यदि तुम किसी के साथ भलाई करते हो और वह उस भलाई के प्रतिकारस्वरुप तुम्हारा कृतज्ञ होना तो दूर उल्टा तुम्हारे साथ बुराई करता है तो तुम कदापि चिंता न करो। अन्तर्यामी मालिक तुम्हारे भले व्यवहार के फलस्वरुप तुम्हें भलाई ही देगा। उसके घर में देर भले ही हो, परन्तु अन्धेर कदापि नहीं है।
सत्पुरुष फरमातें हैं कि ऐ सेवक! तुम यदि किसी के साथ भलाई करके यह इच्छा रखते हो कि वह तुम्हारा उपकार माने और तुम्हारा मान-सम्मान करे तो फिर ऐसा समझना चाहिये कि जैसे वस्त्र-विक्रेता वस्त्र और लौह-विक्रेता लोहा विक्रय करता है, उसी प्रकार तुम भी भलाई विक्रय करने का कार्य करते हो और असत्य मान-सम्मान की प्राप्ति हेतु भलाई रुपी अमूल्य रत्न को विक्रय करने में प्रसन्नता का अनुभव करते हो। अब तुम ही बताओ कि क्या यह लाभ का कार्य है? निष्काम सेवा करने वाला तो उस सेवा के फलस्वरुप स्वामी को प्राप्त करता है। सेवा करत होइ निहकामी। तिस कउ होत परापति सुआमी।।
मन में कामना रख कर सेवा करने वाला मन की खटाई से कभी भी नहीं बच सकता। उसके भीतर घृणा एवं शत्रुता के विचार उठते ही रहते हैं और अवसर पाकर क्रोध भी अपना प्रभुत्व जमा लेता है, परन्तु फिर भी मनुष्य भूल एवं भ्रम का आखेट होकर अपने को भद्रपुरुष समझता है। ऐसा मनुष्य अपनी भलाई के प्रतिकारस्वरुप मान-सम्मान प्राप्त न होने पर सदैव अशान्त रहता है और कुढ़ता भी रहता है। अब विचार करो कि बुरा मनुष्य तो हर समय दुःखी एवं अशान्त रहता ही है, यदि भला मनुष्य भी हर समय अशान्त रहे तो भले अथवा बुरे मनुष्य में अन्तर ही क्या रहा? इसीलिये सत्पुरुष चेतावनी देते हैं कि भले मनुष्य को मन से मान-सम्मान प्राप्ति की कामना को निकाल देना चाहिये, क्योंकि इस कामना से ही दुःख, कष्ट, क्लेश, क्रोध आदि बुराइयों का जन्म होता है। झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जान।।
महापुरुष फरमातें हैं कि ऐ सेवक! असत्य मान-सम्मान को प्राप्त करके क्या करेगा जबकि सम्पूर्ण जगत स्वप्नवत है। जब यहां सब कुछ अनित्य है, तो जिस असत्य मान-सम्मान की प्राप्ति की तेरे मन में इच्छा है, क्या वह तेरे किसी काम आयेगा? कदापि नहींं। इसलिये उसकी इच्छा त्याग दे।
एक अन्य स्थान पर फरमान हैः-साधो मन का मानु तिआगउ।।
सत्पुरुष उपदेश करते हैं कि मान-सम्मान के विचारों को मन से त्याग दो। यदि हम उनके वचनों की अवहेलना करके उसी वस्तु की आकाँक्षा मन में रखेंगे जिसके त्यागने का वे हमें आदेश देते हैं और फिर अपने को उनका गुरुमुख सेवक भी समझते रहें तो यह बात कहां तक उचित है?
