Saturday, October 29, 2016

भक्ति की प्राप्ति


     भगवान श्री रामचन्द्र जी महाराज अयोध्यावासियों को उपदेश देते हुए कथन करते हैंः-
                भक्ति स्वतन्त्र सकल गुण खानी। बिनु सत्संग न पावहिं प्रानी।।
                पुण्य-पुञ्ज बिनु मिलहिं न सन्ता। सतसंगति संसृति कर अन्ता।।
      ऐ अयोध्यावासियो! भक्ति स्वतन्त्र है अर्थात् वह किसी के अधीन नहीं है। सब गुणों की वह खान है। जितने गुण हैं सब भक्ति से उत्पन्न होते हैं किन्तु ऐसी भक्ति जो गुणों की खान है और स्वाधीन है मिलती कहां से है? फरमाते हैं कि सत्संग के बिना भक्ति को कोई जीव प्राप्त नहीं कर सकता। सत्संग नाम है सन्तों के संग का। उनकी संगति हासिल किये बिना भक्ति नहीं मिल सकती। सन्तों का मिलाप भी कोटि जन्मों के पुण्यों के द्वारा हुआ करता है। जब सन्तों का संग हो जाये तो समझो कि यह पिछले कई जन्मों के शुभ कर्मों का परिणाम है और भगवान की दया है।
     संसारी जीव भगवान की दया का स्वरुप कुछ और समझते है उनका विचार तो यह है कि धन-सम्पत्ति-सन्तान और मान प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाये तो ईश्वर की बड़ी दया हो गई। इन्हीं चीज़ों को वे अपना भाग्य मानते हैं सच्चाई तो यह है कि जब जीव को सत्पुरुषों की संगति मिल जाय तो अपने भाग्य समझने चाहियें। सन्तों की संगति के मिल जाने पर ही जीव जन्म-मरण के चक्र से छूट जायेगा और मोक्षपद का अधिकारी जा बनेगा। अब हमको सोचना चाहिये कि हम कितने भाग्यशाली हैं जो ऐसा ऊँचा आध्यात्मिक दरबार मिला है। ऐसे परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव जी का सत्संग मिल गया और उनसे नाम की प्राप्ति भी हो गई। इस रहस्य को वे ही जान सकते हैं जिनकी आँखें खुली हैं।
     हनुमान जी जब सीता जी की खोज करते हुए लंका में गये तो क्या देखा कि सारी नगरी राक्षसों से भरी हुई है। फिरते-फिराते एक ऐसी जगह पहुंचे जहां भवन के बाहर "रामनाम' अंकित था। उन्हें यह देखकर बड़ा अचम्भा हुआ कि कहां यह राक्षसों की सारी नगरी और कहां राम-नाम! सोचने लगे कि यह तो कोई राम-भक्त नज़र आता है। प्रातःकाल का समय था। विभीषण जी उठे और उन्होने राम-नाम का स्मरण किया। हनुमान जी को अब तो निश्चय हो गया कि यह कोई भगवान का भक्त है। इससे अवश्य ही मित्रता करके अपने मन का हाल कहना चाहिये। हनुमान जी विभीषण जी से मिले-दोनों के ह्मदय आनन्द से भरपूर हो गये। तब विभीषण ने कहाः-
                अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।
हे हनुमान जी! अब मुझे भरोसा हो गया है कि मुझ पर भगवान की दया है। भगवान की कृपा के बिना सन्तों का मिलाप नहीं हो सकता।
     जो लोग सत्संग में आ गये उनके भाग्य खुल गये हैं। अब उनको चाहिये कि वे अपने भाग्यों का दुरुपयोग न करें। उनका सत्संग में आना केवल भक्ति के हेतु है। भक्ति नाम है दर्शन का, सेवा का और वचनों को सुनने का। ये सब भक्ति के अंग हैं। अगर इनको छोड़कर जीव सत्संग में यदि आता है और मन में अनेक सांसारिक इच्छाओं को संजोए हुए है तो समझो वह अपने भाग्यों को ठुकराता है। उसने भगवत्कृपा का मूल्य सही नहीं आँका।
