जाकै संगि इहु मन निरमलु-जाकै संगि हरि हरि सिमरनु।।
जाकै संगि किलबिख होहि नास-जाकै संगि रिदै परगास।।
से संतन हरि के मेरे मीत केवल नामु गाईयै जाकै नीत।।
(गौड़ महल्ला5-पृ.863)
एक जिज्ञासु, एक सत्संगी व अभ्यासी के लिये एक प्रश्न है। वह प्रश्न क्या है? वह यह कि उसको इस मार्ग में उसका मन ठीक तरह से चलने नहीं देता। न अभ्यास में, न सत्संग में और न भक्ति मार्ग में। कारण कि मन स्वभाव से चञ्चल है। यह प्रश्न बहुधा एक साधक के सामने आता है। इसका उत्तर न तो वह स्वयं दे सकता है और न इसे सर्वसाधारण मनुष्य दे पाता है। इसमें हेतु यह है कि मन की रचना ही ऐसी है जिसे हर एक समझ नहीं सकता यह साधना का मार्ग बड़ा गूढ़ और सूक्ष्म मार्ग है। इसके भेदी केवल सन्त सद्गुरु ही हैं। इस प्रश्न का उत्तर महापुरुषों ने दिया है। उनकी सम्मति क्या है? वे कथन करते हैं कि वस्तुतः यह जो मन है इसके बनाने वाला स्वयं मनुष्य ही है। इसे बाहर से आकर किसी ने नहीं बनाया और न ही भगवान ने इस मन को बना बनाया भेजा है। यह कार्य मनुष्य के अपने हाथ में है। वह जैसा चाहे इसे बनावे। यह गोरखधन्धा एक जन्म का नहीं अपितु अनेक जन्मों का है।
सन्तों का कथन है कि जीव जैसे जैसे कर्म करता है और जैसे जैसे मन अपनी वृत्तियों द्वारा बाहर से आहार ग्रहण करता है मन वैसा ही बन जाता है। प्रायः जीवों की मनोवृत्ति बहिर्मुखी है। जिस जिस वस्तु से वृत्तियां टकराती हैं और जिससे प्यार करती हैं जिस जिस स्थान पर रुकती हैं और स्थिर होती हैं तो क्या होता है? उन उन वस्तुओं का असर अपने अन्दर खींच कर वापस ले आती हैं। मन की वृत्ति में स्वाभाविक ही एक चुम्बक शक्ति है। उन प्रभावों का एक कोश संस्कारों के रुप में मनुष्यों के भीतर संचित हो जाता है। उस संस्कार-पुञ्ज का नाम ही "मन' है। भिन्न भिन्न संस्कारों के समुदाय को ही मन कहते हैं। यदि मन की वृत्तियां शुभ वस्तुओं के साथ मेल करती हैं तो सुन्दर प्रभाव अन्दर एकत्र होकर अच्छे मन की रचना करेंगे यदि अशुभ पदार्थों से उनका मेल होगा तो मन भी बुरा बनेगा। यह प्राकृतिक नियम है जो मनुष्य के अन्दर स्वतः काम कर रहा है। उदाहरण के रुप में आप एक शहद के छत्ते को लीजिये। शहद की मक्खियांं बाहर से फूलों के रसों को लेकर मधु बनाती हैं कई फूल ऐसे होते हैं जिनकी गन्ध कड़ुवी होती है और कई फूलों में मीठी गन्ध होती हैं। यदि वे मधुमक्खियां मीठी गन्ध वाले फूलों से रस लाएंगी तो शहद मधुर बनेगा। यदि वह रस कड़ुवे फूलों का है तो मधु भी कड़ुवी होगी। इसी तरह ये मनोवृत्तियां उन मधुमक्खियों के समान हैं और मन एक शहद के छत्ते के सदृश है। मन को यदि हमने स्वयं गन्दा बनाया है तो उसकी शक्ति ने अपना काम करना है। जैसी मनोवृत्ति होगी वैसा ही कार्य आगे सिद्ध होगा। यदि मन खरा़ब बन गया है और हम उससे भजन व ध्यान में लगने की आशा रखें ऐसा कदापि न हो सकेगा। जिस समय जो भी शक्ति मन के अन्दर प्रबल हो जाती है वह उसे कार्य करने को विवश कर देती है। इस प्रकार एक दुर्जन दस लोगों को दुर्जन बना देता है। एक झूठा मनुष्य सौ मनुष्यों को झूठा बनाएगा। भाव यह कि जो जैसा भी होता है उसका वैसा ही प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। जैसे यदि कोई भक्ति भावों वाला है तो वह अकेला भक्त नहीं बना रहेगा प्रत्युत वह औरों को भी भक्ति भावों से भरपूर कर देता जैसी संगत वैसा ही प्रभाव यह नियम अपनेआप आकर काम कर रहा है। जिस प्रकार का आहार वृतियां बाहर से ग्रहण करती हैं वैसी ही शक्ति मन के अन्दर उत्पन्न हो जाती है। यह एक गम्भीर रहस्य है जो सत्संगति के बिना नहीं खुलता तभी सन्त जनों का उपदेश है कि मलिन मन वाले लोगों से
