Saturday, August 27, 2016

करनी भरनी


     प्रकृति की पांच शक्तियां आकाश, पवन, अग्नि, जल और पृथ्वी किसी चीज़ की उत्पत्ति, स्थिति और उसके विनाश में प्रतिपल कार्य करती हैं। उदाहरण रुप में देखिये-किसी पुरुष ने पृथ्वी के अन्दर बीज डाला और उसे दबा दिया। वह बीज धरती में से फूटता है; फलता-फूलता है और एक से अनेक हो जाता है। बीज के (उगाने, फलने-फूलने व एक से अनेक करने में भी उन्हीं पाँचों तत्त्वों का हाथ है। उस मनुष्य ने तो केवल बीज ही बोया है और चाहे कुछ भी नहीं किया तो भी प्रकृति के पांचों तत्त्वों ने बराबर काम करना है। उन पाँचों शक्तियों को काम करने से कोई रोक नहीं सकता।
     मनुष्य भी इस संसार में एक कृषक अथवा भूमिपति के सदृश है। वह चाहे अच्छा बीज बोवे या बुरा इस बात में वह स्वतन्त्र है। वह मात्र मानव शरीर में ही बीज बोने की क्षमता रखता है अन्यथा अन्य कोई योनि नहीं जिसमें जाकर वह भला-बुरा बीज बो सके। इसी कारण ही मनुष्य को सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अब विचारणीय बात यह है कि मनुष्य किस प्रकार का बीज बो रहा है । कड़वा या मीठा। कड़वे या मीठे बीज को उगाने में प्राकृतिक पाँचों तत्त्व तो एक समान ही सहायता करेंगे। बीज कड़वा या मीठा जैसा भी होगा उसका फल तदनुकूल ही आएगा। प्रकृति ने तो उसकी सहायता करके उसे पनपाना है। वह तो चोर को और साध को एक समान ही सहायता देगी।
     अब हम आध्यात्मिक जगत की ओर चलते हैं । जीव अगर पाप का बीज बो रहा है तो उसका फल पाप होगा यदि बीज पुण्य का है तो वह पुण्य का ही फल देगा। बीज बोने का दायित्व मनुष्य पर है। यदि कोई पाप कर्म करके यह समझे कि उसे किसी ने देखा नहीं यह उसका विचार करना मिथ्या है। प्रकृति से कुछ भी छुपाया नहीं जा सकता। वह तो उसे एक न एक दिन उसका फल देवेगी ही। इसी प्रकार से यदि कोई आठवीं गुफा में जाकर भी पुण्य या पाप कर्म करता है तो उसे भी प्रकृति किसी न किसी दिन प्रकट कर देगी। अतः मनुष्य को विश्व में गम्भीरता पूर्वक विचार करके पग बढ़ाना चाहिये। यदि प्रमाद किया अथवा संसारियों की देखा देखी भेड़चाल चला तो वह अवश्यमेव धोखा खायेगा। समय का प्रवाह बड़े वेग से चल रहा है। यदि वह मनुष्य जन्म कहीं धोखेमें ही बीत गया तो फिर क्या कोई दूसरा जन्म भला बीज बोने के लिये मिलेगा? नहीं।
     परमार्थी जीव का धर्म है कि वह अपने कत्र्तव्य को पहचाने। दूसरों का अन्धाधुन्ध अनुकरण न करे। संसारी लोग क्या कर रहे हैं क्या खा रहे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं इधर ध्यान देना उसका उद्देश्य नहीं है। परमार्थी और संसारी का मार्ग पृथक्-पृथक् है। परमार्थी जीव को तो केवल सद्गुरु के उपदेश पर चलना है। यदि वह भी साधारण जीवों की भांति सन्मार्ग को छोड़ देता है और धोखे में चला जाता है तब दूसरे उसका साथ न देंगे। यह ज्योति उसे सन्त सद्गुरुदेव जी के सत्संग से ही मिल सकती है।परमार्थी का धर्म है कि वह सत्संग के वचनों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे और उन पर आचरण करे। मन-बुद्धि-चित्त में उन को स्थान दे। सत्संग का भी तभी लाभ है अन्यथा नहीं। हर किसी की करनी व भरनी अपने अपने साथ है। किसी का अन्धानुकरण करने अथवा किसी के दोषों को देखने की क्या आवश्यकता है? यदि कोई तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करता है तो तुम्हें बदले में बुरा बर्ताव करने की आवश्यकता नहीं। जैसे कहा हैः-     जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
                तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
जिसने तुम्हारे साथ बुरा किया है उसका फल भी उसी को भोगना पड़ेगा। कुदरत हर किसी को उसकी भावना के अनुसार फल देती है। तुम अपने कर्तव्य की चिन्ता करो-दूसरों की ओर देखने की आवश्यकता
ही क्या है?       बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
                जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।।
     एक मनुष्य अपने गुण और दूसरों के अवगुणों को देखता है। प्रकृति के नियमानुसार उसके अन्दर दूसरे के दोष ही आ प्रवेश करेंगे साथ ही उसके अपने गुण बाहर चले जाएँगे। इसलिये महापुरुषों ने सोच समझ कर यह सदुपदेश दिया है कि ऐ जीव! तू केवल अपने कत्र्तव्य पर ही दृष्टि रख। महापुरुषों ने जो परमावश्यक धर्म बताए हैं अर्थात् भजनाभ्यास, आरति-पूजा और सेवा तुम इन्हें नियमपूर्वक करते जाओ। ऐसा करते रहने से अवश्य ही एक दिन बेड़ा पार हो जाएगा। महापुरुष हम से ये ही शुभ कर्म करवाने और हमारा उद्धार करने के लिये प्रकट होते हैं। यदि हम उनके नियमों का परिपालन नहीं करेंगे तो हमें उनकी प्रसन्नता प्राप्त न होगी। यदि हमें वस्तुतः उनकी प्रसन्नता अभीष्ट है तो इन कत्र्तव्यों का पालन करना ही होगा। केवल बातें बनाने से संसार में चाहे काम चल जाय किन्तु मालिक के दरबार में तो करनी ही काम आएगी। वहां चतुराई व बुद्धिमत्ता काम न देगी। वहां तो केवल क्रियात्मिक जीवन और सत्यता की आवश्यकता है। "कट्टे वांग अरड़ावे, ते साहिब दे मन भावे'। महापुरुष कथन करते हैं जिसके मन में सच्चाई है और उसे बात करने का ढंग भी न आवे तो भी ऐसा जीव मालिक को प्यारा लगता है। सदाचरण से ही प्रभु को प्रसन्न किया जा सकता है। सदाचारी बन कर अपने इष्टदेव जी की प्रसन्नता प्राप्त करके मनुष्य को जीवन का यथार्थ उपयोग कर लेना है।

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