Thursday, October 20, 2016

इन्द्रिय-दमन


     ""इन्द्रियों का दमन'' इस गुण को जीवन में अपना लेने से मनुष्य को सच्चा सुख-आनन्द प्राप्त होता है। इस श्री वचन का ह्मदयंगम कर और इस पर आचरण करके मनुष्य शीघ्र ही आत्मिक क्षेत्र में प्रगति कर सकता है और प्रभु के धाम में अपना स्थान सुरक्षित कर सकता है। श्री मद्भगवद्गीता में वर्णन हैः-
                इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
                मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।। 3/42
     अर्थः-""इन्द्रियों को स्थूल शरीर से परे कहते हैं; इन इन्द्रियों से परे मन है, मन से भी परे बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त परे हैं, वह आत्मा है।'' और आत्मा के देश का नित्यानन्द तो मनुष्य तभी प्राप्त कर सकता है जब वह मन और इन्द्रियों के रसों से ऊपर उठ जाये। उदाहरणार्थ, श्री नगर उच्च स्थान पर स्थित है। जो मनुष्य वहां की शीतल वायु का आनन्द लेने का इच्छुक है उसको नीचे के स्थानों
177
(पठानकोट,जम्मूआदि) से गुज़र कर ऊपर चढ़ना आवश्यक है,तभी वह श्री नगर के वातावरण का आनन्द ले सकता है। इसी प्रकार आत्म-रस का आनन्द भी वही मनुष्य ले सकता है जो नीचे के रस अर्थात् पिण्डदेश के शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध आदि को त्याग कर उनसे ऊपर उठ जाये।
     यदि कोई कहे कि बाहर के राग अथवा शब्दों को सुनने से अपने कानों की रोक थाम भी न करुँ और अनहद शब्द में सुरति भी जुड़ जाये, तो यह नितान्त असम्भव है। जो व्यक्ति राग-रंग अथवा खेल-तमाशे में जाता है, तो वहां के वातावरण में जाने पर शब्द, स्पर्श, रुप, रस और गन्ध के विषय एक के पश्चात् एक अपना प्रभाव डाल कर उसकी बुद्धि को अपने अधीन कर लेते हैं। सत्पुरुषों का कथन हैः-
                इन्द्रिन के बस मन रहै, मन के बस रहै बुद्ध।
                कहो ध्यान कैसे लगै, ऐसा जहां विरुद्ध।। (सन्त चरण दास जी)
     अर्थः-इन्द्रियों ने मन को अपने अधीन कर लिया और मन ने बुद्धि को अपने अधीन कर लिया जबकि चाहिये यह था कि बुद्धि मन को अपने अधीन रखती और मन इन्द्रिर्यों को अपने अधीन रखते। सन्त चरणदास जी फरमाते हैं कि जब ऐसी विपरीत स्थिति हो तो फिर सुरति एकाग्र कैसे हो सकती है? भगवान श्रीकृष्ण मन को वश में करने का उपाय बतलाते हुये फरमाते हैंः-
                असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
                अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्रते।। 6/35
     अर्थः-हे महाबाहो! निस्सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! इसे अभ्यास और वैराग्य द्वारा वश में किया जा सकता है।
