Friday, December 30, 2016

भवसागर से पार कैसे हों?


                तुलसी  ममता  राम सों ,  समता सब संसार।
                राग न रोष न दोष दुःख, दास भये भवपार।।
यह कथन सन्त तुलसीदास जी का है कि ऐ मानव! यदि तुझे इस भवसागर से पार उतरना है तो यह काम कर-तुझे यदि ममता करनी ही है तो केवल उस परमपिता परमात्मा से कर और इस संसार के प्रति तेरी दृष्टि समता भरी हो। प्राणिमात्र को समानता के भाव से देखने का प्रयत्न कर। भवसागर से पार उतरने की यदि तेरे मन में उत्कट उत्कण्ठा हो तो अपने ह्मदय पटल पर से इन नीचे लिखे अवगुणों को दूर कर-वे कौन से दोष हैं? 1.राग,2. रोष, 3.दोष, 4. दुःख। इनको हटाने के साथ साथ तुझे दास्य भाव अपनाना होगा-सेवक बनकर अपने में से अभिमान का नाश करना होगा-तब जाकर तू भवजल निधि से पार हो जाएगा। तुझे उस दशा में फिर चौरासी के चक्र में नहीं आना होगा-जन्म मरण की उपाधियां तुझसे सर्वदा के लिये छूट जाएंगी। ये हैं अमोघ साधन जन्म-मरण की उपाधियों से मुक्त होने के।अब हम श्री तुलसीदास जी के इस दोहे के आन्तरिक भाव को सुस्पष्ट करने का प्रयत्न करते हैंः-
ममता राम सों-सबसे पहला धर्म जो एक मोक्षाभिलाषी का होना चाहिये वह है अपने इष्टदेव के प्रति ममता का रखना। सदा मन में इस विचार का रहना कि यदि कोई "मेरा' है तो वह केवल मेरे इष्टदेव ही हैं और कोई नहीं। मैं "मेरा' शब्द का प्रयोग मात्र उन्हीं के लिये ही कर सकता हूँ। मुझे उनके ही श्री चरणों में अपनी ममता की सारी पोटली उड़ेल देनी है जगत् के लाखों ही भोगैश्वर्य के सामान हैं और वे मुझे मेरे प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त भी होने हैं, मैने उनका चाहे अथवा अनचाहे सेवन भी करना है किन्तु मुझे उनमें ममता नहीं रखनी होगी। मेरी भावना उनके प्रति यह होनी चाहिये कि वे सब पदार्थ मेरे लिये हैं किन्तु मेरे नहीं हैं।यदि वे मेरे होते तो मेरा उनके मिलने पर उनके बिछुड़ने पर पूरा पूरा नियंत्रण होता। मैं जब चाहता वे मुझे मिलते और जब तक मैं उन्हें अपने से विदा होने के लिये न कहता तो वे मुझ से पृथक् न होते।  किन्तु ऐसा नियम प्रकृति का है नहीं।
     "ममता' का सरल अर्थ् है "मन का घना लगाव'- मन का लगाव अस्वाभाविक नहीं है। मन अवश्य ही कहीं लगाव लगा लेता है। अब यह सात्त्विकी बुद्धि पर निर्भर है कि वह मन के लगाव को किस वस्तु के साथ लगाना चाहती है। ममता उसी पदार्थ के साथ होगी जिसके प्रति यह हमारा मन अत्यधिक लालायित होगा। एक सच्चा गुरुमुख जो अपने परब्राहृ रुप श्री सद्गुरुदेव जी को नयनों में बसाये रहता है और उन्हें ह्मदय के सिंहासन पर प्रतिष्ठित किये हुए है उसके लिये जगत् और जगत् के मिथ्या पदार्थ नगण्य से हो जाते हैं। वह उनमें केवल उनके रचियता की झांकी देख पाता है।
श्री परमहँसअवतार श्री तीसरी पादशाही जी महाराज के श्री वचन हैं कि ""ऐ गुरुमुखों! अपने और हमारे बीच में किसी को नहीं आने दो।'' गुरुमुख का लक्षण ही यही है कि जैसे चकोर की आँखों में चाँद, चातक के ध्यान में स्वांति बूंद रमा करती है वैसे ही गुरुमुख के नयनों में सद्गुरुदेव ही समाये होते हैं जैसे किः-             गुरुमुख गुरु चितवत रहे ,  जैसे  मनी भुवंग।
                कह कबीर बिसरै नहीं, यह गुरुमुख को अंग।।
गुरुमुख को अपने मालिक का ध्यान इस तरह रहना चाहिये जैसे मणि वाले सर्प को अपनी मणि का रहता है-वह एक पल भी उस मणि से पृथक् नहीं हो सकता। सत्पुरुषों के वचन तो ये थे कि ऐ जीव! तुझे संसार के पदार्थों का सेवन करने का स्वतन्त्र अधिकार है किन्तु उन्हें पाकर उनमें आसक्त न हो जाना। अपनी ममता उनमें न कर लेना-नहीं तो वे पदार्थ सदा ही तेरे मन को अशान्त-दुःखी और चंचल बनाये रखेंगे। संसार के पदार्थों अथवा बन्धु बान्धवों से ममता नहीं करनी-जगत् को समभाव से यथायोग्य बत्र्ताव करके जीवन बिताना है।
     प्रायः संसार में यह चर्चा रहती है कि हमने गुरु धारण कर लिया है। अब प्रश्न हो सकता है कि गुरु धारण करना क्या होता है? गुरुदेव को धारण करना-बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिये उच्चकोटि की साधना करनी पड़ती है। वह साधना क्या है? साधना नाम इसका है कि जो गुण अपने प्राणप्रिय इष्टदेव जी में हैं उन गुणों को धीरे धीरे उनकी निष्काम सेवा, श्रद्धा पूर्वक आराधना, प्रेम सहित उनके दर्शन, उनका विमल सत्संग श्रवण और उनके कृपापूर्वक प्रदान किये हुए नाम मन्त्र की कमाई करना इन उपायों का अवलम्बन करने से श्री भगवान की पवित्र छवि के आन्तरिक दर्शन अन्तर्जगत् में हो जाते हैं। इस प्रकार परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव जी को जिसने अपना बना लिया उसने मानो विश्व को ही अपना कर लिया। करुणासिन्धु महाप्रभु स्वयमेव जीवों को अपने स्वरुप और स्वभाव का वर्णन गीता जी में यों करते हैंः-
     अब उस ब्राहृस्वरुप अपने परिपूर्ण इष्टदेव के उपासक को अपने जीवन में इन दो गुणों को उतारने का पूर्ण प्रयास करना ही चाहिये। जिस प्रकार भगवान किसी प्रकार के दोष से युक्त नहीं हैं उपासक को भी अपने चरित्र को सब प्रकार के दोषों से खाली करना चाहिये। जैसे उपास्यदेव समदर्शी हैं प्रत्येक के साथ उनका व्यवहार वैसा ही होता है जैसा कि वह साधक है। उनका सदा यह प्रयत्न रहता है कि करोड़ों ही जीवो में से एक भी ऐसा न निकले जो यह कह सके कि मुझ पर तो मेरे भगवान की कृपा दृष्टि है नहीं। पूर्ण सद्गुरुदेव जी सभी की आत्माओं में स्थित हैं, रोम रोम में रमे हुए हैं।
    जिस आराधक के आराध्यदेव समदर्शी हों और सब प्रकार के दोषों से सर्वथा रहित हों तो क्या उनका श्रद्धालु सेवक अपने को उन जैसा बनाने की भरपूर कोशिश न करे? शिष्य अथवा गुरुमुख का सदा यही ध्येय होना चाहिये कि मुझ में ऐसे दिव्य गुण एकत्र होते चले जाये कि जिनके द्वारा मैं अपने इष्टदेव जी की हार्दिक प्रसन्नता का पात्र बनता हुआ उनमें एकाकार हो जाऊं। गुरुमुख को संसार की प्रत्येक वस्तु उस परमईश्वरीय सत्ता से ओत  प्रोत हुई दिखाई देनी चाहिये। वह विश्व के तिनके तक की भी निन्दा न करे। उसके भगवत्प्रेम से पूर्ण ह्मदय में आठोंपहर यही भावना काम करती हो कि जब कि वह मेरा मालिक सर्वत्र विराजमान है इसलिये मुझे हर एक वस्तु के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखे। जैसे किः-
                आत्मौपम्येन सर्वत्र, समं पश्यति योऽर्जुन।
                सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।। 6/32
""ऐ अर्जुन! जो उपासक प्रत्येक प्राणी के सुख व दुःख को अपना सुख वा दुःख जानता है और सभी में एक समान आदर और प्रेम रखता है किसी प्राणी को सताता नहीं वह योगी मेरा परम भक्त हैं।''

ऐसा समदर्शी सच्चा गुरुमुख ही समस्त चराचर विश्व को आत्मा का ही विस्तार समझता है उसके लिये जगत् में द्वैत भाव नहीं रह जाता। वह सम्पूर्ण जीवों से किसी प्रकार की घृणा न करता हुआ सबके लिए अपने ह्मदय में मंगल कामना रखता है।
     ब्राहृनिष्ठ सन्त सत्पुरुष सदा ही निःस्पृह होते हैं। उन्हें संसार से कुछ भी प्रयोजन शेष नहीं रह जाता। वह स्वयं ही ब्राहृस्वरुप,सच्चिदानन्द और सर्वसमर्थ होते हैं। उन्हें प्रत्येक अणु में उस परमात्म सत्ता की ही प्रतीति होती है। वे अपने गुरुमुख सेवकों को भी यह वरदान दिया चाहते हैं कि वे भी ब्राहृ दृष्टि रखने लग जायें जिससे संसार में से भय-कलह-कल्पना-अशान्ति और राग-द्वेष की भावनाओं की इति श्री हो जाये।
      भव से पार होने के लिये तीन कत्र्तव्यों का परिपालन करना अनिवार्य है।
1.तुलसी ममता राम सोंः-अर्थात् परमात्मा अथवा अपने आराध्यदेव भगवान् के प्रति मन में ममता भरी हो अर्थात् साधक अपने प्रेम की तारों को इष्टदेव के चरणों में सुदृढ़ होकर बाँध दे। वह अपने उपास्य देव भगवान् सगुण साकार सन्त सद्गुरुदेव जी में ही उस निराकार-निर्गुण ब्राहृ को प्रत्यक्ष विराजमान होता हुआ देखा करे। अपने ह्मदय की सारी गुत्थियों को उनके सदुपदेश-सेवा और भजनाभ्यास के द्वारा सुलझा कर अपने शरीर-मन-बुद्धि और चित्त को उन्हें समर्पित करदे। जो मन की ममता देह में, इन्द्रियों में, मन-बुद्धि में और सांसारिक बन्धु बान्धवों में अटकी हुई है उसे सब ओर से तोड़ ले और पूर्ण रुप से अपने इष्टदेव जी का ही बन जाय। अपने संकल्प विकल्पों को भी उनके हवाले कर दे फिर भवसागर अपने आप ही ऐसे शुष्क हो जाएगा जिस प्रकार प्रचण्ड-ग्रीष्म काल में छोटी नदियां और सरोवर स्वयं सूख जाते हैं। इसका कारण यह कि सांसारिक पदार्थों और मोह ममता के सम्बन्धों के द्वारा आने वाली कलुषित एवं विषैली भावनाएं उसके मन-बुद्धि और चित्त को चंचल न कर सकेंगी। मन की सारी धारा सन्त सद्गुरुदेव जी की प्रसन्नता को हासिल करने में ही लीन होगी। इसका परिणाम यह होगा कि जीव के मानस सरोवर में भगवान का ध्यान, उनकी रुचिर वचनावलि, उनकी सेवा में दिया हुआ समय, उनके नामाभ्यास की साधना और उनकी ही की हुई आरति-इन सभी शुभ कार्यों की सुगन्धि धीरे धीरे व्याप्त हो जाएगी और साधक अपने इस जीवन में सद्गुरुदेव जी की श्री मौज और आज्ञा के अनुसार किये हुये निष्काम कर्मों का फल अपने भगवान की हार्दिक प्रसन्नता के रुप में स्वयं प्राप्त कर लेगा। इसके अतिरिक्त गुरुमुख साधक का जो समय केवल सांसारिक काम-काज में खर्च होता था और उसमें संसार की कलह-कल्पनाएं मन को और दूषित कर दे सकती थीं। वह अब सागर से पार करने वाले कार्यों में बाधक ना हो पायेंगी। कितना बड़ा लाभ ले लिया एक गुरुमुख जीव ने। ममता को अपने मालिक के लिये सुरक्षित रखना चाहिये। चौबीस घण्टों की दिनचर्या में विशेष करके अपने सन्त सद्गुरु देव जी का ही स्मरण चले। बाहर के कार्यों को भी शरीर-मन और बुद्धि के द्वारा सम्पन्न करना है किन्तु अन्तह्र्मदय में मालिक की मीठी मीठी स्मृति रहना ही चाहिये। ऐसी ममता मनुष्य को आवागमन के चक्र से छुड़ाने वाली है। सन्तों के वचन हैंः-
                 सुमिरण की सुधि यों करै, ज्यों गागर पनिहार।।
                हालै  डोलै  सुरति  में,  कहै  कबीर  विचार।।
पनिहारिनें सिर पर घड़े उठाये बातों का आनन्द लेती हुई घर की ओर बढ़ती चली जाती हैं परन्तु उनके अन्तर्मन में एक यह भावना भी काम कर रही होती है कि हमारे सिर पर रखे हुए घड़ों का सन्तुलन कहीं बिगड़ न जाये नहीं तो सारा हमारा जल ले आने का श्रम निष्फल हो जायेगा। इसी तरह सन्त सद्गुरुदेव जी का अनन्य उपासक एक साधक उनकी आज्ञा के तार में बंधा हुआ व्यावहारिक कार्य प्रसन्न चित्त होकर करता है किन्तु उसके ह्मदय की तलहटी में यह भी गूँज उठा करती है कि मेरा यह कार्य भी परम इष्टदेव जी की प्रसन्नता के लिये ही है । इसे कहते हैं ""तुलसी ममता राम सों''।
     इसके विपरीत मनमुख के मनके टुकड़ों को संसार की मिथ्या माया रुपी चील झपट कर ले जाती है और मनमुख के हाथ में सिवाय कष्ट क्लेश चिन्ता और कल्पनाओं के और कुछ भी नहीं आता जबकि गुरुमुख का किया हुआ सारा श्रम सफल हो जाता है क्योंकि उसके इष्टदेव सन्त सद्गुरु उसकी कमाई को अपने पास सुरक्षित रखते हैं। उस गुरुमुख की जीवन-नैय्या की पतवार विश्वपति के हाथों में है।
2.समता सब संसारः-भव से पार होने के लिये संसार के प्रति एक सच्चे उपासक का दृष्टिकोण समता का होना चाहिये। भक्त साधक ही संसार मे समता की नौका पर सवार होकर भवसागर से अपने प्राणेश सन्त सद्गुरुदेव जी की अकारण कृपा से पार हो जाते हैं। परिपूर्ण सद्गुरुदेव जी के अनन्य भक्त को यह समूचा जगत् बड़ा ही प्रिय लगता है। वह हर किसी से प्यार का ही लेने-देन रखता है। कारण यह क्योंकि उसके अपने मालिक जो ऐसे हैं। उन्हें कभी किसी जीव से घृणा-द्वेष अथवा अप्रीति नहीं होती। श्री भगवान के वचन हैंः- ""समोऽहं सर्वभूतेषु, न में द्वेष्योऽस्ति न प्रियः'' 9/29
ऐ अर्जुन! मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ-मुझे न कोई प्रिय है और न अप्रिय है। इसी प्रकार सच्चा भक्त भी न किसी वस्तु या व्यक्ति से राग रखता है और न द्वेष ही। संसार मे समभाव से विचरण करने वाले पुरुष के अन्दर द्वन्द्व भावनाओं को कोई स्थान नहीं। ऐसा साधक ही आत्मा के साक्षात्कार का उत्तम अधिकारी बन सकता है।
    ""एक दिन अर्जुन ने भगवान से पुनः प्रार्थना की कि मुझे उस गीतामृत के सदुपदेशों का पान करा दो। उस समय आपने ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य और निष्काम कर्मयोग के अति मधुर, शान्तिदायक और रुचिकर वचन सुनाये थे परन्तु उस समय मेरे चित्त के विचलित हो जाने के कारण मुझे भूल से गये हैं।''
     श्री भगवान ने कहाः-""हे अर्जुन! वह समय ही और था-उस समय हमारे चित्त में बड़े गहरे एवं गोपनीय ज्ञान की तरंगें उछल रही थीं। हमने तुम्हें शुक्ल और कृष्णगति के रहस्यों का भी बोध कराया था-अब वह सब कुछ दोहराया न जा सकेगा।'' हां-एक परमसिद्ध ब्रााहृण में जो ब्राहृलोक से इस धराधाम पर उतरे थे और महर्षि काश्यप में जो मोक्षपद के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तर हुये थे उनका सार तुम्हें सुनाता हूँ जिससे तुम्हारे चित्त को परम शान्ति मिलेगी। काश्यप जी ने उस सिद्ध पुरुष से यह प्रश्न किया कि-ब्रााहृण! भवसागर से पार उतरने का क्या उपाय है?
ब्रााहृणः-जो मनुष्य सुख और दुःख दोनों को अनित्य, शरीर को अपवित्र वस्तुओं का समुदाय और मृत्यु को कर्म का फल समझता है तथा सुख के रुप में जो कुछ भी प्रतीत होता है उसे दुःख ही दुःख मानता है वह इस घोर तथा दुस्तर सागर से पार हो जाता है।
काश्यपः-संसार के बन्धन से मुक्त कौन होता है?
सिद्ध ब्रााहृणः-काश्यप! 1. जो मनुष्य (स्थूल, सूक्ष्म, और कारण) शरीरों में से क्रमपूर्वक पूर्व, पूर्व का अभिमान छोड़कर कुछ भी चिन्तन नहीं करता और मौन भाव में रहकर सबके एकमात्र अधिष्ठान परब्राहृ सद्गुरु परमाात्मा में लीन रहता है, वही संसार-बन्धन से मुक्त होता है।
2. जो नियम परायण और पवित्र रहकर सब प्राणियों के प्रति अपने जैसा व्यवहार करता है, जिसके भीतर सम्मान पाने की इच्छा नहीं है तथा जो अभिमान से दूर रहता है वह सर्वथा मुक्त ही है।
3. जो किसी के द्रव्य का लोभ नहीं रखता, किसी का तिरस्कार नहीं करता, जिसके मन पर द्वन्द्वों का प्रभाव नहीं पड़ता और जिस के चित्त की आसक्ति दूर हो गई है वह सर्वथा मुक्त ही है।
4. जो किसी भी कर्म का कत्र्ता नहीं बनता, जिसके मन में कोई कामना नहीं है, जो इस जगत् को अश्वत्थ
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अर्थात अनित्य समझता है तथा जो सदा इसे जन्म-जरा और मृत्यु से युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्य में लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषों पर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने सकल बन्धनों का नाश कर देता है।
5. जिसकी दृष्टि में आत्मा पांचभौतिक गुणों से हीन, निराकार, कारणरहित तथा निर्गुण होते हुए भी (माया के सम्न्बन्ध से) गुणों का भोक्ता मात्र है, वह मुक्त हो जाता है।
ये हैं संक्षिप्त रुप से बताये हुए लक्षण उस मोक्षालिभाषी पुरुष के जो भव से पार हो जाया करता है।
अब हम आते हैं गोसार्इं तुलसीदास जी के दोहे की दूसरी पंक्ति मेंः-
""राग न रोष न दोष दुःख, दास भये भवपार।''
तीसरी उपाय भवजलनिधि से पार उतरने का यह है कि वह साधक इन दोषों से सर्वथा मुक्त होना चाहिये। राग-रोष (खीझना) दोष-दृष्टि और दुःख (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) अर्थात् शरीर के प्रकृती के एवं मन के परिताप-इन सब दोषों से जो रहित हो वह भवनिधी को तर जाने का पात्र है।
     अन्त में एक और गुण की चर्चा भी सन्त तुलसीदास जी कर देते हैं कि मुक्ति के अभिलाषी साधक में दास्यभाव कूट कूटकर भरा होना चाहिये। यदि ह्मदय में दासता,दीनता और गरीबी अथवा खाकसारी नहीं है तो भी उसमें से ऊपर से गिनाये हुए दुर्गुण दूर नहीं हो सकते। और उस साधक से भवनिधि से पार नहीं हुआ जा सकता।
      भगवान् श्री कृष्ण अपने प्रिय सखा अर्जुन को उस सिद्ध ब्रााहृण और काश्यप मुनि का संवाद सुनाते हुए आगे कथन करते हैं कि उस ब्रााहृण ने काश्यप को वे योगसाधन भी बतलाये जिनके अपनाने से जीव भव से सहजरुप में पार हो जाता है। इस सुरत-शब्द-योग के साधन से जीव में राग (लगाव) रोष बात बात में खीझ उठना-दूसरों के दोषों पर निगाह रखना और किसी प्रकार के सुख-दुःख का अनुभव करना-ये सारे दुर्गुण स्वयमेव शान्त हो जायेंगे और जीव सच्चे अर्थों में "दास' बनने के प्रयत्नों में पूर्णतया सफल हो जायेगा।
सिद्ध ब्रााहृण ने कहा कि हे काश्यप! अब मैं उस सर्वोत्तम योग का वर्णन करुंगा जिससे कोई भी पुण्यात्मा सहजभाव से आत्म साक्षात्कार कर लेता है। सबसे पूर्व तो उस आत्मदर्शन के उत्सुक योगशील पुरुष को परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव जी की पुनीत चरण-शरण ग्रहण कर लेनी चाहिये। बिना उनकी प्राप्ति के यह जीव कभी भी अपने मन की अटपटी चालों को समझने में स्वयं सफल न होगा। निराकार मन यद्यपि कोई आकार-प्रकार नहीं रखता परन्तु परिसूक्ष्म आत्मा के दर्शनों की अभिलाषा इसकी कभी पूर्ण न होगी जब तक यह सगुण साकार ब्राहृस्वरुप सन्तसद्गुरुदेव जी के गुप्त मन्त्र नाम से परिचित न हो जायेगा। वह नाम-मन्त्र ही इसके मन के भीतर बैठे हुए छः प्रबल रिपुओं को जिनके नाम ये हैं ""काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार और मात्सर्य अर्थात् ईष्र्या'' साँप सुँघाने में समर्थ है। सन्त सद्गुरु ही परब्राहृ हैं-सन्त रुप में इसी हेतु ही अवतरित होते हैं कि अभ्यास-परायण जीवों के मन को सुनिर्मल कर दें। वो इस देवदुर्लभ मानुष देह में आई हुई आत्मा को फिर से भवसागर की उत्ताल तरंगों में उतराता हुआ नहीं देख सकते। गुरुमुख बनना एक निर्वाण पद के अभिलाषी को अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि कलि-कुटिल मन रुपी महानाग को शब्द रुपी गारूड़ी मन्त्र देकर वशीभूत करना केवल सन्त सत्पुरुष ही जानते हैं। ""शब्द बिना साधू नहीं-द्रव्य बिना नहिं साह।'' धन सम्पत्ति के बिना कब कोई सेठ कहलाया इसी तरह जिस साधु ने शब्द की कमाई नहीं की वह अभी साधना-पथ में है। परमपद का इच्छुक सद्गुरुदेव जी की पावन शरण लेकर उनसे शब्द मन्त्र की दीक्षा ले ले। उसकी प्रचण्ड साधना करे। सन्त सद्गुरुदेव जी की आज्ञा और मौज के
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अनुसार चलने को ही अपना मुख्य धर्म माने, अपने मन का योग उनके ही श्री चरणारविन्दों से कर दे। यह है वास्तविक सहजयोग। इसे ही गीता के चौथे अध्याय में राजयोग कहा गया है-इसके लिये साधक को इतनी विनय अवश्य कर लेनी चाहिये कि ""ऐ मेरे परब्राहृ सन्त सद्गुरुदेव जी! मुझे सर्वदा ही अपने चरण कमलों का दास बनाओ। दास बनने में ही असीम सुख है-परमशान्ति है और है दिव्य आनन्द।''
     सन्त तुलसीदास जी ने भी इस दोहे के अन्तिम चरण में "दास पद का प्रयोग बड़ी कुशलता से किया है-"दास भये भवपार' अर्थात् दास बनने पर ही भवपार हुआ जा सकता है। दास भाव एक ऐसा उज्जवल रत्न है जो एक भक्त की सारी साधना को अलौकिक ज्यति से भर देता है। साधक सब कुछ करता हुआ भी अपने को अकत्र्ता मानता है-कत्र्तृत्व के अभिमान को झटकाते रहना ही गुरु भक्ति की अन्तिम मंज़िल पर पहुँचना है।
     अपने में "दासता' की भावना को उतार लेना बड़ा ही उच्चतम काम है। दासभाव में अभिमान का लेशमात्र भी शेष नहीं रह जाता। अहन्ता का परित्याग न करना है भवसागर में बने रहना है। श्री तीसरी पादशाही जी फरमाया करते थे कि ""गुण देखो तो हम में देखो और दोष देखो तो अपने में''-मनुष्य क्या है दोषों, अवगुणों और त्रुटियों का पुतला। जीव बुद्धि में पूर्णता आ ही नहीं सकती। जीव भाव को समूल काटने के लिये अत्यावश्यक है कि जीव हर समय अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु देव जी के द्वार पर पड़ा रहे और आठों पहर यही विनय करे किः- दीनता ही भक्त का ऋंगार है।
करता केरे बहुत गुण, औगुण कोई नाहिं। जे दिल खोजौं आपणा, तौ सब औगुण मुझ माहिं।।
तुम तो समरथ साँइयां, दृढ़ करि पकरो बाहिं।।  धुर ही लै पहुँचाइयो , जनि छाँड़ो मग माहिं।।
""आप सर्वकला समर्थ परिपूर्ण इष्टदेव हो मेरे-आप सकल गुणों के अक्षय भण्डार हो-आपमें कोई भी अवगुण हो ही नहीं सकता। मेरे देव! सम्पूर्ण दोष तो मेरे ही इस अन्तर्मन में खचाखच भरें हैं-एक भी गुण ढूँढ नहीं मिलता।''
      ""आप परम शक्तिमान हैं मेरे प्राणेश्वर! मेरी भुजा को बड़ा दृढ़ता से थाम लीजिए-और मुझे परमपद तक पहुँचा दें, मार्ग में न छोड़ देना-अपने आप अकेले बिना आपका सहारा लिये भवसागर से निकल जाना मेरी शक्ति से बाहर है।''
     सार यह कि भवसागर से पार होने के लिये इन अंगों का परिपालन करना अत्यावश्यक है-1. अपने परमाराध्यदेव के चरणारविन्दों में गहरी ममता हो। 2. जगत् के जीवों के साथ समता का भाव रखकर सारा कार्य-व्यवहार करे। 3. अन्तःकरण में राग-रोष-दोष और दुःख में से किसी का भी बीज न हो और अन्त में साधक पुरुष में दास भाव का होना अनिवार्य है। हम भी इस कल्याण चाहने वाले पथ पर पग रख कर भवजलनिधि से पार हो जायें।

