Monday, October 3, 2016

दीनता धारण करो


     ""संसार में झूठे धन की प्राप्ति के लिये या कुछ मान प्रतिष्ठा पाने के लिये सत्ताधारियों के आगे लोग कैसे झुकते हैं। भाग्य से जिनको सत्पुरुषों की संगति या वचनों द्वारा यह निश्चय हो गया है कि पूर्ण समर्थ सद्गुरु-सत्पुरुष सब ऐश्वर्यों के दाता हैं तो उसको भी अन्तिम श्वास तक भक्ति रुपी मणि को पाने के लिये दीनता नहीं छोड़नी चाहिये। इसमें ही सेवक की भलाई,बड़ाई और सच्ची उन्नति समाई हुई है।''
     आत्मिक उन्नति के साधनों में "दीनता' सबसे उत्तम गुण है। दीनता वाले सेवक के अन्तर से ही प्रार्थना निकल सकती है। वह हार्दिक विनय ही मालिक की दया को खींच ले आती है। उस दया के द्वारा ही सेवक निर्बल से बलवान, उदास से प्रसन्नवदन, अवगुणी से गुणवान बन जाता है। जिसके ह्मदय में सच्ची दीनता नहीं होगी, वह गुरु-दरबार में चाहे बरसों तक रहे, खाली ही रहेगा। वह अपने मन में चाहे अपने आपको कोई चीज़ समझता रहे किन्तु सत्यता की उसके अन्दर गन्ध भी नहीं आ सकती। अहन्ता के कारण उसके अन्दर हर्ष-शोक क्रोध-वैर-घृणा आदिक दोष डेरा जमा कर अन्दर ही अन्दर से उसे दुःख पहुंचाते रहेंगे। वास्तव में गुरु-शरण में आाने का उद्देश्य ही यही है कि गुरु को सब कुछ समझ कर अपने आपको मिटा देना और जीते जी मर रहना-श्री भगवान के वचन हैंः-
                दीन  ग़रीबी  बन्दग़ी ,  साधन  से  आधीन।
                तिन के संग मैं यो रहूँ, ज्यों पानी सँग मीन।।
मछली जैसे पानी को नहीं छोड़ सकती वैसे ही प्रभु दीन ह्मदय वाले को कभी नहीं छोड़ते। जैसे ही सदना भक्त ने अन्तस्तल से गुहार की तो भगवान ने तुरन्त उसकी पुकार को सुना।
                मैं नाही कुछ हउ नही किछु आहि न मोरा।
                अउसर लजा राखि लेहु, सधना जनु तोरा।।
प्रसंग यह है कि लोगों की शिकायत सुनकर बादशाह ने सन्त सधना जी को जीते जी दीवार में चुनवा दिया-सधना ने मन ही मन में ऊपर के शब्दों में विनय की तो प्रभु ने तत्काल ही दया का हाथ फैलाया और अचानक यह चमत्कार हुआ कि दीवार में दबे हुए श्री सधना जी बाहर आ गये। परिणाम यह हुआ कि देश के बादशाह व अमीरों को सधने जैसे कसाई के कदमों में झुकना पड़ा। यह सब प्रताप आपाभाव को मिटाने का है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी अपनी वाणी में कथन करते हैंः-
                सब से  लघुताई  भली, लघुता  से  सब होय।
                जस दुतिया को चन्द्रमा, सीस नवै सब कोय।।
उदाहरण देकर समझाया है कि द्वितीया का चाँद छोटे से छोटा होता है तो सब कोई उसे सीस झुकाता है। एक दिन बीतने पर क्योंकि चाँद में थोड़ा सा बड़प्पन आ जाता है तो उसे कोई भी मस्तक नहीं निवाता। किसी सन्त का वचन हैः-
                हौं नाही हौं नाहीं रे, हौं नाहीं हौं नाँह।
                ताते नाहीं हो रहो, अपने साहिब माँह।।
भाव यह कि जो कुछ समझो अपने मालिक को समझो-सदा ऐसे बोले कि ""मैं क्या चीज़ हूँ'' ऐसा सेवक न केवल पारमार्थिक उन्नति करता है बल्कि वह व्यवहार में भी सुख शान्तिपूर्वक रहता है।
     आयु-पद अथवा गुणों में कोई चाहे बहुत बड़ा हो परन्तु दीनता के कारण वह छोटों से भी छोटा बन कर चलता है। वह औरों को जीतने देता है और स्वयं हार मान लेता है। वह किसी का अवगुण देखते हुए भी नहीं देखता और किसी से खींचातानी नहीं करता। तभी तो सन्तों ने भक्त जनों के लक्षणों के विषय में लिखा हैः-हरिजन  तो हारा  भला जीतन  दे संसार।
         हारा तो हर सूँ मिले, जीता जम के द्वार।।
महापुरुषों ने भी अपनी वाणी में कथन किया हैः-
