Thursday, June 30, 2016

सच्ची खुशी


     संसार में अगर किसी से पूछा जाये कि तुम्हें सबसे अधिक ख्वाहिश किस चीज़ की है तो वह कहेगा मुझेअपार धन चाहिए, कोई कहेगा कि मेरी संसार में खूब मानइज़्ज़त हो,कोई कहेगा कि मेरे पास सब तरह के ऐशो इशरत के सामान हों, किसी को अपने शरीर के तन्दरूस्त,सुन्दर व निरोग होने की ख्वाहिश होगी और कोई ये भी कहेगा कि मुझे ईश्वर या परमात्मा की तलाश है। अब अगर इनसे पूछा जाये कि तुम्हें धन दौलत चाहिए तो किसलिये? मान और इज़्ज़त प्राप्त करने की ख्वाहिश है तो किसलिये? ऐशो इशरत के सामानों की इच्छा और शरीर के सुन्दर और निरोग होने की चाहना है तो क्योंकर? और अगर प्रभु को पाने की दिल में तमन्ना है तो आखिर क्यों? बहुत से व्यक्तियों से तो इसका जवाब शायद ही बन पाये। लेकिन इसका जवाब है, वो जवाब है खुशी। इन्सान अगर धन दौलत चाहता है तो खुशी के लिये,जायदाद मकान बनाता है तो खुशी को लिये,मान सम्मान चाहता है तो खुशी के लिये,ऐशो इशरत के सामानों की खाहिश है तो खुशी के लिये, अगर इन्सान भक्ति भी करता है तो खुशी के लिये। गौर करने से मालूम होता है दुनियां में खुशी से बढ़कर कोई भी चीज़ नहीं है।धन दौलत हो खुशी न हो तो कुछ भी नहीं, मान इज़्ज़त हो शरीर तन्दरुस्त और सुन्दर हो,ऐशो इशरत के सब सामान मौजूद हों सब कुछ हो पर खुशी न हो तो कुछ भी नहीं मिला। मान लो, अगर किसी को परमात्मा भी मिल जाये पर खुशी न हो तो कुछ भी नहीं मिला।कहने का तात्पर्य ये है कि जीव संसार में जो कुछ भी कार्यव्यवहार करता है,खाना पीना,उठना बैठना, नौकरी, खेती व्यापार आदि धन कमाने के लिये करता हैअर्थात जो भी कार्य करता है केवल खुशी के लिये ही। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक मनुष्य की ज़िन्दगी का मकसद खुशी को हासिल करना है। जाने या अन्जाने में हर इन्सान अपनी अपनी समझ अनुसार खुशी को हासिल करने के लिये प्रयत्नशील है। लेकिन अब ये देखना है कि कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें खुशी नसीब है।
     आमतौर पर संसार में दुःख की ही शिकायत हुआ करती है। बड़े बड़े विद्वानों ने, सन्तों महापुरुषों ने, सदग्रन्थों की वाणियों ने इस संसार को दुःखसागर का नाम दिया है। एक भी आदमी ऐसा नहीं है जो इसे वैकुण्ठ सागर या सुखसागर कहता

हो। क्योंकि अगर हम संसार की तरफ गौर करके देखें तो मालूम होगा बल्कि हर इन्सान देखता भी है कि सभी को, बीमारी, बुढ़ापा दुर्घटनाओं और मौत के शिकार होने का डर हमेशा सिर पर बना रहता है। कोई बीमारी के हाथों तंग है कोई गरीबी का मारा परेशान है। बड़े बड़े व्यापारी, राजा महाराजा,धनवान सब अपनी अपनी चिन्ताओं की चक्की में पिसे चले जा रहे हैं।जब धनवानों का ये हाल है तो गरीबों की तो बात ही क्या है। हस्पतालों में जाकर देखो कैसे लोग तड़फ रहे हैं। जेलों में सख्त सजाएं हो रही हैं। मतलब क्या कि संसार में धनवान,बलवान प्रतिष्ठावान, किसी से भी पूछा जाये कि क्या उसे खुशी प्राप्त है,क्या वह सुखी है? तो वहअपने दुःखों की कहानी शुरु कर देगा। आप कहेंगे कि उसके पास अपार धन है,कुटुम्ब परिवार है नौकर चाकर हैं उसे और क्या चाहिये उसके पास सब कुछ है वह ज़रूर सुखी होगा। उसे ज़रूर खुशी प्राप्त होगी। उससे पूछने पर आप उसके दिल में भी एक निराशा, चिन्ता उदासी या खिन्नता के भाव ही पायेंगे। सन्त सहजो बाई जी का कथन है-:      धनवन्ते सब ही दुःखी निर्धन दुःख का रूप।
     फरमाती हैं कि धनवानों और अमीरों को मैने दुःखी और पीड़ा में कराहते हुये पाया है और निर्धन तो दुःख का रूप ही हैं। संसार का प्रत्येक प्राणी संसारिक पदार्थों में खुशी की तलाश करता है लेकिन गौर करने से, विचार करने से ये ही मालूम होता है कि खुशी न दौलत में है,न इज़्ज़त में,ना ही किसी और सांसारिक पदार्थों में खुशी है। किसी पंजाबी सन्त ने कहा है।
   विषय वासना विच गल्तान बन्दा दीन दुःखी आजीज़ सुबह शाम रहंदा।
   नित  लोड़दा  सुखां  ते  खुशियाँ  नूं अफसोस मगर  नाकाम  रंहदा।
   सुख मूल नहीं विषयाँ विच दासा ना ही सुख दा नाम निशान हरगिज़।
   जिन्हां चीज़ां विच खुशी लभदा तूँ खुशी वाले ऐ नाहीं सामान हरगिज़।
     अब प्रश्न होता है कि जब सांसारिक पदार्थों में खुशी नहीं है तो आखिर वह कहाँ से और किस प्रकार प्राप्त हो सकती है। महापुरुष फरमाते हैं कि जीव को सच्चा सुख व सच्ची खुशी तब ही मिल सकती है जब वह अपना रूख परमात्मा की तरफ मोड़े क्योंकि जिस चीज़ का जहाँ भण्डार हो वहीं से मिल सकती है किसी को कपड़ों की आवश्यकता है और वह बर्तनों की या मिठाई की दुकान पर तलाश
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करे तो उसे कैसे मिल सकते हैं। कपड़े खरीदने के लिये उसे कपड़ों की दुकान पर ही जाना होगा।अगर उसे सोना चाँदी की ज़रूरत है तो वह सुनार की दुकान पर ही उपलब्ध होगा न कि गाजर मूली या सब्ज़ी की दुकान पर।
    एक मनुष्य दरिया के किनारे पर खड़ा है उसकी नज़र पानी में एक मणी पर जाती है वह कपड़े उतार कर दरिया में डुबकी लगाता है परन्तु बार बार गोता लगाने से गहरे पानी में जाने पर भी उसके हाथ नहीं आती। दुःखी हो जाने पर भी बार बार डुबकी लगाने से नहीं हटता। इतने में वहाँ कोई अनुभवी महात्मा स्नान करने आते हैं और उस व्यक्ति को बार बार डुबकी लगाते दुःखी देखते हैं। उन्होने उससे पूछा क्यों भाई दरिया में बार बार डुबकी क्यों लगा रहे हो? किन्तु वह भेद खोलना नहीं चाहता उसे आशंका है कि कहीं बाबा जी मणी को निकाल कर ले न जायें। इसलिये वह बात टाल देता है किन्तु महात्मा जी की दृष्टि उस मणी पर पड़ जाती है उसे देखकर वह समझ गये और बोले क्यों भाई तुम उस मणी को लेने के लिये ही बार बार डुबकी लगा रहे हो? भेद खुला देख उसे स्वीकार करना पड़ा। बाबा जी ने कहा डुबकी लगाते कितना समय हो गया उसने कहा जब से आया हूँ तब से डुबकी लगा रहा हूं। बाबा जी ने कहा कुछ हाथ भी लगा?उसने कहा कुछ भी नहीं। तो फिर क्यों डुबकी लगा रहा है?उसने कहा इसलिये कि डुबकी लगाते लगाते कभी न कभी तो मणी हाथ आ ही जायेगी। बाबा जी ने कहा इस प्रकार सारी आयु डुबकी लगाते रहोगे तो भी मणी तुझे नहीं मिल सकती क्योंकि जो मणी तुझे दिखाई दे रही है वह वहां पर है ही नहीं तो मिलेगी कैसे? उसने कहा आप कैसी बात कर रहे हैं वह तो साफ दिखाई दे रही है। बाबा जी ने हँसकर कहा कुछ देर ठहर तुझे अभी सारा भेद मालूम हो जायेगा। जब जल ठहर गया तो बाबा जी ने कहा तुझे जहाँ मणी दिखाई दे रही है वहाँ और भी कुछ दिखाई दे रहा है? उसने कहाँ हाँ एक वृक्ष दिखाई दे रहा है। बाबा जी ने कहा डुबकी लगाते वक्त पेड़ की कोई डाली या पत्ता हाथ लगा?अगर वहाँ वृक्ष होता तो ज़रूर उसकी टहनी या पत्ता हाथ में आता मगर वहां वृक्ष है नहीं केवल दिखाई दे रहा है। ऐसा कहकर महात्मा जी ने वृक्ष की डाली हिलाई जल में दिखाई देने वाला वृक्ष भी हिला देखकर उसने कहा आपका कहना सत्य है। कृप्या मणि के मिलने का भी उपाय भी बतलाईये।

बाबा जी ने कहा यदि तुझे मणी प्राप्त करना है तो वृक्ष पर चढ़ जा इसी वृक्ष पर तुझे मणी मिल जायेगी। तब उसने वृक्ष पर चढ़कर मणी व लाल प्राप्त किया।
     कहने का तात्पर्य ये है कि यह संसार ही दरिया है विषय ही उसमें जल है। विषयों में जो सुख भासता है वह मणी की परछांर्इं है। जीव ही डुबकी (जन्ममरण) लगाने वाला मनुष्य है।सतगुरु ही महात्मा हैं।दृढ़ वैराग्य किनारे का वृक्ष और अभ्यास का साधन उस पर चढ़ना है और परमानन्द परमात्मा का स्वरूप ही सच्ची मणी है।इस प्रकार जल में परछार्इं की भांति यहां विषयों में आनन्द प्रतीत होता है वह उस परमात्मा का ही प्रतिबिम्ब है यदि उसे पाने की इच्छा है तो इस संसार रूपी दरिया में प्रतीत होने वाले विषयों से मुख मोड़ कर सतगुरु के बतलाये हुये दृढ़ वैराग्य रूप वृक्ष पर चढ़कर नाम का अभ्यास करके उसे ढूँढो तभी तुम्हें उसकी प्राप्ति होगी। इसलिये महापुरुष फरमाते हैं कि अगर जीव को सच्ची खुशी प्राप्त करना है तो उसे चाहिये कि संसार के पदार्थों में तलाश करने की बजाए परमात्मा की तरफ अपना रूख मोड़े सतगुरु की भक्ति में चित जोड़े जो सुखऔर शान्ति के व आनन्द के भण्डार हैं।
        ""सतगुरु सुख सागर जग अन्तर होर थार्इं सुख नाहीं''।
     सन्त महापुरुषों को संसार की दुःखित अवस्था को देखकर खेद होता है जीवों को सच्ची खुशी प्रदान करने के लिये अपने आनन्द और शान्ति के धाम को छोड़कर इस संसार में आते हैं और जीवों को सुख रूप बनाने के लिये सरल और सहज साधन बना देते हैं वो साधन हैं श्री आरती पूजा, नाम सुमिरण, ध्यान,सत्संग,सेवा व सतपुरुषों के दर्शन। वह जीव खुशकिस्मत है वह गुरुमुख भाग्यशाली हैं जिन्हें सन्तों महापुरुषों की संगत और उनसे प्रभु नाम की प्राप्ति हो गई है और वह सच्ची खुशी को हासिल करते हैं जो महापुरुषों के बताये हुये रास्ते पर चलते हैंऔर उनके द्वारा बनाये सुख के साधनों को प्रयोग में लाते हैं। इसलिये वही जीव सच्ची खुशी को हासिल करता है वह परिवार खुशियों से भरपूर रहता है जिसमें मालिक की भक्ति, प्रभु का गुणगान, सुबह शाम नितप्रति श्रीआरती पूजा, सत्संग,नाम कासुमिरण भजन कीर्तन होता रहता है। आप सब गुरुमुख सौभाग्यशाली हैं जिन्हें सन्तों की संगत प्राप्त होने से समझ आ गई है कि सच्ची

खुशी मालिक की भक्ति में है इसलिये गुरुमुखों का कर्तव्य है कि संसार के कार्य व्यवहार करते हुये महापुरुषों के बताये रास्ते पर चलते हुये उनके द्वारा बनाये खुशी के साधनों को अपनाते हुये सच्ची खुशी को हासिल करके मनुष्य जन्म को सफल बनायें और परलोक सँवार लें।

