Saturday, July 30, 2016

सुरति को शब्द से जोड़ दो


""तुम अपनी सुरति को गुरु शब्द से जोड़ दो फिर देखो! प्रकृति और उसकी सब शक्तियां तुम्हारे आगे कैसे हाथ बाँधकर खड़ी हो जाती हैं।'' विज्ञान का यह नियम है कि सदा छोटी वस्तु अपनी सजातीय बड़ी वस्तु की ओर भागती है उदाहरणतया-आप एक पत्थर को ऊपर फैंको तो वह धरती की ओर ही दौड़ेगा क्योंकि वह उसका अंश है। पानी की नदी समुद्र की तरफ ही दौड़ी जाती है। दीये की ज्वाला अथवा मोमबत्ती की शिखा ऊपर की ओर ही लपकेगी क्योंकि वह सूर्य का अँश है। सन्तों का कथन हैः-
                रैन  समानी  भान्नु  में  , भानु  अकासे  माहीं।
                आकास समानो सबद में, सबद परे कुछ नाहीं।।
यह प्रकृति शब्द में से उत्पन्न हुई है। यह प्रसिद्ध है कि भगवान ने शब्द का उच्चारण किया कि-""एकोऽहं बहु स्याम्'' अर्थात् मैं एक हूँ अनेक हो जाऊँ इतने शब्द के कहते ही सृष्टि बन गई। गुरुवाणी का वाक हैः-              नाम के धारे सगले जन्त। नाम के धारे खण्ड ब्राहृण्ड।।
नाम से अर्थात् शब्द से ही खण्ड और ब्राहृाण्ड बन गये। उसी नाम के ही आधार पर सब स्थित हैं। इस विचार से जहाँ नाम का निवास है वहां सब पदार्थ भाग-भाग कर पहुँचते हैं सन्तों के पास यही नाम ही कल्पवृक्ष और कामधेनु है। पारजातु इहु हरि को नाम। कामधेन हरि हरि गुण गाम।।
उसी नाम के प्रताप से ऋद्धियां और सिद्धियां उनके द्वार की दासियां बनी रहती हैं। सन्त सत्पुरुषों की यही मौज होती है कि जो सेवक हमारी शरण में आये हैं-वे मायावी मिथ्या पदार्थों की दासता से मुक्त होकर उन के स्वामी बन जाएं और ऐसे शहनशाही पद को प्राप्त करने की जो सहजविधि है,"शब्दाभ्यास' है। सत्पुरुष अपने सेवकों से वही अभ्यास कराते हैं उन जैसे उपकारी संसार में और कोई नहीं है। इनसे नाम दान पाकर सदा के लिये प्रशान्त हो जाता है। आशाएँ काफूर हो जाती हैं। सुरति को सच्चा आश्रय मिल जाता है जिससे वह फिर झूठ की ओर नहीं झुकती। चौरासी का चक्र अनायास ही कट जाता है।
     आप विज्ञान का एक और उदाहरण ले लो। सूर्य की गर्मी से जब वायु हल्की होकर ऊपर को उठती है तो उसका स्थान लेने के लिये भारी हवाएँ दौड़ती हुई आती हैं।जिन्हें तूफान कहा जाता है। ऐसे ही जिस मनुष्य की सुरत शब्दाभ्यास से सूक्ष्म हो जाती है अर्थात् मायावी कीच से मुक्त हो जाती है तो वह ऊपर के चक्रों की ओर उड़ान भरती है। तभी उसके पास संसार के स्थूल पदार्थ भाग-भाग कर आते हैं। यदि त्यागवान पुरुष उन्हें स्वीकार करे तो वे पदार्थ अपने को परमधन्य मानते हैं। कारण यह कि उनका गौरव भी कई गुना अधिक हो जाता है। जैसे देखा जाता है कि जिस भूखण्ड को सन्त सत्पुरुषों ने अपना डेरा लगाने के लिये पसन्द कर लिया तो उसके एक एक कण का कितना मुल्य हो जाता है लाखों लोग उसे श्रद्धा से सीस पर चढ़ाते हैं।जिस लकड़ी के सिंहासन पर बैठने की वे कृपा करते हैं उस लकड़ी को लाखों जीव अपना मस्तक छुआते हैं और अपना भाग्य मनाते हैं। जो जल श्री चरण कमलों को छूकर चरणामृत बनने का गौरव प्राप्त करता है फिर वही अमृत रुप होकर लाखों जीवों को अमर कर देता है। ""गुरुपादोदकं पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते।''
     हज़ारों लोगों के मुख से सुना जाता है कि हमें पृथ्वी जगह नहीं देती हमारे कहीं पांवों टिकते ही नहीं-हमारा धन्धा नहीं चलता। एक जगह जाते हैं फिर दूसरे स्थान की तैयारी में होते हैं। भटक भटक कर व्याकुल हो उठे हैं। इतना अन्तर है-किसी को वह भूमि जगह ही नहीं देती और किसी के आगमन की बाट जोहा करती है।   गहु करि पकरी न आई हाथि। प्रीति करी चाली नहीं साथि।।
                कहु नानक जउ तिआग  दई।  तब ओह  चरणी आई पई।।(रामकली म.5)
यह एक अटल नियम है कि सांसारिक पदार्थों को मन से त्याग दो तो वे तुम्हारा पीछा न छोड़ेंगे। आमने-सामने के किवाड़ खोल दो तो वायु एक तरफ से जाने लगेगी तो दूसरी ओर से हवा आना शुरु हो जाएगी। वायु के जाने का मार्ग रोक दो तो पवन के आने का मार्ग बन्द हो जाएगा। मनुष्य का दायां हाथ क्यों बलशाली होता है? क्योंकि वह अपनी शक्ति खर्च करता रहता है-इसकी तुलना में बायां हाथ कम शक्ति खर्च करता है अतः वह कम बलवान होता है। आप पानी में तैरना चाहो तो पानी को दोनों हाथों से पीछे को फैंकते जाओ तो जल में तैर सकोगे। पानी को यदि पीछे नहीं फैंकोगे तो डूब जाओगे।
                पानी  बाढ़ै  नाव  में , घर में बाढ़ै दाम।
                दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।
     ऐसे ही सांसारिक जड़ पदार्थों को मन से बाहर फैंकते जाओ तो सहज ही भवसागर से तर जाओगे। यदि उन्हें फैंकना नहीं सीखोगे तो तरना असम्भव है। वस्तुतः तो त्यागने का नाम ही पाना है। किसी कवि ने क्या सुन्दर कहा हैः-जब तक न धन दिया था, तब तक ग़रीब था मैं।
                    सब कुछ तुझे ही देकर, अब मैं धनी हुआ हूँ।।
तब तक तो भगवान भी आराम से बैठे थे जब तक नामदेव भक्त की जेब में बीस रुपये थे। जब देखा कि नामदेव ने वे रुपये सन्तों की सेवा में खर्च कर दिये हैं तो एक दम आरी आदि बढ़ई का सामान कन्धे पर उठाया और पल भर में वहां पहुँच कर उसका टूटा हुआ छप्पर तैयार कर दिया।
     भक्त भगवान दास जी एक दिन श्री कालीदास जी के घर गये। जब तक कालीदास के घर को छोड़ेगे नहीं वे अपने घर कैसे पहुँचेंगे? ऐसे ही यह शरीर काल का घर है। इसमें थोड़े दिनों के लिये जीवात्मा(जो कि वास्तव में ईश्वर का अंश है) विहार करने आया है। जब तक यह जीवात्मा इस घर की मोह ममता का त्याग नहीं करेगा तो अकाल पुरुष के देश (निज देश) में कैसे पहुँचेगा? यदि सन्तों की आज्ञा मान कर हर्षपूर्वक इस घर की ममता को नहीं छोड़ेगा तो महाकाल देव इससे दण्ड के बल से छुड़वाएगा।
     एक बन्दर ने सुराही में पड़े हुए चनों की मुट्ठी भर ली जिससे उसका हाथ वहीं अटक गया। किसी बुद्धिमान ने कहा कि मुट्ठी खोल दो,चनों का लालच छोड़ दो तो स्वतन्त्र हो जाओगे नहीं तो मारे जाओगे और चनों से भी हाथ धो बैठोगे। उसने फिर भी कहना न माना फल यह हुआ कि मदारी आया और बन्दर के गले में फन्दा डाला और उसके सिर में दो-चार डण्डे लगा दिये मार भी खाईऔर चने भी हाथ न आये और सदा के लिये कैद भी हो गया यही दशा इस जीव की है। सन्त सद्गुरु हमें समझाते हैं कि ममता की मुट्ठी खोल दो तो बन्धनों से मुक्त हो जाओगे-जो भाग्यवान उनका आदेश मानता है वह मुक्ति का सुख पाता है। जो नहीं मानता उसका यह हाल होता है जैसा कि गुरुवाणी में कहा हैः-
                संपति रथ धन राज सिउ  अति  नेहु  लगाइओ ।
                काल फास जब गलि परी, सभ भइओ पराइओ।। (तिलंग म.9-पृ.727)
अब बुद्धिमान मनुष्य को लाभ हानि पर विचार करना चाहिये एक ओर तो है मोक्ष का सुख और दूसरी तरफ है यम का पाश। एक तरफ तो है लोक और परलोक की सुख-सम्पदा का हाथ लगना-दूसरी ओर है दोनों लोकों में खाली हाथ रहना-यह सोच कर लाभ का काम करना ही बुद्धिमत्ता की निशानी है।
    श्री गुरुमहाराज जी जैसे हमारे परम हितैषी हैं वैसा और कोई भी भूमण्डल पर नहीं है। वे बड़े दूरदर्शी हैं। उनकी दृष्टि दोनों लोकों में हमारी भलाई के लिये पहुँचती है।हमारा धर्म है और इसमें ही हमारी भलाई है कि उनके वचनों को हम सत्य सत्य करके मानें और अपनी सुरति की धारा को उनके दिये हुए शब्द से जोड़ दें। जिससे इस लोक में भी सुखी रहें और परलोक में भी मालिक के आगे निश्शंक होकर जावें।

