों को इकट्ठा कर लूँ-----यह दोनों चीज़ें इकट्ठी नहीं रह सकतीं।
।। दोहा ।।
जहां काम तहँ नाम नहिं, जहां नाम नहिं काम ।
कहैं कबीर दोऊ न मिलैं, रवि रजनी इक ठाम ।।
                परमसन्त श्री कबीर साहब जी
जिसके दिल में मालिक का सच्चा नाम व भक्ति वास करती है वहां दुनियावी इच्छायें नहीं ठहर सकतीं। जहां झूठी इच्छायें होंगी वहां नाम नहीं रह सकता। एक दिल में एक ही चीज़ बस सकती है। रात-दिन एक समय में इकट्ठे नहीं रह सकते। महापुरुषों ने यह एक प्रमाण दिया है। इसीतरह दोनों चीज़ें एक दिल में इकट्ठी नहीं टिक सकतीं। जहां नाम होगा, वहां झूठी इच्छायें नहीं होंगी।
यह इच्छायें ही दुःख का कारण हैं। नरक में ले जाती   हैं। सच्ची खाहिश मालिक से मिलाती है व सुखदायी होती है। महापुरुषों ने जो रास्ता बतलाया है वह सच्ची शान्ति का है। वे मार्ग बतलाते भी हैं और आचरण भी कराते हैं।
महापुरुषों ने जो नियम बनाये हैं, सच्ची मुक्ति दिलाने वाले हैं। मालिक से मिलाने वाले हैं। भजन-अभ्यास, सेवा-सत्संग, दर्शन-ध्यान------ये सब नियम इन्सान के अन्दर सच को बसानेवाले और झूठ को निकालनेवाले हैं। मानुष-जन्म का क्या लाभ है, उसको अपने सम्मुख रखे और महापुरुषों के आदेशानुसार साधन अपनाए व मानुष-जन्म को सफल बना ले। लक्ष्य को पूरा करके अपना नाम अमर कर ले, अमर पदवी को पा ले। यही जीवन का लक्ष्य है, इसीलिए ही इन्सान संसार में आया है। इसी को ही पूर्ण करना है, इसी में ही इसकी भलाई निहित है।

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