Sunday, June 5, 2016

सुरति-शब्द योग


मानव शरीर प्राकृतिक रूप से तीन खण्डों मे विभाजित है। एक खण्ड वह है जो नेत्रों से नीचे का पूरा धड़ है। इस खण्ड को पिण्डदेश अथवा माया का देश कहते हैं। सामान्यतः मनुष्य की सुरति माया की रचना में फैलीरहने के कारण इसी पिण्डदेश में ही रहती है। अन्य दो खण्ड नेत्रों से ऊपर हैं। नेत्रों से ऊपर से लेकर शिखा प्रदेश अथवा सिर की चोटी तक जो खण्ड है वह ब्राहृाण्ड देश कहलाता है। तथा सिर की चोटी से आगे गुद्दी तक जो खण्ड है। उसका नाम दयाल देश है। सुरति प्रायः पिण्डदेश में रहती है किन्तु यह सुरति अथवा आत्मा का वास्तविक आवास नहीं। सुरति का वास्तविक आवास अथवा ठिकाना तो वह अनामी स्थान है जो तीनों खण्डों में सर्वोपरि प्रदेश है। वहीं से सुरति उतर कर नीचे संसार में आयी और फैल गयी। अनामी लोक तक विरली असामान्य आत्माओं की पहुँच होती है जिन्हें परमसन्त कहा जाता है। अनामी लोक से एक मौज उठी और शब्द की धारा बनकर नीचे को उतरी अनामी लोक से नीचे दो स्थान अगमलोक और अलख लोक हैं। इन दोनों से गुज़रती हुई शब्द की धारा चौथे स्थान सतलोक में आकर ठहरी। सतलोक तक पहुँचने वालों को सन्त कहते हैं।
यह स्थान ठीक शिखा के नीचे है तथा यह एक प्रकार से दयाल देश और ब्राहृाण्ड देश का सन्धिस्थान है। अनामी लोक, अगमलोक, अलख लोक और सतलोक यह चारों धाम दयालदेश के खण्ड में हैं। जब सुरति सतलोक से भी नीचे को उतरी तो भँवरगुफा और महासुन्न नामक दो अन्य लोकों से होकर पुनः सुन्नलोक में ठहरी, जिसे दशम द्वार भी कहा जाता है। यहाँ रहकर सुरति पाँच तत्वों,तीन गुणों तथा कारण,सूक्ष्म एवं स्थूल तीनों शरीरों से सर्वथा रहित है। इस स्थान अर्थात् दशम द्वार तक पहुंचे हुये आत्मा को पूरा साध कहते हैं। सुन्न से नीचे त्रिकुटी स्थान है, जिसे गगन मण्डल भी कहते हैं। इस स्थान से महासूक्ष्म तीन गुण, पाँचों तत्व, वेदादिक धर्मग्रन्थ,रचना की सूक्ष्म सामग्री तथा निर्मल माया प्रकट हुई है। इस स्थान से भी नीचे सहरुादल कमल स्थान है, जो नेत्रों के मध्य में पीछे की ओर स्थित है। यही पिण्ड और ब्राहृाण्ड की सीमा है। सन्त मत में इसी स्थान से साधन अभ्यास का श्री गणेश कराया जाता है। इसे सन्तजन निजमन भी कहते हैं। इस स्थान से सूक्ष्म तत्व शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदि तथा इनके अतिरिक्त पाँचों प्राण और पच्चीसों प्राकृतियाँ प्रकट हुर्इं। पिण्डदेश की सारी रचना इस स्थान
सहरुादलकमल से नीचे की ओर फैली हुई है। दयालदेश के खण्ड में अनामी लोक, अगमलोक, अलखलोक और सतलोक यह चारों उच्चतर धाम हैं। सतलोक से ब्राहृाण्ड देश का खण्ड आरम्भ हुआ। तथा इस खण्ड में सतलोक,भँवर गुफा, महासुन्न, सुन्न, त्रिकुटी एवं सहरुादल कमल नामक छः स्थान हैं। तथा सहरुाार से नीचे की सब रचना तीसरे खण्ड अथवा पिण्डदेश की है। जब सुरति सहरुादलकमल के नीचे उतरकर पिण्डदेश में आती है तो पाँचों कर्मेन्द्रयों,पाँचों ज्ञानेन्द्रियों तथा ग्यारवाँ मन इन ग्यारहों से मिल जाती है। इनमें से प्रत्येक में सत,रज,तम तीन गुण हैं। प्रत्येक गुण में एक कोटि इच्छाएं अथवा वासनाएँ हैं। इस प्रकार तीन कोटि को ग्यारह से गुणा करने पर कुल तैंतीस कोटि इच्छाओं के अधीन होकर सुरति शनैः शनैः माया की चाकरी करने की अभ्यस्त हो जाती है तथा फिर वह माया में बुरी तरह फँस जाती है तब माया की रचना तथा इच्छाओं के बन्धनों से उसका छूट सकना जन्म-जन्मान्तर तक के लिये कठिन हो जाता है।

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