Sunday, August 14, 2016

यज्ञमय जीवन


     मनुष्य एक अद्भुत रचना है उस परमात्मा की। यह उस परमेश्वर का प्रतिनिधि है और इस भूलोक पर दूसरे समस्त जीवों को जीवन के आदर्श सिखाने आया है। यदि इसे ईश्वर का पुत्र कह दें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। और यदि यह अपने को "अहं ब्राहृास्मि' कहकर गर्व मानता है तो भी इसका अधिकार है ऐसा मानना और जानना। तत्त्वदर्शियों ने स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया है कि "अयमात्मा ब्राहृ' अर्थात् यह आत्मा औेर वह ब्राहृ दोनों में कोई भेद नहीं। आत्मा ही ब्राहृ है और ब्राहृ का ही दूसरा पर्याय वाचक शब्द "आत्मा है। इसी भाव को मनीषियों ने ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर इसे अपने स्वरुप को जतलाते हुए लिखा है कि ""तत्त्वमसि'' अर्थात् तू ही वही ब्राहृ है-ब्राहृ और तू दो नहीं।
     इतना गौरवशाली है यह मानव। ब्राहृ रुप होकर भी ईश्वर की इस त्रिगुणात्मिका माया की चपेट में आ जाता है। त्रिगुणात्मिका माया इसे भ्रम में डाल देती है और यह भी न जाने क्यों कर अपने स्वाभाविक ब्राहृत्व की पदवी को छोड़कर अपने को जीवात्मा कहने लगता है। सन्त सत्पुरुष युग युग से इसे जगाते चले आए हैं कि ""ऐ मनुष्य! तू वह सच्चिदानन्दघन ब्राहृ है-क्योंकि अपनी प्रभु सत्ता को भुला कर इस मिथ्या माया भरे प्रपञ्च को पहचान नहीं पा रहा। परमात्मा ने इस मनुष्य को अपनी पवित्र वेदवाणी द्वारा सृष्टि के आदि में ही बतला दिया था कि तुझे अपने जीवन को कैसे व्यतीत करना है। उन्होने कहा था किः-ॐ आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्य ज्ञेन कल्पतां श्रोत्रं यज्ञेन,
     कल्पतां  वाग्यज्ञेन  कल्पतां  मनोयज्ञेन  कल्पतामात्मा  यज्ञेन कल्पतामिति।
""तुझे अपनी आयु को यज्ञमय बनाकर बिताना है। सम्पूर्ण शरीर यज्ञ रुप हो जाए। तेरे प्राण,चक्षु, श्रोत्र, वाणी मन और बुद्धि यज्ञ भावना से ओत प्रोत हों। तेरा सारा जीवन परमार्थ और परोपकार के लिये हो।''
     यह यज्ञ भावना क्या है? मनुष्य अपने जीवन को दूसरी भोग योनियों के समान स्वार्थ से पूर्ण न बनाये। इसका रोम-रोम परोपकार में लगा हो। इसके मन में सदा ही शिव संकल्प उठा करें। यह कभी किसी दूसरे प्राणी के क्लेश और दुःख का हेतु न बने। अपने से जो बड़े हों उनके प्रति आदर सत्कार के भाव रखे-बराबर वालों से प्रेम-प्यार का व्यवहार करे और अपने से छोटों के साथ स्नेह तथा विनम्रता पूर्वक बरते। यह है यज्ञ शब्द का तात्पर्य।
      "यज्ञ' शब्द से यज् धातु है। इसका प्रयोग तीन अर्थो में होता है-1.देवपूजा। 2. संगति करण। 