Wednesday, August 24, 2016

सेवक


भगवान् श्री रामचन्द्र जी महाराज काक भुशुण्डि जी को उपदेश कर रहे हैंः-
                अब सुनु परम विमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।
                निज सिद्धान्त सुनावौं तोही। सुनि मन धरु सब तजि भजु मोही।।
                मम  माया   संभव  संसारा। जीव   चराचर  विविध  प्रकारा ।।
                सब मम प्रिय सब मम उपजाये। सब ते अधिक मनुज मोहिं भाये।।
                तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुति धारी।तिन्ह महँ निगम धर्मअनुसारी।।
                तिन्ह महँ प्रिय विरक्त पुनि ज्ञानी। ज्ञानिहुं ते अधिक प्रिय विज्ञानी।।
                तिन ते पुनि मोहिं प्रिय निज दासा।जेहि गति मोरि न दूसरिआसा।।
                पुनि पुनि सत्य कहौं तोहिं पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
                भक्ति  हीन  विरंचि किन होई। सब  जीवहु  सम प्रिय मोहिं सोई।।
                भक्ति वन्त अति  नीचौ  प्राणी। मोहिं प्राण प्रिय अस मम बानी।।
दोहाः-          शुचि सुशील सेवक सुमति, प्रिय कहु काहि न लाग।
                श्रुति पुराण कह नीति अस, सावधान सुनु काग।।
हे काकभुशुण्डि जी! अब मेरी पवित्र वाणी को सुनो जो यथार्थ है और जिसे वेद शास्त्रों ने भी गान किया है तुझको अपना सिद्धान्त सुनाता हूँ तुम उसे मन लगाकर और निर्भय होकर सुनो- वह सिद्धान्त क्या है?
सारा संसार अर्थात् अनेक प्रकार के जीव जड़ और चेतन जिन्हें तुम देखते हो सब मेरी माया से ही उत्पन्न हुए हैं। मुझे ये सब प्रिय हैं क्योंकि मुझसे उपजाये गये हैं। परन्तु इन योनियों में मनुष्य मुझे अधिक प्यारे हैं। उन मनुष्यों में ब्रााहृण और ब्रााहृणों में मुझे वेदपाठी ब्रााहृण प्रिय हैं। उनसे भी अधिक वेद की नीति के अनुसार चलने वाले प्यारे हैं। उनसे भी प्रिय वे हैं जो संसार के विषयों को तुच्छ जान कर विरक्त हो गये हैं और सत्य ज्ञान की प्राप्ति में संलग्न हैं। इन ज्ञानियों से भी अधिक प्रिय वे हैं जो ब्राहृ में लीन हो गये हैं किन्तु उन ब्राहृलीन विज्ञानियों से मुझे अपने दास अत्यन्त प्रिय हैं जिन्हें मेरे सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं है। इसलिये मैं सत्यरुप में तुझसे बार बार कहता हूँ कि सेवक के समान मुझे कोई भी प्रिय नहीं है।
     ऐ काकभुशुण्डि जी! भक्ति और प्रेम से हीन यदि ब्राहृा भी क्यों न हो उसे मैं बाकी चराचर योनियों की न्यार्इं जानता हूँ। मेरे ह्मदय में उसका आदर उनके समान ही है परन्तु भक्तिमान प्राणी अतिनीच भी क्यों न हो वह मुझे प्राणों के सदृश प्रिय है। पवित्र विचार एवं सत्स्वभाव वाला सेवक हर एक को प्रिय लगता है। तुम स्पष्ट समझ लो वेद और पुराण भी इसी तथ्य का समर्थन करते हैं।
