Friday, June 24, 2016

बुरे की बुराई मत सोचो


""तुम से जो बुराई कर रहा है तुम्हारा मालिक उसे देख रहा है। उसकी बुराई का फल वह उसे देगा। तू उससे बदला लेने की मत सोच।''
     ये महापुरुषों के अनुभूत प्रयोग हैं जो कि बिगड़े हुए आत्मिक स्वास्थ्य को स्वस्थ कर देते हैं क्योंकि आत्मा की निर्बलता और रोग का प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है इसलिये इन नुस्खों का सेवन करने से शारीरिक स्वास्थ्य भी सुधर जाएगा। बाबा फरीद साहिब का वचन हैंः-
                फरीदा बुरे दा भला करे गुस्सा मनि न द्रढ़ाइ।।
                देही  रोगु  न  लगई  पलै  सभु  किछु पाई।।
इन वचनों में क्या कमाल के वर दिये हुए हैं कि देह के दुःख भी नष्ट हो जावें और जो भी मनःकामना हो वह भी पूरी हो जाये। इससे बढ़कर मनुष्य को क्या चाहिये। परन्तु फिर भी खेद की बात है कि लाखों में से कोई कोई इस वचन का सहारा लेकर वैर और घृणा से बचा रहता है। अन्यथा सर्वसाधारण बुराई करने वाले तो क्रोध कर के ऐसे अमूल्य आशीर्वादों को हाथ से गँवा देते हैं।
     बाबा फरीद साहिब जी को तो सदियाँ बीत गर्इं किन्तु यह ऊपर वाला वचन तो उनका कथन किया हुआ है जिनके सेवक कहलाने का हमें गर्व है जो अभी विद्यमान हैं और जिनका हमें मान है। यदि हम भी इस वचन का परिपालन न करके मन के कहने पर चलेंगे तो उनकी दया की धारा आज्ञा की डोरी के बिना किसके द्वारा हम तक पहुँचेगी। ऐसा करने से यदि हम गुरु-कृपा से वञ्चित रह गये तो फिर हमारे जीवन में सफलता कैसे आयेगी? हम अति गम्भीरता पूर्वक इस भारी लाभ व हानि को सोचें। श्री सद्गुरु देव को अन्तर्यामी और समर्थ समझ कर ऐसी बातों को उनकी मौज पर छोड़ दें। वे जैसा उचित समझें करें। हम प्रत्येक दशा में प्रसन्न रहें। हमारा मन जिससे दर्पण की न्यार्इं निर्मल रहे। मालिक की अखण्ड ज्योंति उसमें चमकती रहे। मनुष्य शुद्ध व चैतन्य स्वरुप हो जाये। इस को ही सेवक स्वामी का मेल कहते हैं। यही जीव और इनकी एकता है। यही सच्चा लाभ है और यही मानव जीवन की सफलता है।
     श्री गुरु महाराज जी की आज्ञा के बिना यह मन शत्रु कभी नहीं जीता जा सकता। अपने अथाह वेग से यह मन मनुष्य को चिन्ता, संशय,भ्रम, सन्देह और अवगुणों के गढ़े में जा गिराता है। जहाँ इसे सुख का सांस लेना भी कठिन हो जाता है। मनुष्य स्वयमेव अपनी पीठ पर पशुओं से भी अधिक भार लाद लेता है जिससे वह सर्वदा चीत्कार व हाहाकार करता रहता है। अतः जिसे अपनी आत्मा पर करुणा करनी हो वह उपर्युक्त वचन को लक्ष्य बना कर दूसरों की बुराइयों को भुलाकर अपना उत्तरदायी मालिक को समझे जिससे उसके मन का बोझ उतर जाय और  जीवन हर्ष के  साथ व्यतीत हो। सन्त सत्पुरुषों  का अवतार
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केवल इसी निमित्त ही होता है कि वे जीवों के मानसिक संघर्ष को हलका कर दें और उन्हें सच्चा सुख प्राप्त हो। आप गीता रामायण, महाभारत,गुरुवाणी या बाईबिल में से कोई भी धार्मिक ग्रन्थ देखें सर्वत्र यही
मिलेगा कि महापुरुषों ने अपनी मौज से निर्बल जीवों के सहायक बन कर उन्हें भय और चिन्ता के सागर से पार उतार दिया। किन्तु पार तो वही उतर सकता है जो उन्हें अपनी बाँह पकड़ा देवे और उन पर भरोसा या विश्वास रखे। जो मनुष्य स्वयं दूसरे से बदला लेना चाहता है इसका भाव यह होगा कि उसका अपना विश्वास अपने इष्टदेव पर नहीं है या वह उन्हें समर्थ और न्यायकारी नहीं समझता फिर वह मनुष्य भव सागर कैसे तरेगा?