Wednesday, July 27, 2016

आज्ञा में ही सिद्धी है


""जिस सेवक ने अपने विचार को ईश्वर की मौैज व आज्ञा के साथ मिला दिया तो उसी के विचार को सब देवता और सकल शक्तियाँ पूरा करने का प्रयत्न करती हैं और कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती। इसके विपरीत जो अपनी इच्छा के अनुसार चला वह शून्य का शून्य रहा।''
     सद्गुरु के इन वचनों का जो पालन करता है उसकी रक्षा नियम-निर्माता स्वयं करता है। सच्चे सद्गुरु के दरबार में अधिकारी सेवक को इसी शिक्षा के सीखने का अवसर मिलता है। श्री रामचन्द्र जी को जब भगवान वशिष्ठ जी ज्ञानोपदेश कर रहे थे तो रह रह कर वे शंका करने लगे और निरर्थक वाद-विवाद में समय गँवाने लगे। तब श्री वसिष्ठ जी ने उनसे पूछा-""कि तुम ज्ञानी हो या अज्ञानी? यदि तुम ज्ञानवान हो तो मुझे तुम्हें उपदेश करने की आवश्यकता ही नहीं है यदि तुम अज्ञानी हो तो हमारे वचन सुनो और सत्य सत्य कर उन्हें मानों। इस तरह धीरे धीरे सारा भेद तुम पर अपने आप पर खुल जाएगा और सब प्रश्नों के उत्तर तुम्हें स्वयं मिल जाएँगे। ज्यों ज्यों हमारे वचनों के द्वारा प्रकाश अन्दर जाएगा वैसे वैसे आध्यात्मिक ज्योति बढ़ती जाएगी।
     जब श्री रामचन्द्र जी ने उनके कथनानुसार अपने मन को उन के वचनों से मिलाया सब भ्रम और संशय अपने आप  ही जाते रहे और उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त हो गई जिसके आगे सम्पूर्ण शक्तियां झुककर सेवा करने लगीं।
     अवतारी पुरुषों ने भी इस नियम का परिपालन किया और हमें अपने आचरण से सिखाया। जैसे कि भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ने गीता के तीसरे अध्याय के 21वे श्लोक में कथन किया है।
                यद्यदाचरति  श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो  जनः।
                स यत्प्रमाणं कुरुते, लोकस्तदनु वत्र्तते।।
""यद्यपि इन अवतारों को कोई कर्म का बन्धन नहीं होता तो भी नियम को स्थिर रखने के लिये अपनी मौज से सब कर्म करते हैं जिससे सर्व साधारण को बड़ा लाभ होता है क्योंकि वे बड़ों का ही अनुकरण करते हैं।'' कई बार श्री गुरु महाराज जी कथन किया करते थे कि तुम अपूर्ण से पूर्ण बनने के लिये ही यहाँ आए हो। जैसे जैसे आज्ञा को मानकर सेवा करोगे तुम्हारा अधूरापन दूर होता जाएगा और तुम अपने आप ही अपने को निर्बल से बलवान एवं दुःखी से सुखी पाओगे। तुम्हारे अन्तर में ज्ञान की ज्योति जलती जाएगी और सद्गुरुदेव जी का बहुमूल्य आत्मिक धन तुम्हारे अन्दर स्वतः आ जाएगा जिससे तुम दास से स्वामी बन जाओगे। आशाएं तुम्हें नहीं सताएंगी।
                जिस जन अपना हुकम मनाइया। सरब थोक नानक तिन पाया।।
श्री सतगुरुदेव जी अपनी दात(कृपादृष्टि) श्री आज्ञा में लपेट कर अपने सेवकों को प्रदान करते हैं।
                वाणी  गुरु  गुरु  है  वाणी  विच  वाणी अमृतसारे।
                गुरुवाणी कहै सेवक जन मानै परतख गुरु निसतारे।।
जिस जिसने भी आज्ञा को सीस पर रखा, उसी ने सब कुछ प्राप्त कर लिया और जिसने उस आज्ञा को अपने मन से तोलने का प्रयत्न किया वह और भी भ्रम में पड़ गया वह खाली का खाली रह गया। यही कारण है कि उस एक ही दरबार में से उस ही गुरुदेव जी से कोई रुपये का रुपया लाभ उठाता है, कोई एक पैसे का भी नहीं उठा पाता। श्री गुरुवाकः-इकना ते रंग चढ़ गया इक रह गये अमन अमान।।
जिन्होंने सद्गुरुदेव जी के वचनों पर विश्वास रखा वे भक्ति धन से मालामाल हो गये। जिन्होंने गुरु वचनों की कोई परवाह न की वे भक्ति का लाभ उठाने से वंचित रह गये।
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     राजा जन्मेजय परीक्षित का पुत्र और अर्जुन के तनय अभिमन्यु का पोता था। उसने ब्रााहृणों के कहने पर नागयज्ञ किया जिसमें अनेकों नाग मर गये। क्योंकि उसके पिता महाराज परीक्षित तक्षक सर्प के डसने से मरे थे,और वह इस यज्ञ के द्वारा उसका बदला ले रहे थे। उस यज्ञ में महर्षि वेदव्यास जी भी उपस्थित थे। राजा ने उनसे पूछा कि हमारे पूर्व पुरुषों ने जुआ क्यों खेला था? संग्राम करके इतने वीरों और विद्वानों का नाश क्यों कर दिया था? उन्हें क्यों किसी विद्वान ने न रोका? वेदव्यास जी ने उत्तर दिया कि भावी बड़ी प्रबल होती है।उसे बड़े बड़े महापुरुषों ने भी सिर पर धारण किया है। यह सुनकर भी जन्मेजय राजा को विश्वास न हुआ। वह बोला कि जब मनुष्य को ज्ञात भी हो कि यह काम बुरा है, फिर वह काम करे ही क्यों? वेदव्यास जी त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने कहा कि आज हम तुम्हें सावधान करते हैं कि तुम्हारे पास किसी देश के सौदागर अच्छे अच्छे घोड़े लेकर बेचने को आएंगे। परन्तु तुम उनसे घोड़े न खरीदना। किन्तु होगा ऐसे कि तुम वे घोड़े खरीद लोगे। यदि खरीद भी लो तो उनमें से सफेद रंग का घोड़ा जिसके कान काले हों उसे मत खरीदना। परन्तु तुम उसे भी खरीद लोगे। यदि खरीद भी लो तो उसपर सवार न होना। परन्तु करोगे सही। यदि सवारी करो भी तो दक्षिण दिशा की ओर न जाना। परन्तु तुम अवश्य जाओगे। यदि उधर तुम्हारा जाना हो भी तो वहाँ से किसी स्त्री को अपने साथ न लाना। अगर उसे तुम अपने घर में भी ले आओ तो उसे अपनी रानी न बनाना। परन्तु तुम उसे अपनी पत्नी भी बनाओगे। अगर ऐसा भी कर लो तो उसके कहने में आकर ब्रााहृणों का नाश न कराना। परन्तु तुम उसका कहना मानकर ब्रााहृणों का वध करा दोगे। इस घोर पातक के कारण तुम्हें कुष्ठ रोग हो जायेगा।
     चिरकाल बीत जाने से होनहार ने उससे ऋषि की सभी बातें भुलवा दीं। इससे जो होनहार था वह हो गया। ब्रााहृणों की हत्या के परिणाम-स्वरुप उसे कोढ़ हो गया। तब उसने श्री वेदव्यास जी को स्मरण किया और उनके आने पर यह निवेदन किया कि, सत्पुरुषों का वचन वस्तुतः ही अटल होता है। मैने विश्वास न करने से बुरा फल पाया। अब आप कृपा कर मुझे इस दारुण रोग से छुटकारा दिला दो। वेदव्यास जी ने कथन किया कि आप मुझसे महाभारत की कथा सुनो-उसे जितना तुम सत्य सत्य मानते जाओगे उतना तुम्हारा कोढ़ भी मिटता जाएगा। जहाँ तुम कथा में कोई संशय करोगे कि ऐसा तो नहीं हो सकता, तो शेष कोढ़ शरीर में रह जाएगा। राजा जन्मेजय सत्य सत्य करके कथा सुनते गये।साथ ही साथ कोढ़ भी मिटता गया। जब यह प्रसंग आया कि भीमसेन इतने बलवान थे कि हाथियों को घुमा घुमाकर आकाश में उछाल देते थे,जो आज तक भी नीचे नहीं गिरे। जन्मेजय ने कहा कि यह असम्भव है। उसी समय वेदव्यास जी ने मन्त्रोच्चारण करके जल की चुल्ली आकाश में फैंकी तो गगन मण्डल में गजराज घूमते हुए दृष्टिगोचर हुए। परन्तु उसका कोढ़ वहीं का वहीं रह गया। वह अब दूर होने से रह गया।
     इन दृष्टान्तों से सिद्ध होता है कि जो भी प्राणी महापुरुषों की मौज के अनुसार उतरे हुए वचनों को सच सच कर मन में धारण नहीं करता, वह अति दुःख पाता है, और जो मनमति को एक ताक पर रख कर उनके वचनों को शिरोधार्य करता है उसके पास सुख संपदा की कोई कमी नहीं रहती।

Sunday, July 24, 2016

विश्वास कीजिए


     विश्वास कीजिए-कि हम सब जीवात्मा उस सर्वात्मा परमात्मा के अंश मात्र हैं। परन्तु कुल मालिक से विलग हो जाने के कारण स्वयं को उस मालिक से पृथक मानकर संसार की भूल-भुलैय्याँ में भटक रहे हैं और अकारण ही दुःख, क्लेश और परेशानी का शिकार हो रहे हैं। हमारे मालिक ने जिसके हम अंश हैं हमें अपने से पृथक करके दूर नहीं फेंका है,अपितु स्वयं हम अपने सच्चे मालिक को भुलाकर और उससे जुदा होकर दिनों दिन उससे दूर होते चले जा रहे हैं।
     विश्वास कीजिए-कि जगत की अनेक प्रकार की लुभावनी रचना एवं इसके मोहक आकर्षण ने हमें अपने जाल में उलझा लिया है और हम इन अस्थायी रसों में फंसकर ऐसे मदोन्मत्त हो रहे कि अपने वास्तविक आत्म-स्वरुप को भुलाकर संसार के क्रीत दास बन गये हैं।
     विश्वास कीजिए-कि हमारे मालिक ने तो जगत की नाट्यशाला में हमें एक दर्शक के रुप में भेजा था, परन्तु हम यहाँ आकर जगत की मादकता में ही खो गये। हमारा वास्तविक घर अथवा स्थायी आवास तो सत्लोक में है। पर जगत की रचना ने हमारे पाँव ऐसे जकड़ लिये कि हम यहीं के हो रहे। इस जगत की अस्थायी चमक दमक एवं क्षणिक रसों में खोए खोए हमने इतना दीर्घकाल बिता दिया है कि समय का यन्त्र भी उस दीर्घकाल को नहीं माप सकता। स्वयं हमें ही इसका आभास नहीं रहा कि कितने समय से हम जगत की दासता की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं। अपने निजी घर अर्थात् सतलोक का स्मरण तक हमें नहीं रहा। जगत के मादक रसों एवं विलासता ने हमारे मनोमस्तिष्क पर इतना स्थूल आवरण डाल दिया है कि हम अपनी सुधबुध ही खो चुके हैं।
     विश्वास कीजिए-कि हमारा मालिक जो हमें अपने प्रिय अंश मानता है वह सत्-धाम में हमारे लौट आने की प्रतीक्षा कर रहा है। इधर हम हैं कि गफलत, प्रमाद एवं आत्म-विस्मृति की अवस्था में ही सन्तुष्ट हैं और अपनी इसी मन्दावस्था को ही परम आनन्द मान कर मगन हो रहे हैं। गफलत, प्रमाद और अज्ञान की यह अवस्था हमारी वास्तविक स्थिति नहीं है। अपितु यह तो कपटपूर्ण माया की विडम्बना है। अपनी इस दीन हीन अवस्था में सन्तुष्ट रहना ही हमारी नासमझी का परिचायक है।
     विश्वास कीजिए-कि हमारा मालिक अति स्नेह पूर्वक हमें अपने निकट बुलाना चाहता है। प्रतिक्षण उसकी ओर से बुलावे पर बुलावा आ रहा है। परन्तु हम जगत के मोह में ऐसे गाफिल हैं कि उसकी आवाज़ को सुनकर भी अनसुनी किये जा रहे हैं और उसकी ओर देखकर भी देखना नहीं चाहते। क्योंकि जगत के मोह ने हमारी आँखें बन्द कर रखी हैं।
      विश्वास कीजिए-कि हम अपने उच्चस्तर से इतने गिर चुके और अपने आपको इस सीमा तक भुला चुके कि अपने सच्चे मालिक को भी नहीं पहचान सकते, जो हमारा प्रिय पिता है। न ही हम उसकी आवाज़ को सुनते हैं, जबकि वह हमें हर क्षण अपने निकट देखने को व्याकुल है।

