समय का मूल्य पहचानो
""समय का आदर करोगे तो जगत् तुम्हारा मान करेगा। साधक को चाहिये कि वह हर एक श्वास का ध्यान रखे कि वह शब्द की कमाई में लगकर सफल हुआ है अथवा प्रमाद करने से व्यर्थ में निकल गया।''
जीवन एक चादर की न्यार्इं है जो श्वासों के तन्तुओं से बुनी है। कल्पना करो कि एक कपड़ा मोटे सूत से बुना हुआ है और दूसरा विशुद्ध ज़री के सूक्ष्म तारों से। तो ज़रीदार वस्त्र का मुल्य सूत के कपड़े से बहुत ही अधिक होगा। यदि ज़री की बजाय कोई सोने की तारों से कपड़ा तैयार करवावे तो उसके दाम और भी बढ़ जाएंगे। किन्तु मनुष्य का एक एक श्वास सोने की तो क्या बात! हीरे जवाहरात से भी बढ़-चढ़कर है। उससे इस मानव जीवन रुपी चादर को बुना गया है।
जैसे बुने हुए कपड़े में से एक एक तार निकालने लगें तो एक दिन वह कपड़ा समाप्त हो जायेगा। इस जीवन रुपी चादर से प्रतिदिन श्वास रुपी अमूल्य तारें निकलती जा रही हैं। परिणाम यह होगा कि एक दिन यह जीवन शान्त हो जाएगा। जब सोने की तारों से बुना हुआ कपड़ा अगर कोई दस-बीस रुपया मीटर के भाव से बेच दे तो उसे कोई बुद्धिमान व्यापारी न कहेगा। फिर ऐसे श्वासों से बुना हुआ कपड़ा जिसके एक एक श्वास का मोल जानकारों ने त्रिलोकी से भी अधिक बताया है। इसे मुफ्त में ही नष्ट कर देवे तो बुद्धिमान्जन उसे मन्दमति कहेंगे।
एक व्यापारी ने अपने बच्चे को सौ रुपये का नोट देकर बाज़ार से छोटे नोट लाने को कहा। जब वह लौट कर आया तो उसने नोट गिने तो एक कम था। यह देखकर बच्चे को बड़ी डाँट पड़ी। देखो-जब एक रुपये का घाटा उस सेठ ने सहन न किया तो वह विश्वपति हमारी इतनी बड़ी हानि को कैसे सहन करेंगे जिन्होने हमें श्वासों की असीम निधि देकर संसार में व्यापार करने को भेजा है। जैसे गुरुवाणी में लिखा हैः-वणजु करहु वणजारिया वखरु लेहु समालि।
तैसी वस्तु बिसाहीऐ जैसी निबहै नालि।। अगै साहु सुजाणु है लैसी वस्तु समालि।।
क्या वे हमारे मालिक नहीं देखेंगे कि यह कौन सी वस्तु खरीद कर आया है? जब वे देखेंगे कि उस
बहुमूल्य राशि के बदले काँच खरीद कर लाया है तो फिर डांट-डपट से हम बच जाएँगे? इस सरकार में भी यही नियम है कि जितनी बड़ी हानि उतनी बड़ी सज़ा। कोई दस बीस रुपये की यदि चोरी करता है तो पुलिस उसे दो-चार थप्पड़ मार कर छोड़ देती है यदि कोई बैंक आदि पर लाखों रुपयों का डाका मारता है तो उसे वर्षों तक कारागर में हवा खानी पड़ती है। मनुष्य को स्वयं ही विचार करना चाहिये कि जो प्रमादी
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मनुष्य मालिक की सौंपी हुई अमूल्य राशि को बड़ी उपेक्षा से गँवा देगा तो वह कितना दारुण दण्ड पायेगा! कर्म का फल तो अवश्य ही मिलना है अतः सयानप इसी में है कि हम ऐसा काम करें ही क्यों जिसका फल हमारे लिये दुःखदायी हो। सच्चे दरबार में हमें लज्जित होना पड़े। सारोक्तावलि के शब्द हैंः-
""सब ही कर्मों के आरम्भ में बुद्धिमान सदा फल को सुमरै।''
