Monday, August 29, 2016

मन के विकारों से बचो


महापुरुषों का कथन हैः-मनु माइया मैं रमि रहिउ निकसत नाहिनि मीत।
                     नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहनि भीत।।
                                               गुरुवाणी, सलोक म.-9
     फरमाते हैं कि इस जीवात्मा को जो मानुष चोला प्राप्त हुआ है तो उसके साथ ही प्रकृति ने मनुष्य को एक महान शक्ति भी प्रदान कर दी है जो मनुष्य के अन्दर काम कर रही है। वह शक्ति है मनुष्य का मन, परन्तु यह मन कैसा है? यह माया के संग मिला हुआ है। माया के संग मिलकर यह उसमें रच गया है। किस प्रकार? सत्पुरुष उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार चित्रकार लोग दीवार पर चित्र बना देते हैं तो उसे फिर दीवार से अलग करना सम्भव नहीं होता क्योंकि वह दीवार में रच गया है, इसी प्रकार यह मन माया के साथ कुछ ऐसा गहरा मिल गया है कि अब यह माया को छोड़ता नहीं, उससे अलग नहीं होता।
     कई जन्मों से माया के पदार्थों के साथ लगाव रखते-रखते जीवात्मा उनके अधीन हो गया है। अनेक जन्मों के संस्कार मन में इतने गहरे उतर चुके हैं कि मन अब उनसे अलग होना तो एक ओर, उन्हें छोड़ने की बात सोच भी नहीं सकता। आम संसार की यही दशा हो रही है कि माया से गहरा लगाव होने के कारण सुरति माया के पदार्थों और विषय भोगों में ही सदैव लगी रहती है इसी कारण आम संसारी मनुष्य परेशान और दुःखी भी रहता है। मन और माया के अधीन होकर उसे सुख का सांस लेना भी दुर्लभ होता है। मन की यह स्वाभाविक विशेषता है अथवा यूं कहा जाये कि जन्मों से पड़ी हुई आदत का परिणाम है कि यह सदैव माया की ओर, बुराई की ओर और बंधन की ओर ही दौड़ता है, जिन कार्यों में आत्मा की भलाई एवं मुक्ति है। उनकी ओर उसका झुकाव नहीं होता। जिस प्रकार जल सदैव निचाई और ढलान की ओर दौड़ता है। पानी कहीं भी छोड़ा जाये, ढाल की ओर वह अपने आप चला जायेगा, इसमें तनिक भी देर नहीं लगेगी और न किसी प्रकार का परिश्रम करना पड़ेगा। परन्तु उसी जल को यदि ऊँचे स्थान पर ले जाना हो तो उसमें काफी परिश्रम लगता है और कई प्रकार के यत्न एवं साधन करने पड़ते हैं तब कहीं जल ऊपर चढ़ता है। फिर उसे ऊपर रोक रखने के लिये भी काफी प्रबन्ध और होशियारी की आवश्यकता है, तभी उससे लाभ भी उठाया जा सकता है। इसी प्रकार मन भी सदैव गिरावट की ओर, बुराई की ओर झट दौड़ जाता है और इसमें तनिक भी देर नहीं लगाता, परन्तु यदि इससे आत्मिक भलाई और परमार्थ का कार्य लेना हो तो यह सैंकड़ों बाधायें खड़ी करता है। इसे भक्ति एवं परमार्थ की ओर लगाने में काफी परिश्रम एवं यत्न के साथ-साथ दृढ़ निश्चय की भी आवश्यकता होती है।
   माया की ओर मन शीघ्र क्यों भागता है? इसलिये कि माया ने भी इसे खींचने के लिये बहुत बड़ा जाल फैला रखा है। मन को लुभाने वाले अनेक पदार्थ, शारीरिक सुख-भोग आदि मन को बहलाने फुसलाने के लिये माया ने बना रखे हैं। ये मानों उसे फंसाने के लिये दाना डाला गया है। मन इन रसभोगों के पीछे पागलों के समान दौड़ता है और अपने साथ जीवात्मा को भी घसीट ले जाता है। इस प्रकार मन ऐन्द्रिक सुख-भोगों में फंसकर जीवात्मा को भी सत्मार्ग से भटका देता है और इन्हीं सुख-भोगों को ही जीवन का ध्येय मान कर उनके अधीन हो जाता है और इस प्रकार अपना मूल्यवान जीवन व्यर्थ गंवा देता है।
     आम संसारी लोगों की तो यह दशा हो रही है जिसका वर्णन ऊपर हुआ है अर्थात् वे जीवन के वास्तविक ध्येय आत्मा की मुक्ति से असावधान होकर मन माया के अधीन रहकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। परन्तु गुरुमुखों और विचारवानों का मार्ग भिन्न है। सत्संग के प्रताप से उन्हें यह सूझ-बूझ प्राप्त हो गई है कि लाभ किस में है और हानि किस में है। वे मन के विचारों के वश नहीं होते अपितु अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनते हैं और सत्यता की ओर अग्रसर होते हैं; सांसारिक सुख भोगों में न फंस कर वे अपना दिल भक्ति में लगाते हैं और मालिक की प्रसन्नता प्राप्त करते हैं।आम संसारियों और गुरुमुखों में यही वास्तविक अन्तर है।
    यह समझ आम संसार को बहुत कम होती है कि आत्मा का कल्याण करना ही जीवन का वास्तविक ध्येय है अर्थात् जिस जन्म मरण और आवागमन के चक्र में आत्मा लम्बे समय से पड़ी हुई है, उसे उस चक्र से मुक्त कराना और मालिक के साथ मिलाना ही मनुष्य का वास्तविक ध्येय है। इस वास्तविक ध्येय से असावधान होकर और शरीर एवं इन्द्रियों की कामनाओं में फंसकर आम मनुष्य अपने जीवन को अकारण ही गंवा रहा है। सत्पुरुषों की संगति और उनकी कृपा के बिना वास्तविक ध्येय का ज्ञान नहीं हो सकता। सत्पुरुष समझाते हैं कि विचार करके देखो कि जिस प्रकार मन के वश होकर दुःख एवं कष्ट की अवस्था में जीवन व्यतीत हो रहा है, क्या मानव जीवन की उपलब्धि यही है? नहीं, नहीं। मानव जीवन की उपलब्धि तो इससे नितान्त भिन्न है और अत्यन्त उच्च एवं उत्तम है। मन इस पर विचार करे तो वास्तविकता स्वयमेव समझ में आ जायेगी। जब सन्तों के वचनों पर मनुष्य विचार करेगा तो मन का धोखा एवं भ्रम दूर होकर वास्तविकता सामने आती जायेगी।
     मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य तो यही है कि मनुष्य मालिक का भजन सुमिरण करके मालिक की प्रसन्नता प्राप्त करे और मालिक के चरणों तक पहुँच प्राप्त करके शाश्वत आनन्द को प्राप्त कर ले। परन्तु दूसरी ओर मन माया का जाल भी शक्तिशाली है और उनके वश होकर मनुष्य इस ध्येय को भूल जाता है और धोखे में जन्म व्यर्थ कर देता है। गुरुमुख जनों के उच्च संस्कार होते हैं। वे आत्मा की आवाज़ को सुनते हैं और मन माया के पंजे से निकल कर भक्ति की कमाई में लग जाते हैं।
     सभी सन्तों महापुरुषों का यही कथन है और ग्रन्थशास्त्र भी यही बतलाते हैं कि मानव जीवन की प्राप्ति सौभाग्य से होती है। इससे बढ़कर सौभाग्यशाली वे हैं जिन्हें मानुष जीवन में सन्तों सत्पुरुषों की शरण संगत प्राप्त हो जाये। सत्पुरुषों के वचन हैंः-
                कोटि जन्म भ्रमि भ्रमि आइउ। वडै भागि साध संगु पाइउ।।
                                              गुरुवाणी, रामकली म.-5
अर्थः-करोड़ों जन्मों से जीव मोह माया के चक्र में भटकता चला आया है। बड़े भाग्यों से  इसे करोड़ों जन्मों के पश्चात् साधु सन्तों की शरण-संगत का अमूल्य अवसर प्राप्त हुआ है। जब बड़े भाग्यों से सन्तों सत्पुरुषों की चरण-शरण में आने का सुनहरी अवसर मिल गया तो मनुष्य को इससे पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करना चाहिये। सत्संग में ही यह विचार उत्पन्न होता है कि इस अमूल्य समय में आत्मा के कल्याण का यत्न करना है और सदैव के लिये जन्म मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त करनी है। दूसरी ओर यह भी सही है कि जब गुरुमुख नाम एवं भक्ति की कमाई के मार्ग पर चल पड़ता है तो उधर मन और माया भी पूरी शक्ति से सामना करते हैं। वे नहीं चाहते कि उनके चंगुल में आया हुआ जीव स्वतंत्र हो जाये। जहां आम संसारी जीव मन की पकड़ में आया हुआ है और इसी दशा में प्रसन्न है, वहां गुरुमुख मन के चंगुल से मुक्त होने के लिये पूरा यत्न और पुरुषार्थ करते हैं। मन एवं मन के विकार सदैव अपना दांव चलाने की घात में रहते हैं। गुरुमुख को भी सदैव उनके दांव पेच से बचने के लिये सावधान रहना पड़ता है। यह भी सही है कि अपनी शक्ति से जीव मन-माया को पराजित नहीं कर सकता। इसके लिये उसे भी किसी अत्यन्त बलशाली शक्ति की सहायता की आवश्यकता है। वह शक्ति है सन्त सद्गुरु की कृपा।
                हेच नकुशद नफ़स रा जुज़ ज़ुल्ले पीर।
                दामने आं नफ़स कुश रा सख्तगीर।। (मौलाना रुमी साहिब)
अर्थः-""दुष्ट मन को परिपूर्ण सन्त सद्गुरु की कृपा के सिवा और कोई शक्ति नहीं मार सकती। इसलिये ऐ भक्ति परमार्थ के अभिलाषी! मन को मारने वाले उस परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव का आंचल दृढ़ता से पकड़ ले।'' मन को मारने अथवा वश करने वाली शक्ति केवल सद्गुरु का शब्द ही है। सद्गुरु का आंचल दृढ़ता से पकड़ रखने और सद्गुरु-शब्द की कमाई करने से अन्त में मन पराजित हो जाता है और अपने ओछे अस्त्र-शस्त्र फेंककर आज्ञाकारी बन जाता है। जहां सम्पूर्ण संसार मन का आज्ञाकारी एवं दास बना हुआ है, वहां शब्द की कमाई करने वाले गुरुमुखों का यह मन ही आज्ञाकारी दास बन जाता है। इसलिये गुरुमुख को मन के विरुद्ध अत्यन्त चौकन्ना और सावधान रहकर सद्गुरु-शब्द का अभ्यास करना अत्यन्त आवश्यक है। भक्ति के जितने भी साधन जैसे सत्संग, शब्द-अभ्यास, सन्तों की सेवा आदि नित्य नियम हैं, ये सब मन को मारने के शस्त्र हैं। इन शस्त्रों के द्वारा मन एवं मन की सेना को पराजित करना है।
     जिस प्रकार धनवान का धन-सम्पत्ति को लूटने के लिये चोर और लुटेरे घात लगाये रहते हैं, वैसे ही गुरुमुखजन जो भक्ति-धन संचित कर रहे हैं, उनके धन को लूट ले जाने के लिये भी लुटेरे हर समय तत्पर हैं-ये लुटेरे मन के विकार हैं। मन ने भी अपनी एक सेना तैयार कर रखी है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, ईष्र्या,तृष्णा आदि अनेक विकार मन के संकेत पर कार्य कर रहे हैं और ये भक्ति के धन को लूटने की घात में हैं। गुरुमुख जो भक्ति की कमाई करता है तो उसके साथ-साथ उसे यह ध्यान भी रखना है कि कहीं ये विकार उसकी कमाई को नष्ट तो नहीं कर रहे। यह तो स्वाभाविक ही है कि जहां खज़ाना होता है वहां उसे हथियाने के लिये चोर-लुटेरे भी आ उपस्थित होते हैं।
     जिज्ञासु जो भक्ति की कमाई करने में लगा है स्वयं ही अपने भीतर झांककर ज्ञात कर सकता है कि मेरी कमाई सुरक्षित है अथवा कहीं इसे विकार तो लूट कर नहीं ले जा रहे हैं? ऐसा तो नहीं कि स्वयं तो ज्ञान न पड़ता हो जबकि सावधान एव चैतन्य हो। जब भी यह अनुभव हो कि मन के विकारों की विजय हो रही है तत्काल सद्गुरु-शब्द के शस्त्र से विकारों का सामना करे वरना यदि असावधान रह गया तो मन तो अपना वार करने से कभी चूकता नहीं। इसीलिये महापुरुष उपदेश करते हैंः-
                मन लोचे बुरिआइयां गुर सब्दी एह मन होड़िये। (गुरुवाणी)
अर्थः-मन तो बार-बार बुराईयों की इच्छा उत्पन्न करता है। इसलिये मन जब भी बुराई की ओर जाने लगे गुरु के शब्द की लगाम देकर इसे उस ओर जाने से रोकना चाहिये। यह सत्य है कि भक्ति की धन-सम्पत्ति के सामने तीन लोक की सम्पदा भी निम्न कोटि की है। जैसे हीरे के सामने कौड़ियों का कोई मूल्य नहीं, वैसे ही जो मनुष्य भक्ति का मूल्य जानता है उसकी दृष्टि में संसार की धन-सम्पत्ति का कोई मूल्य नहीं। सन्तों का कथन हैः-
                 कबीर सब जग निर्धना, धनवन्ता नहि कोय।
                धनवंता सोई जानये, जाके सतनाम धन होय।।
     फरमाते हैं कि सम्पूर्ण संसार ही निर्धन एवं कंगाल है, यहां किसी को भी धनवान मत जानो। वास्तव में धनी तो वह है जिसके पास सच्चे धन नाम की पूंजी है। सन्तों के विचार से सांसारिक धन-सम्पत्ति को प्राप्त करके कोई धनी नही हो जाता। जो परमार्थ का मूल्य जानते हैं, संसार की धन-सम्पत्ति उनकी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं रखती क्योंकि यह असत् सम्पदा किसी के पास सदैव रहती नहीं; यह  आज है तो कल नहीं, इसलिये इसका अहंकार असत् है। नाम एवं भक्ति की सच्ची सम्पदा के सामने भला यह असत् सांसारिक सम्पदा क्या मूल्य रखती है? गुरुमुख जो नाम और भक्ति की पूंजी संचित कर रहे हैं, वे सच्चे धनवान हैं। जो नाम की सम्पदा से वंचित हैं, उनके पास सासांरिक सम्पदा के चाहे अंबार ही क्यों न हों, वास्तव मे वे निर्धन और कंगाल हैं। धनी वही है जिसके पास सच्चे नाम की पूंजी है।
     साधु-सन्त, महात्मा एवं भक्तजन जिन्होने भक्ति की कमाई की और नाम का धन पाकर मालामाल हुये, उनके इतिहास पढ़-सुनकर देखो। वे यद्यपि अब इस संसार में विद्यमान नहीं, परन्तु नाम की कमाई के प्रताप से उनका नाम आज तक संसार में जीवित और विद्यमान है। आज तक लोग उनकी पूजा करते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करके अपनी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। उनका नाम लेने और उनको स्मरण करने से संसारियों की कामनायें पूर्ण होती हैं। क्या इससे सिद्ध नहीं होता कि नाम और भक्ति की कमाई ही सर्वोत्तम है। नाम की कमाई करने वालों पर सब संसार आश्रित है परन्तु जो नाम का धनी है वह कभी किसी पर आश्रित नहीं होता।
     अतएव इन बातों को ध्यान में रखते हुए सदैव नाम की कमाई करने में दिल लगाना चाहिये। परन्तु नाम की कमाई करते हुये गुरुमुख को यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कहीं मन एवं मन के विकार उसकी कमाई को नष्ट न कर दें। इसी प्रकार सदैव मन के आक्रमणों से सावधान रहकर और मन के चंगुल से स्वतंत्र रहकर केवल सद्गुरु शब्द का सहारा लेना है और सद्गुरु-शब्द की कमाई करते हुए अपने वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचना है। यही जीवन की उपलब्धि है।