     विश्वास कीजिए-कि किसी स्नेही पिता का प्रिय शिशु यदि किसी मेले की गहमा गहमी में खोकर अपने पिता से बिछुड़ जाये तो वह पिता अपने प्यारे शिशु को खोज निकालने के लिये कितना व्याकुल होता है? क्या कोई पिता यह सहन कर सकता है कि उसका लाडला उससे विलग होकर दर दर भटकता और परेशान होता फिरे? कदापि नही। ठीक इसी प्रकार हमारे दयालु पिता सच्चे मालिक से भी यह कदापि सहन नहीं हो सकता कि उसके अंश अर्थात् हम जीवात्मा उससे विलग होकर जगत की भवाटवी में भटकते और पग पग पर ठोकरें खाते फिरें। इसलिये हमारा दयालु पिता हमें अपने निकट देखने का ह्मदय से इच्छुक है, हमें अपनी स्नेहमयी गोद में बिठलाकर प्यार करने को व्याकुल है; अपने घर में प्रसन्न भाव से खेलते कूदते तथा मुसकानें बिखेरते देखने को लालायित है।
      विश्वास कीजिए-कि हम में से कुछ एक यह कहते सुने जाते हैं कि हमारा मालिक हमसे अप्रसन्न है। हमारी अवज्ञाओं और अवहेलनाओं ने उसे हमसे विपरीत कर दिया है। अथवा यह कि वह हमसे द्वेष करता और हमें अपने से दूर रखना चाहता है। तो उन लोगों का यह कथन सर्वथा गलत एवं अज्ञान पर आधारित है। पुत्र चाहे कितना ही अयोग्य एवं अवज्ञाकारी क्यों न हो, दयालु पिता का ह्मदय उसे अपने से दूर रखना सहन नहीं कर सकता। अपना अंश पिता को अति प्रिय होता है और वह उसे प्रत्येक अवस्था में अपनाने को तत्पर रहता है।
     विश्वास कीजिए-कि जो लोग ऐसा कहते हैं, उनकी अपनी बेसमझी, पथ भ्रष्टता तथा दुष्कृत्यों ने ही उन्हें सच्चे एवं दयालु पिता की ओर से संशकित कर रखा है। परन्तु अज्ञानता तो अज्ञानता ही है,बुद्धिमान पुरुष उसे कभी ठीक नहीं मान सकते।
     विश्वास कीजिए-कि हमारे सच्चे मालिक को यदि कोई बात अरुचिकर प्रतीत होती है तो वह बस यही हमारी बेसमझी और अज्ञानता है अथवा हमारे दुष्कृत्य एवं अवांछित लक्षण हैं। परन्तु इसका यह अर्थ तो कदापि नहीं कि उसे हमसे भी अरुचि है। नहीं, ऐसा तो कभी भूलकर भी नहीं समझना चाहिये । हमारी बिगड़ी हुई वर्तमान अवस्था हमारी वास्तविक अवस्था तो नहीं है। यह तो स्वयं हमने ही अपना हुलिया बिगाड़ रखा है। हमारा पिता हमें इस अज्ञानावस्था से निकालकर हमें हमारा वास्तविक स्वरुप प्रदान करना चाहता है। परन्तु हम उससे सशंकित होकर दूर दूर भागने की कोशिश करते हैं। इस गलत प्रयत्न में हमारे पग और भी गलत मार्ग पर पड़ने लगते हैं, जिसके फलस्वरुप हमारी रुप-रेखा और भी अधिक बिगड़ती जा रही है।
     विश्वास कीजिए-कि पिता तो अपने प्रिय अंशज को अपने निकट लाने का ह्मदय से आकाँक्षी हो किन्तु पुत्र बार बार दूर भागने की चेष्टा करे। तो ऐसी अवस्था में पिता पुत्र का मिलन भला कैसे सम्भव हो सकता है? बस यही कारण है कि हम अपने मालिक से विलग और दूर हैं। अन्यथा वह मालिक तो हमें अपना लेने को नितान्त उत्सुक है।
      विश्वास कीजिए-कि जिस प्रकार हमारा दयालु पिता हमें अपनी गोद में बिठलाने को उत्सुक है, हमारे चित्त में यदि उसके एक प्रतिशत भाग के बराबर भी अपने मालिक से मिलने के लिये व्यग्रता एवं व्याकुलता होती, तो बीच की यह दूरी कब की समाप्त हो चुकी होती और अब तक हम अपने दयाद्र्र पिता की गोद में आराम कर रहे होते। परन्तु खेद तो इसी बात का है कि हमारे अन्तर्मन में वैसी व्याकुलता उत्पन्न ही नहीं हो रही, जैसी कि स्वाभाविक रुप से होनी चाहिये।
      विश्वास कीजिए-कि मालिक से मिलने की सच्ची तड़प औेर व्याकुलता की भावना हमारे चित्त में इसलिये जागरुक नहीं होती कि हम मानव प्राणी साधारणतया जगत के मिथ्या भोगों एवं रसों को सत् मान

रहे हैं जैसे कोई मदोन्मत्त प्राणी नशे में अपनी सुधबुध खो देता है। अथवा जैसे माता की गोद में जाने के लिये रोता मचलता हुआ बालक सुन्दर खिलौनों के ढेर देखकर उनमें रम जाता है और माता की गोद में उपलब्ध होने वाले अपूर्व आनन्द को विस्मृत कर देता है।
     विश्वास कीजिए-कि जगत के अति सुन्दर दिखाई देने वाले खिलौनो में वह आनन्द एवं तृप्ति कहाँ, जो दयालु पिता की गोद में है। खिलौनों की सुन्दरता एवं उनका आकर्षण तो मन बहलाने का एक अस्थायी साधन है। इस अस्थायी तृप्ति को ही आनन्द की पराकाष्ठा मान लेना घोर अज्ञान है, जिसका फल है दयालु पिता की गोद से वंचित रहना।
     विश्वास कीजिए-कि जीवात्मा को जो सात्विक आनन्द एवं अपरिमेय तृप्ति अपने वास्तविक घर (निजधाम) में उपलब्ध हो सकती है, वह जगत के अस्थायी एवं नष्टप्राय घर में कहाँ मिल सकती है? संसार भर के रस-भोग तथा उनसे प्राप्त होने वाला सुख भी उस परमानन्द के कण-मात्र की तुलना में तुच्छ है। पर खेद है कि उस अपिरमेय अनन्त एवं अपार आनन्द से वंचित रहने का दुःख ही जीव को नहीं सताता।
     विश्वास कीजिए- कि जब कोई व्यक्ति विदेश यात्रा करता है तो उसे यह आभास निरन्तर रहता है कि मैं अपने घर से दूर हूँ तथा विदेश में उपलब्ध आनन्ददायक सामग्रियां भी मात्र अस्थायी हैं। वह उन अस्थायी सुख सामग्रियों में अपना मन नहीं अटकाता, वरन् अपने घर की सुखद स्मृति उसे हरदम बनी रहती है। एक अज्ञात प्रकार की व्यग्रता उसे भीतर ही भीतर कचोटती रहती है कि कब अपने घर में पहुँचूँ और सच्चे सुख अथवा परमानन्द की प्राप्ति करुँ। इसी प्रकार हम जीवात्मा भी अपने निज-घर से, सच्चे माता पिता से बिछुड़कर दूर पड़े हुए हैं, तो हमें भी इस दूरी का आभास अवश्य होना चाहिये। यदि अपने घर एवं माता पिता से बिछुड़ने का दुःख हमें व्यग्र एवं व्याकुल नहीं करता,तो यह सर्वथा अस्वाभाविक है। विदेश में चित को अटकाकर अपने घर एवं प्रिय मित्रों को भूल जाना बुद्धिमानी नहीं, कोरी अज्ञानता है।
     विश्वास कीजिए-कि हमें चाहिये कि अपने अन्तर्मन में व्यग्रता एवं व्याकुलता की इस स्वाभाविक भावना को उत्पन्न करें। तथा अति सुखदायी अवस्था में रहने पर भी तब तक चैन लेना पसन्द न करें, जब तक कि अपने घर में पहुँच न लें तथा निज-घर का अपूर्व आनन्द हमें उपलब्ध न हो जाये।
     विश्वास कीजिए-कि ज्योंही व्याकुलता की ऐसी भावना जिसे विरह कहा जाता है, हमारे चित में जागरुक हुई कि फिर मालिक के मिलने में विलम्ब नहीं। इस विरह-कसक के प्रभाव से वे सब विघ्न-बाधाएँ स्वतः दूर हो जायेंगी, जो हमारे निज-घर तक पहुँचने तथा दयालु पिता से मिलने के मार्ग को अवरुद्ध कर रही हैं।  प्रकृति की शक्तियाँ हमारे लिये मार्ग प्रशस्त करेंगी तथा हम शीघ्रातिशीघ्र निज घर तक पहुँचने में सफल होंगे। क्योंकि हमारा मालिक हमारी तीव्र व्याकुलता की प्रतीक्षा में है। जैसे ही ऐसी तड़प हमारे मन में जागी कि वह स्वयं हमें अपने निकट बुला लेगा और हमें अपनी गोद में लेकर अति प्रसन्न होगा।

