महापुरुषों का कथन हैः-मनु माइया मैं रमि रहिउ निकसत नाहिनि मीत।
नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहनि भीत।।
गुरुवाणी, सलोक म.-9
फरमाते हैं कि इस जीवात्मा को जो मानुष चोला प्राप्त हुआ है तो उसके साथ ही प्रकृति ने मनुष्य को एक महान शक्ति भी प्रदान कर दी है जो मनुष्य के अन्दर काम कर रही है। वह शक्ति है मनुष्य का मन, परन्तु यह मन कैसा है? यह माया के संग मिला हुआ है। माया के संग मिलकर यह उसमें रच गया है। किस प्रकार? सत्पुरुष उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार चित्रकार लोग दीवार पर चित्र बना देते हैं तो उसे फिर दीवार से अलग करना सम्भव नहीं होता क्योंकि वह दीवार में रच गया है, इसी प्रकार यह मन माया के साथ कुछ ऐसा गहरा मिल गया है कि अब यह माया को छोड़ता नहीं, उससे अलग नहीं होता।
कई जन्मों से माया के पदार्थों के साथ लगाव रखते-रखते जीवात्मा उनके अधीन हो गया है। अनेक जन्मों के संस्कार मन में इतने गहरे उतर चुके हैं कि मन अब उनसे अलग होना तो एक ओर, उन्हें छोड़ने की बात सोच भी नहीं सकता। आम संसार की यही दशा हो रही है कि माया से गहरा लगाव होने के कारण सुरति माया के पदार्थों और विषय भोगों में ही सदैव लगी रहती है इसी कारण आम संसारी मनुष्य परेशान और दुःखी भी रहता है। मन और माया के अधीन होकर उसे सुख का सांस लेना भी दुर्लभ होता है। मन की यह स्वाभाविक विशेषता है अथवा यूं कहा जाये कि जन्मों से पड़ी हुई आदत का परिणाम है कि यह सदैव माया की ओर, बुराई की ओर और बंधन की ओर ही दौड़ता है, जिन कार्यों में आत्मा की भलाई एवं मुक्ति है। उनकी ओर उसका झुकाव नहीं होता। जिस प्रकार जल सदैव निचाई और ढलान की ओर दौड़ता है। पानी कहीं भी छोड़ा जाये, ढाल की ओर वह अपने आप चला जायेगा, इसमें तनिक भी देर नहीं लगेगी और न किसी प्रकार का परिश्रम करना पड़ेगा। परन्तु उसी जल को यदि ऊँचे स्थान पर ले जाना हो तो उसमें काफी परिश्रम लगता है और कई प्रकार के यत्न एवं साधन करने पड़ते हैं तब कहीं जल ऊपर चढ़ता है। फिर उसे ऊपर रोक रखने के लिये भी काफी प्रबन्ध और होशियारी की आवश्यकता है, तभी उससे लाभ भी उठाया जा सकता है। इसी प्रकार मन भी सदैव गिरावट की ओर, बुराई की ओर झट दौड़ जाता है और इसमें तनिक भी देर नहीं लगाता, परन्तु यदि इससे आत्मिक भलाई और परमार्थ का कार्य लेना हो तो यह सैंकड़ों बाधायें खड़ी करता है। इसे भक्ति एवं परमार्थ की ओर लगाने में काफी परिश्रम एवं यत्न के साथ-साथ दृढ़ निश्चय की भी आवश्यकता होती है।
माया की ओर मन शीघ्र क्यों भागता है? इसलिये कि माया ने भी इसे खींचने के लिये बहुत बड़ा जाल फैला रखा है। मन को लुभाने वाले अनेक पदार्थ, शारीरिक सुख-भोग आदि मन को बहलाने फुसलाने के लिये माया ने बना रखे हैं। ये मानों उसे फंसाने के लिये दाना डाला गया है। मन इन रसभोगों के पीछे पागलों के समान दौड़ता है और अपने साथ जीवात्मा को भी घसीट ले जाता है। इस प्रकार मन ऐन्द्रिक सुख-भोगों में फंसकर जीवात्मा को भी सत्मार्ग से भटका देता है और इन्हीं सुख-भोगों को ही जीवन का ध्येय मान कर उनके अधीन हो जाता है और इस प्रकार अपना मूल्यवान जीवन व्यर्थ गंवा देता है।
