सतपुरुष
फरमाते हैं कि दुःख का कारण तुम्हारे ही मन में है बाहर खोजने गये पहला ही
कदम गलत पड़ गया। जब भी तुम किसी को दुःख देना चाहते हो तुम स्वयं पाओगे।
जब भी किसी को दुःख देने की आकांक्षा से, किसी विचार के पीछे जाते हो तुम
दुःख के बीज बो रहे हो। दूसरे को दुःख मिलेगा या नहीं मिलेगा, तुम्हे दुःख
ज़रुर मिलेगा। तुम अगर आज दुःख पा रहे हो तो सन्त फरमाते हैं कल जो बीज बोये
थे उनका फल है और कल तुम चाहते हो दुःख न पाओ तो आज कृपा करना आज बीज मत
बोना। यदि कोई दोष युक्त मन से बोलता है, सोचता है, व्यवहार करता है, या
वैसे कर्म करता है तो दुःख उसका अनुसरण वैसे ही करता है जैसे गाड़ी जाती है
बैलों के पीछे चाक चले आते हैं। तुम्हारे मन में अगर किसी को दुःख देने का
ज़रा सा भी भाव है तो तुम अपने लिये बीज बो रहे हो। क्योंकि तुम्हारे मन में
जो दुःख देने का बीज है तुम्हारे ही मन की भूमि में गिरेगा। दूसरे की मन
की भूमि में नहीं गिर सकता। बीज तो तुम्हारे भीतर वृक्ष भी तुम्हारे भीतर
होगा। फल भी तुम्हीं भोगोगे। अगर गौर से देखा जाये तो जब तुम दूसरे को दुःख
देना चाहते हो तो तुमने अपने को दुःख देना शुरु कर ही दिया। तुम दुःखी
होने शुरु हो ही गये। तुम क्रोधित हो क्रोध करके किसी को नष्ट करना चाहते
हो तुम उसे नष्ट करोगे या नहीं ये दूसरी बात है किन्तु तुमने अपने को नष्ट
करना शुरु कर दिया। सन्त कहते हैं क्रोध से बड़ी कोई मूढ़ता नहीं। दूसरे पर
क्रोध करके तुम अपने को दण्ड देते हो। एक आदमी ने तुम्हें गाली दी कसूर
उसका होगा क्रोधित तुम हो रहे हो दण्ड अपने को दे रहे हो। इससे ज़्यादा
मूढ़ता क्या होगी। गाली देना उसकी समस्या है। तुम क्यों परेशान हो?
ये तो भगवान बुद्ध की वाणी है जिसे ढ़ाई हजार वर्ष पहले तथागू बुद्ध ने कहा था।
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