Thursday, August 18, 2016

जितनी हितचिन्ता-उतनी शान्ति


""जो सेवक जितनी हित-चिन्ता से गुरु दरबार की सेवा करेगा उतनी ही उसे आत्मा की शुद्धि प्राप्त होगी और उसी ही अनुपात के अनुसार उसे शक्ति व शान्ति मिलेगी।''
     सहरुाों ही सेवक श्री गुरुदरबार की सेवा कर रहे हैं किन्तु सबको एक समान फल प्राप्त नहीं होता। उसमें कारण केवल यही है कि हर एक की लगन और भावना भिन्न भिन्न है। कोई तो पूरे का पूरा तन मन और धन श्री गुरुदरबार के ऊपर निष्काम भाव से न्यौछावर कर देता है वह तो पूर्ण रुप से शान्ति के फल को पा लेता है। समस्त प्राकृतिक शक्तियां उसकी सहायक हो जाती हैं। कोई तन से तो सेवा करता है किन्तु मन को अर्पित नहीं करता। भाव यह कि निष्काम भाव से वह सेवा नहीं करता इसलिये उसका अन्तरमानस शान्त नहीं होता। वह कभी सन्तुष्ट और कभी असन्तुष्ट रहता है। उसके अन्तःकरण में सेवा के फल पाने की आशा बनी रहती है यदि उसकी मनोअभिलाषा पूरी हो गई तो सन्तुष्ट हो गया और यदि वह कामना अपूर्ण रह गई तो वह रुष्ट हो गया। धन की सेवा भी इसी तरह कोई तो नम्रता और श्रद्धा के साथ करके उन्नति कर जाता है और कोई मन में अभिमान करके अपने को कुछ समझने लगता है। फल यह होता है कि जब वह समझता है कि मेरे गुणों की प्रशंसा नहीं हुई तो सेवा जैसे उत्तम गुण से भी हाथ धो बैठता है। अर्थात् भविष्य में भी वह सेवा नहीं करता।
     वैसे तो तन चाहे धन दोनों ही नश्वर पदार्थ हैं। यदि ये दोनों सद्गुरु के श्री दरबारके निमित्त काम में आ गये तो सार्थक हो गये यदि नहीं लगे तो संसार की ओर लग कर विनष्ट हो जाएंगे हाँ-उसका परिणाम अवश्य दुःखदायी होगा। सद्गुरु पूर्ण की अथवा उनके दरबार की सेवा को छोड़कर जिस ओर भी तन-मन-धन लगेगा उसमें सुरति का लगाव अवश्य हो जायेगा-ऐसे झूठे मोह का फल श्री गुरु अमरदास जी इस प्रकार चित्रित करते हैंः-
                इह कुटम्ब सभ जीअ के बन्धन भाई-भरम भुलासैं सारा।
                बिन  गुरु  बन्धन  टूटहि  नाहीं गुरुमुख मोख दुआरा।।
कथन करते हैं कि यह जितना कुटुम्ब-परिवार है इनका मोह मनुष्य की आत्मा को बन्धन में बाँध देता है। परन्तु सारा संसार उन्हें अपना हितकारी समझने के भ्रम में फँस गया है। यह बन्धन पूर्ण सद्गुरु की भक्ति के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं टूट सकते। जो भाग्यशाली सद्गुरु की मौज को मुख्य रखकर कुटुम्ब परिवार में जल कमल जैसे रहता है वह ही मोह-जाल से विमुक्त होकर मुक्ति पद को प्राप्त कर लेता है। नहीं तो झूठे भ्रम में भूलकर इस लोक में भी यह जीव दुःखी रहता है और अपना परलोक भी बिगाड़ लेता है। ""जहाँ आसा तहां वासा'' का अटल नियम उसे खींचकर जन्म मरण में डाल देता है।
     यह तो परिपूर्ण सद्गुरु देव की अनुकम्पा एवं उपकार है जो कि मिथ्या तन-मन-धन की सेवा स्वीकृत करके वे नित्य मुक्त पुरुष बँधी हुई सुरति को अनायास प्रमुक्त कर देते हैं। इसलिये उनकी सेवा करके भी हमें उनका कृतज्ञ रहना चाहिये काँच के बदले कञ्चन-बन्धन के बदले स्वाधीनता प्रदान करने वाले सद्गुरु ऐसी कृपा हम पर करते हैं। श्री दरबार की रचना सन्त सत्पुरुष उन संस्कारी आत्माओं को एकत्र करने के लिये ही किया करते हैं। उनका दरबार कल्पवृक्ष की न्यार्इं होता है। उनके दरबार की सेवा जिस जिस भावना से की जाती है फल भी वैसा वैसा सेवक को मिलता है। उनके दरबार की विशेषता है कि सेवक को प्रेंम-भक्ति, विश्वास, नम्रता आदि दैवी गुणों से समृद्ध कर देना।