Wednesday, November 30, 2016

सेवक


भगवान् श्री रामचन्द्र जी महाराज काक भुशुण्डि जी को उपदेश कर रहे हैंः-
                अब सुनु परम विमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।
                निज सिद्धान्त सुनावौं तोही। सुनि मन धरु सब तजि भजु मोही।।
                मम  माया   संभव  संसारा। जीव   चराचर  विविध  प्रकारा ।।
                सब मम प्रिय सब मम उपजाये। सब ते अधिक मनुज मोहिं भाये।।
                तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुति धारी।तिन्ह महँ निगम धर्मअनुसारी।।
                तिन्ह महँ प्रिय विरक्त पुनि ज्ञानी। ज्ञानिहुं ते अधिक प्रिय विज्ञानी।।
                तिन ते पुनि मोहिं प्रिय निज दासा।जेहि गति मोरि न दूसरिआसा।।
                पुनि पुनि सत्य कहौं तोहिं पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
                भक्ति  हीन  विरंचि किन होई। सब  जीवहु  सम प्रिय मोहिं सोई।।
                भक्ति वन्त अति  नीचौ  प्राणी। मोहिं प्राण प्रिय अस मम बानी।।
दोहाः-          शुचि सुशील सेवक सुमति, प्रिय कहु काहि न लाग।
                श्रुति पुराण कह नीति अस, सावधान सुनु काग।।
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हे काकभुशुण्डि जी! अब मेरी पवित्र वाणी को सुनो जो यथार्थ है और जिसे वेद शास्त्रों ने भी गान किया है तुझको अपना सिद्धान्त सुनाता हूँ तुम उसे मन लगाकर और निर्भय होकर सुनो- वह सिद्धान्त क्या है?
सारा संसार अर्थात् अनेक प्रकार के जीव जड़ और चेतन जिन्हें तुम देखते हो सब मेरी माया से ही उत्पन्न हुए हैं। मुझे ये सब प्रिय हैं क्योंकि मुझसे उपजाये गये हैं। परन्तु इन योनियों में मनुष्य मुझे अधिक प्यारे हैं। उन मनुष्यों में ब्रााहृण और ब्रााहृणों में मुझे वेदपाठी ब्रााहृण प्रिय हैं। उनसे भी अधिक वेद की नीति के अनुसार चलने वाले प्यारे हैं। उनसे भी प्रिय वे हैं जो संसार के विषयों को तुच्छ जान कर विरक्त हो गये हैं और सत्य ज्ञान की प्राप्ति में संलग्न हैं। इन ज्ञानियों से भी अधिक प्रिय वे हैं जो ब्राहृ में लीन हो गये हैं किन्तु उन ब्राहृलीन विज्ञानियों से मुझे अपने दास अत्यन्त प्रिय हैं जिन्हें मेरे सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं है। इसलिये मैं सत्यरुप में तुझसे बार बार कहता हूँ कि सेवक के समान मुझे कोई भी प्रिय नहीं है।
     ऐ काकभुशुण्डि जी! भक्ति और प्रेम से हीन यदि ब्राहृा भी क्यों न हो उसे मैं बाकी चराचर योनियों की न्यार्इं जानता हूँ। मेरे ह्मदय में उसका आदर उनके समान ही है परन्तु भक्तिमान प्राणी अतिनीच भी क्यों न हो वह मुझे प्राणों के सदृश प्रिय है। पवित्र विचार एवं सत्स्वभाव वाला सेवक हर एक को प्रिय लगता है। तुम स्पष्ट समझ लो वेद और पुराण भी इसी तथ्य का समर्थन करते हैं।
      भगवान् श्री रामचन्द्र जी महाराज ने संसार में सबसे उच्च पदवी सेवक को दी है। वह सेवक कैसा होना चाहिये और उसमें कौन सा गुण होना चाहिये बतलाते हैं कि वास्तव में सच्चा सेवक वही है जो गुरु की आज्ञा के अनुसार कर्म करता है। जो काम करता है उसमें पहले सोचता है कि इस में मेरे गुरु की प्रसन्नता भी है या नहीं। वह हर समय अपने आप को गुरु की मौज और आज्ञा में बाँधे रखता है। गुरु के बन्धन में बँधा हुआ सेवक अपनी आत्मा को काल और माया के बन्धन से मुक्त कर लेता है। जिसने तन मन पर गुरु का बन्धन नहीं है वे जीव काल और माया के बन्धन में पड़ जाते हैं। जो जीव गुरु के वचन और आज्ञा में नहीं चलते उन पर यमदूतों की आज्ञा चलती है। जो सेवक होकर भी गुरु की आज्ञा और मौज में नहीं चलता उसका भी कल्याण होना सन्दिग्ध है। सेवक धर्म का मार्ग श्री मौज को मानना है। अपने आप को मिटाने का पथ है। गुरु सेवक की रहनी-सहनी के बारे में श्री पंचम पातशाही जी महाराज  उल्लेख करते हैंः- गुरु के गृह सेवक जो रहै। गुरु की आज्ञा मन मह सहै।।
                आपस कौ कर कछु न जनावै। हरि हरि नाम रिदै सद ध्यावै।।
                मन बेचै सतगुरु के पास। तिस सेवक के कारज रास।।
                सेवा करत होय निहकामी। तिस को होत परापत स्वामी।।
                अपनी कृपा जिस आप करेइ। नानक सो सेवक गुरु की मति लेइ।।
जो जीव गुरु के गृह में प्रवेश पा गया है अर्थात् जो गुरु की शरण में आ गया है उसे चाहिये कि वह गुरु की आज्ञा और मौज को अपने दिल में जगह देवे। दूसरा गुरु के आगे अपने को कुछ जतलावे नहीं। ऐसा विचार कभी न उठावे कि गुरु जानते हैं तो मैं भी कुछ जानता हूँ। गुरु के आगे विनम्र और दीन बन जावे। जो अपने आपको गुरु के आगे विनीत होकर उनके चरणों में समर्पित कर देगा गुरु उस सेवक की ज़िम्मेवारी उठा लेंगे और लोक परलोक में उसके सदा सहायक होंगे। यह मार्ग अपने आप को मिटाने का है।              मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मर्तबा चाहे।
                कि दाना खाक में मिल कर, गुले गुलज़ार होता है।।
भक्तों और सन्तों के पुराने इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि किस प्रकार उन सेवकों ने अपने आप को धूलि में मिला दिया। उन्होने गुरु की और अपनी ज़ात को एक कर दिया। बुल्लेशाह ज़ात के सैयद थे।
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सैयद मुसलमानों में ऊँचे समझे जाते हैं। उनके गुरु अरार्इं ज़ात के थे और माली का काम करते थे। जब बुल्लेशाह ने अरार्इं को अपना गुरु बनाया तो उसके सम्बन्धियों ने उसे काफिर कहना शुरु किया कि देखो
यह सैयद होकर अरार्इं का शिष्य बन गया है। परन्तु बुल्लेशाह ने अपनी झोली पसार दी और कहने लगा
कि आप मुझे सहर्ष काफिर कहें मैं इसे प्रसन्नता से स्वीकार करता हूँ। ""बुल्ले हा! लोकी काफिर-काफिर आखदे, तूँ आहो आहो आख'' मैं अरार्इं हूँ मेरी ज़ात वही है जो मेरे गुरु की ज़ात है। वाक हैः-
मन तूं मत माण करहिं जे हौं किछु जाणदा गुरुमुख निमाणा होहु।।
अंतरि अज्ञान हौं बुद्धि है सच सबदि मलु खोहु। होहु निमाणां सद्गुरु अगै मत किछु आप लखावई।
आपणे अहंकार जगत जलिया मत तूँ आपणा आप गवावई।
सतगुरु कै भाणै करहिं कार सतगुरु के भाणै लागि रहु।।
इउ कहै नानक आप छडि सुख पावहिं मन निमाणा होय रहु।।
सेवक सच्चा वह है जो अपने मन को सद्गुरु के पास बेच देता है। जब कोई वस्तु बेच दी जाती है तो बेचने वाले का उस पर कोई स्वत्व नहीं रह जाता। मन को गुरु के हवाले सदा के लिये कर देना ही सच्ची भक्ति है ऐसा सेवक जिसने मनमति को सब प्रकार से त्याग दिया है उसके समस्त कार्य अपने आप सिद्ध हो जाते हैं। जो प्राणी मनमति के अनुसार चलते हैं और आशा करते हैं कि उनके सब कार्य सिद्ध् हों भला यह क्योंकर हो सकता है? सच्चे सेवक के गुरु ज़िम्मेवार हो जाते हैं और सेवक सब विपदाओं से निश्चिन्त हो जाता है। ऐसे सेवकों की रक्षा गुरु सर्वथा करता है। सन्त पलटू साहिब का वचन हैः-
पलटू सोवे मगन में साहिब चौकीदार।।
साहिब चौकीदार मगन होइ सोवन लागे।।    दोनों पाँव पसार देखि कै दुश्मन भागे।।
जाके सिर पर राम ताहि को वार न बांके। गर ग़ाफिल में मैं रहों आपनी आपहु ताकै।।
हमको नाहीं सोच सोच सब उनको भारी।  छिन भर परै न भोर लेत है खबर हमारी।।
लाज तजा जिन राम पर डारि दिया सिर भार। पलटू सोवे मगन में साहिब चौकीदार।।
सेवाधर्म का कितना सुन्दर और सरल मार्ग है। लोक और परलोक दोनों का बोझ मालिक के ऊपर रख दो और स्वयं सुख की नींद करो। पलटू साहिब का कथन है कि भगवान भक्तों के चौकीदार हैं। भला, जिसकी चौकीदारी भगवान स्वयं करें उसे घाटा क्योंकर! संसार अज्ञानी है जो व्यर्थ में अपने ऊपर बोझ उठाये फिरता है। जिन्होने अपना बोझ मालिक के कन्धों पर धर दियाऔर आप उसके हो रहे उनके सदृश दूसरा संसार में कौन हो सकता है। संसार के सभी  सुख उन्हीं के भाग्य में आ जाते हैं। जगत् में जीव प्रायः दुखी क्यों है? कारण यह कि वह आप मालिक बन बैठा है। मालिक बनने में दुःख और सेवक बनने में सुख भरा है। अन्त में फरमाते हैंः-""सेवा करते होय निःकामी। तिस को होत परापत स्वामी। सेवक को सेवा निष्काम भाव से करनी चाहिये। यदि सेवक के मन में कामना का कोई बीज है-स्मरण रखिये वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। सेवक को सेवा केवल गुरु की प्रसन्नता के हेतु करनी चाहिये। यदि तुम संसार में सुखी रहना चाहते होतो एक मात्र उपाय इस का यह है कि तुम सेवक बन जाओ। सेवक का पद चाहे बाह्र रुप में तुच्छ प्रतीत होता है किन्तु वस्तुतः उसकी पदवी बड़ी ऊंची है। सत्य तो यह कि सेवक ही स्वामी है। जो जीव निष्काम भाव से और अहंकार हीन होकर गुरु की सेवा करते हैं वे अपने दोनों लोक सुधार लेते हैं। ऐसे सेवक का दर्ज़ा बड़े-बड़े ऋषि मुनियों से भी बढ़कर है। जैसा कि ऊपर श्री रामचन्द्र जी महाराज ने अपनी वाणी में श्री काकभुशुण्डि जी को कथन किया है।
     तात्पर्य यह कि सच्चा सेवक ज्ञानी-ध्यानी-योगी-तपस्वी-कर्मकाण्डी आदि से कहीं उत्कृष्ट है क्योंकि उसने अपनी अहन्ता को मिटा कर अपने को स्वामी के अर्पित कर दिया है।   
                  

