Thursday, June 30, 2016

सच्ची खुशी


     संसार में अगर किसी से पूछा जाये कि तुम्हें सबसे अधिक ख्वाहिश किस चीज़ की है तो वह कहेगा मुझेअपार धन चाहिए, कोई कहेगा कि मेरी संसार में खूब मानइज़्ज़त हो,कोई कहेगा कि मेरे पास सब तरह के ऐशो इशरत के सामान हों, किसी को अपने शरीर के तन्दरूस्त,सुन्दर व निरोग होने की ख्वाहिश होगी और कोई ये भी कहेगा कि मुझे ईश्वर या परमात्मा की तलाश है। अब अगर इनसे पूछा जाये कि तुम्हें धन दौलत चाहिए तो किसलिये? मान और इज़्ज़त प्राप्त करने की ख्वाहिश है तो किसलिये? ऐशो इशरत के सामानों की इच्छा और शरीर के सुन्दर और निरोग होने की चाहना है तो क्योंकर? और अगर प्रभु को पाने की दिल में तमन्ना है तो आखिर क्यों? बहुत से व्यक्तियों से तो इसका जवाब शायद ही बन पाये। लेकिन इसका जवाब है, वो जवाब है खुशी। इन्सान अगर धन दौलत चाहता है तो खुशी के लिये,जायदाद मकान बनाता है तो खुशी को लिये,मान सम्मान चाहता है तो खुशी के लिये,ऐशो इशरत के सामानों की खाहिश है तो खुशी के लिये, अगर इन्सान भक्ति भी करता है तो खुशी के लिये। गौर करने से मालूम होता है दुनियां में खुशी से बढ़कर कोई भी चीज़ नहीं है।धन दौलत हो खुशी न हो तो कुछ भी नहीं, मान इज़्ज़त हो शरीर तन्दरुस्त और सुन्दर हो,ऐशो इशरत के सब सामान मौजूद हों सब कुछ हो पर खुशी न हो तो कुछ भी नहीं मिला। मान लो, अगर किसी को परमात्मा भी मिल जाये पर खुशी न हो तो कुछ भी नहीं मिला।कहने का तात्पर्य ये है कि जीव संसार में जो कुछ भी कार्यव्यवहार करता है,खाना पीना,उठना बैठना, नौकरी, खेती व्यापार आदि धन कमाने के लिये करता हैअर्थात जो भी कार्य करता है केवल खुशी के लिये ही। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक मनुष्य की ज़िन्दगी का मकसद खुशी को हासिल करना है। जाने या अन्जाने में हर इन्सान अपनी अपनी समझ अनुसार खुशी को हासिल करने के लिये प्रयत्नशील है। लेकिन अब ये देखना है कि कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें खुशी नसीब है।
     आमतौर पर संसार में दुःख की ही शिकायत हुआ करती है। बड़े बड़े विद्वानों ने, सन्तों महापुरुषों ने, सदग्रन्थों की वाणियों ने इस संसार को दुःखसागर का नाम दिया है। एक भी आदमी ऐसा नहीं है जो इसे वैकुण्ठ सागर या सुखसागर कहता

