Tuesday, November 1, 2016

जिह्वा पर नियंत्रण


     सत्पुरुषों का वचन हैः-दीपक झोला पवन का, नर का झोला नार।
                         साध झोला वचन का, बोले नहीं विचार।।
     जलते हुये दीपक को वायु का झोंका बुझा देता है और उसके प्रकाश को अंधकार में बदल देता है। जिस व्यक्ति की चित्तवृत्ति स्त्रियों की ओर लग जाती है, वह नाम-सुमिरण के मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता। इस पर सन्तवाणी में फरमान है-जहां काम तहां नाम नहीं। काम और नाम का आपस में  मेल ही नहीं है।इसी प्रकार उस साधु की भी सम्पूर्ण साधनायें व्यर्थ चली जाती हैं जो कि बिना विचारे अर्थात् बिना तोले बोल देता है। और यह भी निश्चित है कि जो लोग बहुत बोलने के आदी होते हैं उनसे प्रायः भूल-चूक भी हो जाती है। कई बार शीघ्रता में गलत और अनुचित शब्द भी मुख से निकल जाते हैं। जिनको चुप रहने की आदत है, वे प्रायः ऐसी भूल चूक और गलत शब्द कहने से बचे रहते हैं। भाव यह कि बहुत बोलने वाले के लिये गलती से बचना इतना सुगम नहीं जितना कि चुप रहने वाले के लिये सुगम है।
     इसलिये जिसको विचार हो कि मैं जहां तक सम्भव गलती से बचता रहूं और आत्मिक मार्ग में मैं दिन प्रतिदिन अग्रसर होता जाऊं उसे चाहिये कि अपनी चित्तवृत्ति को अन्दर की ओर प्रवृत करे और प्रत्येक बात को तोल कर मुख से निकाले ताकि सुनने वालों का दिल न दुखे। सन्तों के इस उपदेश को सदैव स्मरण रखोः-
                ज़ुबां  बेमहल  खोलना  ऐब है ,  अज़ीज़ो  बहुत  बोलना  ऐब है।।
                ज़ुबां अपनी हद में है बेशक ज़ुबां, बढ़े एक नुक़्ता तो है यह ज़िआं।।
     प्रियवर! बिना अवसर बोलना बहुत बड़ा अवगुण है। हर समय बोलते रहना भी एक प्रकार का अवगुण है। कम बोलने वाली जिह्वा ही वास्तव में जिह्वा है। एक बिन्दु बढ़ जाने से ज़बां (जिह्वा) शब्द ज़िआं बन जाता है। जिसका अर्थ हानि है। ज़बां और ज़िआं के शब्द लिखने में उर्दू में केवल एक ही बिन्दु का अन्तर है। इसलिये मनुष्य को बोलचाल में संयम बर्तना चाहिये।
   कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि जो काम एक शब्द से हो सके उसको व्यर्थ ही लम्बा करके उसकी व्याख्या दस शब्दों में करेंगे। उसके विपरीत बुद्धिमान व्यक्ति दस शब्दों वाली बात का आशय एक ही शब्द में प्रकट कर देता है। मितभाषी एवं गम्भीर व्यक्ति के एक ही शब्द में इतनी शक्ति और प्रभाव होता है जितना अधिक बोलने वाले के दस शब्दों में भी नहीं होता। किन्तु मितभाषी भी तो वही बन सकता है और खामोशी से प्यार भी वही रख सकता है जिसके घट में सद्गुरु के शब्द की लगन होती है। जिसकी सुरति सद्गुरु के शब्द में जुड़ी रहकर आत्म-आनन्द को प्राप्त करती रही है, ऐसा व्यक्ति आवश्यकता के बिना कदापि नहीं बोलता। वह सत्पुरुषों के इस वचन का पाबंद रहता हैः-
                ज्ञान रतन की कोठरी, चुप करि दीजै ताल।
                पारख आगे खोलिये, कुंजी बचन रसाल।।
     परमसन्त श्री कबीर साहिब फरमाते हैं कि ऐ जीव! तेरे अन्दर ज्ञान के रत्नों से भरी हुई कोठरी विद्यमान है। उस पर मौनता का ताला लगा दे। जब कोई पारखू मिले तब मधुर शब्दों की चाबी लगा कर खोलना। जो लोग स्थान-स्थान पर बिना आवश्यकता के अपारखुओं के समक्ष वचनों के हीरे-रतन बिखेरते रहते हैं, वह अपनी अनमोल पूंजी व्यर्थ में नष्ट करते रहते हैं क्योंकि वस्तु की कद्र तो पारखुओं के पास ही हुआ करती है। इसलिये सत्पुरुषों का फरमान उचित है कि अपनी जिह्वा पर मौनता का ताला लगा दो। जब कोई पारखू और श्रद्धावान मिले तब उस ताले में मधुर वचनों की कुँजी डाल कर खोलो।
अर्थात् मौनता को जब भी तोड़ो तो मधुर वचन बोलो। कटु वचन बोलने की अपेक्षा चुप रहना लाख गुणा श्रेष्ठ और लाभदायक है। किसी ने सच कहा है कि ""जब मिलेगा पारखू, लेगा महंगे मोल।''
     अफलातून जैसा चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति मौनव्रत तोड़ने के कारण ही तो मारा गया। यदि वह यमदूतों के चापलूसी भरे शब्द ""कि अफलातून! तूने कमाल कर दिया, परन्तु एक दोष तो रह गया।'' को सुनकरअपनी मौनता भंग न करता और ""कौनसा'' का शब्द जिह्वा से न निकालता तो शायद यमदूतों के पंजे से बच जाता। इस प्रमाण से सिद्ध होता है कि पहले बात को तोलो फिर मुंह से बोलो। बिना विचारे बोलने से चुप रहना लाभदायक है। एक फकीर का कथन हैः-सुख़न गुफ़्ता सीम अस्त नागुफ़्ता ज़र।।
     अभिप्राय यह कि जो बात मुख से निकल गई उसका मूल्य चांदी पड़ा। यदि मुख के अन्दर ही रह जाती तो वह सोना होती। किन्तु इसका अर्थ कोई यह न समझे कि संसार में गूंगा बनकर रहना चाहिये, अपितु सत्पुरुषों का उपदेश यह है कि मनुष्य मध्यम मार्ग अपनाये। उनका कथन हैः-
                अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
                अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
     जैसे वर्षा ऋतु में वर्षा कदापि न हो तो भी फसल न होगी और यदि सीमा से अधिक वर्षा हो जाये तो भी फसल सड़ जायेगी, वैसे ही समयानुसार उचित शब्द न बोलना और बिना आवश्यकता के व्यर्थ ही अधिक बोलते रहना अत्यन्त हानिकारक है। आवश्यकतानुसार थोड़े शब्द बोलने से दूसरे का भला हो जाता है। बिना आवश्यकता के बोलने से झगड़ा-फसाद भी हो सकता है।
                बोलत बोलत बढहि विकारा। बिनु बोले किआ करहि बीचारा।।
अर्थः-परमसन्त श्री कबीर साहिब गुरुवाणी में वर्णन करते हैं कि अधिक बोलने से कई बार विवाद बढ़ जाता है, परन्तु बोले बिना भी तो वास्तविकता का विचार नहीं मिलता। उत्तम यह है कि सत्पुरुषों, विचारवानों की संगति में रहकर बोलने का ढंग सीखना चाहिये। विचार के तराजू में वाणी को तोल कर बोलने वाला लोक-परलोक में सुखी रहता है। सत्पुरुषों के वचन इस प्रकार प्रकाश देते हैंः-
                बानी तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल।
                हीरा तो दामों मिलै, शब्द का तोल न मोल।।
     प्रकृति की ओर से मनुष्य को जो बोलने का अधिकार मिला हुआ है, यह एक दुर्लभ और मूल्यवान् रत्न है, यदि कोई सौभाग्यशाली सत्पुरुषों की संगति में जाकर उसके प्रयोग का ढंग सीख ले अर्थात् बोलने की युक्ति जिसे आ जाये तो वह व्यक्ति बहुत अधिक मालदार हो सकता है, क्योंकि हीरे-जवाहर तो दाम से मिल जाते हैं, परन्तु सत्पुरुषों का शब्द किसी भी मूल्य से नहीं मिल सकता। यह जब भी मिलेगा, उनकी कृपा से मिलेगा। हीरे का मूल्य लगाया जा सकता है, परन्तु शब्द के मूल्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसलिये सत्पुरुष उपदेश करते हैं किः-हिये तराजू तोल के, तब मुख बाहर खोल।। अर्थात् जब भी बोले, पहले मन में अच्छी प्रकार सोच समझ लो कि बोलने में क्या लाभऔर क्या हानि है? इस प्रकार जो लाभ-हानि का अनुमान लगाकर और भलीभांति सोच-विचार कर बोलता है,तो वह सौभाग्यशाली सदैव सम्मान और सुख से जीवन व्यतीत करता है। जो बिना तोल के जैसा आया बोल दिया, उनका जीवन सदैव फ़साद और अशान्ति का शिकार बना रहता है।
     एक भिखारी था जो भीख मांग कर गुज़ारा करता था चूँकि वह गुरु-शब्द से खाली था, अतएव उसका मन सदा चंचल बना रहता था। इस कारण जिह्वा पर भी उसे नियंत्रण नहीं था। एक दिन भीख मांगने गया तो उसे भीख में चावल और मूँग की दाल मिली। ले गया एक बुढ़िया के पास। उसे कहा कि मुझे इस चावल दाल की खिचड़ी पका दो। बुढ़िया ने आग जलाई और चावल-दाल को देगची मे डाल कर चूल्हे पर पकने को धर दिये। जितनी देर तक खिचड़ी बने, उतनी देर तक भी उस भिखारी से चुप न बैठा गया। मन और जिह्वा पर नियंत्रण तो था नहीं, सोचने लगा कि यह वृद्धा अकेली रहती है इसकी गुज़र कैसे होती होगी? अऩ्ततः बुढ़िया से पूछ ही लिया कि तुम्हारी गुज़र-बसर कैसे होती है? बुढ़िया ने कहा कि मेरे पास एक भैंस है, उसका दूध बेचकर अपना पेट पालती हूँ। भिखारी बोला-तुम्हारे घर का द्वार तंग दिखाई देता है,कहीं तुम्हारी भैंस इसमें फँस कर मर गई तो तुम क्या करोगी?
     बुढ़िया को यह बात अच्छी न लगी, बोली-ऐसे अशुभ वचन मत बोलो, वरना अधपके चावल दाल लेकर अपना रास्ता नापो। भिखारी ने अऩुनय-विनय की और चुप बैठने का वचन दिया। किन्तु उसका चंचल मन बिना शब्द के ताले के चुप न रह सका। कठिनता से एक मिनट बीता तो फिर पूछा कि तुम अकेली हो अथवा तुम्हारी कोई सन्तान भी है? माई बोली- मेरा एक लड़का है मोटर ड्राइवरी का काम सीख रहा है। भिखारी बोला-मोटर दुर्घटना हो जाय और तुम्हारा लड़का मर जाये तो क्या करोगी? माई से उसकी बात सहन न हो सकी। अधपकी खिचड़ी की देगची उतार कर बोली-यह लो अपनी खिचड़ी और तत्काल नौ दो ग्यारह हो जाओ। उसके पास बर्तन तो था ही नहीं, चादर की झोली में खिचड़ी डलवाई और अपने भाग्य को कोसता हुआ वहां से चल दिया। मार्ग में चावलों की मांड बहती जा रही थी। किसी ने पूछा कि यह क्या बह रहा है? भिखारी बोला-यह मेरे मुख से निकले हुये कटु वचनों का परिणाम है, जो मेरी झोली में पड़ा हुआ है, वही बह रहा है। गुरुवाणी में वचन है किः-सहु वे जीआ अपणा कीआ। ऐ जीव! अपनी करनी का फल भोग। और यह वास्तविकता है कि सब लोगों को अपने किये हुए कर्मों का अर्थात् मन, वचन और कर्म का फल भोगना पड़ता है; प्रत्येक को अपनी जिह्वा का फल चखना पड़ता है। प्रकृति किसी के साथ पक्षपात नहीं करती।
                कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहि सो तस फल चाखा।।
     मालिक ने जगत में कर्म को ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल पाता है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं कि जो लोग कटु वचन बोलने के आदी हैं, वे मानो जिह्वा पर तलवार बाँध रखते हैं और दूसरों का दिल दुखाकर उनकी आत्मा को हानि पहुँचाते हैं। इसलिये सत्पुुरुषों इन वचनों में हमें चेतावनी देकर सावधान किया है कि सदैव मधुर वाणी से भक्ति भरी वार्तालाप करो। इस प्रकार के वार्तालाप का फल सदैव शुभ और सुखदायक होता है। वह तुम्हें भी सुखी करेगा। सद्गुरु सच्चे पादशाह जैसा जीव का हितकारी अन्य कोई नहीं हो सकता। यदि हम उनके मार्गदर्शन में चलकर और उनके फरमान को शिरोधार्य कर अपने पुराने स्वभाव को बदल देंगे, तो कौड़ी से हीरा बन जायेंगे।
     देखो!द्रोपदी ने दुर्योधन को बिना तोले दो-चार शब्द ही तो कहे थे-अंधे का अन्धा बेटा, परन्तु इन शब्दों का कितना भयानक परिणाम निकला? इतनी महान् लाभ-हानि है जिह्वा पर नियंत्रण रखने और न रखने में। इस भारी लाभ-हानि को दृष्टि में रखते हुये श्री सद्गुरुदेव भगवान हमें सदैव संयम में रहने और अपनी जिह्वा पर नियन्त्रण रखने का उपदेश फरमाया करते हैं।
     और यह भी ध्यान रखो कि मुख से दो प्रकार के कार्य हुआ करते हैं अथवा जिह्वा दो प्रकार के काम करती है-एक बोलना और दूसरा खाना। जो लोग भोजन भी आवश्यकतानुसार करते हैं, वे लोग स्वास्थ्य जैसी अमूल्य नेमत के अधिकारी बनते हैं। इसके विपरीत जो लोग स्वादिष्ट पदार्थों के लोभ में आकर आवश्यकता से अधिक खा जाते हैं, वे बदहज़मी का शिकार होकर स्वास्थ्य जैसी अमूल्य वस्तु से हाथ धो बैठते हैं।   मिठा करिकै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु।।