Sunday, November 20, 2016

सेवा की कसौटी


     गुरुभक्ति या सद्गुरु सेवा का मार्ग आध्यात्मिक प्रगति का पथ है। यह जीव को उसके शिखर तक पहुंचाने का एक मात्र उपकरण है। जीव का यथार्थ उद्देश्य विश्वपति सन्त सद्गुरु के स्वरुप में लीन हो जाना है। इस ध्येय की पूर्त्ति के लिये जीव को अपनी पूर्व मलिनता की दशा को छोड़कर नवीन निर्मल दशा में आना होता है। दूसरे शब्दों में जीव की काया पलट होती है। जीव की पूर्वावस्था अज्ञानमयी दशा है। इस रुप में जीव अपने स्वरुप से भूला हुआ है। अब क्योंकि वह अपनी वास्तविक दशा में लौटना चाहता है इसलिये उसे अपनी वर्तमान दुर्दशा से किनारा करना होगा। यही जीव का काया-कल्प है। इसी को ही आत्मिक उन्नति कहते हैं। जीव प्रकृति से ही आत्मिक उत्कर्ष का अभिलाषी है और उसके लिये उचित साधन सन्त सद्गुरु की सेवा-भक्ति और प्रेम है। सन्त सद्गुरु की सेवा ही जीव की मलिनता को साफ करने की एक उत्तम कसौटी है। जैसे कि सन्तों का वचन हैः-
                सतगुरु की सेवा गाखड़ी सिरु दीजे आपु गवाइ।
                सबदि मरहि फिरि ना मरहि, ता सेवा पवै सभ थाइ।।
                पारस परसिऐ पारसु होवै, सचि रहे लिव लाइ।
                जिसु पूरबि होवै लिखिआ, तिसु सतिगुरु मिलै प्रभु आइ।।
                नानक गणतै सेवकु ना मिलै जिसु बखसे सो पवै थाइ।।
                                      गुरुवाणी सोरठ महला-3 पृ. 649
""सन्त सतगुरु की सेवा एक कसौटी है। इस कसौटी पर खरा उतरने के लिये सन्त सद्गुरु की सेवा में अपने आप को मिटा देना चाहिये। जो जीव सद्गुरु के शब्द में मिट जाते हैं वे फिर जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते और उनकी की हुई सेवा सफल हो जाती है। जिस तरह लोहा पारसमणि के साथ छू जाने से सोना बन जाता है। जीव भी इसी तरह सत्य स्वरुप पारस रुप सन्त सद्गुरु से प्रेम के तार जोड़ लेने पर स्वयं भी उनकी भाँति पारस ही हो जाता है। जिन जीवों के विगत जन्मों के शुभ संस्कार अति प्रबल होते हैं उन्हीं को ही सन्त सद्गुरुदेव जी से भेंट होती है। विशेष बात यह है कि सेवक अपने गुणों के बलबूते पर मालिक के रुप में कभी लीन नहीं हो सकता अपितु जिन जीवों पर सन्त सद्गुरु की विशेष दया और
कृपा होती है उन्हीं की कमाई फलवती सिद्ध होती है। वे ही जीव निजधाम में पहुँच सकते हैं।''
     यह है सन्त सद्गुरु की सेवा का चमत्कार। इसे हर एक जीव नहीं समझ सकता। सन्त महापुरुषों ने स्पष्ट रुप में सब कुछ रख दिया है कि सद्गुरु की सेवा की कसौटी पर चढ़े बिना जीव परमपद की प्राप्ति नहीं कर सकता क्योंकि जब तक वह इस कसौटी पर पूरा नहीं उतरता वह दया और कृपा का पात्र नहीं बन सकता। पात्र बने बिना कोई वस्तु किसी को नहीं दी जाती। जीव को सन्त सद्गुरु की दया व कृपा को पाने के लिये अर्हता प्राप्त करनी है। वह दया या कृपा कोई अलग वस्तु नहीं वह यही सन्त सद्गुरु की निष्काम सेवा ही है। जीवों को अपनी सेवा में लगाना ही उनकी सबसे बड़ी कृपा और अनुकम्पा है। जिस सेवक पर यह कृपा उतरती है उसका कल्याण होने में कोई सन्देह नहीं।
     संसार में यह प्रचलन है कि किसी वस्तु को जो विकृत अवस्था में है सुधारना हो तो उसे किसी उपकरण के द्वारा निर्मल किया जाता है। उदाहरणतः किसी धातु को विमल करना हो तो उसे कसौटी पर चढ़ाया जाता है। इसी तरह जीव को भी मोह ममता आदि दोषों से छुड़ाने के लिये सद्गुरु की निष्काम सेवा ही एक मात्र प्रतीकार है। किसी वस्तु को जब पहले से अधिक सुन्दर रुप में देखना है तो वहां किसी न किसी उपकरण की आवश्यकता होगी ही।
                ता हम चू कलम सिर न नही दर तह कारद।
                हरगिज़  बसरे  अंगुश्त  निगारे  न  रसी।।
                ता शाना सिफत सिर न नही, दर तह आरा।
                हरगिज़ बसरे ज़ुलफ, निगारे न रती।। (शेख सादी साहिब)
""जब तक तू कलम की न्यार्इं अपना सिर छुरी के नीचे नहीं रखेगा हरगिज़ अपने प्रियतम की अंगुली तक न पहुँच पायेगा और जब तक कंघी की न्यार्इं अपना सिर आरी के नीचे नहीं देगा और अंग अंग को चिरा नहीं देगा इष्टदेव के केशों तक कदापि नहीं  पहुंच पायेगा।''अतएव यदि आत्मिक उनन्ति की उच्चकोटि पर पहुँचना है तो सन्त सद्गुरु की सेवा रुपी कसौटी को स्वीकार करना ही होगा। सन्तों के वचन हैंः-
                सेवक  सेवा  में  रहै ,  अनत  कहूँ  नहि  जाय।
                दुःख सुख सब सिर पर सहै,कहैं कबीर समझाय।।
                सेवक  फल  मांगे  नहीं ,  सेव करै दिन रात।
                कहैं कबीर ता दास पर , काल करै नहीं घात।।
निष्कर्ण यह कि जो जीव सच्चे मन से परमार्थ और ब्राहृविद्या के अभिलाषी हों और जिन्हें मोह ममता के बन्धनों से विमुक्त होना है उनका धर्म है कि वे प्राणपण से सन्त सद्गुरु की सेवा, उनकी भक्ति और उनके पवित्र प्रेम में अपने मन को लगायें। सद्गुरु की मौज को और उनके सब प्रकार के व्यवहार को ह्मदय से स्वीकार करें और अपना कल्याण कर लेवें।
     श्री दरबार की सेवा करते हुए अपने दिल में किसी प्रकार की इच्छा मत रखो। अपने आप को सयाना मत समझो अपितु सदा अपने आपको अयाना समझो। जब कभी कृपा करके श्री सद्गुरुदेव जी कुछ समझावें या ताड़ना करें तो हमें उनकी बातें प्रिय लगनी चाहियें।
                जे गुरु झिड़के ता मीठा लागै।।
यह तो श्री सद्गुरुदेव जी की अपार कृपा समझो जो वे तुम्हें अपना जानकर तुम्हारे दोष दूर कर देते हैं। दरबार से तुम्हें चाहे अधिक प्राप्त हो या कम जो कुछ भी प्राप्त हो उसी में प्रसन्न रहो। यह प्रण कर लो कि शरीर चाहे छूट जाये परन्तु भक्ति-प्रेम के नाते को मैं नहीं तोड़ूंगा। श्री सद्गुरुदेव जी जैसे भी रखें, उसी अवस्था में प्रसन्न रहकर सदैव उनका गुणगान करता रहूंगा और उनके दासों का दास बनकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करने का ही प्रयत्न करता रहूँगा। तुम सदैव यही प्रार्थना करते रहना कि हे श्री सद्गुरुदेव! मेरी करनी की ओर न देखते हुये अपने श्री चरण कमलों में ठौर दीजिये।
     जिनको भक्ति रुपी अमोलक रत्न की पहचान होगी वही इसकी प्राप्ति के लिये त्यागऔर प्रयत्न करते हैं। श्री दरबार में सबसे छोटा बनकर रहना और सबकी भली-बुरी बातों को सहन करना-इसके लिये महान त्याग की आवश्यकता होती है। ऐसा त्याग कर सकना प्रत्येक मनुष्य का काम नहीं। विचारवानों का कथन है कि मानुष तन पाकर भी जिसने भक्ति न की समझो उसने अपना हीरे जैसा मानुष तन व्यर्थ गंवा दिया क्योंकि आत्मिक शान्ति देने वाला और लोक तथा परलोक में सहायक भक्ति के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। जब भक्ति इतनी मूल्यवान वस्तु है तो वह चाहे किसी मूल्य पर भी मिले, सस्ती समझनी चाहिये। संसार के धक्के खाने से तो गुरु घर के धक्के खाकर भी गुरु घर में पड़े रहने में ही हमारा कल्याण और हमारी बुद्धिमत्ता है।
     हनुमान जी भगवान श्री राम जी के अति प्रिय थे। एक बार उनकी अनुपस्थिति में अऩ्य सेवकों ने राय करके सब सेवायें आपस में बाँट लीं और हनुमान जी के लौटने पर कहने लगे कि खबरदार! आप किसी सेवा को हाथ मत लगाना। यह स्थिति देखकर हनुमान जी ने न तो अपना दिल ही खट्टा किया और न उनसे किसी प्रकार का झगड़ा ही किया। उन्होने तुरन्त अपने लिये एक छोटी सी सेवा ढूँढ ली। आप दिन भर भगवान के श्री चरणों में बैठकर उनका मुख निहारते रहे। जब कभी भगवान उबासी (जम्भाई) लेते तो आप चुटकी बजा देते। भगवान श्री राम चूंकि हनुमान जी से सदैव प्रसन्न रहते थे अतः उन्होने ऊपर से तो सेवकों से कुछ न कहा, परन्तु भीतर ही भीतर ऐसी लीला रचाई कि हनुमान जी की अनुपस्थिति में लगातार ऐसी उबासियां लीं कि मुख बन्द ही न होने पाये। अब तो सब सेवक बहुत घबराये और हनुमान जी के पास दौड़े गये। जिन्होने हनुमान जी की अपेक्षा करनी चाही थी, वही उनके आगे हाथ जोड़कर मिन्नतें करने लगे। हनुमान जी आये तो उबासियां बन्द हुर्इं और भक्त की जय जयकार हुई। हनुमान जी ने भी भगवान श्री राम जी की सेवा करके सच्चे सुख को पाया।
     श्री गुरु अर्जुनदेव जी को जब श्री गुरु रामदास जी ने लाहौर भेज दिया तो पृथी चन्द जो आपके ज्येष्ठ भ्राता थे और आपसे ईष्र्या करते थे को अवसर मिल गया। उसने यह प्रचार करना आरम्भ कर दिया कि मैं ही श्री सद्गुरुदेव जी का कृपा-पात्र हूँ। अर्जुनदेव जी तो उनके दिल से उतरे हुए हैं। ऐसा करके उसने कई लोगों को अपने पक्ष में कर लिया। कुछ लोगों ने जब श्री गुरु अर्जुनदेव जी से सब हाल जाकर बताया कि पृथीचन्द कहता है कि गुरु के दास तो हम हैं, तब आपने उत्तर दिया कि हम तो उसके दासों के भी दास बनकर भक्ति कर लेंगे और उसी में सच्चा सुख समझेंगे। आपने यह शब्द पढ़कर सुनायाः-          जन की कीनी आपि सहाइ, सुखु पाइआ लगि दासह पाइ।
                आपु गइआ ता आपहि भए, कृपा निधान की सरनी पए।।
अन्त में उन्हीं लोगों ने कहा कि वास्तव में जो नीचा होना जानता है अर्थात् जिसमें अहंकार का लेशमात्र नहीं होता, वही एक दिन ऊँचा बनता है। सच्चाई से गुरु-शरण लेने मे ही सच्चा लाभ है।
     जिन दिनों गुरु रामदास जी जो गुरु दरबार की सेवा करते थे उन्हीं दिनों की बात है कि एक बार उनके गांव के कुछ लोग वहां आये और आपके सामने ही आपस में बातें करने लगे कि देखो, अब कैसे साध बन बैठे हैं। कुछ दिन पहले तक जब ये व्यवहार में फँसे थे तो न जाने कितने झूठ बोलते थे। उनकी बातें सुन कर आपने ये शब्द पढ़े।
                हम  अपराध  पाप बहु  कीने करि  दुसटी  चोर चुराइआ।
                अब नानक सरणागति आए, हरि राखहु लाज हरि भाइआ।। गुरुवाणी गौड़ी म.-4
भाइयो! आपकी सब बातें सत्य हैं। यह सब महिमा मेरे श्री गुरु महाराज जी की है जिन्होने दया करके मुझ जैसे अपराधी को भी अपनी चरण-शरण में रखकरअपनी अपार कृपा से सच्चा साध बनाया है। लोहे का कोई मूल्य नहीं होता, परन्तु पारस से छूकर वह मूल्यवान बन जाता है, वह स्वर्ण बन जाता है। फिर उसे कोई लोहा नहीं कहता। हम भी जब से श्री गुरु महाराज जी की शरण में आये हैं, तब से उन्होने अपने नाम को देखकर हमारी लाज रख ली है। यह सुनकर वे लोग बहुत लज्जित हुए और चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। जितने भी महापुरुष कमाई वाले हुए हैं, उन्होने कभी भी अपनी महिमा नहीं की। उन्होने सदैव अपने श्री सद्गुरुदेव जी की महिमा का ही गान किया। श्री गुरु अर्जुनदेव जी के वचन हैंः-
                कहु नानक हम नीच करना, सरणी परे की राखहु सरमा।।
एक और स्थान पर वे फरमाते हैंः-
                मूरख  मुगध  अनाथ  चंचल  बलहीन  नीच अजाणा।
                बिनवन्ति नानक सरणि तेरी रखि लेहु आवण जाणा।।
भक्ति की अमूल्य दात को पाने के लिये उन्होने कितनी नम्रता धारण की। इसी कसौटी से हम अपनी निरख-परख करें कि हमारे भीतर कितनी नम्रता और सहनशीलता है। जितने अधिक ये गुण हमारे भीतर होंगे, उतनी ही अधिक हमें शान्ति प्राप्त होगी। चाहे हम केवल पांच दिनों से सेवा कर रहे हों अथवा पचास बरसों से। संसार की दृष्टि में हम चाहे मामूली सेवक हों या बड़े से बड़े। प्रकृति हर एक को अपनी अपनी भावना का फल देती है। इसलिये श्री गुरु महाराज जी हमें आज्ञा देते हैं कि जिन कर्मों के करने से गुरुमुख की भक्ति बढ़ती हो, दृढ़ विश्वास से वही कर्म करके पूर्बले मलीन संस्कारों के फल को दग्ध करना है। ऐसा करने से निश्चित रुप से तुम भक्ति के अनमोल धन को प्राप्त करोगे।

