सारे संसार की हालत को देखा जाए तो
वह दुःख, ग़म, कष्ट-क्लेश
और चिन्ताओं से घिरा हुआ है। प्रत्येक इन्सान को कोई न कोई दुःख, ग़म,
चिन्ता लगी हुई
है। जबकि उसका प्रयत्न एवं पुरुषार्थ इसीलिए है कि मैं दुःखों से छुटकारा पा लूँ
और ऐसे सुख को पा लूँ जिसके पीछे कोई दुःख,
ग़म और चिन्ता न
हो। उसकी यह अभिलाषा होते हुए भी कि मैं जीवन प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत करूँ, मेरा जीवन आनन्द एवं खुशियों से भरपूर हो, उस का यह ख्याल पूरा नहीं होता। वह सुख उसे
मिलता नहीं अपितु दुःख,
चिन्ता और कष्टों
से घिरा रहता है।
अब विचार किया जाये कि एक इन्सान ने
इच्छा तो सुख की की परन्तु मिलता उसे दुःख है------इसका क्या कारण है? कारण इसका एक ही है कि चाहना तो सुख की है
परन्तु मन के ख्याल ऐसे पदार्थों को चाहते हैं जिन में सुख नाममात्र को भी नहीं या
वे पदार्थ मांगता है जो न·ार, अस्थायी
व क्षणभंगुर हैं।
यदि विचार करके देखा जाय जो पदार्थ
न·ार, अस्थायी
और बिछुड़ जाने वाले हैं यदि उनसे सुख प्राप्त होता है तो यह आवश्यक है कि उनके
बिछुड़ने से दुःख होगा। अब संसार में कौनसी वस्तु है जो बिछुड़ने वाली नहीं अथवा अमर
व शा·ात है? इन दोनों का निर्णय करने से सुख-दुःख का निर्णय
भी हो जाता है। इसका सही निर्णय क्या होगा?
क्या दुनियादारों
की संगति में अथवा साधारण लोगों के मन के ख्यालों के अनुसार कोई कहे कि मैं निर्णय
कर लूँ, अपनी इच्छित वस्तु सुख को पा
लूँ------यह नहीं हो सकता। क्योंकि इन्सान की दौड़धूप जहाँ तक है, वह सब माया है। माया के जितने भी पदार्थ हैं सब
न·ार हैं। जहाँं तक भी इन्सान की
दृष्टि जाती है,
सब न·ार और अस्थायी वस्तुएँ हैं। फ़कीरों के वचन
हैं------
आकबत चीज़े
कि दारी नज़र ।
फ़ानी अन्द फ़ानी शवद र्इं सरबसर ।।
जहां तक भी इन्सान की दृष्टि जाती
है, धरती से आसमान तक दुनिया के जितने
भी पदार्थ हैं सब न·ार होंगे। यह दृढ़ वि·ाास रखो,
इसमें तनिक भी
सन्देह नहीं। जड़ अथवा चेतन------सभी दृश्यमान पदार्थ न·ार हैं। इन्सान चाहे कि मैं इन पदार्थों में
सच्चा सुख पा लूँ------ऐसा नहीं हो सकता। फिर इसे सच्ची एवं सुख देनेवाली वस्तु के
विषय में कौन बतलायेगा अथवा यह विचार कहां से मिलेगा? जिन्होंने अपने जीवन में आचरण से अनुभव किया, सच्चा सुख प्राप्त किया, वही इन्सान को सच्चा सुख प्रदान कर सकेगा। वे
सन्त महापुरुष हैं जिन्होंने अपने जीवन में वह चीज़ प्राप्त की है जो सत् व नित्य
है। उन्होंने ही सच्चा सुख पाया है। उनकी यह वाणी है कि तू भी यदि सुखी रहना चाहता
है तो किस चीज़ की चाहना कर?
जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह
।।
कहु नानक सुन रे मना दुरलभ मानुख
देह ।।
गुरुवाणी
सन्त तुलसीदास जी भी अपनी वाणी में
फ़रमाते हैं-
श्रुति पुरान
सब ग्रंथ कहाहीं ।
रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ।।
सारांश तो एक ही है कि राम की शरण
में आ जाओ। उनकी भक्ति और मालिक के नाम को दिल में बसाने से इन्सान सदा सुखी हो
जाता है, फिर उसको ज़रा भी दुःख नहीं होता। अब
यह सुख कहां से मिलेगा?
विचार करो कि क्या
यह वस्तु दुनिया के बाज़ार में या देश-विदेश में मिलेगी? ऐसा कौनसा सामान है जो सुख देनेवाला है और
दुनिया में मिल सके। सुख तो इन्सान के अपने दिल के अन्दर है। आन्तरिक सुख की
प्राप्ति से इन्सान सुखी हो जाता है तथा दिल में शान्ति होने से सुख की अनुभूति हो
सकती है।
सुख बाहर कहीं नहीं बल्कि अन्दर की
वस्तु है। यह कैसे मिलेगी?
जब मालिक का नाम
दिल में बस जायेगा और दुःखदायी ख्याल सर्वथा निकल जायेंगे। प्रभु की भक्ति अन्दर
बस जायेगी तो इन्सान सुखी हो जायेगा। यह देखना है कि यह सुख क्या प्रत्येक इन्सान
को मिल सकता है?
क्या प्रत्येक
प्राणी इसका खरीददार है अथवा हरेक के भाग्य में है? यदि
इन्सान सच्चे सुख का खरीददार है तो सर्वप्रथम सत्पुरुषों की संगति प्राप्त होनी
चाहिए। जब तक सत्पुरुषों की संगति नहीं मिलती, संशय
भ्रम दूर नहीं हो सकते। मिथ्या ख्याल दिल से नहीं निकल सकते। अमर सुख की प्राप्ति
सत्पुरुषों की संगति में ही मिलती है। सत्पुरुषों के वचन हैं------
बड़े भाग
पाइब सतसंगा ।
बिनही प्रयास
होहिं भवभंगा ।।
जब इन्सान के भाग्य उदित होते हैं
तब उसे सत्पुरुषों की संगति मिलती है। तब इन्सान की सम्पूर्ण चिन्तायें, दुःख,
दर्द व क्लेश दूर
हो जाते हैं।
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