या दुनियां में आइके, छाँड़ि देइ तू एेंठ।
लेना होइ सो लेइ ले, उठी जात हैं पैंठ।।
सन्तों के वचन हैं कि ""इस संसार में आकर ऐ मनुष्य! तू मिथ्या अभिमान को छोड़ दे। जो कुछ तुझे लेना हो उसे ले ले। जगत् की हाट तो बन्द हो रही है।''
सन्त सत्पुरुष समझाते हैं कि ऐ मनुष्य! तू इस संसार में अपने कर्मों के फल को भोगने के लिये आ तो गया है परन्तु तुझे इस नश्वर जगत् में बने रहना शोभा नहीं देता। तू मनुष्य है-सम्पूर्ण भोग योनियों में तेरा दर्ज़ा सबसे श्रेष्ठ है-तू अपने सर्वश्रेष्ठ होने के गौैरव को भूल नहीं। ऐसा प्रयत्न कर कि जिससे इस कर्म जंजाल से तेरा छुटकारा शीघ्र हो जाय। तू अपनी शक्ति की पहचान कर-अपने स्वरुप का ज्ञान प्राप्त कर। अपनी इस मानुष-देह की अद्भुत शक्तियों से वह काम ले जिससे तेरे समस्त कर्मबन्धन कट जायें। जन्म और मरण का भय तुझे न रहे। संसार में तेरा आगमन स्वतन्त्रता पूर्वक जीवन यापन करने के लिये है। चौदह लोकों के भोगैश्वर्य तेरे जीवन के ध्येय को पंकिल न कर दें। तेरा लक्ष्य अमर पद की प्राप्ति है-तुझे आत्मा के देश में लौट जाना है। ये इन्द्रियां, शरीर, मन, बुद्धि और चित्त सब के सब अचेतन और असत् हैं। इन की रचना विधाता ने पांच तत्त्वों और तीनों गुणों से की है परन्तु तुझे ब्राहृा ने बनाया ही नहीं-न वह बनाने की सामथ्र्य रखता है। तू तो स्वयम्भू है-अनादि काल से स्वयमेव है और अनन्त काल तक तेरी सत्ता बनी रहेगी। तू तो वह शक्ति है कि जिसके संकल्प से ही यह समस्त प्रपञ्च अवस्थित है। तेरी सत्ता को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता। देवी देवता भी तेरे इशारे को समझने में असमर्थ हैं। चौदह भुवनों का तू अधिपति है। जन्म और मृत्यु तो तेरे दोनों हाथों के खिलौने हैं। सृष्टि और प्रलय कर देना तेरे बायें हाथ का खेल है। इतनी अलौकिक एवं अनन्त शक्तियों का स्वामी होकर भी तू अविद्या के वश हो गया है। मानव जन्म की श्रेष्ठता इसी बात में है कि मनुष्य अपने सामने कोई न कोई ऊँचा लक्ष्य रखे। जीवन को बिना किसी उद्देश्य के बिता देना कोई बुद्धिमत्ता नहीं। जिस व्यक्ति के जीवन का कोई ध्येय ही नहीं है उसकी सम्पूर्ण शक्तियां शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक निर्रथक चली जाती हैं। समय ने तो प्रतीक्षा करनी नहीं-श्वास और प्रश्वासों की चलती हुई धारा ने रुकना नहीं। सूर्य-चाँद-तारे-दिशाएं-धरती और आकाश में सब केवल साक्षी हैं। इन्होने तुझे कभी नहीं समझना कि तेरा कत्र्तव्य अथवा अकत्र्तव्य क्या है? ऐ भाग्यशाली मनुष्य! तनिक सोच तो सही! कहाँ तू परमचेतन और सनातन पुरुष परमेश्वर का अंश-तू उसी के सदृश ""चेतन अमल सहज सुखराशि' है और कहाँ यह संसार अचेतन मलिन और स्वभाव से-दुःखों का घर! तेरे कत्र्तव्य कर्म तो ये हैंः-
जो तो को काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय।
""ऐ मनुष्य! यदि तेरे लिये कोई काँटे बो देता है तो तू उसके लिये फूल बो दे। ये फूल तेरे लिये तो फूल का काम देंगे ही और उसको ये कांटे के समान चुभने लगेंगे।''