Tuesday, November 15, 2016

ज्ञान मार्ग-भक्ति मार्ग


     एक दिन ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग पर प्रकाश डालते हुये श्री वचन हुए कि ऐसा कहा जाता है किः- ""ज्ञान का पन्थ कृपाण की धारा'' अर्थात् ज्ञान मार्ग अत्यन्त कठिन है तथा भक्ति मार्ग अथवा प्रेममार्ग अत्यन्त सरल एवं सुगम है। किन्तु सुगम हो अथवा कठिन, मनुष्य ज्ञानमार्ग में स्वयं का जीवन रखकर ज्ञान को तो साध सकता है, परन्तु भक्तिमार्ग चाहे सुगम ही सही, जो व्यक्ति स्वयं को जीवित समझता है, वह इस मार्ग में पग धरने के योग्य ही नहीं। प्रेमाभक्ति का मार्ग उसी के लिये है जो स्वयं को मृतक समझ ले और सिर को हथेली पर रख कर आवे।
भक्ति का रस्ता नहीं तलवार की ये धार है, वही  इस  पर चल  सके जो  सिर से  खेले पार है।
काम कमज़ोरों का इस रस्ता पर चलने का नहीं, कदम जो धर कर दिखावे पहलवां हुशियार है।।
प्रेमाभक्ति का मार्ग तलवार की धार पर चल कर तय करना पड़ता है। जो सिर-धड़ की बाज़ी लगाकर चले,वही इस मार्ग पर पग रख सकता है। जिनके चित्त में संसार के विचार तथा काम, क्रोध, लोभ, मोहादि भरे हुये हैं, वे दुर्बल चित्त हैं; वे इस मार्ग पर कदापि पग नहीं रख सकते। जो शारीरिक एवं ऐन्द्रिक कामनाओं का गला घोंट कर भक्ति मार्ग में पग रखता है, वही वस्तुतः शूरवीर और सचेत है। वह सासंारिकता की दृष्टि से मृत है, परन्तु आध्यात्मिक जगत् में जीवन पाता है। सांसारिकता की दृष्टि से यह निराला मार्ग है।  भगता की चाल निराली।।
                चाला निराली भगताह केरी बिखम मारगि चलणा।
                लबु लोभ अंहकारु तजि त्रिसना बहुतु नाही बोलणा।।
                खंनिअहु तिखी वालहु निकी एतु मारगि जाणा।
                गुर परसादी जिन्हीं आप तजिआ हरि वासना समाणी।।
                कहै नानकु चाल भगता जगहु जुगु निराली।। (गुरुवाणी)
     मालिक के प्रेमियों-भक्तों की चाल निराली हुआ करती है। कौन सा निरालापन हुआ करता है भक्तों की चाल में? यही कि वे अत्यन्त कठिन मार्ग पर चलते हैं। लोभ, अहंकार, तृष्णा आदि को त्याग कर वे सदैव मौन रहते हैं और तलवार की धार से तीव्र और बाल से भी सूक्ष्म भक्ति-मार्ग पर चलते हैं। गुरु-कृपा से जिन्होंने अहंता एवं अहंकार को तिलांजलि देकर सम्पूर्ण कामनाओं को समाप्त कर दिया है, ऐसे भक्तजन ही इस भक्ति मार्ग पर चल सकते हैं। श्री गुरु नानकदेव जी फरमाते हैं कि प्रत्येक युग में भक्तों की चाल आम संसारियों से निराली हुआ करती है।
     श्री महाराज जी ने फरमाया कि भक्ति-मार्ग में अहंकार को तो जड़मूल से काटना पड़ता है। भक्त को अपने प्रीतम की प्रसन्नता ही हर समय अभीष्ट होती है। यदि यह बात हो सके तो फिर उसके लिये भक्ति करना सुगम है। वह पल के पल में अपने प्रीतम की प्रसन्नता को प्राप्त कर लेता है। इस मार्ग में मुख्य साधन ध्यान है अर्थात् सेवक हर समय अपने इष्टदेव परिपूर्ण सन्त सद्गुरु का ध्यान दृढ़ करता रहे। उन की भली-बुरी अथवा सत्य-असत्य बातों की ओर तनिक ध्यान न दे। यह नहीं कि जब तक वे तुम्हारी हां में हां मिलाते रहे तब तक तो तुम प्रसन्न और यदि तनिक सी बात उन्होने तुम्हारी इच्छा के विपरीत कह दी अथवा कोई कार्य रुचि के विपरीत कर दिया तो तुरन्त गिरावट में पड़ गये। जब यह स्थिति है प्रेम कैसा? तुम तो उन्हें अपना मालिक और परमेश्वर समझ कर उनका ध्यान करते हो और उनसे प्रेम करते हो, फिर ऐसी बातों का उनके मार्ग में आना कब उचित है?
     ऊपर वर्णन हुआ है कि भक्ति मार्ग में मृतक होना अथवा सिर हथेली पर रखना होता है। इसका अर्थ यह है कि अपने इष्टदेव के ध्यान में इस प्रकार लीन होना पड़ता है कि अपने शरीर तक की सुधि न रहे; अपने में अहंता आदि की गन्ध भी न रहे।
                तू दरौ-गुम शौ विसाल र्इं अस्तोबस। तू मबाश असला कमाल र्इं अस्तोबस।।
     ऐ जिज्ञासु! तू अपने मालिक के ध्यान में पूर्णतः लीन हो जा, क्योंकि इसी का नाम ही योग है। और तू स्वयं को मिटा दे, भक्ति-मार्ग में बस यही पूर्णता है। भक्ति की महिमा का वर्णन करते हुये भगवान श्री राम लक्ष्मण जी से कथन करते हैंः-
                सो सुतंत्र अवलंब न आना ।  तेहि  आधीन ग्यान बिग्याना।।
                भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलई जो संत होर्इंँ अनुकूला।।
     अर्थः-भक्ति स्वतंत्र है, उसको किसी अन्य साधन के सहारे की अपेक्षा नहीं। ज्ञान-विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम तथा सुख की मूल है, परन्तु तभी प्राप्त होती है जब सन्त महापुरुष जीव पर दयाल हो जायें।
     एक दिन गुरु भक्ति के भेद तथा साधन आदि को समझाने के लिये श्री वचन हुये कि प्रेमाभक्ति में तीन वस्तुओं की आवश्यकता होती है-प्रेमी, प्रेम और प्रीतम अर्थात् इष्टदेव कुल मालिक, मालिक के दर्शन एवं योग के मार्ग में जो आवरण हैं उन्हें दूर करने के लिये साधन बतलाते हुये फरमायाः-     उदाहरण को समझने के लिये सूर्य को मालिक की भांति समझो। कुल मालिक भी सृष्टि की उत्पत्ति और उसका प्रलय ऐसे ही करता है जैसे सूर्य जल को सुखाता भी है और बरसाता भी है। सूर्य मंडल की दृष्टि से सूर्य एकदेशीय भी है और प्रकाश एवं ऊष्णता के विचार से सर्वदेशीय भी। इसी प्रकार मालिक भी एक देशीय एवं सर्वदेशीय है।
     सूर्य को देखने के मार्ग में दो प्रकार का अवरोध अथवा आवरण होता है। एक तो बादल का तथा अन्य अपने दृष्टिदोष का जैसे आँख में मोतियाबिंद,जाला अथवा फूला आदि। बादल का आवरण तो वायु से हटता है अर्थात् यदि वायु वेग से चले तो बादल हट जाये और सूर्य दृष्टिगोचर होने लगे। इसी प्रकार घट में अपने मालिक के दर्शन के मार्ग में जो मल-विक्षेप के आवरण पड़े हैं वह सहज प्राणायाम और अजपाजाप के अभ्यास से हट सकते हैं। किन्तु आँख में जो देखने का दोष है अर्थात् जो मोतियाबिंद आदि का आवरण पड़ा हुआ है, वह योग्य चिकित्सक के उपचार से दूर होता है और सूर्य दिखलाई देने लगता है। इसी प्रकार घट में भी जो अज्ञान-आवरण पड़ा हुआ है, वह परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के ज्ञान की युक्ति से उठता है। अर्थात् जब शिष्य दृढ़ विश्वास से सत्पुरुषों के उपदेश को श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है तो उसके घट में प्रेमाभक्ति की ज्योति जगमाग उठती है। तब आत्मा रुपी सूर्य प्रत्यक्ष दिखाई देने लगता है। किन्तु जैसे बादल और दृष्टिदोष-इन दोनों के विद्यमान होते हुये भी सूर्य की गर्मी एवं ताप से उसका होना सिद्ध होता है अर्थात् उसके अस्तित्व से कोई इनकार नहीं कर सकता,उसी प्रकार मल-विक्षेप आवरण के होते हुये भी जब मनुष्य मृत्यु एवं जीवन की समस्याओं से दो-चार होता है और अनेक कार्यों मे विवशता एवं अधीनता की अनुभूति करता है, तब उसे मालिक के अस्तित्व एवं उसकी विद्यमानता का अनुभव होता है और निस्सन्देह उसके अस्तित्व एवं उसकी शक्ति को मानना पड़ता है। किन्तु इस प्रकार मान लेने पर भी गुरु की सहायता के बिना मनुष्य कुछ लाभ नहीं उठा सकता। जैसे उपवन में पुष्प खिले हुये हैं, परन्तु उनकी सुगन्धि तो भली प्रकार से तभी आयेगी जब कोई व्यक्ति पुष्प को तोड़कर और नासिका से लगाकर उसके सूँघने की युक्ति बता दे; अथवा कहीं एक शीशी में इत्र रखा हुआ है, परन्तु जब
तक कोई व्यक्ति उस इत्र में से रुई के फूहे को भिगो कर शरीर और वस्त्रों में लगाने की युक्ति न समझा दे, तब तक उसकी सुगन्धि से पूर्णरुपेण लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार कुल मालिक की विद्यमानता भी परिपूर्ण सन्त सद्गुरु की सहायता के बिना लाभदायक नहीं हो सकती।
      जैसे बादल के दूर होने के लिये अनुकूल वायु की प्रतीक्षा करनी पड़ती है और आँख के ठीक होने के लिये डाक्टर का उपकार मानना पड़ता है और उसके कहे अनुसार चलना पड़ता है, उसी प्रकार भजन-भक्ति के मार्ग में भी परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के पवित्र अस्तित्व से प्रेम करना पड़ता है, उनका भी उपकार मानना पड़ता है और उनकी पवित्र मौज अनुसार चलना पड़ता है। हठधर्मी से यदि कोई मनुष्य गुरु, महात्मा और मालिक के अस्तित्व को न माने तो दूसरी बात है, किन्तु उसे भी दुःख-कष्ट आदि अनेक कार्यों में जब विवशता एवं असमर्थता की अनुभूति होती है, तब वह अनुभूति उससे भी मालिक, सद्गुरु और महात्माओं के अस्तित्व और उनके आशीर्वाद तथा उनकी सहायता की आवश्यकता को मनवा कर छोड़ती है और उसे भी स्वीकार करना पड़ता है कि वस्तुतः सत्पुरुषों के आशीर्वाद और उनकी सहायता की जीव को प्रत्येक समय और प्रत्येक स्थान पर अर्थात् लोक-परलोक में आवश्यकता होती है।
    एक दिवस श्री परमहँस दयाल जी की सेवा में बाई योगानन्द जी ने करबद्ध विनय की कि श्री महाराज जी! मीरां बाई जी और व्रज की गोपियों में से कौन उत्तम है? मेरे विचार में तो मीरांबाई जी का पद उच्च है क्योंकि उन्होंने तो भगवान् श्री कृष्ण को देखा भी नहीं और अदृश्य प्रेम में ही इस पद को पहुँच गर्इं। और गोपियों को प्रेम हो जाना तो कोई विशेष बात नहीं क्योंकि उन्होने तो भगवान श्री कृष्ण की शोभा एवं लीलाओं को अपने नेत्रों से देखा था। श्री महाराज जी ने फरमायाः-यह बात नहीं है। पद तो गोपियों का ही बड़ा है। गोपियाँ भगवान श्री कृष्ण के साथ आम लोगों के समान मिलजुल कर रहती थीं, उनके प्रत्येक व्यवहार को प्रसन्नतापूर्वक सहन करती थीं और उनकी कठोर से कठोर बात पर भी क्रोधित तथा रुष्ट नहीं होती थीं। भगवान श्री कृष्ण यद्यपि आम मनुष्यों की भांति उनके मध्य रहते-सहते और खाते-पीते थे, परन्तु फिर भी वे उनको महा- योगेश्वर और सोलह कला सम्पूर्ण अवतार समझ कर उनसे प्रेम करती थीं।
     किन्तु मीरांबाई जी के साथ ऐसा कहां हुआ? मूर्तिपूजन को तो इसीलिये प्रारम्भ किया गया क्योंकि लोग चेतन की पूजा करने की सामथ्र्य एवं योग्यता नहीं रखते। मन ने चाहा तो मूर्ति पर दो सेर दूध चढ़ा दिया, नहीं चाहा तो नहीं चढ़ाया; वह न कुछ बोलती है न चालती है। उसका ध्यान सुगम है, परन्तु चेतन की भक्ति तथा उसका ध्यान करना अत्यन्त कठिन है।
                निर्गुन रुप  सुलभ अति ,  सगुन जान  नहिं कोइ।
                सुगम अगम नाना चरित, सुनिमुनि मन भ्रम होइ।।
     अर्थः-निर्गुण रुप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझ में आ जाने वाला) है, परन्तु (गुणातीत दिव्य) सगुणरुप को कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान के अनेक प्रकार के सुगम तथा अगम चरित्रों को सुन कर ऋषियों-मुनियों का मन भी भ्रमित हो जाता है। चेतनरुप की भक्ति को इसलिये कठिन कहा गया है कि वे आम मनुष्यों की भाँति लोगों के मध्य रहते और खाते-पीते हैं, बीमार भी होते हैं और कभी-कभी दुःखी भी दिखलाई देते हैं। उनकी कुल चेष्टा और कार्यवाही आम मनुष्यों की सी होती है। उनको अवसर देखकर कठोर बात भी कहनी पड़ती है। यह सब देखकर उनके कुछ सेवक उनसे रुष्ट भी हो जाते हैं और उनकी प्रत्येक बात को सहन करना असम्भव हो जाता है, इसलिये उन पर निश्चय होना कठिन है। किन्तु गोपियां हर समय भगवान् के ध्यान में इस प्रकार तन्मय रहती थीं जैसे सत्पुरुषों ने वर्णन किया हैः-    सत समरथ तें राखि मन, करिये जगत को काम।
            जगजीवन यह मंत्र है ,  सदा सुक्ख बिसराम ।।
वे संसार के कार्य-व्यवहार करती हुई भी ह्मदय में भगवान् के पवित्र नाम को सदैव जपती रहती थीं। और यही दशा सच्चे जिज्ञासुओं की भी होती है। यद्यपि वे प्रकट में संसार के कार्य-व्यवहार में उलझे रहते हैं, परन्तु उनकी आन्तरिक लगन हर समय मालिक के नाम-सुमिरण में रहती है। उनकी प्रशंसा में वर्णन हैः-
हैं  कान लग े मुर्शिदे-कामिल की  तरफ , नूरे-उरफां  है मोजज़न  दिल  की  तरफ।
हंगामा-ए-हस्ती में है सालिक की नज़र, और अहकामे-तरीक़त के मसाइल की तरफ।।
गो  मजमा-ए-हस्ती  में घिरा  रहता है ,  मगर मुर्शिद  के इशारों पे फ़िदा रहता है।।
दुनियां  के  तरानों  से  जिसे  साज़  नहीं , उस  हर्फ से  कान  आशना रहता है।।
अर्थः-सच्चे भक्त के कान हर समय परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के वचन सुनने की प्रतीक्षा में रहते हैं और उसके ह्मदय में ब्राहृज्ञान का प्रकाश झलकता रहता है। यद्यपि वह बाह्रदृष्टि से संसार के बखेड़ों में फँसा हुआ है, परन्तु साथ-साथ वह भक्ति के नियमों पर भी दृढ़ रहता है। देखने में वह निस्सन्देह सांसारिक कार्य-व्यवहार में गहरा फँसा हुआ है, किन्तु गुरु का तनिक सा संकेत पाते ही उन पर प्राण न्यौछावर करने को तत्पर रहता है। संसार के राग-रंग से उसे कुछ भी लगाव नहीं होता। उसके कानों में तो वही शब्द (जो उसे गुरु ने पढ़ाया है) हर समय गूंजता रहता है। उसे मालिक और मृत्यु सदैव स्मरण रहते हैं, इसलिये वह संसार में रहता हुआ भी अलिप्त एवं न्यारा रहता है। इसलिये हमारे विचार में तो सगुण साकार की पूजा करने वाले भक्त का पद ही उच्च है।