Saturday, June 25, 2016

सन्तों की संगत


                जाकै संगि इहु मन निरमलु-जाकै संगि हरि हरि सिमरनु।।
                जाकै संगि किलबिख होहि नास-जाकै संगि रिदै परगास।।
                से संतन हरि के मेरे मीत केवल नामु गाईयै जाकै नीत।।
                                           (गौड़ महल्ला5-पृ.863)
     एक जिज्ञासु, एक सत्संगी व अभ्यासी के लिये एक प्रश्न है। वह प्रश्न क्या है? वह यह कि उसको इस मार्ग में उसका मन ठीक तरह से चलने नहीं देता। न अभ्यास में, न सत्संग में और न भक्ति मार्ग में। कारण कि मन स्वभाव से चञ्चल है। यह प्रश्न बहुधा एक साधक के सामने आता है। इसका उत्तर न तो वह स्वयं दे सकता है और न इसे सर्वसाधारण मनुष्य दे पाता है। इसमें हेतु यह है कि मन की रचना ही ऐसी है जिसे हर एक समझ नहीं सकता यह साधना का मार्ग बड़ा गूढ़ और सूक्ष्म मार्ग है। इसके भेदी केवल सन्त सद्गुरु ही हैं। इस प्रश्न का उत्तर महापुरुषों ने दिया है। उनकी सम्मति क्या है? वे कथन करते हैं कि वस्तुतः यह जो मन है इसके बनाने वाला स्वयं मनुष्य ही है। इसे बाहर से आकर किसी ने नहीं बनाया और न ही भगवान ने इस मन को बना बनाया भेजा है। यह कार्य मनुष्य के अपने हाथ में है। वह जैसा चाहे इसे बनावे। यह गोरखधन्धा एक जन्म का नहीं अपितु अनेक जन्मों का है।
     सन्तों का कथन है कि जीव जैसे जैसे कर्म करता है और जैसे जैसे मन अपनी वृत्तियों द्वारा बाहर से आहार ग्रहण करता है मन वैसा ही बन जाता है। प्रायः जीवों की मनोवृत्ति बहिर्मुखी है। जिस जिस वस्तु से वृत्तियां टकराती हैं और जिससे प्यार करती हैं जिस जिस स्थान पर रुकती हैं और स्थिर होती हैं तो क्या होता है? उन उन वस्तुओं का असर अपने अन्दर खींच कर वापस ले आती हैं। मन की वृत्ति में स्वाभाविक ही एक चुम्बक शक्ति है। उन प्रभावों का एक कोश संस्कारों के रुप में मनुष्यों के भीतर संचित हो जाता है। उस संस्कार-पुञ्ज का नाम ही "मन' है। भिन्न भिन्न संस्कारों के समुदाय को ही मन कहते हैं। यदि मन की वृत्तियां शुभ वस्तुओं के साथ मेल करती हैं तो सुन्दर प्रभाव अन्दर एकत्र होकर अच्छे मन की रचना करेंगे यदि अशुभ पदार्थों से उनका मेल होगा तो मन भी बुरा बनेगा। यह प्राकृतिक नियम है जो मनुष्य के अन्दर स्वतः काम कर रहा है। उदाहरण के रुप में आप एक शहद के छत्ते को लीजिये। शहद की मक्खियांं बाहर से फूलों के रसों को लेकर मधु बनाती हैं कई फूल ऐसे होते हैं जिनकी गन्ध कड़ुवी होती है और कई फूलों में मीठी गन्ध होती हैं। यदि वे मधुमक्खियां मीठी गन्ध वाले फूलों से रस लाएंगी तो शहद मधुर बनेगा। यदि वह रस कड़ुवे फूलों का है तो मधु भी कड़ुवी होगी। इसी तरह ये मनोवृत्तियां उन मधुमक्खियों के समान हैं और मन एक शहद के छत्ते के सदृश है। मन को यदि हमने स्वयं गन्दा बनाया है तो उसकी शक्ति ने अपना काम करना है। जैसी मनोवृत्ति होगी वैसा ही कार्य आगे सिद्ध होगा। यदि मन खरा़ब बन गया है और हम उससे भजन व ध्यान में लगने की आशा रखें ऐसा कदापि न हो सकेगा। जिस समय जो भी शक्ति मन के अन्दर प्रबल हो जाती है वह उसे कार्य करने को विवश कर देती है। इस प्रकार एक दुर्जन दस लोगों को दुर्जन बना देता है। एक झूठा मनुष्य सौ मनुष्यों को झूठा बनाएगा। भाव यह कि जो जैसा भी होता है उसका वैसा ही प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। जैसे यदि कोई भक्ति भावों वाला है तो वह अकेला भक्त नहीं बना रहेगा प्रत्युत वह औरों को भी भक्ति भावों से भरपूर कर देता जैसी संगत वैसा ही प्रभाव यह नियम अपनेआप आकर काम कर रहा है। जिस प्रकार का आहार वृतियां बाहर से ग्रहण करती हैं वैसी ही शक्ति मन के अन्दर उत्पन्न हो जाती है। यह एक गम्भीर रहस्य है जो सत्संगति के बिना नहीं खुलता तभी सन्त जनों का उपदेश है  कि मलिन मन वाले  लोगों से
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वृत्तियों को जोड़ने की अपेक्षा उच्च संस्कार वाले लोगों से मन को जोड़ो। इस  तरह  जब मन निर्मल हो
जाएगा तो अवश्य ही भजनाभ्यास में रस लेने लगेगा।
     परमार्थी जीव के लिये आवश्यक है कि वह सच्छास्त्रों व सत्पुरुषों के बताये हुए सत्कर्मों  को नियम पूर्वक करे-जैसे अपने इष्टदेव की श्री आरती उतारना,सत्संग व भजनाभ्यास करना, गुरु सेवा और सद्गुरु का दर्शन ध्यान करना आदि। ऐसे कर्मों को नित्य कर्म कहा जाता है। इन कर्मों का प्रभाव जब मन में संचित होगा तो मन भजन में लगेगा। इसके विपरीत मन को मैला करते हुए हम यह आशा करते हैं कि वह भजन में जुड़े यह कैसे सम्भव है। इसलिये सन्त महापुरुषों ने नित्य कर्मों को करने पर प्रयाप्त बल दिया है। इसका नाम है "भक्तियोग'। अजपाजाप, अनाहत शब्द और सहज समाधि ये सब योग के साधन हैं। साकार रुप की सेवा, ध्यान, सत्संग और प्रेम इसका नाम है भक्ति।
     कुछ लोग संसार में आत्मा के कल्याण के लिये योग मार्ग का सहारा लेते हैं और कई भक्ति मार्ग को अपनाते हैं। सत्य तो यह है कि यदि योगाभ्यास में सफलता मिल भी जाय परन्तु उसमें भक्ति का समावेश नहीं है तो उस योगाभ्यासी को माया कभी भी गिरा सकती है। भक्ति सहित योग मार्ग सुरक्षित रहेगा। जीव के अन्दर सद्गुरु निराकार ब्राहृ रुप में विद्यमान हैं और बाहर वही ब्राहृ सर्गुण साकार रुप में प्रकट है। साकार रुप की भक्ति निराकार निर्गुण रुप में पहुँचाएगी। योग मार्ग में यदि कोई साधक पूर्ण नहीं है और भक्ति मार्ग में सफल है तो भी वह अपूर्ण नहीं कहा जाएगा। रामायण में-भगवान श्रीराम-लक्ष्मण के प्रति उपदेश करते हैंः-धर्म ते विरति योग ते ज्ञाना। ज्ञान मोक्ष प्रद वेद बखाना।।
                   जाते वेगि द्रवौं मैं भाई।  सो  मम भक्ति  भक्त सुखदाई।।
अर्थः-धर्म से वैराग्य और योग से ज्ञान की प्राप्ति होगी। ज्ञान हो जाने पर मोक्ष पद मिलेगा। ऐसा वेद कहते हैं। यह एक नियम है। भगवान आगे कथन करते हैं कि इससे ऊपर अर्थात् धर्म योग-ज्ञान-वैराग्य तथा मुक्ति से भी परे एक और तत्त्व है जिस के द्वारा हे लक्ष्मण! मैं अति शीघ्र प्रसन्न हो जाता हूँ। वह क्या है? वह है मेरी भक्ति-जो भक्तों को सुख देने वाली है। ये उपरलिखित वर्णित सब साधन भक्ति के अधीन हैं। भक्ति स्वतन्त्र है वह किसी और साधन के अधीन नहीं भगवान आगे निर्देश करते हैंः-
                सो स्वतन्त्र अवलंब न आना। तेहि अधीन ज्ञान विज्ञाना।।
वह भक्ति कैसी है? स्वतन्त्र है; परमुखापेक्षी नहीं। उस पर किसी का दबाव नहीं है। इसी भक्ति के अधीन ज्ञान और विज्ञान रहते हैं। सन्त भी इसी भक्ति की महिमा का गान करते हैं। भगवान जिस पर प्रसन्न हो जावें उसे फिर और किस वस्तु की कमी रह जाएगी। भगवान तो धर्म, वैराग्य,ज्ञान और मुक्ति सब के स्वामी हैं। किन्तु भक्ति उसे ही प्रदान करते हैं जिस पर वे प्रसन्न हो जावें। इसलिये सन्त महापुरुषों के वचन हैंः-        जाके संग एह मन निरमल। जाके संग हर हर सिमरन।।
                जाके संग किलविख होये नास। जाके संग रिदै प्रगास।।
पंचम पादशाही श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज के वचन हैं कि जिनके संग से यह मन निर्मल हो जावे, जिसकी संगति से भजनाभ्यास में वृत्ति लगे, जिनके संग से पिछले पापों का नाश हो जाये- जिनके संग से ह्मदय में प्रकाश हो जाये-वे कौन हैं? इसका उत्तर में देते हैं किः-
                से सन्तन हरि के मेरे मीत। केवल नाम गाइये जाके नीत।।
वे भगवान के भेजे हुए सन्त मेरे मित्र हैं जिनके संग करने से नाम की कमाई होती है। उनकी सत्संगति में रहने से मन निर्मल होगा, भजनाभ्यास में मन लगेगा पिछले जन्मों के पाप धुल जायेंगे और ह्मदय में आत्मा की ज्योति जगमगा उठेगी। कारण-उनका अन्तःकरण नितान्त विशुद्ध है।
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     जब जीव की वृत्ति रुपी मक्खियां उस परम पवित्र शुद्ध रस को खींच कर अन्दर ले जाएंगी तो जीव का मन भी पवित्र और स्वच्छ बनेगा। इसका नाम है क्ल्याण-जीव का सुधार-मन इस कार्य में अवश्य ही मीन-मेष करता है।
     लोग कहते हैं कि रोज-रोज़ इष्टदेव के दर्शन करने की क्या आवश्यकता है? प्रतिदिन सत्संग का श्रवण करना क्यों आवश्यक है? भला-विचार किया जावे कि वृत्तियां बाहर से सांसारिक सामान ला लाकर मन को मैला तो प्रतिदिन कर रही हैं-मन को मैला करने का काम तो दैनिक होता हो और झाड़ू कभी कभी दिया जाये-यह तो उचित नहीं। इसलिये सन्त उपदेश करते हैं कि हर रोज़ इष्टदेव की श्री आरित-पूजा, भजनाभ्यास और ध्यान किया करो। ये सब नित्य कर्म हैं। जैसे आपको प्रतिदिन अपने कार्य पर जाना पड़ता है और कई प्रकार के दैनिक कार्य-व्यवहार से ये मन की वृत्तियां मलिनता को अन्दर लाती रहती हैं। वृत्तियों का स्वभाव ही यह है कि वे प्रतिपल कुछ न कुछ मैल अन्दर लाती ही रहती हैं। माया और मायावी पदार्थों के प्रभाव हर घड़ी मन को दूषित करते ही रहते हैं-यदि सफाई का नियम रुक जाये या कभी कभी चले तो यह उचित नहीं। स्वच्छता का कार्य भी साथ साथ ही होना चाहिये।
                       अपने गुनाहों का लगा लेना हिसाब रोज़-रोज़।
                       उन पै रोना रोज़ और, आँसूं बहाना रोज़-रोज़।।
यदि भजन में मन नहीं लगता तो इसकी चिन्ता न करो। यदि गत जन्मों के संस्कारों करके मन दूषित है और भजन में नहीं लगता तो कोई बात नहीं। आगे के लिये तो अच्छा बन ही रहा है। वर्तमान कर्मों का महत्व बहुत बड़ा है। यदि पिछले संस्कार किसी के अच्छे नहीं है और वतर्मान में वह अच्छे कर्म कर रहा है तो वर्तमान के शुभ कर्म उसके दुषित विचारों को दबाकर स्वयं प्रधान हो जायंगे। इसके विपरीत यदि किसी के गत जन्मों के संस्कार अच्छे हैं और वर्तमान काल के कर्म बुरे हैं तो ये बुरे संस्कार और कर्म इतने प्रबल हो जायेंगे कि उसके पिछले अच्छे संस्कारों को भी परास्त कर देंगे। यह प्राकृतिक नियम है।
       इस भेद को सामने रखते हुए सत्पुरुषों ने निर्णय किया है कि दैनिक कर्तव्यों की उपेक्षा न करो अहंकार और लोभ आदि को त्याग कर नित्य कर्म निरन्तर करते जाओ। भक्ति मार्ग में काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार रुपी चोर भी घात में रहते हैं और मन के साथ मिलकर कमाई लूट भी लेते हैं। साधक का धर्म है कि वह अहंकार को दिल से निकाल कर सेवा करता जावे।
                 सेवा दा आवे हंकार-न उर वार न ओह पार।।
     इस बात को ध्यान में रखकर मनुष्य अपनी साधना में जुटा रहे फिर देखे कि उसमें भक्ति की शक्ति आती है या नहीं। वह शक्ति दिन दुगुनी और चौगुनी होगी। यदि काम क्रोधादि चोर भी साथ में हों तो वही कहावत लागू होगी""अन्धी पीसे कुत्ता चाटे।'' भक्ति इस तरह से करनी चाहिये कि चोरों का भय न बना रहे और भक्ति सब प्रकार से सुरक्षित रहे।