भाव यह कि ऐ मानव! तू जगत् में सर्वोत्तम जीव है-तुझे संसार के स्वभाव को नहीं ग्रहण करना जगत की ओर से यदि कोई कष्ट तुझ पर आता है तो तू भी उसे दुःख और कष्ट लौटाना न सीख वह दुःख देता है तू उसे सुख दे। तेरा दिया हुआ सुख उसके अन्तःकरण के अन्दर पश्चात्ताप को जगा देगा उसका अन्तर्मानस अपने आप ही उसे कचोटेगा और वह अपनी करनी पर स्वयं अनुताप करेगा।
सन्त तुकाराम जी महाराष्ट्र के सन्तों में से एक उच्च कोटि के सन्त माने जाते हैं। वे प्रारब्धवश उच्च वंश के न थे। छोटे कुल में उत्पन्न होने के कारण इनसे ब्रााहृण कुलोत्पन्न कई पण्डित ईष्र्या किया करते थे। इनकी सच्चाई गहरी थी ह्मदय में उनके अपने इष्टदेव श्री पाण्डुरंग जी का असीम प्रेम लहराया करता था। अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल एवं सरल था। प्रभु-भक्ति के रस में आठों पहर मग्न रहते थे। गुरु-कृपा से इनकी वाणी में इतनी मधुरता थी कि लोग इनके प्रवचन सुनने के लिये बड़े लालायित रहते थे। भगवद् अनुकम्पा से इनकी रसना से भक्ति भरे "अभंग'अपने आप ही फूटा करते थे। सैंकड़ों ही अभंग इन्होंने रच डाले थे जिन में भक्ति-ज्ञान-वैराग्य तथा कत्र्तव्य-भावना भरी होती थी।
उधर पंडित रामेश्वर भट्ट जी को अपनी कुलीनता का बड़ा अभिमान था। जब उन्होने सुना कि तुकाराम शूद्र जाति का होकर भगवान की कथा करता है-कितने ही उच्च कुल के लोग भी उसके सत्संगों में आते जाते हैं। उसकी बड़ी प्रसिद्धि होती जाती है और किन्हीं को नाम-मन्त्र की दीक्षा भी दे देता है वह अपने चरणों को पुजवाता है। यह सब जानकर रामेश्वर पंडित तो आग बबूला हो गये। उन्होने निश्चय कर लिया कि तुकाराम को तो पाण्डुरंग जी के मन्दिर में जाने से भी रोक देना है और पण्ढरपुर नगर से भी निकलवाना है। उन्होने ऐसा ही किया। भट्ट जी की उच्चाधिकारियों तक अच्छी पहुँच थी उनसे मेल जोल करके उन्होने तुकाराम जी का देव-दर्शन करना बन्द करा दिया और उनके बड़े परिश्रम से लिखे हुए अभंगों की पुस्तक को भी इन्द्रायणी नदी में प्रवाहित कर दिया। परन्तु तुकोबा सन्त चुप हैं-शान्त हैं उन्हें अपने इष्टदेव श्री पाण्डुरंग जी पर अनन्य विश्वास और श्रद्धा थी वे घर में बैठकर मन ही मन में अपने प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि प्रभो! आप सब कुछ कर लीजिये किन्तु अपने मन्दिर प्रवेश से तो वञ्चित न कीजिये। मुझ से कोई भी अपराध हुआ हो तो क्षमा कर दीजिये।
भक्त की गुहार प्रभु देव ने सुनी-तुकोबा जी की शिष्य मण्डली को इस बात का बड़ा रोष था कि हमारे गुरुदेव की वह अभंगों की विशाल पुस्तक जिसमें अलौकिक जीवनोपयोगी अभंग शोभा पा रहे हैं आज नदी में बहा दी गई है और उन्होने जाकर देखा कि उसका एक एक पन्ना अलग-अलग नदी की लहरों में तैर रहा है। यह सब काण्ड देखकर वे अश्रुओं के घूँट पीते रहे। उधर क्षमाशील उदार ह्मदय, निष्कपट और सरलचित्त तुकाराम जी ब्रााहृण के दर्शन करने के लिये रामेश्वर भट्ट जी के द्वार पर पहुँचे और उनके चरणों में मस्तक रख कर बैठ गये।
भट्ट जी-कहो तुकाराम! कैसे आये?
