Sunday, July 3, 2016

गुरु की मानें-मन की नहीं


     मनुष्य जन्म एक ऐसी विशेष जगह है जिसमें चाहे तो जीव अपनी आत्मा को यानी अपने आपको परमपद तक पहुँचा दे अथवा नीच योनियों का शिकार बना दे। दोनों प्रकार की शक्तियां इस स्थान पर पहुँच कर मनुष्य में आ जाती हैं। सन्त कथन करते हैं कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है। कर्म करने में विधाता की ओर से इस मानव पर कोई दबाव नहीं है। चाहे जीव अच्छे कर्म करे अथवा बुरे इस बात का निर्णय करने वाला यह आप है। अच्छे कर्म इसे अच्छा बना देंगे और बुरे कर्म करने से यह बुरा हो जाएगा। अच्छे और बुरे कर्म एक प्रकार के बीज हैं जिन्हें यह स्वयमेव बो रहा है। जैसा यह बोएगा वैसा ही फल इसे मिलेगा।  ""जेहा बीजै सो लुणै करमा संदड़ा खेत''
इसका अभिप्राय दूसरे शब्दों में यह हुआ कि मनुष्य ही परलोक को बनाने या बिगाड़ने वाला है। उसकी इच्छा है कि वह जीवात्मा को बन्धन में डाले अथवा उसे मुक्त कर दे। अब विचार करना है कि जीव बुरे अथवा पाप कर्म क्यों करता है? इसका कारण यह है कि वह अपने मालिक को अन्तर्यामी नहीं जान रहा। प्रभु को अगर यह अन्तर्यामी और सर्वव्यापक समझे तो अवश्य ही यह पाप कर्मों से बच सकता है।
      ईश्वर के दो स्वरुप हैं-एक निराकार और दूसरा साकार। परमात्मा घट घट वासी और सर्वशक्तिमान है यह उस परमात्मा के निराकार स्वरुप की महिमा है। दूसरा रुप परमात्मा का साकार है जिसे "अवतार अथवा "गुरु' कहते हैं।"गु' का अर्थ अन्धेरा और "रु' का अर्थ "प्रकाश' है गुरु का अर्थ यह हुआ कि जो जीव को अन्धेरे से निकाल कर प्रकाश में ले आवे। साकार रुप सदा भूले भटके जीवों या पाप कर्मों से दुःखी जीवों को अन्धकार से प्रकाश में लाते हैं। यदि एक जीव साकार रुप से छिपकर पाप करता है और
वह समझता है कि मुझे मेरा भगवान नहीं देख रहा तो ऐसी दशा में वह अपने पाप को निराकर भगवान
से कैसे छिपायेगा? निराकार रुप तो हमारे अन्दर बैठकर हमारी सारी कार्रवाही को देखता है और कर्मों
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का लेख लिखता रहता है। जब जीव परलोक में प्रभु दरबार में पेश होगा तो वहां निर्णय उसके कर्मों के चिट्ठे पर होगा। वहां किसी की साक्षी हो तो वहां साक्ष्य देने की आवश्यकता ही क्या रहेगी। सन्त फरमातें हैं कि प्रभु के दरबार में न अपील, न वकील और न दलील की ही अपेक्षा रह जाती है। यह नियम प्रत्येक जीव पर चाहे वह कोई भी हो लागू है।
     जीवात्मा कर्म चक्र में उलझा हुआ बार बार नीच योनियों का शिकार होता रहता है। मन के अधीन रहकर यह अनेक प्रकार के  कष्ट उठाता रहता है। महापुरुष इसे स्वतन्त्र कराने का प्रयत्न करते हैं। मन जीव से ऐसा कर्म करवाता है जिससे जीव उस के फन्दे से कभी भी न छूट सके। मन काल का अग्रदूत और पाँच चोरों (काम-क्रोध-मोह-अहंकार) का सरदार है। यह जीव को अनेक प्रकार के नाच नचाता रहता है। संसार में जितने कष्ट क्लेश देखे जाते हैं वे सब मन की कृपा के फल हैं। इन दुःखों से बचने का  एक यही उपाय है कि मन के सर्प को कुचल दिया जाय। जैसा कि बाबा फरीद साहिब के वचन हैंः-
                फ़रीदा मन मैदान कर, टोये-टिब्बे ढाह।
                अगै मूल न आवसी, दोजक सन्दी भाह।।
अर्थः-इस मन के टोये-टिब्बे अर्थात् ऊबड़-खाबड़ भू भागों को गिरा कर इसे समतल करके अर्थात् जब तेरा मन निर्मल हो जायेगा तब तू नरक की ज्वालाओं से बच सकेगा।