     एक सेठ का लड़का खाने-पीने का बहुत शौकीन था। बहुत खाने के कारण उसकी तोंद फूल गई और बदहज़मी के रोग में ग्रस्त होकर शय्या पर पड़ गया। डॉक्टर ने उसके लिये यह उपचार बतलाया कि उसे तीन दिन तक उपवास कराओ; केवल नींबू का रस पानी में डाल कर देते रहो। इस उपचार से उसके स्वास्थ्य की आशा हो सकती है,अन्य कोई साधन नहीं। दो दिन तक उसने डॉक्टर के परामर्श पर आचरण किया और सिवा पानी और नींबू के रस के और कुछ न खाया-पिया। इस उपचार से उसकी शारीरिक अवस्था में काफी परिवर्तन हो गया और वह अच्छी तरह चलने-फिरने योग्य हो गया। किन्तु तीसरे दिन उससे न रहा गया। अपनी मां से केक-पेस्ट्री खाने को मांग ली और मां ने भी बच्चे की ममता में फँस कर उसे दे दी, परिणामस्वरुप रोग ज़ोर पकड़ गया। डॉक्टर को बुलाया गया। उसने आते ही पहला प्रश्न यही किया कि क्या इसको कुछ खिलाया गया? उन्होने साफ साफ बतला दिया कि केक-पेस्ट्री खिलाई है। डॉक्टर ने टंडी सांस भरकर कहा कि खेद! अब इसका रोग ला-इलाज हो गया। अब इसके उपचार में काफी दिन लगेंगे और यह सदैव का रोगी बना रहेगा। यदि जिह्वा पर नियन्त्रण रखता और एक दिन और उपवास रख लेता, तो स्वास्थ्य जैसे अमूल्य पदार्थ का मज़ा लूटता और सारी आयु उचित रुप से खाता पीता रहता और आनन्ददायक जीवन व्यतीत कर सकता। इतना भेद है जिह्वा को नियंत्रण में रखने और न रखने में! और इस भेद को सन्त सत्पुरुष ही सही रुप में जानते हैं। इसी कारण वे जीव को सदैव संयम में रहने का उपदेश फरमाया करते हैं ताकि जीव दुःखरहित जीवन व्यतीत कर सके।
                युक्ताहारविहारस्य   युक्तचेष्टस्य   कर्मसु ।
                युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। 6/17
     अर्थः-""दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।'' किन्तु यह अवस्था-इस प्रकार का रहन-सहन सत्पुरुषों के बतलाये हुये शब्द की कमाई और उनके वचनानुसार आचरण करने से ही प्राप्त होती है। जो भाग्यशाली गुरुमुख गुरु-शब्द अर्थात् नाम का रसपान करते हैं, वे सांसारिक रसों में नहीं उलझते। सांसारिक रस उनकी दृष्टि में फीके पड़ जाते हैं और उन्हें संसार के दुःख-सुख व्याकुल नहीं कर सकते। वे संसार के उतार-चढ़ाव को प्रसन्नतापूर्वक सहन करते हैं। मालिक का हाथ सदैव उनकी सहायता करता है।
     एक महात्मा ध्यानमग्न अवस्था में बैठे थे। एकाएक उनके मुख से एक आह निकल गई। एक गुरुमुख शिष्य ने कारण पूछा तो उन्होने बतलाया कि थोड़ी दूरी पर एक साधु भजन कर रहा था। कुछ शरारती लोग उसे व्यर्थ ही परेशान कर रहे थे। अब तक वह चुप रहकर उनकी सब बातों को सहन करता रहा। उसकी सहायता के लिये आकाश से एक तलवार उतर रही थी, परन्तु उसने अपनी मौनता भंग कर दी और अपशब्दों का प्रयोग करने लगा। इसी कारण वह दैवी सहायता से वंचित हो गया। यह देखकर हमें अत्यन्त खेद हुआ। यदि वह मौन न तोड़ता, तो दैवी हाथ, जो उसकी सहायता को आ रहा था, उससे वंचित न रहता।
      ऊपर के लेख से प्रकट होता है कि जो लोग जिह्वा को नियंत्रण में रखते हैं, वे मालिक के कृपामात्र बन जाते हैं। उनकी सहायता मालिक स्वयं करते हैं। हमारा भी कत्र्तव्य है कि गुरुमहाराज जी के वचनों का परिपालन करके मालिक की कृपा के अधिकारी बनें और उनके शुभ आशीर्वाद को प्राप्त करके अपना लोक और परलोक सफल बनायें और इस वचन को सदैव स्मरण रखें कि कम खाने और कम बोलने अर्थात् मीठा बोलने और नम्रता से पेश आने वाला मनुष्य सदा सुखी और शान्त रहता है।

Saturday, October 29, 2016

भक्ति की प्राप्ति


     भगवान श्री रामचन्द्र जी महाराज अयोध्यावासियों को उपदेश देते हुए कथन करते हैंः-
                भक्ति स्वतन्त्र सकल गुण खानी। बिनु सत्संग न पावहिं प्रानी।।
                पुण्य-पुञ्ज बिनु मिलहिं न सन्ता। सतसंगति संसृति कर अन्ता।।
      ऐ अयोध्यावासियो! भक्ति स्वतन्त्र है अर्थात् वह किसी के अधीन नहीं है। सब गुणों की वह खान है। जितने गुण हैं सब भक्ति से उत्पन्न होते हैं किन्तु ऐसी भक्ति जो गुणों की खान है और स्वाधीन है मिलती कहां से है? फरमाते हैं कि सत्संग के बिना भक्ति को कोई जीव प्राप्त नहीं कर सकता। सत्संग नाम है सन्तों के संग का। उनकी संगति हासिल किये बिना भक्ति नहीं मिल सकती। सन्तों का मिलाप भी कोटि जन्मों के पुण्यों के द्वारा हुआ करता है। जब सन्तों का संग हो जाये तो समझो कि यह पिछले कई जन्मों के शुभ कर्मों का परिणाम है और भगवान की दया है।
     संसारी जीव भगवान की दया का स्वरुप कुछ और समझते है उनका विचार तो यह है कि धन-सम्पत्ति-सन्तान और मान प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाये तो ईश्वर की बड़ी दया हो गई। इन्हीं चीज़ों को वे अपना भाग्य मानते हैं सच्चाई तो यह है कि जब जीव को सत्पुरुषों की संगति मिल जाय तो अपने भाग्य समझने चाहियें। सन्तों की संगति के मिल जाने पर ही जीव जन्म-मरण के चक्र से छूट जायेगा और मोक्षपद का अधिकारी जा बनेगा। अब हमको सोचना चाहिये कि हम कितने भाग्यशाली हैं जो ऐसा ऊँचा आध्यात्मिक दरबार मिला है। ऐसे परिपूर्ण सन्त सद्गुरुदेव जी का सत्संग मिल गया और उनसे नाम की प्राप्ति भी हो गई। इस रहस्य को वे ही जान सकते हैं जिनकी आँखें खुली हैं।
     हनुमान जी जब सीता जी की खोज करते हुए लंका में गये तो क्या देखा कि सारी नगरी राक्षसों से भरी हुई है। फिरते-फिराते एक ऐसी जगह पहुंचे जहां भवन के बाहर "रामनाम' अंकित था। उन्हें यह देखकर बड़ा अचम्भा हुआ कि कहां यह राक्षसों की सारी नगरी और कहां राम-नाम! सोचने लगे कि यह तो कोई राम-भक्त नज़र आता है। प्रातःकाल का समय था। विभीषण जी उठे और उन्होने राम-नाम का स्मरण किया। हनुमान जी को अब तो निश्चय हो गया कि यह कोई भगवान का भक्त है। इससे अवश्य ही मित्रता करके अपने मन का हाल कहना चाहिये। हनुमान जी विभीषण जी से मिले-दोनों के ह्मदय आनन्द से भरपूर हो गये। तब विभीषण ने कहाः-
                अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।
हे हनुमान जी! अब मुझे भरोसा हो गया है कि मुझ पर भगवान की दया है। भगवान की कृपा के बिना सन्तों का मिलाप नहीं हो सकता।
     जो लोग सत्संग में आ गये उनके भाग्य खुल गये हैं। अब उनको चाहिये कि वे अपने भाग्यों का दुरुपयोग न करें। उनका सत्संग में आना केवल भक्ति के हेतु है। भक्ति नाम है दर्शन का, सेवा का और वचनों को सुनने का। ये सब भक्ति के अंग हैं। अगर इनको छोड़कर जीव सत्संग में यदि आता है और मन में अनेक सांसारिक इच्छाओं को संजोए हुए है तो समझो वह अपने भाग्यों को ठुकराता है। उसने भगवत्कृपा का मूल्य सही नहीं आँका।
     क्या हम सत्संग में मायावी पदार्थ मांगने आये हैं? संसारी चीज़ें तो जो हमारे प्रारब्ध में हैं हमें मिल कर रहेंगी। हम चाहे उनकी मांग करें या न करें। जो कुछ भी हमारे भाग्यों में बदा है वह मिल कर रहेगा। अगर सत्संग में आकर भी माया माँग ली और माया मिल भी गई तो परिणाम क्या होगा-शरीर छोड़ते समय यदि सुरति माया में चली गई तो उसे सर्प की योनि मिलेगी मनुष्य से गिर कर यदि जीव सर्प-योनि
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में चला गया तो कितने बड़े घाटे का काम उसने किया। इसका नाम है भाग्यों का दुरुपयोग। इसलिये शिष्य को गुरु-दरबार में पहुँच कर कभी भी मायावी पदार्थों की मांग या इच्छा नहीं करनी चाहिये। यदि कुछ मांगना ही है तो भक्ति-सेवा और दर्शनों की मांग करे।
      भक्ति का दूसरा अंग है दीनता-ग़रीबी। मायाधारी ग़रीब नहीं बन सकता। ग़रीबी का भाव है विनयशीलता और सेवकपन। ऐसा तो कोई करोड़ों में से एक ही निकलता है जो माया पति भी हो और अहंकार रहित भी अन्यथा माया तो सबको अन्धा बना देती है। भक्ति सदा दीनता में निवास करती है। फल वाली टहनी हमेशा झुक जाती है। जिस शाखा पर फल नहीं आये वह सीधी खड़ी रहती है।
                ऊंचे पानी नहिं टिके, नीचे ही ठहराय।
                नीचा होय सो भर पिये, ऊँच प्यासा जाय।।
     जहां अहंकार है वहां भक्ति का क्या काम? रावण अभिमानी था और उसका सगा भाई विभीषण राम का भक्त था। रावण का पुतला बनाकर लोग उसे प्रतिवर्ष भरी समाज में जला देते हैं क्या कभी विभीषण के साथ भी ऐसा हुआ? कारण इसका यह कि विभीषण के अन्दर भक्ति थी और रावण भक्ति विहीन था।
     इसलिये दास बनना सीखो। इसमें सुख है। दास केवल गुरु का नहीं अपितु गुरु के दासों के भी दास बनो। मालिक अन्तर्यामी हैं। वे शिष्य की सारी दिनचर्या को गुप्तरुप से निहार रहे हैं। भक्ति दिखावे को पसन्द नहीं करती। कई लोग दरबार में सेवा इस भावना से करते हैं कि लोग उन्हें भक्त कहें। भक्ति के कर्म लोगों को दिखाकर करते हैं। भक्ति मार्ग में इस बात को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। बीज जो धरती में दब जाता है, वह उगता है और फल देता है-वह मिट्टी में खुद को गला कर अपना रंग-रुप खो देता है। जो बीज धरती के ऊपर ही पड़ा रहा वह निष्फल चला गया। इसी तरह गुप्त रुप से की हुई भक्ति फल देती है और दिखावे की भक्ति ऊपर पड़े हुए बीज की तरह निर्रथक चली जाती है।
     पंचम पादशाही श्री गुरु अर्जुन देव जी का युग था। एक शिष्य ने गुरु महाराज जी के सम्मुख खड़े होकर विनय की-"प्रभो! सच्चे गुरुमुख की महिमा को सर्वदा सुनते हैं-कृपया उसके दर्शन भी कराओ।' सुनकर फरमाया-अच्छा भाई! कभी प्रत्यक्ष रुप में तुम्हें सच्चे गुरुमुख के दर्शन करवाएंगे। कुछ समय पीछे उसी शिष्य को बुलाकर कहा कि "यह हमारा आज्ञापत्र ले जाओ और अमुक ग्राम में हमारा एक सिख रहता है उससे सरोवर की सेवा के लिये पाँच सौ रुपये ले आओ।'
     उस काल में पाँच सौ रुपये बहुत कीमत रखते थे। आज कल जैसा युग न था। वह प्रेमी हुकुमनामा लेकर चल पड़ा। सोचता जाता है कि जिसके नाम यह हुकुमनामा है न जाने वह कितना बड़ा सेठ होगा। पूछताछ करता हुआ वह उस गाँव में जा पहुँचा और उस गुरुमुख के घर जाकर वह आज्ञापत्र उसे दे दिया। वह सिख कैसा था? अत्यन्त निर्धन। घास खोदकर निर्वाह करता था। आज्ञापत्र पढ़ते ही उसके हर्ष का कोई पारावार न रहा। उसे यह चिन्ता न हुई कि पाँचसौ रुपये कहां से आएंगे। वैसे तो उसके पास पाँच पैसे भी न थे। मन में बारम्बार श्री गुरुमहाराज जी का धन्यवाद करता है कि धन्य हैं गुरु महाराज जिन्होंने मुझ जैसे पापी और गुनहगार को भी अपने दासों में गिन कर सेवा का सौभाग्य दिया है। मन में उसे यह भी विश्वास है कि जिन्होने यह आज्ञा भेजी है उसको पूर्ण करने की शक्ति भी साथ में अवश्य भेजी होगी। मैं कौन करने वाला। करने करानेवाले वे मालिक आप हैं।
     मालिक की मौज। उसी समय नगर में ढिंढोरा फिर रहा था कि एक शाही पहलवान मस्कीनियां आया है। उसके साथ जो कुश्ती लड़ेगा उसे जीतने पर एक हज़ार रुपये इनाम दरबार की ओर से मिलेगा और हार जाने पर भी पाँच सौ रुपये पारितोषिक मिलेगा। यह डोंडी सुनकर वह अति प्रसन्न हुआ। दंगल
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का जो समय निश्चित था दूर दूर से पहलवान वहाँ पहुँच गये। दर्शकों की भी वहाँ भीड़ लग गई। मस्कीनियां शाही पहलवान अखाड़े में लगा झूमने। उसे देखकर किसी का साहस नहीं होता था कि सामने आकर ताल ठोंके।
     हार जाने पर भी पाँच सौ रुपये इनाम इसलिये रखा गया था क्योंकि मस्कीनियां की मार यदि कोई एक बार भी खा लेता था उसकी दुर्दशा हो जाती थी। देखते देखते वह गुरु का सिख-दुबला-पतला अखाड़े में मस्कीनियां से लोहा लेने के लिये कूद पड़ा। लोगों ने यह तमाशा देखकर ताली पीटनी शुरु कर दी। लोग यह सोचने लगे कि ऐसा लगता है यह बूढ़ा मरियल आदमी घर से दुःखी होकर मरने को आया है। इधर मस्कीनियां को भी उसे देखकर अचम्भा हुआ कि इसमें अवश्य ही कोई भेद है। वह पूछे बिना रह न सका। उसने कहा-भले पुरुष! आपको मेरे साथ कुश्ती लड़ने का कैसे साहस हुआ? पहले उस गुरुमुख ने मस्कीनीयां को टालने की कोशिश की अन्त में उसने सत्य-सत्य सब भेद बता ही दिया। वह बोला- मुझे श्री गुरु महाराज जी का हुक्म पाँच सौ रुपये सेवा करने का हुआ है। मैं तो हारने के लिये आया हूँ। चाहे मेरा शरीर चला जाय मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं। किन्तु श्री गुरु महाराज की आज्ञा अवश्य पूरी होनी चाहिये। सिख ने आगे कहा कि भाई! एक शरीर तो क्या यदि मैं लाखों शरीर भी गुरु जी की प्रसन्नता पाने के लिये कुर्बान कर दूँ तो भी मैं उनके अगणित उपकारों का बदला नहीं चुका सकता।
     उसके ऐसे भाव गर्भित वचन सुनकर मस्कीनियां अत्यन्त प्रभावित हुआ। कहने लगा-आफ़रीन-आफ़रीन! इतनी सच्चाई! अच्छा भाई! जिन गुरु महाराज जी के लिए तुम इतनी कुर्बानी करने को तैयार हो मुझे भी उनके दर्शन कराओ। हम दोनों लोगों के दिखावे के लिये झूठ-मूठ लड़ाई लड़ते हैं-ऐसा करते करते मैं अपने आपको नीचे गिरा दूँगा और तुम मेरे ऊपर आ बैठना। इस प्रकार मैं हार जाऊँगा और तुम जीत जाओगे। तुम्हें एक हज़ार रुपये इनाम मिलेगा। उन में से पाँच सौ रुपये तुम और पाँच सौ रुपये मैं-दोनों श्री गुरु महाराज जी की दर्शन भेंट करेंगे।
     ऐसा आपस में विचार-विमर्श करके दोनों अखाड़े में लगे कुश्ती लड़ने। होना तो वही था जैसा उन्होंने पहले ही निर्धारित कर लिया था लोगों ने भी देखा कि मस्कीनियां हार गया और  बूढ़ा आदमी जीत गया। लोगों की हैरानी की हद न रही। विश्व प्रसिद्ध पहलवान मस्कीनीयां आँखें नीची करके निकल रहा है। उसने केवल गुरु दर्शन की खातिर अपने मान को धूलि में मिला लिया। गुरु प्रेमी को एक हज़ार रुपये का इनाम मिल गया। मस्कीनियां को साथ लेकर दोनों श्री गुरु दरबार में इनाम सहित उपस्थित हुए। वह हुकुमनामे को पहुँचाने वाला सिख भी उनके साथ में था।
     श्री गुरु महाराज जी उस समय श्री सुखमनी साहिब की रचना कर रहे थे। ग्यारहवीं अष्टपदी लिख चुके थे। अगली अष्टपदी लिखना ही चाहते थे कि ये तीनों श्री चरणों आ खड़े हुए। सारा वृत्तान्त श्री चरण कमलों में सुना दिया। सुनकर श्री गुरु महाराज जी अति प्रसन्न हुए और उन्होने बारहवीं अष्टपदी के आरम्भ में वचन उल्लिखित कियेः-
                सूखी वसे मसकीनियां आप निवारि तले।
                वडे वडे अहंकारिया नानक गरबि गले।।
     भक्ति, जिसकी इतनी महिमा है और जो गुणों की खान है, वह प्रेम-सच्चाई और कुर्बानी से मिलती है। भक्तिमान जीव दीनता से प्यार करते हैं अहन्ता से नहीं। लोग बातों से भक्ति लिया चाहते हैं। भला जो इतनी अमूल्य वस्तु है वह खाली बातों से कैसे हाथ आ सकती है?
     सन्त सद्गुरु ही जीव को भक्ति पथ पर चला सकते हैं। वे हमारी आत्मा के परम हितकारी हैं और
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सच्चे साथी हैं। संसार में कोई भी दूसरा उनके समान हितैषी नहीं है। जो जीव गुरु की चरण-शरण में आ गये हैं, जिन्हें उनके सत्संग की प्राप्ति हो गई है उनके अत्युत्तम भाग्य हैं। कोई कहां तक उनकी सराहना करे। उनको इस दुर्लभ संयोग का आदर करना चाहिये। गुरु वचनों को शिरोधार्य कर जीवन यापन करना चाहिये। समय धीरे धीरे गुज़रता जा रहा है। पानी के बहाव की भांति जो समय निकल गया फिर हाथ नहीं आता। समय का यही सदुपयोग है कि कोई भी क्षण मालिक के सुमिरण बिना व्यतीत न हो। सच्चा जिज्ञासु इस तरह आचरण करता हुआ सच्ची भक्ति का अधिकारी बन जाता है और लोक व परलोक दोनों को सफल बना लेता है

