इस संसार में प्रत्येक मनुष्य एक यात्री है और हर पल हर समय जीवन की गाड़ी में यात्रा तय कर रहा है। अब देखना यह है कि मनुष्य जो यात्रा कर रहा है वह दुःखदायी है अथवा सुखदायी? अर्थात् मन कर के मनुष्य दुःखी है अथवा सुखी? इस बात की पहचान किसी ने बाहर से नहीं करनी। प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर झांक कर अपने आप की स्वयं ही निरख-परख कर सकता है कि वह किस स्थिति में है? मन शान्त है अथवा अशान्त? यदि मन सुखी एवं शान्त है तो समझो कि वह व्यक्ति अपनी जीवन-यात्रा प्रकाश में तय कर रहा है और यदि स्थिति इसके विपरीत है तो निश्चय ही वह अन्धेरे में है। मनुष्य यात्री है और जीवन एक यात्रा है। उसे कोई प्रकाश में तय करे अथवा अंधकार में, मार्ग तो नहीं देखता कि यात्री अंधेरे में यात्रा कर रहा है अथवा प्रकाश में। यही सोचना यात्री का काम है। अंधकार और प्रकाश का सम्बन्ध मन के साथ है, शरी़र के साथ नहीं। जिस प्रकाश का ऊपर वर्णन आया है उस प्रकाश से अभिप्राय बाह्र प्रकाश से कदापि नहीं। बाह्र सृष्टि के सूर्य, चन्द्रमा, तारागण आदि मनुष्य की आन्तरिक सृष्टि को प्रकाशित नहीं कर सकते। घट में प्रकाश करने वाली शक्ति कोई और ही है। सन्तों सत्पुरुषों का कथन हैः- जे सउ चंदा उगवहि सूरज चढ़हि हज़ार।
एतै चानण होंदिआँ गुर बिन घोर अंधार।।
महापुरुष फरमाते हैं कि यदि संसार में सैंकड़ों चन्द्रमा और सहरुाों सूर्य एक साथ उदय हो जाये, तो इतने प्रकाश के होते हुये भी सन्त सद्गुरु के ज्ञान के बिना मनुष्य की आन्तरिक सृष्टि में अंधकार व्याप्त रहता है। सत्यता यह है कि परिपूर्ण सन्त सद्गुरु ही संसार में प्रकाश के स्तम्भ होते हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारी जीवन-यात्रा प्रकाश में तय हो तो आवश्यक है कि हम अपने मन, चित्त और बुद्धि का सम्बन्ध समय के सन्त सद्गुरु के चरणों से जोड़ दें।
यदि कोई कहे कि हमें सन्त सद्गुरु तो मिल गये हैं और उनसे हमने चित्त का सम्बन्ध भी जोड़ रखा है, परन्तु फिर भी हमारे मन में न प्रकाश है और न सुख ही, अपितु हम तो अभी तक अंधकार में ही ठोकरें खा रहे हैं और अत्यन्त दुःखी हैं, तो इसका अभिप्राय यह हुआ कि उसे अभी तक गुरु से प्रकाश मिला ही नहीं है। वास्तव में बात यह है कि उसने अभी तक अपने मन का सम्बन्ध सद्गुरु के साथ जोड़ा ही नहीं है अन्यथा ऐसा कब सम्भव है कि प्रकाश के भण्डार से सम्बन्ध जुड़ जाये और फिर प्रकाश की प्राप्ति न हो। उसके घट में अंधेरा रहे, ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। उदाहरणार्थ आप अपने घर में बैठे हुये हैं। एक बटन के दबाते ही सारे घर को प्रकाशमान् कर लेते हैं, यद्यपि प्रकाश का भण्डार अर्थात् पावर हाउस तो आपके घर से कितने ही मीलों की दूरी पर स्थित है। आपको वहां से प्रकाश मिलता रहता है, परन्तु शर्त यह है कि विद्युत के तार के द्वारा वहां तक सम्बन्ध भली प्रकार जुड़ा हुआ हो। यदि कहीं सम्बन्ध में त्रुटि हो गई तो फिर बार-बार बटन के दबाने अथवा नीचे ऊपर करने से प्रकाश कदापि नहीं हो सकेगा। यही अवस्था उसके मन की भी समझनी चाहिये जो कहता है कि मैने गुरु तो धारण कर रखा है, परन्तु मेरे अन्दर अभी तक प्रकाश नहीं हुआ। अर्थात् उसने भी ऊपर-ऊपर से तो सम्बन्ध जोड़ रखा है, परन्तु मन से अभी तक सम्बन्ध नहीं जोड़ा।
गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तिन ताप।
हर्ष सोक व्यापै नहीं, तब गुरु आपै आप।।
सन्त सद्गुरु का मिलाप तभी समझना चाहिये जबकि मन में से मोह, ममता और तीनों तापों (आधि, व्याधि, उपाधि) का अंधकार दूर हो जाये। जब जीव को हर्ष-शोक और सुख दुःख न व्यापे तब जानो कि उसके ह्मदय में गुरु का निवास है। यदि जीव के मन में मोह-माया के विचार विद्यमान हैं तो जीव अंधेरे में है। यहां उन लोगों के विषय में वर्णन हो रहा है जो प्रकाशस्तम्भ के निकट आ चुके हैं अर्थात् जो समय के सन्त सद्गुरु से नाम की दीक्षा प्राप्त कर चुके हैं और जिन्हें अपना परलोक संवारने का विचार है। उन लोगों का यहां वर्णन नहीं कर रहे हैं जिनको अभी तक अपने उद्धार का कोई ध्यान नहीं है और न ही वे सत्संग के वृत्त में आये हैं।
प्रकाश न मिलने का कारण क्या है? जीव के अन्दर अंधकार क्यों छा जाता है? प्रकाश क्योंकर होगा? इन बातों की ओर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं, यद्यपि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है। जिसकी पाचन-शक्ति ठीक न हो उसे खट्टे डकार आते हैं, परन्तु जिसकी पाचन शक्ति ठीक होती है, उसे भोजन भली प्रकार पच जाता है। यह एक बनी बनाई बात है। इसी सिद्धांतानुसार जिस के मन में काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकारादि विकारों की प्रबलता है तो समझना चाहिये कि पारमार्थिक दृष्टि से उसका मन स्वस्थ नहीं है। इसके विपरीत यदि मन में शुभ विचार उठते रहें तो उसका मन पारमार्थिक दृष्टि से स्वस्थ समझना चाहिये। सन्त सत्पुरुषों के दरबार में इसी बात की पहचान कराई जाती है। उनका युद्ध सदैव मन के साथ हुआ करता है। सत्पुरुष शरीर की ओर कम ध्यान देते हैं।उनकी सम्पूर्ण कार्यवाही मन के संवारने और सुधारने के उद्देश्य से ही हुआ करती है। शरीर की रक्षा एवं उसके पालन पोषण की समझ-बूझ तो प्रत्येक जीव को होती है, परन्तु मन के विषय में आम संसार अनभिज्ञ रहता है। सन्त सद्गुरु शरण में आने का ध्येय ही यही होता है कि जीव सत्संग और सेवा की रगड़ से अपने मन को शुद्ध-निर्मल बनाने का यत्न करे। और इस बात को केवल विचारवान सत्संगी गुरुमुख ही जान सकते हैं। आम मनुष्यों की इतनी समझ-बूझ कहां जो इस पारमार्थिक भेद को समझ सकें।
पहले वर्णन कर आये हैं कि परमार्थी जीव को इस बात पर विचार करना है कि उसकी जीवन-यात्रा प्रकाश में तय हो रही है अथवा अंधकार में। समय तो व्यतीत हुआ जा रहा है वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। सोना, चांदी, जवाहर तथा धन-सम्पत्ति आदि इतने मूल्यवान नहीं जितना कि समय; क्योंकि ये सब पदार्थ खो जाने पर भी उद्यम और पुरुषार्थ से पुनः प्राप्त हो सकते हैं, परन्तु बीता हुआ समय किसी भी मूल्य पर सहरुाों प्रयत्न करने पर भी पुनः हस्तगत नहीं होता। उदाहरणार्थ, भारत