Tuesday, June 7, 2016

कर्म भूमि

कथा हैः- एक बार किसी सिंहनी ने वन में बच्चा दिया। संयोगवश उस समय सिंहनी वहाँ अकेली थी। उधर एक शिकारी उसी वन में आया हुआ था। जिस समय सिंहनी के बच्चा हुआ, उसी समय शिकारी ने किसी वन्यपशु पर बन्दूक दागी। बन्दूक का धमाका सुनकर सिंहनी तो भाग गयी। किन्तु उसका नवजात शिशु वहीं रह गया।कुछ समय पश्चात वहां से बकरियों का एक झुँड निकला। चरवाहे ने सिंह-शावक को वहां पड़ा देख उठा लिया तथा उसका पालने करने लगा। वह शावक बकरियों के गल्ले में रहकर तथा बकरियों का दूध पीकर पोषित होता रहा। बड़ा होकर वह बकरियों के गल्ले के साथ वन में जाने और उनके साथ ही चरने लगा। वह बकरियों में
हिल मिल गया तथा बकरियाँ भी उससे हिल मिल गयीं। इस प्रकार वह सिंह शावक स्वयं को बकरी का बच्चा समझने लगा।एक दिन बकरियाँ वन में चर रही थीं कि संयोगवश एक सिंह वहां आ निकला। सिंह को दूर से देखते ही बकरियाँ एक ओर को भागीं। बकरियों के साथ पला हुआ वह सिंहशावक भी भयभीत होकर उनके साथ दौड़ने लगा। वनराज की दृष्टि उस भागते हुए सिंहशावक पर पड़ी, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ तथा वह विचारने लगा कि यह क्यों मुझसे भयभीत होकर भाग रहा है,जब कि वह स्वयं सिंह है। यह सोचकर वनराज ने उस शावक को अपने निकट बुलाया। उसके बुलाने से शावक तो मारे भय के थर थर कांपने लगा। वनराज ने उस समझाने के उद्देश्य से कहा,""अरे! तू तो सिंहशावक है। यह बकरियां जिनके साथ मिलकर तू रहता है,यह तो तेरा आहार हैं।''
परन्तु सिंहशावक की समझ में यह बात न आ सकी। तब वनराज उसे समझा बुझाकर एक निकटवर्ती सरोवर के तट पर ले आया। वहां पहुँचकर बनराज ने उसे जल में अपना प्रतिबिम्ब देखने को कहा। सिंहशावक ने जब निर्मल जल में अपनी प्रतिच्छाया देखी,तो अपनी आकृति को उसने बकरियों की आकृति से भिन्न पाया। तब उसकी समझ में आया कि सचमुच मैं सिंहशावक हूँ। वनराज ने एक घोर गर्जना की, जिसे सुनकर उस शावक के चित्त में भी उत्तेजना उत्पन्न हुई। उसने भी सिंह का अनुकरण करते हुए वैसा ही गर्जन किया। उसकी गर्जना सुनकर वही बकरियां जो उसके साथ मिलकर रहा करती थीं, अब उसी शावक से भयभीत होकर भागने लगीं। अब जाकर सिंहशावक को पूर्ण विश्वास हुआ कि वह बकरी नहीं, वरन् सिंह है। ऐसा निश्चय दृढ़ होने के उपरान्त वह निर्भीक होकर वनराज के साथ मन्थर गति से चलता हुआ वन में अदृश्य हो गया।इस दृष्टान्त का भाव यह कि जीवात्मा यथार्थतः सिंहशावक अर्थात् मालिक का अंश है। परन्तु भ्रमवश यह माया के साथ मिलकर माया रूप हो रहा है। महापुरुष सन्त सतगुरु स्वयं सिंह अर्थात् मालिक का रूप हैं। जीव की मन्द अवस्था देखकर उनके चित्त में दया उत्पन्न होती है तथा वे उसे उसके यथार्थ रूप का चेत कराते हैं।
आरम्भ में तो जीव की समझ में यह बात नहीं आती। परन्तु जब महापुरुष दया करके बारम्बार समझाते हैं, तब कुछ काल सत्संग होने के उपरान्त जीव को शनैःशनैः अपने यथार्थ स्वरूप की समझ आने लगती है और वह जान लेता है कि मैं माया का अंशज नहीं, वरन् मालिक का अंशज हूँ। सत्संग के प्रताप से यह बात भी उसकी समझ में आ जाती है कि मालिक के साथ सुरति को मिला देने से ही संसार के इन दुःखों एवं कलेशों से छुटकारा मिल सकेगा, जिनमें जीव अनेक जन्म से पड़ा हुआ है। सन्त सतगुरु जीव को शब्द का गर्जन सुनाते हैं तथा उसे भी शब्द रूपी गर्जन करना सिखाते हैं। मन,माया, इन्द्रियाँ तथा इन्द्रियों की इच्छाएँ जो बकरियों के समान हैं तथा जिन्होने जीवात्मा रूप सिंह को घेर रखा है, शब्द का घोर गर्जन सुनकर यह सब भयभीत होकर भाग जाती हैं और जीव का इनसे पीछा छूट जाता है। सुरति को शब्द के साथ मिला देने से जीवात्मा मालिक के धाम में पहुँच जाता है तथा उसके समस्त दुःखों एवें क्लेशों का अन्त हो जाता है।
पिण्डदेश से ऊपर के उन स्थानों में जिनका वर्णन पहले हुआ है, वहां माया का पसारा नहीं है। वहाँ प्रकृतियों एवं इन्द्रियों की इच्छाओं का बन्धन भी नहीं है। जब सुरति शब्द की धारा को पकड़कर ऊपर चढ़ती है, तो ऊपर के प्रदेश में पहुँचकर वह सब बन्धनों से मुक्त होकर मालिक के धाम में निवास करती है। केवल धोखे और भ्रम का शिकार होकर जीव माया की चाकरी कर रहा है। अन्यथा वह तो माया की पहुँच से बहुत परे हैं।

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