Tuesday, October 11, 2016

आत्म-संयम


                कबीर यह मन मसखरा, कहौं तो मानै रोस।
                जा मारग साहिब मिलै, तहां न चालै कोस।।
                    मनहीं को परमोधिये, मनहीं को उपदेस।
                    जो यहि मन को बसि करै, तो सिष्य होये सब देस।।
     मन को वश में करने का नाम है ""आत्म संयम''। इसके अर्थ हैं अपने आपको वश में करना अर्थात् अपने कर्म, वचन और मन पर अधिकार करना, शरीर, जिह्वा और मन को वश में रखना अर्थात् शरीर से कोई अशुभ कर्म न होने पाये, जिह्वा से कोई अपशब्द न निकले और मन में कभी अशुभ विचार न उठने पाये। यदि मनुष्य अपने शरीर-इन्द्रियों को वश में करके उनका उचित ढंग से प्रयोग करता है,तो यह मनुष्य वास्तव में मनुष्य कहलाने का अधिकारी है। इसके विपरीत जब यह मनुष्य अपने कर्म वचन और मन पर अधिकार नहीं रखता, उचित-अनुचित का ज्ञान नहीं रखता, तो मनुष्यता के उच्चपद से गिरकर अन्य योनियों में गिने जाने के योग्य हो जाता है। इसलिये मनुष्य के सच्चे हितैषी और हितकारी सन्त सत्पुरुष सदैव ही ऐसा शुभ उपदेश फरमाया करते हैंः-जिह्वा को अशुभ बात कहने से, मन को अशुभ बात सोचने से और हाथों को अशुभ काम करने से रोक रखो, क्योंकि जिसके लिये तुम अशुभ सोच रहे हो शायद उसके लिये विधाता को ऐसा अभीष्ट न हुआ तो तुम्हारे सोचने से उसका बुरा तो होगा नहीं, उस अशुभकर्म का प्रभाव स्वयं तुम्हारे ऊपर पड़ेगा। प्रत्येक व्यक्ति के कर्मानुसार शुभ अथवा अशुभ होना तो विधाता के अधीन है। किसी के लिये अशुभ सोचने से मनुष्य का कुछ अनिष्ट नहीं कर सकता उल्टा स्वयं को बुरा अवश्य बना लेता है। प्राकृतिक नियमानुसार विचारों का प्रभाव स्वयं उसी पर वार करता है जैसा कथन हैः-   जैसा सोचोगे, वैसे ही बनते जाओगे। जैसा करोगे, वैसा ही भरोगे।।
      यह कभी न सोचो कि ""विचार केवल विचार ही हैं, यह कोई वस्तु नहीं।'' वास्तव में सत्य तो यह है कि यह संसार विचारों का संसार है। अन्य शब्दों में विचारों के संसार का नाम ही संसार अथवा विश्व है। इस विचार में अत्याधिक शक्ति विद्यमान है। यह विचार ही बार-बार उभर कर जिह्वा को हिलाता है, मस्तिष्क को गति प्रदान करता है और शरीर को कर्म करने पर विवश करता है। भूल कर भी कभी यह न समझो कि वचन कोई शक्ति नहीं रखता। विचार ही का अन्य रुप वचन है और वह जगत-क्रम को उलट-पलट करने की शक्ति रखता है। वचन से ही तो कर्म का आरम्भ होता है। और यह भी कभी न सोचना कि कर्म नितान्त साधारण बात है अपितु इस प्रकार समझो कि यह जगत् कर्ममय है। जो कुछ हुआ, हो रहा है और होगा, वह सब कर्म ही के प्रभाव से हुआ है, हो सकता है, हो रहा है और होगा। कर्म में असीम शक्ति है। यह विचार की तीसरी शक्ति है और इसी कर्म के पीछे विचार और वचन रहकर इसे गतिमान रखते हैं। इसीलिये कहा गया है कि मन-वचन-कर्म अर्थात् मन-जिह्वा और शरीर-इन तीनों को वश में रखो तब परमार्थ-पथ की ओर पग बढ़ाओ। यदि तुम में आत्म-संयम नहीं है तो आत्मिक-धन तुम्हारे हाथ नहीं आएगा। तुम शरीर और इन्द्रियों में फँस कर निर्बल हो जाओगे और अत्यन्त अपमानित होगे। पहले अपना अनिष्ट करोगे, फिर और किसी का अनिष्ट कर सकोगे।

