संसार में हरेक मनुष्य जिस श्रेणी
अथवा स्तर का हो,
जैसे भी उसके
ख्याल हैं, अपने ख्यालानुसार संसारी कामों में
उन्नति चाहता है। कोई भी एक ही परिस्थिति में नहीं रह सकता, उत्तरोत्तर उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहता है, ऊपर उठना चाहता है। उदाहरणतया एक विद्यार्थी जो
अभी स्कूल में पढ़ता है उसकी अभिलाषा होती है कि मैं बी.ए. अथवा एम.ए. की डिग्री
प्राप्त करूँ। उसके बाद और भी ऊँचा उठूँ और उच्च स्तर पर पहुँचूं। निर्धन की इच्छा
होती है कि धनवान बन जाऊँ। कलर्क चाहता है कि बड़ा अधिकारी बन जाऊँ। अभिप्राय यह कि
प्रत्येक इन्सान के दिल में उन्नति करने की अभिलाषा लगी रहती है, चाहे बच्चा है या बूढ़ा, स्त्री है या पुरुष, जवान अथवा कोई भी हो एक ही अवस्था में रहना
पसन्द नहीं करता।
प्रत्येक प्राणी ऊँचा दर्जा प्राप्त
करना चाहता है। परन्तु देखना यह है कि इन्सान किस चीज़ की उन्नति चाहता है? संसारी पदार्थ मिल जायें, बड़ा पद मिल जाये, धन
अथवा विद्या की प्राप्ति हो जाय------ये सब मायावी सामान हैं। मान-प्रतिष्ठा-पद की
इच्छा केवल शरीर तक ही सीमित है। जब शरीर चला गया तो इसको क्या मिला? विद्या,
धन व अन्य सामान
शरीर के लिए हैं। शरीर बिनस जाने पर ये भी बिनस गये। इनकी उन्नति शरीर तक सीमित
रही और नष्ट हो गई। यह उन्नति हुई या अवनति। महापुरुषों की दृष्टि से देखा जाय तो
इसने अपने अन्दर ऐसे ख्याल पैदा कर लिये जिससे पतन की ओर चला गया। जिस दर्जा से
उठकर मानव-तन पाया था,
इससे ऊपर उठता तो उन्नति
थी। यह तो उलटा चौरासी की ओर चला गया। महापुरुषों का कथन है-----
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु
पाइओइ।।
नानक नामु समालि तूँ सो दिन नेड़ा
आइओइ ।।
गुरुवाणी
कभी पशु, प्रेत,
पेड़, पर्वत,
पक्षी आदि बनकर
चौरासी की नीच योनियों में भरमता रहा। चौरासी लाख योनियों के बाद मानुष का दर्जा
प्राप्त किया। अब अपने अन्दर मायावी ख्यालात भर लिए, दुनियावी
उन्नति को उन्नति समझना,
आत्मा की उन्नति
तो नहीं है। झूठे मायावी ख्यालों से चौरासी खरीदी तो इसका पतन हो गया। उन्नति
किससे होती है?
आत्मा से ऊपर का
स्तर परमात्मा का है। निम्न स्तर पशु-पक्षी नीच योनियों का है। यदि इसके ख्याल
विषयों की ओर जाते हैं तो नीचे का दर्जा अर्थात् चौरासी लाख योनि खरीद ली। यदि
ख्याल भक्ति की ओर जाते हैं तो ऊँचा
दर्जा प्राप्त कर लिया। अब यह अपने ख्यालों पर निर्भर है कि जिसतरह के चाहे ख्याल
अन्दर भरे। महापुरुषों का कथन है----
एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि
मन ।।
जैसे सूकरु सुआन नानक मानो ताहि तन
।।
गुरुवाणी
यदि मालिक की भक्ति व याद दिल
में नहीं है, भगवान की ओर इन्सान का मुख नहीं तो निश्चय ही पतन
होगा। ई·ार कहां रहता है? यदि किसी छोटे बच्चे से भी पूछा जाए कि कौन ऊँचा है
तो वह ऊपर की ओर अँगुली करता है अर्थात् ई·ार ही बड़ा है। ऊँचाई की ओर इन्सान तब जा सकता है जब
उसकी ओर रुख़ करेगा। वरना सन्त फ़रमाते हैं------""जैसे सूकरु सुआन नानक
मानो ताहि तन।'' यदि भक्ति नहीं की तो सूअर और कुत्ते अर्थात् पशु का
दर्जा मिलता है। यह है इन्सान की उन्नति से अवनति का मार्ग। यह है मायावी ख्यालों
का परिणाम। यदि उन्नति करनी है तो भक्ति को दिल में बसाना होगा। मालिक की याद
में दिल लगाना होगा, फिर उन्नति होगी। पुन: देखो कि क्या दर्जा मिलता है।
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