      मन को रोकने के दो ही साधन हैं-एक अभ्यास, दूसरा वैराग्य। दोनों के द्वारा मनोवृत्ति एकाग्र होती है। इसलिये जिज्ञासु को चाहिये कि विषयों से विरक्त होकर निरन्तर नाम का अभ्यास करता रहे। जब कहीं नदी के जल पर नियंत्रण करना अभीष्ट हो, तो नदी पर बांध बनाकर उसमें से नहरें निकाली जाती हैं जिससे लाखों एकड़ भूमि की सिंचाई होती है और वह उपजाऊ बन जाती है। इसी प्रकार यदि हम अपने ह्मदय की धरती में हरियाली देखना चाहते हैं तो सुरति को विषय-विकारों की ओर से रोककर उसे सद्गुरु के शब्द में जोड़ना होगा। यद्यपि प्रारम्भ में मन अभ्यास की ओर से हट कर विषयों की ओर दौड़ने का यत्न करेगा, परन्तु शनैः शनैः वह अभ्यास में स्थिर होने  लग जायेगा। सत्पुरुषों का कथन हैः-
                मन जो गया तो जानि दे, दृढ़ करि राखु सरीर।
                बिना  चढ़ै  कमान  के ,  कैसे  लागै  तीर ।।
     मन चाहे भजन में लगे अथवा न लगे, परन्तु शरीर को वश में रखकर प्रतिदिन भजनाभ्यास करना आवश्यक है। कमान पर चढ़े बिना जैसे तीर निशाने पर नहीं लगता वैसे ही शरीर और इन्द्रियों की सहायता के बिना मन भी चाहे कितना ही दौड़ता रहे, वह कोई कार्यवाही नहीं कर सकता। इसीलिये मन की एकाग्रता के लिये शरीर और इन्द्रियों का दमन करना आवश्यक है। कोई व्यक्ति यदि गले में भारी पत्थर बांध कर तैरने का प्रयत्न करे तो उसे कोई भी बुद्धिमान नहीं कहेगा; क्योंकि वह नितान्त असम्भव है।                गलि-पाथर कैसे तरै अथाह।।
     इसी प्रकार आज का मनुष्य अपने गले में विषय-विकार के पत्थर बांध कर संसार-सागर से पार होना चाहता है। भला यह कैसे हो सकता है? सत्पुरुषों के वचन हैंः-
                लगा कर इश्क दुनियां से ख़ुदा का जो वस्ल चाहे।
                कोई ज्यों आग से सर्दी का तालिब बे-अकल होगा।।
178
     जगत् से प्रीत लगाकर परमात्म-प्राप्ति का इच्छुक व्यक्ति भी वैसा ही है जैसा कि कोई अल्प-बुद्धि मनुष्य अग्नि के निकट बैठ कर शीतलता की आकांक्षा करे। इसी प्रकार कोई कहे कि सासंारिक भोगों का त्याग भी न करुँ और सच्चे नाम का आनन्द भी प्राप्त कर लूं, तो यह कदापि सम्भव नहीं है।
     कथा है कि दो चींटियाँ जो भिन्न भिन्न स्थान की रहने वाली थीं, उनकी अकस्मात् भेंट हो गई। एक का शरीर बलवान् और दूसरी का दुर्बल था। दुर्बल चींटी ने बलवान् चींटी से पूछा-बहिन! तुम कहां रहती और क्या खाती हो जो इतनी बलवान् हो? उसने उत्तर दिया-मैं मिसरी के भण्डार में रहती हूँ और मिसरी ही खाया करती हूँ। यह सुनकर पहली चींटी के मुख में जल भर आया, बोली बहिन! में तो नमक के भण्डार में रहकर नमक खाते-खाते घुली जा रही हूँ। मुझ पर उपकार कर और अपने साथ मिसरी के भण्डार में ले चल। दूसरी चींटी बोली-अवश्य चलो।
      आदत के अनुसार पहली चींटी ने मुख में नमक भर लिया और दूसरी चींटी के साथ मिसरी के भण्डार में पहुँची। किन्तु जहां भी मुंह लगाती उसे नमक का ही स्वाद मिलता। इस कारण उसे कोई रस न मिला और शिकायत की कि व्यर्थ ही मैं यहां आई, क्योंकि यहां भी वही नमक ही नमक है। मिसरी वाली चींटी ने कहा-बहिन! तनिक अपना मुख तो खोलो, कुछ मुख में रखा हुआ तो नहीं? देखा तो उसके मुख में नमक भरा हुआ था। देखकर बोली-इस नमक को निकाल कर फिर इसका रस चखो। ऐसा करते ही उसे बहुत स्वाद आया और प्रसन्न होकर उसका उपकार मानने लगी।