तुका-मुझे क्षमा करें, यह जो कुछ भी आप देख रहे हैं इसमें मेरा अपना कोई भी हाथ नहीं। मेरे भगवान पाण्डुरंग देव जी की अपनी कृपा हो रही है। मेरे अन्तस्तल में लेशमात्र भी यश प्राप्त करने की इच्छा नहीं। मेरा ग्रन्थ आपने नदी के अगाध जल में फिंकवा दिया है। मुझे इसकी भी चिन्ता नहीं किन्तु श्री पाण्डुरंग जी के पूजा मन्दिर में मुझे जाने की आज्ञा हो जाय तो आपका अत्यन्त अनुग्रह होगा।
रामेश्वर जी ने श्री मन्दिर दर्शन की तो आज्ञा प्रदान कर दी शेष रही इन्द्रयाणी के अथाह जल में अभंग ग्रन्थ के डलवा देने की बात इस पर वे चुप हो गये भक्त पुरुष क्या करे। उस समय वह असहाय है। परन्तु कृपा के सागर भगवान तो तुकाराम के परम सहायक हैं। श्री पाण्डुरंग जी क्या लीला करते हैं कि इन्द्रयाणी के जल में चार दिनों से ग्रन्थ की पाण्डुलिपि में लिखा हुआ एक एक पन्ना तैर रहा है परन्तु उसकी लिपि वैसी की वैसी अक्षुण्ण है। सूखे सूखे पन्ने दूर दूर तक बिखरे हुये थे उनकी थोड़ी सी भी क्षति नहीं हुई थी। शिष्य मण्डली से रहा नहीं गया। वे प्रेमी इन्द्रायणी पर गये और पन्नों को इकट्ठा करने लगे। इधर रामेश्वर भट्ट जी को भी अपने आप ही उस अपनी क्रूरता पर बड़ा अनुताप हुआ। तुकाराम जी की इतनी साधुता और विनम्रता का उन पर और भी गहरा प्रभाव पड़ा। वे मन ही मन उनकी विशुद्ध भक्ति भावना की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे और स्वयं उस ग्रन्थ के पन्नों को बचाने के लिये इन्द्रायणी नदी में उतर पड़े वहाँ जब उन्होंने यह चमत्कार देखा कि पुस्तक के पन्ने वैसे के वैसे ही सूखे हैं उनपर तनिक भी आँच नहीं आई-वे दंग रह गये और मान गये कि तुकाराम कोई अलौकिक पुरुष हैं। भगवान के परम भक्त हैं। और तुकाराम की भक्ति का भट्ट पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि अपने ब्रााहृणत्व के अभिमान को एक ताक पर रखकर उन्होने उनसे नाम मन्त्र ले लिया। यह है सच्ची मानवता। मनुष्य को इस प्रकार की संकीर्णता को छोड़कर विशाल ह्मदय बनना चाहिये। विरोधी के ह्मदय को भी जीत लेना चाहिये ऐ मनुष्य! तेरी सुन्दरता तो यह हैः-जो तो को काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
""मनुष्य का धर्म तो यह है कि वह संसार को कभी ठगने का प्रयत्न न करे। स्वयं घाटा उठा ले वह अच्छा है। दूसरे के ह्मदय को ठेस लगाना सज्जन को उचित नहीं।'' ऐ मानव तेरा कर्तव्य क्या है-""ज्ञान रुपी हाथी पर सवार हो जा-सरल स्वभाव रुपी दुलीचे को बैठने के लिये नीचे बिछा ले और आनन्द मग्न होकर चलता जा-संसार तो बुरा-भला कहता ही रहता है। उसकी परवाह दृढ़ प्रतिज्ञ पुरुष नहीं किया करते।''
ऐ मनुष्य! ये हैं तेरे अनुरुप गुण। निर्मल आत्माएं ऐसे ही सद्गुणों से भरपूर रहा करती हैं। दया-क्षमा-शील-धैर्य-सत्य-उदारता-अहिंसा आदि सुन्दर गुण हैं जो कर्मयोनि में उत्पन्न मनुष्य के चरित्र की अनुपम शोभा हैं। इन गुणों को जीवन काल में धारण करना है।
किसी भी वस्तु को प्राप्त करना हो तो उसके लिये नम्रता और सरलता को अपनाना ही पड़ता है। यदि कोई यह चाहे कि मैं अपने ज्ञान-कुल-जाति-धन-रुप और बल का अभिमान भी न छोड़ूँ और दूसरों से कुछ प्राप्त कर लूँ यह सर्वथा असम्भव है।
