Sunday, August 21, 2016

रक्षा बन्धन


रक्षा बन्धन का पुनीत पर्व कब से प्रारम्भ हुआ कुछ कहना कठिन है। मगर यह स्र्वमान्य सत्य है कि उसकी मूल भावना हमारे यहाँअत्यन्त प्राचीनकाल से चली आ रही है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के वामन अवतार ने भी राजा बलि के रक्षासूत्र बाँधा था और उसके उपरान्त ही उन्हें पाताल जाने का आदेश दिया था।आज भी रक्षाबन्धन के समय जो मन्त्र पढ़ा जाता है उसमें इसी घटना का ज़िक्र होता है।
        ये बद्धो  बलि राजा  दानवेन्द्रो  महाबलः।
        तेन त्वामनुबन्धनामि रक्षे मा चलमाचलः।।
अर्थात यह वही रक्षा सूत्र है जिससे महाबलवान राक्षसों के राजा बलि बाँधे गये। रक्षा सूत्र तुम चल विचल मत हो प्रतिष्ठित रहो। रक्षा सूत्र का अर्थ है रक्षा की व्यवस्था। जिस व्यक्ति के रक्षा सूत्र बाँधा जाता है उसकी रक्षा की भावना ही रक्षा सूत्र में निहित है। रक्षासूत्र के बारे में महाभारत में एक कथा का उल्लेख मिलता है। इस कथा केअनुसार एक समय देवताओंऔर राक्षसों में भयानक युद्ध हुआ जो लम्बे समय तक चला इस युद्ध में राक्षस विजयी हो रहे थे और देवता पराजित। इस पर इन्द्राणी भयभीत होकर अत्यन्त दयनीय दशा में देवताओं के गुरु बृहस्पति जी के पास गर्इं और उनसे इस समस्या का समाधान पूछा। गुरु बृहस्पति जी ने उपाय बतलाया कि श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को इन्द्राणी इन्द्र को तिलक लगाये और उसकी दाहिनी भुजा पर वेदज्ञ ऋषियों सेअभिमन्त्रित रक्षा सूत्र बाँध दे ऐसा करने पर देवताओं की विजय काआश्वासन दिया। इन्द्राणी ने ऐसा किया भी। इससे इन्द्र को असाधारण शक्ति प्राप्त हुई। युद्ध का पासा पलटने लगा और देवताओं की विजय हुई। यह कथा भगवान श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को उस समय सुनाई थी जब पाण्डव संकट ग्रस्त थे। धर्मराज युधिष्ठिर ने यह साधन अपनाया भी और सफलता भी प्राप्त की।
     रक्षा बन्धन का पुनीत पर्व श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को मनाया जाता है।
यह रक्षा बन्धन राजा को पुरोहित द्वारा,यजमान के ब्राहृाण द्वारा,पति के पत्नि द्वारा,भाई के बहन द्वारा तथा सतगुरु के शिष्य द्वारा दाहिनी कलाई पर बाँधा जाता है। रक्षाबन्धन में तीन भावनाएँ काम करती हैं। प्रथम जिस व्यक्ति के रक्षा बन्धन किया जाता है उसकी कल्याण कामना,दूसरे रक्षाबन्धन करने वाले की उसके प्रति स्नेह भावना और तीसरे रक्षाबन्धन करने वाले या भेजने वाले की सहायता। इस प्रकार रक्षाबन्धन वास्तव में स्नेह,अपनत्व, शान्तिऔर रक्षा का बन्धन है इसमें सबके सुख और कल्याण की भावना है।