     यदि जीव स्वतन्त्र होना चाहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि वह पहले सन्त सत्पुरुषों की चरण-शरण में आवे क्योंकि जब तक उस पर काम-क्रोध आदि शत्रुओं का अधिकार है तब तक कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। महापुरुष आश्वासन देते हैं कि हम तुम्हें स्वाधीनता दिलायेंगे किन्तु तू हमारे कहने पर चलता जा। महापुरुषों का अवतार जीवों को संसार के बन्धनों से छुड़ाने के लिए ही होता है इसलिये उन्हें "बन्दी छोर' भी कहते हैं। तभी तो इसी बात पर बल दिया गया है कि जीव अपनी मन की मति को छोड़कर उनकी मति को ग्रहण करे-जैसा किः-
                गुरु की मति तू लै अयाने। भगति बिना बहु डूबे सयाने।।
इस मार्ग में केवल सद्गुरु की मति अर्थात परामर्श ही चलेगा। मन का तो स्वभाव ही यह है कि वह जीव को गुरु के मार्ग से रोकता है। अन्दर बैठकर सदैव यह जीव के साथ शत्रुता करता रहता है। एक ओर गुरु है और दूसरी ओर मन है- गुरु और मन की राय एक दूसरे के विरुद्ध होती है। सन्त महापुरुष ग्रन्थों व शास्त्रों में मन के विपरीत सदा लिखते हैं। जब सन्त सद्गुरु मन के पक्ष में नहीं बोलते तो क्या मन उनके पक्ष में बोलेगा? सद्गुरु जीव को मन की कैद से छुड़वाना चाहते हैं और छूटने के लिये सहायता भी करते हैं। साथ ही युक्तियां भी बतलाते हैं। वैरी से लड़ने का सामान भी देते हैं और वैरी की नाकाबन्दी करते हैं। जिससे शत्रु विवश होकर शस्त्र फैंक दे। इसलिये सद्गुरु को जीव का सच्चा साथी और मन को जीव का शत्रु कहा गया है जैसा किः- "मन सम सर शत्रु नहीं गुरु समान नहिं सज्जन' परन्तु जीव सद्गुरु का उपकार तभी मानेगा जब इसकी आँखे खुल जाएगी। अब देखना यह है कि हम गुरुमुख तो कहलाते हैं परन्तु क्या सद्गुरु का कहना अच्छी तरह मानते हैं? हमारे अन्दर बड़ी त्रुटियां हैं। जो आज्ञा हमारे मन मे अनुकूल होती है उसे मान लेते हैं और जो आज्ञा मन के विपरीत होती है उसे हमारा मन मनन नहीं करता गुरु की आज्ञा मानना और भक्ति करना मन को कब स्वीकार है? एक रोगी डॉक्टर के पास जाकर कहे कि मैं दवाई वह खाऊँगा जो मुझे मीठी लगेगी उस रोगी की चिकित्सा भी नहीं होसकती।  इसी तरह अपने मन के विचारों पर चलने से जीव का कल्याण नहीं हो सकता इसमें सन्देह नहीं कि जब मन गुरु की आज्ञा में रहकर विनिर्मल हो जाएगा फिर वह तुम्हारे पक्ष में बोलेगा। जब मन की रुचि संसार
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से हटकर भक्ति की तरफ झुकने लगे तो समझो मन विशुद्ध हो चुका है। जो तुम्हारा शत्रु था अब वह तुम्हारा मित्र बन गया है। आवश्यकता है जीव को अपने में शक्ति भरने की जैसा कि श्री भगवान का कथन हैः-उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं, नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्रात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु  शत्रुत्वे,  वर्तेतात्मैव  शत्रुवत्।। 6/5-9
जीव स्वयं ही संसार सागर से पार होने की चिन्ता करे और अपने को अधोगति में न डाले। क्योंकि यह मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।
    जिसने मन इन्द्रियों सहित शरीर को गुरु-कृपा से जीत लिया है वह जीव आप ही अपना मित्र है । जिसने मन इन्द्रियों सहित अपने शरीर को नहीं जीता उसके लिये वह शत्रु के समान बर्तता है। हमारा धर्म यही है कि गुरुमुख बनकर सद्गुरु की आज्ञा और मौज के बन्धन में रहते हुए अपनी मन और इन्द्रियों को वश में कर ले-जब यह दशा आ जाएगी तो फिर यह जीव भवसागर से निस्सन्देह पार हो जावेगा।

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