     जो दूसरों के लिये अशुभ सोचता है, उसका मन विषपूर्ण विचारों का रुाोत है। यदि वह ऐसा न होता तो उसमें अपने और पराये को हानि पहुँचाने वाले विचार और विष की धार कैसे निकलती? मनुष्य बुरा होगा तभी तो बुराई सोचेगा। जो दूसरों की बुराई में जिह्वा खोलता है तो मानो उसके मन में बुराई का स्थायी निवास हो गया है और उसके निकलने का मार्ग उसकी जिह्वा बन गई है। यदि वह मन और जिह्वा का बुरा न होता तो किसी के लिये अशुभ वचन क्यों निकालता? जो दूसरों के साथ बुराई करता है वह मन, मस्तिष्क और शरीर का मलीन है, तभी तो वह औरों की हानि चाहता है। जो जैसा है और जैसा जिसने अपने आपको बना लिया है, वह वैसा ही सोचेगा और करेगा भी। यह मान्य और सच्ची बात है जिसके सिद्ध करने के लिये किसी दलील की कदापि आवश्यकता नहीं। इसलिये यदि बुराई से बचना चाहते हो तो पहले शरीर पर, फिर जिह्वा पर और मन पर दृष्टि रखो ताकि शरीर से कोई अशुभ कर्म न होने पाये, जिह्वा से कोई अपशब्द न निकले और मन को कभी किसी के सम्बन्ध में अशुभ सोचने का अवसर न मिले।
     बुराई से बचने का उत्तम उपाय यह है कि रुख को नेकी और भलाई की ओर कर दो। शरीर को बुरी संगति से रोककर सत्पुरुषों की संगती की ओर मोड़ दो। वह नेक हो जायेगा, बुरे कर्मों से बच जायेगा। जिह्वा को अशुभ वचन कहने से रोक दो। उसे मालिक का नाम जपने और सद्शास्त्रों का अध्ययन करने में लगा दो। ऐसा करने से वह शुभ वचन बोलने लगेगी। मन को बुराई सोचने से रोक दो। किन्तु यह भी ध्यान रहे कि मन बेकार रहना नहीं जानता। इसे हर पल कुछ न कुछ सोचने विचारने और समझने का मसाला चाहिये। जब तुम्हारा शरी़र और जिह्वा सत्पुरुषों की शुभ संगति के प्रभाव से शुभ मार्ग की ओर लग जायेंगे अर्थात् जब शरीर शुभ कर्म करने लगेगा और जिह्वा शुभ वचन बोलने लगेगी तो मन को भी शुभ भोजन मिलता रहेगा। संगति अपना प्रभाव डाले बिना कैसे रह सकती है?
                सोहबते सालेह तुरा सालेह कुनद।
                सोहबते ताले तुरा ताले कुनद।। (शेख सादी साहिब)
     अर्थात् नेक मनुष्यों की संगति तुझे नेक बनायेगी और बुरे मनुष्यों की संगति तुझे बुरा बना देगी। सत्पुरुषों की शुभ संगति के प्रभाव से जब शरीर से शुभ कर्म होने लगेंगे और जिह्वा से शुभ वचन निकलने लगेंगे तो उनके प्रभाव से मन भी मालिक की भजन-भक्ति की ओर झुकेगा। विचारों को दृढ़ करने से जब उसे सच्चा रस आने लगेगा तो चंचल से निश्चल होने लगेगा और मनुष्य का मित्र बनकर भक्ति मार्ग में सहायक सिद्ध होगा।
                उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेतः।
                आत्मैव ह्रात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
                    बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
                    अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।। ( 6/ 5-6)
     योगीराज भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी फरमाते हैं कि ऐ अर्जुन! जब यह मन अपना चंचल पन त्याग करके एकाग्र हो जाये तो यही मन ही मनुष्य का मित्र बन जाता है। इसके विपरीत जब यह स्वेच्छाचारी और चंचल बना रहता है तो यही मन मनुष्य का शत्रु बन जाता है।