Saturday, August 27, 2016

करनी भरनी


     प्रकृति की पांच शक्तियां आकाश, पवन, अग्नि, जल और पृथ्वी किसी चीज़ की उत्पत्ति, स्थिति और उसके विनाश में प्रतिपल कार्य करती हैं। उदाहरण रुप में देखिये-किसी पुरुष ने पृथ्वी के अन्दर बीज डाला और उसे दबा दिया। वह बीज धरती में से फूटता है; फलता-फूलता है और एक से अनेक हो जाता है। बीज के (उगाने, फलने-फूलने व एक से अनेक करने में भी उन्हीं पाँचों तत्त्वों का हाथ है। उस मनुष्य ने तो केवल बीज ही बोया है और चाहे कुछ भी नहीं किया तो भी प्रकृति के पांचों तत्त्वों ने बराबर काम करना है। उन पाँचों शक्तियों को काम करने से कोई रोक नहीं सकता।
     मनुष्य भी इस संसार में एक कृषक अथवा भूमिपति के सदृश है। वह चाहे अच्छा बीज बोवे या बुरा इस बात में वह स्वतन्त्र है। वह मात्र मानव शरीर में ही बीज बोने की क्षमता रखता है अन्यथा अन्य कोई योनि नहीं जिसमें जाकर वह भला-बुरा बीज बो सके। इसी कारण ही मनुष्य को सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अब विचारणीय बात यह है कि मनुष्य किस प्रकार का बीज बो रहा है । कड़वा या मीठा। कड़वे या मीठे बीज को उगाने में प्राकृतिक पाँचों तत्त्व तो एक समान ही सहायता करेंगे। बीज कड़वा या मीठा जैसा भी होगा उसका फल तदनुकूल ही आएगा। प्रकृति ने तो उसकी सहायता करके उसे पनपाना है। वह तो चोर को और साध को एक समान ही सहायता देगी।
     अब हम आध्यात्मिक जगत की ओर चलते हैं । जीव अगर पाप का बीज बो रहा है तो उसका फल पाप होगा यदि बीज पुण्य का है तो वह पुण्य का ही फल देगा। बीज बोने का दायित्व मनुष्य पर है। यदि कोई पाप कर्म करके यह समझे कि उसे किसी ने देखा नहीं यह उसका विचार करना मिथ्या है। प्रकृति से कुछ भी छुपाया नहीं जा सकता। वह तो उसे एक न एक दिन उसका फल देवेगी ही। इसी प्रकार से यदि कोई आठवीं गुफा में जाकर भी पुण्य या पाप कर्म करता है तो उसे भी प्रकृति किसी न किसी दिन प्रकट कर देगी। अतः मनुष्य को विश्व में गम्भीरता पूर्वक विचार करके पग बढ़ाना चाहिये। यदि प्रमाद किया अथवा संसारियों की देखा देखी भेड़चाल चला तो वह अवश्यमेव धोखा खायेगा। समय का प्रवाह बड़े वेग से चल रहा है। यदि वह मनुष्य जन्म कहीं धोखेमें ही बीत गया तो फिर क्या कोई दूसरा जन्म भला बीज बोने के लिये मिलेगा? नहीं।
     परमार्थी जीव का धर्म है कि वह अपने कत्र्तव्य को पहचाने। दूसरों का अन्धाधुन्ध अनुकरण न करे। संसारी लोग क्या कर रहे हैं क्या खा रहे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं इधर ध्यान देना उसका उद्देश्य नहीं है। परमार्थी और संसारी का मार्ग पृथक्-पृथक् है। परमार्थी जीव को तो केवल सद्गुरु के उपदेश पर चलना है। यदि वह भी साधारण जीवों की भांति सन्मार्ग को छोड़ देता है और धोखे में चला जाता है तब दूसरे उसका साथ न देंगे। यह ज्योति उसे सन्त सद्गुरुदेव जी के सत्संग से ही मिल सकती है।परमार्थी का धर्म है कि वह सत्संग के वचनों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे और उन पर आचरण करे। मन-बुद्धि-चित्त में उन को स्थान दे। सत्संग का भी तभी लाभ है अन्यथा नहीं। हर किसी की करनी व भरनी अपने अपने साथ है। किसी का अन्धानुकरण करने अथवा किसी के दोषों को देखने की क्या आवश्यकता है? यदि कोई तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करता है तो तुम्हें बदले में बुरा बर्ताव करने की आवश्यकता नहीं। जैसे कहा हैः-     जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
                तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
जिसने तुम्हारे साथ बुरा किया है उसका फल भी उसी को भोगना पड़ेगा। कुदरत हर किसी को उसकी भावना के अनुसार फल देती है। तुम अपने कर्तव्य की चिन्ता करो-दूसरों की ओर देखने की आवश्यकता
ही क्या है?       बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
                जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।।
     एक मनुष्य अपने गुण और दूसरों के अवगुणों को देखता है। प्रकृति के नियमानुसार उसके अन्दर दूसरे के दोष ही आ प्रवेश करेंगे साथ ही उसके अपने गुण बाहर चले जाएँगे। इसलिये महापुरुषों ने सोच समझ कर यह सदुपदेश दिया है कि ऐ जीव! तू केवल अपने कत्र्तव्य पर ही दृष्टि रख। महापुरुषों ने जो परमावश्यक धर्म बताए हैं अर्थात् भजनाभ्यास, आरति-पूजा और सेवा तुम इन्हें नियमपूर्वक करते जाओ। ऐसा करते रहने से अवश्य ही एक दिन बेड़ा पार हो जाएगा। महापुरुष हम से ये ही शुभ कर्म करवाने और हमारा उद्धार करने के लिये प्रकट होते हैं। यदि हम उनके नियमों का परिपालन नहीं करेंगे तो हमें उनकी प्रसन्नता प्राप्त न होगी। यदि हमें वस्तुतः उनकी प्रसन्नता अभीष्ट है तो इन कत्र्तव्यों का पालन करना ही होगा। केवल बातें बनाने से संसार में चाहे काम चल जाय किन्तु मालिक के दरबार में तो करनी ही काम आएगी। वहां चतुराई व बुद्धिमत्ता काम न देगी। वहां तो केवल क्रियात्मिक जीवन और सत्यता की आवश्यकता है। "कट्टे वांग अरड़ावे, ते साहिब दे मन भावे'। महापुरुष कथन करते हैं जिसके मन में सच्चाई है और उसे बात करने का ढंग भी न आवे तो भी ऐसा जीव मालिक को प्यारा लगता है। सदाचरण से ही प्रभु को प्रसन्न किया जा सकता है। सदाचारी बन कर अपने इष्टदेव जी की प्रसन्नता प्राप्त करके मनुष्य को जीवन का यथार्थ उपयोग कर लेना है।

Wednesday, August 24, 2016

सेवक


भगवान् श्री रामचन्द्र जी महाराज काक भुशुण्डि जी को उपदेश कर रहे हैंः-
                अब सुनु परम विमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।
                निज सिद्धान्त सुनावौं तोही। सुनि मन धरु सब तजि भजु मोही।।
                मम  माया   संभव  संसारा। जीव   चराचर  विविध  प्रकारा ।।
                सब मम प्रिय सब मम उपजाये। सब ते अधिक मनुज मोहिं भाये।।
                तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुति धारी।तिन्ह महँ निगम धर्मअनुसारी।।
                तिन्ह महँ प्रिय विरक्त पुनि ज्ञानी। ज्ञानिहुं ते अधिक प्रिय विज्ञानी।।
                तिन ते पुनि मोहिं प्रिय निज दासा।जेहि गति मोरि न दूसरिआसा।।
                पुनि पुनि सत्य कहौं तोहिं पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
                भक्ति  हीन  विरंचि किन होई। सब  जीवहु  सम प्रिय मोहिं सोई।।
                भक्ति वन्त अति  नीचौ  प्राणी। मोहिं प्राण प्रिय अस मम बानी।।
दोहाः-          शुचि सुशील सेवक सुमति, प्रिय कहु काहि न लाग।
                श्रुति पुराण कह नीति अस, सावधान सुनु काग।।
हे काकभुशुण्डि जी! अब मेरी पवित्र वाणी को सुनो जो यथार्थ है और जिसे वेद शास्त्रों ने भी गान किया है तुझको अपना सिद्धान्त सुनाता हूँ तुम उसे मन लगाकर और निर्भय होकर सुनो- वह सिद्धान्त क्या है?
सारा संसार अर्थात् अनेक प्रकार के जीव जड़ और चेतन जिन्हें तुम देखते हो सब मेरी माया से ही उत्पन्न हुए हैं। मुझे ये सब प्रिय हैं क्योंकि मुझसे उपजाये गये हैं। परन्तु इन योनियों में मनुष्य मुझे अधिक प्यारे हैं। उन मनुष्यों में ब्रााहृण और ब्रााहृणों में मुझे वेदपाठी ब्रााहृण प्रिय हैं। उनसे भी अधिक वेद की नीति के अनुसार चलने वाले प्यारे हैं। उनसे भी प्रिय वे हैं जो संसार के विषयों को तुच्छ जान कर विरक्त हो गये हैं और सत्य ज्ञान की प्राप्ति में संलग्न हैं। इन ज्ञानियों से भी अधिक प्रिय वे हैं जो ब्राहृ में लीन हो गये हैं किन्तु उन ब्राहृलीन विज्ञानियों से मुझे अपने दास अत्यन्त प्रिय हैं जिन्हें मेरे सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं है। इसलिये मैं सत्यरुप में तुझसे बार बार कहता हूँ कि सेवक के समान मुझे कोई भी प्रिय नहीं है।
     ऐ काकभुशुण्डि जी! भक्ति और प्रेम से हीन यदि ब्राहृा भी क्यों न हो उसे मैं बाकी चराचर योनियों की न्यार्इं जानता हूँ। मेरे ह्मदय में उसका आदर उनके समान ही है परन्तु भक्तिमान प्राणी अतिनीच भी क्यों न हो वह मुझे प्राणों के सदृश प्रिय है। पवित्र विचार एवं सत्स्वभाव वाला सेवक हर एक को प्रिय लगता है। तुम स्पष्ट समझ लो वेद और पुराण भी इसी तथ्य का समर्थन करते हैं।
      भगवान् श्री रामचन्द्र जी महाराज ने संसार में सबसे उच्च पदवी सेवक को दी है। वह सेवक कैसा होना चाहिये और उसमें कौन सा गुण होना चाहिये बतलाते हैं कि वास्तव में सच्चा सेवक वही है जो गुरु की आज्ञा के अनुसार कर्म करता है। जो काम करता है उसमें पहले सोचता है कि इस में मेरे गुरु की प्रसन्नता भी है या नहीं। वह हर समय अपने आप को गुरु की मौज और आज्ञा में बाँधे रखता है। गुरु के बन्धन में बँधा हुआ सेवक अपनी आत्मा को काल और माया के बन्धन से मुक्त कर लेता है। जिसने तन मन पर गुरु का बन्धन नहीं है वे जीव काल और माया के बन्धन में पड़ जाते हैं। जो जीव गुरु के वचन और आज्ञा में नहीं चलते उन पर यमदूतों की आज्ञा चलती है। जो सेवक होकर भी गुरु की आज्ञा और मौज में नहीं चलता उसका भी कल्याण होना सन्दिग्ध है। सेवक धर्म का मार्ग श्री मौज को मानना है। अपने आप को मिटाने का पथ है। गुरु सेवक की रहनी-सहनी के बारे में श्री पंचम पातशाही जी महाराज  उल्लेख करते हैंः- गुरु के गृह सेवक जो रहै। गुरु की आज्ञा मन मह सहै।।
                आपस कौ कर कछु न जनावै। हरि हरि नाम रिदै सद ध्यावै।।
                मन बेचै सतगुरु के पास। तिस सेवक के कारज रास।।
                सेवा करत होय निहकामी। तिस को होत परापत स्वामी।।
                अपनी कृपा जिस आप करेइ। नानक सो सेवक गुरु की मति लेइ।।
जो जीव गुरु के गृह में प्रवेश पा गया है अर्थात् जो गुरु की शरण में आ गया है उसे चाहिये कि वह गुरु की आज्ञा और मौज को अपने दिल में जगह देवे। दूसरा गुरु के आगे अपने को कुछ जतलावे नहीं। ऐसा विचार कभी न उठावे कि गुरु जानते हैं तो मैं भी कुछ जानता हूँ। गुरु के आगे विनम्र और दीन बन जावे। जो अपने आपको गुरु के आगे विनीत होकर उनके चरणों में समर्पित कर देगा गुरु उस सेवक की ज़िम्मेवारी उठा लेंगे और लोक परलोक में उसके सदा सहायक होंगे। यह मार्ग अपने आप को मिटाने का है।              मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मर्तबा चाहे।
                कि दाना खाक में मिल कर, गुले गुलज़ार होता है।।
भक्तों और सन्तों के पुराने इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि किस प्रकार उन सेवकों ने अपने आप को धूलि में मिला दिया। उन्होने गुरु की और अपनी ज़ात को एक कर दिया। बुल्लेशाह ज़ात के सैयद थे। सैयद मुसलमानों में ऊँचे समझे जाते हैं। उनके गुरु अरार्इं ज़ात के थे और माली का काम करते थे। जब बुल्लेशाह ने अरार्इं को अपना गुरु बनाया तो उसके सम्बन्धियों ने उसे काफिर कहना शुरु किया कि देखो
यह सैयद होकर अरार्इं का शिष्य बन गया है। परन्तु बुल्लेशाह ने अपनी झोली पसार दी और कहने लगा
कि आप मुझे सहर्ष काफिर कहें मैं इसे प्रसन्नता से स्वीकार करता हूँ। ""बुल्ले हा! लोकी काफिर-काफिर आखदे, तूँ आहो आहो आख'' मैं अरार्इं हूँ मेरी ज़ात वही है जो मेरे गुरु की ज़ात है। वाक हैः-
मन तूं मत माण करहिं जे हौं किछु जाणदा गुरुमुख निमाणा होहु।।
अंतरि अज्ञान हौं बुद्धि है सच सबदि मलु खोहु। होहु निमाणां सद्गुरु अगै मत किछु आप लखावई।
आपणे अहंकार जगत जलिया मत तूँ आपणा आप गवावई।
सतगुरु कै भाणै करहिं कार सतगुरु के भाणै लागि रहु।।
इउ कहै नानक आप छडि सुख पावहिं मन निमाणा होय रहु।।
सेवक सच्चा वह है जो अपने मन को सद्गुरु के पास बेच देता है। जब कोई वस्तु बेच दी जाती है तो बेचने वाले का उस पर कोई स्वत्व नहीं रह जाता। मन को गुरु के हवाले सदा के लिये कर देना ही सच्ची भक्ति है ऐसा सेवक जिसने मनमति को सब प्रकार से त्याग दिया है उसके समस्त कार्य अपने आप सिद्ध हो जाते हैं। जो प्राणी मनमति के अनुसार चलते हैं और आशा करते हैं कि उनके सब कार्य सिद्ध् हों भला यह क्योंकर हो सकता है? सच्चे सेवक के गुरु ज़िम्मेवार हो जाते हैं और सेवक सब विपदाओं से निश्चिन्त हो जाता है। ऐसे सेवकों की रक्षा गुरु सर्वथा करता है। सन्त पलटू साहिब का वचन हैः-
पलटू सोवे मगन में साहिब चौकीदार।।
साहिब चौकीदार मगन होइ सोवन लागे।।    दोनों पाँव पसार देखि कै दुश्मन भागे।।
जाके सिर पर राम ताहि को वार न बांके। गर ग़ाफिल में मैं रहों आपनी आपहु ताकै।।
हमको नाहीं सोच सोच सब उनको भारी।  छिन भर परै न भोर लेत है खबर हमारी।।
लाज तजा जिन राम पर डारि दिया सिर भार। पलटू सोवे मगन में साहिब चौकीदार।।
सेवाधर्म का कितना सुन्दर और सरल मार्ग है। लोक और परलोक दोनों का बोझ मालिक के ऊपर रख दो और स्वयं सुख की नींद करो। पलटू साहिब का कथन है कि भगवान भक्तों के चौकीदार हैं। भला, जिसकी चौकीदारी भगवान स्वयं करें उसे घाटा क्योंकर! संसार अज्ञानी है जो व्यर्थ में अपने ऊपर बोझ उठाये फिरता है। जिन्होने अपना बोझ मालिक के कन्धों पर धर दियाऔर आप उसके हो रहे उनके सदृश दूसरा संसार में कौन हो सकता है। संसार के सभी  सुख उन्हीं के भाग्य में आ जाते हैं। जगत् में जीव प्रायः दुखी क्यों है? कारण यह कि वह आप मालिक बन बैठा है। मालिक बनने में दुःख और सेवक बनने में सुख भरा है। अन्त में फरमाते हैंः-""सेवा करते होय निःकामी। तिस को होत परापत स्वामी। सेवक को सेवा निष्काम भाव से करनी चाहिये। यदि सेवक के मन में कामना का कोई बीज है-स्मरण रखिये वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। सेवक को सेवा केवल गुरु की प्रसन्नता के हेतु करनी चाहिये। यदि तुम संसार में सुखी रहना चाहते होतो एक मात्र उपाय इस का यह है कि तुम सेवक बन जाओ। सेवक का पद चाहे बाह्र रुप में तुच्छ प्रतीत होता है किन्तु वस्तुतः उसकी पदवी बड़ी ऊंची है। सत्य तो यह कि सेवक ही स्वामी है। जो जीव निष्काम भाव से और अहंकार हीन होकर गुरु की सेवा करते हैं वे अपने दोनों लोक सुधार लेते हैं। ऐसे सेवक का दर्ज़ा बड़े-बड़े ऋषि मुनियों से भी बढ़कर है। जैसा कि ऊपर श्री रामचन्द्र जी महाराज ने अपनी वाणी में श्री काकभुशुण्डि जी को कथन किया है।
     तात्पर्य यह कि सच्चा सेवक ज्ञानी-ध्यानी-योगी-तपस्वी-कर्मकाण्डी आदि से कहीं उत्कृष्ट है क्योंकि उसने अपनी अहन्ता को मिटा कर अपने को स्वामी के अर्पित कर दिया है।  