     भाव यह कि मनुष्य जब तक इन्द्रियों के भोगों के रस को नहीं त्यागता अर्थात् इन्द्रिय-निग्रह नहीं करता, तब तक उसे मालिक के सच्चे नाम के सुमधुर रस का आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता। सत्पुरुषों का कथन हैः- इह रस छाडे उह रसु आवा। उह रसु पीआ इह रसु नहीं भावा।।
     अर्थः-जब मनुष्य ऐन्द्रिक रसों का त्याग कर देता है तब उसे भक्ति का रस प्राप्त होता है। जो एक बार उसका आनन्द ले लेता है, ऐन्द्रिक रस फिर उसकी दृष्टि में नीरस हो जाते हैं।
      श्री सद्गुरुदेव महाराज जी जीव को भिक्षुक से सम्राट बनाना चाहते हैं। उनकी मौज यही है, परन्तु यह जीव तो विषय-विकारों की कौड़ियों में मिथ्या चमक-दमक देखकर और उन्हें सच्चे लाल तथा रतन समझ कर उनमें अटक गया है। उनमें सुरति उलझाने से जीव की भारी हानि है। जीव को हानि की ओर जाता देखकर महापरुषों को दया आती है और वे बार-बार समझाते हैं कि ऐ जीव! विषय विकारों के असत् और अस्थायी रसों में सुरति को मत अटकाओ।
      हमारा भी कत्र्तव्य है कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मौज में चलें। जबकि वे हमें नाम और भक्ति की अमूल्य निधि प्रदान करना चाहते हैं तो हमें भी चाहिये कि तुच्छ पदार्थों का प्रसन्नतापूर्वक त्याग करके सच्चे आत्मिक धन को प्राप्त करें और अपना जीवन सार्थक करें।
     कथा है कि एक राजा अपने राज्यप्रासाद की सातवीं मंज़िल पर जाकर बैठ गया और अपने नौकरों-चाकरों आदि को आज्ञा प्रदान कर दी कि आज के दिन राज्यभवन में से जो व्यक्ति जो कोई वस्तु ले जाना चाहे, ले जा सकता है; कोई रोक-टोक न होगी। आज के दिन जिस वस्तु को कोई हाथ लगायेगा, वह वस्तु उसी की हो जायेगी। सबसे नीचे वाली मंज़िल के सब कमरे पैसों के सिक्कों से भरे हुये थे। कितने ही मनुष्य वहां से पोटलियां बांध-बांध कर प्रसन्नतापूर्वक घर ले गये। दूसरी मंज़िल के सब कमरे पचीस पैसे के सिक्कों से भरे हुये थे, अतएव जो दूसरी मंज़िल पर चढ़े, वे पच्चीस पैसों की गठरियां बांध कर ले गये। जिन्होने तीसरी मंज़िल पर पांव रखा, उन्होने देखा कि कमरों में अठन्नियां भरी हुई हैं; उनसे जितना उठाते बना उठा कर ले गये। चौथी मंज़िल पर जाने वालों को रुपयों के ढेर मिले;उन्होने रुपयों की
179
गठरियां बांधीं और मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न हुये। जो लोग पांचवीं मंज़िल पर चढ़े, उन्हें सोना, चांदी, पौंड और अशरफियां प्राप्त हुर्इं। उनसे ऊपर जाने वालों को हीरे, लाल और जवाहिर प्राप्त हुये; वे अपने भाग्य पर इतराते हुये घरों को लौटे। केवल एक बुद्धिमान् व्यक्ति नीचे की सब मंज़िलों की वस्तुओं की ओर ध्यान न देकर सातवीं मंज़िल पर जा पहुँचा और राजा साहिब को हाथ लगाकर कहा कि मुझे और कुछ नहीं चाहिये, केवल आप ही मेरे हो जाइये।