Friday, June 24, 2016

बुरे की बुराई मत सोचो


""तुम से जो बुराई कर रहा है तुम्हारा मालिक उसे देख रहा है। उसकी बुराई का फल वह उसे देगा। तू उससे बदला लेने की मत सोच।''
     ये महापुरुषों के अनुभूत प्रयोग हैं जो कि बिगड़े हुए आत्मिक स्वास्थ्य को स्वस्थ कर देते हैं क्योंकि आत्मा की निर्बलता और रोग का प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है इसलिये इन नुस्खों का सेवन करने से शारीरिक स्वास्थ्य भी सुधर जाएगा। बाबा फरीद साहिब का वचन हैंः-
                फरीदा बुरे दा भला करे गुस्सा मनि न द्रढ़ाइ।।
                देही  रोगु  न  लगई  पलै  सभु  किछु पाई।।
इन वचनों में क्या कमाल के वर दिये हुए हैं कि देह के दुःख भी नष्ट हो जावें और जो भी मनःकामना हो वह भी पूरी हो जाये। इससे बढ़कर मनुष्य को क्या चाहिये। परन्तु फिर भी खेद की बात है कि लाखों में से कोई कोई इस वचन का सहारा लेकर वैर और घृणा से बचा रहता है। अन्यथा सर्वसाधारण बुराई करने वाले तो क्रोध कर के ऐसे अमूल्य आशीर्वादों को हाथ से गँवा देते हैं।
     बाबा फरीद साहिब जी को तो सदियाँ बीत गर्इं किन्तु यह ऊपर वाला वचन तो उनका कथन किया हुआ है जिनके सेवक कहलाने का हमें गर्व है जो अभी विद्यमान हैं और जिनका हमें मान है। यदि हम भी इस वचन का परिपालन न करके मन के कहने पर चलेंगे तो उनकी दया की धारा आज्ञा की डोरी के बिना किसके द्वारा हम तक पहुँचेगी। ऐसा करने से यदि हम गुरु-कृपा से वञ्चित रह गये तो फिर हमारे जीवन में सफलता कैसे आयेगी? हम अति गम्भीरता पूर्वक इस भारी लाभ व हानि को सोचें। श्री सद्गुरु देव को अन्तर्यामी और समर्थ समझ कर ऐसी बातों को उनकी मौज पर छोड़ दें। वे जैसा उचित समझें करें। हम प्रत्येक दशा में प्रसन्न रहें। हमारा मन जिससे दर्पण की न्यार्इं निर्मल रहे। मालिक की अखण्ड ज्योंति उसमें चमकती रहे। मनुष्य शुद्ध व चैतन्य स्वरुप हो जाये। इस को ही सेवक स्वामी का मेल कहते हैं। यही जीव और इनकी एकता है। यही सच्चा लाभ है और यही मानव जीवन की सफलता है।
     श्री गुरु महाराज जी की आज्ञा के बिना यह मन शत्रु कभी नहीं जीता जा सकता। अपने अथाह वेग से यह मन मनुष्य को चिन्ता, संशय,भ्रम, सन्देह और अवगुणों के गढ़े में जा गिराता है। जहाँ इसे सुख का सांस लेना भी कठिन हो जाता है। मनुष्य स्वयमेव अपनी पीठ पर पशुओं से भी अधिक भार लाद लेता है जिससे वह सर्वदा चीत्कार व हाहाकार करता रहता है। अतः जिसे अपनी आत्मा पर करुणा करनी हो वह उपर्युक्त वचन को लक्ष्य बना कर दूसरों की बुराइयों को भुलाकर अपना उत्तरदायी मालिक को समझे जिससे उसके मन का बोझ उतर जाय और  जीवन हर्ष के  साथ व्यतीत हो। सन्त सत्पुरुषों  का अवतार
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केवल इसी निमित्त ही होता है कि वे जीवों के मानसिक संघर्ष को हलका कर दें और उन्हें सच्चा सुख प्राप्त हो। आप गीता रामायण, महाभारत,गुरुवाणी या बाईबिल में से कोई भी धार्मिक ग्रन्थ देखें सर्वत्र यही
मिलेगा कि महापुरुषों ने अपनी मौज से निर्बल जीवों के सहायक बन कर उन्हें भय और चिन्ता के सागर से पार उतार दिया। किन्तु पार तो वही उतर सकता है जो उन्हें अपनी बाँह पकड़ा देवे और उन पर भरोसा या विश्वास रखे। जो मनुष्य स्वयं दूसरे से बदला लेना चाहता है इसका भाव यह होगा कि उसका अपना विश्वास अपने इष्टदेव पर नहीं है या वह उन्हें समर्थ और न्यायकारी नहीं समझता फिर वह मनुष्य भव सागर कैसे तरेगा?
      प्रह्लाद भक्त या श्री कबीर साहिब, नामदेव या भक्त रविदास जी आदिक जिनको लोगों ने निरर्थक कष्ट दिये उन भक्तों ने दुःखदायकों का बदला लेने का विचार स्वप्न में भी न उठाया तब तो भगवान को नृसिंह आदि अवतार धारण कर आना पड़ा। वे यदि आप प्रतिशोध लेने का विकल्प उठाते तो भगवान बीच में आते ही नहीं। वह कहते कि ""तुम आपस में निबट लो।'' फिर भला प्रह्लाद बालक,हिरण्यकशिपु जैसे महादैत्य का सामना कर सकता। पिता उसे चूर चूर न कर देता। परन्तु इन सबों ने आप गँवाया और शौह की मदद को पाया। आज तक भी उनका जय जयकार संसार में हो रहा है।
     आज जो हमें अपने वचन के द्वारा मालिक ने शिक्षा दी है इस में भी उनकी मौज यही है कि यदि तुम किसी की बुराई नहीं सोचोगे और तुम से कोई बुराई कर जायेगा तो हम तुम्हारा पक्ष लेंगे। तुम्हारी उसमें विजय निश्चित होगी। फिर हम ऐसा कार्य क्यों न करें जिससे हमें यहां भी विजय मिले और भगवान भी अपने बनें। इससे बढ़कर लाभ का व्यापार और कौन सा हो सकता है। कथा हैः-
     एक सन्त महात्मा अपने सेवक के साथ कहीं से गुज़र रहे थे तो देखते क्या हैं कि आकाश से एक तलवार तेज़ी से आ रही है किन्तु पल भर में वह आकाश में वापस चली गई। सेवक ने पूछा कि श्री गुरुमहाराज! यह क्या माजरा है? श्री गुरुमहाराज जी ने उत्तर दिया कि बेटा! एक मालिक के भक्त को कोई दुष्ट व्यर्थ में सता रहा था। उसकी सहायता के लिए और दुष्ट का वध करने के लिए यह तलवार अदृश्य से आ रही थी। परन्तु भक्त को दुःख सहन करते करते एकदम जोश आ गया-उसने भी दुष्ट को दो चार सुना दीं। यह देखकर मालिक ने अपनी तलवार को लौटवा लिया और कहा कि ""अब आपस में आप ही निपट लो।'' परिणाम यह हुआ कि उस दुष्ट ने भक्त को बड़ा मारा और वह मार खाकर पीछे पछताता रहा। लोगों ने भी उसे कहा कि तुम पूर्ण भक्त नहीं हो क्योंकि अन्त में तुम भी आपे से बाहर हो ही गये भक्त जन तो जीतने का प्रयत्न करते ही नहीं क्योकिः-
                हर जन तो हारा भला, जीतन दे  संसार।
                हारा तो हरि सों मिले, जीता जम के द्वार।।
इसी प्रकार जो वचन का उल्लंघन करते हैं वे यहां भी मारे जाते हैं-परलोक में भी लज्जित होते हैं। यदि हम इस लोक में भी विजयश्री का मुख देखना चाहते हैं और परलोक में सम्मान पूर्वक जाना चाहते हैं तो उपरलिखित वचन को कार्य रुप में परिणत करते हुए मालिक की कृपा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।
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Wednesday, June 22, 2016