Sunday, August 21, 2016

रक्षा बन्धन


रक्षा बन्धन का पुनीत पर्व कब से प्रारम्भ हुआ कुछ कहना कठिन है। मगर यह स्र्वमान्य सत्य है कि उसकी मूल भावना हमारे यहाँअत्यन्त प्राचीनकाल से चली आ रही है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के वामन अवतार ने भी राजा बलि के रक्षासूत्र बाँधा था और उसके उपरान्त ही उन्हें पाताल जाने का आदेश दिया था।आज भी रक्षाबन्धन के समय जो मन्त्र पढ़ा जाता है उसमें इसी घटना का ज़िक्र होता है।
        ये बद्धो  बलि राजा  दानवेन्द्रो  महाबलः।
        तेन त्वामनुबन्धनामि रक्षे मा चलमाचलः।।
अर्थात यह वही रक्षा सूत्र है जिससे महाबलवान राक्षसों के राजा बलि बाँधे गये। रक्षा सूत्र तुम चल विचल मत हो प्रतिष्ठित रहो। रक्षा सूत्र का अर्थ है रक्षा की व्यवस्था। जिस व्यक्ति के रक्षा सूत्र बाँधा जाता है उसकी रक्षा की भावना ही रक्षा सूत्र में निहित है। रक्षासूत्र के बारे में महाभारत में एक कथा का उल्लेख मिलता है। इस कथा केअनुसार एक समय देवताओंऔर राक्षसों में भयानक युद्ध हुआ जो लम्बे समय तक चला इस युद्ध में राक्षस विजयी हो रहे थे और देवता पराजित। इस पर इन्द्राणी भयभीत होकर अत्यन्त दयनीय दशा में देवताओं के गुरु बृहस्पति जी के पास गर्इं और उनसे इस समस्या का समाधान पूछा। गुरु बृहस्पति जी ने उपाय बतलाया कि श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को इन्द्राणी इन्द्र को तिलक लगाये और उसकी दाहिनी भुजा पर वेदज्ञ ऋषियों सेअभिमन्त्रित रक्षा सूत्र बाँध दे ऐसा करने पर देवताओं की विजय काआश्वासन दिया। इन्द्राणी ने ऐसा किया भी। इससे इन्द्र को असाधारण शक्ति प्राप्त हुई। युद्ध का पासा पलटने लगा और देवताओं की विजय हुई। यह कथा भगवान श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को उस समय सुनाई थी जब पाण्डव संकट ग्रस्त थे। धर्मराज युधिष्ठिर ने यह साधन अपनाया भी और सफलता भी प्राप्त की।
     रक्षा बन्धन का पुनीत पर्व श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को मनाया जाता है।
यह रक्षा बन्धन राजा को पुरोहित द्वारा,यजमान के ब्राहृाण द्वारा,पति के पत्नि द्वारा,भाई के बहन द्वारा तथा सतगुरु के शिष्य द्वारा दाहिनी कलाई पर बाँधा जाता है। रक्षाबन्धन में तीन भावनाएँ काम करती हैं। प्रथम जिस व्यक्ति के रक्षा बन्धन किया जाता है उसकी कल्याण कामना,दूसरे रक्षाबन्धन करने वाले की उसके प्रति स्नेह भावना और तीसरे रक्षाबन्धन करने वाले या भेजने वाले की सहायता। इस प्रकार रक्षाबन्धन वास्तव में स्नेह,अपनत्व, शान्तिऔर रक्षा का बन्धन है इसमें सबके सुख और कल्याण की भावना है।
    साँस्कृतिक परम्पराओं में समयानुसार परिवर्तन आना सहज स्वाभाविक है। रक्षा बन्धन के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। मुगल शासन काल में अनेक महिलाओं ने आक्रमण कारियों से बचने के लिये बहादुर व्यक्तियों को रक्षा सूत्र भेजेऔर उन व्यक्तियों ने बिना किसी धर्म जाति का भेद किये उन महिलाओंकी रक्षा की। कर्णवती चितौड़ की महारानी थी गुजरात के बादशाह बहादुरशाह ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया। उसकी विशाल सेना से टक्कर लेना चितौड़ के लिये सम्भव नहीं था। महारानी कर्णवती ने अपनी सहायता के लिये मुगल बादशाह हिमायूं के पास राखी भेजी। हिमायुं ने राखी का पूरा पूरा सम्मान किया। महारानी की सहायता के लिये तत्काल चितौड़ पहुँच गया। हिमायुं के बाद अन्य मुगल बादशाह भी रक्षा के बन्धन को स्वीकारते रहे। विश्वविजय का स्वपन देखने वाला सिकन्दर बादशाह जब पोरस से हार रहा था ऐसी परिस्थिती में युनान की एक महिला ने राजा पोरस के पास इस विचार से राखी भेजी कि वह उसे बहन माने तथा हर हालत में सिकन्दर के प्राणों की रक्षा करे। राखी की लाज बचाने के लिये अनेक बार अवसर मिलने पर भी पोरस ने सिकन्दर के प्राण नहीं लिये।
      आजकल प्रायः रक्षा बन्धन का पर्व भाई बहनों के ही त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। बहने अपने भाईयों के उज्जवल भविष्य के लिये मंगल कामनाएं करती हैं और किसी भी संकट के समय अपनी सुरक्षा का उनसे आश्वासन पाती हैं। रक्षाबन्धन का पर्व केवल भाई बहन के पवित्र स्नेह के बन्धन का पर्व ही सम्पूर्ण मानव जाति के स्नेह के बन्धन का त्यौहार है।
     रक्षा बन्धन का पर्व केवल भाई बहन के पवित्र स्नेह के रूप में कब से प्रारम्भ हुआ सम्भवतः महाभारत में द्रोपदी चीरहरण के पश्चात ही भाई बहन के पर्व में परिवर्तित हो गया। पाण्डवों ने जब राजसूय यज्ञ काआयोजन किया था उस यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण की अग्रिम पूजा के लिये वहाँ उपस्थित सभी ऋषियों,महर्षियों,राजा महाराजाओं ने स्वीकार किया कि अग्रिम पूजा श्री कृष्ण जी की की जाए। लेकिन चन्देरी के राजा शिशुपाल को यह स्वीकार्य न हुआ। शिशुपाल ने आपत्ति की और भरा सभा में श्री कृष्ण जी को कई अपशब्द कह डाले। अन्य राजाओं के मना करने पर भी वह श्री कृष्ण जी की शान में अत्यन्त अपमान सूचक शब्द कहता रहा। श्री कृष्ण जी बड़ी देर तक मौन भाव से उसके अनुचित व्यवहार को सहन करते रहे परन्तु जब शिशुपाल का घृणित व्यवहार सीमा पार कर गया तो भगवान श्री कृष्ण जी ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का शीश धड़ से अलग कर दिया। सुदर्शन चक्र से भगवान की अँगुली में खरोंच आ गई जिसके फलस्वरूप उनकी अँगुली में रक्त बहने लगा। महारानी द्रोपदी ने जब देखा तो उसने अपनी कीमती साड़ी फाड़कर एक टुकड़ा जलाकर उसकी राख अँगुली पर लगा दी और दूसरा टुकड़ा फाड़कर अँगुली पर पट्टी बाँध दी। द्रोपदी की इस प्रेमाभक्ति पूर्वक कुर्बानी से आश्चर्य में पड़कर श्री कृष्ण जी ने पूछा, द्रोपदी यह तूने क्या किया? साधारण से जख्म के लिये इतनी कीमती साड़ी को व्यर्थ में ही फाड़ दिया। जब कि पट्टी के लिये साधारण कपड़ा ही काफी था। इस पर द्रोपदी ने उत्तर दिया कि--।
        लहू  इस  हाथ  से  टपके  तो  चूल्हे में गई साड़ी।
        फक्त  इक  बूँद  पर  करूं  लाखों कुर्बां नई साड़ी।।
        अगर फाहे  को  हो  दरकार  प्यारे खाल गर्दन की।
        तो हाज़िर है ये खोलिये किस्मत फिलहाल गर्दन की।।
हे प्रभु एक बूंद पर एक साड़ी तो क्या लाखों नई साड़ियाँ भी कुर्बान हैं। फाहे के लिये अगर गर्दन की खाल की ज़रूरत है तो ये मेरा सौभाग्य है वह गर्दन भी हाज़िर हैं। द्रोपदी की अनुपम श्रद्धा,भक्ति,प्रेम,त्याग बलिदान से प्रसन्न हो कर श्री कृष्ण जी ने कहा।
      भाव सच्चा काम  मरहम से भी ज्यादा कर गया।
      जख्म ही क्या दिल  मेंरा तेरे वचन से भर गया।।
      है बस मेरी नज़र  श्रद्धा प्रेम  पर और मान  पर।
      कम है इस धज्जी से जो मैं थान चुन दूँ थान पर।।
      रीझ जाता  है फक्त दिल  प्रेम  के  इक पान पर।
      भाव  बिन  थूकूँ  नहीं  गाड़ी  भरे  सामान पर।।
द्रोपदी! मैं तेरे इस अनुपम प्रेमभक्ति,श्रद्धा,त्याग और बलिदान पर अति प्रसन्न हूँ। तेरे त्याग,बलिदान और तेरा प्रेम देखकर मेरा घाव तो क्या मेरा दिल भी तेरे वचन से भर गया है। तूने जो ये पट्टी बाँधकर मुझेअपने प्रेम के बन्धन में बाँध दिया है इसके बदले में अगर मैं साड़ियों के अम्बार भी लगा दूँ,थान पर थान चुन दूँ तो भी तेरे इस प्रेम के बन्धन की बराबरी नहीं कर सकते। तेरी इस पट्टी के एकएक तार का ऋणि हूँ। द्रोपदी ने भगवान की अँगुली पर पट्टी बाँध कर भगवान को अपने प्रेम के बन्धन में बाँध दिया। श्री कृष्ण ने द्रौपदी के इस अनुपम बलिदान का बदला समय आने पर चुका देने का वचन दिया जिसे उन्होने अवसर आने पर निभाया भी। श्रद्धा भक्ति पूर्वक श्री कृष्ण को समर्पण किया हुआ वही साड़ी का टुकड़ा दुर्योधन की राज्य सभा में साड़ियों के अम्बार में बदल गया और उसने द्रोपदी की लाज की रक्षा की। द्रौपदी ने जो पट्टी बाँधी ये प्रेम का बन्धन था। द्रोपदी भगवान श्री कृष्ण जी को अपना भाई मानती थी। इस प्रेम के बदले इसमें भगवान के द्वारा(भाई के द्वारा बहन की सुरक्षा वचन था)। यह एक एतिहासिक और धार्मिक घटना होने के  कारण यह त्यौहार भाई बहन के पवित्र स्नेह के रूप में मनाया जाने लगा। ये त्यौहार भाई बहन के प्रेम का ही नहीं,भगवान और भक्त के,सतगुरु और शिष्य के स्नेह बन्धन का भी त्यौहार है शिष्य अपने सतगुरु के कर कमलों में राखी बाँधता है और यही कामना करता है कि मेरे सीस पर मेरे इष्टदेव का वरदहस्त जन्मों जन्मों तक कायम रहे। श्री सतगुरु भी शिष्य को केवल आश्वासन ही नहीं देते बल्कि शिष्य की हर प्रकार सेआधिदैहिक,आधिदैविक औरआध्यात्मिक रक्षा करने की ज़िम्मेवारी अपने ऊपर ले लेते हैं।और उसे निभाते भी हैं। इतिहास साक्षी है कि जब जब भक्तों पर भीर पड़ी है तब तब भगवान ने उनकी रक्षा की वे अपना विरद निभाते आये हैं निभा रहे हैं और निभाते रहेंगे।।
    आप पाप त्रय ताप गये जो गुरु शरणी आये।
जो भी उनकी शरण में आया और उनसे अपने स्नेह का बन्धन बाँधा है उसके तीनो ताप खत्म हो जाते हैं और शिष्य सच्चे सुख और शाश्वत आनन्द को प्राप्त करके अपने जीवन को सफल करता है।
जिन सौभाग्यशाली गुरुमुखों ने अपनी प्रीत का बन्धन श्री सतगुरु के चरण कमलों से बाँधा है वो सब तरफ से सुरक्षित हो जाते हैं सतगुरु से किया हुआ प्रीत का बन्धन ही अमर बन्धन है।

