Monday, March 21, 2016

जिह घट सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु।।

महापुरुष फ़रमाते हैं------
जिह घट सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु।।
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ।।
जिस इन्सान के दिल में मालिक की याद है, वह मुक्त है, आजाद है और सुखरूप है। ऐसे मानुष का दर्जा बहुत ऊँचा है। उस मानुष अर्थात् हरि कुल मालिक में कोई अन्तर नहीं। यह सच कर जानो कि उनका दर्जा एक ही है। वह इन्सान ई·ार का रूप हो जाता है। केवल करना यह है कि अपने दिल से विषय विकारों के अधम ख्यालों को निकालना है और मालिक की याद के वचारों को दिल में बसाना होगा। यह कोई लम्बा चौड़ा काम नहीं, केवल यही काम करना है। मन के रुख़ को बदलना है। कहीं जंगलों अथवा पहाड़ों में जाने की ज़रूरत नहीं। मन के ख्यालों का कांटा बदल दो। मन के ख़्याल कहां परिवर्तित होते हैं, केवल सत्पुरुषों की संगति में मन का कांटा बदला जा सकता है। संगति का प्रभाव भारी होता है। जैसा संग वैसा रंग। सत्पुरुषों का फ़रमान है------
।। दोहा ।।
जिन जैसी संगत करी, तिन तैसो फल लीन ।
कदली सीप भुजंग मुख, बूँद एक गुण तीन ।।
स्वांति नक्षत्र की बूँद ने जैसी संगति की वैसा ही रूप धारण कर लिया। अगर सीप के मुँह में गिरी तो चमकीला मोती बन गई। वही बूँद यदि केले के फूल पर गिरी तो कपूर बन गई और यदि सांप के मुँह में जा पड़ी तो विष बन गई। एक ही बूँद ने अलग अलग संगति से क्रमश: रूप धारण कर लिया। यह है संगति का प्रभाव।
आपने सुना होगा कि वाल्मीकि डाकू था। मार्ग चलते यात्रियों को लूटता भी था और जानलेवा भी बना हुआ था। अपने स्वार्थ के लिए लोगों को दुःख देता था। जब सन्तों की संगति में आया तो वही डाकू बाल्मीकि ऋषि बन गया। यदि कोई ख़्यालों को पलटना चाहता है और उन्नति करना चाहता है तो सत्पुरुषों की संगति आवश्यक है। सत्पुरुषों की संगति बड़े भाग्यों से मिलती है, प्रत्येक को यह सौभाग्य नहीं मिलता। जीव के जब पूर्व पुण्य उदित होते हैं तो सत्पुरुषों की संगति का संयोग बनता है।
बड़े भाग्यों से मानुष देही मिली व सत्पुरुषों का संग मिला। अब हर एक का कर्तव्य हो जाता है कि सच्ची उन्नति करे। दुनियावी एवं शारीरिक उन्नति शरीर के नष्ट होने के साथ मिट जाती है। आत्मोन्नति शा·ात रहेगी। यह जीव को ईश्वर से मिलायेगी। इसलिए सत्पुरुषों की संगति में नसीहत मिलती है कि भले संसार में रहो लेकिन मालिक की याद को दिल में बसाये रखो। अन्य ख़्यालों को दिल में स्थान मत दो। भक्तिवाले ख़्यालों को बढ़ाओ। सुखी वही रहेगा जिसका मन शान्त हो। शान्ति मालिक की याद से ही प्राप्त होगी और इसी को ही प्राप्त करना है।
जब शरीर नश्वर है और इसे कूच कर जाना है, यदि यह इस संसार में भी दुःखी रहा तो आगे इसको सुख कैसे मिलेगा? आगे भी वही फल मिलेगा अर्थात् दुःख ही मिलेगा। सुख के साधन सब गुरुमुखों को प्राप्त हैं। भजनाभ्यास, सेवा, सत्संग और दर्शन-ध्यान------इन नियमों को आचरण में लाना है। यह सब साधन जीव को सुखी बनाने वाले हैं।
इसलिये मानुष-जन्म मिला है। जीव गलतफ़हमी में पड़कर माया की ओर चला जाता है। पहले की कमाई भी व्यर्थ चली जाती है और जीव भी जन्मों तक चौरासी की यन्त्रणायें सहन करता है। ऐसा कर्म कर चलो जिससे आत्मा बन्धन से छूट जाय, मालिक से मिलकर एक हो जाय यही जीवन का लक्ष्य है। जीव को पूरा लाभ तभी हो सकता है यदि महापुरुषों के उपदेशानुसार भक्ति के साधनों को अपनाये। पुन: स्वयं ही अनुभव करेगा कि शान्ति मिल गई है। मृत्योपरान्त शान्ति, सुख तुम्हारे साथ जायेगा; यही सच्ची उन्नति है।

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