Thursday, July 21, 2016

श्री गुरु पूर्णिमा या व्यास पूजा


श्री गुरु पूजा का पर्व एक महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक पर्व है इसे श्री व्यास पूजा भी कहते हैं। संसार में आमतौर पर लोग ये समझते हैं कि द्वापरयुग के अन्त में प्रकट हुये महर्षि वेदव्यास जी के नाम पर ही श्री गुरुपूजा का पर्व श्रीव्यास पूजा रखा गया है लेकिन ये विचार सत्य नहीं है क्योंकि इतिहास कारों के अनुसार पुराणों में ब्राहृा जी से लेकर महर्षि वेदव्यास जी तक अट्ठाईस व्यासों की परम्परा मिलती है अर्थात सतयुग से लेकर द्वापर के अन्त तक 28 व्यास हुये हैं। वेदव्यास जी 28वें  व्यास हैं जिनका नाम कृष्णद्वैपायन था। कृष्ण इनका नाम था नदी के द्वीप में पैदा होने के कारण द्वैपायन कहलाये। इसलिये इनका नाम कृष्णद्वैपायन हुआ। इन्होंने ऋग्वेद का विस्तार करके उसको चार भागों में विभक्त करके अपने चारों शिष्यों को,पैल को ऋग्वेद,वैशम्पायन को यजुर्वेद,जैमिनी को सामवेद और सुमन्तु को अथर्ववेद का ज्ञान कराया। चार वेद बनाने और उनका ज्ञान कराने के कारण ये वेदव्यास कहलाये। चूँकि ये द्वापर केअन्त में हुये हैं इन से पहले भी सतयुग और त्रेतायुग में श्रीव्यास पूजा का पर्व मनाया जाता था। आदिकाल से ही शिष्य सतगुरु की पूजा अर्चना करता आया है इसलिये महर्षि वेदव्यास जी के नाम पर इस पर्व का नाम व्यास पूजा नहीं है। वि उपसर्ग के साथ अस धातु के लगने से व्यास होता है। व्यास का अर्थ होता है क्षेपण करने के, फैंकने के, विस्तार करने के, अलग अलग करने के। अर्थात जो सतऔर असत को अलगअलग करके जिज्ञासु के मन में बिठा दे उसे व्यास कहते हैं। गुरु शब्द का अर्थ भी अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला है।""गु''का अर्थअन्धकार और""रू''का अर्थ प्रकाश कीओर ले जाने वाला अर्थात जो अपने शिष्य के ह्मदय में मोह माया के अज्ञान का अन्धकार दूर करके आत्मज्ञान का प्रकाश करा दे सत और असत का भेद समझा दे वह गुरु है,सतगुरु है। जिसके हर पल सुमिरण से,पूजा आराधना से,ध्यान से और जिसकी कृपा से जीव केअन्दर जीव भाव काफूर होकर ब्राहृ को प्राप्त कर ले ऐसे सतगुरु का नाम ही व्यास है। ऐसे सतगुरु की पूजा ही श्रीव्यास पूजा है।
      ईश्वरीय महान विभूतियों सन्त महापुरुषों ने हर युग में समय समय पर जीवों के उपकार के लिये संसार मेंअवतार लिया। उन महापुरुषों केअलौकिक गुणों की गरिमा महिमा गायन करने के लिये और उनके द्वारा किये गये महान उपकारों के लिये आभार प्रकट करने के लिये हर वर्ष संसार में जयन्तियाँ या पर्व मनाये जाते हैं। जैसे भगवान श्री राम जी केअवतरित दिवस पर रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, श्री गुरुनानक जयन्ति,बुद्ध पूर्णिमा आदि। उन महापुरुषों के चरणों में जन समाज उनके उपकारों के प्रतिआभार प्रकट करने के लिये प्रति वर्ष निश्चित तिथी में भावभीनी श्रद्धाँजलि अर्पित करता है। इसी उद्देश्य से ही सतगुरु के द्वारा किये गये महान उपकारों और एहसानों के प्रति आभार प्रकट करने के लिये हर वर्ष श्री गुरु पूजा का पर्व बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।
    अनादि काल से ही ये मर्यादा चली आई है कि शिष्य अपने विद्या गुरु, कुल गुरु,दीक्षा गुरु और सतगुरु की पूजा निष्ठा से करता आया है। शिष्य के अन्दर सदशिक्षा,सदाचरण और शुभ विचारों को भरने वाला गुरु ही है और चौरासी से छुड़ाकर परमात्मा से मिलाने वाला सतगुरु है।जब से जीव संसार में जन्म लेता है उसे जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरे जीवन में पग पग पर गुरु की आवश्यकता होती है। यहाँ तक कि मृत्यु के उपरान्त भी परलोक में सतगुरु के बिना जीव की गति नहीं होती। गुरु बिन गत नहीं शाह बिना पत नहीं। चाहे कोई कितना ही बुद्धिमान है,चतुर है,सयाना है,विद्वान है,विद्वता को प्राप्त है वह सब कुछ अपने आप नहीं सीख गया। पैदा होते ही उसे किसी न किसी से चलना बोलना, खाना पहनना, यहां तक कि खेलना भी सीखना पड़ता है। उसे आप माँ बाप,भाई,बहन,मित्र,कुछ भी कह सकते हैं। बचपन से लेकर बड़े होने तक उसे कई तरह के शिक्षक अपनाने पड़ते हैं। कुछ बड़ा होने पर स्कूल में उसे हिन्दी अंग्रेज़ी,गणित,विज्ञान केअलगअलग शिक्षक मिले। कालेज में जाने पर उसे फिलासफी, कानून,इन्जिनियरिंग, डाक्टरी आदि के विद्याओं को ग्रहण करने के लिये कोई न कोई शिक्षक या गुरु की आवश्कता होती है तो आत्म ज्ञान को प्राप्त करने के लिये,परमात्मा की प्राप्ति को लिये क्या गुरु की आवश्यकता नही है? जिस परमात्मा का हमें पता ही नहीं है वह कैसा है कहां रहता है,कितनी दूर है,वह बिना सतगुरु की राहनुमाई के कैसे प्राप्त किया जा सकता है? गुरुबिन भवनिधि तरे न कोई। जे विरंची शंकर सम होई।।भले ही कोई ब्राहृा और शिव की पदवी तक पहुँच जाये लेकिन सतगुरु के बिना भव से पार होना असम्भव है।  संसार में अब तक जितने भी ऋषि मुनि,सिद्धसाधक योगी भक्त इत्यादि हुये हैं उन्होने सतगुरु की शरण में आकर ही लाभ उठाया है और ऊंची पदवी को प्राप्त हुये और संसार में पुज्यनीय कहलाये। स्वामी विवेक आनन्द जी पर रामकृष्ण जी की कृपा थी। शिवा जी पर समर्थ गुरु रामदास जी का हाथ था।अर्जुन के ऊपर भगवान श्री कृष्ण जी का अनुग्रह था। हम नित्य प्रति श्री आरती पूजा में स्त्रोत में पढ़ते हैं।
        शुक सनकादिक,ध्रुव नारदादिक गुरु उपदेश ते अमरणम।
        ऋषि  मुनि  जन  प्रकृत जग में लै दीक्षा प्रभु सुमिरणम।
शुकदेव जी को गर्भयोगीश्वर कहा जाता है। जब वह माता के गर्भ में ही थे तो उन्हें ज्ञान प्राप्त था परन्तु बिना गुरु के वे भी मोक्ष के अधिकारी नहीं हुये। जब उन्होने महाराज जनक जी को गुरु धारण किया तो वह मोक्ष के अधिकारी हुये।
          गर्भ योगीश्वर गुरु बिना लागा हरि की सेव।
          कहें  कबीर वैकुण्ठ से फेर दिया शुकदेव।।
          जनक विदेही गुरु किया लागा हरि की सेव।
          कहें कबीर वैकुण्ठ में फेर मिला शुकदेव।।
सनक,सनन्दन,सनत कुमार,सनातन और देवर्षि नारद जी ब्राहृा जी के मानस पुत्र कहलाते हैं। गुरुदेव की कृपा से उनसे नाम दीक्षा लेकर सुमिरण किया
तभी वे अमरपद को प्राप्त हुये। धनी धर्म दास जी परम सन्त श्री कबीर
साहिब जी के शिष्य हुये हैं,वे गुरु महिमा में वर्णन करते हैं।
अखिल विवुध जग में अधिकारी। व्यास वशिष्ठ महान आचारी।
गौतम कपिल कणाद पातञ्जलि।जौमिनी बाल्मीकि चरणन बलि।
ये सब गुरु की शरणहिं आये। तासे जग में श्रेष्ठ कहाये।।
विश्व में जितने भी ऋषि मुनि,राजर्षि,महर्षि,ब्राहृर्षि,देवर्षि हुयें हैं उदाहरण देते हैं गौतम,कपिल,कणाद,पातञ्जलि,वेदव्यास,वसिष्ठ,बाल्मीकि आदि ये सब शास्त्रों के रचियता, ब्राहृनिष्ठ उच्चकोटि के महापुरुष हुये हैं सभी गुरु की शरण में आये उनकी सेवा करके उनकी प्रसन्नता व कृपा के पात्र बने तब ही जग में श्रेष्ठ और पुज्यनीय हुये। परमात्मा की प्राप्ति जब भी होगी गुरु के माध्यम से ही होगी और कोई साधन है ही नहीं। प्रभु ईसामसीह ने भी अपने शिष्यों के समक्ष ये घोषणा की थी।
क्ष् ठ्ठथ्र् द्यण्ड्ढ ड्डदृदृद्ध द्यण्द्धदृद्वढ़ण् त्द ध्र्ण्त्ड़ण् न्र्दृद्व ण्ठ्ठध्ड्ढ द्यदृ ड्ढदद्यड्ढद्ध द्यदृ थ्र्ड्ढड्ढद्य ण्त्थ्र्.
अर्थात मैं वह द्वार हूँ जिसमें से गुज़र कर ही प्रभु से मिलाप हो सकता है। और कोई रास्ता नहीं है।
ड़दृथ्र्ड्ढ द्वदद्यदृ थ्र्ड्ढ ठ्ठदड्ड त् द्मण्ठ्ठथ्थ् ड्डत्द्मद्रड्ढथ् ठ्ठथ्थ् द्यण्न्र् द्मद्वढढड्ढद्धत्दढ़द्म.
मेरी शरण लो मैं तुम्हारे सब दुखों को नाश कर दूँगा।
भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी अर्जुन के माध्यम से हमें गीता का सन्देश दिया है कि ऐ अर्जुन तू सब धर्मों को छोड़कर एक मेरी शरण में आजा मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा इसमें तनिक भी संशय न कर। स्मरण रहे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के सतगुरु हैं जो उसे मार्गदर्शन कर रहे हैं। क्योंकि भगवान श्री कृष्ण स्वयं अर्जुन के सामने खड़े हैं अर्जुन दर्शन भी कर रहा है तो भी श्री कृष्ण जी कह रहे हैं कि अर्जुन तू मुझे इन आँखों से नहीं देख सकता मुझे देखने के लिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ। सिद्ध है भगवान का स्वरूप और है जिसे प्राप्त करना है। संसार में जितने भी मत मतान्तर हैं सम्प्रदाय हैं सभी ने एक ही बात पर जोर दिया है सबके एक ही मूल सिद्धान्त हैं सतगुरु के बिना अपने अन्दर में दिव्य ज्योति के दर्शन करना असम्भव है।
                  लख पीर पैगम्बर औलिया मुल्ला काजी शेख।
                  किसे शान्त न आया बिन सतगुरु के उपदेश।।
  एक बार देवर्षि नारद जी भ्रमण करते हुये वैकुण्ठ लोक में पहुँच गये तो उन्होने भगवान को अकेले और उदास बैठे पाया तो नारद जी ने विनय की भगवन आप अकेले ही और उदास बैठे दिखाई दे रहे हैं। उचित समझें तो मुझे उदासी का कारण बताने की कृपा करें। भगवान ने कहा नारद मैंने ये सृष्टि बनाई इसमें पशु पक्षी कीड़े मकौड़े जानवर पेड़ पौधे इत्यादि सब बनाये थे तो मुझे कोई परेशानी नहीं थी लेकिन जब से मैने मनुष्य को बनाया है तब से ही परेशान हो गया हूँ। कारण ये है कि बाकी सब जीव जन्तु को कोई माँग नहीं थी जैसा उनको बना दिया उसी में वे सन्तुष्ट थे लेकिन ये मनुष्य ऐसा है कि इसकी माँगें ही पूरी होने में नहीं आती। रोज द्वार पर खड़ा हो जाता है आज मुझे फलाँ चीज़ चाहिये आज मुझे ये चाहिए वो चाहिए इसकी माँग ही इतनी हैं कि पूरी होने में ही नहींआती। फिर इससे छिपकर मैं समुन्द्र में जाता हूँ तो ये पनडुब्बी लेकर वहाँ भी पहुँच जाता हैं हिमालय पर जाता हूँ तो ये वहाँ भी पहुँच जाता है, चन्द्रमा पर जाता हूँ मंगल पर जाता हूँ सब जगह ये पहुँच जाता है। अब ये सोचता हूँ कि ऐसी कोई जगह मिले जहाँ ये मनुष्य न पहुँच सके। इसलिये परेशान  हूँ। नारद जी ने विनय की भगवन एक सुझाव देता हूँ अगर आपको पसन्द आये तो प्रयोग करके देख लें हो सकता है आपकी समस्या का समाधान हो जाये। वो सुझाव ये है कि मनुष्य हमेशा आपको बाहर की चीज़ों में ढूँढने की कोशिश करता है आप इसके अन्दर छिपकर बैठ जायें यो कभी भी अन्दर झाँकने का प्रयत्न नहीं करेगा। इसलिये ये आपको ढूँढ नहीं पायेगा। भगवान ने कहा सुझाव तो तुम्हारा ठीक है लेकिन इसमें एक समस्या ये है कि ये मुझे ढूँढ नहीं पायेगा तो आनन्द से हमेशा वंचित हो जायेगा। सदा दुःखी रहेगा। ये मुझे अति प्यारा भी है। मैं नहीं चाहता कि ये दुखी रहे क्योंकि इसे दुःखी रहने के लिये भी तो नहीं बनाया। नारद जी ने कहा इसका सीधा सा
हल है कि जो संसार के पदार्थों की चाह करे वह तो आपने संसार में भरपूर कर दिये हैं। अगर कोई केवल आपकी ही चाहना करे तो उसे आप स्वयं सतगुरु बनकर अपनी लखता करा सकते हैं। भगवान ये सुझाव सुनकर अति प्रसन्न हुये। सन्त सहजो बाई जी ने कहा है।
हरि ने मौ सूँ आप छिपायो। गुरु दीपक दे ताहि लखायो।
कि हरि ने स्वयं को मुझसे छिपा लिया परन्तु सतगुरु ने ज्ञान का दीपक देकर हरि का पता बता दिया है। सतगुरु की महिमा उनके अलौकिक गुणों के वर्णन से शास्त्र भरे पड़े हैं। फिर भी सतगुरु की महिमा का वर्णन नहीं हो सकता। इसीलिये तो कहा है:-
       सब  धरती  कागज  करूँ  लेखनी  करूँ  बनराय।
       सात समुन्द की मसि करूँ गुरु गुण लिखा न जाये।।
इतनी महिमा है सतगुरु की। जिस सतगुरु ने भव से पार लगाया, चौरासी से छुड़ाकर परमात्मा से मिलाया और भी अनन्त उपकार किये ऐसे सतगुरु के उपकारों के प्रति श्रद्धा और आभार प्रकट करने के लिये वर्ष में एक दिन तो नियुक्त होना ही चाहिए।
प्राचीन काल में आजकल की तरह स्कूल या विद्यालय नहीं हुआ करते थे। उन दिनों गुरुकल आश्रम होते थे। जिनके संचालक ब्राहृनिष्ठ उच्चोकोटि के सन्त महापुरुष हुआ करते थे। विद्यार्थी इन गुरुकुल आश्रमों में रहकर राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक और नैतिक विद्या ग्रहण करते थे इन विद्याओं के साथ साथ आध्यात्मिक विद्या भी पढ़ाई जाती थी कि किस प्रकार संसार में रहकर संसार के कार्य व्यवहार करते हुये जीवन को सुखी एवम सफल बनाया जा सकता है। विद्यार्थी अपने जीवन के प्रथम पच्चीस वर्ष इन्हीं गुरुकुल आश्रमों में ही व्यतीत करता था। जब वह इन विद्याओं में पारंगत हो जाता था तो अपने सतगुरु की आज्ञा से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। उस समय ये नियम और मर्यादा बाँधी गई कि जिस परोपकारी सतगुरु ने जीवन जीने का ढंग औरआत्मकल्याण का मार्ग सुझाया है उनके  उपकारों के प्रति जीवन के निर्माण और व्यवसायों को करते हुये भी वर्ष के 365 दिन में से एक नियुक्त किया जाये।आषाढ़ पूर्णिमा का पवित्र दिन इस मांगिलक कार्य के लिये नियुक्त किया गया कि शिष्य इस दिन अपने सतगुरु के श्रीचरण कमलों में सादर नतमस्तक होकर दण्डवत प्रणाम करे। अपनी श्रद्धानुसार पत्र,फल,तिल,पुष्पादि भेंट करे। सतगुरु के चरणों के समक्ष बैठकर अपने अवगुणों का उल्लेख करते हुये उनसे अपने अपराधों, पापों, त्रुटियों और भूलों के लिये क्षमा याचना करे और विनयपूर्वक प्रार्थना करे कि हे गुरुदेव मुझे ऐसा शुभाशीर्वाद प्रदान करें ऐसा बल प्रदान करें कि मैं आपके आदेशों निर्देशों आदेशों पर चलता हुआ आपकी श्री आज्ञानुसार जीवन के रथ को चलाता हुआ आपकी प्रसन्नता एवम कृपा का पात्र बन जाऊँ। ये था उद्देश्य गुरु पूजा के पर्व का।
     हम सब अति सौभाग्यशाली हैं जो हमें श्री सतगुरुदेव दातादयाल जी की चरण शरण और उनकी राहनुमाई प्राप्त हुई है। हमारा कर्तव्य है कि उनकी पूजा आराधना करते हुये, उनका पावन वचनों अनुसार अपने जीवन को ढालते हुये सतगुरु की प्रसन्नता को प्राप्त करके अपने जीवन को सुखमयी बनायें और परलोक भी सँवार लें।