Tuesday, October 25, 2016

समय का मूल्य पहचानो

समय का मूल्य पहचानो
""समय का आदर करोगे तो जगत् तुम्हारा मान करेगा। साधक को चाहिये कि वह हर एक श्वास का ध्यान रखे कि वह शब्द की कमाई में लगकर सफल हुआ है अथवा प्रमाद करने से व्यर्थ में निकल गया।''
    जीवन एक चादर की न्यार्इं है जो श्वासों के तन्तुओं से बुनी है। कल्पना करो कि एक कपड़ा मोटे सूत से बुना हुआ है और दूसरा विशुद्ध ज़री के सूक्ष्म तारों से। तो ज़रीदार वस्त्र का मुल्य सूत के कपड़े से बहुत ही अधिक होगा। यदि ज़री की बजाय कोई सोने की तारों से कपड़ा तैयार करवावे तो उसके दाम और भी बढ़ जाएंगे। किन्तु मनुष्य का एक एक श्वास सोने की तो क्या बात! हीरे जवाहरात से भी बढ़-चढ़कर है। उससे इस मानव जीवन रुपी चादर को बुना गया है।
     जैसे बुने हुए कपड़े में से एक एक तार निकालने लगें तो एक दिन वह कपड़ा समाप्त हो जायेगा। इस जीवन रुपी चादर से प्रतिदिन श्वास रुपी अमूल्य तारें निकलती जा रही हैं। परिणाम यह होगा कि एक दिन यह जीवन शान्त हो जाएगा। जब सोने की तारों से बुना हुआ कपड़ा अगर कोई दस-बीस रुपया मीटर के भाव से बेच दे तो उसे कोई बुद्धिमान व्यापारी न कहेगा। फिर ऐसे श्वासों से बुना हुआ कपड़ा जिसके एक एक श्वास का मोल जानकारों ने त्रिलोकी से भी अधिक बताया है। इसे मुफ्त में ही नष्ट कर देवे तो बुद्धिमान्जन उसे मन्दमति कहेंगे।
     एक व्यापारी ने अपने बच्चे को सौ रुपये का नोट देकर बाज़ार से छोटे नोट लाने को कहा। जब वह लौट कर आया तो उसने नोट गिने तो एक कम था। यह देखकर बच्चे को बड़ी डाँट पड़ी। देखो-जब एक रुपये का घाटा उस सेठ ने सहन न किया तो वह विश्वपति हमारी इतनी बड़ी हानि को कैसे सहन करेंगे जिन्होने हमें श्वासों की असीम निधि देकर संसार में व्यापार करने को भेजा है। जैसे गुरुवाणी में लिखा हैः-वणजु करहु वणजारिया वखरु लेहु समालि।
         तैसी वस्तु बिसाहीऐ जैसी निबहै नालि।। अगै साहु सुजाणु है लैसी वस्तु समालि।।
क्या वे हमारे मालिक नहीं देखेंगे कि यह कौन सी वस्तु खरीद कर आया है? जब वे देखेंगे कि उस
बहुमूल्य राशि के बदले काँच खरीद कर लाया है तो फिर डांट-डपट से हम बच जाएँगे? इस सरकार में भी यही नियम है कि जितनी बड़ी हानि उतनी बड़ी सज़ा। कोई दस बीस रुपये की यदि चोरी करता है तो पुलिस उसे दो-चार थप्पड़ मार कर छोड़ देती है यदि कोई बैंक आदि पर लाखों रुपयों का डाका मारता है तो उसे वर्षों तक कारागर में हवा खानी पड़ती है। मनुष्य को स्वयं ही विचार करना चाहिये कि जो प्रमादी
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मनुष्य मालिक की सौंपी हुई अमूल्य राशि को बड़ी उपेक्षा से गँवा देगा तो वह कितना दारुण दण्ड पायेगा! कर्म का फल तो अवश्य ही मिलना है अतः सयानप इसी में है कि हम ऐसा काम करें ही क्यों जिसका फल हमारे लिये दुःखदायी हो। सच्चे दरबार में हमें लज्जित होना पड़े। सारोक्तावलि के शब्द हैंः-
                ""सब ही कर्मों के आरम्भ में बुद्धिमान सदा फल को सुमरै।''
अर्थः-बुद्धिमान पुरुष वह होता है जो हर एक कार्य करने से पहले उसके परिणाम पर विचार कर ले। सोच समझ कर समय के अन्दर ही अपना पारमार्थिक धर्म सँवार लेवे। जिस कर्म का फल दुःखदायी प्रतीत होता हो उससे अपने आपको बचाकर रखे। सन्तों महापुरुषों ने अपनी वाणी द्वारा हमें बता दिया है कि किस अपराध का क्या दण्ड मिलता है? जिन्होने प्रभु की प्रदान की हुई पूँजी नाम स्मरण के सिवाय मनमति में गँवा दी उनके लिये आदेश हैः-
                जिन गुरु की चोरी करी, गये नाम गुण भूल।
                तेहि विधि चमगादड़ किये, रहे ऊध्र्वमुख झूल।।
उस सच्चे शाह ने तो इन श्वासों से नाम का सौदा करने की आज्ञा दी है, जो उसका वचन भूलकर ये श्वास अपनी इच्छा के अनुसार शरीर और इन्द्रियों की आसक्ति में खर्च कर देता है वह आज्ञा का उल्लंघन करता है। जैसे कोई सेठ किसी नौकर को राशि देकर बाज़ार में भेजे कि अमुक वस्तु ले आओ नौकर उस आज्ञा को भुलाकर वह वस्तु तो न लावे और उस धन को अपने काम में खर्च कर देवे तो सेठ उसे अपराधी की दृष्टि से देखेगा। वैसे ही जो लोग सद्गुरु की प्रदान की हुई श्वासों की अमूल्य पूँजी को अपने मन के अधीन होकर विषय-विकारों में नष्ट कर देते हैं और नाम-स्मरण में नहीं लगाते उन्हें जो दण्ड मिलता है और जिन्होंने उनकी दुर्दशा देखी है उनके वचन हैं कि वे लोग चमगादड़ की योनि में जाकर ऊपर मुंह किये हुए झूला करते हैं। इस प्रकार वे अपने किये हुए बुरे-कर्मों का पश्चात्ताप करते हैं। उन्हें तो मानुष जन्म जब मिलेगा सो मिलेगा किन्तु हमें तो मानव काया में आने का अवसर प्राप्त हो चुका है हम जो कुछ करना चाहें कर सकते हैं।
     जब हमें श्री सद्गुरुदेव जी सावधान करते हैं कि एक एक श्वास पर नज़र रखो कि उस श्वास के बदले में हमने क्या कुछ प्राप्त किया? वह श्वास सार्थक हुआ या निर्रथक चला गया? तो हमारा प्रथम कत्र्तव्य हो जाता है कि हम अभी से चेत जावें और अपनी सुरित की धारा को बहिर्मुख होने से रोककर उसे अन्तर्मुखी कर दें। उसे गुरु-शब्द सो जोड़कर अभय-पद को प्राप्त करें। यदि हम श्री गुरुदेव के वचन के अनुसार आचरण नहीं करेंगे तो प्रकृति रानी भी अपने विधान के द्वारा हमें दण्डित करने से न चूकेगी।
     परमसन्त श्री कबीर जी के पास एक बड़ा सेठ आया। उसको श्री कबीर साहिब जी ने फरमाया कि "झूठे धन को सच्चा और संग जाने वाला मत समझो और नाम की कमाई करो क्योंकि नाम-धन ही सच्चा और साथ जाने वाला धन है।' परन्तु उस सेठ ने यह उपदेश सुनकर भी अनसुना कर दिया और अपने धन के मद में मस्त रहा। कुदरत के काम हैं। कर्म का फल किसी को एक न एक दिन मिलता ही है। वह छोटे बड़ा का पक्षपात नहीं करती। वह सेठ यद्यपि अपने मन की मति से दान-पुण्य भी बहुत करता था परन्तु मृत्यु के उपरान्त वह हाथी जा बना। सिद्धान्त यह है कि गुरु शब्द की कमाई के बिना इस आशा का नाश नहीं होता और जब तक आशा बनी हुई है तब तक चौरासी का चक्र कटता नहीं।
     सौभाग्यवश उस हाथी को काशीराज ने खरीद लिया। वह उसके द्वार पर बँधा हुआ था कि अकस्मात् श्री कबीर साहिब जी का उधर से गुज़रना हुआ तो हाथी सिर धुन धुन कर लगा चिंघाड़ने। परमसन्त श्री कबीर साहिब तो अन्तर्यामी थे तत्काल पहचान गये कि यह कौन है और  क्या  कह रहा है-उसे उन्होंने
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अपनी वाणी में यो कहाः- राज   दुआरे  बन्धिया ,  मूड़ी  धुने  गजन्द।
                      मानुष जनम कब पाइहौं, भजिहौं परमानन्द।।
समझाते हैं कि हाथी अब सिर धुन धुन कर पछताता है और वचन देता है कि मुझे एक अवसर दे तो कि गुरु-शरण में जाकर गोबिन्द का भजन करुँ। श्री कबीर जी ने पूछा कि ऐ गजराज! तुम तो बड़ा दान-पुण्य किया करते थे? अब तुम्हें क्या मिलता है? वह गजेन्द्र बोला कि मुझे उस दान के बदले अब एक समय पर खाने के लिये सवा मन भोजन मिलता है। परन्तु इससे मुझे कोई लाभ नहीं क्योंकि किसी का पेट तो थोड़े से अन्न से भर जाता है और मेरा बड़ा पेट बहुत खुराक मांगता है। इस ढंग से मानो मुझे मनमति से किये हुए दान का फल मिल रहा है। तब श्री कबीर साहिब जी ने यों कथन कियाः-
                बहुत दान जो देत हैं, कर कर लम्बी आस।
                काहू के गज होयेंगे ,  खायेंगे सेर पचास।।
यह दशा होती है मनमति पर चल कर कर्म करने की। मन के वश होकर किया हुआ सत्कर्म भी अपूर्ण पुण्य बन जाता है जैसे गन्दी जगह से गुज़रने के कारण स्वच्छ पवन भी दूषित हो जाता है।
                नाम संगि मनि प्रीति न लावै, कोटि करम करतो न रुकि जावै।।  गौड़ी महला-5
जो मन गुरु शब्द से नहीं जुड़ा वह कदाचित् शुद्ध नहीं हो सकता। जब मन ही विमल नहीं होगा तो विचारधारा कैसे शुद्ध हो सकेगी? जब विचार मलिन होंगे तो कर्म भी श्रेष्ठ न होंगे और बुरे कर्म करने वाला कभी भी दण्ड से बच नहीं सकता। इसलिये सन्त सद्गुरु सब दुःखों के मूल कारण की चिकित्सा करते हैं-कथन करते हैं, ""जितना परिश्रम करो मन को सँवारने के लिये करो।'' श्री वचन हैंः-
                ""छिन छिन मन गुरु चरणन लावै। एक पलक छूटन नहीं पावे।''
गुरु चरणों का प्रताप किसी से छुपा नहीं। यदि ये श्री चरण जल से छू जावें तो वह पानी "चरणामृत' बन जाता है, यदि वे धरती से छू जावें तो वह भूमि तीर्थ बन जाती है। यदि कोई अपना मन उनसे प्रतिपल लगाता रहेगा तो वह क्यों नहीं उज्जवल हो जायेगा। निर्मल मन के पीछे स्वयं भगवान ऐसा भागे आते हैं जैसे दीप शिखा पर पतंगा। आप स्वयं ही विचार करो कि जो सुखों के सागर प्रभु देव हैं वे जिसके ह्मदय में बस जावें तो उसे कौन से सुख की कमी रह जाएगी। यह सद्ग्रन्थों का सार है। जिसने इस तथ्य को समझ लिया और उस पर आचरण कर लिया मानों उसने सब ग्रन्थों के सार को जान लिया और अपना निजी काम बना लिया। कबीर मन निर्मल भया, जैसा गंगा नीर।
                     पाछै लागे हरि फिरै, कहत कबीर कबीर।।
जो मानव मन को निर्मल करने की साधना में लगा हुआ है वही बुद्धिमान् और भाग्यशाली है। अल्पज्ञ संसार पहले चाहे उसका आदर न भी करे उसकी खिल्ली भी करे परन्तु एकदिन आगे चल कर ऐसा आयेगा कि वही जगत् उसके चरण चूमेगा इसमें दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। श्री गुरुनानक देव जी महाराज जब इस साधन में लगे तो संसार ने उन्हें "कुराही' भी कहा "दीवाना' भी कहा "बेताला' जैसे अपशब्द भी कहे। यदि वे संसार का विरोध देखकर अपने संकल्प से विचलित हो जाते तो आज विश्व में उनका नाम सूर्य की भांति न चमकता।
     श्री मीराबाई जब भजन-भक्ति की राह पर चलने लगीं तो और लोगों की बात तो एक किनारे रही अपने आत्मीय जनों ने भी उसे अपार कष्ट दिये। विरोध इतना प्रचण्ड होता गया कि उसका मुँह देखना तक भी उन्हें प्रिय न था। उसकी जीवन लीला को समाप्त करने के लिये उन्होने उसे विष भी दे दिया। परन्तु यदि वह इन दारुण कष्टों को देखकर घबड़ा जाती और उनके कहने पर भक्ति की राह छोड़कर
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चलने लगती तो उसका आज जैसा गौरव न रहता। वह भी सामान्य जीवों के समान काल के विकराल गाल में समा गई होती।
     अतः जो साधक दृढ़ संकल्पपूर्वक भजन भक्ति की कमाई करना चाहे उसका दृढ़ संकल्प होना चाहिये। वह संसार की ओर से आने वाले मिथ्या अपवादों पर यदि ध्यान देने लगे तो मन जगत् की झूठी बातों में आ जाएगा और उसका सारा श्रम धूलि में मिल जायेगा।
     कोई प्रश्न करे कि ऊपर तो समय की सफलता पर चल रहे थे और अब वज्र संकल्प के विषय पर करने लगे हो। परन्तु गुरुमुखों को विचार करना चाहिये कि दृढ़ संकल्प का होना और समय को सफल करना-ये एक ही विषय के दो पहलू हैं। उदाहरणतया-ध्रुव भक्त ने जब समय को सफल करने का काम आरम्भ किया तो समय को निर्रथक कर देने वाली लोभ आदिक शक्तियां उसके पीछे पड़ गर्इं। यदि उसमें दृढ़ संकल्प रखने का गुण न होता तो वह समय के सफल करने के उद्देश्य को सिद्ध न कर सकता।
     अतः हमें भी श्री सद्गुरु देव भगवान् की आज्ञानुसार अपने वज्र संकल्प की शक्ति की परीक्षा करके पग बढ़ाते जाना चाहिये और इस प्रकार परमार्थ के पथ को पार करके निज घर पहुंचने का यथाशक्ति प्रयत्न करना चाहिये।