     कई सेवक इस भेद को न जानकर श्री दरबार से अनुचित सुविधायें-जो शरीर से सम्बन्ध रखने वाली होती हैं-प्राप्त करके अतिप्रसन्न होते हैं-परन्तु यह उनकी यथार्थ में अज्ञानता है सच्ची निष्ठा नहीं। गुरु दरबार में तो इन वस्तुओं की कमी नहीं है जिनसे शारीरिक सुख मिलता है- परन्तु यहां तो प्रश् है अपनी सुरित की आसक्ति का। जिसकी सुरति काया के सुखों और सामानों व सम्बन्धियों में उलझ गई उसने अपना वास्तविक कार्य तो बिगाड़ दिया और वह शरीर तथा उसके सामान व सम्बन्धी सबके सब बिछुड़ गये। जिसने ऐसा घाटे वाला सौदा किया उसे बुद्धिमान कौन कहेगा। उसने तो सत्य का त्याग करके असत्य को ग्रहण किया खेद-सत्य का लाभ भी न लिया और असत्य हाथ से निकल गया। दोनों हाथ खाली-शून्य आया और शून्य ही चला गया। ऐसी दशा पर महापुरुषों को खेद होता है। उन्हें ऐसा स्वर्णमय अवसर भी मिला उसका पूरा लाभ भी न उठाया। फिर ऐसा संयोग कब बनेगा इसका कोई ठिकाना नहीं। गुरुवाणी का कथन हैः-भाई रे भगतिहीण काहे जग आया।
                    पूरे गुरु की सेव न कीनी विरथा जन्म गवाँया।।
तात्पर्य यह कि मानुष देह पाकर जिसने तन मन धन से पूरे सद्गुरु की सेवा नहीं की उसका इस जग में आना न आने के बराबर है।
     छठी पातशाही श्री हरगोबिन्द साहिब जी का पोता "धीरमल' गुरु दरबार की माल-सम्पत्ति संचित करके अपने को कुछ मानने लगा। उस धन सम्पदा के बूते पर गुरु महाराज से अलग होकर करतारपुर में जा बैठा। जब उसके पिता "बाबा गुरुदित्ता साहिब जी' ने देह त्याग किया तो श्री गुरुमहाराज जी ने धीरमल को कहलवा भेजा कि तुम पिण्ड दानादि कर आओ क्योंकि तुम्हारे पिता जी शरीर छोड़ गये हैं। वह माया के मद में इतना डूब गया था कि उसने दूत से कहा कि मैं इतना मतिहीन नहीं हूँ कि सारी सम्पत्ति छोड़ कर वहां चलूँ-मुझे किसी की परवा नहीं है। मेरे पास सब कुछ है और मैं अभी अभी दिल्ली के मुगल सम्राट् से मित्रता का सम्बन्ध जोड़ कर आया हूँ।
     इस पर श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी ने उसका ऐसा उत्तर सुनकर गुरु-गद्दी उसके छोटे भाई "हरिराय' जी को दे दी। अब हर एक इन दोनों भाइयों की प्रतिष्ठा का अनुमान लगा सकता है। जिनमें से एक ने तो गुरु महाराज जी की आज्ञा को सिर पर धारण करके धन-पदार्थ की ओर ध्यान तक भी न दिया और दूसरे ने धन-सम्पत्ति के सहारे को सच्चा आश्रय समझकर सच्चे सद्गुरुदेव की आज्ञा का उल्लंघन किया। परिणाम यह हुआ है कि श्री गुरु हरिराय साहिब जी तो ऋद्धियों-सिद्धियों के स्वामी बन गये और धीरमल का सामान जिस पर उसे घमण्ड था लूट लिया गया। एक का तो न रहा सामान व नामोनिशान दूसरे के शरीर से स्पर्श की हुई वस्तुएं आज तक भी श्रद्धा सत्कार के साथ पूजी जाती हैं एक तो अमर हो गया और दूसरे ने तो अपना सर्वनाश कर लिया। एक ने तो अपना संसार ही बिगाड़ लिया और दूसरे ने जहाँ अपना कल्याण किया वहां दूसरे लाखों जीवों का भी कल्याण कर दिया। इतना अन्तर है दोनों के जीवन में-यद्यपि वे दोनों ही गुरु दरबार में रहे।