Tuesday, July 19, 2016

भक्ति गुरु-मौज में है


""पूर्ण सन्त सद्गुरु की मौज के अनुसार जो भी कार्यवाही है उसका नाम "भक्ति' है। यदि सेवक सही ढंग पर भक्ति पथ पर चले तो कोई कारण नहीं है कि सच्ची प्रसन्नता और आत्मिक शक्ति उसके ह्मदय में न आवे।'' सहरुाों मनुष्यों की यह शिकायत होती है कि हम भक्ति भी करते हैं किन्तु एक न एक दुःख हमारा पीछा नहीं छोड़ता-उन्हें सूक्ष्म बुद्धि से अन्तर्मुख होकर देखना चाहिये कि भक्ति किसकी हो रही है? मालिक की अथवा कामनाओं की। कामनाओं की भक्ति मन को स्थूलतर बनाया करती है। शत्रु प्रबल और आत्मा निर्बल होने लगती है। परिणाम इसका उलटा ही निकलता है। मन से इस तरह हम धोखा खा जाते हैं। प्रभु की आज्ञा में चलने से तो मन मरता है। मनुष्य सर्वथा सुप्रसन्न रहता है। सुख-दुःख में समान रहने की शक्ति उसमें आ जाती है। निन्दा-स्तुति उसे स्पर्श भी नहीं कर सकती। वह कभी भी शिकायतें नहीं करता। शिकायतें करने वाला तो एक प्रकार से अपने मालिक को ही लज्जित करता है। जो सदा रोता ही रहे कि अमुक ने मुझे दुःख दिया है-अमुक ने मेरा आदर नहीं किया-उससे पूछा जाये कि तुम अपने सम्मान के पुजारी हो या अपने गुरुदेव के? यदि गुरुदेव की पूजा करते हो और तुम्हारा सब काम-काज उनकी मौज में हो रहा है तो तुम्हारी सेवा सफल हो गई कोई यदि तुम्हारा मान करता है तो वह अपना ही भला करता है-नहीं करता तो वह जाने और उसका अपना धर्म जाने। तुम्हें इससे क्या? प्रत्येक ने अपना अपना धर्म निभाना है। हम यदि दूसरों की ओर ध्यान देंगे तो अपनी शान्ति को खो बैठेंगे। यदि इस जीवन में शान्ति का मुँह देखना है तो हमें यह बात आज ही भुला देनी चाहिये कि सब लोग मेरी इच्छा के अनुसार चलें। जब तक यह आशा मन में बनी रहेगी तब तक चिन्ता हमारा पीछा करती रहेगी। हमारा धर्म तो यह है कि हम सन्त सद्गुरु महापुरुषों की मौज और आज्ञा के अनुसार चलते चलें-इस तरफ हम ध्यान ही क्यों दें, कि लोग हमारे विषय में क्या कह रहे हैं? यदि हम अपने मन में अपने आप को बड़ा समझेंगे तो बड़ाई हमारे निकट नहीं आ सकती यह आत्मिक विद्या का अचल नियम है।
    विश्व में विविध प्रकार के लोग देखने में आते हैं। कई तो ऐसे हैं जिनके पीछे समस्त संसार के पदार्थ क्या भोज्य और क्या पहनने के अर्थात् सब प्रकार की सुखदायक वस्तुएं दौड़ी चली आती हैं यदि वे उन्हें स्वीकार करते हैं तो वे वस्तुएं और उनके देने वाले अपने को भाग्यशाली समझते हैं तथा वे लेने वाले को धन्यवाद देते हैं। दूसरे लोग ऐसे हैं जो पदार्थों के पीछे चकित और चिन्तित हैं किन्तु वे पदार्थ उनके हाथ नहीं आते। गहरी दृष्टि से देखा जाये तो इसका आधार भी मनोवृत्ति है। मन में यदि पूर्ण वैराग्य और त्याग है तो सांसारिक पदार्थों को तुम्हारे चरणों तक भाग भाग कर पहुँचना ही होगा। मार्ग में उन्हें कोई रोक नहीं सकता यदि कहीं आने वाले पदार्थ रास्ते में रुक जावें तो इसके दोषी हम होंगे। प्रथम तो हम त्याग व वैराग्य से रुक गये होंगे और पीछे बाहर के संसार में रोक आई होगी। अतः हम जितना सुधार करें तो अपने अन्दर को ही सँवारें बाहर की चिन्ता करने का दायित्व हम पर नहीं है। हम बीज़ बोयें और उनकी रक्षा करें-उन्हें खाद और जल दें फल की आशा रखें या न रखें यह तो विधि ने देना ही है। समय पर सब कुछ हो जायेगा। एक बात और भी है कि कर्म के फल पर अपनी भावनाओं का भी प्रभाव पड़ता है।
      कथा हैः-मनुष्य के मन के विचारों तथा उसकी भावनाओं का प्रभाव केवल मनुष्य पर ही नहीं होता, प्रत्युत् पशु, पक्षियों एवं पेड़ों को भी वे प्रभावित किये बिना नहीं रहतीं। एक राजा आखेट के लिये वन में गया और साथियों से बिछुड़कर मार्ग भूल गया तथा दो तीन दिन भूखा-प्यासा भटकता रहा। भूख-प्यास से मरणासन्न हो रहा था कि उसे एक उद्यान दिखाई दिया। भूखे प्यासे भटकते रहने से यद्यपि शरीर निढाल हो रहा था, अत्यन्त कठिनाई से उद्यान में पहुँचा। वहां अनार के हरे-भरे पेड़ों को देखकर जान में जान आई।माली को संकेत से निकट बुलाया और उससे फलों का रस मांगा। माली वस्तुतः एक महात्मा थे, जिन्होंने अपने आश्रम में वह उद्यान लगा रखा था। उन्होंने पके हुये अनार तोड़े, उनका रस निकाला और गिलास भरकर राजा को दिया। रस पीकर राजा की जान में जान आई। उसने कहा कि ऐसा ही रस का एक गिलास और भी भर कर ला दो।
     महात्मा जी अब की बार जब पके अनार तोड़ने के लिये गये,तो एक भी अनार पका हुआ दिखाई न दिया। विवश होकर वे अधपके अनारों को तोड़कर रस निकालने का प्रयत्न करने लगे। काफी देर बाद वे केवल आधा गिलास रस लेकर राजा के पास आये। राजा ने पूछा कि पहली बार जब आप रस लेने गये थे, तो मिनटों में ही गिलास भरकर ले आये थे, परन्तु अब की बार आप काफी देर बाद लौटे हैं, फिर भी रस का आधा गिलास ही लाये हैं। इसका क्या कारण है? महात्मा जी ने उत्तर दिया-क्षमा कीजियेगा, मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि पहली बार जब आपने रस मांगा था, उस समय आपके मन में शुभ भावना थी, जिसके प्रभाव से जब मैं पेड़ों के पास गया, तो मुझे तुरन्त पके अनार दिखाई पड़ गये। उनको तोड़कर और दाने निकालकर निचोड़ा, तो तत्काल ही गिलास रस से भर गया। किन्तु अब की बार कदाचित आपकी भावना में कुछ अन्तर आ गया था, जिसके प्रभाव से सब पेड़ मुरझा गये थे। मैं प्रत्येक पेड़ के पास गया, परन्तु मुझे एक भी पका हुआ अनार दिखाई न पड़ा। मैं मन ही मन बड़ा चकित हुआ और सोचने लगा कि अभी अभी इन पेड़ों को क्या हो गया है? जब मुझे कोई पका अनार न मिला, तो मैने कच्चे पक्के अनार तोड़े, परन्तु जब रस निकालने लगा तो देखा कि दाने सूखे हुये हैं। बहुत प्रयत्न करने पर और बहुत से अनारों के दानों को निचोड़ने पर भी रस का गिलास नहीं भरा गया। राजा भी सत्यवादी था। उसने अपना अपराध स्वीकार करते हुये कहा महात्मन्! मैं इस देश का राजा हूँ। पहली बार जब आप रस लेने गये थे, तब मैंने मन ही मन विचार किया था कि आपके हाथ से रस पीकर मैं आपको प्राणदाता मानूँगा और आपके गुण गाऊँगा। किन्तु जब दूसरी बार आप रस लेने के लिये गये, तो मेरे मन में विचार उठा कि आपके पास तो बहुत बड़ा बाग है और इससे आपको बहुत आय होती होगी, अतएव आप पर राजस्व लगाना चाहिये। वास्तव में मेरी इस दुर्भावना का फल ही मुझे प्राप्त हुआ है कि रस का गिलास भी न मिल सका। मैं आपको वचन देता हूँ कि भविष्य में कभी भी किसी के प्रति कुभावना को मन में प्रविष्ट न होने दूँगा। आप जैसे महान सन्त की पल भर की संगति ने मेरा ह्मदय प्रकाशमान कर दिया है। सन्त उपदेश करते हैं कि अपनी भावनाओं को शुभ बनाने का यत्न करते रहो। इससे मालिक भी प्रसन्न रहते हैं। जिससे आपका जीवन भी खुशी से बीतता है और परलोक भी संवरता है।
     इसीलिये हमें श्री गुरुमहाराज जी अपने धर्म पर दृढ़ रहने की शिक्षा देते हैं-हम जितनी सच्चाई से श्री गुरुमहाराज जी कीआज्ञा को शिरोधार्य करेंगे उतनी ही शीघ्रता से ऋद्धियां-सिद्धियां हमारे निकट दौड़ी चली आएंगी। इन आध्यात्मिक भेदों को सर्वसाधारण मनुष्य नहीं समझ सकता। ऐसा भी हो सकता है कि हम अपने मन में समझते हों कि हम श्री गुरुमहाराज जी की मौज के अनुसार सेवा कर रहे हैं परन्तु वस्तुतः हम उनकी मौज से लाखों कोस दूर होते हैं। कारण यह कि हम मालिक की मौज और आज्ञा में अपने मन को सम्मिलित कर देते हैं और मन हमें धोखे में डाल कर झूठ को सच बता देता है। यद्यपि हम माया के धोखेमें आ चुके होते हैं। फिर भी मन हमें निश्चय कराता है कि तुम भक्ति कर रहे हो। भला भक्तिमान पुरुष भी कभी अशान्त रह सकता है? सुखदाता श्रीसद्गुरुदेव जी की आज्ञा रुपी मुकुट जिसके सिर पर हो उसपर सद्गुरु सर्वदा कृपालु हैं। उनका अदृश्य हाथ उसके साथ है उसे फिर क्या कमी? इस लोक में तो क्या परलोक में भी ऐसा सुखी कोई नहीं जैसा सुखी पूर्ण सद्गुरु का सच्चा सेवक है।