     क्या हम सत्संग में मायावी पदार्थ मांगने आये हैं? संसारी चीज़ें तो जो हमारे प्रारब्ध में हैं हमें मिल कर रहेंगी। हम चाहे उनकी मांग करें या न करें। जो कुछ भी हमारे भाग्यों में बदा है वह मिल कर रहेगा। अगर सत्संग में आकर भी माया माँग ली और माया मिल भी गई तो परिणाम क्या होगा-शरीर छोड़ते समय यदि सुरति माया में चली गई तो उसे सर्प की योनि मिलेगी मनुष्य से गिर कर यदि जीव सर्प-योनि
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में चला गया तो कितने बड़े घाटे का काम उसने किया। इसका नाम है भाग्यों का दुरुपयोग। इसलिये शिष्य को गुरु-दरबार में पहुँच कर कभी भी मायावी पदार्थों की मांग या इच्छा नहीं करनी चाहिये। यदि कुछ मांगना ही है तो भक्ति-सेवा और दर्शनों की मांग करे।
      भक्ति का दूसरा अंग है दीनता-ग़रीबी। मायाधारी ग़रीब नहीं बन सकता। ग़रीबी का भाव है विनयशीलता और सेवकपन। ऐसा तो कोई करोड़ों में से एक ही निकलता है जो माया पति भी हो और अहंकार रहित भी अन्यथा माया तो सबको अन्धा बना देती है। भक्ति सदा दीनता में निवास करती है। फल वाली टहनी हमेशा झुक जाती है। जिस शाखा पर फल नहीं आये वह सीधी खड़ी रहती है।
                ऊंचे पानी नहिं टिके, नीचे ही ठहराय।
                नीचा होय सो भर पिये, ऊँच प्यासा जाय।।
     जहां अहंकार है वहां भक्ति का क्या काम? रावण अभिमानी था और उसका सगा भाई विभीषण राम का भक्त था। रावण का पुतला बनाकर लोग उसे प्रतिवर्ष भरी समाज में जला देते हैं क्या कभी विभीषण के साथ भी ऐसा हुआ? कारण इसका यह कि विभीषण के अन्दर भक्ति थी और रावण भक्ति विहीन था।
     इसलिये दास बनना सीखो। इसमें सुख है। दास केवल गुरु का नहीं अपितु गुरु के दासों के भी दास बनो। मालिक अन्तर्यामी हैं। वे शिष्य की सारी दिनचर्या को गुप्तरुप से निहार रहे हैं। भक्ति दिखावे को पसन्द नहीं करती। कई लोग दरबार में सेवा इस भावना से करते हैं कि लोग उन्हें भक्त कहें। भक्ति के कर्म लोगों को दिखाकर करते हैं। भक्ति मार्ग में इस बात को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। बीज जो धरती में दब जाता है, वह उगता है और फल देता है-वह मिट्टी में खुद को गला कर अपना रंग-रुप खो देता है। जो बीज धरती के ऊपर ही पड़ा रहा वह निष्फल चला गया। इसी तरह गुप्त रुप से की हुई भक्ति फल देती है और दिखावे की भक्ति ऊपर पड़े हुए बीज की तरह निर्रथक चली जाती है।
     पंचम पादशाही श्री गुरु अर्जुन देव जी का युग था। एक शिष्य ने गुरु महाराज जी के सम्मुख खड़े होकर विनय की-"प्रभो! सच्चे गुरुमुख की महिमा को सर्वदा सुनते हैं-कृपया उसके दर्शन भी कराओ।' सुनकर फरमाया-अच्छा भाई! कभी प्रत्यक्ष रुप में तुम्हें सच्चे गुरुमुख के दर्शन करवाएंगे। कुछ समय पीछे उसी शिष्य को बुलाकर कहा कि "यह हमारा आज्ञापत्र ले जाओ और अमुक ग्राम में हमारा एक सिख रहता है उससे सरोवर की सेवा के लिये पाँच सौ रुपये ले आओ।'