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वृत्तियों को जोड़ने की अपेक्षा उच्च संस्कार वाले लोगों से मन को जोड़ो। इस तरह जब मन निर्मल हो
जाएगा तो अवश्य ही भजनाभ्यास में रस लेने लगेगा।
परमार्थी जीव के लिये आवश्यक है कि वह सच्छास्त्रों व सत्पुरुषों के बताये हुए सत्कर्मों को नियम पूर्वक करे-जैसे अपने इष्टदेव की श्री आरती उतारना,सत्संग व भजनाभ्यास करना, गुरु सेवा और सद्गुरु का दर्शन ध्यान करना आदि। ऐसे कर्मों को नित्य कर्म कहा जाता है। इन कर्मों का प्रभाव जब मन में संचित होगा तो मन भजन में लगेगा। इसके विपरीत मन को मैला करते हुए हम यह आशा करते हैं कि वह भजन में जुड़े यह कैसे सम्भव है। इसलिये सन्त महापुरुषों ने नित्य कर्मों को करने पर प्रयाप्त बल दिया है। इसका नाम है "भक्तियोग'। अजपाजाप, अनाहत शब्द और सहज समाधि ये सब योग के साधन हैं। साकार रुप की सेवा, ध्यान, सत्संग और प्रेम इसका नाम है भक्ति।
कुछ लोग संसार में आत्मा के कल्याण के लिये योग मार्ग का सहारा लेते हैं और कई भक्ति मार्ग को अपनाते हैं। सत्य तो यह है कि यदि योगाभ्यास में सफलता मिल भी जाय परन्तु उसमें भक्ति का समावेश नहीं है तो उस योगाभ्यासी को माया कभी भी गिरा सकती है। भक्ति सहित योग मार्ग सुरक्षित रहेगा। जीव के अन्दर सद्गुरु निराकार ब्राहृ रुप में विद्यमान हैं और बाहर वही ब्राहृ सर्गुण साकार रुप में प्रकट है। साकार रुप की भक्ति निराकार निर्गुण रुप में पहुँचाएगी। योग मार्ग में यदि कोई साधक पूर्ण नहीं है और भक्ति मार्ग में सफल है तो भी वह अपूर्ण नहीं कहा जाएगा। रामायण में-भगवान श्रीराम-लक्ष्मण के प्रति उपदेश करते हैंः-धर्म ते विरति योग ते ज्ञाना। ज्ञान मोक्ष प्रद वेद बखाना।।
जाते वेगि द्रवौं मैं भाई। सो मम भक्ति भक्त सुखदाई।।
अर्थः-धर्म से वैराग्य और योग से ज्ञान की प्राप्ति होगी। ज्ञान हो जाने पर मोक्ष पद मिलेगा। ऐसा वेद कहते हैं। यह एक नियम है। भगवान आगे कथन करते हैं कि इससे ऊपर अर्थात् धर्म योग-ज्ञान-वैराग्य तथा मुक्ति से भी परे एक और तत्त्व है जिस के द्वारा हे लक्ष्मण! मैं अति शीघ्र प्रसन्न हो जाता हूँ। वह क्या है? वह है मेरी भक्ति-जो भक्तों को सुख देने वाली है। ये उपरलिखित वर्णित सब साधन भक्ति के अधीन हैं। भक्ति स्वतन्त्र है वह किसी और साधन के अधीन नहीं भगवान आगे निर्देश करते हैंः-
सो स्वतन्त्र अवलंब न आना। तेहि अधीन ज्ञान विज्ञाना।।
वह भक्ति कैसी है? स्वतन्त्र है; परमुखापेक्षी नहीं। उस पर किसी का दबाव नहीं है। इसी भक्ति के अधीन ज्ञान और विज्ञान रहते हैं। सन्त भी इसी भक्ति की महिमा का गान करते हैं। भगवान जिस पर प्रसन्न हो जावें उसे फिर और किस वस्तु की कमी रह जाएगी। भगवान तो धर्म, वैराग्य,ज्ञान और मुक्ति सब के स्वामी हैं। किन्तु भक्ति उसे ही प्रदान करते हैं जिस पर वे प्रसन्न हो जावें। इसलिये सन्त महापुरुषों के वचन हैंः- जाके संग एह मन निरमल। जाके संग हर हर सिमरन।।
जाके संग किलविख होये नास। जाके संग रिदै प्रगास।।
पंचम पादशाही श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज के वचन हैं कि जिनके संग से यह मन निर्मल हो जावे, जिसकी संगति से भजनाभ्यास में वृत्ति लगे, जिनके संग से पिछले पापों का नाश हो जाये- जिनके संग से ह्मदय में प्रकाश हो जाये-वे कौन हैं? इसका उत्तर में देते हैं किः-