 वाकः-   सभे सुख  भये  प्रभ तुठे। गुर  पूरे के  चरण मनि बुठे।।
         सहज समाधि लगी लिव अन्तरि-सो रसु सोई जाणै जिउ।। गुरुवाणी माझ महला 5
कथन करते हैं कि भक्ति के रस को जानने वाला केवल भक्त ही जानता है कि वह कैसा मीठा और निर्मल रस है। क्योंकि उसकी तार आनन्द स्वरुप प्रभु से जुड़ी रहती है वहां से अमृत की धारा सर्वदा ही झरती रहती है। जिसे पीकर भक्त की आत्मा सदा तृप्त रहती है। इसी हेतु उसे संसार की तृष्णा या मोह ममता कभी भी सता नहीं सकती। ऐसा कोई सुख शेष नहीं रहता जो भक्त को न मिले। आगे महापुरुष उसी शब्द के अन्दर भक्तों की दशा का वर्णन करते हैंः-
                प्रभ मिलने की एह निसाणी। मनी इको सचा हुकमु पछाणी।।
                सहज सन्तोखि सदा त्रपतासे। अनदु खसम  कै भाणै जीउ।।
                                              गुरुवाणी माझ महला 5.पृ.106
जिसे मालिक का मिलाप हो चुका है उसकी निशानी यह है कि मन एकाग्र होकर प्रभु की आज्ञा में जुड़ जाता है। वह अपने मन को इधर उधर भटकाता नहीं। सदा ही आज्ञाकारी रहता है। चाहे उसे कितना लोभ दिया जाय अथवा डराया धमकाया जाय- किन्तु वह प्रभु की लकीर से बाहर कदापि नहीं आता- न ही वह किसी के बहकाने से किसी लालच में आता है और किसी के दबाव से वह भयभीत भी नहीं होता है। उसे दृढ़ विश्वास है कि मैं यदि सद्गुरु की आज्ञा अर्थात् शब्द की रेखा के भीतर रहूँगा तो कोई मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकता क्योंकि गुरु का शब्द मेरा प्रहरी है-शत्रु की क्या शक्ति कि शब्द की सीमा के अन्दर प्रवेश करके मुझे हानि पहुँचा सके। वाक हैः-
                ""गुरु का सबदु रखवारे-चौकी चौगिरद हमारे।''
                 ""चौगिर्द हमारे रामकार, दुःख लगै न भाई।।''
उसकी सुरत मालिक की मौज में भीजी रहती है उसे तो यह विश्वास है कि जो कुछ हो रहा है मेरे प्रभु की मौज में ही रहा है और इसी में ही मेरी भलाई निहित है। ऐसा दृढ़ संकल्प रखने वाला भक्त दुःख को भी सुख में बदलने की शक्ति रखता है। जैसे गर्म लू पसीने से तर बदन से टकरा कर ठण्डी वायु बन जाती है वैसे ही बड़ी से बड़ी कठिनाई एक पूर्ण भक्तिमान पुरुष के पास आकर स्वयं सुगम बन जाती है। इसलिये सत्पुरुषों ने अपने प्यारे सेवकों को यही शिक्षा दी है कि तुम और उपायों को त्याग कर गुरु शब्द की कमाई करो तुम्हारी समस्त उलझने गुरु शब्द की कमाई से सुलझ जाएंगी। कथा हैः-
छठी पादशाही श्री हरिगोबिन्द साहिब जी के बढ़ते हुये यश को देखकर चन्दू हर समय अपने मन में ईष्र्या-द्वेष की अग्नि में जलता रहता था। एक बार उसने आगरा के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी को लालच देकर इस बात पर राज़ी कर लिया कि वह बादशाह जहांगीर के पास जाये और रमल फेंककर अथवा किसी अन्य प्रकार से उसे यह विश्वास दिलाये कि बादशाह के ऊपर साढेसाती आने वाली है। यह साढ़े साती बादशाह पर बहुत भारी है। जिसमें बादशाह के प्राण जाने का भी भय है। जब बादशाह इस साढ़ेसाती से बचने का उपाय पूछे, तो उससे यह कहे कि श्री गुरुहरिगोबिन्द साहिब जी को चालीस दिन ग्वालियर के किले में नज़र बन्द किया जाये और उनसे यह कहा जाये कि वे बादशाह के कुशल क्षेम के लिये मालिक के आगे प्रार्थना करें। ज्योतिषी लालच में आ गया। चन्दू के कहे अनुसार वह बादशाह के पास गया और उसे साढ़ेसाती का भय दिखाकर कहा कि यदि आप गुरु हरिगोबिंद साहिब को चालीस दिन के लिये ग्वालियर के किले में रखेंऔर वे वहां रहकर आपके लिये मालिक से प्रार्थना करें, तो आपका कष्ट टल सकता है। बादशाह बहकावे में आ गया। उसने गुरुमहाराज जी से विनय की कि आप चालीस दिन ग्वालियर के किले में रहकर मेरे स्वास्थ्य के लिये मालिक से प्रार्थना करें। महापुरुषों की प्रत्येक कार्यवाही जीवों के हित एवं कल्याण के लिये ही होती है। उनके प्रत्येक कार्य में कोई न कोई रहस्य छिपा होता है, जिसे वे स्वयं ही जानते हैं, साधारण जीव उन रहस्यों को क्योंकर जान सकते हैं? श्री गुरुमहाराज
जी ने किले में जाना स्वीकार कर लिया। ग्वालियर के किले में उन दिनों बावन राजा कैद थे, जिन्हें अकबर ने किले में नज़रबन्द किया था और जो अब तक वहीं कैद थे। वे जीवन से पूरी तरह निराश हो चुके थे और दुःखों चिंताओं में घुल-घुल कर उनके शरीर अस्थिपिंजर मात्र रह गये थे। श्री गुरुमहाराज जी के किले में पदार्पण करते ही वहां सतसंग की पवित्र-निर्मल धारा प्रवाहित होने लगी। महापुरुषों के पावन दर्शन करके तथा उनके कल्याणकारी वचनों को श्रवण करके मुर्दा शरीरों में फिर से जान पड़ गई। उनकी सब चिंतायें, दुःख तथा कष्ट काफूर हो गये। वही किला जो पहले उनके लिये बन्दीगृह था, महापुरुषों के वहां चरण डालते ही अब बैकुण्ठ से भी अधिक सुखदायी बन गया। सभी गुरुमहाराज जी के सेवक बन गये और उनके दर्शन एवं सतसंग के अमृत पान करने के साथ-साथ उनके वचनानुसार नाम का सुमिरण करने लगे। सत्संग के प्रताप से अब उनकी सुरति की धारा राजपाट और अन्य शारीरिक सुखों स हटकर गुरु शब्द में जुड़ गई। इस शुभ कर्म से उनकी अशेष चिन्ताएं काफूर हो गर्इं। यह सब प्रताप सत्पुरुषों के दर्शन एवं वचनों का था सत्पुरुषों ने उन्हें दुःख को सुख में बदलने की अनोखी युक्ति बतला दी थी। जिस पर सभी राजा आचरण कर रहे थे। महापुरुषों के शब्द के अनुसार आचरण करने से उनके चित्त पर पड़े हुए मोह-माया के आवरण हट गये। सुरति विनिर्मल होकर सब बन्धनों से विमुक्त हो गई।
     इसी प्रकार कई महीने बीत गये। इधर बादशाह जहांगीर को वास्तव में ही रोगों ने घेर लिया और धीरे-धीरे उसका स्वास्थ्य बहुत गिर गया। तब लाहौर के सूफी फकीर मियांमीर ने दिल्ली आकर बादशाह को समझाया कि यह सारा कष्ट तुम्हारे ऊपर इसलिये आया है, क्योंकि तुमने दुष्ट लोगों के बहकावे में आकर गुरु हरिगोबिंद साहिब को, जो कि पूर्ण महापुरुष हैं, ग्वालियर के किले में नज़रबन्द कर दिया। आज इस बात को कई महीने हो गये। यदि भलाई चाहते हो,तो उन्हें तत्काल सम्मानपूर्वक रिहा कर दो। जब बादशाह ने गुरु महाराज जी की रिहाई का सन्देश भेजा, तो गुरु महाराज जी ने उत्तर में बादशाह को कहलवा भेजा कि हमारे साथ इन सब राजाओं को भी स्वतन्त्र करो तो ठीक अन्यथा हम भी इस किले से बाहर नहीं जायेंगे। तब बादशाह ने दोबारा सन्देश भिजवाया कि जितने राजा आपके चोले को पकड़ लेंगे, वे सब आपके साथ बाहर जा सकेंगे। तब गुरुमहाराज जी ने बावन कलियों वाला चोला बनवाकर पहन लिया। प्रत्येक राजा ने एक एक कली पकड़ ली और गुरुमहाराज जी की कृपा से कैद से मुक्ति प्राप्त की।
     यह सब महिमा महापुरुषों की है जो कि सेवकों को लोक परलोक के दुःखों से छुटकारा दिला देते हैं। महापुरुष तो संसार में अवतरित ही इसीलिये होते हैं ताकि वे जीवों को दुःखों, कष्टों तथा चिंताओं की ज्वाला से निकाल कर, चौरासी की कैद से छुड़ाकर, उन्हें सुख एवं आनन्द प्रदान करें और उन्हें हर प्रकार के बन्धन से मुक्ति दिलायें। इसलिये यदि सुख और आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करते हुये जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त करने की इच्छा है, तो फिर सच्चे सेवक बनो। मनमति का त्याग कर सद्गुरु की आज्ञा अथवा वचन को दृढ़तापूर्वक पकड़ लो, श्री आज्ञा को श्रद्धापूर्वक ह्मदयंगम कर ह्मदय से उसकी पालना करो। इसी में जीवन का सच्चा लाभ और परम कल्याण है।    
       