नमन

नमन
भगवद् भक्ति के मन्दिर में प्रवेश करने की सर्वश्रेष्ठ और अनिवार्य सीढ़ी "नमन' है। नमन का अर्थ है झुकना। नम्र होना, खाकसार बनना। अपने अहंकार का समूल नाश कर देना। इसी भाव को सन्त वाणी में दीनता-गरीबी आदि नामों से अभिव्यक्त किया जाता है।
     भक्ति के मार्ग में सबसे प्रबल शत्रु "अंहकार' है। यह दीनता से ऐसे ही कोसों दूर रहता है जैसे सर्प नकुल से। ये दोनों मानों सहज वैरी हैं। संसार का आभूषण जहां अहंकार है वहां भक्ति का सौन्दर्य दीन भाव में निखर उठता है। हो भक्त और चाहे आत्म सम्मान-आदर-सत्कार यह उसकी नितान्त भूल है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी के वचन हैंः-
                इक  बानो जो दीनता,  सन्तन किया विचार।
                यही भेंट गुरुदेव की, सब कुछ गुरु दरबार।।
परम सन्त श्री कबीर जी कथन करते हैं कि सच्चे परमार्थी का सबसे श्रेष्ठ भूषण क्या है "दीनता' जिसने अपने परम इष्टदेव जी के चरण कमलों में रहकर दीन भाव का बाना ओढ़ लिया है उसने मानों अपना सर्वस्व ही उन्हें अर्पित कर दिया। इसी का नाम है "नमन'- सदा ही अपने इष्टदेव जी के वचनों को शिरोधार्य करना, उनकी आज्ञा के अनुसार अपने जीवन को उसी ढंग से चलाना जिससे उनकी प्रसन्नता प्राप्त हो सके।
     भक्ति के अमृत का पान करने वाला जिज्ञासु पुरुष इस संसार के प्रत्येक पदार्थ में अपने इष्टदेव जी को ही देखने लगता है। उसके लिये कण-कण नमस्कार के योग्य बन जाता है। उसके नयनों में यजुर्वेद के 40 वेंअध्याय का प्रथम मन्त्र हर समय अंकित रहता है-"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चिज्जगत्यां जगत्'अर्थात् सम्पूर्ण यह विश्व उस परमेश्वर से आच्छादित है। वह इसके अणु अणु में ओत प्रोत हैं। उसकी दृष्टि इस अभ्यास के करने से इतनी परिसूक्ष्म हो जाती है कि वह हरएक वस्तु में अपने उपास्यदेव को पहले देखता है और उस पदार्थ को पीछे-वह अपने प्रियतम के उसमे, विद्यमान होने करके अत्यन्त प्रफुल्लित रहता है। उसके लिये हर चीज़ ही अति पवित्र, अति सुन्दर और अति प्रिय हो जाती है। जैसा कि गोस्वामी तुलसी दास जी का कथन हैः-
                सिया राममय सब जग जानी। करउं प्रणाम जोरि युग पानी।।
उसके ह्मदय में श्री कृष्ण चन्द्र जी महाराज जी के ये वचन प्रतिपल गूँजते रहते हैंः-
                समोऽहं  सर्वभूतेषु,  न  मे  द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
                ये भजन्ति तु मां भक्तया, मयि ते तेषु चाप्यहम्।।
श्री भगवान कथन करते हैं कि मैं सब भूतों में सम भाव से व्यापक हूँ। मेरा न कोई अप्रिय है और न प्रिय है। जो भक्त मुझे प्रेम से भजते हैं वे मेरे में और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट होता हूँ।
     भाव यह कि जैसे सूक्ष्म रुप से व्याप्त अग्नि सब पदार्थों में गुप्त रुप से रहा करती है-किन्तु साधनों द्वारा उसे प्रत्यक्ष कर लिया जाता है वैसे ही परमेश्वर से खाली कोई भी स्थान नहीं,हर एक के ह्मदय में वह सर्वदा स्थित हैं परन्तु अनन्य और एकनिष्ठ भक्त ही उसे अपने उत्कट प्रेम भाव से प्रकट कर लेते हैं।
     सन्त सत्पुरुष जो स्वयं परमेश्वर रुप ही होते हैं संसार के जीवों में रहकर यही उपकार करते हैं कि उनके और ब्राहृ के अन्तराल में जो तीनों गुणों(सत्त्व-रज-तम) के तारों से बुना हुआ यह विराट् प्रकृति का प्रपञ्च व्यवधान बनकर ठहरा है उसे प्रेममयी भक्ति के द्वारा दूर करते हैं और उनकी दृष्टि को अपनी कृपा भरी चितवन डार कर निर्मल कर देते हैं जिससे वे जीव भगवद् दर्शन करने में सफल हो जाते हैं। सन्त
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सद्गुरु ही जीव की बिखरी हुई वृत्तियों को सेेवा-पूजा-भजनाभ्यास के साधन सिखा कर अपने में समाहित कर लेते हैं। और उस भक्त की सुरति अपने कृपालु सद्गुरुदेव जी में ही उस निराकार ब्राहृ का दर्शन कर लेती है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी के चन हैंः-
                निराकार   की  आरसी,  सन्तन  ही  की  देहि।
                लखा जो चाहे अलख को, इन ही में लखि लेहि।।
यह सब कुछ तभी सम्भव है जब साधक में अत्यन्त दीनता के भाव घर कर चुके होंगे और उसमें मालिक के दर्शनों के लिये उग्र उत्कण्ठा होगी जैसे किः-
                अनन्यचेताः सततं, यो मां स्मरति नित्यशः।
                तस्याहं सुलभः पार्थ, नित्ययुक्तस्य योगिनः।। 8/14
हे अर्जुन! जो पुरुष मुझ में अनन्य चित्त से स्थित हुआ हुआ मुझे ही सर्वदा स्मरण करता है-मैं उस निरन्तर मुझ में लीन योगी के लिये सुलभ हो जाता हूँ अर्थात् यदि वे मेरे लिये अति व्याकुल हो रहा है तो मैं उसके लिये उससे भी अधिक आतुर रहता हूँ कि वह मुझे मिले ही मिले। इस एकाकार हो जाने की वृत्ति को सुगम करने का यदि कोई साधन है तो वह "प्रेम और नमन' है -झुकना।
     बड़े बड़े तूफान आते हैं-भयंकर उपद्रव करते हैं उन्नत सिर किये हुए ऊँचे ऊँचे वृक्षों को जो उस प्रचण्ड पवन का मार्ग रोकने की चेष्टा करते हैं, जड़ से उखाड़ देते हैं। परन्तु नन्हें कोमल हरे भरे छोटे छोटे पौधेअन्धेरी के सामने तुरन्त झुक जाते हैं। वह तूफान बड़ी शान्ति से उन्हें दुलराता हुआ निकल जाता है। इसी प्रकार अभिमान रहित, विनम्र स्वभाव के जो मनुष्य होते हैं परन्तु अपने आत्मबल के धनी-वे भी माया और महाकाल की कितनी भयंकर चोटें भी क्यों न सहनी पड़ेंअपनी सहज मुस्कान से उन्हें झेल लेते हैं। वे "कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाय' वाली उक्ति को अचरितार्थ कर देते हैं उनमें सच्चरित्रता की अदम्य शक्ति होती है। उनके नयनों में अपने इष्टदेव जी की श्री छवि का निवास होता है। उनके ह्मदय में इष्टदेव जी के चरण कमलों का अनन्य प्यार भरा होता है। वे आत्म संयम के धनी होते हैं।
     बंगाल के परम कृष्ण भक्त श्री गौरांग महाप्रभु जी के जीवन में एक घटना आती है कि वे प्रभात में गंगा तट पर प्रतिदिन स्नान करने जाते थे। मार्ग में एक छात्रावास था जहां कुछ विधर्मी बालक निवास करते थे। एक दिन पता नहीं क्यों उनमें से जो चार लड़कों को चैतन्य जी से शरारत करने की सूझी। वे ज्योंं ही चार बजे स्नान करके छात्रावास के सामने से गुज़रे लड़कों ने उनपर जूठा पानी उछाल दिया। गौरांग शान्त रहे-उन्होंने उन्हें अपने मुख से एक शब्द भी न कहा-चुपके से लौट गये और भागीरथी में पुनः स्नान कर आये। उन चपल लड़कों ने फिर वही कुचेष्टा की-चैतन्य उलटे कदम लौट गये और स्नान कर लिया। उन धूत्र्त विद्यार्थियों ने भी आज चित्त में न जाने क्या ठान रखा था-भक्त जी के समीप आने पर फिर वही कुल्ले कर दिये-उनका जूठा पानी फैंकना और भक्त चैतन्य का बार बार नहा लेना- यह क्रम 108 बार तक चलता रहा-धन्य है उस विनय मूर्ति गौरांग की धीरता-सहिष्णुता और उनका अदम्य संयम वे तनिक भी न तिलमिलाये-माथे पर एक भी सिकुड़न न आई- मुखमण्डल शान्त और कान्त विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन चुके थे वे। कुदरत ने भी बड़ी उग्र परीक्षा ली उस प्रभुभक्त की-वे उद्दण्ड छात्र भी उस समय अपनी उच्छृंखला पर तुले रहे-जब अति हो गई-भगवान की भेजी हुई उस अग्नि परीक्षा में भक्त जी उत्तीर्ण हो गये तब 109 वीं बार जब गौरांग स्नान करके लौटे उन शठ लड़कों ने उनके चरण पकड़ लिये और अपनी ढिठाई की क्षमा माँगी और भविष्य के लिये उद्दण्डता न करने का व्रत ले लिया। यह है नमन का प्रताप और फल। चैतन्य केवल मुस्करा दिये उनकी करतूत पर और अपने इष्टदेव भगवान श्री कृष्ण जी
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की उस अद्भुत लीला के ध्यान में ही मग्न हुए अपने स्थान पर लौट आये।
     अपने मालिक से प्रार्थना करना-परमात्मा की स्तुति और उपासना इसी "नमन' सोपान के ही अंग हैं जो दम्भ-दर्प-अभिमान से भरा है उसे प्रार्थना करने का विचार ही नहीं आ सकता। उस में अज्ञान, अविद्या कूट कूट कर भरे हैं। उसके मुख से प्रभु प्रार्थना के स्थान पर ये शब्द सुने जाते हैं किः-""मैं बड़ा धनवान हूं, बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान इस धरती पर दूसरा कौन है मैं यज्ञ करुँगा,दान दूंगा गुलछर्रे उड़ाऊँगा इस प्रकार की डींगें ऐसे अज्ञानी लोग मारा करते हैं। ऐसे मद्मत्त लोग हिरण्यकशिपु के समान अपने को ही भगवान मानने लगते हैं। दुर्योधन की न्यार्इं धन-ऐश्वर्य और अधिकारों के मोह में अन्ध हुए अपने मानुष जन्म को व्यर्थ में गँवा देते हैं। परन्तु जो उत्तम संस्कारी हैं उनका जीवन ही किसी और साँचे में ढला होता है वे अपने अन्तर्मानस में इन दिव्य गुणों को पनपाया करते हैंः-
                अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
                दया भूतेष्वलोलुप्त्वं , मार्दवं ह्यीरचापलम्।। गीता 16/2
अर्थः- वे मन, वाणी और कर्म से किसी प्रकार का कष्ट किसी को नहीं दिया करते, अपने अन्तःकरण और इन्द्रियों द्वारा जैसा निश्चय किया हो वैसे का वैसा प्रिय शब्दों में कह देते हैं। ये होते हैं अहिंसा और सत्यप्रिय मानव। अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध नहीं करते। अपने किये हुए कर्मों में कत्र्तापन का अभिमान नहीं करते। उनका चित्त चञ्चल नहीं होता। किसी की निन्दा इत्यादि नहीं करते। सब भूत प्राणियों में दया करना-इन्द्रियों से आसक्ति न रखकर वे उनका संसार में सदुपयोग करते हैं। उनका चित्त कोमल होता है। उन्हें लोक और शास्त्र की मर्यादाओं का उल्लंघन करने में लज्जा प्रतीत होती है। वे बिना किसी उद्देश्य के कोई भी कार्य नहीं किया करते। हर एक कार्य में उनकी वृत्ति अपने मालिक की प्रसन्नता को मुख्य रखती है। तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
                 भवन्ति  संपदं  दैवीमभिजातस्य  भारत।।
अर्थः-तेज-क्षमा-धैर्य-पवित्रता-किसी में शत्रुभाव न होना-अपने को बड़ा न समझना यह होता है स्वभाव उन निर्मल आत्माओं का जो शीलवान होती हैं।
     नमन-विनय और शील ये तीनों शब्द एक ही विनम्रता के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। ""सकल गुणभूषा च विनयः'' सब गुणों का ऋंगार विनय है। विनय शीलता का अनुकरणीय आदर्श भक्त प्रह्लाद के प्रशंसनीय चरित्र में देखा जा सकता है। जितनी विपदाओं ने आकर उसके धैर्य की भलीभांति परीक्षा ली है उतनी शायद ही किसी अन्य के जीवन में आई होंगी। मृत्यु के क्रूर पञ्जों ने रह रहकर उसको दबोचना चाहा था परन्तु अगाध धैर्य का धनी प्रह्लाद कमल पुष्प के समान मुस्कराता ही रह गया। भगवत्कृपा ने उसका बाल तक बांका होने न दिया। हाथी-सर्प-समुद्र-पर्वत और अग्नि तक भी उसे अपनी लपेट में न ले सके। उसके पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपु की उसको यमलोक पठाने में कोई दाल न गली-वह मानों काल का भी काल बन गया। कारण यह कि इतने भीषण काण्डों में भी उसकी सुरति भगवान के चरणों में लिपटी रही। यह है "नमन' का अलौकिक आदर्श। प्रभु भक्तों की ओट कुल मालिक स्वयं बन जाते हैं।इसी शील की महिमा परमसन्त श्री कबीर जी ने इस प्रकार गायन की हैः-
                शीलवन्त सब तें बड़ा, सर्व रतन  की खानि।
                तीन लोक की सम्पदा, रही शील में  आनि।।
                ज्ञानी  ध्यानी  संजमी ,  दाता  शूर  अनेक।
                जपिया-तपिया बहुत हैं, शीलवन्त कोउ एक।।
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नमन के दिव्य आदर्श को अवतारी पुरुषों ने भी अपने जीवन से दर्शाया है। भगवान श्री राम जी नीच
कुलोत्पन्न शबरी के जूठे बेर तक भी सहर्ष ग्रहण करते हैं। कितनी उदारता और ह्मदय की विशालता भरी
थी उनके पवित्र चरित्र में। हस्तिनापुर में जब युधिष्ठिर जी राजसूय जज्ञ रचाते हैं तब सब भाइयों ने और बन्धु-बान्धवों ने अपने अपने लिये सेवा कार्य चुना-योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान (जिनकी उस यज्ञ में अग्रिम पूजा की गई थी) ने ऋषि मुनियों के जूठे पत्तलों उठाने की सेवा का भार लिया था। धन्य है आपकी सुजनता और विनयशीलता। उस युग में रथ चलाने वालों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। परन्तु भगवान स्वयं अर्जुन के सारथि बन जाते हैं। यह है दीनता और गरीबी का उच्चादर्श।
     सारांश यह कि "नमन' भक्ति के मन्दिर में प्रवेश करने का सर्वोत्तम सोपान है।