अर्थः-बुद्धिमान पुरुष वह होता है जो हर एक कार्य करने से पहले उसके परिणाम पर विचार कर ले। सोच समझ कर समय के अन्दर ही अपना पारमार्थिक धर्म सँवार लेवे। जिस कर्म का फल दुःखदायी प्रतीत होता हो उससे अपने आपको बचाकर रखे। सन्तों महापुरुषों ने अपनी वाणी द्वारा हमें बता दिया है कि किस अपराध का क्या दण्ड मिलता है? जिन्होने प्रभु की प्रदान की हुई पूँजी नाम स्मरण के सिवाय मनमति में गँवा दी उनके लिये आदेश हैः-
जिन गुरु की चोरी करी, गये नाम गुण भूल।
तेहि विधि चमगादड़ किये, रहे ऊध्र्वमुख झूल।।
उस सच्चे शाह ने तो इन श्वासों से नाम का सौदा करने की आज्ञा दी है, जो उसका वचन भूलकर ये श्वास अपनी इच्छा के अनुसार शरीर और इन्द्रियों की आसक्ति में खर्च कर देता है वह आज्ञा का उल्लंघन करता है। जैसे कोई सेठ किसी नौकर को राशि देकर बाज़ार में भेजे कि अमुक वस्तु ले आओ नौकर उस आज्ञा को भुलाकर वह वस्तु तो न लावे और उस धन को अपने काम में खर्च कर देवे तो सेठ उसे अपराधी की दृष्टि से देखेगा। वैसे ही जो लोग सद्गुरु की प्रदान की हुई श्वासों की अमूल्य पूँजी को अपने मन के अधीन होकर विषय-विकारों में नष्ट कर देते हैं और नाम-स्मरण में नहीं लगाते उन्हें जो दण्ड मिलता है और जिन्होंने उनकी दुर्दशा देखी है उनके वचन हैं कि वे लोग चमगादड़ की योनि में जाकर ऊपर मुंह किये हुए झूला करते हैं। इस प्रकार वे अपने किये हुए बुरे-कर्मों का पश्चात्ताप करते हैं। उन्हें तो मानुष जन्म जब मिलेगा सो मिलेगा किन्तु हमें तो मानव काया में आने का अवसर प्राप्त हो चुका है हम जो कुछ करना चाहें कर सकते हैं।
जब हमें श्री सद्गुरुदेव जी सावधान करते हैं कि एक एक श्वास पर नज़र रखो कि उस श्वास के बदले में हमने क्या कुछ प्राप्त किया? वह श्वास सार्थक हुआ या निर्रथक चला गया? तो हमारा प्रथम कत्र्तव्य हो जाता है कि हम अभी से चेत जावें और अपनी सुरित की धारा को बहिर्मुख होने से रोककर उसे अन्तर्मुखी कर दें। उसे गुरु-शब्द सो जोड़कर अभय-पद को प्राप्त करें। यदि हम श्री गुरुदेव के वचन के अनुसार आचरण नहीं करेंगे तो प्रकृति रानी भी अपने विधान के द्वारा हमें दण्डित करने से न चूकेगी।
परमसन्त श्री कबीर जी के पास एक बड़ा सेठ आया। उसको श्री कबीर साहिब जी ने फरमाया कि "झूठे धन को सच्चा और संग जाने वाला मत समझो और नाम की कमाई करो क्योंकि नाम-धन ही सच्चा और साथ जाने वाला धन है।' परन्तु उस सेठ ने यह उपदेश सुनकर भी अनसुना कर दिया और अपने धन के मद में मस्त रहा। कुदरत के काम हैं। कर्म का फल किसी को एक न एक दिन मिलता ही है। वह छोटे बड़ा का पक्षपात नहीं करती। वह सेठ यद्यपि अपने मन की मति से दान-पुण्य भी बहुत करता था परन्तु मृत्यु के उपरान्त वह हाथी जा बना। सिद्धान्त यह है कि गुरु शब्द की कमाई के बिना इस आशा का नाश नहीं होता और जब तक आशा बनी हुई है तब तक चौरासी का चक्र कटता नहीं।
सौभाग्यवश उस हाथी को काशीराज ने खरीद लिया। वह उसके द्वार पर बँधा हुआ था कि अकस्मात् श्री कबीर साहिब जी का उधर से गुज़रना हुआ तो हाथी सिर धुन धुन कर लगा चिंघाड़ने। परमसन्त श्री कबीर साहिब तो अन्तर्यामी थे तत्काल पहचान गये कि यह कौन है और क्या कह रहा है-उसे उन्होंने