हो। क्योंकि अगर हम संसार की तरफ गौर करके देखें तो मालूम होगा बल्कि हर इन्सान देखता भी है कि सभी को, बीमारी, बुढ़ापा दुर्घटनाओं और मौत के शिकार होने का डर हमेशा सिर पर बना रहता है। कोई बीमारी के हाथों तंग है कोई गरीबी का मारा परेशान है। बड़े बड़े व्यापारी, राजा महाराजा,धनवान सब अपनी अपनी चिन्ताओं की चक्की में पिसे चले जा रहे हैं।जब धनवानों का ये हाल है तो गरीबों की तो बात ही क्या है। हस्पतालों में जाकर देखो कैसे लोग तड़फ रहे हैं। जेलों में सख्त सजाएं हो रही हैं। मतलब क्या कि संसार में धनवान,बलवान प्रतिष्ठावान, किसी से भी पूछा जाये कि क्या उसे खुशी प्राप्त है,क्या वह सुखी है? तो वहअपने दुःखों की कहानी शुरु कर देगा। आप कहेंगे कि उसके पास अपार धन है,कुटुम्ब परिवार है नौकर चाकर हैं उसे और क्या चाहिये उसके पास सब कुछ है वह ज़रूर सुखी होगा। उसे ज़रूर खुशी प्राप्त होगी। उससे पूछने पर आप उसके दिल में भी एक निराशा, चिन्ता उदासी या खिन्नता के भाव ही पायेंगे। सन्त सहजो बाई जी का कथन है-:      धनवन्ते सब ही दुःखी निर्धन दुःख का रूप।
     फरमाती हैं कि धनवानों और अमीरों को मैने दुःखी और पीड़ा में कराहते हुये पाया है और निर्धन तो दुःख का रूप ही हैं। संसार का प्रत्येक प्राणी संसारिक पदार्थों में खुशी की तलाश करता है लेकिन गौर करने से, विचार करने से ये ही मालूम होता है कि खुशी न दौलत में है,न इज़्ज़त में,ना ही किसी और सांसारिक पदार्थों में खुशी है। किसी पंजाबी सन्त ने कहा है।
   विषय वासना विच गल्तान बन्दा दीन दुःखी आजीज़ सुबह शाम रहंदा।
   नित  लोड़दा  सुखां  ते  खुशियाँ  नूं अफसोस मगर  नाकाम  रंहदा।
   सुख मूल नहीं विषयाँ विच दासा ना ही सुख दा नाम निशान हरगिज़।
   जिन्हां चीज़ां विच खुशी लभदा तूँ खुशी वाले ऐ नाहीं सामान हरगिज़।
     अब प्रश्न होता है कि जब सांसारिक पदार्थों में खुशी नहीं है तो आखिर वह कहाँ से और किस प्रकार प्राप्त हो सकती है। महापुरुष फरमाते हैं कि जीव को सच्चा सुख व सच्ची खुशी तब ही मिल सकती है जब वह अपना रूख परमात्मा की तरफ मोड़े क्योंकि जिस चीज़ का जहाँ भण्डार हो वहीं से मिल सकती है किसी को कपड़ों की आवश्यकता है और वह बर्तनों की या मिठाई की दुकान पर तलाश
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करे तो उसे कैसे मिल सकते हैं। कपड़े खरीदने के लिये उसे कपड़ों की दुकान पर ही जाना होगा।अगर उसे सोना चाँदी की ज़रूरत है तो वह सुनार की दुकान पर ही उपलब्ध होगा न कि गाजर मूली या सब्ज़ी की दुकान पर।
    एक मनुष्य दरिया के किनारे पर खड़ा है उसकी नज़र पानी में एक मणी पर जाती है वह कपड़े उतार कर दरिया में डुबकी लगाता है परन्तु बार बार गोता लगाने से गहरे पानी में जाने पर भी उसके हाथ नहीं आती। दुःखी हो जाने पर भी बार बार डुबकी लगाने से नहीं हटता। इतने में वहाँ कोई अनुभवी महात्मा स्नान करने आते हैं और उस व्यक्ति को बार बार डुबकी लगाते दुःखी देखते हैं। उन्होने उससे पूछा क्यों भाई दरिया में बार बार डुबकी क्यों लगा रहे हो? किन्तु वह भेद खोलना नहीं चाहता उसे आशंका है कि कहीं बाबा जी मणी को निकाल कर ले न जायें। इसलिये वह बात टाल देता है किन्तु महात्मा जी की दृष्टि उस मणी पर पड़ जाती है उसे देखकर वह समझ गये और बोले क्यों भाई तुम उस मणी को लेने के लिये ही बार बार डुबकी लगा रहे हो? भेद खुला देख उसे स्वीकार करना पड़ा। बाबा जी ने कहा डुबकी लगाते कितना समय हो गया उसने कहा जब से आया हूँ तब से डुबकी लगा रहा हूं। बाबा जी ने कहा कुछ हाथ भी लगा?उसने कहा कुछ भी नहीं। तो फिर क्यों डुबकी लगा रहा है?उसने कहा इसलिये कि डुबकी लगाते लगाते कभी न कभी तो मणी हाथ आ ही जायेगी। बाबा जी ने कहा इस प्रकार सारी आयु डुबकी लगाते रहोगे तो भी मणी तुझे नहीं मिल सकती क्योंकि जो मणी तुझे दिखाई दे रही है वह वहां पर है ही नहीं तो मिलेगी कैसे? उसने कहा आप कैसी बात कर रहे हैं वह तो साफ दिखाई दे रही है। बाबा जी ने हँसकर कहा कुछ देर ठहर तुझे अभी सारा भेद मालूम हो जायेगा। जब जल ठहर गया तो बाबा जी ने कहा तुझे जहाँ मणी दिखाई दे रही है वहाँ और भी कुछ दिखाई दे रहा है? उसने कहाँ हाँ एक वृक्ष दिखाई दे रहा है। बाबा जी ने कहा डुबकी लगाते वक्त पेड़ की कोई डाली या पत्ता हाथ लगा?अगर वहाँ वृक्ष होता तो ज़रूर उसकी टहनी या पत्ता हाथ में आता मगर वहां वृक्ष है नहीं केवल दिखाई दे रहा है। ऐसा कहकर महात्मा जी ने वृक्ष की डाली हिलाई जल में दिखाई देने वाला वृक्ष भी हिला देखकर उसने कहा आपका कहना सत्य है। कृप्या मणि के मिलने का भी उपाय भी बतलाईये।