Friday, November 11, 2016

आत्म-समर्पण


      आत्म-समर्पण का शाब्दिक अर्थ है-अपने को अन्य को सौंप देना। सांसारिक दृष्टिकोण से जब दो विरोधी व्यक्तियों अथवा पक्षों में से कोई एक व्यक्ति अथवा पक्ष अन्य व्यक्ति अथवा पक्ष के समक्ष अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है तो यह कहा जाता है कि उसने विजयी पक्ष के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया है। ऐसे आत्म-समर्पण में एक बात ध्यान देने योग्य है कि पराजित पक्ष यद्यपि अपनी हार को दृष्टिगत रखकर और उसे अपरिहार्य समझ कर शरीर से स्वयं को विजयी पक्ष के समक्ष समर्पित कर देता है, परन्तु मन से वह कभी भी आत्म-समर्पण नहीं करता। उसका मन भीतर ही भीतर विद्रोही बना रहता है। शरीर से तो वह विवश होकर आत्म-समर्पण अवश्य करता है, परन्तु मन से वह आत्म-समर्पण कदापि नहीं करता। किन्तु भक्ति-परमार्थ के दृष्टिकोण से यदि हम इस शब्द की विवेचना करें तो हम स्थिति को पूर्णतः भिन्न पायेंगे। भक्ति-मार्ग में आत्म-समर्पण का अर्थ है अपने इष्टदेव के चरण कमलों में स्वयं को पूर्णतया समर्पित कर देना। इसमें साधक अथवा सेवक अपने इष्टदेव सन्त सद्गुरु के चरणों में केवल अपना तन ही समर्पित नहीं करता प्रत्युत् मन और बुद्धि भी अर्पण कर देता है। वह अपनी समस्त कामनाओं और इच्छाओं को, मन के समस्त संकल्प-विकल्पों को इष्टदेव सन्त सद्गुरु की पवित्र श्री आज्ञा मौज में लय कर देता है और यह सब वह किसी विवशता के कारण नहीं करता। प्रत्युत ऐसा करके वह अपने को परम सौभाग्यवन्त समझता है क्योंकि वह जानता है कि इष्टदेव सन्त सद्गुरु के चरण कमलों में आत्म-समर्पण करने में ही उसका हित है, इसी में उसका परम कल्याण है और इसी में उसके जीवन की सार्थकता है। आत्म-समर्पण करने को भक्ति-मार्ग में शरणागत होना भी कहते हैं। सन्त सद्गुरु के चरणों में पूर्ण आत्म-समर्पण में ही अपना परम कल्याण समझ कर साधक अपने इष्टदेव का ह्मदय से अनुगामी बन जाता है। वह उन्हीं की श्री आज्ञा मौज के सांचे में अपने जीवन को ढाल लेता है; मनमति को हस्तक्षेप नहीं करने देता। ऐसे सेवक के लिये ही कहा जाता है कि उसने पूर्ण आत्म-समर्पण किया है और ऐसी अवस्था में ही वह सच्चे अर्थों में शरणागत समझा जाता है।
     संसार में चारों ओर काल और माया की प्रबलता है। काल और माया ने सम्पूर्ण सृष्टि को अपने बलशाली पंजों में दबोच रखा है। इनका काम ही यही है कि जीव को मोह-ममता की ऋंखलाओं में जकड़ कर उसे चौरासी लाख योनियों के गहरे गर्त में ढकेलें ताकि वह अपनेअंशी मालिक से मिलाप न कर सके और सदा-सर्वदा उनकी अधीनता में ही रहे। जीव का मन भी जो जन्मों-जन्मों से काल और माया के पंजे में आया हुआ है, इन्हीं के रंग में रंग गया है। वह भी जीव का शत्रु बन कर जीव को इनके पंजे में फँसाये रखने का यत्न करता है। जैसे समुद्र में लहरें उठती ही रहती हैं, वैसे ही मनुष्य के मन में भी प्रत्येक पल संकल्प उठते ही रहते हैं। संकल्पों से मन कभी खाली नहीं रहता। ये संकल्प जीव के लिये एक प्रकार का जाल है। इन संकल्पों के माध्यम से ही काल और माया जीवात्मा को अपना शिकार बनाते हैं। ये संकल्प ही संस्कार बन कर जीव के लिये बीज का रुप धारण कर लेते हैं जो उसे नीच योनियों में भटकाते हैं। अतएव साधक के लिये परम आवश्यक है कि वह उन संकल्पों-उन कामनाओं के जाल से मुक्त हो जिनके कारण उसे बार-बार आवागमन का चक्र काटना पड़ता है। आम संसार तो काल और माया के धोखे में आकर मन को ही अपना मित्र समझ रहा है और उसके कहने पर चल कर चौरासी का चक्र क्रय कर रहा है, किन्तु साधक, जिसने भक्ति-पथ पर अपना पग बढ़ाया है और जिसे सत्पुरुषों की शुभ संगति के फलस्वरुप इस बात की समझ आ गई है, वह काल और माया के पंजे से मुक्त होने का हर सम्भव प्रयास करता है। प्रश्न यह है कि क्या साधक अपने प्रयास से और अपने बल-बूते पर ऐसे शक्तिशाली शत्रुओं पर जिनके समक्ष देवा-देवता भी पानी मांगते हैं, विजय प्राप्त कर सकता है? जीव ठहरा अपूर्ण; उसकी शक्ति सीमित है; उसका बल परिमित है। उसमें इतनी सामथ्र्य नहीं कि वह काल-माया का सामना कर सके। जीव जल की बूँद के समान शक्तिशाली है, परन्तु वही बूंद जब समुद्र में  मिलकर समुद्र रुप बन जाती है तो बड़ी-बड़ी शिलाओं से टकराने की शक्ति रखती है। इसी प्रकार साधक अथवा सेवक भी जब अपना सर्वस्व, अपना अस्तित्व परिपूर्ण सन्त सद्गुरु जो कि सर्वशक्तिमान हैं, सर्वाधार हैं, अपरिमित बल के रुाोत हैं, में लय कर देता है; अपने को पूर्णतः उन्हीं पर निर्भर और आश्रित कर देता है, तब सन्त सद्गुरु सेवक के ह्मदय में आ विराजते हैं और उसके जीवन की बागडोर संभाल लेते हैं। जिस सेवक के जीवन-रथ की बागडोर परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के हाथों में हो, जिसके सिर पर सर्वशक्तिमान सन्त सद्गुरु का वरद हस्त हो और जिसके संरक्षक वे स्वयं हो, काल और माया उस सेवक की छाया से भी दूर भागते हैं। परिणामस्वरुप ऐसा सेवक सदा-सर्वदा के लिये निर्भय हो जाता है।
     महाभारत युद्ध के पूर्व की बात है। युद्ध के लिये जब कौरव और पाण्डव अपना-अपना पक्ष सुदृढ़ करने में संलग्न थे, तो एक दिन दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही भगवान श्री कृष्ण से सहायता मांगने के लिये गये। दुर्योधन पहले पहुँचा, परन्तु जिस समय वह वहां पहुँचा उस समय भगवान श्री कृष्ण विश्राम में थे। दुर्योधन उनके सिरहाने की ओर बैठ गया और उनके जागने की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ समय पश्चात अर्जुन भी वहाँ पहुँचा और भगवान को विश्राम में देखकर उनके चरणों में बैठ गया। जब भगवान श्री कृष्ण विश्राम से उठे तो उनकी दृष्टि सीधी अर्जुन पर पड़ी। भगवान बोले-अर्जुन! तुम कब आये? अर्जुन के उत्तर देने से पूर्व ही दुर्योधन बोल उठा-अर्जुन से पहले मैं आया हूँ, इसलिये आपको मेरे पक्ष का समर्थन करना चाहिए। आप कृपया युद्ध में मेरा समर्थन करें।
      भगवान् ने फरमाया-दुर्योधन! तुम निस्सन्देह पहले आये होगे, परन्तु मैने चूंकि पहले अर्जुन को देखा है, इसलिये सहायता मांगने का पहला अधिकार उसी का है। चूंकि तुम दोनों ही मेरे द्वार पर आए हो, इसलिए मैं दोनों की सहायता करुँगा। एक ओर मैं रहूँगा, परन्तु इस शर्त के साथ कि मैं युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊँगा और दूसरी ओर मेरी चतुरंगिणी सेना होगी। चयन का पहला अधिकार अर्जुन का है, इसलिए अर्जुन इन दोनों में से जिसको चाहे चुन सकता है।
     यह सुनते ही दुर्योधन उदास हो गया। उसने सोचा कि अर्जुन तो श्री कृष्ण की चतुरंगिणी सेना का ही चयन करेगा और मेरे भाग्य में आएँगे शस्त्र-हीन श्री कृष्ण। वह भला प्रेमी भक्तों के ह्मदय की अवस्था को क्या समझ सकता था! उसे क्या पता था कि प्रेमी की दृष्टि में अपने इष्टदेव की तुलना में चौदह भुवनों का राज्य भी तुच्छ होता है और यह तो थोड़ी सी सेना ही थी।
     अर्जुन ने विनय की-प्रभो! मुझे तो केवल आपकी आवश्यकता है। आप अपनी सेना दुर्योधन को दे दें। यह सुनते ही दुर्योधन की प्रसन्नता का तो ठिकाना न रहा। उसका कार्य स्वयमेव ही सिद्ध हो गया था। उसे तो श्री कृष्ण की सेना की ही आवश्यकता था। वह अर्जुन को मूर्ख समझने लगा जिसने विशाल सेना का त्याग करके श्री कृष्ण का चयन किया था। जब दुर्योधन भगवान् श्री कृष्ण से आज्ञा लेकर चला गया तो एकान्त होते ही भगवान ने अत्यन्त प्रेम से अर्जुन से पूछा- अर्जुन! यह तुमने क्या किया? तुमने सेना छोड़कर मुझको क्यों चुना जबकि मैने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की है? अर्जुन ने विनय की-प्रभो! मुझे आपकी सेना की नहीं आपकी आवश्यकता है। मैं चाहता हूँ कि युद्ध में आप मेरे रथ के सारथि बनें; मेरे रथ की बागडोर आपके हाथों में हो।
     यदि पारमार्थिक दृष्टि से देखा जाये तो अर्जुन ने अपने रथ की बागडोर ही भगवान् के हाथ में नहीं
दी, अपितु अपने जीवन की बागडोर ही उनके हाथों में सौंप दी। उसने अन्य सभी आश्रयों का त्याग कर के केवल भगवान श्री कृष्ण की कृपा की ओर दृष्टिपात किया और इसका परिणाम भी सब को विदित ही है कि युद्ध में विजय अर्जुन की ही हुई।
     संसार में रहते हुये सेवक अथवा साधक को भी काल और माया के साथ जो युद्ध करना है उसके लिये उसे परिपूर्ण सन्त सद्गुरु की सहायता की प्रत्येक पल आवश्यकता है। काल और माया पर विजय प्राप्त करना साधक के अपने वश की बात नहीं। इसके लिये उसे भी अर्जुन की भाँति अपने जीवन की बागडोर सन्त सद्गुरु के सशक्त हाथों में सौंपनी होगी, वे चाहे जैसे जीव के जीवन-रथ को चलावें। भक्ति-परमार्थ के साधनों पर दृढ़ता से चलना, मार्ग की बाधाओं और कठिनाइयों का सामना करना तथा काल-माया की घातों से बचना सन्त सद्गुरु की संनिधि में ही सम्भव है। सन्त सद्गुरु के सारथि हुये बिना जीव के लिये इस युद्ध में विजय प्राप्त करना नितान्त असम्भव है।
     आम जीव जो मन-माया के धोखे में आया हुआ है, उसकी सम्पूर्ण कार्यवाही मनमति के अनुसार होती है। वह अपने बल, बुद्धि और चतुराई पर भरोसा करता है। वास्तव में जीव की अहंता, उसकी बुद्धि और चतुराई आदि ही उसकी अधोगति का कारण हैं। ये ही जीव को मालिक से मिलने नहीं देते। जब जीव मालिक पर निर्भर न करके, उनका आश्रय ग्रहण न करके अपनी बल-बुद्धि पर निर्भर करता है तभी वह निराश्रय हो जाता है और काल-माया उस पर हावी हो जाते हैं तथा उसे अपने बंधन में जकड़ लेते हैं जिसके परिणामस्वरुप उसे जन्मों जन्मों तक नीच योनियों में घूमते हुये नाना प्रकार के दुःख कष्ट झेलने पड़ते हैं। किन्तु यदि जीव अपनी अहंता, बुद्धि तथा चतुराई तथा अपने बल को ताक पर रखकर परिपूर्ण सन्त सद्गुरु को सर्वशक्तिमान्, परमहितैषी और परम सुह्मद समझ कर अपने अन्तःकरण और शरीर को उनके समर्पित कर देता है, अन्य सभी आश्रयों का त्याग करके केवल उनके सौहार्द की ओर दृष्टिपात करता है, तो ऐसे सेवक के सम्पूर्ण अभावों की पूर्ति स्वयमेव हो जाती है और उसके मार्ग के समस्त अवरोध दूर हो जाते हैं। ऐसा सेवक यही समझता है कि मुझ में कुछ भी शक्ति नहीं है, सन्त सद्गुरु ही मेरे ह्मदय-मन्दिर में विराजमान होकर सब प्रकार की शक्ति प्रदान करके मेरे द्वारा अपनी मौज अऩुसार समस्त कर्म करवा रहे हैं। में इन सभी का कर्ता नहीं हूँ, मैं तो केवल निमित्त मात्र हूं, करन-करावनहार तो कुल मालिक सन्त सद्गुरु स्वयं ही हैं। ऐसा सेवक ही सच्चे अर्थों में शरणागत कहलाने का अधिकारी है।
     जीवन-यात्रा में शारीरिक दुःख-सुख तो आते ही रहते हैं सच्चा, शरणागत सेवक शारीरिक दुःखों-कष्टों के आने पर पथ से विचलित नहीं होता, अपितु प्रहलाद की भाँति उन्हें इष्टदेव का प्रसाद समझकर उन्हें सहर्ष स्वीकार करता है। प्रह्लाद को उसके पिता द्वारा कितने कष्ट दिये गये, परन्तु वह अपने पथ से तनिक भी न डगमगाया क्योंकि उसे अपने इष्टदेव की शक्ति और सामथ्र्य पर तथा उनके द्वारा सहायता और रक्षा का पूर्ण विश्वास था। फलस्वरुप उसका बाल भी बांका न हुआ।
     एक बात सेवक के लिये और भी विचारणीय है कि जब सेवक ने अपना सर्वस्व सन्त सद्गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया तो फिर सेवक का तन-मन सब सद्गुरु का हो गया, सेवक का अब उनसे क्या सम्बन्ध? वे सेवक को जिस अवस्था में रखे, उसे तो प्रत्येक अवस्था में मालिक की मौज में प्रसन्न रहना चाहिये। उसके ह्मदय से तो हर समय यही शब्द निकलने चाहियें¬-
                आप की  जिसमें हो  रज़ा  वह हाल अच्छा।
                आपकी जिसमें हो खुशी वह ख़्याल अच्छा।।
     स्वयं के जीवन में यदि कभी शारिरिक दुःख-कष्ट आ भी जायें तो मालिक की रज़ा समझ कर सेवक को घबराना नहीं चाहिये। वस्तुतः इनके द्वारा सेवक के मन की स्थिरता की परीक्षा होती है कि वह भक्ति की किस मंज़िल पर पहुंचा है। दुःखों-कष्टों के आने पर सच्चे सेवक की सुरति मालिक में लीन रहने के कारण उसे ये दुःख-कष्ट भासते नहीं। सेवक जब तक स्वयं को इष्टदेव के पवित्र अस्तित्व में पूर्णतः लय नहीं कर देता, तब तक उसे काल-माया का भय बना ही रहता है। काल-माया तो हर समय सतर्क हैं और इस घात में है कि उन्हें तनिक-सा भी अवसर प्राप्त हो और वे जीव पर आक्रमण करके उसे अपने अधीन कर लें। सेवक ने मन के धोखे में आकर यदि तनिक सा भी श्री आज्ञा-मौज की सीमा-रेखा से बाहर पग रखा कि शत्रुओं ने उसे आश्रयहीन समझ कर आक्रमण किया। इसलिये जीव को चाहिये कि अपने मन, अपनी बुद्धि तथा चतुराई को पूर्णतः परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के चरणों में लय कर दे। अपने आपको उनके स्वरुप में गुम कर दे। ऐसा करने से उसकी भी वही अवस्था होगी जो बूंद की सागर में मिल कर होती है अर्थात् पूर्ण में मिलकर सेवक भी पूर्ण हो जायेगा, परिणामस्वरुप काल और माया की उसके समक्ष दाल नहीं गल पायेगी। इसीलिये सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
                तू  दरो  गुम शौ  विसाल र्इं अस्तो-बस।
                तू मबाश असला कमाल र्इं अस्तो-बस।।
     अर्थः-""ऐ जीव! तू स्वयं को मालिक के स्वरुप में गुम करदे, यही मालिक से मिलन है। तू मध्य में कदापि न रह केवल मालिक ही रह जाये, तभी तू पूर्णता को प्राप्त होगा।"" इसलिये सेवक को उचित है कि सन्त सद्गुरु के चरण कमलों में पूर्ण आत्म-समपर्ण करके केवल उन्हीं की कृपा का सहारा ले। ऐसा करने से उसके मार्ग की समस्त बाधायें दूर हो जायेंगी और वह हर प्रकार से सुखी जीवन व्यतीत करता हुआ परमशान्ति और शाश्वत आनन्द की प्राप्ति कर लेगा।
                सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।
     अर्थः-""जो मछलियां अथाह जल में हैं वे सुखी हैं जैसे श्री हरि की शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती।'' जो मछलियां समुद्र की गहराई में रहती हैं वे सुखी रहती हैं, परन्तु जो अपने को प्रकट करके समुद्र की सतह पर तैरती हैं, वे ही मछुये के जाल में फंसती हैं। इसी प्रकार जो जीव अपने भरोसे पर, अपनी बल-बुद्धि पर इतराते हैं, वे ही काल-माया के जाल में फंसते हैं। किन्तु जो मालिक की चरण-शरण में चले जाते हैं, उन्हें काल-माया का भय नहीं रहता और इनसे निर्भय होकर सुखमय और शान्तिमय जीवन व्यतीत करते हैं। सौभाग्यशाली हैं वे जीव जो इस प्रकार का जीवन व्यतीत कर रहें हैं।