ज्ञानी से कहिये कहा, कहत कबीर लजाय।
अन्धे आगे नाचते, कला अकारथ जाय।।
परमसन्त श्री कबीर साहिब जी कथन करते हैं कि हम इन ज्ञानियों से जो केवल वेदादि शास्त्रों के शब्दों और अर्थों को ही भली भाँति जानते हैं-जिनका जीवन उन शास्त्रों के वचनों के अनुसार ढला नहीं है-क्या कहें? उनसे हमारा अनुभव सिद्ध बातें करना ऐसे ही निर्रथक होगा जैसे कोई नट बड़ी सुन्दरता से नाच करता हो परन्तु जिसकी प्रसन्नता के लिये वह जो कुछ कर रहा है वह तो नेत्रहीन है। वह क्या जाने कि नृत्य-कला कैसी होती है? श्री कबीर साहिब जी तो काशी के वेदपाठी पंडितों को अनुभव शून्य देखकर मन ही मन खीझ कर कहते थेः-
मेरा तेरा मनुआ कैसे इक होइ रे।
मैं कहता हूं आंखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे। मैं कहता सुरझावन हारी, तूँ राख्यों अरुझाइ रे। मैं कहता हूँ जागत रहियों, तूँ रहता है सोई रे।। मैं कहता निर्मोही रहियो, तूँ जाता है मोहि रे। सतगुरु धारा निरमल वाहै, वा में काया धोइ रे।कहत कबीर सुनो भाइ साधो, तब ही वैसा होइ रे।।
ऐ वेदशास्त्रों के स्वाध्याय करने वालो! सुनो तो! तुम्हारा और हमारा मन एक कैसे हो सकता है? मैं जो कुछ भी आपसे कहता हूँ वह सब मेरे अपने अनुभव के रंग में रंगा होता है और तुम केवल पुस्तकीय ज्ञान की ही व्याख्या कर देते हो। मैं जो कुछ भी कहूँगा उसका सच्चे भाव से श्रवण करने से तुम्हारा कोई भी संशय शेष न रहेगा किन्तु शास्त्रों की पंक्तियों में जो सारतत्त्व है उस तक तुम स्वयं नहीं पहुँचे हो तो औरों को क्या समझाओगे? मैं कहता हूँ कि माया और ब्राहृ के भेद को जानने के लिये योग साधना करो जिससे तुम्हारी अन्तरदृष्टि खुले और तुम केवल शब्दों के जाल में लोगों को फँसा देते हो क्योंकि उन शब्दो के अन्तर्भाव से स्वयं शून्य हो-मैं तुम्हें कहता हूं जगत का मोह छोड़ दो और तुम अपने को मोह ममता के जाल में उलझा देते हो। इसलिये आवश्यक है कि जीव किसी पूर्ण गुरुदेव की शरण ले सन्त सद्गुरुदेव जी के लिये हुए निर्मल उपदेश की जब तक कमाई नहीं होगी तब तक मन निर्मल नहीं होगा। नाम-मन्त्र के जाप की युक्ति उनसे सीख कर अपने अन्तह्र्मदय में डुबकी लगाओ तभी अपने स्वरुप को जान पाओगे और तुम्हारे सब संशय निवृत्त हो जायेंगे।
सन्त जनों के वचनों में कितना तेज़ है; सहानुभूति और करुणा है वे स्वयं इतने संवेदनशील होते हैं जो जगत् के मोह जंज़ाल में उलझे हुए मनुष्यों को छुड़ाने के लिये बड़े ही आतुर रहते हैं। वे एक क्षण के लिये भी दूसरों का कष्ट देख नहीं सकते। वे ह्मदय से चाहते हैं कि सारा विश्व ही आनन्दमय हो जाय-अपने वास्तविक उद्देश्य को पहचाने, आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाय परन्तु संसार की मनोमोहिनी, अतिरमणीय एवं कमनीय माया ने इतने दृढ़ लपेटे दे रखे हैं जो सांसारिक मनुष्य हाथ-पाँव भी नहीं मार सकते। मोह-माया की मदिरा का कण्ठ तक पान किया हुआ है जो विमल प्रभु-भक्ति का श्वास तक भी भीतर प्रवेश नहीं कर पाता।