जब प्राकृतिक नियमों का पालन करने अथवा न करने के शुभ अथवा अशुभ फल से कोई भी नहीं बच सकता तो हम कैसे बच सकते हैं? इसलिये यदि हम अपना जीवन सुख-शान्ति से व्यतीत करना चाहते हैं तो हमें चाहिये कि सत्पुरुषों के वचन जो कि प्राकृतिक नियमों के समान अटल हैं, उनका हम पूर्णरुपेण पालन करें। उनके पवित्र वचनों के वृत्त से एक पग भी बाहर न रखें और मनमति को त्याग कर सन्त सद्गुरु की आज्ञा-मौज में चलें। हमें विश्वास होना चाहिये कि कोई भी कर्म अपना फल दिये बिना नहीं रह सकता और यह भी अटल सिद्धान्त है कि आम का पेड़ लगा कर अखरोट का फल नहीं प्राप्त होता। आम के पेड़ से तो आम का फल ही प्राप्त होगा। परमसन्त श्री कबीर साहिब ने फरमाया हैः-
जो तो को काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है, वा को है तिरसूल।।
सुकरात यूनान के एक प्रसिद्ध दार्शनिक हुये हैं। एक दिन उनकी स्त्री ने उनके ऊपर गंदा जल फेंक दिया, तो उन्होने हँसते हुये फरमाया कि मेरे मन में कब से यह विचार उठ रहा था कि कभी न कभी तुम वर्षा करके मुझे शीतल कर ही दोगी। आज तुमने मेरे विचार को पूरा कर दिया। हे देवी! तुम धन्य हो। ऐसे शीतल वचन सुनकर उस देवी की क्रोधाग्नि तुरन्त शान्त हो गई और उसने उनके चरणों में गिर कर क्षमा याचना की। यह है जो जीवित प्रमाण बुराई के बदले भलाई करने का। इसका परिणाम भी कितना सुखद एवं उत्तम सिद्ध हुआ। यदि सुकरात मन में यह सोचते कि चूँकि मैं इतना प्रसिद्ध व्यक्ति हूँ,मेरे अनेक शिष्य हैं जो मेरा अत्यधिक सम्मान करते हैं और उनके सम्मुख ही इसने मेरा अपमान किया है और क्रोध में आग बगूला हो जाते तो घर को भी नरक बना देते और उनका जो मान-सम्मान आज जगत में है, स्यात् वह भी न होता। एक दिन पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा कि आपके सन्तों में कौन सी
महानता एवं विशेषता है? भगवान शंकर ने फरमायाः-
उमा सन्त तकी इहइ बड़ाई। मन्द करते जो करइ भलाई।।
हे पार्वते! सन्तों की यही बड़ाई है कि जो उनके साथ बुराई करता है, वे उसके साथ भी भलाई ही करते हैं। जैसे कुल्हाड़ा चन्दन की लकड़ी को काटता है, परन्तु चन्दन उसे सुगन्धि ही प्रदान करता है, इसी प्रकार सन्तजन अहित करने वालों के साथ भी सदैव हित ही करते हैं।
एक महात्मा जी किसी आम के बाग में बैठकर कथा वार्ता कर रहे थे। वहां का राजा और प्रजा के सहरुाों व्यक्ति वहाँ बैठे कथा श्रवण कर रहे थे। उस बाग के चारों ओर पक्की दीवार बनी हुई थी। किसी बालक ने आम का फल प्राप्त करने की इच्छा से आम के पेड़ पर पत्थर फेंका। वह पत्थर महात्मा जी के मस्तक में जा लगा। चूँकि चोट अधिक आई थी, इसलिये रक्त बहने लगा। हाहाकार मच गया। राजा ने आदेश दिया कि पत्थर मारने वाले अपराधी को उपस्थित करो। राज्य कर्मचारी भागे और उस बालक को पकड़ लाये। बालक बहुत घबराया हुआ था। यद्यपि उसने जानबूझ कर महात्मा जी पर पत्थर नहीं फेंका था, परन्तु पत्थर उन्हें लगने के कारण वह अपराध का भागी तो बन ही गया था, इसलिये वह समझता था कि अब उसे कठोर दण्ड दिया जायेगा। किन्तु महात्मा जी ने उसे अपने निकट बुलाया और अत्यन्त प्रेम से पूछा बच्चे! सच-सच बता, क्या पत्थर तूने ही फेंका था? बालक ने रोते हुये उत्तर दिया-हां स्वामी जी! किन्तु मैंने यह पत्थर आप पर नहीं फेंका था, अपितु आम के पेड़ पर फेंका था। यह मेरा दुर्भाग्य है कि वह पत्थर आम को न लगकर आपको आ लगा। चूँकि मैने घोर अपराध किया है, इसलिये मुझे जो भी दण्ड दिया जायेगा मैं भुगतने के लिये तैयार हूँ।