     राजा साहिब वचनबद्ध थे। उसके त्याग और हार्दिक प्रेम को देखकर उस पर प्रसन्न हो गये और उसी के हो गये। जब राजा साहिब ही उसके हो गये, तो एक प्रकार से राज्य की सम्पूर्ण सम्पत्ति ही उसी की हो गई। इसी प्रकार जो विचारवान गुरुमुख संसार के सब पदार्थों और रसों का त्याग करके और शरीर-इन्द्रियों से ऊपर उठ कर केवल एक मालिक की प्राप्ति की ही अभिलाषा मन में रखते हैं, ऐसे गुरुमुख ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होते हैं और आत्म-आनन्द के सच्चे रस का पान करते हैं।
     ऊपर फरमाये गये वचन "इन्द्रिय-दमन' को भुला कर रावण और दुर्योधन की कितनी बुरी दशा हुई? यदि वे इन्द्रिय दमन करते और अनित्य एवं अस्थायी रसभोगों में न फंसते, तो उनकी यह दशा न होती और रावण की तपस्या का भी शुभ परिणाम होता।किन्तु वे मन इन्द्रियों के रसों में फंस गये और परिणाम स्वरुप हानि उठाई। सत्पुरुष चेतावनी देते हैंः-
                निमख काम सुआद कारणि कोटि दिनस दुखु पावहि।
                घरी मुहत रंग माणहि फिरि बहुरि बहुरि पछुतावहि।। गुरुवाणी, आसा म-5
      फरमाते हैं कि ऐ मनुष्य! तू इन्द्रियों के क्षणभंगुर सुखों में फंसकर करोड़ों दिनों तक दुःख पाता है। एक घड़ी का अस्थायी सुख पाकर बाद में बार-बार पछताता रहता है।
     जैसे औषधि-सेवन के साथ-साथ भोजन में संयम बर्तना भी आवश्यक है, वैसे ही नाम का पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करने के लिये काम, क्रोधादि विषय-विकारों से परहेज़ रखने की भी अत्यन्त आवश्यकता है। जो लोग यह कहते हैं कि हमें नाम की कमाई करते वर्षों हो गये हैं, परन्तु हमें पूरा-पूरा रस नहीं मिलता, उनमें कमी यही रह जाती है कि वे इन्द्रिय-दमन नहीं करते। सन्त दादू दयाल जी के वचन हैंः-
                औषधि खाय न पथ करै, विखम व्याधि क्यों जाय।
                दादू   रोगी   बांवरा  ,   दोष   बैद  को लाय।।
     रोगी न तो नियमानुसार औषधि खाये और न ही परहेज़ रखे तो फिर विषम रोग क्योंकर दूर हो? सन्त दादू दयाल जी फरमाते हैं कि अज्ञानी रोगी अपने दोष को तो देखता नहीं और व्यर्थ ही वैद्य को दोषी ठहराता है। नाम के अभ्यास की युक्ति और परहेज़ का ढंग सन्त सत्पुरुष ही जानते हैं।
                हरि अउखधु सभ घट है भाई। गुर पूरे बिनु विधि न बनाई।।
                गुरि पूरे संजमु करि दीआ। नानक तउ फिरि दूख न थीआ।। गउड़ी म.-5
फरमाते हैं कि हे भाई! हरि-नाम की औषधि तो सबके अन्दर विद्यमान है, परन्तु पूर्ण गुरु के बिना उसके प्रयोग की विधि समझ में नहीं आती। जब पूरे गुरु ने उसके प्रयोग का ढंग बतला दिया, तब फिर किसी प्रकार का दुःख शेष नहीं रहता।
     कहते हैं कि जब नादिरशाह ने एक देश पर चढ़ाई की, तो उस देश के राजा ने उससे सन्धि करके उसकी सेना सहित दावत की और भांति-भांति के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करवाये। नादिरशाह ने उन व्यंजनों को देखकर कहा कि इस प्रकार के चटपटे, नमकीन और मीठे व्यंजनों को खाने से मेरी सेना को इनका रस पड़ जायेगा और वह युद्ध के अयोग्य हो जायेगी। अतएव बहिश्तियों (पानी छिड़कने वालों) को
180

बुलवाकर सब व्यंजनों पर पानी डलवा कर उन्हें नष्ट कर दिया और दाल रोटी बनवा कर अपनी सेना को सादा भोजन करवाया।