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अपनी वाणी में यो कहाः- राज दुआरे बन्धिया , मूड़ी धुने गजन्द।
मानुष जनम कब पाइहौं, भजिहौं परमानन्द।।
समझाते हैं कि हाथी अब सिर धुन धुन कर पछताता है और वचन देता है कि मुझे एक अवसर दे तो कि गुरु-शरण में जाकर गोबिन्द का भजन करुँ। श्री कबीर जी ने पूछा कि ऐ गजराज! तुम तो बड़ा दान-पुण्य किया करते थे? अब तुम्हें क्या मिलता है? वह गजेन्द्र बोला कि मुझे उस दान के बदले अब एक समय पर खाने के लिये सवा मन भोजन मिलता है। परन्तु इससे मुझे कोई लाभ नहीं क्योंकि किसी का पेट तो थोड़े से अन्न से भर जाता है और मेरा बड़ा पेट बहुत खुराक मांगता है। इस ढंग से मानो मुझे मनमति से किये हुए दान का फल मिल रहा है। तब श्री कबीर साहिब जी ने यों कथन कियाः-
बहुत दान जो देत हैं, कर कर लम्बी आस।
काहू के गज होयेंगे , खायेंगे सेर पचास।।
यह दशा होती है मनमति पर चल कर कर्म करने की। मन के वश होकर किया हुआ सत्कर्म भी अपूर्ण पुण्य बन जाता है जैसे गन्दी जगह से गुज़रने के कारण स्वच्छ पवन भी दूषित हो जाता है।
नाम संगि मनि प्रीति न लावै, कोटि करम करतो न रुकि जावै।। गौड़ी महला-5
जो मन गुरु शब्द से नहीं जुड़ा वह कदाचित् शुद्ध नहीं हो सकता। जब मन ही विमल नहीं होगा तो विचारधारा कैसे शुद्ध हो सकेगी? जब विचार मलिन होंगे तो कर्म भी श्रेष्ठ न होंगे और बुरे कर्म करने वाला कभी भी दण्ड से बच नहीं सकता। इसलिये सन्त सद्गुरु सब दुःखों के मूल कारण की चिकित्सा करते हैं-कथन करते हैं, ""जितना परिश्रम करो मन को सँवारने के लिये करो।'' श्री वचन हैंः-
""छिन छिन मन गुरु चरणन लावै। एक पलक छूटन नहीं पावे।''
गुरु चरणों का प्रताप किसी से छुपा नहीं। यदि ये श्री चरण जल से छू जावें तो वह पानी "चरणामृत' बन जाता है, यदि वे धरती से छू जावें तो वह भूमि तीर्थ बन जाती है। यदि कोई अपना मन उनसे प्रतिपल लगाता रहेगा तो वह क्यों नहीं उज्जवल हो जायेगा। निर्मल मन के पीछे स्वयं भगवान ऐसा भागे आते हैं जैसे दीप शिखा पर पतंगा। आप स्वयं ही विचार करो कि जो सुखों के सागर प्रभु देव हैं वे जिसके ह्मदय में बस जावें तो उसे कौन से सुख की कमी रह जाएगी। यह सद्ग्रन्थों का सार है। जिसने इस तथ्य को समझ लिया और उस पर आचरण कर लिया मानों उसने सब ग्रन्थों के सार को जान लिया और अपना निजी काम बना लिया। कबीर मन निर्मल भया, जैसा गंगा नीर।
पाछै लागे हरि फिरै, कहत कबीर कबीर।।
जो मानव मन को निर्मल करने की साधना में लगा हुआ है वही बुद्धिमान् और भाग्यशाली है। अल्पज्ञ संसार पहले चाहे उसका आदर न भी करे उसकी खिल्ली भी करे परन्तु एकदिन आगे चल कर ऐसा आयेगा कि वही जगत् उसके चरण चूमेगा इसमें दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। श्री गुरुनानक देव जी महाराज जब इस साधन में लगे तो संसार ने उन्हें "कुराही' भी कहा "दीवाना' भी कहा "बेताला' जैसे अपशब्द भी कहे। यदि वे संसार का विरोध देखकर अपने संकल्प से विचलित हो जाते तो आज विश्व में उनका नाम सूर्य की भांति न चमकता।
