""जिस मनुष्य का पूर्ण सद्गुरुदेव जी के साथ सच्चे प्रेम का नाता है उसकी संगत करने से तुम्हें परमार्थ का लाभ होगा। और जो मनुष्य पहले कभी सद्गुरु का प्रेमी था किन्तु अब उसने प्रेम की तार को तोड़ दिया है-उसकी संगति करने से तुम्हें सरासर हानि होगी। जैसे बिजलीघर से बिजली तारों के द्वारा आती है और अन्धेरे को हटाकर प्रकाश करती है जैसे जलकूप से जुड़ी हुई टुटियों में से घर बैठे पानी मिल जाता है वैसे ही परिपूर्ण सद्गुरु जो परमार्थ के भण्डार होते हैं उनके साथ पूरी पूरी सुरति की धारा जोड़ने से परमार्थ का धन सहज ही में उपलब्ध हो जाता है। जो भी भाग्यवान सब ओर से सुरति की धारा को समेट कर गुरु-शब्द से जोड़ देता है वह भी एक प्रकार का अध्यात्म शक्ति का भण्डार बन जाता है। वह न केवल इससे अपना भला करता है अपितु जो भी उसके साथ प्रेम का सम्बन्ध रखता है वह भी परमार्थ के धन का पात्र बन जाता है।
आप लोगों ने बहुधा "काफला' देखा होगा, उसमें जैसे ऊँटों की कतार एक दूसरे से जुड़ी रहती है और सैंकड़ों ही ऊँट एक ही रस्सी में बँधे हुए ठीक मार्ग पर चले जाते हैं वैसे ही गुरुमुख की संगति करने से हज़ारों लाखों को रंग लग जाता है और वे स्वार्थी से परमार्थी बन जाते हैं परन्तु इस मार्ग में यह बात अवश्य है कि यह भक्ति की तार बहुत सूक्ष्म होती है। मन और माया के हिचकोले आने से यह बीच बीच में कहीं कहीं टूट भी जाती है-ऐसी दशा में वह जीव हरे भरे होने की जगह कुम्हलाने लगता है अर्थात् वह भक्ति के धन से खाली होने लगता है। खाली घड़ा बजने में तो भरे हुए से भी अधिक आवाज़ देता है परन्तु अन्दर से खोखला ही होता है- इसी तरह भक्ति से हीन लोग रीते कलश के समान बड़े वाचाल होते हैं। ऐसी अवस्था में सेवक को बड़ा सतर्क होकर रहना चाहिये और इसीलिये हमें भी श्री सद्गुरु दीन दयाल जी सावधान करते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि तुम अपने ध्येय स्थान पर न पहुँच कर बीच में ही भटक जाओ।
किसी दिन सन्ता और बलवन्ता रागी जो दिन रात श्री गुरु महाराज की महिमा गाया करते थे उनकी निन्दा करने लगे। जब स्वार्थ के आकर्षण ने उनकी परमार्थ की झीनी तार को तोड़ दिया तो अब कोई यह विचार करे कि ये दोनों तो बड़ी रमणीय कथाएं सुनाते हैं इन्हें पूरी गुरुवाणी कण्ठस्थ है; स्वर भी इनका सुमधुर है, गला भी साफ है, पक्के सुरताल से गाते हैं आदि आदि। यह विचार उसका नितान्त मिथ्या है। ये सबकी सब सुन्दरताएं ऐसी ही समझिये जैसे पत्थर की बनी हुई नकली आँख-जो देखने में तो असली आँख से भी सुन्दर लगती है परन्तु उसमें ज्योति नहीं होती।
परमार्थ के अभिलाषियों को ऐसे लोगों की संगति से दूर रहना चाहिए। कितने ही दुर्बल विचारों वाले इनके खिलाने-पिलाने के प्रलोभनों में फँस कर पुराने परिचयों के आधार पर इनसे मन के तार जोड़ बैठते हैं। रसना के रस तो उन्हें अवश्य प्राप्त होते हैं किन्तु उनकी पारमार्थिक हानि हो जाती है। उन लोगों को भी उस मूर्ख मनुष्य के सदृश समझना चाहिए जो अपने साये के आगे तो अच्छे अच्छे पदार्थ खाने के लिये रख दे और स्वयं विष भक्षण कर लेवे क्योंकि देह तो वस्तुतः आत्मा के समक्ष छाया रुप है उससे बढ़कर नहीं? उसी शरीर के पालन-पोषण के अधीन होकर आत्मा की उपेक्षा करना अबुद्धिमत्ता नहीं तो और क्या है? इसलिये सच्चे परमार्थी को सच और झूठ का, शरीर और आत्मा का भलीभांति निर्णय करके दृढ़ संकल्प के साथ आत्मिक उन्नति का ध्यान रखना चाहिये। जिन कर्मों से, जिन विचारों से, जिस बोलचाल से आत्मा का उत्कर्ष हो वे ही कर्म, वे ही विचार और वही बातचीत रखनी चाहिये। प्रायः कहा जाता है "जैसा अन्न वैसा मन्न' हर एक की संगति में बैठकर गप-शप लगाना या बिना सोचे-समझे जैसी