     मन उसी का मित्र बन जाता है जिसने गुरु के बताये हुये अभ्यास द्वारा इसे वश में कर लिया। फिर यही मन आत्मिक धन प्राप्त करने में सहायता करता है। इसके विपरीत जब यह वश में नहीं होता तो मनुष्य के साथ शत्रुता करता है। यह इसका स्वभाव है।
     मानव मन स्वयं सब शक्तियों का भंडार है। यदि यह सौभाग्य से समय के सन्त सद्गुरु की संगति का लाभ प्राप्त कर ले, तो उनकी संगति के प्रताप से नेकी की ओर लग कर नेक शक्ति का भंडार बन जाता है। जब मनुष्य को सत्पुरुषों की संगति प्राप्त हो जाती है तो मन को वश करने और उसे नेकी के भंडार की ओर लगाने का भेद और ढंग प्राप्त हो जाता है, फिर जितना-जितना सद्गुरु के बताये हुये अभ्यास द्वारा मनुष्य मन को वश में करता जाता है उतना ही वह पवित्र मन और पवित्र विचारों वाला बनता जाता है। आत्मिक शक्ति मन, जिह्वा और शरीर को निरंकुश छोड़ने में नहीं, अपितु उनको वश करने में है। दूसरे शब्दों में आत्म संयम में ही सब शक्ति है और आत्म-संयमी मनुष्य ही पवित्र मन, पवित्र जिह्वा और पवित्र शरीर वाला कहलाने का अधिकारी है और वही सच्चा सूरमा है।
                तीर तुपक से जो लड़ै, सो तो सूर न होय।
                माया तजि भक्ति करै, सूर कहावै सोय।।
     परमसन्त श्री कबीर साहिब जी का कितना प्रभावकर वचन है कि तीर-कमान और तलवार का धनी वह है जो बाहरी शत्रुओं के साथ शस्त्रों के द्वारा अत्यन्त वीरता से लड़ता है। सांसारिक दृष्टि से चाहे उसकी वीरों में गणना हो, परन्तु भक्ति-मार्ग में उसे सूरमा नहीं कहते। भक्ति-मार्ग में सूरमा की उपाधि उसे दी जाती है जो जागतिक विचारों को त्याग कर भक्ति की कमाई करता है। क्योंकि इस मार्ग में मन और माया से पूरा युद्ध करना पड़ता है। जो जिज्ञासु परमार्थ पथ पर चलता हुआ गुरु की कृपा से मन-माया पर विजय प्राप्त करके भक्ति की कमाई कर रहा है, वही सच्चा सूरमा कहलाता है। वही अपने जीवन को सफल बनाता और जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
     पहले भी वर्णन हुआ है कि मन में असीम शक्ति है। एक बार गुरु की कृपा से मन को वश में कर लिया जाये तो फिर यह मन शेष सब कुछ स्वयं ही वश में कर लेता है। और यदि यह डांवाडोल होकर बुराई की ओर झुक गया तो समझ लो मनुष्य दोनों लोकों से गया।
                गये दोनों जहान के काम से हम, न इधर के रहे न उधर के रहे।।
     मन के मलीन और चंचल होने में दुर्बलता और मृत्यु है। इसके एकाग्र और शान्त होने में शक्ति एवं जीवन है। मन को वश में रखने से मनुष्य भक्ति-परमार्थ की ओर अग्रसर होता है और मन को निरंकुश छोड़ देने से मनुष्य शरीर और इन्द्रियों में फँस कर पशु बन जाता है।
     किसी का अशुभ न सोचने और हानि न पहुँचाने में तुम्हारी अपनी ही भलाई और कुशलता है। प्राकृतिक नियमानुसार भलाई करोगे भलाई मिलेगी, बुराई करोगे बुराई मिलेगी। इसलिये बुराई से बच कर भलाई के मार्ग पर चलना हो तो मन वचन और कर्म को वश में रखना अत्यन्त आवश्यक है। यह मान्य और सत्य बात है कि जो मन को वश में नहीं रख सकता, वह किसी दशा में भला और श्रेष्ठ नहीं हो सकता। यदि तुम्हारे संशय युक्त बात कहने से किसी की हानि होने का भय है तो जिह्वा को रोक रखो, इससे तुम बहुत भारी पाप से बच जाओगे। किसी ने क्या खूब कहा हैः-