    अब विचार करो कि जब संसार में उन्नति करने के लिये संयम की इतनी आवश्यकता है,तो आत्मिक उन्नति करने के लिये इन्द्रियों को वश में रखना कितना अधिक आवश्यक है? इस बात को सन्त सत्पुरुष ही भली प्रकार जानते हैं कि इन्द्रियों को वश में रख कर सादा और सात्त्विक भोजन करने, सादे वस्त्र पहनने और सात्त्विक जीवन व्यतीत करने में अत्यधिक आत्मिक लाभ है और ऐसा जीवन व्यतीत करने से सुख शान्ति प्राप्त होती है। इसके विपरीत तड़क-भड़क के जीवन में दुःख,कष्ट, चिंतायें भरी हुई हैं। संसार के अनित्य एवं क्षणभंगुर सुखभोगों में फंसकर आम संसारी जीव कितना दुःख,कष्ट उठा रहे हैं। वे इस बात को नहीं जानते कि संयम में कितना अधिक आत्मिक सुख भरा हुआ है? सन्त सत्पुरुषों का संसार में अवतरण ही केवल जीवों को सन्मार्ग दिखलाने के लिये होता है। सत्पुरुष जीव को सचेत करते हुये फरमाते हैं कि तुम जिन्हें रसदायक और मधुर फल समझ रहे हो, उनके अन्दर विष भरा हुआ है।
                नारि पुरुष सब ही सुनो, यह सतगुरु की साख।
                विष फल फले अनेक हैं, मत कोई देखो चाख।।
     सत्पुरुष सबको सम्बोधित करते हुये फरमाते हैं कि संसार में अनेक प्रकार के फल विद्यमान हैं जो प्रकट में अत्यन्त मनमोहक और ह्मदयग्राही दृष्टि होते हैं, परन्तु उनके अन्दर विष भरा हुआ है। इसलिये सन्त सद्गुरु का तुम्हें यह उपदेश है कि इन्हें मत चखना। महापुरुषों ने इस प्रकार के संकेत अपनी-अपनी वाणियों में दिये हैं। जो सौभाग्यशाली जीव महापुरुषों के संकेतों को समझ कर मनमति का त्याग करते हैं, वे धोखा खाने से बच जाते हैं। इसके विपरीत जो मनमति पर चलते हैं,वे काल और माया की चक्की में पिसते रहते हैं।
     सन्त सुन्दरदास जी ने एक प्रेमी से फरमाया कि विषय-विकारों से बचकर रहोगे तो तुम्हारी आत्मिक उन्नति होगी अन्यथा सुख का मुख भी न देख सकोगे। किन्तु उस सेवक ने उनके उपदेश पर ध्यान न दिया। तब उन्होंने ये वचन कहेः-
                सुन्दर तेरी मति गई, समझत नहीं लगार।
                कूकर रथ नीचे चलै, हम खैंचत हैं बाहर।।
    ऐ सेवक! तेरी मति कहां गई जो तू हमारा संकेत नहीं समझता। कूकर तो फिर-फिर रथ के नीचे घुसता है, परन्तु हम उसे बाहर खींचते हैं।
     सन्त सत्पुरुष जीवों को सांसारिक पदार्थों के लोभ से रोकने के लिये ही सदुपदेश फरमातें हैं क्योंकि वे जानते हैं कि जीव यदि इनमें फंस गया तो कालचक्र उन्हें पीस कर रख देगा। आम लोग महापुरुषों के उपदेशों पर ध्यान न देकर बार-बार उसी ओर दौड़ते हैं। उस कालचक्र की मार से बचाने के लिये ही सन्त सद्गुरुदेव ने हमें अपने वचन अर्थात् गुरु-शब्द की डोर पकड़ा दी है। हम यदि उसे दृढ़ता से पकड़े रहेंगे, तो बच जायेंगे। विषय-विकारों का आकर्षण भी अत्यन्त प्रबल है। यदि उस ओर खिंच गये तो मुक्ति रुपी धन से हाथ धो बैठेंगे। तब पश्चाताप करने से कुछ प्राप्त न होगा। इसलिये उचित यही है कि हम सद्गुरुदेव जी के श्री वचन को ह्मदयंगम करें और इन्द्रिय-दमन करके काल चक्र में पिसने से बच जायें।

No comments:

Post a Comment