Sunday, June 19, 2016

बुरी संगत छोड़ो


""जिस मनुष्य का पूर्ण सद्गुरुदेव जी के साथ सच्चे प्रेम का नाता है उसकी संगत करने से तुम्हें परमार्थ का लाभ होगा। और जो मनुष्य पहले कभी सद्गुरु का प्रेमी था किन्तु अब उसने प्रेम की तार को तोड़ दिया है-उसकी संगति करने से तुम्हें सरासर हानि होगी। जैसे बिजलीघर से बिजली तारों के द्वारा आती है और अन्धेरे को हटाकर प्रकाश करती है जैसे जलकूप से जुड़ी हुई टुटियों में से घर बैठे पानी मिल जाता है वैसे ही परिपूर्ण सद्गुरु जो परमार्थ के भण्डार होते हैं उनके साथ पूरी पूरी सुरति की धारा जोड़ने से परमार्थ का धन सहज ही में उपलब्ध हो जाता है। जो भी भाग्यवान सब ओर से सुरति की धारा को समेट कर गुरु-शब्द से जोड़ देता है वह भी एक प्रकार का अध्यात्म शक्ति का भण्डार बन जाता है। वह न केवल इससे अपना भला करता है अपितु जो भी उसके साथ प्रेम का सम्बन्ध रखता है वह भी परमार्थ के धन का पात्र बन जाता है।
     आप लोगों ने बहुधा "काफला' देखा होगा, उसमें जैसे ऊँटों की कतार एक दूसरे से जुड़ी रहती है और सैंकड़ों ही ऊँट एक ही रस्सी में बँधे हुए ठीक मार्ग पर चले जाते हैं वैसे ही गुरुमुख की संगति करने से हज़ारों लाखों को रंग लग जाता है और वे स्वार्थी से परमार्थी बन जाते हैं परन्तु इस मार्ग में यह बात अवश्य है कि यह भक्ति की तार बहुत सूक्ष्म होती है। मन और माया के हिचकोले आने से यह बीच बीच में कहीं कहीं टूट भी जाती है-ऐसी दशा में वह जीव हरे भरे होने की जगह कुम्हलाने लगता है अर्थात् वह भक्ति के धन से खाली होने लगता है। खाली घड़ा बजने में तो भरे हुए से भी अधिक आवाज़ देता है परन्तु अन्दर से खोखला ही होता है- इसी तरह भक्ति से हीन लोग रीते कलश के समान बड़े वाचाल होते हैं। ऐसी अवस्था में सेवक को बड़ा सतर्क होकर रहना चाहिये और इसीलिये हमें भी श्री सद्गुरु दीन दयाल जी सावधान करते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि तुम अपने ध्येय स्थान पर न पहुँच कर बीच में ही भटक जाओ।
     किसी दिन सन्ता और बलवन्ता रागी जो दिन रात श्री गुरु महाराज की महिमा गाया करते थे उनकी निन्दा करने लगे। जब स्वार्थ के आकर्षण ने उनकी परमार्थ की झीनी तार को तोड़ दिया तो अब कोई यह विचार करे कि ये दोनों तो बड़ी रमणीय कथाएं सुनाते हैं इन्हें पूरी गुरुवाणी कण्ठस्थ है; स्वर भी इनका सुमधुर है, गला भी साफ है, पक्के सुरताल से गाते हैं आदि आदि। यह विचार उसका नितान्त मिथ्या है। ये सबकी सब सुन्दरताएं ऐसी ही समझिये जैसे पत्थर की बनी हुई नकली आँख-जो देखने में तो असली आँख से भी सुन्दर लगती है परन्तु उसमें ज्योति नहीं होती।
     परमार्थ के अभिलाषियों को ऐसे लोगों की संगति से दूर रहना चाहिए। कितने ही दुर्बल विचारों वाले इनके खिलाने-पिलाने के प्रलोभनों में फँस कर पुराने परिचयों के आधार पर इनसे मन के तार जोड़ बैठते हैं। रसना के रस तो उन्हें अवश्य प्राप्त होते हैं किन्तु उनकी पारमार्थिक हानि हो जाती है। उन लोगों को भी उस मूर्ख मनुष्य के सदृश समझना चाहिए जो अपने साये के आगे तो अच्छे अच्छे पदार्थ खाने के लिये रख दे और स्वयं विष भक्षण कर लेवे क्योंकि देह तो वस्तुतः आत्मा के समक्ष छाया रुप है उससे बढ़कर नहीं? उसी शरीर के पालन-पोषण के अधीन होकर आत्मा की उपेक्षा करना अबुद्धिमत्ता नहीं तो और क्या है? इसलिये सच्चे परमार्थी को सच और झूठ का, शरीर और आत्मा का भलीभांति निर्णय करके दृढ़ संकल्प के साथ आत्मिक उन्नति का ध्यान रखना चाहिये। जिन कर्मों से, जिन विचारों से, जिस बोलचाल से आत्मा का उत्कर्ष हो वे ही कर्म, वे ही विचार और वही बातचीत रखनी चाहिये। प्रायः कहा जाता है "जैसा अन्न वैसा मन्न' हर एक की संगति में बैठकर गप-शप लगाना या बिना सोचे-समझे जैसी
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तैसी मण्डली में सम्मिलित हो जाना औैर उलटी-सीधी बातें अपने कानों में डालते रहना-यह अपनी आत्मा
के साथ अत्याचार करना है। वास्तविकता तो यह है कि जिसका मन पूरी तरह गुरु-वचनों में लगा होता है वही सच्चा परमार्थी है। ऐसा मानव सिवाय पूरे सद्गुरु से और किसी से मैत्री का नाता जोड़ता ही नहीं। ऊपर ऊपर से चाहे वह सबके साथ व्यवहार करता है किन्तु दिल की एक तार भी कहीं नहीं जोड़ता ऐसा सेवक ही गुरु का विश्वास पात्र बन जाता है। उसे ही गुरुदेव आध्यात्मिक-कोष की कुञ्जी सौंप देते हैं। अपनी चरण-शरण की छाँव में उसे रखकर कृतकृत्य कर देते हैं और फिर उस की रात दिन सँभाल भी करते हैं। जैसे कि श्री रामभगवान भक्त विभीषण जी से कथन करते हैंः-
                सबके  ममता  ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
                अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी ह्मदयँ  बसइ धनु जैसें।।
ऐसे सज्जनों से जिन जिन भाग्यशालियों का प्रेम जुड़ जाता है उनकी सँभाल भी भगवान अपने प्रेमियों की बदौलत करते हैं। गुरु वाणी का वाक हैः-
                नानक धूड़ मँगे तिस गुरु सिख की, जो आप जपै अवराँ नाम जपावै।।
महापुरुष कितना ऊँचा दर्ज़ा देते हैं उस शिष्य को जिसकी सुरति अपने नाम शब्द से जुड़ी हुई है और जो अन्य टूटे हुए जीवों को भी जोड़ता है। अतएव  प्रत्येक परमार्थ के इच्छुक को संगति का विशेष विचार रखना चाहिये। जिस संगति से गुरु चरणों का प्रेम बढ़े और गुरुभक्ति के सिद्धान्तों में दृढ़ता मिले उस संग को किसी दशा में भी त्यागना नहीं चाहिये चाहे कितनी कठिनाइयों का सामना क्यों न करना पड़े। और इसके विपरीत बहिर्मुखी और चंचल चित्त वालों की संगति में कितने शारीरिक सुख भी क्यों न मिलें पर इन सुखों को ठोकर मार कर उनकी संगति से दूर रहना चाहिये। जैसा कि परमसन्त श्री कबीर साहिब जी का कथन हैः-    कबीर  संगत  साध  की , जौं  की भूसी खाय।
                खीर खाण्ड भोजन मिले, साकट संग न जाय।।
                कबीर साधु का संगति रहो,जौं की भूसी खाओ।
                होनहार  सो  होइ  है,  साकत संग न जाओ।।
आप ही निर्णय करो कि एक मनुष्य तुम्हें खीर-खाँड में विष घोल कर पिलावे वह अच्छा या जौ की भूसी में अमृत मिला कर पिलावे वह अच्छा? अन्तर से स्वयं ही उत्तर आएगा कि विष तो जीवन ले लेगा और अमृत तो अमर बना देगा।
     इसी कारण ही महापुरुषों ने भक्तिहीन के स्वादिष्ट व्यञ्जनों को त्याग कर भक्ति वालों के सादे भोजन को पसन्द किया। भगवान श्री कृष्ण जी ने दुर्योधन के अच्छे पदार्थों को छोड़कर विदुर जी का साग बड़े प्रेम से खाया। श्री गुरुनानक देव जी ने मलिक भागो के रसमय भोजनों को ठुकरा कर लालो भक्त के घर की सूखी रोटियां खाकर हमें पाठ पढ़ाया कि पहले मनुष्य की परीक्षा करो पीछे उनके साथ उठने-बैठने, खाने पीने का नाता जोड़ो। जिस संगति में भाव-भक्ति और भय बढ़े उसी मण्डली में अपनी मान-बड़ाई को छोड़कर सम्मिलित हो जाओ। जिस मण्डली में निन्दा, चुगली, खुशामद, चापलूसी, देखो उससे अपना बचाव करो। उसके सांसारिक गौरव को न देखो परमार्थ की और दृष्टि रखो। जिसका सद्गुरु देव जी के वचन से नाता जुड़ा होगा उसके अन्तह्र्मदय में शान्ति होगी, उसके संग से तुम भी शान्त हो जाओगे। जिसके मन में सन्देह, संशय और भ्रम होंगे वह स्वयं भी अशान्त, व्याकुल, और उद्विग्न होगा-उसकी संगति से सुख-शान्ति की आशा रखना अपने समय को व्यर्थ में गँवाना है। ऐसा विचार कर अपने मूल्यवान समय का  आदर करो।