                ज़ुबां बेमहल खोलना ऐब है, अज़ीज़ो बहुत बोलना ऐब है।।
                ज़ुबां अपनी हद में है बेशक ज़ुबां, बढ़े एक नुक़्ता तो है यह ज़िआं।।
     प्रियवर! बिना अवसर बोलना बहुत बड़ा अवगुण है। हर समय बोलते रहना भी एक प्रकार का अवगुण है। कम बोलने वाली जिह्वा ही वास्तव में जिह्वा है। एक बिन्दु बढ़ जाने से ज़बां (जिह्वा) शब्द ज़िआं बन जाता है। जिसका अर्थ हानि है। ज़बां और ज़िआं के शब्द लिखने में उर्दू में केवल एक ही बिन्दु का अन्तर है। श्री कबीर साहिब जी भी फरमाते हैंः-

                बानी तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल।
                हिये तराजू तोलि के, तब मुख बाहर खोल।।
     जिह्वा में वक्तृत्व शक्ति अर्थात् बोलने की शक्ति का गुण एक अमुल्य देन है, परन्तु शर्त यह है कि कोई इसे उचित रुप में उपयोग में लाने का ढंग सीख ले। वह ढंग यह है कि पहले मन में भली प्रकार विचार कर ले कि इस बात के कहने से क्या लाभ अथवा हानि है। अथवा इस बात में सत्य कितना है और असत्य कितना है? पहले इन सब बातों का अनुमान लगा ले कि इस वचन के बोलने से दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यदि हर प्रकार से तोलने और विचार करने पर उचित समझे और उचित अवसर देखे तो उस वचन को मुख से बाहर निकाले वरना चुप रहे।
     महापुरुष के वचन हैं कि मनुष्य का शरीर एक दुर्ग की भांति है। इसके भीतर आत्मा का विश्राम-गृह है। यद्यपि इस दुर्ग रुपी महल के और भी कई द्वार हैं, परन्तु मुख एक विशेष द्वार है। जिह्वा इस द्वार का चौकीदार और द्वारपाल है। इसके द्वारा अन्दर के भेद बाहर जाते हैं और बाहरी विचारों का आक्रमण भी इसी जिह्वा के द्वारा ही आत्मा पर हुआ करता है। चूँकि इसको बहुत ज़िम्मेवारी सौंपी गई, इसलिये इसकी चौकीदारी अत्यन्त आवश्यक समझी गई और इसे एक और छोटे से दुर्ग में अर्थात् बत्तीस दांतों की चारदीवारी में बन्द कर दिया गया है, ताकि अत्यन्त आवश्यक समय में ही इसे काम में लाया जा सके, बिना आवश्यकता के हर समय व्यर्थ वार्तालाप यह जिह्वा न करती रहे।
                चूँ मर्द सख़ुन न गुफ़्ता बाशद, ऐब-ो-हुनर निहुफ़्ता बाशद।।
                हर बेशा गुमां मब्बर के ख़ालीस्त, शायद के पलंग खुफ़्ता बाशद।।
                                                         (शेख सादी साहिब जी)
     जब तक मनुष्य मुख से कोई बात नहीं कहता, उसके गुण-अवगुण-दोनों ही गुप्त रहते हैं। उसकी दूसरे मनुष्य पर धाक जमी रहती है कि न जाने इसके मन में कौन सी बात है? प्राकृतिक नियम को देखते हुये मनुष्य वास्तव में यह नहीं कह सकता कि प्रत्येक वन वन्य पशुओं से खाली है। सम्भव है कि कोई शेर-चीता आदि सोया पड़ा हो।