      भगवान् श्री रामचन्द्र जी महाराज ने संसार में सबसे उच्च पदवी सेवक को दी है। वह सेवक कैसा होना चाहिये और उसमें कौन सा गुण होना चाहिये बतलाते हैं कि वास्तव में सच्चा सेवक वही है जो गुरु की आज्ञा के अनुसार कर्म करता है। जो काम करता है उसमें पहले सोचता है कि इस में मेरे गुरु की प्रसन्नता भी है या नहीं। वह हर समय अपने आप को गुरु की मौज और आज्ञा में बाँधे रखता है। गुरु के बन्धन में बँधा हुआ सेवक अपनी आत्मा को काल और माया के बन्धन से मुक्त कर लेता है। जिसने तन मन पर गुरु का बन्धन नहीं है वे जीव काल और माया के बन्धन में पड़ जाते हैं। जो जीव गुरु के वचन और आज्ञा में नहीं चलते उन पर यमदूतों की आज्ञा चलती है। जो सेवक होकर भी गुरु की आज्ञा और मौज में नहीं चलता उसका भी कल्याण होना सन्दिग्ध है। सेवक धर्म का मार्ग श्री मौज को मानना है। अपने आप को मिटाने का पथ है। गुरु सेवक की रहनी-सहनी के बारे में श्री पंचम पातशाही जी महाराज  उल्लेख करते हैंः- गुरु के गृह सेवक जो रहै। गुरु की आज्ञा मन मह सहै।।
                आपस कौ कर कछु न जनावै। हरि हरि नाम रिदै सद ध्यावै।।
                मन बेचै सतगुरु के पास। तिस सेवक के कारज रास।।
                सेवा करत होय निहकामी। तिस को होत परापत स्वामी।।
                अपनी कृपा जिस आप करेइ। नानक सो सेवक गुरु की मति लेइ।।
जो जीव गुरु के गृह में प्रवेश पा गया है अर्थात् जो गुरु की शरण में आ गया है उसे चाहिये कि वह गुरु की आज्ञा और मौज को अपने दिल में जगह देवे। दूसरा गुरु के आगे अपने को कुछ जतलावे नहीं। ऐसा विचार कभी न उठावे कि गुरु जानते हैं तो मैं भी कुछ जानता हूँ। गुरु के आगे विनम्र और दीन बन जावे। जो अपने आपको गुरु के आगे विनीत होकर उनके चरणों में समर्पित कर देगा गुरु उस सेवक की ज़िम्मेवारी उठा लेंगे और लोक परलोक में उसके सदा सहायक होंगे। यह मार्ग अपने आप को मिटाने का है।              मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मर्तबा चाहे।
                कि दाना खाक में मिल कर, गुले गुलज़ार होता है।।
भक्तों और सन्तों के पुराने इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि किस प्रकार उन सेवकों ने अपने आप को धूलि में मिला दिया। उन्होने गुरु की और अपनी ज़ात को एक कर दिया। बुल्लेशाह ज़ात के सैयद थे। सैयद मुसलमानों में ऊँचे समझे जाते हैं। उनके गुरु अरार्इं ज़ात के थे और माली का काम करते थे। जब बुल्लेशाह ने अरार्इं को अपना गुरु बनाया तो उसके सम्बन्धियों ने उसे काफिर कहना शुरु किया कि देखो
यह सैयद होकर अरार्इं का शिष्य बन गया है। परन्तु बुल्लेशाह ने अपनी झोली पसार दी और कहने लगा
कि आप मुझे सहर्ष काफिर कहें मैं इसे प्रसन्नता से स्वीकार करता हूँ। ""बुल्ले हा! लोकी काफिर-काफिर आखदे, तूँ आहो आहो आख'' मैं अरार्इं हूँ मेरी ज़ात वही है जो मेरे गुरु की ज़ात है। वाक हैः-
मन तूं मत माण करहिं जे हौं किछु जाणदा गुरुमुख निमाणा होहु।।
अंतरि अज्ञान हौं बुद्धि है सच सबदि मलु खोहु। होहु निमाणां सद्गुरु अगै मत किछु आप लखावई।
आपणे अहंकार जगत जलिया मत तूँ आपणा आप गवावई।