श्री मीराबाई जब भजन-भक्ति की राह पर चलने लगीं तो और लोगों की बात तो एक किनारे रही अपने आत्मीय जनों ने भी उसे अपार कष्ट दिये। विरोध इतना प्रचण्ड होता गया कि उसका मुँह देखना तक भी उन्हें प्रिय न था। उसकी जीवन लीला को समाप्त करने के लिये उन्होने उसे विष भी दे दिया। परन्तु यदि वह इन दारुण कष्टों को देखकर घबड़ा जाती और उनके कहने पर भक्ति की राह छोड़कर
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चलने लगती तो उसका आज जैसा गौरव न रहता। वह भी सामान्य जीवों के समान काल के विकराल गाल में समा गई होती।
अतः जो साधक दृढ़ संकल्पपूर्वक भजन भक्ति की कमाई करना चाहे उसका दृढ़ संकल्प होना चाहिये। वह संसार की ओर से आने वाले मिथ्या अपवादों पर यदि ध्यान देने लगे तो मन जगत् की झूठी बातों में आ जाएगा और उसका सारा श्रम धूलि में मिल जायेगा।
कोई प्रश्न करे कि ऊपर तो समय की सफलता पर चल रहे थे और अब वज्र संकल्प के विषय पर करने लगे हो। परन्तु गुरुमुखों को विचार करना चाहिये कि दृढ़ संकल्प का होना और समय को सफल करना-ये एक ही विषय के दो पहलू हैं। उदाहरणतया-ध्रुव भक्त ने जब समय को सफल करने का काम आरम्भ किया तो समय को निर्रथक कर देने वाली लोभ आदिक शक्तियां उसके पीछे पड़ गर्इं। यदि उसमें दृढ़ संकल्प रखने का गुण न होता तो वह समय के सफल करने के उद्देश्य को सिद्ध न कर सकता।
अतः हमें भी श्री सद्गुरु देव भगवान् की आज्ञानुसार अपने वज्र संकल्प की शक्ति की परीक्षा करके पग बढ़ाते जाना चाहिये और इस प्रकार परमार्थ के पथ को पार करके निज घर पहुंचने का यथाशक्ति प्रयत्न करना चाहिये।
""समय का आदर करोगे तो जगत् तुम्हारा मान करेगा। साधक को चाहिये कि वह हर एक श्वास का ध्यान रखे कि वह शब्द की कमाई में लगकर सफल हुआ है अथवा प्रमाद करने से व्यर्थ में निकल गया।''
जीवन एक चादर की न्यार्इं है जो श्वासों के तन्तुओं से बुनी है। कल्पना करो कि एक कपड़ा मोटे सूत से बुना हुआ है और दूसरा विशुद्ध ज़री के सूक्ष्म तारों से। तो ज़रीदार वस्त्र का मुल्य सूत के कपड़े से बहुत ही अधिक होगा। यदि ज़री की बजाय कोई सोने की तारों से कपड़ा तैयार करवावे तो उसके दाम और भी बढ़ जाएंगे। किन्तु मनुष्य का एक एक श्वास सोने की तो क्या बात! हीरे जवाहरात से भी बढ़-चढ़कर है। उससे इस मानव जीवन रुपी चादर को बुना गया है।
जैसे बुने हुए कपड़े में से एक एक तार निकालने लगें तो एक दिन वह कपड़ा समाप्त हो जायेगा। इस जीवन रुपी चादर से प्रतिदिन श्वास रुपी अमूल्य तारें निकलती जा रही हैं। परिणाम यह होगा कि एक दिन यह जीवन शान्त हो जाएगा। जब सोने की तारों से बुना हुआ कपड़ा अगर कोई दस-बीस रुपया मीटर के भाव से बेच दे तो उसे कोई बुद्धिमान व्यापारी न कहेगा। फिर ऐसे श्वासों से बुना हुआ कपड़ा जिसके एक एक श्वास का मोल जानकारों ने त्रिलोकी से भी अधिक बताया है। इसे मुफ्त में ही नष्ट कर देवे तो बुद्धिमान्जन उसे मन्दमति कहेंगे।
एक व्यापारी ने अपने बच्चे को सौ रुपये का नोट देकर बाज़ार से छोटे नोट लाने को कहा। जब वह लौट कर आया तो उसने नोट गिने तो एक कम था। यह देखकर बच्चे को बड़ी डाँट पड़ी। देखो-जब एक रुपये का घाटा उस सेठ ने सहन न किया तो वह विश्वपति हमारी इतनी बड़ी हानि को कैसे सहन करेंगे जिन्होने हमें श्वासों की असीम निधि देकर संसार में व्यापार करने को भेजा है। जैसे गुरुवाणी में लिखा हैः-वणजु करहु वणजारिया वखरु लेहु समालि।