का विभाजन होने पर लाखों लोग अपनी धन-सम्पत्ति लुटा कर पाकिस्तान से भारत आ गये। यहां आने पर उन्हें प्रत्येक वस्तु पुनः प्राप्त हो गई। कई लोगों की आर्थिक स्थिति तो पहले से भी उत्तम हो गई, परन्तु बीता हुआ समय कभी किसी को पुनः प्राप्त हुआ है? नहीं; समय तो घुन के कीड़े के समान है जो प्रत्येक पल मनुष्य की आयु रुपी लाठी को खाये जा रहा है और पल-पल में आयु की लाठी जिसके आश्रय मनुष्य चल फिर रहा है, खोखली होकर कमज़ोर होती जा रही है।
ग़ाफिल तुझे घड़ियाल यह देता है मुनादी।
गरदूं ने घड़ी उम्र की इक और घटा दी।।
ऐ अचेत एवं असावधान मनुष्य! घड़ी की टिक-टिक और घड़ियाल की टन-टन तुझे ढिंढोरा पीट कर चेतावनी दे रही है कि प्रमाद की निद्रा से जाग क्योंकि विधाता ने तेरी आयु में से एक घड़ी और कम कर दी है।
इस संसार में कितने ही प्रसिद्ध राजा महाराजा हुये हैं। आज यदि कोई उनकी खोज करना चाहे तो उनका पता कब्रा के तख़्तों तक सीमित है। उसके पश्चात् उनके साथ क्या हुआ, वे कहां गये और आज किस अवस्था में हैं, इसके विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं होता। राजा हो अथवा रंक,धनवान हो अथवा दीन, हर एक का पता श्मशान भूमि तक ही चलता है, आगे का पता किसी को नहीं है।
यह संसार एक मार्ग के समान है जिस पर जीवन की गाड़ी फर्राटे भरती चली जा रही है। मनुष्य तन को मार्ग का एक बहुत बड़ा जंकशन समझना चाहिये। जैसे आप रेलगाड़ी में सवार होकर कहीं लम्बी यात्रा पर जा रहे हैं। प्रत्येक स्टेशन पर थोड़ा बहुत खा-पीकर और घूम-फिर कर आगे को चल पड़ते हैं। इसी प्रकार मनुष्य शरीर में आने से पूर्व जीव रुपी यात्री ने कई प्रकार की योनियां देखीं जो जीवन-यात्रा में स्टेशनों की न्यार्इं आर्इं और चली गर्इं। भाव यह कि कई प्रकार की योनियों को भोगने के पश्चात् अब मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है। यह एक बड़ा स्टेशन ही नहीं, अपितु जंकशन भी है। यहां से वैकुण्ठधाम, स्वर्ग और नरक प्रत्येक ओर को लाइनें निकलती हैं। इसलिये यहां पहुँच कर जीव रुपी यात्री को सम्भलने और सावधान रहने की अत्यन्त आवश्यकता है। कहीं ऐसा न हो कि भूल से मन माया का शिकार होकर अपने पारमार्थिक लक्ष्य से भटक जाये। इस बात को वही समझ सकता है जिसका मन शुद्ध निर्मल है। अशुद्ध मन पारमार्थिक विषयों को नहीं समझ सकता।
प्रश्न उठता है कि यह मन कैसे शुद्ध निर्मल होगा? इसका उत्तर सन्तों ने इस प्रकार दिया है कि मनुष्य शुभ संगति ग्रहण करे। सन्तों सत्पुरुषों की संगति करने से उसकी समस्त कार्यवाही सही और शुभ होने लगेगी। इसी कारण ही महापुरुषों ने सत्संग करने पर अत्यधिक बल दिया है क्योंकि सत्संग में ही जीव को वास्तविक प्रकाश की प्राप्ति होती है।
साध संग में चाँदना, सकल अन्धेरा और।
सहजो दुर्लभ पाइये, सतसंगत में ठौर।।