इसलिये सन्त महापुरुषों को जागरण का सन्देश देते हुए लिखना पड़ता हैः- ""या दुनियां में आइके, छांड़ि देइ तूँ एेंठ'' अर्थात् इस भूमण्डल पर पहुँच कर जगत के अनित्य एवं क्षणभंगुर पदार्थों का अभिमान न कर। जो कुछ भी तुझे प्रारब्ध वश प्राप्त हुआ है अथवा भविष्य में होगा वह सब कुछ अस्थिर है। क्षणस्थायी वस्तुओं से मन लगाना, उनका मान करना, उनकी सुरक्षा की चिन्ता में अपनी सम्पूर्ण मानवीय शक्तियों का व्यय करना सरासर नादानी है।
यह मनुष्य जो चौरासी लाख योनियों में सर्वोपरि है और आत्मज्ञान का अधिकारी है-परमात्मा के दर्शन करने की भी क्षमता जिसमें विद्यमान है और अपने ब्राहृ के स्वरुप को भी जो चीन्ह सकता है जो आत्मिक बुद्धि से भगवान का दूसरा रुप है, अविनाशी और अजर अमर है वह भी क्या मुग्ध हो जायेगा इन संसार के मिथ्या रसों पर? यह चिन्ता का विषय है। आज का मनुष्य ही नहीं अपितु सम्पूर्ण प्राणी अशान्त हैं। दुःखी और अभाव ग्रस्त हैं। अपने जीवन को बिता तो रहे हैं परन्तु उन्हें आन्तरिक उल्लास नहीं उनके वदन पर हास नहीं, उनकी बातचीत में रस नहीं, ह्मदय में सन्तोष नहीं, भाव यह कि आज का विश्व अपने आप से सन्तुष्ट नहीं है, व्याकुल है, किसी ऐसी वस्तु की खोज में है जो इसे कहीं से प्राप्त नहीं हो रही और वह वस्तु जिसका अभाव इसे खल रहा है भौतिक जगत के किसी भी भाग से उपलब्ध हो भी नहीं सकती। वह है नित्य शान्ति परम सुख और अचल आनन्द। उसकी प्राप्ति हो सकती है सन्त सतपुरुषों की संगति से। उनकी सन्निधि में निवास करने से। उनको सेवा शुश्रुसा से प्रसन्न कर लेने से। अथवा उनकी अहैतु की अनुकम्पा से। कारण-यह वस्तु अन्तर्जगत की है। आन्तरिक आनन्द के कोष की कुञ्जी उन्हीं के पास ही है, उनकी प्रसन्नता प्राप्त हो तब जाकर वह चाबी भी मिलेगी और जीव शाश्वत सुख का भागी बन जायेगा।
यह संसार तो परिपूर्ण है। इसमें माया भी गुप्त रुप से छुपी है और मायापति भी ओत प्रोत हैं। जीव की अपनी इच्छा है वह जिसे पसन्द करे। भगवान के पुनीत दर्शन करना चाहता है तो वह संसार को दर्पण बना ले इसमें परमात्मा हर एक पदार्थ के अन्दर रमे हैं। अब यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह ऐसी आँख से देखना सीखे जो पदार्थ के भीतर व्याप्त पुरुष को देख सके। चर्मचक्षु से उस विराट पुरुष के दर्शन नहीं हो सकते। उस लोचन के उघाड़ने वाले केवल सन्त सद्गुरुदेव जी हैं। सन्त सत्पुरुषों की पावन संगति से जब तक मन की मलिनता दूर न होगी तब तक मन में कभी भी श्री सद्गुरु देव जी के दर्शनों की तड़प नहीं हो सकती। उनसे जिस दिन नाम-मन्त्र मिल जायेगा, साधक सच्ची लगन और विश्वास से भजन की कमाई करेगा तो उसकी तीसरी आँख उघड़ जायेगी और वह हर एक प्राणी में अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु देव जी को देखने का प्रयत्न करने लगेगा।