महात्मा जी ने राजा को सम्बोधित करते हुये कहा-क्यों राजा साहिब! यदि यह पत्थर आम के पेड़ पर लगता तो पेड़ उसे क्या देता? राजा ने उत्तर दिया-वह तो इसे आम का फल ही देता। महात्मा जी ने फरमाया-पेड़ तो पत्थर खाककर भी इसे फल देता जिसके खाने से अल्प समय के लिये इसकी तृप्ति हो जाती। अब जबकि वह पत्थर हमें लगा है तो हम इसे क्या दें? राजा समझ गया कि महात्मा जी का संकेत किस ओर है, अतएव उसने बहुत से धन पदार्थ उस बालक को दिलवा दिये।
महात्मा जी के ऐसे नम्र एवं साधु स्वभाव को देखकर बालक मन ही मन अति प्रसन्न हुआ। उसने महात्मा जी के चरणों में गिर कर अपराध की क्षमा मांगी और उनकी शरण-संगति में रहकर वह भी गुरुमुख बन गया और तन-मन से उनकी सेवा करने लगा। सन्त महापुरुष बुरे लोगों से भी भलाई का व्यवहार करके उनको भला बना देते हैं।
पंजाब के प्रसिद्ध नगर लाहौर में छज्जू नामक एक भक्त हुये हैं। एक पठान ने, जो बहुत बड़ा ठेकेदार था, उनपर चोरी का आरोप लगा कर नगर में उन्हें अपमानित करना चाहा। जब वह मुकद्दमा काज़ी के पास गया तो छज्जू भक्त जी सच्चे सिद्ध हुये। तब काज़ी ने यह निर्णय दिया कि छज्जू भक्त जी जोे दण्ड निर्धारित करें, पठान को वही दण्ड दिया जायेगा। उस समय भक्त जी ने यह निर्णय दिया कि सब लोग खाँ साहिब को साधुवाद दें कि आप अत्यन्त भद्र पुरुष हैं। परिणामस्वरुप आज तक धर्मग्रन्थों में छज्जू जी को भक्त-भक्त करके लिखते हैं। यही भक्ति का गुण है जो कि मनुष्य की आत्मा को ज्योतिर्मय बना देता है। यद्यपि बुरे के साथ भलाई करना कठिन कार्य है, परन्तु है अत्यन्त लाभदायक।
धर्मपुत्र युधिष्ठिर बहुत ही भले पुरुष थे। कौरवों ने यद्यपि उनके साथ अनेक बार बुरा व्यवहार किया, परन्तु वे उनके साथ सदैव भलाई ही करते रहे। जब पाँचों पाण्डव बारह वर्ष के लिये बनवास में थे, तो उन्हीं दिनों दुर्योधन उन्हें मारने के विचार से सेना लेकर वहां गया, परन्तु मार्ग में ही उसे युद्ध में पराजित कर गन्धर्वों के राजा चित्रसेन ने बंदी बना लिया। दुर्योधन के सैनिकों द्वारा यह समाचार जब धर्मराज युधिष्ठिर को ज्ञात हुआ तो उन्होने अपने भाइयों को आदेश दिया कि तुम सब जाओ और दुर्योधन आदि को गंधर्वों के बन्धन से मुक्त कराओ। महात्मा युधिष्ठिर की यह बात भीमसेन एवं अर्जुन आदि को उचित प्रतीत न हुई। और उन्होने इसका प्रतिवाद करते हुये विनय की कि वे लोग तो हमारे प्राण हरने के लिये ही आये थे। अच्छा हुआ कि वे स्वयं ही बन्दी बना लिये गये। यह सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा कि इस समय तुम लोग सब बातों को भूलकर उनकी सहायता करो, यह मेरी आज्ञा है, चारों भाइयों ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर दुर्योधन आदि को गंधर्वों के बंधन से मुक्ति दिलाई। ऐसे भले कामों का फल भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें यह दिया कि उनके सहायक एवं रक्षक बनकर समय-समय पर गुप्त रुप में उनकी सहायता एवं रक्षा करते रहे।