3. दान। देव जनों का सत्कार-अपने से बड़े, श्रेष्ठ एवं विद्वान् पुरुषों का सम्मान करना। उनके सामने विनम्र होकर रहना-उनकी आज्ञा में चलना तथा उनके सदुपदेशों पर आचरण करना यह सब कुछ "पूजा' शब्द में आ जाता है। संगति करण शब्द का भाव यह है कि अपने बराबर वालों के प्रति अच्छा बर्ताव करना-परस्पर प्रेम हो-अनुराग और प्रीति के साथ एक दूसरे से व्यवहार करें मित्रता की भावना से ही सब प्राणियों को देखें। द्वेष, विरोध, वैमनस्य, घृणा, स्वार्थ और ईष्र्या जैसे दुर्गुणों का ह्मदय में कोई स्थान न हो। हर एक से मेल-मिलाप बढ़ाने की इच्छा मन में बसी हुई हो-स्वभाव में विघटन अर्थात् दूर रहने की इच्छा, किसी के अनिष्ट -चिन्तन का विचार न उठता हो। रूठे को मना लेना, शत्रु को भी क्षमादान देकर आपस का वैर विरोध समाप्त करना-सदा प्रयत्न यह रहना कि मेरी आत्मा उसकी आत्मा का संस्पर्श कर सके। समता की भावना जगाने का प्रयास करना-यह भाव है "संगति करण' शब्द में। दान-देना-त्याग भावना को अपनाना-स्वार्थ का समूल नाश होने देना-उपकार करने की हर समय उत्कण्ठा रहनी। परहित चिन्तन करना-कभी किसी जीव के प्रति अहित करने का विचार तक भी न उठने देना-छल,कपट, वैर, ठगी, डकैती, चोरी, दोष-दृष्टि, निरर्थक आलोचना करना, इन दुर्गुणों का समावेश "दान' शब्द में नहीं होता।
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     समाज को हम तीन वर्गों में बाँट सकते हैं एक अपने से श्रेष्ठ दूसरे अपने समान के और तीसरे अपने से छोटे-यज्ञ भावना वाले पुरुष को सभी के साथ यथोचति बर्ताव करना है क्योंकि हम बुद्धिशाली और मननशील मनुष्य जन्म में आये हैं।
     हर एक मनुष्य का अपना विशेष स्थान होता है इस विराट् मानव-समाज में। जब महर्षि वाजश्रवा ऐसा यज्ञ कर रहे थे कि जिसमें उन्होंने अपना सर्वस्व ही दक्षिणा के रुप में पूजनीय ब्रााहृणों को दे देना था-उस समय उनका अपना पुत्र नचिकेता भी सामने बैठा था। वह उनका सर्वस्व दक्षिणा यज्ञ देख रहा था। सब कुछ दक्षिणा में दिये जाने पर पुत्र नचिकेता ने कहा कि "पिता जी! क्या मैं आपका नहीं हूँ?'' निस्सन्देह तू मेरा ही औरस तनय है तो फिर आप मुझे क्यों नहीं किसी को सौंप देते? मैं क्या किसी के योग्य नहीं? इस पर रोष में पिता ने कहा""जा तू यम के पास चला जा ये शब्द सुनकर वह बालक एकान्त में विचार करने लगा।''  
                बहूनामेमि  प्रथमो  ,   बहूनामेमि  मध्यमः ।
                किंचिद् समस्य कत्र्तव्यं, यन्मयाद्य करिष्यति।।
अर्थात् पिता जी ने जो मुझे यमराज को सौंप देने की बात कही है वह उचित प्रतीत नहीं होती। उन्होने आवेश वश ऐसा कह दिया है। मैं इस शिष्य मंडली में कितनों से उत्तम हूँ और किन्हीं के बराबर भी-तो यमराज का मुझ से क्या कार्य सिद्ध हो जाएगा जो मुझे पिता जी उसके पास भेज रहे हैं। यह वचन उन्होने गहराई तक विचार कर नहीं कहा-ए तातचरण।
                अनुपश्य   यथा   पूर्वे ,  प्रतिपश्य  तथापरे ।
                सस्यमिव मत्र्यःपच्यते, सस्यमिवा जायते पुनः।