आम संसारी लोगों की तो यह दशा हो रही है जिसका वर्णन ऊपर हुआ है अर्थात् वे जीवन के वास्तविक ध्येय आत्मा की मुक्ति से असावधान होकर मन माया के अधीन रहकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। परन्तु गुरुमुखों और विचारवानों का मार्ग भिन्न है। सत्संग के प्रताप से उन्हें यह सूझ-बूझ प्राप्त हो गई है कि लाभ किस में है और हानि किस में है। वे मन के विचारों के वश नहीं होते अपितु अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनते हैं और सत्यता की ओर अग्रसर होते हैं; सांसारिक सुख भोगों में न फंस कर वे अपना दिल भक्ति में लगाते हैं और मालिक की प्रसन्नता प्राप्त करते हैं।आम संसारियों और गुरुमुखों में यही वास्तविक अन्तर है।
यह समझ आम संसार को बहुत कम होती है कि आत्मा का कल्याण करना ही जीवन का वास्तविक ध्येय है अर्थात् जिस जन्म मरण और आवागमन के चक्र में आत्मा लम्बे समय से पड़ी हुई है, उसे उस चक्र से मुक्त कराना और मालिक के साथ मिलाना ही मनुष्य का वास्तविक ध्येय है। इस वास्तविक ध्येय से असावधान होकर और शरीर एवं इन्द्रियों की कामनाओं में फंसकर आम मनुष्य अपने जीवन को अकारण ही गंवा रहा है। सत्पुरुषों की संगति और उनकी कृपा के बिना वास्तविक ध्येय का ज्ञान नहीं हो सकता। सत्पुरुष समझाते हैं कि विचार करके देखो कि जिस प्रकार मन के वश होकर दुःख एवं कष्ट की अवस्था में जीवन व्यतीत हो रहा है, क्या मानव जीवन की उपलब्धि यही है? नहीं, नहीं। मानव जीवन की उपलब्धि तो इससे नितान्त भिन्न है और अत्यन्त उच्च एवं उत्तम है। मन इस पर विचार करे तो वास्तविकता स्वयमेव समझ में आ जायेगी। जब सन्तों के वचनों पर मनुष्य विचार करेगा तो मन का धोखा एवं भ्रम दूर होकर वास्तविकता सामने आती जायेगी।
मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य तो यही है कि मनुष्य मालिक का भजन सुमिरण करके मालिक की प्रसन्नता प्राप्त करे और मालिक के चरणों तक पहुँच प्राप्त करके शाश्वत आनन्द को प्राप्त कर ले। परन्तु दूसरी ओर मन माया का जाल भी शक्तिशाली है और उनके वश होकर मनुष्य इस ध्येय को भूल जाता है और धोखे में जन्म व्यर्थ कर देता है। गुरुमुख जनों के उच्च संस्कार होते हैं। वे आत्मा की आवाज़ को सुनते हैं और मन माया के पंजे से निकल कर भक्ति की कमाई में लग जाते हैं।
सभी सन्तों महापुरुषों का यही कथन है और ग्रन्थशास्त्र भी यही बतलाते हैं कि मानव जीवन की प्राप्ति सौभाग्य से होती है। इससे बढ़कर सौभाग्यशाली वे हैं जिन्हें मानुष जीवन में सन्तों सत्पुरुषों की शरण संगत प्राप्त हो जाये। सत्पुरुषों के वचन हैंः-
कोटि जन्म भ्रमि भ्रमि आइउ। वडै भागि साध संगु पाइउ।।
गुरुवाणी, रामकली म.-5