Sunday, July 17, 2016

धोखे से बचो


     ""ऐ सेवक! बड़े-बड़े मनुष्यों के ठाट बाट देखकर उन्हें सुखी और शान्त न समझ यदि उनके ह्मदय में नाम का निवास नहीं है। निश्चय करके जान कि उनके अन्दर की दशा जैसी घुन खाये हुए अनाज की होती है-उसमें सार तो होता ही नहीं वह केवल खोखला होता है।''
     सेवक के भक्ति धन को बचाने के लिए समय समय पर श्री सद्गुरुदेव भगवान जी ने अपने अनुभूत वचन कहे हैं। यदि हम उन्हें सत्य सत्य कर मानेंगे तो बड़े धोखे से बच जायेंगे। प्रायः हमारा मन लोगों की तड़क-भड़क को देखकर ऐसा समझने लगता है कि यह लोग बड़े भाग्यवान और सुखी हैं। ऐसा मान कर उनकी स्पर्धा करते हुए यह भी अच्छे अच्छे खाने खाने और बढ़िया पहरावे पहनने लगता है। परिणाम यह होता है कि मनुष्य आलस्य और दम्भ के कारण स्वामी से सेवक बन जाता है। सेवक धर्म निभाने में हिचकिचाता है। सुरति उसकी शारीरिक सुखों की ओर झुक जाती है। शरीर क्योंकि एक दिन मिट्टी में मिलना ही है उसकी सारी कार्यवाही भी धूल में मिल जाती है। सेवक को सदा अपने भक्ति-धन का गर्व होना चाहिये। उसे विश्वास और मान हो ऐसा कि वह अपने तुल्य भाग्यशाली सांसारिक राजा-महाराजा को भी न समझे। कारण यह कि जगत् की जितनी भी भोग-सम्पदाएं हैं वे भक्ति की तुलना में तुच्छ हैं। वे मिथ्या हैं। यदि ऐसा न होता तो राजा-महाराजा राजपाट को त्याग कर भक्ति क्यों करते अथवा महापुरुष ऐसा क्यों कथन करते?
                सगल सृष्टि को राजा दुखीआ। हर का नाम जपत होई सुखीआ।।
क्या यह खेद की बात नहीं है कि सुखी मनुष्य दुःखियों की स्पर्धा करे! शास्त्रकारों ने विषय विकारों को गन्दगी के समान समझा है और भक्ति को अमृत तुल्य कहा है। अमृत को त्याग कर विष्ठा ग्रहण करने वाले को कौन बुद्धिमान् कहेगा? एक स्वच्छ वेषधारी मनुष्य भंगी के काम का अनुकरण करे इसे उन्नति का मार्ग थोड़ा कहा जायेगा? ऐसा ही उस सेवक के सम्बन्ध में भी समझो क्योंकि सद्गुरु के सेवक का दर्ज़ा तो सर्वोत्तम है। भगवान् का सबसे अधिक प्यार सेवक पर ही होता है। अतः सेवक का भी धर्म है कि अपने मन को कभी भी इधर उधर विक्षिप्त न करे। सांसारिक भोग-विलास में न अटकावे। परमसंत श्री कबीर साहिब जी ने भी फरमाया है कि एक मन में एक ही वस्तु समा सकती है। यदि तुम बहिर्मुखी वृत्ति वाले होकर जगत् के रसों का स्वाद लोगे तो तुमसे गुरु भक्ति सिद्ध नहीं हो सकेगी। यदि सच्ची भक्ति करने की इच्छा है तो विषय-विकारों और शारीरिक सुख-सुविधाओं को ह्मदय से तिलाञ्जलि देनी होगी।
                कबीर मन  तो  एक है , चाहे जिधर लगाय।
                चाहे गुरु की भक्ति कर, चाहे विषय कमाय।।
      संसार रुपी बाज़ार में मानव को अधिकार है कि वह कोई भी सौदा खरीद करे-कांच का अथवा रत्न का। परन्तु सन्त सत्पुरुष यही चाहते हैं कि मेरे आत्मिक पुत्र लाभ का व्यापार कर जावें जिससे परलोक मे सम्मान प्राप्त करें और यहाँ भी उनका समय मान और शान्ति पूर्वक व्यतीत हो।
      श्री गुरु नानक देव जी अकाल पुरुष का सन्देश देते हुए आसाम में जा पहुँचे। वहां एक नगर में बड़े ऊंचे और सुन्दर भवन दिखाई दे रहे थे। वहां के सभी नागरिक ठाट-बाट से घूम रहे थे। उन्हें देखकर मर्दाने का मन चंचल हो उठा। उसने श्री गुरु महाराज जी के चरणों में विनय की कि इस नगर के लोग बड़े सुखी प्रतीत होते हैं। श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया-
                बड़े बड़े जो दीसन लोग। तिन को व्यापै चिन्ता रोग।।
     श्री गुरुनानक देव जी के भी वही वचन हैं जो ऊपर श्री गुरु महाराज जी ने फरमाये हैं। कथन किया कि "मर्दाना! उनके अन्दर चिन्ता का रोग लगा हुआ है जो उन्हें दिन रात खाये जा रहा है। तू इनकी बाहरी
शान-शौकत को देखकर भूल मत जा'-किन्तु मर्दाना की तीव्र इच्छा थी कि मैं इस नगर के बाज़ारों में चक्कर लगा आऊँ पुनः प्रार्थना की "भगवन्! मैं देर नहीं लगाऊंगा-शीघ्रातिशीघ्र ही वापिस आ जाऊंगा, मुझे आज्ञा दीजिए।''
     श्री गुरु महाराज जी ने सोचा कि यह इशारे को तो समझता ही नहीं है-इसलिये कह दिया कि जैसे तुम्हारा विचार हो। इस वचन को आज्ञा समझकर मर्दाना नगर में गया-जाने की देर थी-अभी पहली ही गली में पाँव रखा था कि एक जादूगर ने जादू का धागा उसके गले में डाला और उसे भेड़ बनाकर एक खूँटे से बाँध दिया। मर्दाना मन ही मन में बड़ा पछताने लगा और अन्दर ही अन्दर श्री गुरु महाराज जी के चरणों में विनय करने लगा और अपनी भूल के लिये लगा क्षमा याचना करने।
     श्री गुरु महाराज जी अन्तर्यामी थे। उसकी पुकार को सुना और अपना विरुद जानकर वहां पहुँचे। मर्दाना ने उन्हें दूर से देखते ही अपनी भाषा में रोना और चिल्लाना शुरु कर दिया। श्री गुरु महाराज जी जैसे उसके निकट गये वह उनके श्री चरणों में लिपट गया। श्री गुरु महाराज जी ने दया करके उसके गले से धागा खोल कर उसे वास्तविक रुप दे दिया।
     यह दशा प्रायः जीवों की होती है कि वे मनमति के अधीन होकर श्री गुरु महाराज जी के वचनों का उल्लंघन करते हैं और सांसारिक तड़क-भड़क में उलझ जाते हैं। फल यह होता है कि आकृति से मनुष्य होते हुए भी वे स्वभाव से पशु बन जाते हैं। श्रीकृष्ण जी ने गीता में इसी बात को ऐसे स्पष्ट किया हैः-
                ध्यायतो    विषयान्पुंसः    संगस्तेषूपजायते ।
                संगात्संजायते कामः, कामात्क्रोधोऽभिजायते।।
                क्रोधाद् भवति संमोहः, संमोहात्स्मृति विभ्रमः।
                स्मृति भ्रंशाद् बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।(गीता-2/62-63)
     कथन किया कि पहले मनुष्य को पता नहीं लगता आदत पड़नी तो आसान परन्तु उससे छुटकारा अति कठिन है। विषयों के पीछे मन को भगाने से उनसे आसक्ति हो जाती है। संगदोष से कामना का जनम होता है। कामनाओं के पूरा न होने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मनुष्य मूर्ख बन जाता है-उसे इतना भी बोध नहीं होता कि मुझे किससे कैसा बोलना चाहिये और मैं बोल क्या रहा हूँ। ऐसी दशा में मनुष्य सच से वञ्चित रह जाता है। उसका जीवन मृतक के समान हो जाता है। यद्यपि यह दशा एकदम तो नहीं होती परन्तु शनैःशनैः एक दिन उपरवर्णित दशा मनुष्य की हो ही जाती है। ऐसी हानि से वही भाग्यवान बच जाता है जो गुरु के वचन का अतिक्रमण कदाचित् नहीं करता। अपने सेवक-धर्म को दृढ़ता से सँभालता है। शास्त्रों के प्रमाण हैंः- ""धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः''
भाव यह कि "मारा हुआ धर्म मारता है और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी उसकी रक्षा करता है।' धर्म के मार्ग पर चलने वालों पर कितने ही कष्ट आयें परन्तु अन्त में विजय उन धर्मात्माओं की ही हुई। राजा हरिश्चन्द्र अपने कत्र्तव्य पालन को मुख्य रखकर शासन किया करते थे। उनके श्री गुरुमहाराज जी ने उनकी परीक्षा लेनी चाही कि वह कहीं सांसारिक भोग-विलासों में अटका हुआ तो नहीं। देखें कि इनका प्यार मेरे वचनों से है या राज से। कथा प्रसिद्ध है कि हरिश्चन्द्र ने राजपाट को गुरु वचनों पर कुर्बान कर दिया और जितने भी कष्ट-क्लेश आये सहर्ष सहन किये। अन्त में उन्हें प्रतिष्ठा,सच्ची प्रसन्नता, विजय और ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। आज तक भूमण्डल पर अनेकों राजा-महाराजा राज्य कर गये परन्तु हरिश्चन्द्र का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है।"रामायण' में तनपोषक को मृतक कहा गया है। सेवक को सदा परिश्रमी और क्रियाशील रहना चाहिये। उसे सादा स्वभाव रखने से धर्म पालन में सहायता मिलती है। ये अस्त्र हैं जिनकी शक्ति से सेवक बाज़ी जीत जाता है।यदि राजा हरिश्चन्द्र भी बाहरी ठाट-बाट में अटके हुए होते तो परीक्षा के समय असफल हो जाते और आज जितनी महिमा उनकी फैली हुई है वह रत्ती भर भी न होती।
     श्री गुरु महाराज जी की पवित्र मौज है कि हमारा सेवक अन्तिम क्षण तक अपना धर्म निभावे और सच्ची कमाई कर जावे। सत्य पर न्यौछावर हो जावे। सच में समा जावे क्योंकि ऐसा सुयोग बार बार नहीं मिलता। श्री आनन्दपुर जैसे सच्चे दरबार में बैठक मिलना और परिपूर्ण सद्गुरु की शरण का प्राप्त होना एक स्वर्णिम अवसर है। अब का चूका फिर पछताएगा। सद्गुरु जैसा क्षमादाता और कोई नहीं और सद्गुरु की शरण में आए हुए को जो विषय विकारों से बचने के साधन उपलब्ध हैं वे भी किसी और को सुलभ नहीं सकते। उदाहणतः सद्गुरु का भय, सम्मान, सहनशीलता, आदि आदि। यदि सच पूछा जाये तो तथ्य यह है कि संसार की बड़ाइयों से तो सद्गुरु के दरबार की धूलि में लेटना भी भाग्य की निशानी है। वाणी का वाक हैः-घणी  विहूणा  पाट  पटंबर भाही  सेती जाले।
                धूड़ी विच लुड़ंदड़ी सोहां नानक तै सह नालै।।
                                  गुरुवाणी सलोक महला-5
इस वास्ते सेवक को सदा अपनी सुरति की सँभाल करनी चाहिए ऐसा न हो कि वह अपने ठिकाने से कभी भी भटक जावे और गुरु के पास रहता हुआ भी सेवक उनसे अलग पड़ा रहे। समय भी गुज़र जाय और पूरा लाभ भी न उठा सके। यह अत्यन्त खेद की विषय है। इसीलिए महापुरुष सेवक को पहले से चेतावनी देकर सावधान करते हैं जिससे अन्त में उसे पछताना न पड़े।