Thursday, October 20, 2016

इन्द्रिय-दमन


     ""इन्द्रियों का दमन'' इस गुण को जीवन में अपना लेने से मनुष्य को सच्चा सुख-आनन्द प्राप्त होता है। इस श्री वचन का ह्मदयंगम कर और इस पर आचरण करके मनुष्य शीघ्र ही आत्मिक क्षेत्र में प्रगति कर सकता है और प्रभु के धाम में अपना स्थान सुरक्षित कर सकता है। श्री मद्भगवद्गीता में वर्णन हैः-
                इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
                मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।। 3/42
     अर्थः-""इन्द्रियों को स्थूल शरीर से परे कहते हैं; इन इन्द्रियों से परे मन है, मन से भी परे बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त परे हैं, वह आत्मा है।'' और आत्मा के देश का नित्यानन्द तो मनुष्य तभी प्राप्त कर सकता है जब वह मन और इन्द्रियों के रसों से ऊपर उठ जाये। उदाहरणार्थ, श्री नगर उच्च स्थान पर स्थित है। जो मनुष्य वहां की शीतल वायु का आनन्द लेने का इच्छुक है उसको नीचे के स्थानों
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(पठानकोट,जम्मूआदि) से गुज़र कर ऊपर चढ़ना आवश्यक है,तभी वह श्री नगर के वातावरण का आनन्द ले सकता है। इसी प्रकार आत्म-रस का आनन्द भी वही मनुष्य ले सकता है जो नीचे के रस अर्थात् पिण्डदेश के शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध आदि को त्याग कर उनसे ऊपर उठ जाये।
     यदि कोई कहे कि बाहर के राग अथवा शब्दों को सुनने से अपने कानों की रोक थाम भी न करुँ और अनहद शब्द में सुरति भी जुड़ जाये, तो यह नितान्त असम्भव है। जो व्यक्ति राग-रंग अथवा खेल-तमाशे में जाता है, तो वहां के वातावरण में जाने पर शब्द, स्पर्श, रुप, रस और गन्ध के विषय एक के पश्चात् एक अपना प्रभाव डाल कर उसकी बुद्धि को अपने अधीन कर लेते हैं। सत्पुरुषों का कथन हैः-
                इन्द्रिन के बस मन रहै, मन के बस रहै बुद्ध।
                कहो ध्यान कैसे लगै, ऐसा जहां विरुद्ध।। (सन्त चरण दास जी)
     अर्थः-इन्द्रियों ने मन को अपने अधीन कर लिया और मन ने बुद्धि को अपने अधीन कर लिया जबकि चाहिये यह था कि बुद्धि मन को अपने अधीन रखती और मन इन्द्रिर्यों को अपने अधीन रखते। सन्त चरणदास जी फरमाते हैं कि जब ऐसी विपरीत स्थिति हो तो फिर सुरति एकाग्र कैसे हो सकती है? भगवान श्रीकृष्ण मन को वश में करने का उपाय बतलाते हुये फरमाते हैंः-
                असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
                अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्रते।। 6/35
     अर्थः-हे महाबाहो! निस्सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! इसे अभ्यास और वैराग्य द्वारा वश में किया जा सकता है।
      मन को रोकने के दो ही साधन हैं-एक अभ्यास, दूसरा वैराग्य। दोनों के द्वारा मनोवृत्ति एकाग्र होती है। इसलिये जिज्ञासु को चाहिये कि विषयों से विरक्त होकर निरन्तर नाम का अभ्यास करता रहे। जब कहीं नदी के जल पर नियंत्रण करना अभीष्ट हो, तो नदी पर बांध बनाकर उसमें से नहरें निकाली जाती हैं जिससे लाखों एकड़ भूमि की सिंचाई होती है और वह उपजाऊ बन जाती है। इसी प्रकार यदि हम अपने ह्मदय की धरती में हरियाली देखना चाहते हैं तो सुरति को विषय-विकारों की ओर से रोककर उसे सद्गुरु के शब्द में जोड़ना होगा। यद्यपि प्रारम्भ में मन अभ्यास की ओर से हट कर विषयों की ओर दौड़ने का यत्न करेगा, परन्तु शनैः शनैः वह अभ्यास में स्थिर होने  लग जायेगा। सत्पुरुषों का कथन हैः-
                मन जो गया तो जानि दे, दृढ़ करि राखु सरीर।
                बिना  चढ़ै  कमान  के ,  कैसे  लागै  तीर ।।
     मन चाहे भजन में लगे अथवा न लगे, परन्तु शरीर को वश में रखकर प्रतिदिन भजनाभ्यास करना आवश्यक है। कमान पर चढ़े बिना जैसे तीर निशाने पर नहीं लगता वैसे ही शरीर और इन्द्रियों की सहायता के बिना मन भी चाहे कितना ही दौड़ता रहे, वह कोई कार्यवाही नहीं कर सकता। इसीलिये मन की एकाग्रता के लिये शरीर और इन्द्रियों का दमन करना आवश्यक है। कोई व्यक्ति यदि गले में भारी पत्थर बांध कर तैरने का प्रयत्न करे तो उसे कोई भी बुद्धिमान नहीं कहेगा; क्योंकि वह नितान्त असम्भव है।                गलि-पाथर कैसे तरै अथाह।।
     इसी प्रकार आज का मनुष्य अपने गले में विषय-विकार के पत्थर बांध कर संसार-सागर से पार होना चाहता है। भला यह कैसे हो सकता है? सत्पुरुषों के वचन हैंः-
                लगा कर इश्क दुनियां से ख़ुदा का जो वस्ल चाहे।
                कोई ज्यों आग से सर्दी का तालिब बे-अकल होगा।।
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     जगत् से प्रीत लगाकर परमात्म-प्राप्ति का इच्छुक व्यक्ति भी वैसा ही है जैसा कि कोई अल्प-बुद्धि मनुष्य अग्नि के निकट बैठ कर शीतलता की आकांक्षा करे। इसी प्रकार कोई कहे कि सासंारिक भोगों का त्याग भी न करुँ और सच्चे नाम का आनन्द भी प्राप्त कर लूं, तो यह कदापि सम्भव नहीं है।
     कथा है कि दो चींटियाँ जो भिन्न भिन्न स्थान की रहने वाली थीं, उनकी अकस्मात् भेंट हो गई। एक का शरीर बलवान् और दूसरी का दुर्बल था। दुर्बल चींटी ने बलवान् चींटी से पूछा-बहिन! तुम कहां रहती और क्या खाती हो जो इतनी बलवान् हो? उसने उत्तर दिया-मैं मिसरी के भण्डार में रहती हूँ और मिसरी ही खाया करती हूँ। यह सुनकर पहली चींटी के मुख में जल भर आया, बोली बहिन! में तो नमक के भण्डार में रहकर नमक खाते-खाते घुली जा रही हूँ। मुझ पर उपकार कर और अपने साथ मिसरी के भण्डार में ले चल। दूसरी चींटी बोली-अवश्य चलो।
      आदत के अनुसार पहली चींटी ने मुख में नमक भर लिया और दूसरी चींटी के साथ मिसरी के भण्डार में पहुँची। किन्तु जहां भी मुंह लगाती उसे नमक का ही स्वाद मिलता। इस कारण उसे कोई रस न मिला और शिकायत की कि व्यर्थ ही मैं यहां आई, क्योंकि यहां भी वही नमक ही नमक है। मिसरी वाली चींटी ने कहा-बहिन! तनिक अपना मुख तो खोलो, कुछ मुख में रखा हुआ तो नहीं? देखा तो उसके मुख में नमक भरा हुआ था। देखकर बोली-इस नमक को निकाल कर फिर इसका रस चखो। ऐसा करते ही उसे बहुत स्वाद आया और प्रसन्न होकर उसका उपकार मानने लगी।
     भाव यह कि मनुष्य जब तक इन्द्रियों के भोगों के रस को नहीं त्यागता अर्थात् इन्द्रिय-निग्रह नहीं करता, तब तक उसे मालिक के सच्चे नाम के सुमधुर रस का आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता। सत्पुरुषों का कथन हैः- इह रस छाडे उह रसु आवा। उह रसु पीआ इह रसु नहीं भावा।।
     अर्थः-जब मनुष्य ऐन्द्रिक रसों का त्याग कर देता है तब उसे भक्ति का रस प्राप्त होता है। जो एक बार उसका आनन्द ले लेता है, ऐन्द्रिक रस फिर उसकी दृष्टि में नीरस हो जाते हैं।
      श्री सद्गुरुदेव महाराज जी जीव को भिक्षुक से सम्राट बनाना चाहते हैं। उनकी मौज यही है, परन्तु यह जीव तो विषय-विकारों की कौड़ियों में मिथ्या चमक-दमक देखकर और उन्हें सच्चे लाल तथा रतन समझ कर उनमें अटक गया है। उनमें सुरति उलझाने से जीव की भारी हानि है। जीव को हानि की ओर जाता देखकर महापरुषों को दया आती है और वे बार-बार समझाते हैं कि ऐ जीव! विषय विकारों के असत् और अस्थायी रसों में सुरति को मत अटकाओ।
      हमारा भी कत्र्तव्य है कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मौज में चलें। जबकि वे हमें नाम और भक्ति की अमूल्य निधि प्रदान करना चाहते हैं तो हमें भी चाहिये कि तुच्छ पदार्थों का प्रसन्नतापूर्वक त्याग करके सच्चे आत्मिक धन को प्राप्त करें और अपना जीवन सार्थक करें।
     कथा है कि एक राजा अपने राज्यप्रासाद की सातवीं मंज़िल पर जाकर बैठ गया और अपने नौकरों-चाकरों आदि को आज्ञा प्रदान कर दी कि आज के दिन राज्यभवन में से जो व्यक्ति जो कोई वस्तु ले जाना चाहे, ले जा सकता है; कोई रोक-टोक न होगी। आज के दिन जिस वस्तु को कोई हाथ लगायेगा, वह वस्तु उसी की हो जायेगी। सबसे नीचे वाली मंज़िल के सब कमरे पैसों के सिक्कों से भरे हुये थे। कितने ही मनुष्य वहां से पोटलियां बांध-बांध कर प्रसन्नतापूर्वक घर ले गये। दूसरी मंज़िल के सब कमरे पचीस पैसे के सिक्कों से भरे हुये थे, अतएव जो दूसरी मंज़िल पर चढ़े, वे पच्चीस पैसों की गठरियां बांध कर ले गये। जिन्होने तीसरी मंज़िल पर पांव रखा, उन्होने देखा कि कमरों में अठन्नियां भरी हुई हैं; उनसे जितना उठाते बना उठा कर ले गये। चौथी मंज़िल पर जाने वालों को रुपयों के ढेर मिले;उन्होने रुपयों की
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गठरियां बांधीं और मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न हुये। जो लोग पांचवीं मंज़िल पर चढ़े, उन्हें सोना, चांदी, पौंड और अशरफियां प्राप्त हुर्इं। उनसे ऊपर जाने वालों को हीरे, लाल और जवाहिर प्राप्त हुये; वे अपने भाग्य पर इतराते हुये घरों को लौटे। केवल एक बुद्धिमान् व्यक्ति नीचे की सब मंज़िलों की वस्तुओं की ओर ध्यान न देकर सातवीं मंज़िल पर जा पहुँचा और राजा साहिब को हाथ लगाकर कहा कि मुझे और कुछ नहीं चाहिये, केवल आप ही मेरे हो जाइये।
     राजा साहिब वचनबद्ध थे। उसके त्याग और हार्दिक प्रेम को देखकर उस पर प्रसन्न हो गये और उसी के हो गये। जब राजा साहिब ही उसके हो गये, तो एक प्रकार से राज्य की सम्पूर्ण सम्पत्ति ही उसी की हो गई। इसी प्रकार जो विचारवान गुरुमुख संसार के सब पदार्थों और रसों का त्याग करके और शरीर-इन्द्रियों से ऊपर उठ कर केवल एक मालिक की प्राप्ति की ही अभिलाषा मन में रखते हैं, ऐसे गुरुमुख ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होते हैं और आत्म-आनन्द के सच्चे रस का पान करते हैं।
     ऊपर फरमाये गये वचन "इन्द्रिय-दमन' को भुला कर रावण और दुर्योधन की कितनी बुरी दशा हुई? यदि वे इन्द्रिय दमन करते और अनित्य एवं अस्थायी रसभोगों में न फंसते, तो उनकी यह दशा न होती और रावण की तपस्या का भी शुभ परिणाम होता।किन्तु वे मन इन्द्रियों के रसों में फंस गये और परिणाम स्वरुप हानि उठाई। सत्पुरुष चेतावनी देते हैंः-
                निमख काम सुआद कारणि कोटि दिनस दुखु पावहि।
                घरी मुहत रंग माणहि फिरि बहुरि बहुरि पछुतावहि।। गुरुवाणी, आसा म-5
      फरमाते हैं कि ऐ मनुष्य! तू इन्द्रियों के क्षणभंगुर सुखों में फंसकर करोड़ों दिनों तक दुःख पाता है। एक घड़ी का अस्थायी सुख पाकर बाद में बार-बार पछताता रहता है।
     जैसे औषधि-सेवन के साथ-साथ भोजन में संयम बर्तना भी आवश्यक है, वैसे ही नाम का पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करने के लिये काम, क्रोधादि विषय-विकारों से परहेज़ रखने की भी अत्यन्त आवश्यकता है। जो लोग यह कहते हैं कि हमें नाम की कमाई करते वर्षों हो गये हैं, परन्तु हमें पूरा-पूरा रस नहीं मिलता, उनमें कमी यही रह जाती है कि वे इन्द्रिय-दमन नहीं करते। सन्त दादू दयाल जी के वचन हैंः-
                औषधि खाय न पथ करै, विखम व्याधि क्यों जाय।
                दादू   रोगी   बांवरा  ,   दोष   बैद  को लाय।।
     रोगी न तो नियमानुसार औषधि खाये और न ही परहेज़ रखे तो फिर विषम रोग क्योंकर दूर हो? सन्त दादू दयाल जी फरमाते हैं कि अज्ञानी रोगी अपने दोष को तो देखता नहीं और व्यर्थ ही वैद्य को दोषी ठहराता है। नाम के अभ्यास की युक्ति और परहेज़ का ढंग सन्त सत्पुरुष ही जानते हैं।
                हरि अउखधु सभ घट है भाई। गुर पूरे बिनु विधि न बनाई।।
                गुरि पूरे संजमु करि दीआ। नानक तउ फिरि दूख न थीआ।। गउड़ी म.-5
फरमाते हैं कि हे भाई! हरि-नाम की औषधि तो सबके अन्दर विद्यमान है, परन्तु पूर्ण गुरु के बिना उसके प्रयोग की विधि समझ में नहीं आती। जब पूरे गुरु ने उसके प्रयोग का ढंग बतला दिया, तब फिर किसी प्रकार का दुःख शेष नहीं रहता।
     कहते हैं कि जब नादिरशाह ने एक देश पर चढ़ाई की, तो उस देश के राजा ने उससे सन्धि करके उसकी सेना सहित दावत की और भांति-भांति के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करवाये। नादिरशाह ने उन व्यंजनों को देखकर कहा कि इस प्रकार के चटपटे, नमकीन और मीठे व्यंजनों को खाने से मेरी सेना को इनका रस पड़ जायेगा और वह युद्ध के अयोग्य हो जायेगी। अतएव बहिश्तियों (पानी छिड़कने वालों) को
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बुलवाकर सब व्यंजनों पर पानी डलवा कर उन्हें नष्ट कर दिया और दाल रोटी बनवा कर अपनी सेना को सादा भोजन करवाया।
    अब विचार करो कि जब संसार में उन्नति करने के लिये संयम की इतनी आवश्यकता है,तो आत्मिक उन्नति करने के लिये इन्द्रियों को वश में रखना कितना अधिक आवश्यक है? इस बात को सन्त सत्पुरुष ही भली प्रकार जानते हैं कि इन्द्रियों को वश में रख कर सादा और सात्त्विक भोजन करने, सादे वस्त्र पहनने और सात्त्विक जीवन व्यतीत करने में अत्यधिक आत्मिक लाभ है और ऐसा जीवन व्यतीत करने से सुख शान्ति प्राप्त होती है। इसके विपरीत तड़क-भड़क के जीवन में दुःख,कष्ट, चिंतायें भरी हुई हैं। संसार के अनित्य एवं क्षणभंगुर सुखभोगों में फंसकर आम संसारी जीव कितना दुःख,कष्ट उठा रहे हैं। वे इस बात को नहीं जानते कि संयम में कितना अधिक आत्मिक सुख भरा हुआ है? सन्त सत्पुरुषों का संसार में अवतरण ही केवल जीवों को सन्मार्ग दिखलाने के लिये होता है। सत्पुरुष जीव को सचेत करते हुये फरमाते हैं कि तुम जिन्हें रसदायक और मधुर फल समझ रहे हो, उनके अन्दर विष भरा हुआ है।
                नारि पुरुष सब ही सुनो, यह सतगुरु की साख।
                विष फल फले अनेक हैं, मत कोई देखो चाख।।
     सत्पुरुष सबको सम्बोधित करते हुये फरमाते हैं कि संसार में अनेक प्रकार के फल विद्यमान हैं जो प्रकट में अत्यन्त मनमोहक और ह्मदयग्राही दृष्टि होते हैं, परन्तु उनके अन्दर विष भरा हुआ है। इसलिये सन्त सद्गुरु का तुम्हें यह उपदेश है कि इन्हें मत चखना। महापुरुषों ने इस प्रकार के संकेत अपनी-अपनी वाणियों में दिये हैं। जो सौभाग्यशाली जीव महापुरुषों के संकेतों को समझ कर मनमति का त्याग करते हैं, वे धोखा खाने से बच जाते हैं। इसके विपरीत जो मनमति पर चलते हैं,वे काल और माया की चक्की में पिसते रहते हैं।
     सन्त सुन्दरदास जी ने एक प्रेमी से फरमाया कि विषय-विकारों से बचकर रहोगे तो तुम्हारी आत्मिक उन्नति होगी अन्यथा सुख का मुख भी न देख सकोगे। किन्तु उस सेवक ने उनके उपदेश पर ध्यान न दिया। तब उन्होंने ये वचन कहेः-
                सुन्दर तेरी मति गई, समझत नहीं लगार।
                कूकर रथ नीचे चलै, हम खैंचत हैं बाहर।।
    ऐ सेवक! तेरी मति कहां गई जो तू हमारा संकेत नहीं समझता। कूकर तो फिर-फिर रथ के नीचे घुसता है, परन्तु हम उसे बाहर खींचते हैं।
     सन्त सत्पुरुष जीवों को सांसारिक पदार्थों के लोभ से रोकने के लिये ही सदुपदेश फरमातें हैं क्योंकि वे जानते हैं कि जीव यदि इनमें फंस गया तो कालचक्र उन्हें पीस कर रख देगा। आम लोग महापुरुषों के उपदेशों पर ध्यान न देकर बार-बार उसी ओर दौड़ते हैं। उस कालचक्र की मार से बचाने के लिये ही सन्त सद्गुरुदेव ने हमें अपने वचन अर्थात् गुरु-शब्द की डोर पकड़ा दी है। हम यदि उसे दृढ़ता से पकड़े रहेंगे, तो बच जायेंगे। विषय-विकारों का आकर्षण भी अत्यन्त प्रबल है। यदि उस ओर खिंच गये तो मुक्ति रुपी धन से हाथ धो बैठेंगे। तब पश्चाताप करने से कुछ प्राप्त न होगा। इसलिये उचित यही है कि हम सद्गुरुदेव जी के श्री वचन को ह्मदयंगम करें और इन्द्रिय-दमन करके काल चक्र में पिसने से बच जायें।