तैसी वस्तु बिसाहीऐ जैसी निबहै नालि।। अगै साहु सुजाणु है लैसी वस्तु समालि।।
क्या वे हमारे मालिक नहीं देखेंगे कि यह कौन सी वस्तु खरीद कर आया है? जब वे देखेंगे कि उस
बहुमूल्य राशि के बदले काँच खरीद कर लाया है तो फिर डांट-डपट से हम बच जाएँगे? इस सरकार में भी यही नियम है कि जितनी बड़ी हानि उतनी बड़ी सज़ा। कोई दस बीस रुपये की यदि चोरी करता है तो पुलिस उसे दो-चार थप्पड़ मार कर छोड़ देती है यदि कोई बैंक आदि पर लाखों रुपयों का डाका मारता है तो उसे वर्षों तक कारागर में हवा खानी पड़ती है। मनुष्य को स्वयं ही विचार करना चाहिये कि जो प्रमादी
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मनुष्य मालिक की सौंपी हुई अमूल्य राशि को बड़ी उपेक्षा से गँवा देगा तो वह कितना दारुण दण्ड पायेगा! कर्म का फल तो अवश्य ही मिलना है अतः सयानप इसी में है कि हम ऐसा काम करें ही क्यों जिसका फल हमारे लिये दुःखदायी हो। सच्चे दरबार में हमें लज्जित होना पड़े। सारोक्तावलि के शब्द हैंः-
""सब ही कर्मों के आरम्भ में बुद्धिमान सदा फल को सुमरै।''
अर्थः-बुद्धिमान पुरुष वह होता है जो हर एक कार्य करने से पहले उसके परिणाम पर विचार कर ले। सोच समझ कर समय के अन्दर ही अपना पारमार्थिक धर्म सँवार लेवे। जिस कर्म का फल दुःखदायी प्रतीत होता हो उससे अपने आपको बचाकर रखे। सन्तों महापुरुषों ने अपनी वाणी द्वारा हमें बता दिया है कि किस अपराध का क्या दण्ड मिलता है? जिन्होने प्रभु की प्रदान की हुई पूँजी नाम स्मरण के सिवाय मनमति में गँवा दी उनके लिये आदेश हैः-
जिन गुरु की चोरी करी, गये नाम गुण भूल।
तेहि विधि चमगादड़ किये, रहे ऊध्र्वमुख झूल।।
उस सच्चे शाह ने तो इन श्वासों से नाम का सौदा करने की आज्ञा दी है, जो उसका वचन भूलकर ये श्वास अपनी इच्छा के अनुसार शरीर और इन्द्रियों की आसक्ति में खर्च कर देता है वह आज्ञा का उल्लंघन करता है। जैसे कोई सेठ किसी नौकर को राशि देकर बाज़ार में भेजे कि अमुक वस्तु ले आओ नौकर उस आज्ञा को भुलाकर वह वस्तु तो न लावे और उस धन को अपने काम में खर्च कर देवे तो सेठ उसे अपराधी की दृष्टि से देखेगा। वैसे ही जो लोग सद्गुरु की प्रदान की हुई श्वासों की अमूल्य पूँजी को अपने मन के अधीन होकर विषय-विकारों में नष्ट कर देते हैं और नाम-स्मरण में नहीं लगाते उन्हें जो दण्ड मिलता है और जिन्होंने उनकी दुर्दशा देखी है उनके वचन हैं कि वे लोग चमगादड़ की योनि में जाकर ऊपर मुंह किये हुए झूला करते हैं। इस प्रकार वे अपने किये हुए बुरे-कर्मों का पश्चात्ताप करते हैं। उन्हें तो मानुष जन्म जब मिलेगा सो मिलेगा किन्तु हमें तो मानव काया में आने का अवसर प्राप्त हो चुका है हम जो कुछ करना चाहें कर सकते हैं।