बाबा जी ने कहा यदि तुझे मणी प्राप्त करना है तो वृक्ष पर चढ़ जा इसी वृक्ष पर तुझे मणी मिल जायेगी। तब उसने वृक्ष पर चढ़कर मणी व लाल प्राप्त किया।
     कहने का तात्पर्य ये है कि यह संसार ही दरिया है विषय ही उसमें जल है। विषयों में जो सुख भासता है वह मणी की परछांर्इं है। जीव ही डुबकी (जन्ममरण) लगाने वाला मनुष्य है।सतगुरु ही महात्मा हैं।दृढ़ वैराग्य किनारे का वृक्ष और अभ्यास का साधन उस पर चढ़ना है और परमानन्द परमात्मा का स्वरूप ही सच्ची मणी है।इस प्रकार जल में परछार्इं की भांति यहां विषयों में आनन्द प्रतीत होता है वह उस परमात्मा का ही प्रतिबिम्ब है यदि उसे पाने की इच्छा है तो इस संसार रूपी दरिया में प्रतीत होने वाले विषयों से मुख मोड़ कर सतगुरु के बतलाये हुये दृढ़ वैराग्य रूप वृक्ष पर चढ़कर नाम का अभ्यास करके उसे ढूँढो तभी तुम्हें उसकी प्राप्ति होगी। इसलिये महापुरुष फरमाते हैं कि अगर जीव को सच्ची खुशी प्राप्त करना है तो उसे चाहिये कि संसार के पदार्थों में तलाश करने की बजाए परमात्मा की तरफ अपना रूख मोड़े सतगुरु की भक्ति में चित जोड़े जो सुखऔर शान्ति के व आनन्द के भण्डार हैं।
        ""सतगुरु सुख सागर जग अन्तर होर थार्इं सुख नाहीं''।
     सन्त महापुरुषों को संसार की दुःखित अवस्था को देखकर खेद होता है जीवों को सच्ची खुशी प्रदान करने के लिये अपने आनन्द और शान्ति के धाम को छोड़कर इस संसार में आते हैं और जीवों को सुख रूप बनाने के लिये सरल और सहज साधन बना देते हैं वो साधन हैं श्री आरती पूजा, नाम सुमिरण, ध्यान,सत्संग,सेवा व सतपुरुषों के दर्शन। वह जीव खुशकिस्मत है वह गुरुमुख भाग्यशाली हैं जिन्हें सन्तों महापुरुषों की संगत और उनसे प्रभु नाम की प्राप्ति हो गई है और वह सच्ची खुशी को हासिल करते हैं जो महापुरुषों के बताये हुये रास्ते पर चलते हैंऔर उनके द्वारा बनाये सुख के साधनों को प्रयोग में लाते हैं। इसलिये वही जीव सच्ची खुशी को हासिल करता है वह परिवार खुशियों से भरपूर रहता है जिसमें मालिक की भक्ति, प्रभु का गुणगान, सुबह शाम नितप्रति श्रीआरती पूजा, सत्संग,नाम कासुमिरण भजन कीर्तन होता रहता है। आप सब गुरुमुख सौभाग्यशाली हैं जिन्हें सन्तों की संगत प्राप्त होने से समझ आ गई है कि सच्ची

खुशी मालिक की भक्ति में है इसलिये गुरुमुखों का कर्तव्य है कि संसार के कार्य व्यवहार करते हुये महापुरुषों के बताये रास्ते पर चलते हुये उनके द्वारा बनाये खुशी के साधनों को अपनाते हुये सच्ची खुशी को हासिल करके मनुष्य जन्म को सफल बनायें और परलोक सँवार लें।

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