      प्रह्लाद भक्त या श्री कबीर साहिब, नामदेव या भक्त रविदास जी आदिक जिनको लोगों ने निरर्थक कष्ट दिये उन भक्तों ने दुःखदायकों का बदला लेने का विचार स्वप्न में भी न उठाया तब तो भगवान को नृसिंह आदि अवतार धारण कर आना पड़ा। वे यदि आप प्रतिशोध लेने का विकल्प उठाते तो भगवान बीच में आते ही नहीं। वह कहते कि ""तुम आपस में निबट लो।'' फिर भला प्रह्लाद बालक,हिरण्यकशिपु जैसे महादैत्य का सामना कर सकता। पिता उसे चूर चूर न कर देता। परन्तु इन सबों ने आप गँवाया और शौह की मदद को पाया। आज तक भी उनका जय जयकार संसार में हो रहा है।
     आज जो हमें अपने वचन के द्वारा मालिक ने शिक्षा दी है इस में भी उनकी मौज यही है कि यदि तुम किसी की बुराई नहीं सोचोगे और तुम से कोई बुराई कर जायेगा तो हम तुम्हारा पक्ष लेंगे। तुम्हारी उसमें विजय निश्चित होगी। फिर हम ऐसा कार्य क्यों न करें जिससे हमें यहां भी विजय मिले और भगवान भी अपने बनें। इससे बढ़कर लाभ का व्यापार और कौन सा हो सकता है। कथा हैः-
     एक सन्त महात्मा अपने सेवक के साथ कहीं से गुज़र रहे थे तो देखते क्या हैं कि आकाश से एक तलवार तेज़ी से आ रही है किन्तु पल भर में वह आकाश में वापस चली गई। सेवक ने पूछा कि श्री गुरुमहाराज! यह क्या माजरा है? श्री गुरुमहाराज जी ने उत्तर दिया कि बेटा! एक मालिक के भक्त को कोई दुष्ट व्यर्थ में सता रहा था। उसकी सहायता के लिए और दुष्ट का वध करने के लिए यह तलवार अदृश्य से आ रही थी। परन्तु भक्त को दुःख सहन करते करते एकदम जोश आ गया-उसने भी दुष्ट को दो चार सुना दीं। यह देखकर मालिक ने अपनी तलवार को लौटवा लिया और कहा कि ""अब आपस में आप ही निपट लो।'' परिणाम यह हुआ कि उस दुष्ट ने भक्त को बड़ा मारा और वह मार खाकर पीछे पछताता रहा। लोगों ने भी उसे कहा कि तुम पूर्ण भक्त नहीं हो क्योंकि अन्त में तुम भी आपे से बाहर हो ही गये भक्त जन तो जीतने का प्रयत्न करते ही नहीं क्योकिः-
                हर जन तो हारा भला, जीतन दे  संसार।
                हारा तो हरि सों मिले, जीता जम के द्वार।।
इसी प्रकार जो वचन का उल्लंघन करते हैं वे यहां भी मारे जाते हैं-परलोक में भी लज्जित होते हैं। यदि हम इस लोक में भी विजयश्री का मुख देखना चाहते हैं और परलोक में सम्मान पूर्वक जाना चाहते हैं तो उपरलिखित वचन को कार्य रुप में परिणत करते हुए मालिक की कृपा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।
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