     आपको अपनी कुल परम्परा के गौरव की रक्षा करनी चाहिये। जैसा आचरण आपके पिता दादा, समयानुसार करते आये हैं आप भी वैसा ही कीजिये जीवन के श्वासों का क्या विश्वास। इतने दारुण शब्द क्रोध के वश होकर आपको नहीं कहने चाहिये। कोई भी अपने आचरण को बिगाड़कर यदि कार्य करता है तो अजर-अमर नहीं हो जाता देखिये यह मनुष्य खेती की तरह ही पकता है अर्थात् यह बालक-किशोर-तरुण-प्रौढ़ और वृद्ध होकर अन्त में मर जाता है और फिर खेती की भांति ही जन्म ले लेता है। ऐसी अनित्यता में वाणी को कठोर नहीं बनाना चाहिये वही भावना यज्ञ शब्द में मिलती है। अतएव यज्ञ शब्द अपने से बड़ों-बराबर वालों और अपने से छोटों के प्रति उचित ढंग से व्यवहार करना सिखाता है। जीवन का सार प्रेम है। प्रेम पूर्ण मधुर जीवन ही मनुष्य जन्म का सौन्दर्य है। दूसरों के भले के लिये कुर्बान हो जाना यज्ञमय जीवन है। जैसे दीपक स्वयं जलकर भी दूसरों को रोशनी प्रदान करता है, महर्षि दधीचि ने देवताओं के लिये अपनी अस्थियां दान कर दीं। अतिथि यज्ञ में दक्ष राजा रन्तिदेव ने निराहार रहकर भी दूसरों की भूख मिटाई और दूसरों के दुःखों को भोग लेने का ही वरदान माँगा।
     प्रजापति ने जब सृष्टि बनाई तो सम्पूर्ण जीवों को एक-एक उपहार साथ में दे दिया वह क्या था? "यज्ञ' और मनुष्य समाज को आदेश दिया कि ऐ मेरे प्रिय मनुष्यो! तुम्हें यदि इस धराधाम पर जाकर समृद्ध होना है, तो यज्ञ भावना को कभी भी न भुलाना। सदा ही प्राणि मात्र का हित करना। जड़ चेतन संसार तुम्हारे हाथों कभी भी दुःखित न होवे। यह यज्ञ ही तुम्हारे लिये काम धेनु सिद्ध होगी। इस सत्य की पुष्टि श्री मद्भगवद् गीता इन शब्दों में करती हैः-
                सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा, पुरोवाच प्रजापतिः।
                अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्ट कामधुक्। (गीता 3/10)
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ऐ सर्वोत्कृष्ट मनुष्य! मैंने सारी रचना यज्ञ भावना से पूर्ण बनाई है। पांचों तत्त्व अपना अपना कत्र्तव्य करते हुए इस मेरी सृष्टि के अखण्ड यज्ञ को चला रहे हैं। तुझे भी यज्ञमय जीवन बनाना है। परोपकार ही मानव-जीवन का शिरोमणि है।
     कोई भी मशीन ले लीजिये-उस में लगे हुए सब पुर्ज़े अपना अपनी जगह यदि सही कार्य करते हैं तो मशीन चलती रहेगी। एक भी पुर्ज़ा कहीं किसी भी कारण वश काम करने की शक्ति खो बैठता है और वह पुर्ज़ा चाहे कितना छोटा भी क्यों न हो बड़े पुर्ज़ों के घूमने में रुकावट पैदा कर देगा।
     इसी तरह मानव का प्रमुख धर्म है कि वह अपने परमात्मदेव की इस सकल सृष्टि की रचना के चक्र को भलीभाँति घूमने दे। स्वार्थ ही इस यज्ञ का प्रबल शत्रु है। इसलिये आदर्श मानव का कत्र्तव्य है कि वह स्वयं सदाचारी शब्दाभ्यासी, गुरु भक्त और जितेन्द्रिय बनकर विश्व को मनुष्य बनने का उपदेश करे अपने तपोमय जीवन से सृष्टि के यज्ञ कुण्ड में शुभ कर्मों की आहुति डालता जाये जिससे संसार में उसके पुनीत कार्यों की चारु सुगन्धि दसों दिशाओं में फैले। इसके लिये सन्त सत्पुरुषों की समीपता प्राप्त करे। और उनके पावन सत्संग से अपने जीवन का कल्याण कर ले।

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