     ऐसे ही श्री गुरुमहाराज ने ऊपर के वचन में कथन किया है कि "जो सेवक अपनी कुछ शक्तियां परम शक्तिशाली सद्गुरुदेव के ऊपर न्यौछावर कर देता है वह सत्य में समा जाता है और जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है यहां भी सच्ची प्रसन्नता में उसका जीवन व्यतीत होता है और आगे भी वह सुख पाता है। ऐसे लोग भाग्यशाली और सच्चे व्यापारी हैं क्योंकि वे असत् के बदले सत्य प्राप्त कर जाते हैं इसलिये गुरुमुख को इस लाभ-हानि का अन्तर समझ कर सत्य का व्यापार करना चाहिये जिससे यहां भी सम्मान के साथ उसका समय गुज़रे और परलोक में जाकर भी वह शोभा प्राप्त करे। दोनों प्रकार के मनुष्यों के मान-अपमान और लाभ-हानि के अन्तर को निम्नलिखित उदाहरण से अच्छी तरह समझ सकते हैं।
     एक कम्पनी के स्वामी ने दो मनुष्यों को धन राशि देकर कुछ सामान खरीदने के लिये विदेश में भेजा एक ने तो उन पैसों से कम्पनी का माल खरीदा और नियत समय पर लौट आया-कम्पनी वालों ने उसकी सच्चाई व परिश्रम देखकर उसके वेतन में वृद्धि कर दी और उसका दर्ज़ा भी बढ़ा दिया। दूसरा मनुष्य वहां चित्ताकर्षक दृश्यों को देखकर विलासिता में फंस गया। जो राशि सामान खरीदने के लिये कम्पनी की तरफ से मिली थी उसे खाने-पीने व शारीरिक साज-सज्जा में समाप्त कर दिया। जब खाली हाथ वह लौट आया तो कम्पनी ने उसके ऊपर केस चलाया और उसे कठोर कारावास का दण्ड मिला। निस्सन्देह उसने थोड़े दिन विलास-क्रीड़ाओं में गुज़ारे थे परन्तु शेष जीवन के दिन बड़े कष्टों में रहकर उसे बिताने पड़े- वह बड़ा पश्चात्ताप करता रहा।
     ऐसे ही विश्वपति की ओर से प्रत्येक को श्वासों की पूँजी मिली है कि तुम सत्य का व्यापार करके लौट आओगे तो तुम्हें उन्नति और साधुवाद मिलेगा-किन्तु दुःख उन लोगों की बुद्धि पर है जिन्होने श्वासों रुपी अमुल्य पूँजी को क्षणभंगुर शरीर की विलास-प्रियता में व्यर्थ में गँवा दिया। इन्होने अपना अमुल्य समय भी गँवाया और मिथ्या नातों को सत्य समझ कर उनमें सुरति जैसी अप्राप्य वस्तु को उलझा दिया। मालिक की प्रसन्नता व कृपा को प्राप्त करने का विचार तक भी न उठाया। इसके विपरीत विचारशील जीव सावधान रहते हैं-वे इस असत्य संसार में रहते हुए प्रमाद की निद्रा से बच कर श्री सद्गुरु देव के सच्चे दरबार की सेवा हितचित्त से करते हुए अपना जीवन धन्य बना लेते हैं। वे यहाँ भी आनन्द में रहे क्योंकि उन्होने सारी ज़िम्मेवारियों को मालिक को सौंप दिया था और सच्ची दरगाह में भी प्रसंसा के पात्र बने। श्री मुख वाक्य हैंः-""इकनां ते रंग चढ़ गया-इक रह गये अमन-अमान''हमें भी ध्यान रहे कि हम कहीं कोरे के कोरे न रह जावें। हमें चाहिये कि भक्ति के रंग में अपनी सुरत को रंग कर लाल-गुलाल हो जावें।

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