     ऊपर के विषय में जिह्वा को बन्द रखने का वर्णन चल रहा है। यदि इस विशेष द्वार पर ताला लगा रहेगा तो मनुष्य बहुत सी बाहरी आफ़तों से सुरक्षित रहेगा। सत्पुरुष सदैव जिह्वा, कान और नेत्र बन्द रखने का उपदेश फरमाते हैं। ये द्वार विशेष आवश्यकता के समय ही खोले जायें। बिना आवश्यकता के हर समय इनका खुला रहना भय से खाली नहीं। शरीर और मन को वश में करने में इनका विशेष हाथ है। ये द्वार बन्द रहेंगे तो मन और शरीर भी काफी सीमा तक वश में रहेगा। तभी कहा है किः-
                चश्म बन्द व गोश बन्द व लब बबन्द।
                गर न बीनी नूरे-हक बरमन बखन्द।।  (हज़रत मौलाना रुम साहिब)
     ऐ मनुष्य! आँख को बन्द रख (यह सहज समाधि की ओर संकेत है), कानों को बन्द रख ( अनहद शब्द के श्रवण की ओर संकेत है) और मुख को बन्द रख (यह अजपा जाप की ओर संकेत है)।
     सत्पुरुषों के बतलाये हुये अभ्यास के द्वारा मनुष्य यदि अपने आँख, कान और मुख को बन्द रखे तो अपने घट में मालिक के ज्योतिर्मय स्वरुप का दर्शन अवश्य कर सकेगा। हज़रत मौलाना रुम साहिब सूफी फकीर उच्च स्वर में फरमाते हैं कि जो मनुष्य आत्म-संयम की मन्ज़िल को पार कर चुका है,जिसने अपने मन, आँख, कान और जिह्वा को वश में कर लिया है, ऐसा करने पर यदि वह आत्मिक धन से वंचित है और घट में ज्योतिर्मय स्वरुप के दर्शन नहीं कर रहा, तो वह निःस्सन्देह मेरी हँसी उड़ा सकता है।

इसका अर्थ यह है कि वह पूरे विश्वास से फरमाते हैं कि इस अभ्यास के द्वारा मनुष्य सुगमतापूर्वक आत्म-संयमी बन सकता है, अपने शरीर और मन-इन्द्रियों को वश में कर सकता है और चाहे किसी भी धर्म का हो और कोई भी साधन करता हो अपने घट में मालिक के ज्योतिर्मय स्वरुप के दर्शन कर सकता है। ऐसे गुरुमुख जिज्ञासु की प्रशंसा में कहा गया है किः-
                हाथी पर जो सवार है वोह भी ज़ेरे-वार है।
                दिल पर है जो सवार वोह शहसवार है।।
     हाथी पर सवारी करने वाला भी मन के हाथों विवश देखा गया है। किन्तु वास्तव में वही मनुष्य ही सच्चा सूरमा और कुशल सवार है जिसने अपने मन को वश में कर लिया है। इसलिये मन, वचन और कर्म (मन जिह्वा और शरीर) को वश में रखने का पूरा-पूरा यत्न करो। मन से निकला हुआ विचार जल के रुाोत की वह धार है जो कभी बाहर निकल कर वापिस अपने केन्द्र की ओर रुख नहीं करता। जिह्वा से निकली हुई बात वह बाण है जो कभी कमान के चिल्ला की ओर नहीं लौटता। हाथ और शरीर से किये हुये अशुभ कर्म उस बिजली के समान हैं जो आकाश से गिरकर फिर कभी ऊपर नहीं उठती। इसलिये भली प्रकार सोच समझ कर और किसी परिपूर्ण सन्त सद्गुरु की शरण-संगत में जाकर उनके मार्ग दर्शन और सहायता के प्रताप से अपने आपको वश में करने का पूरा यत्न करो। शरीर, मन और जिह्वा आदि पर पूरा संयम रखोगे तो सहरुाों कष्टों से सुरक्षित रहोगे और आत्म ज्योति देख सकोगे। इसी का नाम आत्म-संयम है और यह स्थिति जब भी प्राप्त होगी सन्त सद्गुरु के बतलाये हुये अभ्यास की कमाई करने से ही प्राप्त हो सकेगी। जितनी जितनी अभ्यास में उन्नति होती जायेगी, उतना-उतना अपने आप पर संयम होता जायेगा और भक्ति-परमार्थ का धन प्राप्त होता जायेगा। जिससे यह लोक भी सुखी होगा और परलोक भी सँवर जायेगा।

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