Friday, June 17, 2016

ख्यालों पर निर्भर


यदि किसी मनुष्य को दुनिया के सब भोग्य-पदार्थ और शारीरिक सुख सामग्री उपलब्ध हो जाये, संसार की प्रत्येक वस्तु, माया का हर एक वैभव उसके पास हो; इतना कुछ होते हुए भी वह विश्वास और दावा से नहीं कह सकता कि उनको पाकर मैं सुखी हो गया हूँ, मुझे शाश्वत् सुख मिल गया है; इसके बाद कभी दुःख नहीं आयेगा। ऐसा देखने में नहीं आया कि दुनिया के सब पदार्थ एकत्र कर इन्सान को सच्चा सुख और शान्ति मिल जाए अथवा दुःखों से छुटकारा हो जाए------ऐसा कोई प्रमाण अथवा उदाहरण नहीं।          पुरातन इतिहास से और आधुनिक समय में इन्सान स्वयं अनुमान लगा सकता है कि पहले राजा-महाराजा, अमीर     व प्रतिष्ठित----जो भी हुए हैं, उनके पास सुख-वैभव के प्रचुर सामान थे। किसी बादशाह के पास सुख सामग्री के सामानों की कोई कमी नहीं थी। परन्तु उनकी आन्तरिक दशा पर ध्यान दिया जाए तो वे दुःखी प्रतीत होते हैं। महापुरुषों ने सोध सोधकर वचन लिखे हैं।
सगल  सृसटि  को  राजा  दुखीआ ।।
हरि का  नामु  जपत  होइ  सुखीआ ।।
                                गुरुवाणी
सारी सृष्टि का राजा------जिसके पास हर प्रकार के सुख ऐश्वर्यों के सामान उपलब्ध हैं, फिर भी वह दुःखी है। इससे विदित होता है कि दुनियावी पदार्थों में सुख नाममात्र भी नहीं। वह सुखदायी वस्तु कौनसी है जिसे पाकर इन्सान सुखी हो जाए। जिस सुख शान्ति की प्राप्ति के बाद दुःख न उठाना पड़े, कष्ट-क्लेश न सतायें। सत्पुरुषों के अनुभव एवं आचरणमय जीवन के अनुसार वेदों-शास्त्रों व ग्रन्थों में प्रमाण मिलते हैं, जिसे पढ़ सुनकर आचरण करते हुए इन्सान सही अर्थों में सुखी हो सकता है और दुःखों से छुटकारा मिल सकता है। वह कौन सी चीज़ है? वह है मालिक की भक्ति, प्रभु का भजन-----जिसकी कमाई करने से जीव को कोई दुःख--क्लेश नहीं व्याप सकते। महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। चौपाई ।।
भगति  तात  अनुपम  सुख  मूला ।
मिलइ  जो  संत  होइँ  अनुकूला ।।
राम  भगति मनि  उर  बस  जाके।
दुख  लवलेस  न  सपनेहुँ  ताके ।।
चतुर  सिरोमनि  तेई  जग  माहीं ।
जे मनि लागि सुजतन कराहीं ।।
                       श्री रामचरितमानस
भक्ति ऐसी बेमिसाल है जिसकी तुलना इन्सान पदार्थों से करना चाहे तो कर नहीं सकता। कहे कि अमुक वस्तु में इतना सुख है और भक्ति में इतना-----यह तुलना हो ही नहीं सकती। भक्ति की प्राप्ति पर निरन्तर सुख, आनन्द व शान्ति इन्सान प्राप्त कर सकता है। परन्तु यह मिलती कैसे है? सत्पुरुषों की संगति एवं उन की आज्ञा व मौज अनुसार जीवन बनाने से ही जीव को प्राप्त होती है। जिसके ह्मदय में भक्ति का वास हो जाए उसे स्वप्न में भी दुःख, क्लेश, चिन्ता नहीं व्याप सकते। यह मिलती किसको है अर्थात् इसके ग्राहक कौन हैं? इस को पाने की अभिलाषा किसे होती है? वे भी केवल विशेष-विशेष प्रेमी संस्कारी रूहें आप जैसे भाग्यशाली गुरुमुख होते हैं, जिन्हें सत्पुरुषों की संगति मिल जाती है। जिनके दिल में सच्ची लगन व जिज्ञासा होती है। जिनके पूर्बले संस्कार ऐसे होते हैं और सांसारिक पदार्थों से उपरामता होती है------उन्हें ही सत्पुरुषों की सुसंगति का ऐसा संयोग मिलता है जिसके द्वारा वे भक्ति को सहज स्वभाव ही पा लेते हैं।
विचार करके देखा जाए, वही सयाने, बुद्धिमान और चतुर हैं जिनके दिल में ऐसी सच्ची लगन, ऐसी ऊँची भावना उत्पन्न होती है। वे मालिक की भक्ति को पाकर जीवन को सार्थक और सफल बना लेते हैं। उन्हें ही सच्ची वस्तु भक्ति प्राप्त है। वही भाग्यवान और संस्कारी हैं जो इसे प्राप्त करने के प्रयत्न में निरत रहते हैं।
इस अनुपम भक्ति को गुरुमुख ही प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। दुनिया में अनेकों इन्सान हैं जो अपने कामों में मन के ख्यालानुसार गलतान हैं। उनकी सुरति मायावी धन्धों में इसतरह लिप्त है कि उनको यह ख्याल ही नहीं आता कि भक्ति भी कोई चीज़ है जिसे पाना मनुष्य का कर्तव्य है। संसार में रहते हुए तथा कार्य व्यवहार करते हुए प्रत्येक मनुष्य दुःखी व परेशान है। फिर भी वे भक्ति की चाहना नहीं करते, चूँकि उनके इतने ऊँचे संस्कार नहीं हैं कि वे मालिक की अनन्य भक्ति के इच्छुक हों।
यह इन्सान के कई जन्मों के शुभ संस्कार होते हैं, पूर्व जन्मों की कमाई होती है जिससे उनके दिल में भक्ति की लगन जागरूक होती है कि मैं मालिक की भक्ति करूँ। पहले वे भी संसार में रहते थे और दुनियादार थे परन्तु अब वे गुरुमुख हैं। संसार में रहते हुए उनके ख़्यालों और गुरुमुख बनने के बाद ख्यालों में कितना अन्तर आ गया है। बाहरी वेष-भूषा, खान-पान व कार्य-व्यवहार चाहे एक सामान नज़र आते हैं परन्तु अन्तरीव तौर पर उनके ख्याल और विचार भिन्न भिन्न है। संसारियों की हार्दिक तीव्र इच्छा धन-           पदार्थ, मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करने की होती है परन्तु गुरुमुखों के दिल में यह इच्छा नहीं होती। उनके दिल में एक ही लगन होती है कि सत्पुरुषों की संगति मिले, उनके दर्शन प्राप्त हों तो सेवा का सौभाग्य मिल जाय। नाम-भजन की कमाई का सुअवसर मिले------यही गुरुमुखों के ख़्याल और विचार होते हैं। कुदरत की ओर से उनका ऐसा प्रबन्ध भी हो जाता है।
इन्सान जिस प्रकार के ख्याल उठाता है, कुदरत की ओर से वैसा प्रबन्ध भी हो जाता है। जैसा धरती में बीज बोया जाता है, वैसा ही उगता है। गुरुमुखों के दिल में भक्ति की प्राप्ति का ख्याल उत्पन्न हुआ, कुदरत ने वैसा प्रबन्ध कर दिया। गुरुमुख मालिक की भक्ति करके लक्ष्य को पूर्ण कर लेता है।
सत्पुरुषों की संगति में आने से ज्ञान का प्रकाश मिलता है जिससे इन्सान को वास्तविक अर्थों में निरख-परख और हानि-लाभ का पता चलता है कि भक्ति करने में भारी लाभ और न करने में काफ़ी हानि है। मानुष-जन्म इसीलिए मिला था कि इन्सान भक्ति करके अपने कुल मालिक भगवान से मिल जाए। वह यही अवसर है कोई और नहीं। मानव-तन में यही काम करना है। यह कोई साधारण काम नहीं जिसे इन्सान छोड़ दे या यह अवसर दूसरी बार मिल जायेगा। यदि थोड़ा नुकसान हो तो पूरा हो सकता था। न ऐसा अवसर दोबारा मिलना है और न ही यह घाटा पूरा हो सकता है। यदि इन्सान भक्ति से वंचित रहा और इस तन की कीमत न पहचानी तो मानव-जन्म से गिरकर चौरासी लाख योनि भुगतनी पड़ेगी। महापुरुषों का कथन है------
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ।।
नानक नामु समालि तूँ सो दिनु नेड़ा आइओइ ।।
                                    गुरुवाणी
चौरासी लाख योनियों के बाद यह मानुष-जन्म मिला है। इसको पाकर यदि नाम की कमाई नहीं की तो वह दिन समीप आ रहा है जबकि पुन: चौरासी में जाना पड़ेगा। कुदरत ने अनमोल देह प्रदान की, यदि इस समय में अपना कार्य न किया, लक्ष्य की प्राप्ति न की तथा भक्ति का साधन न अपनाया तो इन्सान को इसका बदला चुकाना पड़ेगा। महापुरुषों ने जो नियम निर्धारित किये हैं, यदि उनपर यह चलेगा तो जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। यदि इन्सान का मन विषय-विकारों में रमा रहा, सारा जीवन इसी में ही व्यतीत कर दिया तो अवश्य ही नुकसान होगा। परन्तु यदि भक्ति में लग गया तो ऐसा सुख व आनन्द एवं दर्जा मिलेगा जिससे मोक्षपद की प्राप्ति होगी और आत्मा मालिक से एकाकार हो जायेगी। महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। चौपाई ।।
जिमि  थल  बिनु जल रहि  नसकाई।
कोटि  भांति  कोउ  करै  उपाई ।।
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई ।
रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ।।
                        श्रीरामचरितमानस
जैसे ज़मीन के बिना पानी नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकार के यत्न कर ले। ऐ गरुड़ जी! इसीप्रकार मोक्ष का सुख मालिक की भक्ति के बिना नहीं मिल सकता। अर्थात् जहां पर भक्ति होगी, वहीं पर सच्चा सुख होगा, अन्यत्र नहीं। इसीलिए भक्तिवान ही चतुर सयाने होते हैं। गुरुमुख ही सोच सकते हैं कि भक्ति करने और न करने में कितना लाभ व कितनी हानि है। गुरुमुखों को साधन प्राप्य हैं, जो कि अत्यन्त सरल हैं। इनका भलीभांति परिपालन करके लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं। तथा भगवान से एकाकार होकर जीवन को सार्थक कर सकते हैं।
यह सुअवसर भाग्यशाली गुरुमुखों को मिला हुआ है। सत्पुरुषों की संगति एवं संयोग उपलब्ध है और भक्ति के सुगम नियम निर्धारित हैं जिनको अपनाने से जीव अपने कार्य को सिद्ध कर सकता है। गुरुमुख इन नियमों का पालन करते हुए अपने जीवन को सफल बना लेते हैं और जन्म को सार्थक कर लेते हैं।

Saturday, June 11, 2016

सच झूठ की परख


इस द्वन्द्वमयी संसार में कुदरत ने दोनों चीज़ें उत्पन्न कर दी हैं------सत् और नित्य पदार्थ, असत् व अनित्य पदार्थ। दोनों चीज़ें संसार में उपलब्ध हैं, दोनों की तासीर भी अलग-अलग है। जो सत् और नित्य वस्तु है, उसको ग्रहण करने से इन्सान को सुख, शान्ति मिलती है। असत् और अनित्य पदार्थ मिल जाने पर दुःख और अशान्ति का सामना करना पड़ता है। दोनों पदार्थ तो मौजूद हैं परन्तु देखना यह है कि सुख और खुशी देनेवाले सत् व नित्य पदार्थों को कौन चाहता है और असत् व अनित्य पदार्थों का ग्राहक कौन है? आम दुनिया का रुख़ और मांग झूठे पदार्थों तथा न·ार सामानों की ओर है। उनको चाहने वाले लोग अधिक हैं। जैसेकि महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। दोहा ।।
सब जग वणजे खार खल, हीरा कोई न लेय ।
हीरा  लेवे  जौहरी, जो  मांगे  सो  देय ।।
दुनिया के तुच्छ पदार्थ खार खल हैं अर्थात् सार वस्तु के निकल जाने पर जो छिलका शेष रह जाता है उस के बराबर हैं। इसीलिए सांसारिक पदार्थों की तुलना खार खल से की गई है। इसको चाहने वाले सारे संसारी लोग हैं। हीरा रूपी भक्ति, नाम जो सत् वस्तु हैं; उसको चाहनेवाले विरले-विरले संस्कारी जीव हैं। इस बात की समझ किसको आती है कि सत् वस्तु में सुख भरा हुआ है, केवल संस्कारी गुरुमुखों को। इसको सब क्यों नहीं चाहते? क्योंकि उनकी इसतरह की समझ ही नहीं और न ही उनको ऐसा सत्संग मिला है।
इन्सान चाहता है कि मुझे सुख व शान्ति मिले, परन्तु जब सुख शान्ति का सवाल पैदा होता है, इन्सान की समझ काम नहीं करती। बाहरी स्थूल चीज़ों की चमक-दमक व उसमें थोड़े समय के सुख की झलक देख कर इन्सान उनपर मोहित हो जाता है। चूँकि सत् पदार्थ की उसको समझ ही नहीं है। कारण क्या है? कारण यह है कि असत् पदार्थ सब माया की रचना हैं। ये सब दृश्यमान हैं। इन बाह्र चीज़ों को देखकर इन्सान भूल जाता है। जो सत् वस्तु है वह इसे नज़र नहीं आती, न ही उसका इसे ज्ञान और विचार है। इसीलिए भ्रम में झूठी चीज़ों की चाहना कर धोखा खा जाता है।
इन्सान चाहता तो है कि मुझे सुख मिले, परन्तु ऐसा कोई बाज़ार नहीं, नगर नहीं, प्रदेश नहीं जहां मायावी पदार्थ पाकर सच्चा आनन्द और सुख मिले। इनमें क्यों सुख नहीं? दृष्टमान जितने भी मायावी पदार्थ हैं, इनमें दुःख भरा हुआ है। इनकी तासीर ही दुःखदायक है। मालिक के नाम और भक्ति में सुख ही सुख भरा हुआ है। यदि कोई इन्सान कहे कि नाम और भक्ति मुझे बाज़ार से या शहर से नहीं मिल सकती ? सत्पुरुष फ़रमाते हैं कि वह हर स्थान पर मौजूद है; इस घट के अन्दर भी है। जिज्ञासु पुरुष जिनके ऐसे संस्कार हैं, जिन्हें जागृति आ गई हो, उत्कंठा उत्पन्न हो गई हो, उनको यह सुखवाली नाम और भक्ति मिल जाती है।
संसार में जब सुख-दुःख दोनों हैं तो सुखदायक वस्तु भी मिलनी चाहिए। उनकी मांग के अनुसार कुदरत उस का प्रबन्ध कर देती है। उन्हें ऐसा साधन मिल जाता है जिससे वे घट में ही सच्ची वस्तु को पा लेते हैं। परन्तु वह साधन कहां से मिलता है? जब जिज्ञासु की तीव्र मांग होती है तो सत्पुरुषों का मिलाप हो जाता है, उनकी संगति उपलब्ध होती है। क्योंकि यह सौदा, यह सच्ची वस्तु सत्पुरुषों के दरबार से ही मिल सकती है। अन्यत्र नहीं मिलती। अन्य कहीं से प्राप्त करने का प्रयत्न विफल होता है।
अब मानव--तन जीव को प्राप्त हुआ है। अल्पायु में वह चीज़ प्राप्त करनी है जो इसकी अपनी मांग है। जब तक इस जीवन में उसे प्राप्त नहीं करेगा, इसका लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। मानव-जन्म को धारण कर उस सच्ची वस्तु को प्राप्त कर ले जो सुखदायी हो और मानव-जन्म भी सफल हो सके। कुदरत ने तो पहले ही दोनों चीज़ें उपलब्ध कर दी हैं, दोनों साधन प्रदान किए हैं। दुनिया में मिथ्या पदार्थ भी मिल जाते हैं और जिज्ञासु को सत्पुरुषों से सच्ची वस्तु नाम और भक्ति की सम्पदा भी मिल जाती है।
प्रत्येक इन्सान अनुमान लगा सकता है कि यदि सच्ची और सुखदायक, झूठी और दुःखदायक------दोनों चीज़ें उपलब्ध हैं तो कौन ऐसा प्राणी होगा जो झूठी व दुःखदायी चीज़ को लेकर सुखदायक वस्तु को छोड़ देगा। फिर क्यों आम दुनिया दुःखदायी वस्तु ग्रहण करती है? क्योंकि उन्हें सुखदायी वस्तु की परख नहीं, झूठी वस्तु को सत्य समझकर ग्रहण करते हैं और दुःखी हो जाते हैं।
जब सत्पुरुषों की संगति से उसे यह परख हो जाती है तो फिर वह झूठे पदार्थों को नहीं लेता बल्कि सच का ग्राहक बन जाता है और सच्ची वस्तु को प्राप्त करने का इच्छुक होता है। जैसाकि पहले कहा गया है------"हीरा लेवे जौहरी, जो मांगे सो देय'। हीरा रूपी भक्ति लेने के लिए पुन: वे तन-मन-धन समर्पण करने में संकोच नहीं करते। जैसे दुनिया की मार्केट में सौदा करना हो तो दाम चुकाना पड़ता है। सच्ची वस्तु के ग्राहक को बदले में कुछ देना होगा। जीव के पास तन-मन-धन और माया के झूठे पदार्थों के अतिरिक्त है ही क्या? यदि सच के बदले में देने भी पड़ें तो लाभ ही लाभ है, इसमें हानि ही क्या है? जैसे महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। दोहा ।।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।
                    परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
यह शरीर पांच तत्त्व का पुतला है। इसमें गन्दग़ी भरी हुई है। यदि इसका उपयोग सही ढंग से किया जाय और सत्पुरुषों की संगति ग्रहण कर सच्ची वस्तु लेने में संकोच न करे क्योंकि इसमें हानि नहीं। झूठी वस्तु के बदले सच्ची वस्तु मिले, यहां भी साथ रहे और परलोक में भी साथ दे, इससे ज़्यादा लाभप्रद सौदा फिर कौनसा होगा?
आप अपने दिल में अनुमान लगायें कि आम संसारी इस शरीर के बदले क्या प्राप्त कर रहा है और गुरुमुखों को क्या प्राप्त हो रहा है? गुरुमुखों को सच्चे नाम का सरमाया मिला है जो लोक परलोक में काम देता है और आम संसारी झूठी माया एकत्र कर रहे हैं, जो यहां भी दुःख का कारण है और परलोक भी उनका बिगड़ जाता है। महापुरुषों का कथन है-----
सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि सासि समाले।।
इह लोक परलोकि संगि सहाई जत कत मोहि रखवाले।।
गुर का बचनु बसै जीअ नाले ।।
जलि नही डूबै तसकरु नही लेवै भाहि न साकैजाले ।। 1 ।। रहाउ
                                     गुरुवाणी
सद्गुरु का शब्द ऐसी सच्ची वस्तु है, ऐसा सच्चा सरमाया है जिसे कोई ख़तरा नहीं। दुनिया की प्रत्येक चीज़ को भय है। सद्गुरु का शब्द व नाम ऐसा सच्चा सरमाया है कि जिसके ह्मदय में इसका वास हो जाये तो यहां भी हर जगह पर सहायक और परलोक में भी संगी।
आखिरकार इन्सान को यहां से कूच करना ही है, इस दुनिया को छोड़ना ही छोड़ना है। आगे इसके साथ क्या जायेगा? यदि सच्ची चीज़ खरीदी होगी तो सच्ची चीज़ जायेगी और यदि झूठे ख्याल होंगे तो झूठ संग जायेगा। झूठ के बदले चौरासी लाख योनियां और सच के बदले दरगाह में मान-प्रतिष्ठा मिलेगी।
यह बात अच्छी तरह से जान लो कि जीवन चार दिन का है। जीवन में कौनसी सच्ची वस्तु एकत्र करे जो अंग-संग रहे। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि असत् को दिल में स्थान न देकर सत् को ही ह्मदय मन्दिर में बसाना है। महापुरुषों ने जो नियम निर्धारित किये हैं, यह सच्चे नाम को ह्मदय में बसाने के साधन हैं। इनका नित्य प्रति सेवन कर माया की मलिनता को निकालना है। गुरुमुखजन सच्ची वस्तु मालिक के नाम को दिल में बसा कर जीवन को धन्य बनाकर इसे सफल कर लेते हैं।