जब हमें श्री सद्गुरुदेव जी सावधान करते हैं कि एक एक श्वास पर नज़र रखो कि उस श्वास के बदले में हमने क्या कुछ प्राप्त किया? वह श्वास सार्थक हुआ या निर्रथक चला गया? तो हमारा प्रथम कत्र्तव्य हो जाता है कि हम अभी से चेत जावें और अपनी सुरित की धारा को बहिर्मुख होने से रोककर उसे अन्तर्मुखी कर दें। उसे गुरु-शब्द सो जोड़कर अभय-पद को प्राप्त करें। यदि हम श्री गुरुदेव के वचन के अनुसार आचरण नहीं करेंगे तो प्रकृति रानी भी अपने विधान के द्वारा हमें दण्डित करने से न चूकेगी।
परमसन्त श्री कबीर जी के पास एक बड़ा सेठ आया। उसको श्री कबीर साहिब जी ने फरमाया कि "झूठे धन को सच्चा और संग जाने वाला मत समझो और नाम की कमाई करो क्योंकि नाम-धन ही सच्चा और साथ जाने वाला धन है।' परन्तु उस सेठ ने यह उपदेश सुनकर भी अनसुना कर दिया और अपने धन के मद में मस्त रहा। कुदरत के काम हैं। कर्म का फल किसी को एक न एक दिन मिलता ही है। वह छोटे बड़ा का पक्षपात नहीं करती। वह सेठ यद्यपि अपने मन की मति से दान-पुण्य भी बहुत करता था परन्तु मृत्यु के उपरान्त वह हाथी जा बना। सिद्धान्त यह है कि गुरु शब्द की कमाई के बिना इस आशा का नाश नहीं होता और जब तक आशा बनी हुई है तब तक चौरासी का चक्र कटता नहीं।
सौभाग्यवश उस हाथी को काशीराज ने खरीद लिया। वह उसके द्वार पर बँधा हुआ था कि अकस्मात् श्री कबीर साहिब जी का उधर से गुज़रना हुआ तो हाथी सिर धुन धुन कर लगा चिंघाड़ने। परमसन्त श्री कबीर साहिब तो अन्तर्यामी थे तत्काल पहचान गये कि यह कौन है और क्या कह रहा है-उसे उन्होंने
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अपनी वाणी में यो कहाः- राज दुआरे बन्धिया , मूड़ी धुने गजन्द।
मानुष जनम कब पाइहौं, भजिहौं परमानन्द।।
समझाते हैं कि हाथी अब सिर धुन धुन कर पछताता है और वचन देता है कि मुझे एक अवसर दे तो कि गुरु-शरण में जाकर गोबिन्द का भजन करुँ। श्री कबीर जी ने पूछा कि ऐ गजराज! तुम तो बड़ा दान-पुण्य किया करते थे? अब तुम्हें क्या मिलता है? वह गजेन्द्र बोला कि मुझे उस दान के बदले अब एक समय पर खाने के लिये सवा मन भोजन मिलता है। परन्तु इससे मुझे कोई लाभ नहीं क्योंकि किसी का पेट तो थोड़े से अन्न से भर जाता है और मेरा बड़ा पेट बहुत खुराक मांगता है। इस ढंग से मानो मुझे मनमति से किये हुए दान का फल मिल रहा है। तब श्री कबीर साहिब जी ने यों कथन कियाः-
बहुत दान जो देत हैं, कर कर लम्बी आस।
काहू के गज होयेंगे , खायेंगे सेर पचास।।
यह दशा होती है मनमति पर चल कर कर्म करने की। मन के वश होकर किया हुआ सत्कर्म भी अपूर्ण पुण्य बन जाता है जैसे गन्दी जगह से गुज़रने के कारण स्वच्छ पवन भी दूषित हो जाता है।
नाम संगि मनि प्रीति न लावै, कोटि करम करतो न रुकि जावै।। गौड़ी महला-5
जो मन गुरु शब्द से नहीं जुड़ा वह कदाचित् शुद्ध नहीं हो सकता। जब मन ही विमल नहीं होगा तो विचारधारा कैसे शुद्ध हो सकेगी? जब विचार मलिन होंगे तो कर्म भी श्रेष्ठ न होंगे और बुरे कर्म करने वाला कभी भी दण्ड से बच नहीं सकता। इसलिये सन्त सद्गुरु सब दुःखों के मूल कारण की चिकित्सा करते हैं-कथन करते हैं, ""जितना परिश्रम करो मन को सँवारने के लिये करो।'' श्री वचन हैंः-