     उस काल में पाँच सौ रुपये बहुत कीमत रखते थे। आज कल जैसा युग न था। वह प्रेमी हुकुमनामा लेकर चल पड़ा। सोचता जाता है कि जिसके नाम यह हुकुमनामा है न जाने वह कितना बड़ा सेठ होगा। पूछताछ करता हुआ वह उस गाँव में जा पहुँचा और उस गुरुमुख के घर जाकर वह आज्ञापत्र उसे दे दिया। वह सिख कैसा था? अत्यन्त निर्धन। घास खोदकर निर्वाह करता था। आज्ञापत्र पढ़ते ही उसके हर्ष का कोई पारावार न रहा। उसे यह चिन्ता न हुई कि पाँचसौ रुपये कहां से आएंगे। वैसे तो उसके पास पाँच पैसे भी न थे। मन में बारम्बार श्री गुरुमहाराज जी का धन्यवाद करता है कि धन्य हैं गुरु महाराज जिन्होंने मुझ जैसे पापी और गुनहगार को भी अपने दासों में गिन कर सेवा का सौभाग्य दिया है। मन में उसे यह भी विश्वास है कि जिन्होने यह आज्ञा भेजी है उसको पूर्ण करने की शक्ति भी साथ में अवश्य भेजी होगी। मैं कौन करने वाला। करने करानेवाले वे मालिक आप हैं।
     मालिक की मौज। उसी समय नगर में ढिंढोरा फिर रहा था कि एक शाही पहलवान मस्कीनियां आया है। उसके साथ जो कुश्ती लड़ेगा उसे जीतने पर एक हज़ार रुपये इनाम दरबार की ओर से मिलेगा और हार जाने पर भी पाँच सौ रुपये पारितोषिक मिलेगा। यह डोंडी सुनकर वह अति प्रसन्न हुआ। दंगल
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का जो समय निश्चित था दूर दूर से पहलवान वहाँ पहुँच गये। दर्शकों की भी वहाँ भीड़ लग गई। मस्कीनियां शाही पहलवान अखाड़े में लगा झूमने। उसे देखकर किसी का साहस नहीं होता था कि सामने आकर ताल ठोंके।
     हार जाने पर भी पाँच सौ रुपये इनाम इसलिये रखा गया था क्योंकि मस्कीनियां की मार यदि कोई एक बार भी खा लेता था उसकी दुर्दशा हो जाती थी। देखते देखते वह गुरु का सिख-दुबला-पतला अखाड़े में मस्कीनियां से लोहा लेने के लिये कूद पड़ा। लोगों ने यह तमाशा देखकर ताली पीटनी शुरु कर दी। लोग यह सोचने लगे कि ऐसा लगता है यह बूढ़ा मरियल आदमी घर से दुःखी होकर मरने को आया है। इधर मस्कीनियां को भी उसे देखकर अचम्भा हुआ कि इसमें अवश्य ही कोई भेद है। वह पूछे बिना रह न सका। उसने कहा-भले पुरुष! आपको मेरे साथ कुश्ती लड़ने का कैसे साहस हुआ? पहले उस गुरुमुख ने मस्कीनीयां को टालने की कोशिश की अन्त में उसने सत्य-सत्य सब भेद बता ही दिया। वह बोला- मुझे श्री गुरु महाराज जी का हुक्म पाँच सौ रुपये सेवा करने का हुआ है। मैं तो हारने के लिये आया हूँ। चाहे मेरा शरीर चला जाय मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं। किन्तु श्री गुरु महाराज की आज्ञा अवश्य पूरी होनी चाहिये। सिख ने आगे कहा कि भाई! एक शरीर तो क्या यदि मैं लाखों शरीर भी गुरु जी की प्रसन्नता पाने के लिये कुर्बान कर दूँ तो भी मैं उनके अगणित उपकारों का बदला नहीं चुका सकता।