Thursday, August 18, 2016

जितनी हितचिन्ता-उतनी शान्ति


""जो सेवक जितनी हित-चिन्ता से गुरु दरबार की सेवा करेगा उतनी ही उसे आत्मा की शुद्धि प्राप्त होगी और उसी ही अनुपात के अनुसार उसे शक्ति व शान्ति मिलेगी।''
     सहरुाों ही सेवक श्री गुरुदरबार की सेवा कर रहे हैं किन्तु सबको एक समान फल प्राप्त नहीं होता। उसमें कारण केवल यही है कि हर एक की लगन और भावना भिन्न भिन्न है। कोई तो पूरे का पूरा तन मन और धन श्री गुरुदरबार के ऊपर निष्काम भाव से न्यौछावर कर देता है वह तो पूर्ण रुप से शान्ति के फल को पा लेता है। समस्त प्राकृतिक शक्तियां उसकी सहायक हो जाती हैं। कोई तन से तो सेवा करता है किन्तु मन को अर्पित नहीं करता। भाव यह कि निष्काम भाव से वह सेवा नहीं करता इसलिये उसका अन्तरमानस शान्त नहीं होता। वह कभी सन्तुष्ट और कभी असन्तुष्ट रहता है। उसके अन्तःकरण में सेवा के फल पाने की आशा बनी रहती है यदि उसकी मनोअभिलाषा पूरी हो गई तो सन्तुष्ट हो गया और यदि वह कामना अपूर्ण रह गई तो वह रुष्ट हो गया। धन की सेवा भी इसी तरह कोई तो नम्रता और श्रद्धा के साथ करके उन्नति कर जाता है और कोई मन में अभिमान करके अपने को कुछ समझने लगता है। फल यह होता है कि जब वह समझता है कि मेरे गुणों की प्रशंसा नहीं हुई तो सेवा जैसे उत्तम गुण से भी हाथ धो बैठता है। अर्थात् भविष्य में भी वह सेवा नहीं करता।
     वैसे तो तन चाहे धन दोनों ही नश्वर पदार्थ हैं। यदि ये दोनों सद्गुरु के श्री दरबारके निमित्त काम में आ गये तो सार्थक हो गये यदि नहीं लगे तो संसार की ओर लग कर विनष्ट हो जाएंगे हाँ-उसका परिणाम अवश्य दुःखदायी होगा। सद्गुरु पूर्ण की अथवा उनके दरबार की सेवा को छोड़कर जिस ओर भी तन-मन-धन लगेगा उसमें सुरति का लगाव अवश्य हो जायेगा-ऐसे झूठे मोह का फल श्री गुरु अमरदास जी इस प्रकार चित्रित करते हैंः-
                इह कुटम्ब सभ जीअ के बन्धन भाई-भरम भुलासैं सारा।
                बिन  गुरु  बन्धन  टूटहि  नाहीं गुरुमुख मोख दुआरा।।
कथन करते हैं कि यह जितना कुटुम्ब-परिवार है इनका मोह मनुष्य की आत्मा को बन्धन में बाँध देता है। परन्तु सारा संसार उन्हें अपना हितकारी समझने के भ्रम में फँस गया है। यह बन्धन पूर्ण सद्गुरु की भक्ति के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं टूट सकते। जो भाग्यशाली सद्गुरु की मौज को मुख्य रखकर कुटुम्ब परिवार में जल कमल जैसे रहता है वह ही मोह-जाल से विमुक्त होकर मुक्ति पद को प्राप्त कर लेता है। नहीं तो झूठे भ्रम में भूलकर इस लोक में भी यह जीव दुःखी रहता है और अपना परलोक भी बिगाड़ लेता है। ""जहाँ आसा तहां वासा'' का अटल नियम उसे खींचकर जन्म मरण में डाल देता है।
     यह तो परिपूर्ण सद्गुरु देव की अनुकम्पा एवं उपकार है जो कि मिथ्या तन-मन-धन की सेवा स्वीकृत करके वे नित्य मुक्त पुरुष बँधी हुई सुरति को अनायास प्रमुक्त कर देते हैं। इसलिये उनकी सेवा करके भी हमें उनका कृतज्ञ रहना चाहिये काँच के बदले कञ्चन-बन्धन के बदले स्वाधीनता प्रदान करने वाले सद्गुरु ऐसी कृपा हम पर करते हैं। श्री दरबार की रचना सन्त सत्पुरुष उन संस्कारी आत्माओं को एकत्र करने के लिये ही किया करते हैं। उनका दरबार कल्पवृक्ष की न्यार्इं होता है। उनके दरबार की सेवा जिस जिस भावना से की जाती है फल भी वैसा वैसा सेवक को मिलता है। उनके दरबार की विशेषता है कि सेवक को प्रेंम-भक्ति, विश्वास, नम्रता आदि दैवी गुणों से समृद्ध कर देना।
     कई सेवक इस भेद को न जानकर श्री दरबार से अनुचित सुविधायें-जो शरीर से सम्बन्ध रखने वाली होती हैं-प्राप्त करके अतिप्रसन्न होते हैं-परन्तु यह उनकी यथार्थ में अज्ञानता है सच्ची निष्ठा नहीं। गुरु दरबार में तो इन वस्तुओं की कमी नहीं है जिनसे शारीरिक सुख मिलता है- परन्तु यहां तो प्रश् है अपनी सुरित की आसक्ति का। जिसकी सुरति काया के सुखों और सामानों व सम्बन्धियों में उलझ गई उसने अपना वास्तविक कार्य तो बिगाड़ दिया और वह शरीर तथा उसके सामान व सम्बन्धी सबके सब बिछुड़ गये। जिसने ऐसा घाटे वाला सौदा किया उसे बुद्धिमान कौन कहेगा। उसने तो सत्य का त्याग करके असत्य को ग्रहण किया खेद-सत्य का लाभ भी न लिया और असत्य हाथ से निकल गया। दोनों हाथ खाली-शून्य आया और शून्य ही चला गया। ऐसी दशा पर महापुरुषों को खेद होता है। उन्हें ऐसा स्वर्णमय अवसर भी मिला उसका पूरा लाभ भी न उठाया। फिर ऐसा संयोग कब बनेगा इसका कोई ठिकाना नहीं। गुरुवाणी का कथन हैः-भाई रे भगतिहीण काहे जग आया।
                    पूरे गुरु की सेव न कीनी विरथा जन्म गवाँया।।
तात्पर्य यह कि मानुष देह पाकर जिसने तन मन धन से पूरे सद्गुरु की सेवा नहीं की उसका इस जग में आना न आने के बराबर है।
     छठी पातशाही श्री हरगोबिन्द साहिब जी का पोता "धीरमल' गुरु दरबार की माल-सम्पत्ति संचित करके अपने को कुछ मानने लगा। उस धन सम्पदा के बूते पर गुरु महाराज से अलग होकर करतारपुर में जा बैठा। जब उसके पिता "बाबा गुरुदित्ता साहिब जी' ने देह त्याग किया तो श्री गुरुमहाराज जी ने धीरमल को कहलवा भेजा कि तुम पिण्ड दानादि कर आओ क्योंकि तुम्हारे पिता जी शरीर छोड़ गये हैं। वह माया के मद में इतना डूब गया था कि उसने दूत से कहा कि मैं इतना मतिहीन नहीं हूँ कि सारी सम्पत्ति छोड़ कर वहां चलूँ-मुझे किसी की परवा नहीं है। मेरे पास सब कुछ है और मैं अभी अभी दिल्ली के मुगल सम्राट् से मित्रता का सम्बन्ध जोड़ कर आया हूँ।
     इस पर श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी ने उसका ऐसा उत्तर सुनकर गुरु-गद्दी उसके छोटे भाई "हरिराय' जी को दे दी। अब हर एक इन दोनों भाइयों की प्रतिष्ठा का अनुमान लगा सकता है। जिनमें से एक ने तो गुरु महाराज जी की आज्ञा को सिर पर धारण करके धन-पदार्थ की ओर ध्यान तक भी न दिया और दूसरे ने धन-सम्पत्ति के सहारे को सच्चा आश्रय समझकर सच्चे सद्गुरुदेव की आज्ञा का उल्लंघन किया। परिणाम यह हुआ है कि श्री गुरु हरिराय साहिब जी तो ऋद्धियों-सिद्धियों के स्वामी बन गये और धीरमल का सामान जिस पर उसे घमण्ड था लूट लिया गया। एक का तो न रहा सामान व नामोनिशान दूसरे के शरीर से स्पर्श की हुई वस्तुएं आज तक भी श्रद्धा सत्कार के साथ पूजी जाती हैं एक तो अमर हो गया और दूसरे ने तो अपना सर्वनाश कर लिया। एक ने तो अपना संसार ही बिगाड़ लिया और दूसरे ने जहाँ अपना कल्याण किया वहां दूसरे लाखों जीवों का भी कल्याण कर दिया। इतना अन्तर है दोनों के जीवन में-यद्यपि वे दोनों ही गुरु दरबार में रहे।
     ऐसे ही श्री गुरुमहाराज ने ऊपर के वचन में कथन किया है कि "जो सेवक अपनी कुछ शक्तियां परम शक्तिशाली सद्गुरुदेव के ऊपर न्यौछावर कर देता है वह सत्य में समा जाता है और जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है यहां भी सच्ची प्रसन्नता में उसका जीवन व्यतीत होता है और आगे भी वह सुख पाता है। ऐसे लोग भाग्यशाली और सच्चे व्यापारी हैं क्योंकि वे असत् के बदले सत्य प्राप्त कर जाते हैं इसलिये गुरुमुख को इस लाभ-हानि का अन्तर समझ कर सत्य का व्यापार करना चाहिये जिससे यहां भी सम्मान के साथ उसका समय गुज़रे और परलोक में जाकर भी वह शोभा प्राप्त करे। दोनों प्रकार के मनुष्यों के मान-अपमान और लाभ-हानि के अन्तर को निम्नलिखित उदाहरण से अच्छी तरह समझ सकते हैं।
     एक कम्पनी के स्वामी ने दो मनुष्यों को धन राशि देकर कुछ सामान खरीदने के लिये विदेश में भेजा एक ने तो उन पैसों से कम्पनी का माल खरीदा और नियत समय पर लौट आया-कम्पनी वालों ने उसकी सच्चाई व परिश्रम देखकर उसके वेतन में वृद्धि कर दी और उसका दर्ज़ा भी बढ़ा दिया। दूसरा मनुष्य वहां चित्ताकर्षक दृश्यों को देखकर विलासिता में फंस गया। जो राशि सामान खरीदने के लिये कम्पनी की तरफ से मिली थी उसे खाने-पीने व शारीरिक साज-सज्जा में समाप्त कर दिया। जब खाली हाथ वह लौट आया तो कम्पनी ने उसके ऊपर केस चलाया और उसे कठोर कारावास का दण्ड मिला। निस्सन्देह उसने थोड़े दिन विलास-क्रीड़ाओं में गुज़ारे थे परन्तु शेष जीवन के दिन बड़े कष्टों में रहकर उसे बिताने पड़े- वह बड़ा पश्चात्ताप करता रहा।
     ऐसे ही विश्वपति की ओर से प्रत्येक को श्वासों की पूँजी मिली है कि तुम सत्य का व्यापार करके लौट आओगे तो तुम्हें उन्नति और साधुवाद मिलेगा-किन्तु दुःख उन लोगों की बुद्धि पर है जिन्होने श्वासों रुपी अमुल्य पूँजी को क्षणभंगुर शरीर की विलास-प्रियता में व्यर्थ में गँवा दिया। इन्होने अपना अमुल्य समय भी गँवाया और मिथ्या नातों को सत्य समझ कर उनमें सुरति जैसी अप्राप्य वस्तु को उलझा दिया। मालिक की प्रसन्नता व कृपा को प्राप्त करने का विचार तक भी न उठाया। इसके विपरीत विचारशील जीव सावधान रहते हैं-वे इस असत्य संसार में रहते हुए प्रमाद की निद्रा से बच कर श्री सद्गुरु देव के सच्चे दरबार की सेवा हितचित्त से करते हुए अपना जीवन धन्य बना लेते हैं। वे यहाँ भी आनन्द में रहे क्योंकि उन्होने सारी ज़िम्मेवारियों को मालिक को सौंप दिया था और सच्ची दरगाह में भी प्रसंसा के पात्र बने। श्री मुख वाक्य हैंः-""इकनां ते रंग चढ़ गया-इक रह गये अमन-अमान''हमें भी ध्यान रहे कि हम कहीं कोरे के कोरे न रह जावें। हमें चाहिये कि भक्ति के रंग में अपनी सुरत को रंग कर लाल-गुलाल हो जावें।