Saturday, October 15, 2016

भलाई करके भूल जाओ


     यदि तुम किसी के साथ भलाई करते हो और वह उस भलाई के प्रतिकारस्वरुप तुम्हारा कृतज्ञ होना तो दूर उल्टा तुम्हारे साथ बुराई करता है तो तुम कदापि चिंता न करो। अन्तर्यामी मालिक तुम्हारे भले व्यवहार के फलस्वरुप तुम्हें भलाई ही देगा। उसके घर में देर भले ही हो, परन्तु अन्धेर कदापि नहीं है।
     सत्पुरुष फरमातें हैं कि ऐ सेवक! तुम यदि किसी के साथ भलाई करके यह इच्छा रखते हो कि वह तुम्हारा उपकार माने और तुम्हारा मान-सम्मान करे तो फिर ऐसा समझना चाहिये कि जैसे वस्त्र-विक्रेता वस्त्र और लौह-विक्रेता लोहा विक्रय करता है, उसी प्रकार तुम भी भलाई विक्रय करने का कार्य करते हो और असत्य मान-सम्मान की प्राप्ति हेतु भलाई रुपी अमूल्य रत्न को विक्रय करने में प्रसन्नता का अनुभव करते हो। अब तुम ही बताओ कि क्या यह लाभ का कार्य है? निष्काम सेवा करने वाला तो उस सेवा के फलस्वरुप स्वामी को प्राप्त करता है। सेवा करत होइ निहकामी। तिस कउ होत परापति सुआमी।।
     मन में कामना रख कर सेवा करने वाला मन की खटाई से कभी भी नहीं बच सकता। उसके भीतर घृणा एवं शत्रुता के विचार उठते ही रहते हैं और अवसर पाकर क्रोध भी अपना प्रभुत्व जमा लेता है, परन्तु फिर भी मनुष्य भूल एवं भ्रम का आखेट होकर अपने को भद्रपुरुष समझता है। ऐसा मनुष्य अपनी भलाई के प्रतिकारस्वरुप मान-सम्मान प्राप्त न होने पर सदैव अशान्त रहता है और कुढ़ता भी रहता है। अब विचार करो कि बुरा मनुष्य तो हर समय दुःखी एवं अशान्त रहता ही है, यदि भला मनुष्य भी हर समय अशान्त रहे तो भले अथवा बुरे मनुष्य में अन्तर ही क्या रहा? इसीलिये सत्पुरुष चेतावनी देते हैं कि भले मनुष्य को मन से मान-सम्मान प्राप्ति की कामना को निकाल देना चाहिये, क्योंकि इस कामना से ही दुःख, कष्ट, क्लेश, क्रोध आदि बुराइयों का जन्म होता है। झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जान।।
     महापुरुष फरमातें हैं कि ऐ सेवक! असत्य मान-सम्मान को प्राप्त करके क्या करेगा जबकि सम्पूर्ण जगत स्वप्नवत है। जब यहां सब कुछ अनित्य है, तो जिस असत्य मान-सम्मान की प्राप्ति की तेरे मन में इच्छा है, क्या वह तेरे किसी काम आयेगा? कदापि नहींं। इसलिये उसकी इच्छा त्याग दे।
एक अन्य स्थान पर फरमान हैः-साधो मन का मानु तिआगउ।।
     सत्पुरुष उपदेश करते हैं कि मान-सम्मान के विचारों को मन से त्याग दो। यदि हम उनके वचनों की अवहेलना करके उसी वस्तु की आकाँक्षा मन में रखेंगे जिसके त्यागने का वे हमें आदेश देते हैं और फिर अपने को उनका गुरुमुख सेवक भी समझते रहें तो यह बात कहां तक उचित है?
      जब प्राकृतिक नियमों का पालन करने अथवा न करने के शुभ अथवा अशुभ फल से कोई भी नहीं बच सकता तो हम कैसे बच सकते हैं? इसलिये यदि हम अपना जीवन सुख-शान्ति से व्यतीत करना चाहते हैं तो हमें चाहिये कि सत्पुरुषों के वचन जो कि प्राकृतिक नियमों के समान अटल हैं, उनका हम पूर्णरुपेण पालन करें। उनके पवित्र वचनों के वृत्त से एक पग भी बाहर न रखें और मनमति को त्याग कर सन्त सद्गुरु की आज्ञा-मौज में चलें। हमें विश्वास होना चाहिये कि कोई भी कर्म अपना फल दिये बिना नहीं रह सकता और यह भी अटल सिद्धान्त है कि आम का पेड़ लगा कर अखरोट का फल नहीं प्राप्त होता। आम के पेड़ से तो आम का फल ही प्राप्त होगा। परमसन्त श्री कबीर साहिब ने फरमाया हैः-
                 जो तो को काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
                तोहि फूल को फूल है, वा को है तिरसूल।।
     सुकरात यूनान के एक प्रसिद्ध दार्शनिक हुये हैं। एक दिन उनकी स्त्री ने उनके ऊपर गंदा जल फेंक दिया, तो उन्होने हँसते हुये फरमाया कि मेरे मन में कब से यह विचार उठ रहा था कि कभी न कभी तुम वर्षा करके मुझे शीतल कर ही दोगी। आज तुमने मेरे विचार को पूरा कर दिया। हे देवी! तुम धन्य हो। ऐसे शीतल वचन सुनकर उस देवी की क्रोधाग्नि तुरन्त शान्त हो गई और उसने उनके चरणों में गिर कर क्षमा याचना की। यह है जो जीवित प्रमाण बुराई के बदले भलाई करने का। इसका परिणाम भी कितना सुखद एवं उत्तम सिद्ध हुआ। यदि सुकरात मन में यह सोचते कि चूँकि मैं इतना प्रसिद्ध व्यक्ति हूँ,मेरे अनेक शिष्य हैं जो मेरा अत्यधिक सम्मान करते हैं और उनके सम्मुख ही इसने मेरा अपमान किया है और क्रोध में आग बगूला हो जाते तो घर को भी नरक बना देते और उनका जो मान-सम्मान आज जगत में है, स्यात् वह भी न होता। एक दिन पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा कि आपके सन्तों में कौन सी
महानता एवं विशेषता है? भगवान शंकर ने फरमायाः-
                उमा सन्त तकी इहइ बड़ाई। मन्द करते जो करइ भलाई।।
     हे पार्वते! सन्तों की यही बड़ाई है कि जो उनके साथ बुराई करता है, वे उसके साथ भी भलाई ही करते हैं। जैसे कुल्हाड़ा चन्दन की लकड़ी को काटता है, परन्तु चन्दन उसे सुगन्धि ही प्रदान करता है, इसी प्रकार सन्तजन अहित करने वालों के साथ भी सदैव हित ही करते हैं।
     एक महात्मा जी किसी आम के बाग में बैठकर कथा वार्ता कर रहे थे। वहां का राजा और प्रजा के सहरुाों व्यक्ति वहाँ बैठे कथा श्रवण कर रहे थे। उस बाग के चारों ओर पक्की दीवार बनी हुई थी। किसी बालक ने आम का फल प्राप्त करने की इच्छा से आम के पेड़ पर पत्थर फेंका। वह पत्थर महात्मा जी के मस्तक में जा लगा। चूँकि चोट अधिक आई थी, इसलिये रक्त बहने लगा। हाहाकार मच गया। राजा ने आदेश दिया कि पत्थर मारने वाले अपराधी को उपस्थित करो। राज्य कर्मचारी भागे और उस बालक को पकड़ लाये। बालक बहुत घबराया हुआ था। यद्यपि उसने जानबूझ कर महात्मा जी पर पत्थर नहीं फेंका था, परन्तु पत्थर उन्हें लगने के कारण वह अपराध का भागी तो बन ही गया था, इसलिये वह समझता था कि अब उसे कठोर दण्ड दिया जायेगा। किन्तु महात्मा जी ने उसे अपने निकट बुलाया और अत्यन्त प्रेम से पूछा बच्चे! सच-सच बता, क्या पत्थर तूने ही फेंका था? बालक ने रोते हुये उत्तर दिया-हां स्वामी जी! किन्तु मैंने यह पत्थर आप पर नहीं फेंका था, अपितु आम के पेड़ पर फेंका था। यह मेरा दुर्भाग्य है कि वह पत्थर आम को न लगकर आपको आ लगा। चूँकि मैने घोर अपराध किया है, इसलिये मुझे जो भी दण्ड दिया जायेगा मैं भुगतने के लिये तैयार हूँ।
      महात्मा जी ने राजा को सम्बोधित करते हुये कहा-क्यों राजा साहिब! यदि यह पत्थर आम के पेड़ पर लगता तो पेड़ उसे क्या देता? राजा ने उत्तर दिया-वह तो इसे आम का फल ही देता। महात्मा जी ने फरमाया-पेड़ तो पत्थर खाककर भी इसे फल देता जिसके खाने से अल्प समय के लिये इसकी तृप्ति हो जाती। अब जबकि वह पत्थर हमें लगा है तो हम इसे क्या दें? राजा समझ गया कि महात्मा जी का संकेत किस ओर है, अतएव उसने बहुत से धन पदार्थ उस बालक को दिलवा दिये।
     महात्मा जी के ऐसे नम्र एवं साधु स्वभाव को देखकर बालक मन ही मन अति प्रसन्न हुआ। उसने महात्मा जी के चरणों में गिर कर अपराध की क्षमा मांगी और उनकी शरण-संगति में रहकर वह भी गुरुमुख बन गया और तन-मन से उनकी सेवा करने लगा। सन्त महापुरुष बुरे लोगों से भी भलाई का व्यवहार करके उनको भला बना देते हैं।
     पंजाब के प्रसिद्ध नगर लाहौर में छज्जू नामक एक भक्त हुये हैं। एक पठान ने, जो बहुत बड़ा ठेकेदार था, उनपर चोरी का आरोप लगा कर नगर में उन्हें अपमानित करना चाहा। जब वह मुकद्दमा काज़ी के पास गया तो छज्जू भक्त जी सच्चे सिद्ध हुये। तब काज़ी ने यह निर्णय दिया कि छज्जू भक्त जी जोे दण्ड निर्धारित करें, पठान को वही दण्ड दिया जायेगा। उस समय भक्त जी ने यह निर्णय दिया कि सब लोग खाँ साहिब को साधुवाद दें कि आप अत्यन्त भद्र पुरुष हैं। परिणामस्वरुप आज तक धर्मग्रन्थों में छज्जू जी को भक्त-भक्त करके लिखते हैं। यही भक्ति का गुण है जो कि मनुष्य की आत्मा को ज्योतिर्मय बना देता है। यद्यपि बुरे के साथ भलाई करना कठिन कार्य है, परन्तु है अत्यन्त लाभदायक।
    धर्मपुत्र युधिष्ठिर बहुत ही भले पुरुष थे। कौरवों ने यद्यपि उनके साथ अनेक बार बुरा व्यवहार किया, परन्तु वे उनके साथ सदैव भलाई ही करते रहे। जब पाँचों पाण्डव बारह वर्ष के लिये बनवास में थे, तो उन्हीं दिनों दुर्योधन उन्हें मारने के विचार से सेना लेकर वहां गया, परन्तु मार्ग में ही उसे युद्ध में पराजित कर गन्धर्वों के राजा चित्रसेन ने बंदी बना लिया। दुर्योधन के सैनिकों द्वारा यह समाचार जब धर्मराज युधिष्ठिर को ज्ञात हुआ तो उन्होने अपने भाइयों को आदेश दिया कि तुम सब जाओ और दुर्योधन आदि को गंधर्वों के बन्धन से मुक्त कराओ। महात्मा युधिष्ठिर की यह बात भीमसेन एवं अर्जुन आदि को उचित प्रतीत न हुई। और उन्होने इसका प्रतिवाद करते हुये विनय की कि वे लोग तो हमारे प्राण हरने के लिये ही आये थे। अच्छा हुआ कि वे स्वयं ही बन्दी बना लिये गये। यह सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा कि इस समय तुम लोग सब बातों को भूलकर उनकी सहायता करो, यह मेरी आज्ञा है, चारों भाइयों ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर दुर्योधन आदि को गंधर्वों के बंधन से मुक्ति दिलाई। ऐसे भले कामों का फल भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें यह दिया कि उनके सहायक एवं रक्षक बनकर समय-समय पर गुप्त रुप में उनकी सहायता एवं रक्षा करते रहे।