     उसके ऐसे भाव गर्भित वचन सुनकर मस्कीनियां अत्यन्त प्रभावित हुआ। कहने लगा-आफ़रीन-आफ़रीन! इतनी सच्चाई! अच्छा भाई! जिन गुरु महाराज जी के लिए तुम इतनी कुर्बानी करने को तैयार हो मुझे भी उनके दर्शन कराओ। हम दोनों लोगों के दिखावे के लिये झूठ-मूठ लड़ाई लड़ते हैं-ऐसा करते करते मैं अपने आपको नीचे गिरा दूँगा और तुम मेरे ऊपर आ बैठना। इस प्रकार मैं हार जाऊँगा और तुम जीत जाओगे। तुम्हें एक हज़ार रुपये इनाम मिलेगा। उन में से पाँच सौ रुपये तुम और पाँच सौ रुपये मैं-दोनों श्री गुरु महाराज जी की दर्शन भेंट करेंगे।
     ऐसा आपस में विचार-विमर्श करके दोनों अखाड़े में लगे कुश्ती लड़ने। होना तो वही था जैसा उन्होंने पहले ही निर्धारित कर लिया था लोगों ने भी देखा कि मस्कीनियां हार गया और  बूढ़ा आदमी जीत गया। लोगों की हैरानी की हद न रही। विश्व प्रसिद्ध पहलवान मस्कीनीयां आँखें नीची करके निकल रहा है। उसने केवल गुरु दर्शन की खातिर अपने मान को धूलि में मिला लिया। गुरु प्रेमी को एक हज़ार रुपये का इनाम मिल गया। मस्कीनियां को साथ लेकर दोनों श्री गुरु दरबार में इनाम सहित उपस्थित हुए। वह हुकुमनामे को पहुँचाने वाला सिख भी उनके साथ में था।
     श्री गुरु महाराज जी उस समय श्री सुखमनी साहिब की रचना कर रहे थे। ग्यारहवीं अष्टपदी लिख चुके थे। अगली अष्टपदी लिखना ही चाहते थे कि ये तीनों श्री चरणों आ खड़े हुए। सारा वृत्तान्त श्री चरण कमलों में सुना दिया। सुनकर श्री गुरु महाराज जी अति प्रसन्न हुए और उन्होने बारहवीं अष्टपदी के आरम्भ में वचन उल्लिखित कियेः-
                सूखी वसे मसकीनियां आप निवारि तले।
                वडे वडे अहंकारिया नानक गरबि गले।।
     भक्ति, जिसकी इतनी महिमा है और जो गुणों की खान है, वह प्रेम-सच्चाई और कुर्बानी से मिलती है। भक्तिमान जीव दीनता से प्यार करते हैं अहन्ता से नहीं। लोग बातों से भक्ति लिया चाहते हैं। भला जो इतनी अमूल्य वस्तु है वह खाली बातों से कैसे हाथ आ सकती है?
     सन्त सद्गुरु ही जीव को भक्ति पथ पर चला सकते हैं। वे हमारी आत्मा के परम हितकारी हैं और
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सच्चे साथी हैं। संसार में कोई भी दूसरा उनके समान हितैषी नहीं है। जो जीव गुरु की चरण-शरण में आ गये हैं, जिन्हें उनके सत्संग की प्राप्ति हो गई है उनके अत्युत्तम भाग्य हैं। कोई कहां तक उनकी सराहना करे। उनको इस दुर्लभ संयोग का आदर करना चाहिये। गुरु वचनों को शिरोधार्य कर जीवन यापन करना चाहिये। समय धीरे धीरे गुज़रता जा रहा है। पानी के बहाव की भांति जो समय निकल गया फिर हाथ नहीं आता। समय का यही सदुपयोग है कि कोई भी क्षण मालिक के सुमिरण बिना व्यतीत न हो। सच्चा जिज्ञासु इस तरह आचरण करता हुआ सच्ची भक्ति का अधिकारी बन जाता है और लोक व परलोक दोनों को सफल बना लेता है

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