हम भी यदि चाहते हैं कि भगवान हम पर सदैव कृपा करें और समय-समय पर हमारी सहायता करते रहें तो उनकी कृपा प्राप्त करने का यही साधन है कि जहाँ तक हो सके हम बुरे का भी भला चाहें और अपने ह्मदय में शत्रुता, घृणा, ईष्र्या, द्वेष आदि के कुत्सित विचारों को कदापि घुसने न दें, अपितु उसमें सदैव मालिक का प्रेम और उनके पवित्र नाम को बसाकर हर समय उसे पवित्र एवं शुद्ध बनाये रखें।
जयदेव जी एक प्रसिद्ध भक्त हुये हैं। वे एक बार जयपुर गये। वहां के राजा ने भण्डारा किया। भोजन उपरान्त राजा ने उन्हें कुछ धन भेंट किया। जयदेव जी ने कहा कि हम इस धन को लेकर क्या करेंगे और कहां संभाले फिरेंगे? किन्तु राजा न माना और वह धन उनकी गुदड़ी में सिलवा दिया। ज्योंही वे नगर के बाहर निकले, कुछ दुष्ट व्यक्तियों ने उन्हें घेर लिया और कहा कि जो कुछ तुम्हारे पास हो, सत्य-सत्य बता दो। उन्होने गुदड़ी वाला धन उनको दे दिया। किन्तु वे तो दुष्ट व्यक्ति थे, उन्होने तो दुष्टता करनी ही थी। उन्होने सोचा कि आगे चल कर यह व्यक्ति हमें पकड़वा न दे, इसलिये अच्छा है कि इसके हाथ-पैर काट कर यहीं-कहीं कुयें में फेंक दें। यह परामर्श करके उन्होने भक्त जयदेव जी के हाथ काट कर उन्हें एक कुएं में फेंक दिया।
अनायास एक राजा शिकार खेलता हुआ उधर आ निकला। उसके साथियों ने जल निकालने के लिये जब उस कुएं में झांका तो उन्हें जयदेव जी दिखाई दिये। उन्होने उन्हें बाहर निकाला और राजा के पास ले गये। राजा ने जब भक्त जी से पूछा कि किसने आपके हाथ काट कर आपको कुएं में गिराया है तो भक्त जी ने उत्तर दिया-मेरे प्रारब्ध ने मेरे हाथ काट कर कुएं में गिराया है और अब मेरे भाग्य ने ही मुझे बाहर निकाला है। उस उत्तर से राजा समझ गया कि ये कोई मालिक के सच्चे भक्त हैं। वह उन्हें बड़े आदर-सम्मान के साथ अपनी राजधानी में ले गया। वहां उसने एक सत्संग आश्रम एवं धर्मशाला का निर्माण करवाया और स्वयं भी सन्त-सेवी बन गया। वहां जो भी साधु महात्मा आते, उनकी बड़ी आव-भगत होती। साधु-सेवा की चर्चा सुनकर वही दुष्ट लोग भी साधु वेष में वहां आये, परन्तु ज्योंही उन्होंने भक्त जयदेव जी को देखा तो घबरा कर वापस जाने लगे किन्तु जयदेव जी ने उनके साथ अत्यन्त प्रेम काव्यवहार किया और उनके रहने एवं भोजन आदि का उचित प्रबन्ध कराया। उनकी हर प्रकार सेवा होने लगी। कुछ दिन ठहरने के पश्चता् जब वे जाने लगे तो भक्त जी ने राजा से कहकर बहुत से धन-पदार्थ उन्हें दिलवाये और पहुँचाने के लिये राज्यकर्मचारी भी साथ भिजवाये। मार्ग में उन राज्यकर्मचारियों ने भेषधारी साधुओं से पूछा कि अन्य साधुओं की अपेक्षा आपका अत्यधिक सम्मान एवं सत्कार किया गया है, इसका क्या कारण है?