         अब हम चली ठाकुर पहि हारि।
         जब हम सरणि प्रभु की आई राखु प्रभू भावै मारि।। गुरुवाणी देवगन्धारी महला-4
          ""अवर न सूझै दूजी ठौर हारि परिओ तऊ दुआरी।।'' टोडी महला-5
अर्थात् उऩ्होंने गुरु के आगे हार मान कर ही जगत को जीता। यही रास्ता हमें भी बतलाया। गुरु महिमा में भी ऐसा ही लिखा है-""लै भिक्षुक समदीन भाव मन''- भिखारी जैसे दीनमन होकर भीख माँगता है-वैसे ही दीनता धारण करने से ही गुरु दातार नाम-धन का दान प्रदान करके सेवक को कृतार्थ कर देते हैं। प्रमाण के रुप में महापुरुषों की वाणियों की एक एक कलि उद्धृत की जाती है जिससे विदित होगा कि जिन्होंने भी नाम धन गुरु के दर से हासिल किया उन्होने कितनी ग़रीबी धार कर अपने इष्टदेव के आगे प्रार्थनाएँ कीं और हमें भी वही विधि अपनानी चाहिये।
                सतिगुर  अगै  अरदासि  करि  साजनु  देइ  मिलाइ।
                साजनि मिलिऐ सुखु पाइआ जमदूत मुए बिखु खाइ।। (रुाी राग महला-1. पृ.55)
श्री गुरुनानक देव जी फरमाते हैं कि "ऐ सेवको! तुम भी ग़रीबी को धारण करके सद्गुरुदेव महाराज के आगे विनय करो कि ऐ मेरे दाता! आप कृपा करके मेरी सुरति को सच्चे साजन "शब्द' में मिला दो। जब गुरु की कृपा से तुम्हारी सुरति शब्द से मिल जाएगी तुम्हें तब सच्चा अविनाशी सुख मिलेगा और यमदूत जो सारे संसार को मारते हैं जब तुम्हें मारनेआएंगे तो स्वयमेव मर जाएंगे। तुम्हारा बाल बांका भी न होगा। क्योंकि सच्चा साजन तुम्हारा रक्षक होगा।'' श्री गुरु अमरदास जी गुरु महाराज के आगे विनति करते हैंः-
                सतिगुर भिखिआ देहि मैं तूँ सम्रथु दातारु।
                हउमै गरबु निवारीऐ कामु क्रोधु अहंकारु।।
संसार में काम-क्रोध और अहंकार का नाश करने में यदि कोई समर्थ है तो वे केवल पूर्ण सन्त सद्गुरुदेव ही हैं। जगत में दूसरे भी कितना ही सम्बन्धी होने का दम भरते हैं परन्तु वे सब जीव को स्वाधीन कराने की अपेक्षा उलटा बन्धन में डालने का प्रयत्न करते हैं। मोह-माया में फँसने की ही सम्मति देते हैं। कहने को तो वे कहते हैं कि हम तुम्हारे हितैषी हैं परन्तु काम शत्रुता का करते हैं। वास्तव में सन्त सद्गुरु ही आत्मा के मित्र हैं-उनसे आत्मा का वैर सहन नहीं किया जाता। भाव यह कि हम अज्ञान के वश में होकर अपने आप से शत्रुता करते हैं परन्तु गुरु महाराज जी इस बात को सहन नहीं कर सकते।
     कहा जाता है कि देवर्षि नारद जी भी काम के अधीन होकर मोह-माया में फँसना चाहते थे परन्तु उनके इष्टदेव से सहन न हो सका-उन्होने नारद जी के कोप को अपने ऊपर ले लिया परन्तु उन्हें मोह के गढ़े में गिरने से बचा लिया। ऊपर के गुरुवाणी के शब्द में भी श्री गुरु अमरदास जी दीन मन होकर यही भीख गुरु महाराज जी से माँगते हैं कि कृपा करके मेरे अहन्ता के रोग को निवृत्त कर दीजिए और मुझे काम क्रोधादि विकारों से सुरक्षित रखिये।
     हमारे अन्दर भी यही पांचों विकार विद्यमान हैं। वे हमारे शान्ति-धन को पल-पल में लूट कर हमें कंगाल बनाते चले जा रहे हैं। हम भी यदि उसी मार्ग पर चलेंगे जिसकी ओर श्री गुरु महाराज जी संकेत करते हैं तो हम इन चोरों से बचकर सच्चे धनवान बन जाएंगे। श्री गुरु रामदास जी महाराज अपने गुरुदेव जी के आगे विनीत भाव से गुहार करते हैं कि मेरी वेदना को पूरे सद्गुरु ही जानते हैं और उसकी दवाई भी उनके पास है। विश्व के बड़े से बड़े कुशल डॉक्टर भी हमारी व्यथा को नहीं पहचान सकते।
     "" मेरी वेदन हरि गुरु पूरा जाणै। हउ रहि न सका बिनु नाम बखाणे।।