Sunday, November 6, 2016

किसी से ईष्र्या द्वेष न करो।


                कंचन तजना सहज है, सहज त्रिया का नेह।
                मान  बड़ाई  ईष्र्या  दुरलभ  तजनी  येह।।
अर्थः-फरमाते हैं कि सोने, चांदी और स्त्री के प्रेम का त्याग करना सुगम है। इनका त्याग करना इतना कठिन नहीं, जितना कि मान,बड़ाई और ईष्र्या का त्याग करना कठिन है। सोने, चांदी तथा स्त्री का त्यागना अर्थात् धन-सम्पत्ति एवं ऐन्द्रिक सुख भोगों के लोभ का त्यागना सरल नहीं। बहुत कम लोग ही इनका त्याग कर पाते हैं, परन्तु ऐसे त्यागियों की अपेक्षा ऐसे व्यक्ति और भी कम मिलते हैं जिन्होने मान,बड़ाई और ईष्र्या का त्याग किया हो। मान, बड़ाई और ईष्र्या भयानक अवगुण है जो मनुष्य को न केवल बड़ों की कृपा से वंचित रखता है, अपितु असभ्य भी बना देता है। ईष्र्या-द्वेष के रोग में ग्रस्त होकर ही एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करता है, क्योंकि दूसरे देश की प्रगति उससे सहने नहीं होती; परिणामस्वरुप लाखों व्यक्ति युद्ध में मारे जाते हैं। यह तो हुई संसारी लोगों की बात। किन्तु सन्तों सत्पुरुषों के संसर्ग में रहने वाले जिज्ञासुओं में भी किसी किसी के अन्दर यह अवगुण पाया जाता है। ईष्र्या-द्वेष के कारण वे लोग भी सत्पुरुषों की संगति और भक्ति का पूरा-पूरा लाभ उठाने में वंचित रह जाते हैं।
     इतिहास साक्षी है कि श्री गुरु अंगददेव जी महाराज जब श्री गुरुनानकदेव जी के उत्तराधिकारी नियुक्त हुये तो लाखों व्यक्तियों ने उनकी सेवा और सम्मान करके पारमार्थिक लाभ प्राप्त किया, परन्तु कुछ व्यक्ति ऐसे भी थे जो आपसे ईष्र्या-द्वेष रखने के कारण पारमार्थिक लाभ से वंचित रह गये। यह प्राकृतिक नियम है कि जिस मन में ईष्र्या-द्वेष का निवास होगा, वहां श्रद्धा विश्वास नहीं रह सकते और जहां श्रद्धा विश्वास न हो, वहां सुख का निवास नहीं होता।
                अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
                नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।। 4/40
अर्थः-विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है। श्रद्धाहीन की बुद्धि संशयात्मक होने के कारण चंचल हो जाती है। वह न तो इस लोक में शान्ति से रहता है और न परलोक में ही उसे सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है। सत्पुरुषों का फरमान हैः-
                जब धारै कोऊ बैरी मीतु। तब लगु निहचलु नाही चितु।।
गुरु की शरण में जाने का लाभ तो उस गुरुमुख ने ही प्राप्त किया, जिसने गुरु-शब्द की कमाई करके अपने मन को चंचल से निश्चल बना लिया। शास्त्र का वाक हैः-
                चंचलं चित्तं भवेत् जीवः। स्थिरं चित्तं भवेत् शिवः।।
अर्थः-जिसका मन चंचल है, वह साधारण जीव है और जिसका मन स्थिर हो गया है, वह शिव स्वरुप है। ऐसा परिवर्तन लाने के लिये ही मनुष्य सन्त सत्पुरुषों की शरण-संगति में जाता है। सत्पुरुषों की शरण-संगति में रहकर भी जिसके मन में मित्र-शत्रु का विचार विद्यमान रहा, उसने मानो अपना समय व्यर्थ किया। उसने अपने मन पर सत्संग और नाम का रंग चढ़ने ही नहीं दिया, वरना सत्संग और शब्दाभ्यास के प्रताप से उसका मन अवश्यमेव निश्चल हो जाता, उसके अन्दर से मित्र-शत्रु की भावना नष्ट हो जाती और उसे सबमें अपने मालिक का स्वरुप दिखाई देता।
      इतनी महान हानि से बचाने के लिये ही श्री गुरुमहाराज जी ने अपने वचन का प्रकाश देकर हम सब पर अत्यन्त कृपा की है। यदि हमने श्री वचन "किसी से ईष्र्या-द्वेष न करना' का सहारा लेकर अर्थात्
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उस पर आचरण करके मन को निर्मल बना लिया, तो बुरी बलाओं से बच जायेंगे और हमारा गुरु-शरण में आना भी सार्थक हो जायेगा तथा जीवन भी सुखमय बन जायेगा। इसके विपरीत यदि हमने मनमति पर चल कर उस सुखदायी और कल्याणकारी वचन की अवज्ञा की, तो हमारा अमूल्य जीवन और अमूल्य समय जो अत्यन्त सौभाग्य से प्राप्त हुआ है, व्यर्थ हो जायेगा। यदि हमने सद्गुरु-शरण में आकर सत्संग के प्रताप से मायिक विचारों का त्याग किया है, संसार और सांसारिक पदार्थों से कुछ किनारा किया है, परन्तु इस त्याग करने का अहंकार हमारे मन में विद्यमान है, तो फिर हमने सत्संगति से कोई लाभ न उठाया, प्रत्युत उलटा घाटे में चले गये। सत्पुरुषों की वाणी हमें सावधान करती हैः-
                माया तजी तो क्या भया, मान तजा नहिं जाय।
                मान बड़े मुनिवर गले, मान सबन को खाय।।
संसार की अवस्था को ध्यानपूर्वक देखने पर ज्ञात होगा कि उच्च पद पर पहुँचे हुए व्यक्ति भी ईष्र्या-द्वेष के कारण आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। ईष्र्या-द्वेष का रोग बड़े-बड़े शूरवीरों को सद्गुरु के शब्द और नाम से भुलाकर चिंताओं के चक्र में डाल देता है और मालिक की महिमा गायन करने की अपेक्षा दूसरों की निन्दा करने का अवगुण उनके मन में भर देता है। ऐसा मनुष्य सही मार्ग से भटक कर कुमार्ग पर चल पड़ता है। ऐसे व्यक्तियों के विषय में ही सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिसदा कदे न होवी भला।।
ओसदे आखिऐ कोई न लगै नित ओजाड़ी पूकारे खला।।
जिसु अंदरि चुगली चुगलो वजै कीता करतिआ ओसदा सभु गइआ।।(गुरुवाणी,गउड़ी का वार म.-4)
कितनी हानि हो गई उस एक दोष के कारण! उसका जीवन भक्तिधन से हीन हो गया और उसकी परिश्रम से की हुई भक्ति की कमाई सब व्यर्थ चली गई। विचार करो कि यदि हम इस अवगुण(ईष्र्या-द्वेष) को मन से निकाल दें और भजन-भक्ति के काम में संलग्न रहें तो हमारा कितना लाभ है कि भक्ति भी प्राप्त हो जाये और जीवन भी सफल हो जाये। इस महान् लाभ-हानि को दृष्टि में रखकर विचारवान् जिज्ञासु को इस बात पर बार बार विचार करना चाहिये और मन में दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिये कि आज से न तो किसी की निंदा-चुगली करेंगे तथा न ही किसी से ईष्र्या-द्वेष करेंगे और इन बुराइयों की गंदगी अपने अन्दर कदापि एकत्र नहीं होने देंगे।
     इतिहास साक्षी है कि जब भक्त नरसी जी केदार राग में भगवान् की महिमा का गायन करते थे, तो भगवान के गले की माला नरसी जी के गले में आ पड़ती थी। भक्त जी का ऐसा पवित्र प्रेम देखकर सहरुाों व्यक्ति उनके अनुयायी बन गये और उनकी महिमा का बखान करने लगे। भक्त नरसी जी का ऐसा सम्मान देखकर ईष्र्यालु दुष्टों से सहन न हो सका, जैसे फरमान हैः-
निंदक दुसट वडिआई वेखि न सकनि ओन्हा पराइआ भला न सुखाई।।
किआ  होवै  किस  ही की झख  मारी जा  सचे सिउ  बणि  आई ।। (बिलावल की वार म.-4)
उन निंदकों ने राजा के पास जाकर उनकी चुगली की कि यह सब आडम्बर है। राजा ने भक्त नरसी जी को बुलवाया और उनसे भजन गाने की प्रार्थना की। भजन गाने पर भगवान के गले की माला नरसी जी के गले में आ पड़ी। राजा ने जब इस सच्चाई को अपनी आंखों से देख लिया, तो निंदकों को राजा के सम्मुख बहुत लज्जित होना पड़ा। सच्चाई देखकर राजा भी भक्त जी का शिष्य हो गया और इस प्रकार उनकी महिमा पहले से भी अधिक हो गई। इसी पर सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
तिन्ह की बखीली कोई किआ करे जिनका अंगु करे मेरा हरि करतारा।। गुरुवाणी, सूही म.-4
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जिन्हा अंतरि गुरमुखि प्रीति है तिन्ह हरि रखणहारा राम राजे।।
तिन्ह की निंदा कोई किआ करे जिन्ह हरि नामु पिआरा।।
जिन्ह हरि सेती मनु मानिआ सभ दुसट झख मारा।।
जन   नानक  नामु   धिआइआ  हरि   रखणहारा।। (गुरुवाणी, आसा म.-4)
जिनके अन्दर ईष्र्या-द्वेष का निवास हो जाता है, उन लोगों की समझ और सब कार्यवाही उलटी हुआ करती है, इसी कारण उनको अपने कर्मों का फल भी उलटा ही मिलता है। ईष्र्या-द्वेष का अंधकार जब आँखों पर छा जाता है, तो सत्पुरुषों के ज्ञान का प्रकाश और उनके गुणों का चमत्कार जीव को दिखाई नहीं देता। पाण्डवों की सच्चाई तथा भगवान कृष्ण का तेज और उनकी महिमा-क्या दुर्योधन को अच्छे लगते थे? कदापि नहीं।
                मतवादी  जानै  नहीं , ततवादी  की बात।
                सूरज उगा उल्लुओं, गिनी अंधियारी रात।।
दूसरों की उन्नति देखकर ईष्र्या-द्वेष की अग्नि में जलना महान दोष है। जो व्यक्ति इस दोष से बच जाता है, वही परमार्थ में सिद्धि प्राप्त कर सकता है। सत्पुरुष सदैव यही उपदेश करते हैं कि तुम किसी का बुरा न सोचो। जो तुम्हारे लिये बुरा सोचेगा वह अपना ही बुरा करेगा, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। प्रकृति की ओर से प्रत्येक मनुष्य को अपनी करनी का फल अवश्यमेव मिलता है। अतएव हमारा कत्र्तव्य है कि दूसरों को उन्नति करते देख कर प्रसन्न हों और जहां तक हो सके बुरों के साथ भी भलाई करें। यही सच्चे सेवकों के लक्षण होते हैं। यदि हमारे अन्दर सच्चे सेवकों जैसे गुण होंगे तो सन्त सद्गुरु की हम पर सदैव कृपा रहेगी जिससे हमारा जीवन संवर जायेगा।

Tuesday, November 1, 2016

जिह्वा पर नियंत्रण


     सत्पुरुषों का वचन हैः-दीपक झोला पवन का, नर का झोला नार।
                         साध झोला वचन का, बोले नहीं विचार।।
     जलते हुये दीपक को वायु का झोंका बुझा देता है और उसके प्रकाश को अंधकार में बदल देता है। जिस व्यक्ति की चित्तवृत्ति स्त्रियों की ओर लग जाती है, वह नाम-सुमिरण के मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता। इस पर सन्तवाणी में फरमान है-जहां काम तहां नाम नहीं। काम और नाम का आपस में  मेल ही नहीं है।इसी प्रकार उस साधु की भी सम्पूर्ण साधनायें व्यर्थ चली जाती हैं जो कि बिना विचारे अर्थात् बिना तोले बोल देता है। और यह भी निश्चित है कि जो लोग बहुत बोलने के आदी होते हैं उनसे प्रायः भूल-चूक भी हो जाती है। कई बार शीघ्रता में गलत और अनुचित शब्द भी मुख से निकल जाते हैं। जिनको चुप रहने की आदत है, वे प्रायः ऐसी भूल चूक और गलत शब्द कहने से बचे रहते हैं। भाव यह कि बहुत बोलने वाले के लिये गलती से बचना इतना सुगम नहीं जितना कि चुप रहने वाले के लिये सुगम है।
     इसलिये जिसको विचार हो कि मैं जहां तक सम्भव गलती से बचता रहूं और आत्मिक मार्ग में मैं दिन प्रतिदिन अग्रसर होता जाऊं उसे चाहिये कि अपनी चित्तवृत्ति को अन्दर की ओर प्रवृत करे और प्रत्येक बात को तोल कर मुख से निकाले ताकि सुनने वालों का दिल न दुखे। सन्तों के इस उपदेश को सदैव स्मरण रखोः-
                ज़ुबां  बेमहल  खोलना  ऐब है ,  अज़ीज़ो  बहुत  बोलना  ऐब है।।
                ज़ुबां अपनी हद में है बेशक ज़ुबां, बढ़े एक नुक़्ता तो है यह ज़िआं।।
     प्रियवर! बिना अवसर बोलना बहुत बड़ा अवगुण है। हर समय बोलते रहना भी एक प्रकार का अवगुण है। कम बोलने वाली जिह्वा ही वास्तव में जिह्वा है। एक बिन्दु बढ़ जाने से ज़बां (जिह्वा) शब्द ज़िआं बन जाता है। जिसका अर्थ हानि है। ज़बां और ज़िआं के शब्द लिखने में उर्दू में केवल एक ही बिन्दु का अन्तर है। इसलिये मनुष्य को बोलचाल में संयम बर्तना चाहिये।
   कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि जो काम एक शब्द से हो सके उसको व्यर्थ ही लम्बा करके उसकी व्याख्या दस शब्दों में करेंगे। उसके विपरीत बुद्धिमान व्यक्ति दस शब्दों वाली बात का आशय एक ही शब्द में प्रकट कर देता है। मितभाषी एवं गम्भीर व्यक्ति के एक ही शब्द में इतनी शक्ति और प्रभाव होता है जितना अधिक बोलने वाले के दस शब्दों में भी नहीं होता। किन्तु मितभाषी भी तो वही बन सकता है और खामोशी से प्यार भी वही रख सकता है जिसके घट में सद्गुरु के शब्द की लगन होती है। जिसकी सुरति सद्गुरु के शब्द में जुड़ी रहकर आत्म-आनन्द को प्राप्त करती रही है, ऐसा व्यक्ति आवश्यकता के बिना कदापि नहीं बोलता। वह सत्पुरुषों के इस वचन का पाबंद रहता हैः-
                ज्ञान रतन की कोठरी, चुप करि दीजै ताल।
                पारख आगे खोलिये, कुंजी बचन रसाल।।
     परमसन्त श्री कबीर साहिब फरमाते हैं कि ऐ जीव! तेरे अन्दर ज्ञान के रत्नों से भरी हुई कोठरी विद्यमान है। उस पर मौनता का ताला लगा दे। जब कोई पारखू मिले तब मधुर शब्दों की चाबी लगा कर खोलना। जो लोग स्थान-स्थान पर बिना आवश्यकता के अपारखुओं के समक्ष वचनों के हीरे-रतन बिखेरते रहते हैं, वह अपनी अनमोल पूंजी व्यर्थ में नष्ट करते रहते हैं क्योंकि वस्तु की कद्र तो पारखुओं के पास ही हुआ करती है। इसलिये सत्पुरुषों का फरमान उचित है कि अपनी जिह्वा पर मौनता का ताला लगा दो। जब कोई पारखू और श्रद्धावान मिले तब उस ताले में मधुर वचनों की कुँजी डाल कर खोलो।
अर्थात् मौनता को जब भी तोड़ो तो मधुर वचन बोलो। कटु वचन बोलने की अपेक्षा चुप रहना लाख गुणा श्रेष्ठ और लाभदायक है। किसी ने सच कहा है कि ""जब मिलेगा पारखू, लेगा महंगे मोल।''
     अफलातून जैसा चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति मौनव्रत तोड़ने के कारण ही तो मारा गया। यदि वह यमदूतों के चापलूसी भरे शब्द ""कि अफलातून! तूने कमाल कर दिया, परन्तु एक दोष तो रह गया।'' को सुनकरअपनी मौनता भंग न करता और ""कौनसा'' का शब्द जिह्वा से न निकालता तो शायद यमदूतों के पंजे से बच जाता। इस प्रमाण से सिद्ध होता है कि पहले बात को तोलो फिर मुंह से बोलो। बिना विचारे बोलने से चुप रहना लाभदायक है। एक फकीर का कथन हैः-सुख़न गुफ़्ता सीम अस्त नागुफ़्ता ज़र।।
     अभिप्राय यह कि जो बात मुख से निकल गई उसका मूल्य चांदी पड़ा। यदि मुख के अन्दर ही रह जाती तो वह सोना होती। किन्तु इसका अर्थ कोई यह न समझे कि संसार में गूंगा बनकर रहना चाहिये, अपितु सत्पुरुषों का उपदेश यह है कि मनुष्य मध्यम मार्ग अपनाये। उनका कथन हैः-
                अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
                अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
     जैसे वर्षा ऋतु में वर्षा कदापि न हो तो भी फसल न होगी और यदि सीमा से अधिक वर्षा हो जाये तो भी फसल सड़ जायेगी, वैसे ही समयानुसार उचित शब्द न बोलना और बिना आवश्यकता के व्यर्थ ही अधिक बोलते रहना अत्यन्त हानिकारक है। आवश्यकतानुसार थोड़े शब्द बोलने से दूसरे का भला हो जाता है। बिना आवश्यकता के बोलने से झगड़ा-फसाद भी हो सकता है।
                बोलत बोलत बढहि विकारा। बिनु बोले किआ करहि बीचारा।।
अर्थः-परमसन्त श्री कबीर साहिब गुरुवाणी में वर्णन करते हैं कि अधिक बोलने से कई बार विवाद बढ़ जाता है, परन्तु बोले बिना भी तो वास्तविकता का विचार नहीं मिलता। उत्तम यह है कि सत्पुरुषों, विचारवानों की संगति में रहकर बोलने का ढंग सीखना चाहिये। विचार के तराजू में वाणी को तोल कर बोलने वाला लोक-परलोक में सुखी रहता है। सत्पुरुषों के वचन इस प्रकार प्रकाश देते हैंः-
                बानी तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल।
                हीरा तो दामों मिलै, शब्द का तोल न मोल।।
     प्रकृति की ओर से मनुष्य को जो बोलने का अधिकार मिला हुआ है, यह एक दुर्लभ और मूल्यवान् रत्न है, यदि कोई सौभाग्यशाली सत्पुरुषों की संगति में जाकर उसके प्रयोग का ढंग सीख ले अर्थात् बोलने की युक्ति जिसे आ जाये तो वह व्यक्ति बहुत अधिक मालदार हो सकता है, क्योंकि हीरे-जवाहर तो दाम से मिल जाते हैं, परन्तु सत्पुरुषों का शब्द किसी भी मूल्य से नहीं मिल सकता। यह जब भी मिलेगा, उनकी कृपा से मिलेगा। हीरे का मूल्य लगाया जा सकता है, परन्तु शब्द के मूल्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसलिये सत्पुरुष उपदेश करते हैं किः-हिये तराजू तोल के, तब मुख बाहर खोल।। अर्थात् जब भी बोले, पहले मन में अच्छी प्रकार सोच समझ लो कि बोलने में क्या लाभऔर क्या हानि है? इस प्रकार जो लाभ-हानि का अनुमान लगाकर और भलीभांति सोच-विचार कर बोलता है,तो वह सौभाग्यशाली सदैव सम्मान और सुख से जीवन व्यतीत करता है। जो बिना तोल के जैसा आया बोल दिया, उनका जीवन सदैव फ़साद और अशान्ति का शिकार बना रहता है।
     एक भिखारी था जो भीख मांग कर गुज़ारा करता था चूँकि वह गुरु-शब्द से खाली था, अतएव उसका मन सदा चंचल बना रहता था। इस कारण जिह्वा पर भी उसे नियंत्रण नहीं था। एक दिन भीख मांगने गया तो उसे भीख में चावल और मूँग की दाल मिली। ले गया एक बुढ़िया के पास। उसे कहा कि मुझे इस चावल दाल की खिचड़ी पका दो। बुढ़िया ने आग जलाई और चावल-दाल को देगची मे डाल कर चूल्हे पर पकने को धर दिये। जितनी देर तक खिचड़ी बने, उतनी देर तक भी उस भिखारी से चुप न बैठा गया। मन और जिह्वा पर नियंत्रण तो था नहीं, सोचने लगा कि यह वृद्धा अकेली रहती है इसकी गुज़र कैसे होती होगी? अऩ्ततः बुढ़िया से पूछ ही लिया कि तुम्हारी गुज़र-बसर कैसे होती है? बुढ़िया ने कहा कि मेरे पास एक भैंस है, उसका दूध बेचकर अपना पेट पालती हूँ। भिखारी बोला-तुम्हारे घर का द्वार तंग दिखाई देता है,कहीं तुम्हारी भैंस इसमें फँस कर मर गई तो तुम क्या करोगी?
     बुढ़िया को यह बात अच्छी न लगी, बोली-ऐसे अशुभ वचन मत बोलो, वरना अधपके चावल दाल लेकर अपना रास्ता नापो। भिखारी ने अऩुनय-विनय की और चुप बैठने का वचन दिया। किन्तु उसका चंचल मन बिना शब्द के ताले के चुप न रह सका। कठिनता से एक मिनट बीता तो फिर पूछा कि तुम अकेली हो अथवा तुम्हारी कोई सन्तान भी है? माई बोली- मेरा एक लड़का है मोटर ड्राइवरी का काम सीख रहा है। भिखारी बोला-मोटर दुर्घटना हो जाय और तुम्हारा लड़का मर जाये तो क्या करोगी? माई से उसकी बात सहन न हो सकी। अधपकी खिचड़ी की देगची उतार कर बोली-यह लो अपनी खिचड़ी और तत्काल नौ दो ग्यारह हो जाओ। उसके पास बर्तन तो था ही नहीं, चादर की झोली में खिचड़ी डलवाई और अपने भाग्य को कोसता हुआ वहां से चल दिया। मार्ग में चावलों की मांड बहती जा रही थी। किसी ने पूछा कि यह क्या बह रहा है? भिखारी बोला-यह मेरे मुख से निकले हुये कटु वचनों का परिणाम है, जो मेरी झोली में पड़ा हुआ है, वही बह रहा है। गुरुवाणी में वचन है किः-सहु वे जीआ अपणा कीआ। ऐ जीव! अपनी करनी का फल भोग। और यह वास्तविकता है कि सब लोगों को अपने किये हुए कर्मों का अर्थात् मन, वचन और कर्म का फल भोगना पड़ता है; प्रत्येक को अपनी जिह्वा का फल चखना पड़ता है। प्रकृति किसी के साथ पक्षपात नहीं करती।
                कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहि सो तस फल चाखा।।
     मालिक ने जगत में कर्म को ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल पाता है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं कि जो लोग कटु वचन बोलने के आदी हैं, वे मानो जिह्वा पर तलवार बाँध रखते हैं और दूसरों का दिल दुखाकर उनकी आत्मा को हानि पहुँचाते हैं। इसलिये सत्पुुरुषों इन वचनों में हमें चेतावनी देकर सावधान किया है कि सदैव मधुर वाणी से भक्ति भरी वार्तालाप करो। इस प्रकार के वार्तालाप का फल सदैव शुभ और सुखदायक होता है। वह तुम्हें भी सुखी करेगा। सद्गुरु सच्चे पादशाह जैसा जीव का हितकारी अन्य कोई नहीं हो सकता। यदि हम उनके मार्गदर्शन में चलकर और उनके फरमान को शिरोधार्य कर अपने पुराने स्वभाव को बदल देंगे, तो कौड़ी से हीरा बन जायेंगे।
     देखो!द्रोपदी ने दुर्योधन को बिना तोले दो-चार शब्द ही तो कहे थे-अंधे का अन्धा बेटा, परन्तु इन शब्दों का कितना भयानक परिणाम निकला? इतनी महान् लाभ-हानि है जिह्वा पर नियंत्रण रखने और न रखने में। इस भारी लाभ-हानि को दृष्टि में रखते हुये श्री सद्गुरुदेव भगवान हमें सदैव संयम में रहने और अपनी जिह्वा पर नियन्त्रण रखने का उपदेश फरमाया करते हैं।
     और यह भी ध्यान रखो कि मुख से दो प्रकार के कार्य हुआ करते हैं अथवा जिह्वा दो प्रकार के काम करती है-एक बोलना और दूसरा खाना। जो लोग भोजन भी आवश्यकतानुसार करते हैं, वे लोग स्वास्थ्य जैसी अमूल्य नेमत के अधिकारी बनते हैं। इसके विपरीत जो लोग स्वादिष्ट पदार्थों के लोभ में आकर आवश्यकता से अधिक खा जाते हैं, वे बदहज़मी का शिकार होकर स्वास्थ्य जैसी अमूल्य वस्तु से हाथ धो बैठते हैं।   मिठा करिकै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु।।