उन्होंने उत्तर दिया-यह भक्त हमारे गांव का है और पहले एक प्रसिद्ध डाकू था। इसने एक दिन बहुत बड़ा डाका डाला, परन्तु यह उस डाके में पकड़ा गया। राजा तो इसे प्राणदण्ड देना चाहता था, परन्तु हमारे कहने पर राजा ने प्राणदण्ड न देकर इसके हाथ काट कर इसको कुएँ में फिंकवा दिया। अब यह यहां आकर भक्त बन बैठा है। जब उन्होने ऐसा कहा तो धरती फट गई और वे दुष्ट उसमें दब गये। यह घटना देखकर राज्य कर्मचारी अत्यन्त विस्मित हुये। उन्होने वापस आकर राजा एवं भक्त जी के समक्ष सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया, जिसे सुनकर जयदेव जी को अत्यन्त खेद हुआ और खेदपूर्ण स्थिति में जैसे ही उन्होने हाथ मले तो भगवान की कृपा से उनके हाथ फिर से बन गये। यह देखकर राजा भी विस्मित हुआ और भक्त जयदेव जी को वास्तविकता बताने के लिये विनय की। तब जयदेव जी ने सम्पूर्ण वृत्तांत कह सुनाया। सुनकर राजा एवं दरबारियों के मुख से धन्य-धन्य के शब्द निकलने लगे और वे अपना भाग्य सराहते हुये कहने लगे हम कितने भाग्यशाली हैं जो हमें आप जैसे महात्मा पुरुष का मिलाप हो गया है जिनकी संगति में हमें ऐसी-ऐसी शिक्षायें मिलती रहती हैं जिनका बदला हम चुका ही नहीं सकते।
ऐसी अनेक कथायें इतिहास में वर्णित हैं, जिनके पढ़ने-सुनने से हमारा भी अपनेे इष्टदेव श्री सद्गुरु देव जी महाराज के श्री वचनों में दृढ़ विश्वास होता है, मन शुद्ध-निर्मल होकर भक्ति में लगता है, मालिक का आश्रय प्राप्त होता है तथा दैवी हाथ सदैव रक्षा करता है। मनुष्य जीवन का आनन्द तो तभी प्राप्त होता है जब ऐसे-ऐसे सर्वोत्तम गुण ह्मदय में निवास करें।
फरीदा जो तै मारनि मुकीआं तिन्हा न मारे घुंमि।
आपनड़ै घरि जाईऐ पैर तिन्हा दे चुंमि ।।
फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढ़ाई।
देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइ।।
अर्थः-""जो तुम्हें मुक्का मारे, उसे तुम घूंसा मत मारो, अपितु उसे अपने घर ले जाकर उसके चरण चूमो। ऐसा करने में वह अपने आचरण पर लज्जित होगा और भविष्य में बुराई करने से रुक जायेगा।'' ""तुम अपने मन से क्रोध को निकाल कर बुरे मनुष्य के साथ भी भलाई किये जाओ। ऐसा करने से तुम्हारे शरीर में कोई रोग नहीं लगेगा और तुम्हे सब कुछ प्राप्त होगा।''
इन वचनों पर आचरण करके यदि हम भी बुरे लोगों के साथ भलाई का व्यवहार करेंगे तो मालिक भी हमारी सदैव रक्षा और सहायता करेंगे और हम निश्चिन्त रहकर अपना जीवन सफल बना लेंगे। यही मानुष जन्म का ध्येय है।
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