Sunday, August 14, 2016

यज्ञमय जीवन


     मनुष्य एक अद्भुत रचना है उस परमात्मा की। यह उस परमेश्वर का प्रतिनिधि है और इस भूलोक पर दूसरे समस्त जीवों को जीवन के आदर्श सिखाने आया है। यदि इसे ईश्वर का पुत्र कह दें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। और यदि यह अपने को "अहं ब्राहृास्मि' कहकर गर्व मानता है तो भी इसका अधिकार है ऐसा मानना और जानना। तत्त्वदर्शियों ने स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया है कि "अयमात्मा ब्राहृ' अर्थात् यह आत्मा औेर वह ब्राहृ दोनों में कोई भेद नहीं। आत्मा ही ब्राहृ है और ब्राहृ का ही दूसरा पर्याय वाचक शब्द "आत्मा है। इसी भाव को मनीषियों ने ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर इसे अपने स्वरुप को जतलाते हुए लिखा है कि ""तत्त्वमसि'' अर्थात् तू ही वही ब्राहृ है-ब्राहृ और तू दो नहीं।
     इतना गौरवशाली है यह मानव। ब्राहृ रुप होकर भी ईश्वर की इस त्रिगुणात्मिका माया की चपेट में आ जाता है। त्रिगुणात्मिका माया इसे भ्रम में डाल देती है और यह भी न जाने क्यों कर अपने स्वाभाविक ब्राहृत्व की पदवी को छोड़कर अपने को जीवात्मा कहने लगता है। सन्त सत्पुरुष युग युग से इसे जगाते चले आए हैं कि ""ऐ मनुष्य! तू वह सच्चिदानन्दघन ब्राहृ है-क्योंकि अपनी प्रभु सत्ता को भुला कर इस मिथ्या माया भरे प्रपञ्च को पहचान नहीं पा रहा। परमात्मा ने इस मनुष्य को अपनी पवित्र वेदवाणी द्वारा सृष्टि के आदि में ही बतला दिया था कि तुझे अपने जीवन को कैसे व्यतीत करना है। उन्होने कहा था किः-ॐ आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्य ज्ञेन कल्पतां श्रोत्रं यज्ञेन,
     कल्पतां  वाग्यज्ञेन  कल्पतां  मनोयज्ञेन  कल्पतामात्मा  यज्ञेन कल्पतामिति।
""तुझे अपनी आयु को यज्ञमय बनाकर बिताना है। सम्पूर्ण शरीर यज्ञ रुप हो जाए। तेरे प्राण,चक्षु, श्रोत्र, वाणी मन और बुद्धि यज्ञ भावना से ओत प्रोत हों। तेरा सारा जीवन परमार्थ और परोपकार के लिये हो।''
     यह यज्ञ भावना क्या है? मनुष्य अपने जीवन को दूसरी भोग योनियों के समान स्वार्थ से पूर्ण न बनाये। इसका रोम-रोम परोपकार में लगा हो। इसके मन में सदा ही शिव संकल्प उठा करें। यह कभी किसी दूसरे प्राणी के क्लेश और दुःख का हेतु न बने। अपने से जो बड़े हों उनके प्रति आदर सत्कार के भाव रखे-बराबर वालों से प्रेम-प्यार का व्यवहार करे और अपने से छोटों के साथ स्नेह तथा विनम्रता पूर्वक बरते। यह है यज्ञ शब्द का तात्पर्य।
      "यज्ञ' शब्द से यज् धातु है। इसका प्रयोग तीन अर्थो में होता है-1.देवपूजा। 2. संगति करण। 3. दान। देव जनों का सत्कार-अपने से बड़े, श्रेष्ठ एवं विद्वान् पुरुषों का सम्मान करना। उनके सामने विनम्र होकर रहना-उनकी आज्ञा में चलना तथा उनके सदुपदेशों पर आचरण करना यह सब कुछ "पूजा' शब्द में आ जाता है। संगति करण शब्द का भाव यह है कि अपने बराबर वालों के प्रति अच्छा बर्ताव करना-परस्पर प्रेम हो-अनुराग और प्रीति के साथ एक दूसरे से व्यवहार करें मित्रता की भावना से ही सब प्राणियों को देखें। द्वेष, विरोध, वैमनस्य, घृणा, स्वार्थ और ईष्र्या जैसे दुर्गुणों का ह्मदय में कोई स्थान न हो। हर एक से मेल-मिलाप बढ़ाने की इच्छा मन में बसी हुई हो-स्वभाव में विघटन अर्थात् दूर रहने की इच्छा, किसी के अनिष्ट -चिन्तन का विचार न उठता हो। रूठे को मना लेना, शत्रु को भी क्षमादान देकर आपस का वैर विरोध समाप्त करना-सदा प्रयत्न यह रहना कि मेरी आत्मा उसकी आत्मा का संस्पर्श कर सके। समता की भावना जगाने का प्रयास करना-यह भाव है "संगति करण' शब्द में। दान-देना-त्याग भावना को अपनाना-स्वार्थ का समूल नाश होने देना-उपकार करने की हर समय उत्कण्ठा रहनी। परहित चिन्तन करना-कभी किसी जीव के प्रति अहित करने का विचार तक भी न उठने देना-छल,कपट, वैर, ठगी, डकैती, चोरी, दोष-दृष्टि, निरर्थक आलोचना करना, इन दुर्गुणों का समावेश "दान' शब्द में नहीं होता।
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     समाज को हम तीन वर्गों में बाँट सकते हैं एक अपने से श्रेष्ठ दूसरे अपने समान के और तीसरे अपने से छोटे-यज्ञ भावना वाले पुरुष को सभी के साथ यथोचति बर्ताव करना है क्योंकि हम बुद्धिशाली और मननशील मनुष्य जन्म में आये हैं।
     हर एक मनुष्य का अपना विशेष स्थान होता है इस विराट् मानव-समाज में। जब महर्षि वाजश्रवा ऐसा यज्ञ कर रहे थे कि जिसमें उन्होंने अपना सर्वस्व ही दक्षिणा के रुप में पूजनीय ब्रााहृणों को दे देना था-उस समय उनका अपना पुत्र नचिकेता भी सामने बैठा था। वह उनका सर्वस्व दक्षिणा यज्ञ देख रहा था। सब कुछ दक्षिणा में दिये जाने पर पुत्र नचिकेता ने कहा कि "पिता जी! क्या मैं आपका नहीं हूँ?'' निस्सन्देह तू मेरा ही औरस तनय है तो फिर आप मुझे क्यों नहीं किसी को सौंप देते? मैं क्या किसी के योग्य नहीं? इस पर रोष में पिता ने कहा""जा तू यम के पास चला जा ये शब्द सुनकर वह बालक एकान्त में विचार करने लगा।''  
                बहूनामेमि  प्रथमो  ,   बहूनामेमि  मध्यमः ।
                किंचिद् समस्य कत्र्तव्यं, यन्मयाद्य करिष्यति।।
अर्थात् पिता जी ने जो मुझे यमराज को सौंप देने की बात कही है वह उचित प्रतीत नहीं होती। उन्होने आवेश वश ऐसा कह दिया है। मैं इस शिष्य मंडली में कितनों से उत्तम हूँ और किन्हीं के बराबर भी-तो यमराज का मुझ से क्या कार्य सिद्ध हो जाएगा जो मुझे पिता जी उसके पास भेज रहे हैं। यह वचन उन्होने गहराई तक विचार कर नहीं कहा-ए तातचरण।
                अनुपश्य   यथा   पूर्वे ,  प्रतिपश्य  तथापरे ।
                सस्यमिव मत्र्यःपच्यते, सस्यमिवा जायते पुनः।
     आपको अपनी कुल परम्परा के गौरव की रक्षा करनी चाहिये। जैसा आचरण आपके पिता दादा, समयानुसार करते आये हैं आप भी वैसा ही कीजिये जीवन के श्वासों का क्या विश्वास। इतने दारुण शब्द क्रोध के वश होकर आपको नहीं कहने चाहिये। कोई भी अपने आचरण को बिगाड़कर यदि कार्य करता है तो अजर-अमर नहीं हो जाता देखिये यह मनुष्य खेती की तरह ही पकता है अर्थात् यह बालक-किशोर-तरुण-प्रौढ़ और वृद्ध होकर अन्त में मर जाता है और फिर खेती की भांति ही जन्म ले लेता है। ऐसी अनित्यता में वाणी को कठोर नहीं बनाना चाहिये वही भावना यज्ञ शब्द में मिलती है। अतएव यज्ञ शब्द अपने से बड़ों-बराबर वालों और अपने से छोटों के प्रति उचित ढंग से व्यवहार करना सिखाता है। जीवन का सार प्रेम है। प्रेम पूर्ण मधुर जीवन ही मनुष्य जन्म का सौन्दर्य है। दूसरों के भले के लिये कुर्बान हो जाना यज्ञमय जीवन है। जैसे दीपक स्वयं जलकर भी दूसरों को रोशनी प्रदान करता है, महर्षि दधीचि ने देवताओं के लिये अपनी अस्थियां दान कर दीं। अतिथि यज्ञ में दक्ष राजा रन्तिदेव ने निराहार रहकर भी दूसरों की भूख मिटाई और दूसरों के दुःखों को भोग लेने का ही वरदान माँगा।
     प्रजापति ने जब सृष्टि बनाई तो सम्पूर्ण जीवों को एक-एक उपहार साथ में दे दिया वह क्या था? "यज्ञ' और मनुष्य समाज को आदेश दिया कि ऐ मेरे प्रिय मनुष्यो! तुम्हें यदि इस धराधाम पर जाकर समृद्ध होना है, तो यज्ञ भावना को कभी भी न भुलाना। सदा ही प्राणि मात्र का हित करना। जड़ चेतन संसार तुम्हारे हाथों कभी भी दुःखित न होवे। यह यज्ञ ही तुम्हारे लिये काम धेनु सिद्ध होगी। इस सत्य की पुष्टि श्री मद्भगवद् गीता इन शब्दों में करती हैः-
                सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा, पुरोवाच प्रजापतिः।
                अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्ट कामधुक्। (गीता 3/10)
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ऐ सर्वोत्कृष्ट मनुष्य! मैंने सारी रचना यज्ञ भावना से पूर्ण बनाई है। पांचों तत्त्व अपना अपना कत्र्तव्य करते हुए इस मेरी सृष्टि के अखण्ड यज्ञ को चला रहे हैं। तुझे भी यज्ञमय जीवन बनाना है। परोपकार ही मानव-जीवन का शिरोमणि है।
     कोई भी मशीन ले लीजिये-उस में लगे हुए सब पुर्ज़े अपना अपनी जगह यदि सही कार्य करते हैं तो मशीन चलती रहेगी। एक भी पुर्ज़ा कहीं किसी भी कारण वश काम करने की शक्ति खो बैठता है और वह पुर्ज़ा चाहे कितना छोटा भी क्यों न हो बड़े पुर्ज़ों के घूमने में रुकावट पैदा कर देगा।
     इसी तरह मानव का प्रमुख धर्म है कि वह अपने परमात्मदेव की इस सकल सृष्टि की रचना के चक्र को भलीभाँति घूमने दे। स्वार्थ ही इस यज्ञ का प्रबल शत्रु है। इसलिये आदर्श मानव का कत्र्तव्य है कि वह स्वयं सदाचारी शब्दाभ्यासी, गुरु भक्त और जितेन्द्रिय बनकर विश्व को मनुष्य बनने का उपदेश करे अपने तपोमय जीवन से सृष्टि के यज्ञ कुण्ड में शुभ कर्मों की आहुति डालता जाये जिससे संसार में उसके पुनीत कार्यों की चारु सुगन्धि दसों दिशाओं में फैले। इसके लिये सन्त सत्पुरुषों की समीपता प्राप्त करे। और उनके पावन सत्संग से अपने जीवन का कल्याण कर ले।