अर्थः-करोड़ों जन्मों से जीव मोह माया के चक्र में भटकता चला आया है। बड़े भाग्यों से इसे करोड़ों जन्मों के पश्चात् साधु सन्तों की शरण-संगत का अमूल्य अवसर प्राप्त हुआ है। जब बड़े भाग्यों से सन्तों सत्पुरुषों की चरण-शरण में आने का सुनहरी अवसर मिल गया तो मनुष्य को इससे पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करना चाहिये। सत्संग में ही यह विचार उत्पन्न होता है कि इस अमूल्य समय में आत्मा के कल्याण का यत्न करना है और सदैव के लिये जन्म मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त करनी है। दूसरी ओर यह भी सही है कि जब गुरुमुख नाम एवं भक्ति की कमाई के मार्ग पर चल पड़ता है तो उधर मन और माया भी पूरी शक्ति से सामना करते हैं। वे नहीं चाहते कि उनके चंगुल में आया हुआ जीव स्वतंत्र हो जाये। जहां आम संसारी जीव मन की पकड़ में आया हुआ है और इसी दशा में प्रसन्न है, वहां गुरुमुख मन के चंगुल से मुक्त होने के लिये पूरा यत्न और पुरुषार्थ करते हैं। मन एवं मन के विकार सदैव अपना दांव चलाने की घात में रहते हैं। गुरुमुख को भी सदैव उनके दांव पेच से बचने के लिये सावधान रहना पड़ता है। यह भी सही है कि अपनी शक्ति से जीव मन-माया को पराजित नहीं कर सकता। इसके लिये उसे भी किसी अत्यन्त बलशाली शक्ति की सहायता की आवश्यकता है। वह शक्ति है सन्त सद्गुरु की कृपा।
हेच नकुशद नफ़स रा जुज़ ज़ुल्ले पीर।
दामने आं नफ़स कुश रा सख्तगीर।। (मौलाना रुमी साहिब)
अर्थः-""दुष्ट मन को परिपूर्ण सन्त सद्गुरु की कृपा के सिवा और कोई शक्ति नहीं मार सकती। इसलिये ऐ भक्ति परमार्थ के अभिलाषी! मन को मारने वाले उस परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव का आंचल दृढ़ता से पकड़ ले।'' मन को मारने अथवा वश करने वाली शक्ति केवल सद्गुरु का शब्द ही है। सद्गुरु का आंचल दृढ़ता से पकड़ रखने और सद्गुरु-शब्द की कमाई करने से अन्त में मन पराजित हो जाता है और अपने ओछे अस्त्र-शस्त्र फेंककर आज्ञाकारी बन जाता है। जहां सम्पूर्ण संसार मन का आज्ञाकारी एवं दास बना हुआ है, वहां शब्द की कमाई करने वाले गुरुमुखों का यह मन ही आज्ञाकारी दास बन जाता है। इसलिये गुरुमुख को मन के विरुद्ध अत्यन्त चौकन्ना और सावधान रहकर सद्गुरु-शब्द का अभ्यास करना अत्यन्त आवश्यक है। भक्ति के जितने भी साधन जैसे सत्संग, शब्द-अभ्यास, सन्तों की सेवा आदि नित्य नियम हैं, ये सब मन को मारने के शस्त्र हैं। इन शस्त्रों के द्वारा मन एवं मन की सेना को पराजित करना है।
जिस प्रकार धनवान का धन-सम्पत्ति को लूटने के लिये चोर और लुटेरे घात लगाये रहते हैं, वैसे ही गुरुमुखजन जो भक्ति-धन संचित कर रहे हैं, उनके धन को लूट ले जाने के लिये भी लुटेरे हर समय तत्पर हैं-ये लुटेरे मन के विकार हैं। मन ने भी अपनी एक सेना तैयार कर रखी है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, ईष्र्या,तृष्णा आदि अनेक विकार मन के संकेत पर कार्य कर रहे हैं और ये भक्ति के धन को लूटने की घात में हैं। गुरुमुख जो भक्ति की कमाई करता है तो उसके साथ-साथ उसे यह ध्यान भी रखना है कि कहीं ये विकार उसकी कमाई को नष्ट तो नहीं कर रहे। यह तो स्वाभाविक ही है कि जहां खज़ाना होता है वहां उसे हथियाने के लिये चोर-लुटेरे भी आ उपस्थित होते हैं।
जिज्ञासु जो भक्ति की कमाई करने में लगा है स्वयं ही अपने भीतर झांककर ज्ञात कर सकता है कि मेरी कमाई सुरक्षित है अथवा कहीं इसे विकार तो लूट कर नहीं ले जा रहे हैं? ऐसा तो नहीं कि स्वयं तो ज्ञान न पड़ता हो जबकि सावधान एव चैतन्य हो। जब भी यह अनुभव हो कि मन के विकारों की विजय हो रही है तत्काल सद्गुरु-शब्द के शस्त्र से विकारों का सामना करे वरना यदि असावधान रह गया तो मन तो अपना वार करने से कभी चूकता नहीं। इसीलिये महापुरुष उपदेश करते हैंः-