        मैं अउखधु मन्त्रु दीजै गुर पूरे मैं हरि हरि नामि उधरी से जीउ।।
यह सुनकर सेवकों ने कहा कि आप धन्य हैं जो सद्गुरु महाराज जी के चरणों में आपको इतना विश्वास है। इस पर श्री गुरु महाराज जी ने उन सेवकों से कहा कि तुम भी श्री गुरु अमर दास साहिब तीसरी पातशाही जी की कृपा से शान्त और सुखी रहोगे और उन्हें यह वाणी पढ़ कर सुनाईः-
                हरि के जन सतिगुरु सतपुरुखा हउ बिनउ करउ गुर पासि।
                हम कीरे किरम सतिगुरु सरणाई करि दइआ नामु परगासि।।
अपने को सब प्रकार से नीचा जान कर उनकी शरण विश्वास पूर्वक ग्रहण करोगे तो अवश्यमेव गुरु की दया मिलेगी। तुम्हारे अन्दर नाम का प्रकाश होगा। जैसे छोटे बच्चे का माता-पिता ध्यान रखते हैं और जब कभी बच्चा तालाब या कीचड़ की तरफ जाता है तो वे उसे रोकते हैं। इसी भाँति सन्त सद्गुरु भी सेवक के सच्चे माता पिता हैं। जो सेवक निरहंकार होकर उनसे विनय करता है कि ""मुझे नाम दान देकर भवसागर से निकाल लीजिये।'' तो सन्त सद्गुरु उस पर दयालु होकर उसे निकाल लेते हैं।
          हम बारिक  गुर अगम  गुसार्इं गुर  करि  किरपा  प्रतिपाल।
          बिखु भउजल डुबदे काढि लेहु प्रभ गुर नानक बाल गुपाल।। गुरुवाणी प्रभाती महला-4
कितनी दीनता से भरे हुए शब्द हैं उन सत्पुरुषों के अपने अहंकार को तो निर्मूल कर लिया है। एक कली में तो उन्होने अपने आपको अन्धा तक भी कह दिया हैः-
                हम अंधुले गिआनहीन अगिआणी किउ चालह मारगि पन्था।
                हम अँधुले कउ गुर अंचलु दीजै जन नानक चलह मिलन्था।। जैतसरी महला-4
जैसे एक अन्धा आँखों वाले का दामन पकड़कर ही राह पर चल सकता है वैसे ही ऐ गुरुदेव! हमें अपने आँचल का सहारा बख़्शें जिससे हम भी आत्मिक पथ पर सकुशल चल सकें। इस प्रकार के विनय भरे शब्द पंचम पादशाही श्री गुरु अर्जुन देव जी ने तो अनेक जगह पर अपनी वाणी में लिखे हैं जैसे किः-
                तुम्हरी टेक पूरे मेरे सतिगुर मन सरनि तुम्हारै परी।
                अचेत इआने बारिक नानक हम तुम राखहु धारि करी।।  गूजरी महला-5
ऐ गुरुदेव! हमारे ऊपर अपनी दया का हाथ रखो क्योंकि हम बालक अज्ञानी व नादान हैं। ऐसी करुणा करिये कि हमारा मन सदा आपकी चरण-शरण में बना रहे इधर उधर भटकने न पावे।
     जगत् में थोड़ी-बहुत सांसारिक सहायता करने वाले को भी मनुष्य शत शत धन्यवाद देता है जिन श्री सद्गुरुदेव जी से इस प्रकार की अदृश्य शक्तियों की सहायता मिलती हो जिससे सुख-दुःख, चिन्ता भय में से कुछ भी सता न सके और उसका मन सर्वदा सच्चिदानन्द स्वरुप प्रभु में जुड़ा रहे। उनके आगे तो जितनी भी दीनता प्रकट की जाय और जितना भी त्याग किया जाय उतना ही थोड़ा है।
                बलिहारी गुर आपणे सद सद कुरबाना।
                नाम न बिसरे इकु खिनु, चसा इहु कीजै दाना।।  आसा राग महला-5
इस वाणी से सिद्ध होता है कि ऐसा दान पूरे सद्गुरु ही कर सकते हैं। जब उनकी दया से सेवक को नाम ही नहीं भूलेगा तो और बातें जो चिन्ता जनक या दुःखप्रद होती हैं तो वे अपना प्रभाव कैसे डाल सकेंगी। फल यह होगा कि सेवक उन अपराधों से दूर रहेगा।
     हमें चाहिये कि हम भी सन्त सत्पुरुषों के अनुभवों से पूरा पूरा लाभ उठावें और सब वरदानों (प्रभु की देन) को प्राप्त करने का बीज जो ""दीनता'' है उसे कदापि न भुलावें जिससे हमारे ह्मदय में "गुरु-कृपा' ठहर सके और हमारा लोक तथा परलोक दोनों सँवर जावें। जब गुरु-कृपा साथ होगी तो उलटे काम भी सीधे हो जाएंगे और बिगड़े हुए कार्य भी सिद्ध होंगे।

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