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तैसी मण्डली में सम्मिलित हो जाना औैर उलटी-सीधी बातें अपने कानों में डालते रहना-यह अपनी आत्मा
के साथ अत्याचार करना है। वास्तविकता तो यह है कि जिसका मन पूरी तरह गुरु-वचनों में लगा होता है वही सच्चा परमार्थी है। ऐसा मानव सिवाय पूरे सद्गुरु से और किसी से मैत्री का नाता जोड़ता ही नहीं। ऊपर ऊपर से चाहे वह सबके साथ व्यवहार करता है किन्तु दिल की एक तार भी कहीं नहीं जोड़ता ऐसा सेवक ही गुरु का विश्वास पात्र बन जाता है। उसे ही गुरुदेव आध्यात्मिक-कोष की कुञ्जी सौंप देते हैं। अपनी चरण-शरण की छाँव में उसे रखकर कृतकृत्य कर देते हैं और फिर उस की रात दिन सँभाल भी करते हैं। जैसे कि श्री रामभगवान भक्त विभीषण जी से कथन करते हैंः-
सबके ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी ह्मदयँ बसइ धनु जैसें।।
ऐसे सज्जनों से जिन जिन भाग्यशालियों का प्रेम जुड़ जाता है उनकी सँभाल भी भगवान अपने प्रेमियों की बदौलत करते हैं। गुरु वाणी का वाक हैः-
नानक धूड़ मँगे तिस गुरु सिख की, जो आप जपै अवराँ नाम जपावै।।
महापुरुष कितना ऊँचा दर्ज़ा देते हैं उस शिष्य को जिसकी सुरति अपने नाम शब्द से जुड़ी हुई है और जो अन्य टूटे हुए जीवों को भी जोड़ता है। अतएव प्रत्येक परमार्थ के इच्छुक को संगति का विशेष विचार रखना चाहिये। जिस संगति से गुरु चरणों का प्रेम बढ़े और गुरुभक्ति के सिद्धान्तों में दृढ़ता मिले उस संग को किसी दशा में भी त्यागना नहीं चाहिये चाहे कितनी कठिनाइयों का सामना क्यों न करना पड़े। और इसके विपरीत बहिर्मुखी और चंचल चित्त वालों की संगति में कितने शारीरिक सुख भी क्यों न मिलें पर इन सुखों को ठोकर मार कर उनकी संगति से दूर रहना चाहिये। जैसा कि परमसन्त श्री कबीर साहिब जी का कथन हैः- कबीर संगत साध की , जौं की भूसी खाय।
खीर खाण्ड भोजन मिले, साकट संग न जाय।।
कबीर साधु का संगति रहो,जौं की भूसी खाओ।
होनहार सो होइ है, साकत संग न जाओ।।
आप ही निर्णय करो कि एक मनुष्य तुम्हें खीर-खाँड में विष घोल कर पिलावे वह अच्छा या जौ की भूसी में अमृत मिला कर पिलावे वह अच्छा? अन्तर से स्वयं ही उत्तर आएगा कि विष तो जीवन ले लेगा और अमृत तो अमर बना देगा।
इसी कारण ही महापुरुषों ने भक्तिहीन के स्वादिष्ट व्यञ्जनों को त्याग कर भक्ति वालों के सादे भोजन को पसन्द किया। भगवान श्री कृष्ण जी ने दुर्योधन के अच्छे पदार्थों को छोड़कर विदुर जी का साग बड़े प्रेम से खाया। श्री गुरुनानक देव जी ने मलिक भागो के रसमय भोजनों को ठुकरा कर लालो भक्त के घर की सूखी रोटियां खाकर हमें पाठ पढ़ाया कि पहले मनुष्य की परीक्षा करो पीछे उनके साथ उठने-बैठने, खाने पीने का नाता जोड़ो। जिस संगति में भाव-भक्ति और भय बढ़े उसी मण्डली में अपनी मान-बड़ाई को छोड़कर सम्मिलित हो जाओ। जिस मण्डली में निन्दा, चुगली, खुशामद, चापलूसी, देखो उससे अपना बचाव करो। उसके सांसारिक गौरव को न देखो परमार्थ की और दृष्टि रखो। जिसका सद्गुरु देव जी के वचन से नाता जुड़ा होगा उसके अन्तह्र्मदय में शान्ति होगी, उसके संग से तुम भी शान्त हो जाओगे। जिसके मन में सन्देह, संशय और भ्रम होंगे वह स्वयं भी अशान्त, व्याकुल, और उद्विग्न होगा-उसकी संगति से सुख-शान्ति की आशा रखना अपने समय को व्यर्थ में गँवाना है। ऐसा विचार कर अपने मूल्यवान समय का आदर करो।
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