     एक सेठ का लड़का खाने-पीने का बहुत शौकीन था। बहुत खाने के कारण उसकी तोंद फूल गई और बदहज़मी के रोग में ग्रस्त होकर शय्या पर पड़ गया। डॉक्टर ने उसके लिये यह उपचार बतलाया कि उसे तीन दिन तक उपवास कराओ; केवल नींबू का रस पानी में डाल कर देते रहो। इस उपचार से उसके स्वास्थ्य की आशा हो सकती है,अन्य कोई साधन नहीं। दो दिन तक उसने डॉक्टर के परामर्श पर आचरण किया और सिवा पानी और नींबू के रस के और कुछ न खाया-पिया। इस उपचार से उसकी शारीरिक अवस्था में काफी परिवर्तन हो गया और वह अच्छी तरह चलने-फिरने योग्य हो गया। किन्तु तीसरे दिन उससे न रहा गया। अपनी मां से केक-पेस्ट्री खाने को मांग ली और मां ने भी बच्चे की ममता में फँस कर उसे दे दी, परिणामस्वरुप रोग ज़ोर पकड़ गया। डॉक्टर को बुलाया गया। उसने आते ही पहला प्रश्न यही किया कि क्या इसको कुछ खिलाया गया? उन्होने साफ साफ बतला दिया कि केक-पेस्ट्री खिलाई है। डॉक्टर ने टंडी सांस भरकर कहा कि खेद! अब इसका रोग ला-इलाज हो गया। अब इसके उपचार में काफी दिन लगेंगे और यह सदैव का रोगी बना रहेगा। यदि जिह्वा पर नियन्त्रण रखता और एक दिन और उपवास रख लेता, तो स्वास्थ्य जैसे अमूल्य पदार्थ का मज़ा लूटता और सारी आयु उचित रुप से खाता पीता रहता और आनन्ददायक जीवन व्यतीत कर सकता। इतना भेद है जिह्वा को नियंत्रण में रखने और न रखने में! और इस भेद को सन्त सत्पुरुष ही सही रुप में जानते हैं। इसी कारण वे जीव को सदैव संयम में रहने का उपदेश फरमाया करते हैं ताकि जीव दुःखरहित जीवन व्यतीत कर सके।
                युक्ताहारविहारस्य   युक्तचेष्टस्य   कर्मसु ।
                युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। 6/17
     अर्थः-""दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।'' किन्तु यह अवस्था-इस प्रकार का रहन-सहन सत्पुरुषों के बतलाये हुये शब्द की कमाई और उनके वचनानुसार आचरण करने से ही प्राप्त होती है। जो भाग्यशाली गुरुमुख गुरु-शब्द अर्थात् नाम का रसपान करते हैं, वे सांसारिक रसों में नहीं उलझते। सांसारिक रस उनकी दृष्टि में फीके पड़ जाते हैं और उन्हें संसार के दुःख-सुख व्याकुल नहीं कर सकते। वे संसार के उतार-चढ़ाव को प्रसन्नतापूर्वक सहन करते हैं। मालिक का हाथ सदैव उनकी सहायता करता है।
     एक महात्मा ध्यानमग्न अवस्था में बैठे थे। एकाएक उनके मुख से एक आह निकल गई। एक गुरुमुख शिष्य ने कारण पूछा तो उन्होने बतलाया कि थोड़ी दूरी पर एक साधु भजन कर रहा था। कुछ शरारती लोग उसे व्यर्थ ही परेशान कर रहे थे। अब तक वह चुप रहकर उनकी सब बातों को सहन करता रहा। उसकी सहायता के लिये आकाश से एक तलवार उतर रही थी, परन्तु उसने अपनी मौनता भंग कर दी और अपशब्दों का प्रयोग करने लगा। इसी कारण वह दैवी सहायता से वंचित हो गया। यह देखकर हमें अत्यन्त खेद हुआ। यदि वह मौन न तोड़ता, तो दैवी हाथ, जो उसकी सहायता को आ रहा था, उससे वंचित न रहता।
      ऊपर के लेख से प्रकट होता है कि जो लोग जिह्वा को नियंत्रण में रखते हैं, वे मालिक के कृपामात्र बन जाते हैं। उनकी सहायता मालिक स्वयं करते हैं। हमारा भी कत्र्तव्य है कि गुरुमहाराज जी के वचनों का परिपालन करके मालिक की कृपा के अधिकारी बनें और उनके शुभ आशीर्वाद को प्राप्त करके अपना लोक और परलोक सफल बनायें और इस वचन को सदैव स्मरण रखें कि कम खाने और कम बोलने अर्थात् मीठा बोलने और नम्रता से पेश आने वाला मनुष्य सदा सुखी और शान्त रहता है।

Saturday, October 29, 2016

भक्ति की प्राप्ति


     भगवान श्री रामचन्द्र जी महाराज अयोध्यावासियों को उपदेश देते हुए कथन करते हैंः-
                भक्ति स्वतन्त्र सकल गुण खानी। बिनु सत्संग न पावहिं प्रानी।।
                पुण्य-पुञ्ज बिनु मिलहिं न सन्ता। सतसंगति संसृति कर अन्ता।।
      ऐ अयोध्यावासियो! भक्ति स्वतन्त्र है अर्थात् वह किसी के अधीन नहीं है। सब गुणों की वह खान है। जितने गुण हैं सब भक्ति से उत्पन्न होते हैं किन्तु ऐसी भक्ति जो गुणों की खान है और स्वाधीन है मिलती कहां से है? फरमाते हैं कि सत्संग के बिना भक्ति को कोई जीव प्राप्त नहीं कर सकता। सत्संग नाम है सन्तों के संग का। उनकी संगति हासिल किये बिना भक्ति नहीं मिल सकती। सन्तों का मिलाप भी कोटि जन्मों के पुण्यों के द्वारा हुआ करता है। जब सन्तों का संग हो जाये तो समझो कि यह पिछले कई जन्मों के शुभ कर्मों का परिणाम है और भगवान की दया है।
     संसारी जीव भगवान की दया का स्वरुप कुछ और समझते है उनका विचार तो यह है कि धन-सम्पत्ति-सन्तान और मान प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाये तो ईश्वर की बड़ी दया हो गई। इन्हीं चीज़ों को वे अपना भाग्य मानते हैं सच्चाई तो यह है कि जब जीव को सत्पुरुषों की संगति मिल जाय तो अपने भाग्य समझने चाहियें। सन्तों की संगति के मिल जाने पर ही जीव जन्म-मरण के चक्र से छूट जायेगा और मोक्षपद का अधिकारी जा बनेगा। अब हमको सोचना चाहिये कि हम कितने भाग्यशाली हैं जो ऐसा ऊँचा आध्यात्मिक दरबार मिला है। ऐसे परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव जी का सत्संग मिल गया और उनसे नाम की प्राप्ति भी हो गई। इस रहस्य को वे ही जान सकते हैं जिनकी आँखें खुली हैं।
     हनुमान जी जब सीता जी की खोज करते हुए लंका में गये तो क्या देखा कि सारी नगरी राक्षसों से भरी हुई है। फिरते-फिराते एक ऐसी जगह पहुंचे जहां भवन के बाहर "रामनाम' अंकित था। उन्हें यह देखकर बड़ा अचम्भा हुआ कि कहां यह राक्षसों की सारी नगरी और कहां राम-नाम! सोचने लगे कि यह तो कोई राम-भक्त नज़र आता है। प्रातःकाल का समय था। विभीषण जी उठे और उन्होने राम-नाम का स्मरण किया। हनुमान जी को अब तो निश्चय हो गया कि यह कोई भगवान का भक्त है। इससे अवश्य ही मित्रता करके अपने मन का हाल कहना चाहिये। हनुमान जी विभीषण जी से मिले-दोनों के ह्मदय आनन्द से भरपूर हो गये। तब विभीषण ने कहाः-
                अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।
हे हनुमान जी! अब मुझे भरोसा हो गया है कि मुझ पर भगवान की दया है। भगवान की कृपा के बिना सन्तों का मिलाप नहीं हो सकता।
     जो लोग सत्संग में आ गये उनके भाग्य खुल गये हैं। अब उनको चाहिये कि वे अपने भाग्यों का दुरुपयोग न करें। उनका सत्संग में आना केवल भक्ति के हेतु है। भक्ति नाम है दर्शन का, सेवा का और वचनों को सुनने का। ये सब भक्ति के अंग हैं। अगर इनको छोड़कर जीव सत्संग में यदि आता है और मन में अनेक सांसारिक इच्छाओं को संजोए हुए है तो समझो वह अपने भाग्यों को ठुकराता है। उसने भगवत्कृपा का मूल्य सही नहीं आँका।
     क्या हम सत्संग में मायावी पदार्थ मांगने आये हैं? संसारी चीज़ें तो जो हमारे प्रारब्ध में हैं हमें मिल कर रहेंगी। हम चाहे उनकी मांग करें या न करें। जो कुछ भी हमारे भाग्यों में बदा है वह मिल कर रहेगा। अगर सत्संग में आकर भी माया माँग ली और माया मिल भी गई तो परिणाम क्या होगा-शरीर छोड़ते समय यदि सुरति माया में चली गई तो उसे सर्प की योनि मिलेगी मनुष्य से गिर कर यदि जीव सर्प-योनि
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में चला गया तो कितने बड़े घाटे का काम उसने किया। इसका नाम है भाग्यों का दुरुपयोग। इसलिये शिष्य को गुरु-दरबार में पहुँच कर कभी भी मायावी पदार्थों की मांग या इच्छा नहीं करनी चाहिये। यदि कुछ मांगना ही है तो भक्ति-सेवा और दर्शनों की मांग करे।
      भक्ति का दूसरा अंग है दीनता-ग़रीबी। मायाधारी ग़रीब नहीं बन सकता। ग़रीबी का भाव है विनयशीलता और सेवकपन। ऐसा तो कोई करोड़ों में से एक ही निकलता है जो माया पति भी हो और अहंकार रहित भी अन्यथा माया तो सबको अन्धा बना देती है। भक्ति सदा दीनता में निवास करती है। फल वाली टहनी हमेशा झुक जाती है। जिस शाखा पर फल नहीं आये वह सीधी खड़ी रहती है।
                ऊंचे पानी नहिं टिके, नीचे ही ठहराय।
                नीचा होय सो भर पिये, ऊँच प्यासा जाय।।
     जहां अहंकार है वहां भक्ति का क्या काम? रावण अभिमानी था और उसका सगा भाई विभीषण राम का भक्त था। रावण का पुतला बनाकर लोग उसे प्रतिवर्ष भरी समाज में जला देते हैं क्या कभी विभीषण के साथ भी ऐसा हुआ? कारण इसका यह कि विभीषण के अन्दर भक्ति थी और रावण भक्ति विहीन था।
     इसलिये दास बनना सीखो। इसमें सुख है। दास केवल गुरु का नहीं अपितु गुरु के दासों के भी दास बनो। मालिक अन्तर्यामी हैं। वे शिष्य की सारी दिनचर्या को गुप्तरुप से निहार रहे हैं। भक्ति दिखावे को पसन्द नहीं करती। कई लोग दरबार में सेवा इस भावना से करते हैं कि लोग उन्हें भक्त कहें। भक्ति के कर्म लोगों को दिखाकर करते हैं। भक्ति मार्ग में इस बात को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। बीज जो धरती में दब जाता है, वह उगता है और फल देता है-वह मिट्टी में खुद को गला कर अपना रंग-रुप खो देता है। जो बीज धरती के ऊपर ही पड़ा रहा वह निष्फल चला गया। इसी तरह गुप्त रुप से की हुई भक्ति फल देती है और दिखावे की भक्ति ऊपर पड़े हुए बीज की तरह निर्रथक चली जाती है।
     पंचम पादशाही श्री गुरु अर्जुन देव जी का युग था। एक शिष्य ने गुरु महाराज जी के सम्मुख खड़े होकर विनय की-"प्रभो! सच्चे गुरुमुख की महिमा को सर्वदा सुनते हैं-कृपया उसके दर्शन भी कराओ।' सुनकर फरमाया-अच्छा भाई! कभी प्रत्यक्ष रुप में तुम्हें सच्चे गुरुमुख के दर्शन करवाएंगे। कुछ समय पीछे उसी शिष्य को बुलाकर कहा कि "यह हमारा आज्ञापत्र ले जाओ और अमुक ग्राम में हमारा एक सिख रहता है उससे सरोवर की सेवा के लिये पाँच सौ रुपये ले आओ।'
     उस काल में पाँच सौ रुपये बहुत कीमत रखते थे। आज कल जैसा युग न था। वह प्रेमी हुकुमनामा लेकर चल पड़ा। सोचता जाता है कि जिसके नाम यह हुकुमनामा है न जाने वह कितना बड़ा सेठ होगा। पूछताछ करता हुआ वह उस गाँव में जा पहुँचा और उस गुरुमुख के घर जाकर वह आज्ञापत्र उसे दे दिया। वह सिख कैसा था? अत्यन्त निर्धन। घास खोदकर निर्वाह करता था। आज्ञापत्र पढ़ते ही उसके हर्ष का कोई पारावार न रहा। उसे यह चिन्ता न हुई कि पाँचसौ रुपये कहां से आएंगे। वैसे तो उसके पास पाँच पैसे भी न थे। मन में बारम्बार श्री गुरुमहाराज जी का धन्यवाद करता है कि धन्य हैं गुरु महाराज जिन्होंने मुझ जैसे पापी और गुनहगार को भी अपने दासों में गिन कर सेवा का सौभाग्य दिया है। मन में उसे यह भी विश्वास है कि जिन्होने यह आज्ञा भेजी है उसको पूर्ण करने की शक्ति भी साथ में अवश्य भेजी होगी। मैं कौन करने वाला। करने करानेवाले वे मालिक आप हैं।
     मालिक की मौज। उसी समय नगर में ढिंढोरा फिर रहा था कि एक शाही पहलवान मस्कीनियां आया है। उसके साथ जो कुश्ती लड़ेगा उसे जीतने पर एक हज़ार रुपये इनाम दरबार की ओर से मिलेगा और हार जाने पर भी पाँच सौ रुपये पारितोषिक मिलेगा। यह डोंडी सुनकर वह अति प्रसन्न हुआ। दंगल
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का जो समय निश्चित था दूर दूर से पहलवान वहाँ पहुँच गये। दर्शकों की भी वहाँ भीड़ लग गई। मस्कीनियां शाही पहलवान अखाड़े में लगा झूमने। उसे देखकर किसी का साहस नहीं होता था कि सामने आकर ताल ठोंके।
     हार जाने पर भी पाँच सौ रुपये इनाम इसलिये रखा गया था क्योंकि मस्कीनियां की मार यदि कोई एक बार भी खा लेता था उसकी दुर्दशा हो जाती थी। देखते देखते वह गुरु का सिख-दुबला-पतला अखाड़े में मस्कीनियां से लोहा लेने के लिये कूद पड़ा। लोगों ने यह तमाशा देखकर ताली पीटनी शुरु कर दी। लोग यह सोचने लगे कि ऐसा लगता है यह बूढ़ा मरियल आदमी घर से दुःखी होकर मरने को आया है। इधर मस्कीनियां को भी उसे देखकर अचम्भा हुआ कि इसमें अवश्य ही कोई भेद है। वह पूछे बिना रह न सका। उसने कहा-भले पुरुष! आपको मेरे साथ कुश्ती लड़ने का कैसे साहस हुआ? पहले उस गुरुमुख ने मस्कीनीयां को टालने की कोशिश की अन्त में उसने सत्य-सत्य सब भेद बता ही दिया। वह बोला- मुझे श्री गुरु महाराज जी का हुक्म पाँच सौ रुपये सेवा करने का हुआ है। मैं तो हारने के लिये आया हूँ। चाहे मेरा शरीर चला जाय मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं। किन्तु श्री गुरु महाराज की आज्ञा अवश्य पूरी होनी चाहिये। सिख ने आगे कहा कि भाई! एक शरीर तो क्या यदि मैं लाखों शरीर भी गुरु जी की प्रसन्नता पाने के लिये कुर्बान कर दूँ तो भी मैं उनके अगणित उपकारों का बदला नहीं चुका सकता।
     उसके ऐसे भाव गर्भित वचन सुनकर मस्कीनियां अत्यन्त प्रभावित हुआ। कहने लगा-आफ़रीन-आफ़रीन! इतनी सच्चाई! अच्छा भाई! जिन गुरु महाराज जी के लिए तुम इतनी कुर्बानी करने को तैयार हो मुझे भी उनके दर्शन कराओ। हम दोनों लोगों के दिखावे के लिये झूठ-मूठ लड़ाई लड़ते हैं-ऐसा करते करते मैं अपने आपको नीचे गिरा दूँगा और तुम मेरे ऊपर आ बैठना। इस प्रकार मैं हार जाऊँगा और तुम जीत जाओगे। तुम्हें एक हज़ार रुपये इनाम मिलेगा। उन में से पाँच सौ रुपये तुम और पाँच सौ रुपये मैं-दोनों श्री गुरु महाराज जी की दर्शन भेंट करेंगे।
     ऐसा आपस में विचार-विमर्श करके दोनों अखाड़े में लगे कुश्ती लड़ने। होना तो वही था जैसा उन्होंने पहले ही निर्धारित कर लिया था लोगों ने भी देखा कि मस्कीनियां हार गया और  बूढ़ा आदमी जीत गया। लोगों की हैरानी की हद न रही। विश्व प्रसिद्ध पहलवान मस्कीनीयां आँखें नीची करके निकल रहा है। उसने केवल गुरु दर्शन की खातिर अपने मान को धूलि में मिला लिया। गुरु प्रेमी को एक हज़ार रुपये का इनाम मिल गया। मस्कीनियां को साथ लेकर दोनों श्री गुरु दरबार में इनाम सहित उपस्थित हुए। वह हुकुमनामे को पहुँचाने वाला सिख भी उनके साथ में था।
     श्री गुरु महाराज जी उस समय श्री सुखमनी साहिब की रचना कर रहे थे। ग्यारहवीं अष्टपदी लिख चुके थे। अगली अष्टपदी लिखना ही चाहते थे कि ये तीनों श्री चरणों आ खड़े हुए। सारा वृत्तान्त श्री चरण कमलों में सुना दिया। सुनकर श्री गुरु महाराज जी अति प्रसन्न हुए और उन्होने बारहवीं अष्टपदी के आरम्भ में वचन उल्लिखित कियेः-
                सूखी वसे मसकीनियां आप निवारि तले।
                वडे वडे अहंकारिया नानक गरबि गले।।
     भक्ति, जिसकी इतनी महिमा है और जो गुणों की खान है, वह प्रेम-सच्चाई और कुर्बानी से मिलती है। भक्तिमान जीव दीनता से प्यार करते हैं अहन्ता से नहीं। लोग बातों से भक्ति लिया चाहते हैं। भला जो इतनी अमूल्य वस्तु है वह खाली बातों से कैसे हाथ आ सकती है?
     सन्त सद्गुरु ही जीव को भक्ति पथ पर चला सकते हैं। वे हमारी आत्मा के परम हितकारी हैं और
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सच्चे साथी हैं। संसार में कोई भी दूसरा उनके समान हितैषी नहीं है। जो जीव गुरु की चरण-शरण में आ गये हैं, जिन्हें उनके सत्संग की प्राप्ति हो गई है उनके अत्युत्तम भाग्य हैं। कोई कहां तक उनकी सराहना करे। उनको इस दुर्लभ संयोग का आदर करना चाहिये। गुरु वचनों को शिरोधार्य कर जीवन यापन करना चाहिये। समय धीरे धीरे गुज़रता जा रहा है। पानी के बहाव की भांति जो समय निकल गया फिर हाथ नहीं आता। समय का यही सदुपयोग है कि कोई भी क्षण मालिक के सुमिरण बिना व्यतीत न हो। सच्चा जिज्ञासु इस तरह आचरण करता हुआ सच्ची भक्ति का अधिकारी बन जाता है और लोक व परलोक दोनों को सफल बना लेता है