से सन्तन हरि के मेरे मीत। केवल नाम गाइये जाके नीत।।
वे भगवान के भेजे हुए सन्त मेरे मित्र हैं जिनके संग करने से नाम की कमाई होती है। उनकी सत्संगति में रहने से मन निर्मल होगा, भजनाभ्यास में मन लगेगा पिछले जन्मों के पाप धुल जायेंगे और ह्मदय में आत्मा की ज्योति जगमगा उठेगी। कारण-उनका अन्तःकरण नितान्त विशुद्ध है।
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जब जीव की वृत्ति रुपी मक्खियां उस परम पवित्र शुद्ध रस को खींच कर अन्दर ले जाएंगी तो जीव का मन भी पवित्र और स्वच्छ बनेगा। इसका नाम है क्ल्याण-जीव का सुधार-मन इस कार्य में अवश्य ही मीन-मेष करता है।
लोग कहते हैं कि रोज-रोज़ इष्टदेव के दर्शन करने की क्या आवश्यकता है? प्रतिदिन सत्संग का श्रवण करना क्यों आवश्यक है? भला-विचार किया जावे कि वृत्तियां बाहर से सांसारिक सामान ला लाकर मन को मैला तो प्रतिदिन कर रही हैं-मन को मैला करने का काम तो दैनिक होता हो और झाड़ू कभी कभी दिया जाये-यह तो उचित नहीं। इसलिये सन्त उपदेश करते हैं कि हर रोज़ इष्टदेव की श्री आरित-पूजा, भजनाभ्यास और ध्यान किया करो। ये सब नित्य कर्म हैं। जैसे आपको प्रतिदिन अपने कार्य पर जाना पड़ता है और कई प्रकार के दैनिक कार्य-व्यवहार से ये मन की वृत्तियां मलिनता को अन्दर लाती रहती हैं। वृत्तियों का स्वभाव ही यह है कि वे प्रतिपल कुछ न कुछ मैल अन्दर लाती ही रहती हैं। माया और मायावी पदार्थों के प्रभाव हर घड़ी मन को दूषित करते ही रहते हैं-यदि सफाई का नियम रुक जाये या कभी कभी चले तो यह उचित नहीं। स्वच्छता का कार्य भी साथ साथ ही होना चाहिये।
अपने गुनाहों का लगा लेना हिसाब रोज़-रोज़।
उन पै रोना रोज़ और, आँसूं बहाना रोज़-रोज़।।
यदि भजन में मन नहीं लगता तो इसकी चिन्ता न करो। यदि गत जन्मों के संस्कारों करके मन दूषित है और भजन में नहीं लगता तो कोई बात नहीं। आगे के लिये तो अच्छा बन ही रहा है। वर्तमान कर्मों का महत्व बहुत बड़ा है। यदि पिछले संस्कार किसी के अच्छे नहीं है और वतर्मान में वह अच्छे कर्म कर रहा है तो वर्तमान के शुभ कर्म उसके दुषित विचारों को दबाकर स्वयं प्रधान हो जायंगे। इसके विपरीत यदि किसी के गत जन्मों के संस्कार अच्छे हैं और वर्तमान काल के कर्म बुरे हैं तो ये बुरे संस्कार और कर्म इतने प्रबल हो जायेंगे कि उसके पिछले अच्छे संस्कारों को भी परास्त कर देंगे। यह प्राकृतिक नियम है।
इस भेद को सामने रखते हुए सत्पुरुषों ने निर्णय किया है कि दैनिक कर्तव्यों की उपेक्षा न करो अहंकार और लोभ आदि को त्याग कर नित्य कर्म निरन्तर करते जाओ। भक्ति मार्ग में काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार रुपी चोर भी घात में रहते हैं और मन के साथ मिलकर कमाई लूट भी लेते हैं। साधक का धर्म है कि वह अहंकार को दिल से निकाल कर सेवा करता जावे।
सेवा दा आवे हंकार-न उर वार न ओह पार।।
इस बात को ध्यान में रखकर मनुष्य अपनी साधना में जुटा रहे फिर देखे कि उसमें भक्ति की शक्ति आती है या नहीं। वह शक्ति दिन दुगुनी और चौगुनी होगी। यदि काम क्रोधादि चोर भी साथ में हों तो वही कहावत लागू होगी""अन्धी पीसे कुत्ता चाटे।'' भक्ति इस तरह से करनी चाहिये कि चोरों का भय न बना रहे और भक्ति सब प्रकार से सुरक्षित रहे।
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