Wednesday, August 10, 2016

सन्त मत


     सन्त मत का अभिप्राय है सन्तों की मति अर्थात् मत पर चलना। सन्त मत में सबसे मुख्य तीन बातें हैंः- 1.सद्गुरु, 2.सत्संग,3.सत्यनाम। सन्त मत में इन तीनों से ही सम्बन्ध जोड़ना पड़ता है। जब तक इन तीनों से सम्पर्क नहीं किया जाता तब तक वास्तविक उद्देश्य अर्थात् आत्म-कल्याण नहीं हो सकता।
     सर्वप्रथम मनुष्य को सद्गुरु से मिलाप करना है। उनके सामीप्य में रहना तथा उनके पवित्र वचन श्रवण करना ही सत्संग है। उनके पावन उपदेश तथा वचनों को अपने ह्मदय में धारण करना प्रधान धर्म है। तदनन्तर सद्गुरु उसे सत्यनाम अर्थात् सुरत शब्द का भेद बतलाएंगे। जिसकी साधना और अभ्यास करने से जीव के सब सांसारिक एवं मायिक बन्धन कट जाते हैं। यह सत्यनाम क्या वस्तु है? यह कोई बाह्र विद्या नहीं जिसे पढ़ने-पढ़ाने से जाना जा सके। यह आन्तरिक ब्राहृविद्या है। इसका सम्बन्ध जीव की सुरति और उसकी विचारधारा से है। इसलिये सन्तमत में इसे सुरत-शब्द-योग कहा जाता है। इसका भाव यह है कि जीव की सुरति के साथ-शब्द-ब्राहृ का मिलाप हो जाना।
     इस सृष्टि का कत्र्ता परब्राहृ शब्द रुप में सम्पूर्ण ब्राहृाण्ड के अणु-अणु में ओत प्रोत है। यही शब्द-ब्राहृ ही प्रत्येक प्राणी के रोम-रोम में रमा हुआ है। और यही हर एक जीव का प्राणाधार है। इसी शब्द के ही आधार पर यह जीव सब सम्बन्धियों व मित्रों को अच्छा मालूम होता है। इसी के आधार पर ही स्थिर है और उसकी देह संसार में कार्य कर रही है। और समस्त प्राणी इसको प्यार करते हैं। यदि यह शब्द इस जीव के साथ न रहे तो इसे मृतक कहा जाता है। वे ही मित्र सम्बन्धी जो इसके साथ प्यार करते थे फिर इससे घृणा करने लगते हैं। फिर यह मनुष्य जलाने, पानी में बहाने अथवा मिट्टी में दबाने के योग्य ही होगा। यह शब्द इस मानव जीवन में इतना महत्त्वपूर्ण है।
     इस शब्द-ब्राहृ का ज्ञान सन्त-सद्गुरु ही प्रदान कर सकते हैं। सन्त मत में सुरत-शब्द योग या सत्यनाम का भेद सद्गुरु से ही प्राप्त होता है। जिस प्रकार बाह्र विद्या विद्यालयों व महाविद्यालयों में प्राप्त हो सकती है। इसी भांति ब्राहृ विद्या का ज्ञान भी सन्त मत में सद्गुरु से ही प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नहीं कि यह सब ज्ञान पाठ्य-पुस्तकों में लिखा होता है तो भी उसे समझने के लिये विद्यालय, महाविद्यालय व विश्व विद्यालयों में जाकर सतर्क होकर अध्यापकों से पाठ सुनने पड़ते हैं क्योंकि उन पुस्तकों में जो भेद छुपा होता है उसे शिक्षक ही व्यक्त करते हैं वे उसकी व्याख्या करके विद्यार्थी के मस्तिष्क में उसे बैठाते हैं जिससे विद्यार्थी उससे लाभान्वित होते हैं।
     इसी प्रकार ब्राहृविद्या अर्थात् सुरति शब्दयोग का रहस्य सभी धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रों में छुपा हुआ होता है परन्तु पढ़ने वाले लोग उस भेद को जान नहीं सकते। वे कई बार उन पुस्तकों को पढ़ते हैं किन्तु उन पर वह भेद स्पष्ट नहीं होता। वह भेद उन पर तभी स्पष्ट होगा जब वे सन्त सद्गुरु की शरण में आयेंगे। सद्गुरु उन गूढ़ रहस्र्यों को उन्हें समझाएंगे तब वे जान सकेंगे कि उन धार्मिक पुस्तकों में क्या लिखा हुआ है। और सत्पुरुष उन ग्रन्थों में क्या क्या भेद छोड़ गये हैं। उस राज को जान करके ही उन्हीं पुस्तकों को फिर से पढ़ने में उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता होगी।
     वस्तुतः सन्तमत में ही ब्राहृविद्या का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। वह ज्ञान-प्राप्त भी केवल केवल सद्गुरु से होता है। जब जीव सद्गुरु की निष्काम सेवा करेगा, शब्द का अभ्यास करेगा, सद्गुरु का पवित्र सत्संग श्रवण करेगा तथा अपने विचारों को सद्गुरु की मौज के अनुसार बनायेगा तो फिर उसको सद्गुरु का वास्तविक स्वरुप दृष्टिगोचर होगा। उनके शब्द-स्वरुप में एकाग्र होने से सद्गुरु के आध्यात्मिक सत्संग का आन्तरिक उद्देश्य उसकी समझ में आयेगा।
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गुर का सबद लगो मन मीठा। पारब्राहृ ताते मोहि डीठा।।राग गौड़ी महला 5. पृ.187)
सन्तमत में जीव को अपनी विचारधारा में परिवर्तन करना होता है-यही सबसे अनिवार्य शर्त है। इसी से वह इस मार्ग में उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकता है जब तक वह जीव अपने विचारों को सद्गुरु के विचारों में सम्मिलित नहीं करता तब तक वह आत्मिक प्रगति नहीं कर सकता। उसको ब्राहृविद्या की प्राप्ति नहीं हो सकती। सन्त मत में अपने विचारों को सद्गुरु के विचारों में मिला देना अर्थात एक रंग हो जाना ही सबसे बड़ा कर्म है। यही सबसे बड़ा ज्ञान, सेवा और योग है। अपने विचारों को मिटा करके सद्गुरु जी की मौज को अपनाना ही सबसे ऊँची शिक्षा है। जैसे पानी पानी में मिलकर एक रुप हो जाता है वैसे ही जीवों के विचार सद्गुरु के विचारों में मिल कर एक रुप हो जाते हैं। यही सन्त मत की अन्तिम मंज़िल है।        सेवक स्वामी एक मति, जो मति में मति मिलि जाय।
                चतुराई   रीझे   नहीं  ,   रीझे   मन   के  भाय।।
सेवक और स्वामी अथवा जीव और सद्गुरु तभी एक मत हो सकते हैं जब जीव सद्गुरु की मौज के अनुसार ही आचरण करे। सद्गुरु की आज्ञानुसार तन और धन से सेवा करे। जब तन व धन से सेवा करेगा तो मन स्वयमेव सद्गुरु की ओर जायेगा। जब मन सद्गुरु के ध्यान व स्मरण में लगेगा तो उसके विचार शनैःशनैः सद्गुरु के विचारों में लीन हो जाएंगे। पुनः ऐसा समय आयेगा जब वह सद्गुरु की कृपा से एकमत हो जाएगा।
     सन्त मत में सबसे विकट समस्या यही होती है कि जीव अपने विचारों का त्याग नहीं करता यह जीव चाहे स्त्री-पुत्र-धन माल आदि सब वस्तुओं का त्याग करे किन्तु जब तक अपने विचार और अपनी मनमति नहीं छोड़ता तब तक अपने ध्येय पर नहीं पहुँचता। सन्त मत के जिनते महान आचार्य हो गुज़रे हैं जैसे परमसन्त श्री कबीर साहिब जी, श्री गुरुनानकदेव जी, श्री परमहँस अद्वैत मत के महान प्रथम आचार्य श्री परमहंस दयाल जी महाराज और उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों का यही मत रहा है कि श्री गुरु-आज्ञा का पालन करना ही जीव का परम धर्म है। सर्वप्रथम कोटि का भक्त, साधु अथवा संन्यासी वह है जिसका मन अपने सद्गुरु की आज्ञा में रंगा हो। जब यह मन सोलह के सोलह आने सद्गुरु की आज्ञा में रंग जायेगा तो इस जीव के अपने विचार सद्गुरु की विचार धारा में स्वयमेव बदल जायेंगे। फिर सेवक और स्वामी एक मति हो जायेंगे।
     सन्त मत के आचार्य जीव को आन्तरिक सुरत शब्द योग की युक्ति बताते हैं और मानुष देह को ही परमात्मा का वास्तविक मन्दिर बतलाते हैं। इस मानवीय काया में ही जीव को उस ज्योति स्वरुप ब्राहृ में लीन हो जाने को कहते हैं किन्तु समय समय पर विश्व में प्रकट होने वाली विभूतियों की कृपा के बिना ये जीव इस मंज़िल को प्राप्त नहीं कर सकते।
     इसके अतिरिक्त सन्त मत-वर्तमान काल को सबसे अधिक महत्त्व देता है। भूतकाल एक स्वप्न है और भविष्यकाल मात्र एक विचार है। इन दोनों को छोड़कर वर्तमान समय का समादर करना चाहिये। यही समय है जिसमें जीव जो चाहे कर सकता है। बीता हुआ काल लौटा नहीं करता। यही समझना चाहिये कि जो प्रभु की मौज थी वैसा ही हुआ। सब ठीक ही हुआ इसी तरह आगे आने वाले समय की दशा है। वह भी एक विचार है हो सकता है कि वह हो या न हो। इसलिये सन्त मत के महान आचार्यों ने वर्तमान काल को विशेष गौरव प्रदान किया है उनका यह भी आदेश होता है कि यह जीव परमार्थ करे।  इस समय को सद्गुरु की आज्ञा व सेवा में ही व्यतीत करे। जिससे वह इस जीवन-काल में ही यथार्थ आनन्द व सुख को प्राप्त कर सके। अपनी सुरति  को काल व माया के चक्र से मुक्त करा ले। यह काम
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सद्गुरु के शब्द की कमाई से और उनका ध्यान करने से सम्भव हो सकता है। यदि जीव की सुरति जीवन काल में स्वतन्त्र न हो सकी तो मरने के बाद वह अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकती। भावार्थ यह कि जीवन काल में ही सब कुछ करना है।
     सन्तमत में जैसे वर्तमान काल को अत्युत्तम समझा जाता है इसी तरह समय के सन्त सद्गुरु को भी सर्वोत्कृष्ट समझा जाता है। वर्तमान के सद्गुरु की उपासना,सेवा और भक्ति ही सबसे ऊँची मानी जाती है। तत्कालीन सद्गुरु ही जीव के आमने-सामने बैठकर उसकी हर तरह से न्यूनता को पूरा कर सकते हैं।
     पहले वर्णन हो चुका है कि जीव ने अपने विचारों को सद्गुरु के विचारों में लीन करना है यह तभी सम्भव है जब कि सद्गुरु सगुण रुप में सामने विराजमान हों। जीव का मन बड़ा चंचल है। हर घड़ी जीव को माया की ओर आकृष्ट करता है। सद्गुरु के चरणों में किये हुए उसके विश्वास पर चोट करता हैऔर उसे अनेक प्रकार के भ्रम व संशयों के चक्र में डाल देता है। इन सब बातों और रुकावटों से बचने के लिये जीव को वर्तमान सद्गुरु की छत्रच्छाया की अत्यन्त आवश्यकता है। समय के सद्गुरु जीव को भ्रम-संशय व सन्देहों से छुड़ाकर उसकी सुरति को अपने अनामी स्थान पर ले जायेंगे। उसे माया के चंगुल से सर्वदा के लिये विमुक्त करा देंगे।
     जीव के अन्तःकरण में अनेकों विचार भरे रहते हैं। साकार सद्गुरु ही उन सब मिथ्या विचारों को काट कर अपनी एक विचार धारा जीव के हृदय में भर देते हैं। जब जीव एक विचार का अथवा एक मत का हो जाता है तो वह ईश्वर रुप हो जायेगा। क्योंकि एक विचार ही ईश्वर है और अनेक विचार जीव हैं।
     आज जो समय का सम्राट अथवा न्यायाधीश होगा उसके आदेश में ही शक्ति है। इसी प्रकार प्रकृति ने इस विश्व में आध्यात्मिक परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये उस पवित्र आसन पर श्री सद्गुरुदेव जी को विराजमान किया है। जो भी सन्त सत्पुरुष इस अध्यात्म के सिंहासन पर समासीन होकर संसार में कार्य कर गये हैं उनके प्रति जीवों के ह्मदयों में अवश्य ही सम्मान होगा। किन्तु आत्मिक लाभ और मन की घड़त तत्कालीन सद्गुरु ही कर सकते हैं। वर्तमान काल के सद्गुरु की भक्ति, सेवा व आज्ञा का पालन करना ही सन्त मत है।
     सन्त मत में पुरुष-स्त्री, बड़े-छोटे और जाति-पांति का भेद नहीं होता। इसकी शिक्षा सबके लिये एक जैसी है। इस भांति जब जीव सन्त मत का अनुुयायी बन जाता है तो इस भवसागर से जीवन काल में ही पार हो जाता है। जीव अपना सम्बन्ध वर्तमान सद्गुरु की पवित्र आज्ञा से, उनके पवित्र अनाहत शब्द व सुरत-शब्द-योग में लगाता है तो उसे नित्य सुख और अनुपम शान्ति मिलती है। सुरति अपने अनामी लोक जहां से यह उतरी थी पर पहुँच कर अपने मालिक सन्त सद्गुरु के स्वरुप में लीन हो जाती है। विश्व में इसलिये सन्त मत सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

Sunday, August 7, 2016

उठी जात हैं पैंठ


                या दुनियां में आइके, छाँड़ि देइ तू एेंठ।
                लेना होइ सो लेइ ले, उठी जात हैं पैंठ।।
     सन्तों के वचन हैं कि ""इस संसार में आकर ऐ मनुष्य! तू मिथ्या अभिमान को छोड़ दे। जो कुछ तुझे लेना हो उसे ले ले। जगत् की हाट तो बन्द हो रही है।''
     सन्त सत्पुरुष समझाते हैं कि ऐ मनुष्य! तू इस संसार में अपने कर्मों के फल को भोगने के लिये आ तो गया है परन्तु तुझे इस नश्वर जगत् में बने रहना शोभा नहीं देता। तू मनुष्य है-सम्पूर्ण भोग योनियों में तेरा दर्ज़ा सबसे श्रेष्ठ है-तू अपने सर्वश्रेष्ठ होने के गौैरव को भूल नहीं। ऐसा प्रयत्न कर कि जिससे इस कर्म जंजाल से तेरा छुटकारा शीघ्र हो जाय। तू अपनी शक्ति की पहचान कर-अपने स्वरुप का ज्ञान प्राप्त कर। अपनी इस मानुष-देह की अद्भुत शक्तियों से वह काम ले जिससे तेरे समस्त कर्मबन्धन कट जायें। जन्म और मरण का भय तुझे न रहे। संसार में तेरा आगमन स्वतन्त्रता पूर्वक जीवन यापन करने के लिये है। चौदह लोकों के भोगैश्वर्य तेरे जीवन के ध्येय को पंकिल न कर दें। तेरा लक्ष्य अमर पद की प्राप्ति है-तुझे आत्मा के देश में लौट जाना है। ये इन्द्रियां, शरीर, मन, बुद्धि और चित्त सब के सब अचेतन और असत् हैं। इन की रचना विधाता ने पांच तत्त्वों और तीनों गुणों से की है परन्तु तुझे ब्राहृा ने बनाया ही नहीं-न वह बनाने की सामथ्र्य रखता है। तू तो स्वयम्भू है-अनादि काल से स्वयमेव है और अनन्त काल तक तेरी सत्ता बनी रहेगी। तू तो वह शक्ति है कि जिसके संकल्प से ही यह समस्त प्रपञ्च अवस्थित है। तेरी सत्ता को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता। देवी देवता भी तेरे इशारे को समझने में असमर्थ हैं। चौदह भुवनों का तू अधिपति है। जन्म और मृत्यु तो तेरे दोनों हाथों के खिलौने हैं। सृष्टि और प्रलय कर देना तेरे बायें हाथ का खेल है। इतनी अलौकिक एवं अनन्त शक्तियों का स्वामी होकर भी तू अविद्या के वश हो गया है। मानव जन्म की श्रेष्ठता इसी बात में है कि मनुष्य अपने सामने कोई न कोई ऊँचा लक्ष्य रखे। जीवन को बिना किसी उद्देश्य के बिता देना कोई बुद्धिमत्ता नहीं। जिस व्यक्ति के जीवन का कोई ध्येय ही नहीं है उसकी सम्पूर्ण शक्तियां शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक निर्रथक चली जाती हैं। समय ने तो प्रतीक्षा करनी नहीं-श्वास और प्रश्वासों की चलती हुई धारा ने रुकना नहीं। सूर्य-चाँद-तारे-दिशाएं-धरती और आकाश में सब केवल साक्षी हैं। इन्होने तुझे कभी नहीं समझना कि तेरा कत्र्तव्य अथवा अकत्र्तव्य क्या है? ऐ भाग्यशाली मनुष्य! तनिक सोच तो सही! कहाँ तू परमचेतन और सनातन पुरुष परमेश्वर का अंश-तू उसी के सदृश ""चेतन अमल सहज सुखराशि' है और कहाँ यह संसार अचेतन मलिन और स्वभाव से-दुःखों का घर! तेरे कत्र्तव्य कर्म तो ये हैंः-
                जो तो को काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
                तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
                कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।
                आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय।
""ऐ मनुष्य! यदि तेरे लिये कोई काँटे बो देता है तो तू उसके लिये फूल बो दे। ये फूल तेरे लिये तो फूल का काम देंगे ही और उसको ये कांटे के समान चुभने लगेंगे।''