मन लोचे बुरिआइयां गुर सब्दी एह मन होड़िये। (गुरुवाणी)
अर्थः-मन तो बार-बार बुराईयों की इच्छा उत्पन्न करता है। इसलिये मन जब भी बुराई की ओर जाने लगे गुरु के शब्द की लगाम देकर इसे उस ओर जाने से रोकना चाहिये। यह सत्य है कि भक्ति की धन-सम्पत्ति के सामने तीन लोक की सम्पदा भी निम्न कोटि की है। जैसे हीरे के सामने कौड़ियों का कोई मूल्य नहीं, वैसे ही जो मनुष्य भक्ति का मूल्य जानता है उसकी दृष्टि में संसार की धन-सम्पत्ति का कोई मूल्य नहीं। सन्तों का कथन हैः-
कबीर सब जग निर्धना, धनवन्ता नहि कोय।
धनवंता सोई जानये, जाके सतनाम धन होय।।
फरमाते हैं कि सम्पूर्ण संसार ही निर्धन एवं कंगाल है, यहां किसी को भी धनवान मत जानो। वास्तव में धनी तो वह है जिसके पास सच्चे धन नाम की पूंजी है। सन्तों के विचार से सांसारिक धन-सम्पत्ति को प्राप्त करके कोई धनी नही हो जाता। जो परमार्थ का मूल्य जानते हैं, संसार की धन-सम्पत्ति उनकी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं रखती क्योंकि यह असत् सम्पदा किसी के पास सदैव रहती नहीं; यह आज है तो कल नहीं, इसलिये इसका अहंकार असत् है। नाम एवं भक्ति की सच्ची सम्पदा के सामने भला यह असत् सांसारिक सम्पदा क्या मूल्य रखती है? गुरुमुख जो नाम और भक्ति की पूंजी संचित कर रहे हैं, वे सच्चे धनवान हैं। जो नाम की सम्पदा से वंचित हैं, उनके पास सासांरिक सम्पदा के चाहे अंबार ही क्यों न हों, वास्तव मे वे निर्धन और कंगाल हैं। धनी वही है जिसके पास सच्चे नाम की पूंजी है।
साधु-सन्त, महात्मा एवं भक्तजन जिन्होने भक्ति की कमाई की और नाम का धन पाकर मालामाल हुये, उनके इतिहास पढ़-सुनकर देखो। वे यद्यपि अब इस संसार में विद्यमान नहीं, परन्तु नाम की कमाई के प्रताप से उनका नाम आज तक संसार में जीवित और विद्यमान है। आज तक लोग उनकी पूजा करते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करके अपनी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। उनका नाम लेने और उनको स्मरण करने से संसारियों की कामनायें पूर्ण होती हैं। क्या इससे सिद्ध नहीं होता कि नाम और भक्ति की कमाई ही सर्वोत्तम है। नाम की कमाई करने वालों पर सब संसार आश्रित है परन्तु जो नाम का धनी है वह कभी किसी पर आश्रित नहीं होता।
अतएव इन बातों को ध्यान में रखते हुए सदैव नाम की कमाई करने में दिल लगाना चाहिये। परन्तु नाम की कमाई करते हुये गुरुमुख को यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कहीं मन एवं मन के विकार उसकी कमाई को नष्ट न कर दें। इसी प्रकार सदैव मन के आक्रमणों से सावधान रहकर और मन के चंगुल से स्वतंत्र रहकर केवल सद्गुरु शब्द का सहारा लेना है और सद्गुरु-शब्द की कमाई करते हुए अपने वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचना है। यही जीवन की उपलब्धि है।
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