     हम भी यदि चाहते हैं कि भगवान हम पर सदैव कृपा करें और समय-समय पर हमारी सहायता करते रहें तो उनकी कृपा प्राप्त करने का यही साधन है कि जहाँ तक हो सके हम बुरे का भी भला चाहें और अपने ह्मदय में शत्रुता, घृणा, ईष्र्या, द्वेष आदि के कुत्सित विचारों को कदापि घुसने न दें, अपितु उसमें सदैव मालिक का प्रेम और उनके पवित्र नाम को बसाकर हर समय उसे पवित्र एवं शुद्ध बनाये रखें।
     जयदेव जी एक प्रसिद्ध भक्त हुये हैं। वे एक बार जयपुर गये। वहां के राजा ने भण्डारा किया। भोजन उपरान्त राजा ने उन्हें कुछ धन भेंट किया। जयदेव जी ने कहा कि हम इस धन को लेकर क्या करेंगे और कहां संभाले फिरेंगे? किन्तु राजा न माना और वह धन उनकी गुदड़ी में सिलवा दिया। ज्योंही वे नगर के बाहर निकले, कुछ दुष्ट व्यक्तियों ने उन्हें घेर लिया और कहा कि जो कुछ तुम्हारे पास हो, सत्य-सत्य बता दो। उन्होने गुदड़ी वाला धन उनको दे दिया। किन्तु वे तो दुष्ट व्यक्ति थे, उन्होने तो दुष्टता करनी ही थी। उन्होने सोचा कि आगे चल कर यह व्यक्ति हमें पकड़वा न दे, इसलिये अच्छा है कि इसके हाथ-पैर काट कर यहीं-कहीं कुयें में फेंक दें। यह परामर्श करके उन्होने भक्त जयदेव जी के हाथ काट कर उन्हें एक कुएं में फेंक दिया।
     अनायास एक राजा शिकार खेलता हुआ उधर आ निकला। उसके साथियों ने जल निकालने के लिये जब उस कुएं में झांका तो उन्हें जयदेव जी दिखाई दिये। उन्होने उन्हें बाहर निकाला और राजा के पास ले गये। राजा ने जब भक्त जी से पूछा कि किसने आपके हाथ काट कर आपको कुएं में गिराया है तो भक्त जी ने उत्तर दिया-मेरे प्रारब्ध ने मेरे हाथ काट कर कुएं में गिराया है और अब मेरे भाग्य ने ही मुझे बाहर निकाला है। उस उत्तर से राजा समझ गया कि ये कोई मालिक के सच्चे भक्त हैं। वह उन्हें बड़े आदर-सम्मान के साथ अपनी राजधानी में ले गया। वहां उसने एक सत्संग आश्रम एवं धर्मशाला का निर्माण करवाया और स्वयं भी सन्त-सेवी बन गया। वहां जो भी साधु महात्मा आते, उनकी बड़ी आव-भगत होती। साधु-सेवा की चर्चा सुनकर वही दुष्ट लोग भी साधु वेष में वहां आये, परन्तु ज्योंही उन्होंने भक्त जयदेव जी को देखा तो घबरा कर वापस जाने लगे किन्तु जयदेव जी ने उनके साथ अत्यन्त प्रेम काव्यवहार किया और उनके रहने एवं भोजन आदि का उचित प्रबन्ध कराया। उनकी हर प्रकार सेवा होने लगी। कुछ दिन ठहरने के पश्चता् जब वे जाने लगे तो भक्त जी ने राजा से कहकर बहुत से धन-पदार्थ उन्हें दिलवाये और पहुँचाने के लिये राज्यकर्मचारी भी साथ भिजवाये। मार्ग में उन राज्यकर्मचारियों ने भेषधारी साधुओं से पूछा कि अन्य साधुओं की अपेक्षा आपका अत्यधिक सम्मान एवं सत्कार किया गया है, इसका क्या कारण है?
     उन्होंने उत्तर दिया-यह भक्त हमारे गांव का है और पहले एक प्रसिद्ध डाकू था। इसने एक दिन बहुत बड़ा डाका डाला, परन्तु यह उस डाके में पकड़ा गया। राजा तो इसे प्राणदण्ड देना चाहता था, परन्तु हमारे कहने पर राजा ने प्राणदण्ड न देकर इसके हाथ काट कर इसको कुएँ में फिंकवा दिया। अब यह यहां आकर भक्त बन बैठा है। जब उन्होने ऐसा कहा तो धरती फट गई और वे दुष्ट उसमें दब गये। यह घटना देखकर राज्य कर्मचारी अत्यन्त विस्मित हुये। उन्होने वापस आकर राजा एवं भक्त जी के समक्ष सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया, जिसे सुनकर जयदेव जी को अत्यन्त खेद हुआ और खेदपूर्ण स्थिति में जैसे ही उन्होने हाथ मले तो भगवान की कृपा से उनके हाथ फिर से बन गये। यह देखकर राजा भी विस्मित हुआ और भक्त जयदेव जी को वास्तविकता बताने के लिये विनय की। तब जयदेव जी ने सम्पूर्ण वृत्तांत कह सुनाया। सुनकर राजा एवं दरबारियों के मुख से धन्य-धन्य के शब्द निकलने लगे और वे अपना भाग्य सराहते हुये कहने लगे हम कितने भाग्यशाली हैं जो हमें आप जैसे महात्मा पुरुष का मिलाप हो गया है जिनकी संगति में हमें ऐसी-ऐसी शिक्षायें मिलती रहती हैं जिनका बदला हम चुका ही नहीं सकते।
     ऐसी अनेक कथायें इतिहास में वर्णित हैं, जिनके पढ़ने-सुनने से हमारा भी अपनेे इष्टदेव श्री सद्गुरु देव जी महाराज के श्री वचनों में दृढ़ विश्वास होता है, मन शुद्ध-निर्मल होकर भक्ति में लगता है, मालिक का आश्रय प्राप्त होता है तथा दैवी हाथ सदैव रक्षा करता है। मनुष्य जीवन का आनन्द तो तभी प्राप्त होता है जब ऐसे-ऐसे सर्वोत्तम गुण ह्मदय में निवास करें।
                फरीदा जो तै मारनि मुकीआं तिन्हा न मारे घुंमि।
                आपनड़ै  घरि  जाईऐ  पैर  तिन्हा  दे  चुंमि ।।
                      फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढ़ाई।
                       देही  रोगु न  लगई पलै  सभु  किछु पाइ।।
     अर्थः-""जो तुम्हें मुक्का मारे, उसे तुम घूंसा मत मारो, अपितु उसे अपने घर ले जाकर उसके चरण चूमो। ऐसा करने में वह अपने आचरण पर लज्जित होगा और भविष्य में बुराई करने से रुक जायेगा।'' ""तुम अपने मन से क्रोध को निकाल कर बुरे मनुष्य के साथ भी भलाई किये जाओ। ऐसा करने से तुम्हारे शरीर में कोई रोग नहीं लगेगा और तुम्हे सब कुछ प्राप्त होगा।''
     इन वचनों पर आचरण करके यदि हम भी बुरे लोगों के साथ भलाई का व्यवहार करेंगे तो मालिक भी हमारी सदैव रक्षा और सहायता करेंगे और हम निश्चिन्त रहकर अपना जीवन सफल बना लेंगे। यही मानुष जन्म का ध्येय है।

Tuesday, October 11, 2016

आत्म-संयम


                कबीर यह मन मसखरा, कहौं तो मानै रोस।
                जा मारग साहिब मिलै, तहां न चालै कोस।।
                    मनहीं को परमोधिये, मनहीं को उपदेस।
                    जो यहि मन को बसि करै, तो सिष्य होये सब देस।।
     मन को वश में करने का नाम है ""आत्म संयम''। इसके अर्थ हैं अपने आपको वश में करना अर्थात् अपने कर्म, वचन और मन पर अधिकार करना, शरीर, जिह्वा और मन को वश में रखना अर्थात् शरीर से कोई अशुभ कर्म न होने पाये, जिह्वा से कोई अपशब्द न निकले और मन में कभी अशुभ विचार न उठने पाये। यदि मनुष्य अपने शरीर-इन्द्रियों को वश में करके उनका उचित ढंग से प्रयोग करता है,तो यह मनुष्य वास्तव में मनुष्य कहलाने का अधिकारी है। इसके विपरीत जब यह मनुष्य अपने कर्म वचन और मन पर अधिकार नहीं रखता, उचित-अनुचित का ज्ञान नहीं रखता, तो मनुष्यता के उच्चपद से गिरकर अन्य योनियों में गिने जाने के योग्य हो जाता है। इसलिये मनुष्य के सच्चे हितैषी और हितकारी सन्त सत्पुरुष सदैव ही ऐसा शुभ उपदेश फरमाया करते हैंः-जिह्वा को अशुभ बात कहने से, मन को अशुभ बात सोचने से और हाथों को अशुभ काम करने से रोक रखो, क्योंकि जिसके लिये तुम अशुभ सोच रहे हो शायद उसके लिये विधाता को ऐसा अभीष्ट न हुआ तो तुम्हारे सोचने से उसका बुरा तो होगा नहीं, उस अशुभकर्म का प्रभाव स्वयं तुम्हारे ऊपर पड़ेगा। प्रत्येक व्यक्ति के कर्मानुसार शुभ अथवा अशुभ होना तो विधाता के अधीन है। किसी के लिये अशुभ सोचने से मनुष्य का कुछ अनिष्ट नहीं कर सकता उल्टा स्वयं को बुरा अवश्य बना लेता है। प्राकृतिक नियमानुसार विचारों का प्रभाव स्वयं उसी पर वार करता है जैसा कथन हैः-   जैसा सोचोगे, वैसे ही बनते जाओगे। जैसा करोगे, वैसा ही भरोगे।।
      यह कभी न सोचो कि ""विचार केवल विचार ही हैं, यह कोई वस्तु नहीं।'' वास्तव में सत्य तो यह है कि यह संसार विचारों का संसार है। अन्य शब्दों में विचारों के संसार का नाम ही संसार अथवा विश्व है। इस विचार में अत्याधिक शक्ति विद्यमान है। यह विचार ही बार-बार उभर कर जिह्वा को हिलाता है, मस्तिष्क को गति प्रदान करता है और शरीर को कर्म करने पर विवश करता है। भूल कर भी कभी यह न समझो कि वचन कोई शक्ति नहीं रखता। विचार ही का अन्य रुप वचन है और वह जगत-क्रम को उलट-पलट करने की शक्ति रखता है। वचन से ही तो कर्म का आरम्भ होता है। और यह भी कभी न सोचना कि कर्म नितान्त साधारण बात है अपितु इस प्रकार समझो कि यह जगत् कर्ममय है। जो कुछ हुआ, हो रहा है और होगा, वह सब कर्म ही के प्रभाव से हुआ है, हो सकता है, हो रहा है और होगा। कर्म में असीम शक्ति है। यह विचार की तीसरी शक्ति है और इसी कर्म के पीछे विचार और वचन रहकर इसे गतिमान रखते हैं। इसीलिये कहा गया है कि मन-वचन-कर्म अर्थात् मन-जिह्वा और शरीर-इन तीनों को वश में रखो तब परमार्थ-पथ की ओर पग बढ़ाओ। यदि तुम में आत्म-संयम नहीं है तो आत्मिक-धन तुम्हारे हाथ नहीं आएगा। तुम शरीर और इन्द्रियों में फँस कर निर्बल हो जाओगे और अत्यन्त अपमानित होगे। पहले अपना अनिष्ट करोगे, फिर और किसी का अनिष्ट कर सकोगे।