Tuesday, October 25, 2016

समय का मूल्य पहचानो

समय का मूल्य पहचानो
""समय का आदर करोगे तो जगत् तुम्हारा मान करेगा। साधक को चाहिये कि वह हर एक श्वास का ध्यान रखे कि वह शब्द की कमाई में लगकर सफल हुआ है अथवा प्रमाद करने से व्यर्थ में निकल गया।''
    जीवन एक चादर की न्यार्इं है जो श्वासों के तन्तुओं से बुनी है। कल्पना करो कि एक कपड़ा मोटे सूत से बुना हुआ है और दूसरा विशुद्ध ज़री के सूक्ष्म तारों से। तो ज़रीदार वस्त्र का मुल्य सूत के कपड़े से बहुत ही अधिक होगा। यदि ज़री की बजाय कोई सोने की तारों से कपड़ा तैयार करवावे तो उसके दाम और भी बढ़ जाएंगे। किन्तु मनुष्य का एक एक श्वास सोने की तो क्या बात! हीरे जवाहरात से भी बढ़-चढ़कर है। उससे इस मानव जीवन रुपी चादर को बुना गया है।
     जैसे बुने हुए कपड़े में से एक एक तार निकालने लगें तो एक दिन वह कपड़ा समाप्त हो जायेगा। इस जीवन रुपी चादर से प्रतिदिन श्वास रुपी अमूल्य तारें निकलती जा रही हैं। परिणाम यह होगा कि एक दिन यह जीवन शान्त हो जाएगा। जब सोने की तारों से बुना हुआ कपड़ा अगर कोई दस-बीस रुपया मीटर के भाव से बेच दे तो उसे कोई बुद्धिमान व्यापारी न कहेगा। फिर ऐसे श्वासों से बुना हुआ कपड़ा जिसके एक एक श्वास का मोल जानकारों ने त्रिलोकी से भी अधिक बताया है। इसे मुफ्त में ही नष्ट कर देवे तो बुद्धिमान्जन उसे मन्दमति कहेंगे।
     एक व्यापारी ने अपने बच्चे को सौ रुपये का नोट देकर बाज़ार से छोटे नोट लाने को कहा। जब वह लौट कर आया तो उसने नोट गिने तो एक कम था। यह देखकर बच्चे को बड़ी डाँट पड़ी। देखो-जब एक रुपये का घाटा उस सेठ ने सहन न किया तो वह विश्वपति हमारी इतनी बड़ी हानि को कैसे सहन करेंगे जिन्होने हमें श्वासों की असीम निधि देकर संसार में व्यापार करने को भेजा है। जैसे गुरुवाणी में लिखा हैः-वणजु करहु वणजारिया वखरु लेहु समालि।
         तैसी वस्तु बिसाहीऐ जैसी निबहै नालि।। अगै साहु सुजाणु है लैसी वस्तु समालि।।
क्या वे हमारे मालिक नहीं देखेंगे कि यह कौन सी वस्तु खरीद कर आया है? जब वे देखेंगे कि उस
बहुमूल्य राशि के बदले काँच खरीद कर लाया है तो फिर डांट-डपट से हम बच जाएँगे? इस सरकार में भी यही नियम है कि जितनी बड़ी हानि उतनी बड़ी सज़ा। कोई दस बीस रुपये की यदि चोरी करता है तो पुलिस उसे दो-चार थप्पड़ मार कर छोड़ देती है यदि कोई बैंक आदि पर लाखों रुपयों का डाका मारता है तो उसे वर्षों तक कारागर में हवा खानी पड़ती है। मनुष्य को स्वयं ही विचार करना चाहिये कि जो प्रमादी
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मनुष्य मालिक की सौंपी हुई अमूल्य राशि को बड़ी उपेक्षा से गँवा देगा तो वह कितना दारुण दण्ड पायेगा! कर्म का फल तो अवश्य ही मिलना है अतः सयानप इसी में है कि हम ऐसा काम करें ही क्यों जिसका फल हमारे लिये दुःखदायी हो। सच्चे दरबार में हमें लज्जित होना पड़े। सारोक्तावलि के शब्द हैंः-
                ""सब ही कर्मों के आरम्भ में बुद्धिमान सदा फल को सुमरै।''
अर्थः-बुद्धिमान पुरुष वह होता है जो हर एक कार्य करने से पहले उसके परिणाम पर विचार कर ले। सोच समझ कर समय के अन्दर ही अपना पारमार्थिक धर्म सँवार लेवे। जिस कर्म का फल दुःखदायी प्रतीत होता हो उससे अपने आपको बचाकर रखे। सन्तों महापुरुषों ने अपनी वाणी द्वारा हमें बता दिया है कि किस अपराध का क्या दण्ड मिलता है? जिन्होने प्रभु की प्रदान की हुई पूँजी नाम स्मरण के सिवाय मनमति में गँवा दी उनके लिये आदेश हैः-
                जिन गुरु की चोरी करी, गये नाम गुण भूल।
                तेहि विधि चमगादड़ किये, रहे ऊध्र्वमुख झूल।।
उस सच्चे शाह ने तो इन श्वासों से नाम का सौदा करने की आज्ञा दी है, जो उसका वचन भूलकर ये श्वास अपनी इच्छा के अनुसार शरीर और इन्द्रियों की आसक्ति में खर्च कर देता है वह आज्ञा का उल्लंघन करता है। जैसे कोई सेठ किसी नौकर को राशि देकर बाज़ार में भेजे कि अमुक वस्तु ले आओ नौकर उस आज्ञा को भुलाकर वह वस्तु तो न लावे और उस धन को अपने काम में खर्च कर देवे तो सेठ उसे अपराधी की दृष्टि से देखेगा। वैसे ही जो लोग सद्गुरु की प्रदान की हुई श्वासों की अमूल्य पूँजी को अपने मन के अधीन होकर विषय-विकारों में नष्ट कर देते हैं और नाम-स्मरण में नहीं लगाते उन्हें जो दण्ड मिलता है और जिन्होंने उनकी दुर्दशा देखी है उनके वचन हैं कि वे लोग चमगादड़ की योनि में जाकर ऊपर मुंह किये हुए झूला करते हैं। इस प्रकार वे अपने किये हुए बुरे-कर्मों का पश्चात्ताप करते हैं। उन्हें तो मानुष जन्म जब मिलेगा सो मिलेगा किन्तु हमें तो मानव काया में आने का अवसर प्राप्त हो चुका है हम जो कुछ करना चाहें कर सकते हैं।
     जब हमें श्री सद्गुरुदेव जी सावधान करते हैं कि एक एक श्वास पर नज़र रखो कि उस श्वास के बदले में हमने क्या कुछ प्राप्त किया? वह श्वास सार्थक हुआ या निर्रथक चला गया? तो हमारा प्रथम कत्र्तव्य हो जाता है कि हम अभी से चेत जावें और अपनी सुरित की धारा को बहिर्मुख होने से रोककर उसे अन्तर्मुखी कर दें। उसे गुरु-शब्द सो जोड़कर अभय-पद को प्राप्त करें। यदि हम श्री गुरुदेव के वचन के अनुसार आचरण नहीं करेंगे तो प्रकृति रानी भी अपने विधान के द्वारा हमें दण्डित करने से न चूकेगी।
     परमसन्त श्री कबीर जी के पास एक बड़ा सेठ आया। उसको श्री कबीर साहिब जी ने फरमाया कि "झूठे धन को सच्चा और संग जाने वाला मत समझो और नाम की कमाई करो क्योंकि नाम-धन ही सच्चा और साथ जाने वाला धन है।' परन्तु उस सेठ ने यह उपदेश सुनकर भी अनसुना कर दिया और अपने धन के मद में मस्त रहा। कुदरत के काम हैं। कर्म का फल किसी को एक न एक दिन मिलता ही है। वह छोटे बड़ा का पक्षपात नहीं करती। वह सेठ यद्यपि अपने मन की मति से दान-पुण्य भी बहुत करता था परन्तु मृत्यु के उपरान्त वह हाथी जा बना। सिद्धान्त यह है कि गुरु शब्द की कमाई के बिना इस आशा का नाश नहीं होता और जब तक आशा बनी हुई है तब तक चौरासी का चक्र कटता नहीं।
     सौभाग्यवश उस हाथी को काशीराज ने खरीद लिया। वह उसके द्वार पर बँधा हुआ था कि अकस्मात् श्री कबीर साहिब जी का उधर से गुज़रना हुआ तो हाथी सिर धुन धुन कर लगा चिंघाड़ने। परमसन्त श्री कबीर साहिब तो अन्तर्यामी थे तत्काल पहचान गये कि यह कौन है और  क्या  कह रहा है-उसे उन्होंने
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अपनी वाणी में यो कहाः- राज   दुआरे  बन्धिया ,  मूड़ी  धुने  गजन्द।
                      मानुष जनम कब पाइहौं, भजिहौं परमानन्द।।
समझाते हैं कि हाथी अब सिर धुन धुन कर पछताता है और वचन देता है कि मुझे एक अवसर दे तो कि गुरु-शरण में जाकर गोबिन्द का भजन करुँ। श्री कबीर जी ने पूछा कि ऐ गजराज! तुम तो बड़ा दान-पुण्य किया करते थे? अब तुम्हें क्या मिलता है? वह गजेन्द्र बोला कि मुझे उस दान के बदले अब एक समय पर खाने के लिये सवा मन भोजन मिलता है। परन्तु इससे मुझे कोई लाभ नहीं क्योंकि किसी का पेट तो थोड़े से अन्न से भर जाता है और मेरा बड़ा पेट बहुत खुराक मांगता है। इस ढंग से मानो मुझे मनमति से किये हुए दान का फल मिल रहा है। तब श्री कबीर साहिब जी ने यों कथन कियाः-
                बहुत दान जो देत हैं, कर कर लम्बी आस।
                काहू के गज होयेंगे ,  खायेंगे सेर पचास।।
यह दशा होती है मनमति पर चल कर कर्म करने की। मन के वश होकर किया हुआ सत्कर्म भी अपूर्ण पुण्य बन जाता है जैसे गन्दी जगह से गुज़रने के कारण स्वच्छ पवन भी दूषित हो जाता है।
                नाम संगि मनि प्रीति न लावै, कोटि करम करतो न रुकि जावै।।  गौड़ी महला-5
जो मन गुरु शब्द से नहीं जुड़ा वह कदाचित् शुद्ध नहीं हो सकता। जब मन ही विमल नहीं होगा तो विचारधारा कैसे शुद्ध हो सकेगी? जब विचार मलिन होंगे तो कर्म भी श्रेष्ठ न होंगे और बुरे कर्म करने वाला कभी भी दण्ड से बच नहीं सकता। इसलिये सन्त सद्गुरु सब दुःखों के मूल कारण की चिकित्सा करते हैं-कथन करते हैं, ""जितना परिश्रम करो मन को सँवारने के लिये करो।'' श्री वचन हैंः-
                ""छिन छिन मन गुरु चरणन लावै। एक पलक छूटन नहीं पावे।''
गुरु चरणों का प्रताप किसी से छुपा नहीं। यदि ये श्री चरण जल से छू जावें तो वह पानी "चरणामृत' बन जाता है, यदि वे धरती से छू जावें तो वह भूमि तीर्थ बन जाती है। यदि कोई अपना मन उनसे प्रतिपल लगाता रहेगा तो वह क्यों नहीं उज्जवल हो जायेगा। निर्मल मन के पीछे स्वयं भगवान ऐसा भागे आते हैं जैसे दीप शिखा पर पतंगा। आप स्वयं ही विचार करो कि जो सुखों के सागर प्रभु देव हैं वे जिसके ह्मदय में बस जावें तो उसे कौन से सुख की कमी रह जाएगी। यह सद्ग्रन्थों का सार है। जिसने इस तथ्य को समझ लिया और उस पर आचरण कर लिया मानों उसने सब ग्रन्थों के सार को जान लिया और अपना निजी काम बना लिया। कबीर मन निर्मल भया, जैसा गंगा नीर।
                     पाछै लागे हरि फिरै, कहत कबीर कबीर।।
जो मानव मन को निर्मल करने की साधना में लगा हुआ है वही बुद्धिमान् और भाग्यशाली है। अल्पज्ञ संसार पहले चाहे उसका आदर न भी करे उसकी खिल्ली भी करे परन्तु एकदिन आगे चल कर ऐसा आयेगा कि वही जगत् उसके चरण चूमेगा इसमें दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। श्री गुरुनानक देव जी महाराज जब इस साधन में लगे तो संसार ने उन्हें "कुराही' भी कहा "दीवाना' भी कहा "बेताला' जैसे अपशब्द भी कहे। यदि वे संसार का विरोध देखकर अपने संकल्प से विचलित हो जाते तो आज विश्व में उनका नाम सूर्य की भांति न चमकता।
     श्री मीराबाई जब भजन-भक्ति की राह पर चलने लगीं तो और लोगों की बात तो एक किनारे रही अपने आत्मीय जनों ने भी उसे अपार कष्ट दिये। विरोध इतना प्रचण्ड होता गया कि उसका मुँह देखना तक भी उन्हें प्रिय न था। उसकी जीवन लीला को समाप्त करने के लिये उन्होने उसे विष भी दे दिया। परन्तु यदि वह इन दारुण कष्टों को देखकर घबड़ा जाती और उनके कहने पर भक्ति की राह छोड़कर
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चलने लगती तो उसका आज जैसा गौरव न रहता। वह भी सामान्य जीवों के समान काल के विकराल गाल में समा गई होती।
     अतः जो साधक दृढ़ संकल्पपूर्वक भजन भक्ति की कमाई करना चाहे उसका दृढ़ संकल्प होना चाहिये। वह संसार की ओर से आने वाले मिथ्या अपवादों पर यदि ध्यान देने लगे तो मन जगत् की झूठी बातों में आ जाएगा और उसका सारा श्रम धूलि में मिल जायेगा।
     कोई प्रश्न करे कि ऊपर तो समय की सफलता पर चल रहे थे और अब वज्र संकल्प के विषय पर करने लगे हो। परन्तु गुरुमुखों को विचार करना चाहिये कि दृढ़ संकल्प का होना और समय को सफल करना-ये एक ही विषय के दो पहलू हैं। उदाहरणतया-ध्रुव भक्त ने जब समय को सफल करने का काम आरम्भ किया तो समय को निर्रथक कर देने वाली लोभ आदिक शक्तियां उसके पीछे पड़ गर्इं। यदि उसमें दृढ़ संकल्प रखने का गुण न होता तो वह समय के सफल करने के उद्देश्य को सिद्ध न कर सकता।
     अतः हमें भी श्री सद्गुरु देव भगवान् की आज्ञानुसार अपने वज्र संकल्प की शक्ति की परीक्षा करके पग बढ़ाते जाना चाहिये और इस प्रकार परमार्थ के पथ को पार करके निज घर पहुंचने का यथाशक्ति प्रयत्न करना चाहिये।