     भाव यह कि ऐ मानव! तू जगत् में सर्वोत्तम जीव है-तुझे संसार के स्वभाव को नहीं ग्रहण करना जगत की ओर से यदि कोई कष्ट तुझ पर आता है तो तू भी उसे दुःख और कष्ट लौटाना न सीख वह दुःख देता है तू उसे सुख दे। तेरा दिया हुआ सुख उसके अन्तःकरण के अन्दर पश्चात्ताप को जगा देगा उसका अन्तर्मानस अपने आप ही उसे कचोटेगा और वह अपनी करनी पर स्वयं अनुताप करेगा।
     सन्त तुकाराम जी महाराष्ट्र के सन्तों में से एक उच्च कोटि के सन्त माने जाते हैं। वे प्रारब्धवश उच्च वंश के न थे। छोटे कुल में उत्पन्न होने के कारण इनसे ब्रााहृण कुलोत्पन्न कई पण्डित ईष्र्या किया करते थे। इनकी सच्चाई गहरी थी ह्मदय में उनके अपने इष्टदेव श्री पाण्डुरंग जी का असीम प्रेम लहराया करता था। अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल एवं सरल था। प्रभु-भक्ति के रस में आठों पहर मग्न रहते थे। गुरु-कृपा से इनकी वाणी में इतनी मधुरता थी कि लोग इनके प्रवचन सुनने के लिये बड़े लालायित रहते थे। भगवद् अनुकम्पा से इनकी रसना से भक्ति भरे "अभंग'अपने आप ही फूटा करते थे। सैंकड़ों ही अभंग इन्होंने रच डाले थे जिन में भक्ति-ज्ञान-वैराग्य तथा कत्र्तव्य-भावना भरी होती थी।
     उधर पंडित रामेश्वर भट्ट जी को अपनी कुलीनता का बड़ा अभिमान था। जब उन्होने सुना कि तुकाराम शूद्र जाति का होकर भगवान की कथा करता है-कितने ही उच्च कुल के लोग भी उसके सत्संगों में आते जाते हैं। उसकी बड़ी प्रसिद्धि होती जाती है और किन्हीं को नाम-मन्त्र की दीक्षा भी दे देता है वह अपने चरणों को पुजवाता है। यह सब जानकर रामेश्वर पंडित तो आग बबूला हो गये। उन्होने निश्चय कर लिया कि तुकाराम को तो पाण्डुरंग जी के मन्दिर में जाने से भी रोक देना है और पण्ढरपुर नगर से भी निकलवाना है। उन्होने ऐसा ही किया। भट्ट जी की उच्चाधिकारियों तक अच्छी पहुँच थी उनसे मेल जोल करके उन्होने तुकाराम जी का देव-दर्शन करना बन्द करा दिया और उनके बड़े परिश्रम से लिखे हुए अभंगों की पुस्तक को भी इन्द्रायणी नदी में प्रवाहित कर दिया। परन्तु तुकोबा सन्त चुप हैं-शान्त हैं उन्हें अपने इष्टदेव श्री पाण्डुरंग जी पर अनन्य विश्वास और श्रद्धा थी वे घर में बैठकर मन ही मन में अपने प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि प्रभो! आप सब कुछ कर लीजिये किन्तु अपने मन्दिर प्रवेश से तो वञ्चित न कीजिये। मुझ से कोई भी अपराध हुआ हो तो क्षमा कर दीजिये।
      भक्त की गुहार प्रभु देव ने सुनी-तुकोबा जी की शिष्य मण्डली को इस बात का बड़ा रोष था कि हमारे गुरुदेव की वह अभंगों की विशाल पुस्तक जिसमें अलौकिक जीवनोपयोगी अभंग शोभा पा रहे हैं आज नदी में बहा दी गई है और उन्होने जाकर देखा कि उसका एक एक पन्ना अलग-अलग नदी की लहरों में तैर रहा है। यह सब काण्ड देखकर वे अश्रुओं के घूँट पीते रहे। उधर क्षमाशील उदार ह्मदय, निष्कपट और सरलचित्त तुकाराम जी ब्रााहृण के दर्शन करने के लिये रामेश्वर भट्ट जी के द्वार पर पहुँचे और उनके चरणों में मस्तक रख कर बैठ गये।
भट्ट जी-कहो तुकाराम! कैसे आये?
तुका-मुझे क्षमा करें, यह जो कुछ भी आप देख रहे हैं इसमें मेरा अपना कोई भी हाथ नहीं। मेरे भगवान पाण्डुरंग देव जी की अपनी कृपा हो रही है। मेरे अन्तस्तल में लेशमात्र भी यश प्राप्त करने की इच्छा नहीं। मेरा ग्रन्थ आपने नदी के अगाध जल में फिंकवा दिया है। मुझे इसकी भी चिन्ता नहीं किन्तु श्री पाण्डुरंग जी के पूजा मन्दिर में मुझे जाने की आज्ञा हो जाय तो आपका अत्यन्त अनुग्रह होगा।
     रामेश्वर जी ने श्री मन्दिर दर्शन की तो आज्ञा प्रदान कर दी शेष रही इन्द्रयाणी के अथाह जल में अभंग ग्रन्थ के डलवा देने की बात इस पर वे चुप हो गये भक्त पुरुष क्या करे। उस समय वह असहाय है। परन्तु कृपा के सागर भगवान तो तुकाराम के परम सहायक हैं। श्री पाण्डुरंग जी क्या लीला करते हैं कि इन्द्रयाणी के जल में चार दिनों से ग्रन्थ की पाण्डुलिपि में लिखा हुआ एक एक पन्ना तैर रहा है परन्तु उसकी लिपि वैसी की वैसी अक्षुण्ण है। सूखे सूखे पन्ने दूर दूर तक बिखरे हुये थे उनकी थोड़ी सी भी क्षति नहीं हुई थी। शिष्य मण्डली से रहा नहीं गया। वे प्रेमी इन्द्रायणी पर गये और पन्नों को इकट्ठा करने लगे। इधर रामेश्वर भट्ट जी को भी अपने आप ही उस अपनी क्रूरता पर बड़ा अनुताप हुआ। तुकाराम जी की इतनी साधुता और विनम्रता का उन पर और भी गहरा प्रभाव पड़ा। वे मन ही मन उनकी विशुद्ध भक्ति भावना की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे और स्वयं उस ग्रन्थ के पन्नों को बचाने के लिये इन्द्रायणी नदी में उतर पड़े वहाँ जब उन्होंने यह चमत्कार देखा कि पुस्तक के पन्ने वैसे के वैसे ही सूखे हैं उनपर तनिक भी आँच नहीं आई-वे दंग रह गये और मान गये कि तुकाराम कोई अलौकिक पुरुष हैं। भगवान के परम भक्त हैं। और तुकाराम की भक्ति का भट्ट पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि अपने ब्रााहृणत्व के अभिमान को एक ताक पर रखकर उन्होने उनसे नाम मन्त्र ले लिया। यह है सच्ची मानवता। मनुष्य को इस प्रकार की संकीर्णता को छोड़कर विशाल ह्मदय बनना चाहिये। विरोधी के ह्मदय को भी जीत लेना चाहिये ऐ मनुष्य! तेरी सुन्दरता तो यह हैः-जो तो को काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
                     तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
""मनुष्य का धर्म तो यह है कि वह संसार को कभी ठगने का प्रयत्न न करे। स्वयं घाटा उठा ले वह अच्छा है। दूसरे के ह्मदय को ठेस लगाना सज्जन को उचित नहीं।'' ऐ मानव तेरा कर्तव्य क्या है-""ज्ञान रुपी हाथी पर सवार हो जा-सरल स्वभाव रुपी दुलीचे को बैठने के लिये नीचे बिछा ले और आनन्द मग्न होकर चलता जा-संसार तो बुरा-भला कहता ही रहता है। उसकी परवाह दृढ़ प्रतिज्ञ पुरुष नहीं किया करते।''
     ऐ मनुष्य! ये हैं तेरे अनुरुप गुण। निर्मल आत्माएं ऐसे ही सद्गुणों से भरपूर रहा करती हैं। दया-क्षमा-शील-धैर्य-सत्य-उदारता-अहिंसा आदि सुन्दर गुण हैं जो कर्मयोनि में उत्पन्न मनुष्य के चरित्र की अनुपम शोभा हैं। इन गुणों को जीवन काल में धारण करना है।
     किसी भी वस्तु को प्राप्त करना हो तो उसके लिये नम्रता और सरलता को अपनाना ही पड़ता है। यदि कोई यह चाहे कि मैं अपने ज्ञान-कुल-जाति-धन-रुप और बल का अभिमान भी न छोड़ूँ और दूसरों से कुछ प्राप्त कर लूँ यह सर्वथा असम्भव है।
                ज्ञानी से कहिये कहा, कहत कबीर लजाय।
                अन्धे आगे नाचते, कला अकारथ जाय।।
परमसन्त श्री कबीर साहिब जी कथन करते हैं कि हम इन ज्ञानियों से जो केवल वेदादि शास्त्रों के शब्दों और अर्थों को ही भली भाँति जानते हैं-जिनका जीवन उन शास्त्रों के वचनों के अनुसार ढला नहीं है-क्या कहें? उनसे हमारा अनुभव सिद्ध बातें करना ऐसे ही निर्रथक होगा जैसे कोई नट बड़ी सुन्दरता से नाच करता हो परन्तु जिसकी प्रसन्नता के लिये वह जो कुछ कर रहा है वह तो नेत्रहीन है। वह क्या जाने कि नृत्य-कला कैसी होती है? श्री कबीर साहिब जी तो काशी के वेदपाठी पंडितों को अनुभव शून्य देखकर मन ही मन खीझ कर कहते थेः-
मेरा तेरा मनुआ कैसे इक होइ रे।
मैं कहता हूं आंखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे। मैं कहता सुरझावन हारी, तूँ राख्यों अरुझाइ रे। मैं कहता हूँ जागत रहियों, तूँ रहता है सोई रे।। मैं कहता निर्मोही रहियो, तूँ जाता है मोहि रे। सतगुरु धारा निरमल वाहै, वा में काया धोइ रे।कहत कबीर सुनो भाइ साधो, तब ही वैसा होइ रे।।
ऐ वेदशास्त्रों के स्वाध्याय करने वालो! सुनो तो! तुम्हारा और हमारा मन एक कैसे हो सकता है? मैं जो कुछ भी आपसे कहता हूँ वह सब मेरे अपने अनुभव के रंग में रंगा होता है और तुम केवल पुस्तकीय ज्ञान की ही व्याख्या कर देते हो। मैं जो कुछ भी कहूँगा उसका सच्चे भाव से श्रवण करने से तुम्हारा कोई भी संशय शेष न रहेगा किन्तु शास्त्रों की पंक्तियों में जो सारतत्त्व है उस तक तुम स्वयं नहीं पहुँचे हो तो औरों को क्या समझाओगे? मैं कहता हूँ कि माया और ब्राहृ के भेद को जानने के लिये योग साधना करो जिससे तुम्हारी अन्तरदृष्टि खुले और तुम केवल शब्दों के जाल में लोगों को फँसा देते हो क्योंकि उन शब्दो के अन्तर्भाव से स्वयं शून्य हो-मैं तुम्हें कहता हूं जगत का मोह छोड़ दो और तुम अपने को मोह ममता के जाल में उलझा देते हो। इसलिये आवश्यक है कि जीव किसी पूर्ण गुरुदेव की शरण ले सन्त सद्गुरुदेव जी के लिये हुए निर्मल उपदेश की जब तक कमाई नहीं होगी तब तक मन निर्मल नहीं होगा। नाम-मन्त्र के जाप की युक्ति उनसे सीख कर अपने अन्तह्र्मदय में डुबकी लगाओ तभी अपने स्वरुप को जान पाओगे और तुम्हारे सब संशय निवृत्त हो जायेंगे।
     सन्त जनों के वचनों में कितना तेज़ है; सहानुभूति और करुणा है वे स्वयं इतने संवेदनशील होते हैं जो जगत् के मोह जंज़ाल में उलझे हुए मनुष्यों को छुड़ाने के लिये बड़े ही आतुर रहते हैं। वे एक क्षण के लिये भी दूसरों का कष्ट देख नहीं सकते। वे ह्मदय से चाहते हैं कि सारा विश्व ही आनन्दमय हो जाय-अपने वास्तविक उद्देश्य को पहचाने, आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाय परन्तु संसार की मनोमोहिनी, अतिरमणीय एवं कमनीय माया ने इतने दृढ़ लपेटे दे रखे हैं जो सांसारिक मनुष्य हाथ-पाँव भी नहीं मार सकते। मोह-माया की मदिरा का कण्ठ तक पान किया हुआ है जो विमल प्रभु-भक्ति का श्वास तक भी भीतर प्रवेश नहीं कर पाता।
     इसलिये सन्त महापुरुषों को जागरण का सन्देश देते हुए लिखना पड़ता हैः- ""या दुनियां में आइके, छांड़ि देइ तूँ एेंठ'' अर्थात् इस भूमण्डल पर पहुँच कर जगत के अनित्य एवं क्षणभंगुर पदार्थों का अभिमान न कर। जो कुछ भी तुझे प्रारब्ध वश प्राप्त हुआ है अथवा भविष्य में होगा वह सब कुछ अस्थिर है। क्षणस्थायी वस्तुओं से मन लगाना, उनका मान करना, उनकी सुरक्षा की चिन्ता में अपनी सम्पूर्ण मानवीय शक्तियों का व्यय करना सरासर नादानी है।
     यह मनुष्य जो चौरासी लाख योनियों में सर्वोपरि है और आत्मज्ञान का अधिकारी है-परमात्मा के दर्शन करने की भी क्षमता जिसमें विद्यमान है और अपने ब्राहृ के स्वरुप को भी जो चीन्ह सकता है जो आत्मिक बुद्धि से भगवान का दूसरा रुप है, अविनाशी और अजर अमर है वह भी क्या मुग्ध हो जायेगा इन संसार के मिथ्या रसों पर? यह चिन्ता का विषय है। आज का मनुष्य ही नहीं अपितु सम्पूर्ण प्राणी अशान्त हैं। दुःखी और अभाव ग्रस्त हैं। अपने जीवन को बिता तो रहे हैं परन्तु उन्हें आन्तरिक उल्लास नहीं उनके वदन पर हास नहीं, उनकी बातचीत में रस नहीं, ह्मदय में सन्तोष नहीं, भाव यह कि आज का विश्व अपने आप से सन्तुष्ट नहीं है, व्याकुल है, किसी ऐसी वस्तु की खोज में है जो इसे कहीं से प्राप्त नहीं हो रही और वह वस्तु जिसका अभाव इसे खल रहा है भौतिक जगत के किसी भी भाग से उपलब्ध हो भी नहीं सकती। वह है नित्य शान्ति परम सुख और अचल आनन्द। उसकी प्राप्ति हो सकती है सन्त सतपुरुषों की संगति से। उनकी सन्निधि में निवास करने से। उनको सेवा शुश्रुसा से प्रसन्न कर लेने से। अथवा उनकी अहैतु की अनुकम्पा से। कारण-यह वस्तु अन्तर्जगत की है। आन्तरिक आनन्द के कोष की कुञ्जी उन्हीं के पास ही है, उनकी प्रसन्नता प्राप्त हो तब जाकर वह चाबी भी मिलेगी और जीव शाश्वत सुख का भागी बन जायेगा।
     यह संसार तो परिपूर्ण है। इसमें माया भी गुप्त रुप से छुपी है और मायापति भी ओत प्रोत हैं। जीव की अपनी इच्छा है वह जिसे पसन्द करे। भगवान के पुनीत दर्शन करना चाहता है तो वह संसार को दर्पण बना ले इसमें परमात्मा हर एक पदार्थ के अन्दर रमे हैं। अब यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह ऐसी आँख से देखना सीखे जो पदार्थ के भीतर व्याप्त पुरुष को देख सके। चर्मचक्षु से उस विराट पुरुष के दर्शन नहीं हो सकते। उस लोचन के उघाड़ने वाले केवल सन्त सद्गुरुदेव जी हैं। सन्त सत्पुरुषों की पावन संगति से जब तक मन की मलिनता दूर न होगी तब तक मन में कभी भी श्री सद्गुरु देव जी के दर्शनों की तड़प नहीं हो सकती। उनसे जिस दिन नाम-मन्त्र मिल जायेगा, साधक सच्ची लगन और विश्वास से भजन की कमाई करेगा तो उसकी तीसरी आँख उघड़ जायेगी और वह हर एक प्राणी में अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु देव जी को देखने का प्रयत्न करने लगेगा।
     संसार से परमेश्वर कहीं भिन्न नहीं हैं। उसी परमात्मा की ज्योति से सम्पूर्ण विश्व जगमगा रहा है। बात तो है प्रेम की-हर एक मनुष्य को देखना तो यह है कि उसे भगवान और संसार में से कौन अधिक प्यारा लगता है? उसे माया के प्रति आसक्ति है अथवा ईश्वर के प्रति प्रेम? मनुष्य का धर्म है कि वह यौवन काल में ही एकान्त में बैठकर यह पूर्णतया निश्चय कर ले कि मुझे परमात्मा को मुख्य रखना है या माया को? दोनों की भली प्रकार से तुलना करे और सोचे कि यदि मैं माया को प्यार करुँगा तो यह दोनों लोकों में विश्वास के योग्य नहीं है। इस लोक में भाग्यों के अनुसार यदि यह मेरे पास रहने भी लगे किन्तु परलोक में जाते हुए तो मुझे इसका साथ छोड़ना पड़ेगा यदि प्यार करता हूँ अपने भगवान श्री सन्त सद्गुरु देव जी से तो वे नित्य के साथी हैं, सर्वकला समर्थ हैं, सर्वदा ही परमसुख के दाता हैं और दोनों लोको में परम शान्ति का दान देने वाले हैं। इस लोक में वही ऐसे सच्चे मित्र हैं जो पग पग पर जीव के सहायक रहते हैं। विपत्तियों में धैर्य का दीप वे ही जलाते हैं। अभावों की पूर्ति करते हैं, सर्वदा ही अपने शरणागत को माया और काल से निर्भय, निश्चिन्त और स्वतन्त्र कर देते हैं। इस प्रकार दोनों पक्षों को अन्तरमानस की तुला पर तोल कर पहले निश्चय कर लेना चाहिये कि मुझे कौन सा मार्ग ग्रहण करना है, माया का अथवा भक्ति का? मार्ग दोनों ही सुगम नहीं हैं, तपस्या तो दोनों को पाने के लिये करनी होगी। निर्णय कर लेने के उपरान्त परम सन्तों का आदेश है कि "लेना है सो लेइ ले' ऐ जीव! तुझे जिस पथ को अपनाना है तू अपना ले। अब विलम्ब न कर। इस तथ्य पर भी तनिक ध्यान दे लें कि माया पति श्री सन्त सद्गुरुदेव जी के सुखद आँचल में रहने से तुझे माया की पृथक् चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी। जहां विश्वपति सद्गुरु होंगे वहीं माया उनके चरणों में बैठी उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रही होगी और यदि तुम्हारी अन्तरात्मा यह कहती है कि मानव चोले में माया से यदि मीठी मीठी अठखेलियां न कीं तो किया क्या? उस दशा में भी कोई विश्वास नहीं कि माया भी आती है या नहीं वह तो हर एक के अपने प्रारब्ध पर निर्भर है।आकर भी वह रहती भी है अथवा नहीं, माया तो माया रही अपनी काया का भी तो कोई विश्वास नहीं। इसलिये कथन करते हैंः- लेना है सो लोइ ले, उठी जात हैं पैंठ।। विश्व का प्रपञ्च तो बन्द हुआ जा रहा है, न संसार नित्य है और न उसके पदार्थ नित्य तो केवल आत्मा ही है, शरीर भी नहीं, अब अनित्य वस्तु भी मिलती हो और नित्य भी, तो नित्य का त्याग करके अनित्य पदार्थ को कौन ग्रहण करेगा? किसी वस्तु को प्राप्त करने से पहले उसके दाम भी चुकाने होते हैं। अपने में सामथ्र्य भी जगानी होती है। नित्य के सच्चे मित्र हैं श्री सन्त सद्गुरुदेव जी जो सगुण भी हैं और निर्गुण भी। उनको प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प करना सर्वोत्तम कार्य है। इसके लिये अपने मन और मस्तिष्क को जिनमें माया पदार्थों को पाने के संस्कार भरे हुए हैं उनकी चरण शरण में अर्पित करना होगा। तभी जाकर उस दिव्यातिदिव्य आत्मा का साक्षात्कार श्री सद्गुरुदेव जी की कृपादृष्टि से हो जायेगा। मुक्ति पाने का यही मार्ग है।   