     जो दूसरों के लिये अशुभ सोचता है, उसका मन विषपूर्ण विचारों का रुाोत है। यदि वह ऐसा न होता तो उसमें अपने और पराये को हानि पहुँचाने वाले विचार और विष की धार कैसे निकलती? मनुष्य बुरा होगा तभी तो बुराई सोचेगा। जो दूसरों की बुराई में जिह्वा खोलता है तो मानो उसके मन में बुराई का स्थायी निवास हो गया है और उसके निकलने का मार्ग उसकी जिह्वा बन गई है। यदि वह मन और जिह्वा का बुरा न होता तो किसी के लिये अशुभ वचन क्यों निकालता? जो दूसरों के साथ बुराई करता है वह मन, मस्तिष्क और शरीर का मलीन है, तभी तो वह औरों की हानि चाहता है। जो जैसा है और जैसा जिसने अपने आपको बना लिया है, वह वैसा ही सोचेगा और करेगा भी। यह मान्य और सच्ची बात है जिसके सिद्ध करने के लिये किसी दलील की कदापि आवश्यकता नहीं। इसलिये यदि बुराई से बचना चाहते हो तो पहले शरीर पर, फिर जिह्वा पर और मन पर दृष्टि रखो ताकि शरीर से कोई अशुभ कर्म न होने पाये, जिह्वा से कोई अपशब्द न निकले और मन को कभी किसी के सम्बन्ध में अशुभ सोचने का अवसर न मिले।
     बुराई से बचने का उत्तम उपाय यह है कि रुख को नेकी और भलाई की ओर कर दो। शरीर को बुरी संगति से रोककर सत्पुरुषों की संगती की ओर मोड़ दो। वह नेक हो जायेगा, बुरे कर्मों से बच जायेगा। जिह्वा को अशुभ वचन कहने से रोक दो। उसे मालिक का नाम जपने और सद्शास्त्रों का अध्ययन करने में लगा दो। ऐसा करने से वह शुभ वचन बोलने लगेगी। मन को बुराई सोचने से रोक दो। किन्तु यह भी ध्यान रहे कि मन बेकार रहना नहीं जानता। इसे हर पल कुछ न कुछ सोचने विचारने और समझने का मसाला चाहिये। जब तुम्हारा शरी़र और जिह्वा सत्पुरुषों की शुभ संगति के प्रभाव से शुभ मार्ग की ओर लग जायेंगे अर्थात् जब शरीर शुभ कर्म करने लगेगा और जिह्वा शुभ वचन बोलने लगेगी तो मन को भी शुभ भोजन मिलता रहेगा। संगति अपना प्रभाव डाले बिना कैसे रह सकती है?
                सोहबते सालेह तुरा सालेह कुनद।
                सोहबते ताले तुरा ताले कुनद।। (शेख सादी साहिब)
     अर्थात् नेक मनुष्यों की संगति तुझे नेक बनायेगी और बुरे मनुष्यों की संगति तुझे बुरा बना देगी। सत्पुरुषों की शुभ संगति के प्रभाव से जब शरीर से शुभ कर्म होने लगेंगे और जिह्वा से शुभ वचन निकलने लगेंगे तो उनके प्रभाव से मन भी मालिक की भजन-भक्ति की ओर झुकेगा। विचारों को दृढ़ करने से जब उसे सच्चा रस आने लगेगा तो चंचल से निश्चल होने लगेगा और मनुष्य का मित्र बनकर भक्ति मार्ग में सहायक सिद्ध होगा।
                उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेतः।
                आत्मैव ह्रात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
                    बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
                    अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।। ( 6/ 5-6)
     योगीराज भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी फरमाते हैं कि ऐ अर्जुन! जब यह मन अपना चंचल पन त्याग करके एकाग्र हो जाये तो यही मन ही मनुष्य का मित्र बन जाता है। इसके विपरीत जब यह स्वेच्छाचारी और चंचल बना रहता है तो यही मन मनुष्य का शत्रु बन जाता है।
     मन उसी का मित्र बन जाता है जिसने गुरु के बताये हुये अभ्यास द्वारा इसे वश में कर लिया। फिर यही मन आत्मिक धन प्राप्त करने में सहायता करता है। इसके विपरीत जब यह वश में नहीं होता तो मनुष्य के साथ शत्रुता करता है। यह इसका स्वभाव है।
     मानव मन स्वयं सब शक्तियों का भंडार है। यदि यह सौभाग्य से समय के सन्त सद्गुरु की संगति का लाभ प्राप्त कर ले, तो उनकी संगति के प्रताप से नेकी की ओर लग कर नेक शक्ति का भंडार बन जाता है। जब मनुष्य को सत्पुरुषों की संगति प्राप्त हो जाती है तो मन को वश करने और उसे नेकी के भंडार की ओर लगाने का भेद और ढंग प्राप्त हो जाता है, फिर जितना-जितना सद्गुरु के बताये हुये अभ्यास द्वारा मनुष्य मन को वश में करता जाता है उतना ही वह पवित्र मन और पवित्र विचारों वाला बनता जाता है। आत्मिक शक्ति मन, जिह्वा और शरीर को निरंकुश छोड़ने में नहीं, अपितु उनको वश करने में है। दूसरे शब्दों में आत्म संयम में ही सब शक्ति है और आत्म-संयमी मनुष्य ही पवित्र मन, पवित्र जिह्वा और पवित्र शरीर वाला कहलाने का अधिकारी है और वही सच्चा सूरमा है।
                तीर तुपक से जो लड़ै, सो तो सूर न होय।
                माया तजि भक्ति करै, सूर कहावै सोय।।
     परमसन्त श्री कबीर साहिब जी का कितना प्रभावकर वचन है कि तीर-कमान और तलवार का धनी वह है जो बाहरी शत्रुओं के साथ शस्त्रों के द्वारा अत्यन्त वीरता से लड़ता है। सांसारिक दृष्टि से चाहे उसकी वीरों में गणना हो, परन्तु भक्ति-मार्ग में उसे सूरमा नहीं कहते। भक्ति-मार्ग में सूरमा की उपाधि उसे दी जाती है जो जागतिक विचारों को त्याग कर भक्ति की कमाई करता है। क्योंकि इस मार्ग में मन और माया से पूरा युद्ध करना पड़ता है। जो जिज्ञासु परमार्थ पथ पर चलता हुआ गुरु की कृपा से मन-माया पर विजय प्राप्त करके भक्ति की कमाई कर रहा है, वही सच्चा सूरमा कहलाता है। वही अपने जीवन को सफल बनाता और जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
     पहले भी वर्णन हुआ है कि मन में असीम शक्ति है। एक बार गुरु की कृपा से मन को वश में कर लिया जाये तो फिर यह मन शेष सब कुछ स्वयं ही वश में कर लेता है। और यदि यह डांवाडोल होकर बुराई की ओर झुक गया तो समझ लो मनुष्य दोनों लोकों से गया।
                गये दोनों जहान के काम से हम, न इधर के रहे न उधर के रहे।।
     मन के मलीन और चंचल होने में दुर्बलता और मृत्यु है। इसके एकाग्र और शान्त होने में शक्ति एवं जीवन है। मन को वश में रखने से मनुष्य भक्ति-परमार्थ की ओर अग्रसर होता है और मन को निरंकुश छोड़ देने से मनुष्य शरीर और इन्द्रियों में फँस कर पशु बन जाता है।
     किसी का अशुभ न सोचने और हानि न पहुँचाने में तुम्हारी अपनी ही भलाई और कुशलता है। प्राकृतिक नियमानुसार भलाई करोगे भलाई मिलेगी, बुराई करोगे बुराई मिलेगी। इसलिये बुराई से बच कर भलाई के मार्ग पर चलना हो तो मन वचन और कर्म को वश में रखना अत्यन्त आवश्यक है। यह मान्य और सत्य बात है कि जो मन को वश में नहीं रख सकता, वह किसी दशा में भला और श्रेष्ठ नहीं हो सकता। यदि तुम्हारे संशय युक्त बात कहने से किसी की हानि होने का भय है तो जिह्वा को रोक रखो, इससे तुम बहुत भारी पाप से बच जाओगे। किसी ने क्या खूब कहा हैः-
                ज़ुबां बेमहल खोलना ऐब है, अज़ीज़ो बहुत बोलना ऐब है।।
                ज़ुबां अपनी हद में है बेशक ज़ुबां, बढ़े एक नुक़्ता तो है यह ज़िआं।।
     प्रियवर! बिना अवसर बोलना बहुत बड़ा अवगुण है। हर समय बोलते रहना भी एक प्रकार का अवगुण है। कम बोलने वाली जिह्वा ही वास्तव में जिह्वा है। एक बिन्दु बढ़ जाने से ज़बां (जिह्वा) शब्द ज़िआं बन जाता है। जिसका अर्थ हानि है। ज़बां और ज़िआं के शब्द लिखने में उर्दू में केवल एक ही बिन्दु का अन्तर है। श्री कबीर साहिब जी भी फरमाते हैंः-

                बानी तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल।
                हिये तराजू तोलि के, तब मुख बाहर खोल।।
     जिह्वा में वक्तृत्व शक्ति अर्थात् बोलने की शक्ति का गुण एक अमुल्य देन है, परन्तु शर्त यह है कि कोई इसे उचित रुप में उपयोग में लाने का ढंग सीख ले। वह ढंग यह है कि पहले मन में भली प्रकार विचार कर ले कि इस बात के कहने से क्या लाभ अथवा हानि है। अथवा इस बात में सत्य कितना है और असत्य कितना है? पहले इन सब बातों का अनुमान लगा ले कि इस वचन के बोलने से दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यदि हर प्रकार से तोलने और विचार करने पर उचित समझे और उचित अवसर देखे तो उस वचन को मुख से बाहर निकाले वरना चुप रहे।
     महापुरुष के वचन हैं कि मनुष्य का शरीर एक दुर्ग की भांति है। इसके भीतर आत्मा का विश्राम-गृह है। यद्यपि इस दुर्ग रुपी महल के और भी कई द्वार हैं, परन्तु मुख एक विशेष द्वार है। जिह्वा इस द्वार का चौकीदार और द्वारपाल है। इसके द्वारा अन्दर के भेद बाहर जाते हैं और बाहरी विचारों का आक्रमण भी इसी जिह्वा के द्वारा ही आत्मा पर हुआ करता है। चूँकि इसको बहुत ज़िम्मेवारी सौंपी गई, इसलिये इसकी चौकीदारी अत्यन्त आवश्यक समझी गई और इसे एक और छोटे से दुर्ग में अर्थात् बत्तीस दांतों की चारदीवारी में बन्द कर दिया गया है, ताकि अत्यन्त आवश्यक समय में ही इसे काम में लाया जा सके, बिना आवश्यकता के हर समय व्यर्थ वार्तालाप यह जिह्वा न करती रहे।
                चूँ मर्द सख़ुन न गुफ़्ता बाशद, ऐब-ो-हुनर निहुफ़्ता बाशद।।
                हर बेशा गुमां मब्बर के ख़ालीस्त, शायद के पलंग खुफ़्ता बाशद।।
                                                         (शेख सादी साहिब जी)
     जब तक मनुष्य मुख से कोई बात नहीं कहता, उसके गुण-अवगुण-दोनों ही गुप्त रहते हैं। उसकी दूसरे मनुष्य पर धाक जमी रहती है कि न जाने इसके मन में कौन सी बात है? प्राकृतिक नियम को देखते हुये मनुष्य वास्तव में यह नहीं कह सकता कि प्रत्येक वन वन्य पशुओं से खाली है। सम्भव है कि कोई शेर-चीता आदि सोया पड़ा हो।
     ऊपर के विषय में जिह्वा को बन्द रखने का वर्णन चल रहा है। यदि इस विशेष द्वार पर ताला लगा रहेगा तो मनुष्य बहुत सी बाहरी आफ़तों से सुरक्षित रहेगा। सत्पुरुष सदैव जिह्वा, कान और नेत्र बन्द रखने का उपदेश फरमाते हैं। ये द्वार विशेष आवश्यकता के समय ही खोले जायें। बिना आवश्यकता के हर समय इनका खुला रहना भय से खाली नहीं। शरीर और मन को वश में करने में इनका विशेष हाथ है। ये द्वार बन्द रहेंगे तो मन और शरीर भी काफी सीमा तक वश में रहेगा। तभी कहा है किः-
                चश्म बन्द व गोश बन्द व लब बबन्द।
                गर न बीनी नूरे-हक बरमन बखन्द।।  (हज़रत मौलाना रुम साहिब)
     ऐ मनुष्य! आँख को बन्द रख (यह सहज समाधि की ओर संकेत है), कानों को बन्द रख ( अनहद शब्द के श्रवण की ओर संकेत है) और मुख को बन्द रख (यह अजपा जाप की ओर संकेत है)।
     सत्पुरुषों के बतलाये हुये अभ्यास के द्वारा मनुष्य यदि अपने आँख, कान और मुख को बन्द रखे तो अपने घट में मालिक के ज्योतिर्मय स्वरुप का दर्शन अवश्य कर सकेगा। हज़रत मौलाना रुम साहिब सूफी फकीर उच्च स्वर में फरमाते हैं कि जो मनुष्य आत्म-संयम की मन्ज़िल को पार कर चुका है,जिसने अपने मन, आँख, कान और जिह्वा को वश में कर लिया है, ऐसा करने पर यदि वह आत्मिक धन से वंचित है और घट में ज्योतिर्मय स्वरुप के दर्शन नहीं कर रहा, तो वह निःस्सन्देह मेरी हँसी उड़ा सकता है।

इसका अर्थ यह है कि वह पूरे विश्वास से फरमाते हैं कि इस अभ्यास के द्वारा मनुष्य सुगमतापूर्वक आत्म-संयमी बन सकता है, अपने शरीर और मन-इन्द्रियों को वश में कर सकता है और चाहे किसी भी धर्म का हो और कोई भी साधन करता हो अपने घट में मालिक के ज्योतिर्मय स्वरुप के दर्शन कर सकता है। ऐसे गुरुमुख जिज्ञासु की प्रशंसा में कहा गया है किः-
                हाथी पर जो सवार है वोह भी ज़ेरे-वार है।
                दिल पर है जो सवार वोह शहसवार है।।
     हाथी पर सवारी करने वाला भी मन के हाथों विवश देखा गया है। किन्तु वास्तव में वही मनुष्य ही सच्चा सूरमा और कुशल सवार है जिसने अपने मन को वश में कर लिया है। इसलिये मन, वचन और कर्म (मन जिह्वा और शरीर) को वश में रखने का पूरा-पूरा यत्न करो। मन से निकला हुआ विचार जल के रुाोत की वह धार है जो कभी बाहर निकल कर वापिस अपने केन्द्र की ओर रुख नहीं करता। जिह्वा से निकली हुई बात वह बाण है जो कभी कमान के चिल्ला की ओर नहीं लौटता। हाथ और शरीर से किये हुये अशुभ कर्म उस बिजली के समान हैं जो आकाश से गिरकर फिर कभी ऊपर नहीं उठती। इसलिये भली प्रकार सोच समझ कर और किसी परिपूर्ण सन्त सद्गुरु की शरण-संगत में जाकर उनके मार्ग दर्शन और सहायता के प्रताप से अपने आपको वश में करने का पूरा यत्न करो। शरीर, मन और जिह्वा आदि पर पूरा संयम रखोगे तो सहरुाों कष्टों से सुरक्षित रहोगे और आत्म ज्योति देख सकोगे। इसी का नाम आत्म-संयम है और यह स्थिति जब भी प्राप्त होगी सन्त सद्गुरु के बतलाये हुये अभ्यास की कमाई करने से ही प्राप्त हो सकेगी। जितनी जितनी अभ्यास में उन्नति होती जायेगी, उतना-उतना अपने आप पर संयम होता जायेगा और भक्ति-परमार्थ का धन प्राप्त होता जायेगा। जिससे यह लोक भी सुखी होगा और परलोक भी सँवर जायेगा।