Thursday, June 9, 2016

अपनी चीज़ की सम्भाल करो


समय गुज़रता जा रहा है। स्वाँसों की पूँजी समाप्त होती जा रही है और इन्सान समझता है कि मैंने कुछ बना लिया, कुछ जमा कर लिया। वह समझता है कि मैंने अनमोल समय में इन कीमती स्वांसों की पूँजी के बदले इससे बढ़कर धन बना लिया। माल-मिलकीयत जमा कर ली। विचार करके देखा जाये यदि यह कहे कि मैंने कुछ बना लिया तो सवाल यह उठता है कि क्या बनाया है? कुटुम्ब-परिवार, मित्र-सम्बन्धी बना लिये, मान-प्रतिष्ठा-पद प्राप्त कर लिया, धन-माल-मिलकियत आदि बना लिये। अनमोल जीवन के उपलक्ष में इसने ऊपरलिखित चीज़ें उपलब्ध कीं और बड़े गर्व से कहता है कि मैंने कुछ बना लिया।
ग़ौर किया जाय कि जिसपर इन्सान गर्व करता है वे सम्बन्धी, कुटुम्ब-परिवार, मित्र-बन्धु क्या इसका साथ देंगे? क्या हमेशा साथ रहेंगे या कि बिछुड़ जायेंगे? अथवा यह उनको छोड़कर चला जायेगा। दूसरी बात यह कि जो धन जमा कर लिया वह साथ जायेगा। क्या वह परलोक में सहारा देगा या इसके काम आ सकेगा? अथवा इसके श्वासों को बढ़ाकर चिरायु बना देगा अथवा श्वास धन के बदले में मिल सकते हैं? यह यहां धन छोड़कर चला जायेगा और माल-मिलकियत भी छूट जायेगी। मित्र-बन्धु, मिलकियत, मान-पदवी, धन-कुटुम्ब-प्रियजन------जबतक स्वांस हैं तबतक कह सकता है कि मेरी मिलकियत है, मकान है और मेरी ही सम्पत्ति है। जब श्वासों की पूँजी समाप्त हुई कि फिर अपना कुछ भी नहीं। सब चीज़ें यहीं रह जायेंगी। तो फिर इन्सान के पास क्या रहा? महापुरुषों ने फ़रमाया है------
।। दोहा ।।
अरब खरब लौ लच्छमी, उदय अस्त लौं राज ।
तुलसी जो निज मरन है, आवे कौने काज ।।
                    सन्त तुलसी साहिब जी
महापुरुषों ने फ़रमाया है कि यह थोड़ी सी सम्पत्ति की बात नहीं; अरबों खरबों तक धन-दौलत और सम्पत्ति हो; जहां से सूर्य उदय होता है और जहां अस्त होता है               अर्थात् सारी सृष्टि पर अधिकार हो। वह धन-दौलत, माल-मिलकियत किस काम की? जब उन चीज़ों का मालिक, उन्हें अपना समझनेवाला ही शरीर छोड़कर चला गया तो माल-मिलकियत व सब सामान किसके हुए? जीवन का समस्त प्रयत्न पुरुषार्थ व स्वाँसों की पूँजी इसमें खर्च कर दे और बदले में नाश्वान् पदार्थ इकट्ठे करता रहे-----जाते समय क्या ले जायेगा? कितना धन कमाया, परिवार बढ़ाया, माल-मिलकियत बना ली------वे सब तो यहीं रह गए परन्तु संस्कार उनके साथ चलेंगे। माया, कुटुम्ब, मान-इज़्ज़त के संस्कार इसको कहां ले जायेंगे। महापुरुष फ़रमाते हैं------
बहुत यत्न से धन कमाया, सिर पर बांधी पोट ।
कहै कबीर सत्तनाम बिन, सहैगा यम की चोट ।।
संसारी लोग तन-मन-धन की बाज़ी लगाकर धन इकट्ठा करते हैं। यदि सच्चे नाम की कमाई नहीं की तो काल के हवाले होगा। अन्तर में बसे हुए मोह ममता के संस्कारों के अनुरूप नरक योनियों को भुगतना पड़ेगा। इन्सान कहता है कि कमा लिया, बना लिया, जमा कर लिया------यह कमाई  कौनसी हुई? कमाई कौनसी की और क्या बनाना है? इसका इसको पता ही नहीं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि उनका रुख़ सही तरफ़ नहीं है। जो कमाई करनी थी, उसकी ओर ध्यान ही नहीं, बेगानी वस्तुओं की ओर अपना रुख़ किया हुआ है। महापुरुषों ने फ़रमाया है----
निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ।
नानक थिर हरि भगति है तिह राखो मन माहि ।।
                                  गुरुवाणी
किसी के कहने पर नहीं अपितु स्वयं अच्छी तरह विचार करो कि कौनसी वस्तु साथ जानेवाली है और इसकी तुलना इन्सान तभी कर सकता है जब इन्सान सत्पुरुषों की संगति में आता है। तब पता लग सकता है कि कौन सी चीज़ अपनी है और कौनसी परायी। मालिक की भक्ति ही संगी-साथी है।
अब विचार यह करना है कि सत् वस्तु की कमाई करे जो यहां भी सुख दे और अन्त में भी साथ जाए। कि जिस वस्तु को इन्सान इकट्ठा करने का पुरुषार्थ करे, वह धोखा दे और जब यहां से जाए तो नरक मिले। वह चीज़ अच्छी है या वह? एक ओर सुख मिले लाभ हो और दूसरी ओर हानि व दुःख मिले------इस बात का हरेक को विचार नहीं आता।
गुरुमुखों को सत्पुरुषों की संगति से यह विचार मिलता है कि माया की सामग्री अपनी नहीं है, इसमें लाभ नहीं है। यह सामान अपना होता तो साथ जाता और इन्सान आखिरी समय क्यों रोता। इसकी आत्मा का जिस चीज़ से कल्याण हो, वह अपनी है। अज्ञानी जीव भूला हुआ है। समय हाथ से निकल जाने पर पछताता है। सौभाग्य से गुरुमुखों को       ही सत्पुरुषों की सुसंगति का संयोग प्राप्त है। वे इसी समय में ही सब कुछ बना लेते हैं। महापुरुष जीव को होशियार करते हैं और मोह की नींद से जगाते हैं।
।। दोहा ।।
जब  चेतै जबही भला, मोह  नींद सूँ  जाग ।
साधू  की  संगत मिलै, सहजो  ऊँचे  भाग ।।
                          सन्त सहजो बाई जी
इन्सान को जब भी समझ आ जाय तो जागृति आ गई। यह जागृति कब आती है? जब ज्ञान की रोशनी मिलती है, तब विदित होता है कि मेरा अपना काम क्या है और मेरे साथ जानेवाली चीज़ कौनसी है? तब इन्सान अपने काम की ओर ध्यान देता है। जन्म-जन्मान्तरों से रूह दुःख उठा रही है, जबतक यह मालिक से नहीं मिल जाती, उसको चैन नहीं मिल सकता। महापुरुषों की संगति में आकर उन साधनों का पता चलता है जिससे कि रूह मालिक से मिल सकती है। वे साधन गुरुमुखों को उपलब्ध हैं। जिन्हें सही मार्ग मिल गया है वे अपने जीवन को सफल बना सकते हैं और संसार में सुखमय जीवन व्यतीत कर अपना परलोक संवार लेते हैं।
प्रत्येक प्राणी छोटे से बड़े तक यही चाहता है कि मेरा भविष्य उज्ज्वल हो। यदि समय गफ़लत में गुज़रता गया, बचपन से जवानी, जवानी से बुढ़ापा और बुढ़ापे से मौत तक कोई नेक काम न किया तो भविष्य क्या बना? यह इन्सान तो एक जन्म की सोचता है कि मैं धन कमा लूँ, परिवार बढ़ा लूँ, मिलकियत बना लूँ, परन्तु यह विदित नहीं कि जहां हमेशा रहना है उसके लिए क्या करना है। यही इन्सान की भूल और गुमराही है। इसीलिए ही काल की चोटें खानी पड़ती हैं। महापुरुष चेतावनी देते हैं------अभी चेत जाओ। यही समय है मालिक की भक्ति कमा लो। यही वस्तु साथ जानेवाली है, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी साथ नहीं जाएगा।
हरि बिनु तेरो को न सहाई ।।
कां की मात पिता सुत बनिता को काहू को भाई ।।1।।रहाउ।।
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई ।।
तन छूटै कछु संगि न चालै कहा ताहि लपटाई ।।
दीन दइआल सदा दुःख भंजन ता सिउ रुच न बढ़ाई ।।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ जिउ सुपना रैनाई ।।
                                     गुरुवाणी
महापुरुषों ने स्पष्ट बतला दिया है कि हरि अथवा सतगुरु के बिना तेरा कोई भी सहायक नहीं है। माता, पिता, पुत्र, मित्र, प्रियजन तथा भाई आदि----कोई भी किसी का नहीं है। धन-सम्पत्ति, धरती आदि सभी पदार्थों की गणना कर दी कि जिसमें तूने सुरति अटकाई है अथवा जिन्हें अपना समझा है; जब तेरा शरीर छूट जाएगा------ये तेरे साथ नहीं जायेंगे। दीनदयाल जो सब दुःखभंजन है, सर्व सुखों के प्रदाता हैं उनमें तेरी रुचि नहीं है जोकि अपनी   चीज़ है। करुणानिधान प्रभु जिसने मानुष पर असीम कृपा की है उससे नेह नहीं बढ़ाया, उनसे अपना नाता नहीं जोड़ा। झूठी वस्तुओं से दिल लगा रखा है। महापुरुष फ़रमाते हैं कि जो अपनी वस्तु है उसके साथ अपना नेह लगाओ, जो यहां भी सुख दे और परलोक में भी इन्सान के साथ जाय।
इन्सान की अपनी वस्तु कौनसी है? वह केवल मालिक का नाम है, सद्गुरु का सत् शब्द है, उनकी भक्ति है जिसके लिए मानुष-जन्म मिला है। माया की भूल-भूलैय्यां में पड़कर इन्सान भूल गया है। महापुरुष चेतावनी देते हैं कि ऐ इन्सान! जाग जा और अपनी वस्तु की संभाल कर। अपनी वस्तु को ग्रहण कर सच्चा सुख प्राप्त कर ले। तब यहां भी इन्सान सुखी हो जाए और परलोक भी संवार ले।