सतगुरु कै भाणै करहिं कार सतगुरु के भाणै लागि रहु।।
इउ कहै नानक आप छडि सुख पावहिं मन निमाणा होय रहु।।
सेवक सच्चा वह है जो अपने मन को सद्गुरु के पास बेच देता है। जब कोई वस्तु बेच दी जाती है तो बेचने वाले का उस पर कोई स्वत्व नहीं रह जाता। मन को गुरु के हवाले सदा के लिये कर देना ही सच्ची भक्ति है ऐसा सेवक जिसने मनमति को सब प्रकार से त्याग दिया है उसके समस्त कार्य अपने आप सिद्ध हो जाते हैं। जो प्राणी मनमति के अनुसार चलते हैं और आशा करते हैं कि उनके सब कार्य सिद्ध् हों भला यह क्योंकर हो सकता है? सच्चे सेवक के गुरु ज़िम्मेवार हो जाते हैं और सेवक सब विपदाओं से निश्चिन्त हो जाता है। ऐसे सेवकों की रक्षा गुरु सर्वथा करता है। सन्त पलटू साहिब का वचन हैः-
पलटू सोवे मगन में साहिब चौकीदार।।
साहिब चौकीदार मगन होइ सोवन लागे।।    दोनों पाँव पसार देखि कै दुश्मन भागे।।
जाके सिर पर राम ताहि को वार न बांके। गर ग़ाफिल में मैं रहों आपनी आपहु ताकै।।
हमको नाहीं सोच सोच सब उनको भारी।  छिन भर परै न भोर लेत है खबर हमारी।।
लाज तजा जिन राम पर डारि दिया सिर भार। पलटू सोवे मगन में साहिब चौकीदार।।
सेवाधर्म का कितना सुन्दर और सरल मार्ग है। लोक और परलोक दोनों का बोझ मालिक के ऊपर रख दो और स्वयं सुख की नींद करो। पलटू साहिब का कथन है कि भगवान भक्तों के चौकीदार हैं। भला, जिसकी चौकीदारी भगवान स्वयं करें उसे घाटा क्योंकर! संसार अज्ञानी है जो व्यर्थ में अपने ऊपर बोझ उठाये फिरता है। जिन्होने अपना बोझ मालिक के कन्धों पर धर दियाऔर आप उसके हो रहे उनके सदृश दूसरा संसार में कौन हो सकता है। संसार के सभी  सुख उन्हीं के भाग्य में आ जाते हैं। जगत् में जीव प्रायः दुखी क्यों है? कारण यह कि वह आप मालिक बन बैठा है। मालिक बनने में दुःख और सेवक बनने में सुख भरा है। अन्त में फरमाते हैंः-""सेवा करते होय निःकामी। तिस को होत परापत स्वामी। सेवक को सेवा निष्काम भाव से करनी चाहिये। यदि सेवक के मन में कामना का कोई बीज है-स्मरण रखिये वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। सेवक को सेवा केवल गुरु की प्रसन्नता के हेतु करनी चाहिये। यदि तुम संसार में सुखी रहना चाहते होतो एक मात्र उपाय इस का यह है कि तुम सेवक बन जाओ। सेवक का पद चाहे बाह्र रुप में तुच्छ प्रतीत होता है किन्तु वस्तुतः उसकी पदवी बड़ी ऊंची है। सत्य तो यह कि सेवक ही स्वामी है। जो जीव निष्काम भाव से और अहंकार हीन होकर गुरु की सेवा करते हैं वे अपने दोनों लोक सुधार लेते हैं। ऐसे सेवक का दर्ज़ा बड़े-बड़े ऋषि मुनियों से भी बढ़कर है। जैसा कि ऊपर श्री रामचन्द्र जी महाराज ने अपनी वाणी में श्री काकभुशुण्डि जी को कथन किया है।
     तात्पर्य यह कि सच्चा सेवक ज्ञानी-ध्यानी-योगी-तपस्वी-कर्मकाण्डी आदि से कहीं उत्कृष्ट है क्योंकि उसने अपनी अहन्ता को मिटा कर अपने को स्वामी के अर्पित कर दिया है।  

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