Friday, October 7, 2016

जेे सौ चन्दा ऊगवैं


     इस संसार में प्रत्येक मनुष्य एक यात्री है और हर पल हर समय जीवन की गाड़ी में यात्रा तय कर रहा है। अब देखना यह है कि मनुष्य जो यात्रा कर रहा है वह दुःखदायी है अथवा सुखदायी? अर्थात् मन कर के मनुष्य दुःखी है अथवा सुखी? इस बात की पहचान किसी ने बाहर से नहीं करनी। प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर झांक कर अपने आप की स्वयं ही निरख-परख कर सकता है कि वह किस स्थिति में है? मन शान्त है अथवा अशान्त? यदि मन सुखी एवं शान्त है तो समझो कि वह व्यक्ति अपनी जीवन-यात्रा प्रकाश में तय कर रहा है और यदि स्थिति इसके विपरीत है तो निश्चय ही वह अन्धेरे में है। मनुष्य यात्री है और जीवन एक यात्रा है। उसे कोई प्रकाश में तय करे अथवा अंधकार में, मार्ग तो नहीं देखता कि यात्री अंधेरे में यात्रा कर रहा है अथवा प्रकाश में। यही सोचना यात्री का काम है। अंधकार और प्रकाश का सम्बन्ध मन के साथ है, शरी़र के साथ नहीं। जिस प्रकाश का ऊपर वर्णन आया है उस प्रकाश से अभिप्राय बाह्र प्रकाश से कदापि नहीं। बाह्र सृष्टि के सूर्य, चन्द्रमा, तारागण आदि मनुष्य की आन्तरिक सृष्टि को प्रकाशित नहीं कर सकते। घट में प्रकाश करने वाली शक्ति कोई और ही है। सन्तों सत्पुरुषों का कथन हैः-        जे सउ चंदा उगवहि सूरज चढ़हि हज़ार।
                एतै चानण होंदिआँ गुर बिन घोर अंधार।।
      महापुरुष फरमाते हैं कि यदि संसार में सैंकड़ों चन्द्रमा और सहरुाों सूर्य एक साथ उदय हो जाये, तो इतने प्रकाश के होते हुये भी सन्त सद्गुरु के ज्ञान के बिना मनुष्य की आन्तरिक सृष्टि में अंधकार व्याप्त रहता है। सत्यता यह है कि परिपूर्ण सन्त सद्गुरु ही संसार में प्रकाश के स्तम्भ होते हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारी जीवन-यात्रा प्रकाश में तय हो तो आवश्यक है कि हम अपने मन, चित्त और बुद्धि का सम्बन्ध समय के सन्त सद्गुरु के चरणों से जोड़ दें।
     यदि कोई कहे कि हमें सन्त सद्गुरु तो मिल गये हैं और उनसे हमने चित्त का सम्बन्ध भी जोड़ रखा है, परन्तु फिर भी हमारे मन में न प्रकाश है और न सुख ही, अपितु हम तो अभी तक अंधकार में ही ठोकरें खा रहे हैं और अत्यन्त दुःखी हैं, तो इसका अभिप्राय यह हुआ कि उसे अभी तक गुरु से प्रकाश मिला ही नहीं है। वास्तव में बात यह है कि उसने अभी तक अपने मन का सम्बन्ध सद्गुरु के साथ जोड़ा ही नहीं है अन्यथा ऐसा कब सम्भव है कि प्रकाश के भण्डार से सम्बन्ध जुड़ जाये और फिर प्रकाश की प्राप्ति न हो। उसके घट में अंधेरा रहे, ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। उदाहरणार्थ आप अपने घर में बैठे हुये हैं। एक बटन के दबाते ही सारे घर को प्रकाशमान् कर लेते हैं, यद्यपि प्रकाश का भण्डार अर्थात् पावर हाउस तो आपके घर से कितने ही मीलों की दूरी पर स्थित है। आपको वहां से प्रकाश मिलता रहता है, परन्तु शर्त यह है कि विद्युत के तार के द्वारा वहां तक सम्बन्ध भली प्रकार जुड़ा हुआ हो। यदि कहीं सम्बन्ध में त्रुटि हो गई तो फिर बार-बार बटन के दबाने अथवा नीचे ऊपर करने से प्रकाश कदापि नहीं हो सकेगा। यही अवस्था उसके मन की भी समझनी चाहिये जो कहता है कि मैने गुरु तो धारण कर रखा है, परन्तु मेरे अन्दर अभी तक प्रकाश नहीं हुआ। अर्थात् उसने भी ऊपर-ऊपर से तो सम्बन्ध जोड़ रखा है, परन्तु मन से अभी तक सम्बन्ध नहीं जोड़ा।
                गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तिन ताप।
                हर्ष सोक व्यापै नहीं, तब गुरु आपै आप।।
     सन्त सद्गुरु का मिलाप तभी समझना चाहिये जबकि मन में से मोह, ममता और तीनों तापों (आधि, व्याधि, उपाधि) का अंधकार दूर हो जाये। जब जीव को हर्ष-शोक और सुख दुःख न व्यापे तब जानो कि उसके ह्मदय में गुरु का निवास है। यदि जीव के मन में मोह-माया के विचार विद्यमान हैं तो जीव अंधेरे में है। यहां उन लोगों के विषय में वर्णन हो रहा है जो प्रकाशस्तम्भ के निकट आ चुके हैं अर्थात् जो समय के सन्त सद्गुरु से नाम की दीक्षा प्राप्त कर चुके हैं और जिन्हें अपना परलोक संवारने का विचार है। उन लोगों का यहां वर्णन नहीं कर रहे हैं जिनको अभी तक अपने उद्धार का कोई ध्यान नहीं है और न ही वे सत्संग के वृत्त में आये हैं।
     प्रकाश न मिलने का कारण क्या है? जीव के अन्दर अंधकार क्यों छा जाता है? प्रकाश क्योंकर होगा? इन बातों की ओर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं, यद्यपि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है। जिसकी पाचन-शक्ति ठीक न हो उसे खट्टे डकार आते हैं, परन्तु जिसकी पाचन शक्ति ठीक होती है, उसे भोजन भली प्रकार पच जाता है। यह एक बनी बनाई बात है। इसी सिद्धांतानुसार जिस के मन में काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकारादि विकारों की प्रबलता है तो समझना चाहिये कि पारमार्थिक दृष्टि से उसका मन स्वस्थ नहीं है। इसके विपरीत यदि मन में शुभ विचार उठते रहें तो उसका मन पारमार्थिक दृष्टि से स्वस्थ समझना चाहिये। सन्त सत्पुरुषों के दरबार में इसी बात की पहचान कराई जाती है। उनका युद्ध सदैव मन के साथ हुआ करता है। सत्पुरुष शरीर की ओर कम ध्यान देते हैं।उनकी सम्पूर्ण कार्यवाही मन के संवारने और सुधारने के उद्देश्य से ही हुआ करती है। शरीर की रक्षा एवं उसके पालन पोषण की समझ-बूझ तो प्रत्येक जीव को होती है, परन्तु मन के विषय में आम संसार अनभिज्ञ रहता है। सन्त सद्गुरु शरण में आने का ध्येय ही यही होता है कि जीव सत्संग और सेवा की रगड़ से अपने मन को शुद्ध-निर्मल बनाने का यत्न करे। और इस बात को केवल विचारवान सत्संगी गुरुमुख ही जान सकते हैं। आम मनुष्यों की इतनी समझ-बूझ कहां जो इस पारमार्थिक भेद को समझ सकें।
     पहले वर्णन कर आये हैं कि परमार्थी जीव को इस बात पर विचार करना है कि उसकी जीवन-यात्रा प्रकाश में तय हो रही है अथवा अंधकार में। समय तो व्यतीत हुआ जा रहा है वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। सोना, चांदी, जवाहर तथा धन-सम्पत्ति आदि इतने मूल्यवान नहीं जितना कि समय; क्योंकि ये सब पदार्थ खो जाने पर भी उद्यम और पुरुषार्थ से पुनः प्राप्त हो सकते हैं, परन्तु बीता हुआ समय किसी भी मूल्य पर सहरुाों प्रयत्न करने पर भी पुनः हस्तगत नहीं होता। उदाहरणार्थ, भारत का विभाजन होने पर लाखों लोग अपनी धन-सम्पत्ति लुटा कर पाकिस्तान से भारत आ गये। यहां आने पर उन्हें प्रत्येक वस्तु पुनः प्राप्त हो गई। कई लोगों की आर्थिक स्थिति तो पहले से भी उत्तम हो गई, परन्तु बीता हुआ समय कभी किसी को पुनः प्राप्त हुआ है? नहीं; समय तो घुन के कीड़े के समान है जो प्रत्येक पल मनुष्य की आयु रुपी लाठी को खाये जा रहा है और पल-पल में आयु की लाठी जिसके आश्रय मनुष्य चल फिर रहा है, खोखली होकर कमज़ोर होती जा रही है।
                ग़ाफिल तुझे घड़ियाल यह देता है मुनादी।
                गरदूं ने घड़ी उम्र की इक और घटा दी।।
     ऐ अचेत एवं असावधान मनुष्य! घड़ी की टिक-टिक और घड़ियाल की टन-टन तुझे ढिंढोरा पीट कर चेतावनी दे रही है कि प्रमाद की निद्रा से जाग क्योंकि विधाता ने तेरी आयु में से एक घड़ी और कम कर दी है।
     इस संसार में कितने ही प्रसिद्ध राजा महाराजा हुये हैं। आज यदि कोई उनकी खोज करना चाहे तो उनका पता कब्रा के तख़्तों तक सीमित है। उसके पश्चात् उनके साथ क्या हुआ, वे कहां गये और आज किस अवस्था में हैं, इसके विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं होता। राजा हो अथवा रंक,धनवान हो अथवा दीन, हर एक का पता श्मशान भूमि तक ही चलता है, आगे का पता किसी को नहीं है।
     यह संसार एक मार्ग के समान है जिस पर जीवन की गाड़ी फर्राटे भरती चली जा रही है। मनुष्य तन को मार्ग का एक बहुत बड़ा जंकशन समझना चाहिये। जैसे आप रेलगाड़ी में सवार होकर कहीं लम्बी यात्रा पर जा रहे हैं। प्रत्येक स्टेशन पर थोड़ा बहुत खा-पीकर और घूम-फिर कर आगे को चल पड़ते हैं। इसी प्रकार मनुष्य शरीर में आने से पूर्व जीव रुपी यात्री ने कई प्रकार की योनियां देखीं जो जीवन-यात्रा में स्टेशनों की न्यार्इं आर्इं और चली गर्इं। भाव यह कि कई प्रकार की योनियों को भोगने के पश्चात् अब मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है। यह एक बड़ा स्टेशन ही नहीं, अपितु जंकशन भी है। यहां से वैकुण्ठधाम, स्वर्ग और नरक प्रत्येक ओर को लाइनें निकलती हैं। इसलिये यहां पहुँच कर जीव रुपी यात्री को सम्भलने और सावधान रहने की अत्यन्त आवश्यकता है। कहीं ऐसा न हो कि भूल से मन माया का शिकार होकर अपने पारमार्थिक लक्ष्य से भटक जाये। इस बात को वही समझ सकता है जिसका मन शुद्ध निर्मल है। अशुद्ध मन पारमार्थिक विषयों को नहीं समझ सकता।
     प्रश्न उठता है कि यह मन कैसे शुद्ध निर्मल होगा? इसका उत्तर सन्तों ने इस प्रकार दिया है कि मनुष्य शुभ संगति ग्रहण करे। सन्तों सत्पुरुषों की संगति करने से उसकी समस्त कार्यवाही सही और शुभ होने लगेगी। इसी कारण ही महापुरुषों ने सत्संग करने पर अत्यधिक बल दिया है क्योंकि सत्संग में ही जीव को वास्तविक प्रकाश की प्राप्ति होती है।
                साध संग में चाँदना, सकल अन्धेरा और।
                सहजो दुर्लभ पाइये, सतसंगत में ठौर।।
     अर्थः-प्रकाश तो केवल सन्तों सत्पुरुषों के सत्संग में ही प्राप्त होता है; इसके अतिरिक्त शेष सब स्थानों पर पारमार्थिक दृष्टि से अंधकार ही अंधकार है। सत्पुरुषों की संगति अत्यन्त सौभाग्य से प्राप्त होती है। यह तो निर्विवाद सत्य है कि सत्संग के वचनों को ह्मदयंगम करने और उन पर आचरण करने से आत्मिक प्रकाश मिलता है जिससे मनुष्य का केवल परलोक ही नहीं संवरता, अपितु इस लोक में भी उसे सच्चा सुख-आनन्द प्राप्त होता है। एक बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिये कि सत्संग में आने का वास्तविक ध्येय यही है कि महापुरुषों के दर्शन करने, उनके वचन श्रवण करने और उन पर आचरण करने से मनुष्य के घट का अंधकार दूर होता है और मनुष्य प्रकाश में जीवन यात्रा तय करता है।
     प्रत्येक व्यक्ति इस बात पर विचार कर सकता है कि जिस समय मनुष्य महापुरुषों, सन्तों सद्गुरुओं के दर्शन करता है और एकाग्रता से उनके पावन वचन श्रवण करने में व्यस्त एवं संलग्न होता है तो क्या उस समय भी उसकी सुरति पर पांच चोर अपना प्रभाव डाल सकते हैं? उत्तर मिलेगा-नहीं; क्योंकि उस समय मनुष्य के मन-चित्त में सत्संग के वचनों का प्रकाश है। इसी कारण वह चोरों के आक्रमण से निर्भय रहता है। पांचों चोर और उनके सब साथी अज्ञान और प्रमाद के अंधकार में अपने कुकर्म करते हैं,सत्संग के प्रकाश में उनका दाँव नहीं चलता।
                परदा-ए-शब में ही तो शमा ने कुरबानी ली।
                रोज़े-रोशन में तो परवाने का था आना मुश्किल।।
     अर्थः-रात्रि के अंधकार के आवरण में ही दीपक ने बलि ली, अन्यथा दिन के प्रकाश के शलभ को उससे क्या काम?
    अनित्य एवं क्षणभंगुर संसार के मनमोहक एवं चित्ताकर्षक दृश्य दीपक के समान हैं जबकि मनुष्य का मन शलभ के सदृश है। मनुष्य तभी उन चित्ताकर्षक पदार्थों पर अपने प्राण न्योछावर करता है जबकि मन में अज्ञान और प्रमाद का अंधकार छाया हुआ हो। यदि सद्गुरु के पवित्र दर्शन, ध्यान तथा वचनों का प्रकाश अपनी पूर्ण आभा से मनुष्य के मन में चमक रहा हो तो फिर यह मन भूलकर भी जागतिक पदार्थों की ओर नहीं देखता। इसलिये परमार्थी जीव को चाहिये कि महापुरुषों के पवित्र दर्शन एवं ध्यान से अपने घट को प्रकाशित रखे और उनके सत्संग का भी प्रत्येक पल लाभ उठाया करे ताकि मन सदैव गुरु के वचनों की ज्योति से ज्योतिर्मान् रहे।
                वंदउँ  गुरु  पद कंज , कृपासिन्धु  नररुप  हरि।
                महामोह तम पुँज, जासु वचन रवि कर निकर।।
     अर्थः- मैं श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की वन्दना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रुप में कुलमालिक का अवतार है और जिनके वचन महामोह रुपी घने अंधकार के नाश करने के लिये सूर्य-किरणों के समूह हैं।
     गुरुमुखों के लिये भजनाभ्यास का नियम भी अत्यन्त आवश्यक है। एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि शुभकार्य को कभी कल पर नहीं छोड़ना चाहिये; अशुभ कार्य को चाहे कल पर छोड़ दो। यह भी मन को प्रकाशमान् रखने का एक साधन है। इस प्रकार महापुरुषों द्वारा प्रदत्त ज्ञान-प्रकाश में मनुष्य यदि यात्रा करेगा तो इस लोक में भी सुख से जीवन व्यतीत करेगा और उसका परलोक भी संवर जायेगा तथा मनुष्य जन्म के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति कर मालिक के धाम में भी उज्जवल मुख होगा।