""छिन छिन मन गुरु चरणन लावै। एक पलक छूटन नहीं पावे।''
गुरु चरणों का प्रताप किसी से छुपा नहीं। यदि ये श्री चरण जल से छू जावें तो वह पानी "चरणामृत' बन जाता है, यदि वे धरती से छू जावें तो वह भूमि तीर्थ बन जाती है। यदि कोई अपना मन उनसे प्रतिपल लगाता रहेगा तो वह क्यों नहीं उज्जवल हो जायेगा। निर्मल मन के पीछे स्वयं भगवान ऐसा भागे आते हैं जैसे दीप शिखा पर पतंगा। आप स्वयं ही विचार करो कि जो सुखों के सागर प्रभु देव हैं वे जिसके ह्मदय में बस जावें तो उसे कौन से सुख की कमी रह जाएगी। यह सद्ग्रन्थों का सार है। जिसने इस तथ्य को समझ लिया और उस पर आचरण कर लिया मानों उसने सब ग्रन्थों के सार को जान लिया और अपना निजी काम बना लिया। कबीर मन निर्मल भया, जैसा गंगा नीर।
पाछै लागे हरि फिरै, कहत कबीर कबीर।।
जो मानव मन को निर्मल करने की साधना में लगा हुआ है वही बुद्धिमान् और भाग्यशाली है। अल्पज्ञ संसार पहले चाहे उसका आदर न भी करे उसकी खिल्ली भी करे परन्तु एकदिन आगे चल कर ऐसा आयेगा कि वही जगत् उसके चरण चूमेगा इसमें दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। श्री गुरुनानक देव जी महाराज जब इस साधन में लगे तो संसार ने उन्हें "कुराही' भी कहा "दीवाना' भी कहा "बेताला' जैसे अपशब्द भी कहे। यदि वे संसार का विरोध देखकर अपने संकल्प से विचलित हो जाते तो आज विश्व में उनका नाम सूर्य की भांति न चमकता।
श्री मीराबाई जब भजन-भक्ति की राह पर चलने लगीं तो और लोगों की बात तो एक किनारे रही अपने आत्मीय जनों ने भी उसे अपार कष्ट दिये। विरोध इतना प्रचण्ड होता गया कि उसका मुँह देखना तक भी उन्हें प्रिय न था। उसकी जीवन लीला को समाप्त करने के लिये उन्होने उसे विष भी दे दिया। परन्तु यदि वह इन दारुण कष्टों को देखकर घबड़ा जाती और उनके कहने पर भक्ति की राह छोड़कर
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चलने लगती तो उसका आज जैसा गौरव न रहता। वह भी सामान्य जीवों के समान काल के विकराल गाल में समा गई होती।
अतः जो साधक दृढ़ संकल्पपूर्वक भजन भक्ति की कमाई करना चाहे उसका दृढ़ संकल्प होना चाहिये। वह संसार की ओर से आने वाले मिथ्या अपवादों पर यदि ध्यान देने लगे तो मन जगत् की झूठी बातों में आ जाएगा और उसका सारा श्रम धूलि में मिल जायेगा।
कोई प्रश्न करे कि ऊपर तो समय की सफलता पर चल रहे थे और अब वज्र संकल्प के विषय पर करने लगे हो। परन्तु गुरुमुखों को विचार करना चाहिये कि दृढ़ संकल्प का होना और समय को सफल करना-ये एक ही विषय के दो पहलू हैं। उदाहरणतया-ध्रुव भक्त ने जब समय को सफल करने का काम आरम्भ किया तो समय को निर्रथक कर देने वाली लोभ आदिक शक्तियां उसके पीछे पड़ गर्इं। यदि उसमें दृढ़ संकल्प रखने का गुण न होता तो वह समय के सफल करने के उद्देश्य को सिद्ध न कर सकता।
अतः हमें भी श्री सद्गुरु देव भगवान् की आज्ञानुसार अपने वज्र संकल्प की शक्ति की परीक्षा करके पग बढ़ाते जाना चाहिये और इस प्रकार परमार्थ के पथ को पार करके निज घर पहुंचने का यथाशक्ति प्रयत्न करना चाहिये।
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