    साँस्कृतिक परम्पराओं में समयानुसार परिवर्तन आना सहज स्वाभाविक है। रक्षा बन्धन के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। मुगल शासन काल में अनेक महिलाओं ने आक्रमण कारियों से बचने के लिये बहादुर व्यक्तियों को रक्षा सूत्र भेजेऔर उन व्यक्तियों ने बिना किसी धर्म जाति का भेद किये उन महिलाओंकी रक्षा की। कर्णवती चितौड़ की महारानी थी गुजरात के बादशाह बहादुरशाह ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया। उसकी विशाल सेना से टक्कर लेना चितौड़ के लिये सम्भव नहीं था। महारानी कर्णवती ने अपनी सहायता के लिये मुगल बादशाह हिमायूं के पास राखी भेजी। हिमायुं ने राखी का पूरा पूरा सम्मान किया। महारानी की सहायता के लिये तत्काल चितौड़ पहुँच गया। हिमायुं के बाद अन्य मुगल बादशाह भी रक्षा के बन्धन को स्वीकारते रहे। विश्वविजय का स्वपन देखने वाला सिकन्दर बादशाह जब पोरस से हार रहा था ऐसी परिस्थिती में युनान की एक महिला ने राजा पोरस के पास इस विचार से राखी भेजी कि वह उसे बहन माने तथा हर हालत में सिकन्दर के प्राणों की रक्षा करे। राखी की लाज बचाने के लिये अनेक बार अवसर मिलने पर भी पोरस ने सिकन्दर के प्राण नहीं लिये।
      आजकल प्रायः रक्षा बन्धन का पर्व भाई बहनों के ही त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। बहने अपने भाईयों के उज्जवल भविष्य के लिये मंगल कामनाएं करती हैं और किसी भी संकट के समय अपनी सुरक्षा का उनसे आश्वासन पाती हैं। रक्षाबन्धन का पर्व केवल भाई बहन के पवित्र स्नेह के बन्धन का पर्व ही सम्पूर्ण मानव जाति के स्नेह के बन्धन का त्यौहार है।
     रक्षा बन्धन का पर्व केवल भाई बहन के पवित्र स्नेह के रूप में कब से प्रारम्भ हुआ सम्भवतः महाभारत में द्रोपदी चीरहरण के पश्चात ही भाई बहन के पर्व में परिवर्तित हो गया। पाण्डवों ने जब राजसूय यज्ञ काआयोजन किया था उस यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण की अग्रिम पूजा के लिये वहाँ उपस्थित सभी ऋषियों,महर्षियों,राजा महाराजाओं ने स्वीकार किया कि अग्रिम पूजा श्री कृष्ण जी की की जाए। लेकिन चन्देरी के राजा शिशुपाल को यह स्वीकार्य न हुआ। शिशुपाल ने आपत्ति की और भरा सभा में श्री कृष्ण जी को कई अपशब्द कह डाले। अन्य राजाओं के मना करने पर भी वह श्री कृष्ण जी की शान में अत्यन्त अपमान सूचक शब्द कहता रहा। श्री कृष्ण जी बड़ी देर तक मौन भाव से उसके अनुचित व्यवहार को सहन करते रहे परन्तु जब शिशुपाल का घृणित व्यवहार सीमा पार कर गया तो भगवान श्री कृष्ण जी ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का शीश धड़ से अलग कर दिया। सुदर्शन चक्र से भगवान की अँगुली में खरोंच आ गई जिसके फलस्वरूप उनकी अँगुली में रक्त बहने लगा। महारानी द्रोपदी ने जब देखा तो उसने अपनी कीमती साड़ी फाड़कर एक टुकड़ा जलाकर उसकी राख अँगुली पर लगा दी और दूसरा टुकड़ा फाड़कर अँगुली पर पट्टी बाँध दी। द्रोपदी की इस प्रेमाभक्ति पूर्वक कुर्बानी से आश्चर्य में पड़कर श्री कृष्ण जी ने पूछा, द्रोपदी यह तूने क्या किया? साधारण से जख्म के लिये इतनी कीमती साड़ी को व्यर्थ में ही फाड़ दिया। जब कि पट्टी के लिये साधारण कपड़ा ही काफी था। इस पर द्रोपदी ने उत्तर दिया कि--।
        लहू  इस  हाथ  से  टपके  तो  चूल्हे में गई साड़ी।
        फक्त  इक  बूँद  पर  करूं  लाखों कुर्बां नई साड़ी।।
        अगर फाहे  को  हो  दरकार  प्यारे खाल गर्दन की।
        तो हाज़िर है ये खोलिये किस्मत फिलहाल गर्दन की।।