संसार से परमेश्वर कहीं भिन्न नहीं हैं। उसी परमात्मा की ज्योति से सम्पूर्ण विश्व जगमगा रहा है। बात तो है प्रेम की-हर एक मनुष्य को देखना तो यह है कि उसे भगवान और संसार में से कौन अधिक प्यारा लगता है? उसे माया के प्रति आसक्ति है अथवा ईश्वर के प्रति प्रेम? मनुष्य का धर्म है कि वह यौवन काल में ही एकान्त में बैठकर यह पूर्णतया निश्चय कर ले कि मुझे परमात्मा को मुख्य रखना है या माया को? दोनों की भली प्रकार से तुलना करे और सोचे कि यदि मैं माया को प्यार करुँगा तो यह दोनों लोकों में विश्वास के योग्य नहीं है। इस लोक में भाग्यों के अनुसार यदि यह मेरे पास रहने भी लगे किन्तु परलोक में जाते हुए तो मुझे इसका साथ छोड़ना पड़ेगा यदि प्यार करता हूँ अपने भगवान श्री सन्त सद्गुरु देव जी से तो वे नित्य के साथी हैं, सर्वकला समर्थ हैं, सर्वदा ही परमसुख के दाता हैं और दोनों लोको में परम शान्ति का दान देने वाले हैं। इस लोक में वही ऐसे सच्चे मित्र हैं जो पग पग पर जीव के सहायक रहते हैं। विपत्तियों में धैर्य का दीप वे ही जलाते हैं। अभावों की पूर्ति करते हैं, सर्वदा ही अपने शरणागत को माया और काल से निर्भय, निश्चिन्त और स्वतन्त्र कर देते हैं। इस प्रकार दोनों पक्षों को अन्तरमानस की तुला पर तोल कर पहले निश्चय कर लेना चाहिये कि मुझे कौन सा मार्ग ग्रहण करना है, माया का अथवा भक्ति का? मार्ग दोनों ही सुगम नहीं हैं, तपस्या तो दोनों को पाने के लिये करनी होगी। निर्णय कर लेने के उपरान्त परम सन्तों का आदेश है कि "लेना है सो लेइ ले' ऐ जीव! तुझे जिस पथ को अपनाना है तू अपना ले। अब विलम्ब न कर। इस तथ्य पर भी तनिक ध्यान दे लें कि माया पति श्री सन्त सद्गुरुदेव जी के सुखद आँचल में रहने से तुझे माया की पृथक् चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी। जहां विश्वपति सद्गुरु होंगे वहीं माया उनके चरणों में बैठी उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रही होगी और यदि तुम्हारी अन्तरात्मा यह कहती है कि मानव चोले में माया से यदि मीठी मीठी अठखेलियां न कीं तो किया क्या? उस दशा में भी कोई विश्वास नहीं कि माया भी आती है या नहीं वह तो हर एक के अपने प्रारब्ध पर निर्भर है।आकर भी वह रहती भी है अथवा नहीं, माया तो माया रही अपनी काया का भी तो कोई विश्वास नहीं। इसलिये कथन करते हैंः- लेना है सो लोइ ले, उठी जात हैं पैंठ।। विश्व का प्रपञ्च तो बन्द हुआ जा रहा है, न संसार नित्य है और न उसके पदार्थ नित्य तो केवल आत्मा ही है, शरीर भी नहीं, अब अनित्य वस्तु भी मिलती हो और नित्य भी, तो नित्य का त्याग करके अनित्य पदार्थ को कौन ग्रहण करेगा? किसी वस्तु को प्राप्त करने से पहले उसके दाम भी चुकाने होते हैं। अपने में सामथ्र्य भी जगानी होती है। नित्य के सच्चे मित्र हैं श्री सन्त सद्गुरुदेव जी जो सगुण भी हैं और निर्गुण भी। उनको प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प करना सर्वोत्तम कार्य है। इसके लिये अपने मन और मस्तिष्क को जिनमें माया पदार्थों को पाने के संस्कार भरे हुए हैं उनकी चरण शरण में अर्पित करना होगा। तभी जाकर उस दिव्यातिदिव्य आत्मा का साक्षात्कार श्री सद्गुरुदेव जी की कृपादृष्टि से हो जायेगा। मुक्ति पाने का यही मार्ग है।
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