Tuesday, June 7, 2016

कर्म भूमि

कथा हैः- एक बार किसी सिंहनी ने वन में बच्चा दिया। संयोगवश उस समय सिंहनी वहाँ अकेली थी। उधर एक शिकारी उसी वन में आया हुआ था। जिस समय सिंहनी के बच्चा हुआ, उसी समय शिकारी ने किसी वन्यपशु पर बन्दूक दागी। बन्दूक का धमाका सुनकर सिंहनी तो भाग गयी। किन्तु उसका नवजात शिशु वहीं रह गया।कुछ समय पश्चात वहां से बकरियों का एक झुँड निकला। चरवाहे ने सिंह-शावक को वहां पड़ा देख उठा लिया तथा उसका पालने करने लगा। वह शावक बकरियों के गल्ले में रहकर तथा बकरियों का दूध पीकर पोषित होता रहा। बड़ा होकर वह बकरियों के गल्ले के साथ वन में जाने और उनके साथ ही चरने लगा। वह बकरियों में
हिल मिल गया तथा बकरियाँ भी उससे हिल मिल गयीं। इस प्रकार वह सिंह शावक स्वयं को बकरी का बच्चा समझने लगा।एक दिन बकरियाँ वन में चर रही थीं कि संयोगवश एक सिंह वहां आ निकला। सिंह को दूर से देखते ही बकरियाँ एक ओर को भागीं। बकरियों के साथ पला हुआ वह सिंहशावक भी भयभीत होकर उनके साथ दौड़ने लगा। वनराज की दृष्टि उस भागते हुए सिंहशावक पर पड़ी, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ तथा वह विचारने लगा कि यह क्यों मुझसे भयभीत होकर भाग रहा है,जब कि वह स्वयं सिंह है। यह सोचकर वनराज ने उस शावक को अपने निकट बुलाया। उसके बुलाने से शावक तो मारे भय के थर थर कांपने लगा। वनराज ने उस समझाने के उद्देश्य से कहा,""अरे! तू तो सिंहशावक है। यह बकरियां जिनके साथ मिलकर तू रहता है,यह तो तेरा आहार हैं।''
परन्तु सिंहशावक की समझ में यह बात न आ सकी। तब वनराज उसे समझा बुझाकर एक निकटवर्ती सरोवर के तट पर ले आया। वहां पहुँचकर बनराज ने उसे जल में अपना प्रतिबिम्ब देखने को कहा। सिंहशावक ने जब निर्मल जल में अपनी प्रतिच्छाया देखी,तो अपनी आकृति को उसने बकरियों की आकृति से भिन्न पाया। तब उसकी समझ में आया कि सचमुच मैं सिंहशावक हूँ। वनराज ने एक घोर गर्जना की, जिसे सुनकर उस शावक के चित्त में भी उत्तेजना उत्पन्न हुई। उसने भी सिंह का अनुकरण करते हुए वैसा ही गर्जन किया। उसकी गर्जना सुनकर वही बकरियां जो उसके साथ मिलकर रहा करती थीं, अब उसी शावक से भयभीत होकर भागने लगीं। अब जाकर सिंहशावक को पूर्ण विश्वास हुआ कि वह बकरी नहीं, वरन् सिंह है। ऐसा निश्चय दृढ़ होने के उपरान्त वह निर्भीक होकर वनराज के साथ मन्थर गति से चलता हुआ वन में अदृश्य हो गया।इस दृष्टान्त का भाव यह कि जीवात्मा यथार्थतः सिंहशावक अर्थात् मालिक का अंश है। परन्तु भ्रमवश यह माया के साथ मिलकर माया रूप हो रहा है। महापुरुष सन्त सतगुरु स्वयं सिंह अर्थात् मालिक का रूप हैं। जीव की मन्द अवस्था देखकर उनके चित्त में दया उत्पन्न होती है तथा वे उसे उसके यथार्थ रूप का चेत कराते हैं।
आरम्भ में तो जीव की समझ में यह बात नहीं आती। परन्तु जब महापुरुष दया करके बारम्बार समझाते हैं, तब कुछ काल सत्संग होने के उपरान्त जीव को शनैःशनैः अपने यथार्थ स्वरूप की समझ आने लगती है और वह जान लेता है कि मैं माया का अंशज नहीं, वरन् मालिक का अंशज हूँ। सत्संग के प्रताप से यह बात भी उसकी समझ में आ जाती है कि मालिक के साथ सुरति को मिला देने से ही संसार के इन दुःखों एवं कलेशों से छुटकारा मिल सकेगा, जिनमें जीव अनेक जन्म से पड़ा हुआ है। सन्त सतगुरु जीव को शब्द का गर्जन सुनाते हैं तथा उसे भी शब्द रूपी गर्जन करना सिखाते हैं। मन,माया, इन्द्रियाँ तथा इन्द्रियों की इच्छाएँ जो बकरियों के समान हैं तथा जिन्होने जीवात्मा रूप सिंह को घेर रखा है, शब्द का घोर गर्जन सुनकर यह सब भयभीत होकर भाग जाती हैं और जीव का इनसे पीछा छूट जाता है। सुरति को शब्द के साथ मिला देने से जीवात्मा मालिक के धाम में पहुँच जाता है तथा उसके समस्त दुःखों एवें क्लेशों का अन्त हो जाता है।
पिण्डदेश से ऊपर के उन स्थानों में जिनका वर्णन पहले हुआ है, वहां माया का पसारा नहीं है। वहाँ प्रकृतियों एवं इन्द्रियों की इच्छाओं का बन्धन भी नहीं है। जब सुरति शब्द की धारा को पकड़कर ऊपर चढ़ती है, तो ऊपर के प्रदेश में पहुँचकर वह सब बन्धनों से मुक्त होकर मालिक के धाम में निवास करती है। केवल धोखे और भ्रम का शिकार होकर जीव माया की चाकरी कर रहा है। अन्यथा वह तो माया की पहुँच से बहुत परे हैं।

Sunday, June 5, 2016

सुरति-शब्द योग


मानव शरीर प्राकृतिक रूप से तीन खण्डों मे विभाजित है। एक खण्ड वह है जो नेत्रों से नीचे का पूरा धड़ है। इस खण्ड को पिण्डदेश अथवा माया का देश कहते हैं। सामान्यतः मनुष्य की सुरति माया की रचना में फैलीरहने के कारण इसी पिण्डदेश में ही रहती है। अन्य दो खण्ड नेत्रों से ऊपर हैं। नेत्रों से ऊपर से लेकर शिखा प्रदेश अथवा सिर की चोटी तक जो खण्ड है वह ब्राहृाण्ड देश कहलाता है। तथा सिर की चोटी से आगे गुद्दी तक जो खण्ड है। उसका नाम दयाल देश है। सुरति प्रायः पिण्डदेश में रहती है किन्तु यह सुरति अथवा आत्मा का वास्तविक आवास नहीं। सुरति का वास्तविक आवास अथवा ठिकाना तो वह अनामी स्थान है जो तीनों खण्डों में सर्वोपरि प्रदेश है। वहीं से सुरति उतर कर नीचे संसार में आयी और फैल गयी। अनामी लोक तक विरली असामान्य आत्माओं की पहुँच होती है जिन्हें परमसन्त कहा जाता है। अनामी लोक से एक मौज उठी और शब्द की धारा बनकर नीचे को उतरी अनामी लोक से नीचे दो स्थान अगमलोक और अलख लोक हैं। इन दोनों से गुज़रती हुई शब्द की धारा चौथे स्थान सतलोक में आकर ठहरी। सतलोक तक पहुँचने वालों को सन्त कहते हैं।
यह स्थान ठीक शिखा के नीचे है तथा यह एक प्रकार से दयाल देश और ब्राहृाण्ड देश का सन्धिस्थान है। अनामी लोक, अगमलोक, अलख लोक और सतलोक यह चारों धाम दयालदेश के खण्ड में हैं। जब सुरति सतलोक से भी नीचे को उतरी तो भँवरगुफा और महासुन्न नामक दो अन्य लोकों से होकर पुनः सुन्नलोक में ठहरी, जिसे दशम द्वार भी कहा जाता है। यहाँ रहकर सुरति पाँच तत्वों,तीन गुणों तथा कारण,सूक्ष्म एवं स्थूल तीनों शरीरों से सर्वथा रहित है। इस स्थान अर्थात् दशम द्वार तक पहुंचे हुये आत्मा को पूरा साध कहते हैं। सुन्न से नीचे त्रिकुटी स्थान है, जिसे गगन मण्डल भी कहते हैं। इस स्थान से महासूक्ष्म तीन गुण, पाँचों तत्व, वेदादिक धर्मग्रन्थ,रचना की सूक्ष्म सामग्री तथा निर्मल माया प्रकट हुई है। इस स्थान से भी नीचे सहरुादल कमल स्थान है, जो नेत्रों के मध्य में पीछे की ओर स्थित है। यही पिण्ड और ब्राहृाण्ड की सीमा है। सन्त मत में इसी स्थान से साधन अभ्यास का श्री गणेश कराया जाता है। इसे सन्तजन निजमन भी कहते हैं। इस स्थान से सूक्ष्म तत्व शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदि तथा इनके अतिरिक्त पाँचों प्राण और पच्चीसों प्राकृतियाँ प्रकट हुर्इं। पिण्डदेश की सारी रचना इस स्थान
सहरुादलकमल से नीचे की ओर फैली हुई है। दयालदेश के खण्ड में अनामी लोक, अगमलोक, अलखलोक और सतलोक यह चारों उच्चतर धाम हैं। सतलोक से ब्राहृाण्ड देश का खण्ड आरम्भ हुआ। तथा इस खण्ड में सतलोक,भँवर गुफा, महासुन्न, सुन्न, त्रिकुटी एवं सहरुादल कमल नामक छः स्थान हैं। तथा सहरुाार से नीचे की सब रचना तीसरे खण्ड अथवा पिण्डदेश की है। जब सुरति सहरुादलकमल के नीचे उतरकर पिण्डदेश में आती है तो पाँचों कर्मेन्द्रयों,पाँचों ज्ञानेन्द्रियों तथा ग्यारवाँ मन इन ग्यारहों से मिल जाती है। इनमें से प्रत्येक में सत,रज,तम तीन गुण हैं। प्रत्येक गुण में एक कोटि इच्छाएं अथवा वासनाएँ हैं। इस प्रकार तीन कोटि को ग्यारह से गुणा करने पर कुल तैंतीस कोटि इच्छाओं के अधीन होकर सुरति शनैः शनैः माया की चाकरी करने की अभ्यस्त हो जाती है तथा फिर वह माया में बुरी तरह फँस जाती है तब माया की रचना तथा इच्छाओं के बन्धनों से उसका छूट सकना जन्म-जन्मान्तर तक के लिये कठिन हो जाता है।

Saturday, June 4, 2016

30.05.2016


सतपुरुष फरमाते हैं कि दुःख का कारण तुम्हारे ही मन में है बाहर खोजने गये पहला ही कदम गलत पड़ गया। जब भी तुम किसी को दुःख देना चाहते हो तुम स्वयं पाओगे। जब भी किसी को दुःख देने की आकांक्षा से, किसी विचार के पीछे जाते हो तुम दुःख के बीज बो रहे हो। दूसरे को दुःख मिलेगा या नहीं मिलेगा, तुम्हे दुःख ज़रुर मिलेगा। तुम अगर आज दुःख पा रहे हो तो सन्त फरमाते हैं कल जो बीज बोये थे उनका फल है और कल तुम चाहते हो दुःख न पाओ तो आज कृपा करना आज बीज मत बोना। यदि कोई दोष युक्त मन से बोलता है, सोचता है, व्यवहार करता है, या वैसे कर्म करता है तो दुःख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाड़ी जाती है बैलों के पीछे चाक चले आते हैं। तुम्हारे मन में अगर किसी को दुःख देने का ज़रा सा भी भाव है तो तुम अपने लिये बीज बो रहे हो। क्योंकि तुम्हारे मन में जो दुःख देने का बीज है तुम्हारे ही मन की भूमि में गिरेगा। दूसरे की मन की भूमि में नहीं गिर सकता। बीज तो तुम्हारे भीतर वृक्ष भी तुम्हारे भीतर होगा। फल भी तुम्हीं भोगोगे। अगर गौर से देखा जाये तो जब तुम दूसरे को दुःख देना चाहते हो तो तुमने अपने को दुःख देना शुरु कर ही दिया। तुम दुःखी होने शुरु हो ही गये। तुम क्रोधित हो क्रोध करके किसी को नष्ट करना चाहते हो तुम उसे नष्ट करोगे या नहीं ये दूसरी बात है किन्तु तुमने अपने को नष्ट करना शुरु कर दिया। सन्त कहते हैं क्रोध से बड़ी कोई मूढ़ता नहीं। दूसरे पर क्रोध करके तुम अपने को दण्ड देते हो। एक आदमी ने तुम्हें गाली दी कसूर उसका होगा क्रोधित तुम हो रहे हो दण्ड अपने को दे रहे हो। इससे ज़्यादा मूढ़ता क्या होगी। गाली देना उसकी समस्या है। तुम क्यों परेशान हो?