हे प्रभु एक बूंद पर एक साड़ी तो क्या लाखों नई साड़ियाँ भी कुर्बान हैं। फाहे के लिये अगर गर्दन की खाल की ज़रूरत है तो ये मेरा सौभाग्य है वह गर्दन भी हाज़िर हैं। द्रोपदी की अनुपम श्रद्धा,भक्ति,प्रेम,त्याग बलिदान से प्रसन्न हो कर श्री कृष्ण जी ने कहा।
      भाव सच्चा काम  मरहम से भी ज्यादा कर गया।
      जख्म ही क्या दिल  मेंरा तेरे वचन से भर गया।।
      है बस मेरी नज़र  श्रद्धा प्रेम  पर और मान  पर।
      कम है इस धज्जी से जो मैं थान चुन दूँ थान पर।।
      रीझ जाता  है फक्त दिल  प्रेम  के  इक पान पर।
      भाव  बिन  थूकूँ  नहीं  गाड़ी  भरे  सामान पर।।
द्रोपदी! मैं तेरे इस अनुपम प्रेमभक्ति,श्रद्धा,त्याग और बलिदान पर अति प्रसन्न हूँ। तेरे त्याग,बलिदान और तेरा प्रेम देखकर मेरा घाव तो क्या मेरा दिल भी तेरे वचन से भर गया है। तूने जो ये पट्टी बाँधकर मुझेअपने प्रेम के बन्धन में बाँध दिया है इसके बदले में अगर मैं साड़ियों के अम्बार भी लगा दूँ,थान पर थान चुन दूँ तो भी तेरे इस प्रेम के बन्धन की बराबरी नहीं कर सकते। तेरी इस पट्टी के एकएक तार का ऋणि हूँ। द्रोपदी ने भगवान की अँगुली पर पट्टी बाँध कर भगवान को अपने प्रेम के बन्धन में बाँध दिया। श्री कृष्ण ने द्रौपदी के इस अनुपम बलिदान का बदला समय आने पर चुका देने का वचन दिया जिसे उन्होने अवसर आने पर निभाया भी। श्रद्धा भक्ति पूर्वक श्री कृष्ण को समर्पण किया हुआ वही साड़ी का टुकड़ा दुर्योधन की राज्य सभा में साड़ियों के अम्बार में बदल गया और उसने द्रोपदी की लाज की रक्षा की। द्रौपदी ने जो पट्टी बाँधी ये प्रेम का बन्धन था। द्रोपदी भगवान श्री कृष्ण जी को अपना भाई मानती थी। इस प्रेम के बदले इसमें भगवान के द्वारा(भाई के द्वारा बहन की सुरक्षा वचन था)। यह एक एतिहासिक और धार्मिक घटना होने के  कारण यह त्यौहार भाई बहन के पवित्र स्नेह के रूप में मनाया जाने लगा। ये त्यौहार भाई बहन के प्रेम का ही नहीं,भगवान और भक्त के,सतगुरु और शिष्य के स्नेह बन्धन का भी त्यौहार है शिष्य अपने सतगुरु के कर कमलों में राखी बाँधता है और यही कामना करता है कि मेरे सीस पर मेरे इष्टदेव का वरदहस्त जन्मों जन्मों तक कायम रहे। श्री सतगुरु भी शिष्य को केवल आश्वासन ही नहीं देते बल्कि शिष्य की हर प्रकार सेआधिदैहिक,आधिदैविक औरआध्यात्मिक रक्षा करने की ज़िम्मेवारी अपने ऊपर ले लेते हैं।और उसे निभाते भी हैं। इतिहास साक्षी है कि जब जब भक्तों पर भीर पड़ी है तब तब भगवान ने उनकी रक्षा की वे अपना विरद निभाते आये हैं निभा रहे हैं और निभाते रहेंगे।।
    आप पाप त्रय ताप गये जो गुरु शरणी आये।
जो भी उनकी शरण में आया और उनसे अपने स्नेह का बन्धन बाँधा है उसके तीनो ताप खत्म हो जाते हैं और शिष्य सच्चे सुख और शाश्वत आनन्द को प्राप्त करके अपने जीवन को सफल करता है।
जिन सौभाग्यशाली गुरुमुखों ने अपनी प्रीत का बन्धन श्री सतगुरु के चरण कमलों से बाँधा है वो सब तरफ से सुरक्षित हो जाते हैं सतगुरु से किया हुआ प्रीत का बन्धन ही अमर बन्धन है।

No comments:

Post a Comment