अर्थः-प्रकाश तो केवल सन्तों सत्पुरुषों के सत्संग में ही प्राप्त होता है; इसके अतिरिक्त शेष सब स्थानों पर पारमार्थिक दृष्टि से अंधकार ही अंधकार है। सत्पुरुषों की संगति अत्यन्त सौभाग्य से प्राप्त होती है। यह तो निर्विवाद सत्य है कि सत्संग के वचनों को ह्मदयंगम करने और उन पर आचरण करने से आत्मिक प्रकाश मिलता है जिससे मनुष्य का केवल परलोक ही नहीं संवरता, अपितु इस लोक में भी उसे सच्चा सुख-आनन्द प्राप्त होता है। एक बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिये कि सत्संग में आने का वास्तविक ध्येय यही है कि महापुरुषों के दर्शन करने, उनके वचन श्रवण करने और उन पर आचरण करने से मनुष्य के घट का अंधकार दूर होता है और मनुष्य प्रकाश में जीवन यात्रा तय करता है।
प्रत्येक व्यक्ति इस बात पर विचार कर सकता है कि जिस समय मनुष्य महापुरुषों, सन्तों सद्गुरुओं के दर्शन करता है और एकाग्रता से उनके पावन वचन श्रवण करने में व्यस्त एवं संलग्न होता है तो क्या उस समय भी उसकी सुरति पर पांच चोर अपना प्रभाव डाल सकते हैं? उत्तर मिलेगा-नहीं; क्योंकि उस समय मनुष्य के मन-चित्त में सत्संग के वचनों का प्रकाश है। इसी कारण वह चोरों के आक्रमण से निर्भय रहता है। पांचों चोर और उनके सब साथी अज्ञान और प्रमाद के अंधकार में अपने कुकर्म करते हैं,सत्संग के प्रकाश में उनका दाँव नहीं चलता।
परदा-ए-शब में ही तो शमा ने कुरबानी ली।
रोज़े-रोशन में तो परवाने का था आना मुश्किल।।
अर्थः-रात्रि के अंधकार के आवरण में ही दीपक ने बलि ली, अन्यथा दिन के प्रकाश के शलभ को उससे क्या काम?
अनित्य एवं क्षणभंगुर संसार के मनमोहक एवं चित्ताकर्षक दृश्य दीपक के समान हैं जबकि मनुष्य का मन शलभ के सदृश है। मनुष्य तभी उन चित्ताकर्षक पदार्थों पर अपने प्राण न्योछावर करता है जबकि मन में अज्ञान और प्रमाद का अंधकार छाया हुआ हो। यदि सद्गुरु के पवित्र दर्शन, ध्यान तथा वचनों का प्रकाश अपनी पूर्ण आभा से मनुष्य के मन में चमक रहा हो तो फिर यह मन भूलकर भी जागतिक पदार्थों की ओर नहीं देखता। इसलिये परमार्थी जीव को चाहिये कि महापुरुषों के पवित्र दर्शन एवं ध्यान से अपने घट को प्रकाशित रखे और उनके सत्संग का भी प्रत्येक पल लाभ उठाया करे ताकि मन सदैव गुरु के वचनों की ज्योति से ज्योतिर्मान् रहे।
वंदउँ गुरु पद कंज , कृपासिन्धु नररुप हरि।
महामोह तम पुँज, जासु वचन रवि कर निकर।।
अर्थः- मैं श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की वन्दना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रुप में कुलमालिक का अवतार है और जिनके वचन महामोह रुपी घने अंधकार के नाश करने के लिये सूर्य-किरणों के समूह हैं।
गुरुमुखों के लिये भजनाभ्यास का नियम भी अत्यन्त आवश्यक है। एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि शुभकार्य को कभी कल पर नहीं छोड़ना चाहिये; अशुभ कार्य को चाहे कल पर छोड़ दो। यह भी मन को प्रकाशमान् रखने का एक साधन है। इस प्रकार महापुरुषों द्वारा प्रदत्त ज्ञान-प्रकाश में मनुष्य यदि यात्रा करेगा तो इस लोक में भी सुख से जीवन व्यतीत करेगा और उसका परलोक भी संवर जायेगा तथा मनुष्य जन्म के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति कर मालिक के धाम में भी उज्जवल मुख होगा।
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