Wednesday, August 3, 2016

वर्तमान समय की कद्र करो


     जो समय बीत चुका है, उसको स्मरण न करो, जो आने वाला है उसकी चिंता न करो; जो समय चल रहा है उसी में ही मन से नाम-सुमिरण, तन से शुभकर्म करते चलो। इससे यह जीवन भी आनन्द से व्यतीत होगा और परलोक भी संवर जायेगा।
     इस वचन में जीवन की सफलता और अनन्त सुख समाया हुआ है। संसार की ओर दृष्टिपात करने पर हम पायेंगे कि लाखों-करोड़ों व्यक्ति बीती हुई बातों को स्मरण कर-करके उनकी ही चिंता में वर्तमान समय को भी व्यर्थ कर देते हैं और लाखों-करोड़ों व्यक्ति भविष्य की चिंताओं के बोझ तले दबे रहते हैं। मनुष्य को उचित है कि भूत और भविष्य की चिंता त्याग कर वर्तमान समय का लाभ उठाये। सत्पुरुषों का कथन हैः-    गुज़श्ता ख़्वाब व आयंदा ख़्याल अस्त।
                ग़नीमत दां हम र्इं दम के हाल अस्त।।
अर्थः-बीता हुआ समय स्वप्न और आने वाला विचार के समान है। लाभदायक और उत्तम समय तो वही है जो आज हमारे पास है। इसीलिये इन वचनों में यह फरमाया गया है कि भूत और भविष्य के व्यर्थ बोझ में न दब कर वर्तमान समय की कद्र करो और इसी में ही अपना काम संवार लो। इसी एक वचन पर आचरण करने से करोड़ों जीव दुःख और चिंताओं के बोझ से मुक्त होकर सुखी बन जाते हैं।
     जब कोई मनुष्य शरीर त्याग देता है तो आम बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि ""अमुक व्यक्ति गुज़र गया।'' गुज़र गया का अर्थ है जो अब नहीं रहा। इसलिये जो गुज़र जाता है उसे या तो कब्रा में गाड़ दिया जाता है या चिता में रखकर जला दिया जाता है अथवा जल में बहा दिया जाता है। तनिक सोचो यदि कोई शव को कब्रा से निकाल कर गले लगाने का यत्न करे तो सिवा दुर्गन्ध और रोग के उसके पल्ले और क्या पड़ेगा? ऐसे ही जो व्यक्ति बीते हुये समय को अथवा बीती हुई बातों को बार-बार स्मरण कर अर्थात् उनसे चिपक कर वर्तमान समय को बिना सुमिरण के व्यर्थ गंवा दे और माया के संस्कारों को ह्मदय में स्थान दे तो ऐसे व्यक्ति के बारे में सत्पुरुष ये फरमाते हैंः-
                निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा।
                आवै जाइ भवाईऐ बहु जोनि नचा।। गुरुवाणी मारू म.-5
निर्भय बनाने वाली वस्तु थी नाम, उसे तो भुला दिया और माया के पदार्थों से सुरति जोड़ ली। ऐसा मनुष्य बार-बार आएगा और जाएगा, बार-बार अनेक योनियों में नाचता फिरेगा; भाव यह कि जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहेगा।
     सन्त फरमाते हैं कि एक ओर तो नाम-सुमिरण है और दूसरी ओर माया की रचना है। जो मनुष्य नाम को भुला कर माया का सुमिरण करता है, वह स्वयं को दुःखों में डालता है और शत्रुता एवं वैर-विरोध की अग्नि में जलता रहता है। ऐसे मनुष्यों की संसार में कमी नहीं है जो कहते हैं कि वर्षों पहले की बात है अमुक व्यक्ति ने मेरे साथ दुव्र्यवहार किया था और मुझे अपशब्द कहकर मेरे साथ अशिष्टता से पेश आया था। वे बातें मुझे भूली नहीं हैं। अब विचार करो कि जिसके ह्मदय में ऐसी ऐसी दुःख देने वाली, द्वेषपूर्ण एवं ह्मदय में चुभने वाली बातें घर किये हों,उसके ह्मदय में सुखदायी वस्तु ""नाम'' कहां टिक सकता है? वह तो बला लेने की युक्तियां सोचता रहेगा। इस नियम का उसे पता ही नहीं कि दूसरे को दुःख तब पहुँचाया जा सकता है जब पहले अपने भीतर दुःख का विचार उत्पन्न करके अपने आपको दुःख की अग्नि में जलाया जाता है। माचिस की तीली दूसरे को जलाने से पूर्व स्वयं को जलाती है।
     द्रौपदी ने दुर्योधन से इतना ही तो कहा था कि ""अन्धे की अन्धी सन्तान''परन्तु इन शब्दों को दुर्योधन ने ह्मदय में रख लिया और क्रोध के वश होकर प्रतिज्ञा कर ली कि मैने इन शब्दों का प्रतिकार लेना है और इसी कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ जिसमें करोड़ों व्यक्तियों के प्राण चले गये। यदि दुर्योधन के ह्मदय में नाम का निवास होता तो उस व्यंग्य को भूल जाता और उसे ह्मदय में स्थान न देता और न ही इतना रक्तपात होता। इसीलिये सत्पुरुष सदैव यही उपदेश करते आये हैं कि सिवा मालिक के नाम के और कोई बात ह्मदय में न रखो।  सभे गलां बिसरनु इको विसरि न जाउ।।
श्री गुरुनानक देव जी फरमाते हैं कि अन्य सब बातों को भुला दो किन्तु एक मालिक का नाम कभी न भूलने पाये। नाम एक ऐसी औषधि है जिसके प्रयोग करने से मनुष्य दुःखों और कष्टों से बच जाता है। प्रभु के सुमिरण से ही दुःखों का विनाश होता है तभी तो सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
                सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ।
                कलि कलेस तन माहि मिटावउ।।   गुरुवाणी सुखमनी
अर्थात् मालिक के नाम का सुमिरण करो और सुमिर-सुमिर कर सुख की प्राप्ति कर लो और कलिकाल के कष्ट-क्लेश तन में से दूर कर दो।
     एक प्रसिद्ध लेखक लिखता है कि हस्तपतालों में जितने रोगी आते हैं, उनमें से आधे से अधिक तो चिंताओं के कारण ही बीमार पड़ते हैं और उनके मन पर भूत और भविष्य का अत्याधिक बोझ होता है। इसी कारण उन्हें नसों का रोग, रक्तचाप आदि हो जाते हैं और यही रोग घुन बनकर उनके जीवन को चट कर जाते हैं।
     एक महात्मा जी एक स्थान पर प्रतिदिन सत्संग किया करते थे। काफी संगत वहां सत्संग श्रवण करने के लिये एकत्र हो जाया करती थी। एक दिन कोई नया व्यक्ति सत्संग श्रवण करने आया और उसने महात्मा जी से प्रश्न किया कि इन सत्संगियों में से कौन सा मनुष्य सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है? महात्मा जी ने सामने बैठे हुये एक सत्संगी की ओर संकेत करके फरमाया कि यह सत्संगी सदैव आनन्द में रहता है। उसने पुनः प्रश्न किया को कौन से गुण के आधार पर यह भाग्यशाली व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है? महात्मा जी ने उत्तर दियाः-
                बीती को चितवै नहिं, आगे करे न शोक।
                वर्तमान में वरत रहे, सत्संगी निर्दोष।।
     इसमें यही गुण है कि बीती को स्मरण नहीं करता और भविष्य की चिंता नहीं करता। वर्तमान को ध्यान में रखकर निरंतर भक्तिमार्ग पर आगे पग बढ़ाता हुआ यह सत्संगी सदैव सुखी और प्रसन्न जीवन व्यतीत करता है। अन्य और भी जितने सत्संगी यहां आया करते हैं अथवा इस समय बैठे हैं, सब में शनैः शनै, उन्नति हो रही है और इस उपर्लिखित बात को ध्यान में रखकर उस पर आचरण करने का सब प्रयत्न कर रहे हैं। जितना जितना इनका आचरण है, उतना-उतना इनको सुख भी प्राप्त है। दुःख तो उनकी दशा पर है जो वर्तमान को भुला कर भूत एवं भविष्य की चिंताओं में खोये रहते हैं, जैसे कथन हैः-
                किनी माज़ी मन में किनी मुस्तकबाल।
                हैफ़ तिनां दे हाल पर जिन भुलाया हाल।।
प्रश्न करने वाले ने हाथ जोड़ कर विनय की-महाराज! एक प्रार्थना मेरी भी सुन लीजिये कि मुझे ईष्र्या का रोग अत्यन्त व्याकुल करता है किसी को अपने से अच्छा खाता-पीता अथवा प्रसन्न जीवन व्यतीत करता देखूं तो मेरे मन में बड़ी जलन उत्पन्न होती है। मुझे भी कोई ऐसा हितकर उपदेश देने की कृपा करें जिससे मेरा जीवन सुधर जाये।
     महात्मा जी ने फरमाया-भैया! ये वस्तुयें तो प्रत्येक को अपने-अपने प्रारब्ध के अनुसार ही मिलती हैं। सत्य पूछो तो इन वस्तुओं में रखा ही क्या है? सत्पुरुषों ने सत्य ही फरमाया हैः-
                जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत।
                कहि नानक थिरु न रहै जिउ बालू की भीत।।
आत्मिक उन्नति का सम्बन्ध इन वस्तुओं से कदापि नहीं है। प्रारब्ध अनुसार जैसी भी प्राप्त हो उसी में ही प्रसन्न रहना चाहिये। किसी ने क्या ही सुन्दर बात कितने साधारण शब्दों में कही हैः-
                किसी की किस्मत में हैं लड्डू पेड़े खाने को।
                तेरी किस्मत में गर छोले खुशी से तू चबाता जा।।
                हैं किस्मत में किसी की मोटर गाड़ियां चढ़ने को।
                तुम्हारी किस्मत में पैदल खुशी से पांव बढ़ाता जा।।
                चला चल चला चल का चक्र चल रहा दिन रात।
                चलते को तू चलाता जा गुज़रते को भूलाता जा।।
इस उपदेश को सुन कर उस नये सत्संगी भक्त ने महात्मा जी को बहुत धन्यवाद दिया। अपने जीवन को इस उपदेश के सांचे में ढालने से उसने भी कुछ ही दिनों में सच्चा सुख प्राप्त कर लिया। सचमुच ही उसका जीवन संवरने और सुधरने लगा।
     सन्तों का उपदेश है कि ""तुम्हारा यह कर्तव्य नहीं है कि कल की चिंता में आज की शक्ति को भी व्यय कर दो। कल भी जब आज का रुप धारण कर लेगा। तब उसका सत्कार करना।'' सत्पुरुषों के एक-एक वचन में लोक-परलोक का सम्मान और सच्चा सुख समाया हुआ है। जो भी उनके श्री वचनों पर आचरण करता है, वही सच्चे सुख को प्राप्त करता है। इसमें किसी देश अथवा जाति का कोई प्रश्न नहीं है; भारतीय हो अथवा विदेशी, हिन्दू हो अथवा मुसलमान, अंग्रेज़ हो अथवा पारसी, इससे प्रत्येक को एक समान लाभ पहुंचता है। इसलिये हम भी यदि उपर्लिखित श्री वचन के मार्गदर्शन में उस पर आचरण करते हुये अपने जीवन की यात्रा तय करेंगे तो निश्चय ही हम यह जीवन-यात्रा भी आनन्दपूर्वक तय करेंगे और अपना परलोक भी संवार लेंगे। ऐसा ही वरदान श्री सद्गुरुदेव जी ने अपने श्री पवित्र वचन में फरमा दिया है।