Wednesday, July 13, 2016

सबके साथ प्रेम से व्यवहार करो


     इस संसार के अन्दर दुःख तथा सुख दोनों मनुष्य के साथ हर समय रहते हैं। इस सुख-दुःख के घेरे के अन्दर से जीव कभी बाहर नहीं होता अर्थात् किसी समय दुःख और किसी समय सुख उसको व्यापते रहते हैं। जब सुख आता है तो वह प्रसन्न हो जाता है और जब दुःख आता है तो सन्तप्त होता है।यह दुःख और सुख की दशा प्रायः उसके साथ आजीवन चलती रहती है। इसमें सन्देह नहीं कि वस्तुतः जीव सुख का अभिलाषी है। उसे दुःख पसन्द नहीं है। उसके सारे प्रयत्न भी सुख के प्राप्त करने के लिये होते हैं। ऐसी दशा में उसकी जीवन-यात्रा तो समाप्त हो जाती है परन्तु वह किसी विशेष परिणाम तक नहीं पहुँचता कि ये सुख और दुःख कहां से आये थे? इस अनिश्चय में ही जीव अपना अमुल्य जीवन बिता देता है।
     प्रायः सर्वसाधारण की बुद्धि जहां तक पहुंच सकती है वह यह है कि संसारी पदार्थों के मिलने में सुख और उनके प्राप्त न होने पर दुःख हुआ करता है। इन पदार्थों में जड़ भी हैं और चेतन भी। वास्तव में इन पदार्थों में न दुःख है और न ही सुख है। भला इन वस्तुओं में सुख और दुःख कहाँ? सन्तों का उपदेश है कि सुख और दुःख दोनों तेरे मन की उपज हैं। संसारी पदार्थों में दुःख या सुख दोनों नहीं भरे हैं। सुख भी तेरे मन से उत्पन्न होता है और दुःख भी मन में जन्म लेता है। अन्तरमानस से इन दोनों का सम्बन्ध है। जीव क्योंकि मन की गहराई को समझता नहीं इसलिये सुख दुःख के तत्त्व को जान नहीं पाता।
                वस्तु कहीं, ढूँढे कहीं, केहि  विधि  आवै हाथ।
                कहै कबीर तब पाइये, जब भेदी लीजै साथ।।
सुख तो जीव के अन्दर है किन्तु वह उसे बाहर के पदार्थों में खोजता है। दुःख भी इसी तरह जीव के मन से उत्पन्न होता है परन्तु वह उसका दोष किसी और वस्तु को देता है। सुख है वास्तव में प्रेम और प्यार के अन्दर। जब मन में सन्त महापुरुषों के सत्संग से प्रेम पैदा हो जाएगा तब मन को शान्ति मिलेगी। घृणा करने से मन दुःखी और अशान्त रहेगा। यह बात किसी से निर्णय कराने वाली नहीं है। प्रत्येक मनुष्य इसका अनुमान स्वयं कर सकता है। तुम्हारे मन में दूसरों के प्रति यदि घृणा है तो ठण्डे-ठण्डे कमरों में रहते हुए, अच्छे खाते-पीते हुए और सुखमय जीवन बिताते हुए भी अशान्त रहोगे। इसके विपरीत जब मन में प्रेम-प्यार, दया और परोपकार के भाव हैं तो झोंपड़ी के अन्दर रहते हुए रुखी-सूखी खाते हुए भी तुम मन में सुखी होवोगे। इसीलिये तो सन्तों का निर्णय है कि दुःख और सुख मन की क्यारी में ही उपजा करते हैं। इन्द्रियों के जिन रसों में जीव सुख मानता है वे वस्तुतः दुःख की जड़ हैं। इनसे मन दूषित होता है। मलिन मन से सुख की आशा कैसी की जा सकती है? जब मन मैला है उसमें प्रेम नहीं पनप सकता। आवश्यक है कि मन को स्वच्छ और शुद्ध बनाया जाय। सदा ही दूसरों का भला सोचो-किसी के लिये बुरा सोचना अपने लिये गढ़ा खोदना है। यदि सचमुच तुम सुख के इच्छुक हो तो दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार करो कि उन्हें सुख मिले।
भक्तों और संसारियों में यह अन्तर पाया जाता है कि भक्त लोग र्इंट का जवाब कभी पत्थर से नहीं देते। उनके अन्दर अगाध धैर्य होता है। आप इस बात की परीक्षा करके देखें कि कोई आपके साथ दुव्र्यवहार करता है और आप भी उससे बदले की भावना में बुरा ही बर्ताव करते हैं तो क्या आपको शान्ति मिलेगी? कदापि नहीं। सन्तों का वचन हैः-करगस सम दुर्जन वचन, रहै सन्त जन टारि।
                             बिजुरी  परे  समुद्र  में, कहा सकेगी जारि।।
भक्तों का ह्मदय गम्भीर ठण्डे समुद्र के समान है और संसारियों का ह्मदय एक बारुद की कोठड़ी के तुल्य है। क्रोध आग की एक चिनगारी है। जब क्रोध की चिनगारी भक्तों के ह्मदय में पड़ेगी तो वह वहाँ शान्त हो जायेगी। दूसरे शब्दों में आप ऐसा समझें कि भक्तों के साथ यदि कोई कटु वचन बोले अथवा क्रोध करे तो उनके समुद्र के समान गम्भीर ह्मदय पर उसका कोई प्रभाव न पड़ेगा। यदि वही क्रोध की चिनगारी किसी संसारी के बारूद रुपी ह्मदय की कोठड़ी में जा गिरी तो आग भड़क उठेगी। फकीर हाफीज़ साहिब कथन करते हैंः-        हाफज़ा गर वस्ल खाही, सुलह कुन बा ख़ासो आम।
                बा मुसल्याँ अल्लाह अल्लाह, बा हनूदां राम-राम।।
     ऐ हाफज़! यदि तू ईश्वर के दर्शन का अभिलाषी है तो तू क्या कर सर्वसाधारण से प्रेम-प्रीति रख। मुसलमान के मिलने पर "अल्लाह-अल्लाह' और हिन्दु से भेंट होने पर "राम-राम' कह कर उससे बात कर। इस प्रकार दुःख का लेश भी न रहेगा-सुख ही सुख प्राप्त होगा। यदि तुम्हें आत्मिक शान्ति की इच्छा है तो दूसरों की आत्मा को शान्ति प्रदान करो। आत्मा की साक्षी अपनी आत्मा ही होती है। यह अवस्था मन को जीत लेने पर ही आ सकती है। इस भूमि पर रहते हुए ऐसा बर्ताव करना चाहिये कि किसी दूसरे को हमसे दुःख न पहुंचे। परन्तु ऐसा भी न हो कि अपनी अति कोमलता के कारण दूसरे उसका अनुचित लाभ ले लें।
     एक बार एक महात्मा का एक सर्प से मिलाप हुआ। महात्मा ने सर्प से कहा कि तू किसी को डंक न मारा कर। इससे क्योंकि दूसरों को कष्ट पहुंचता है। सर्प ने महात्मा की आज्ञा मानकर डसना छोड़ दिया। वह चुपचाप सड़क के किनारे पर पड़ रहा। परिणाम यह हुआ कि जो कोई वहां से गुज़रे वह उसे देखकर रोड़ा या पत्थर मार दे किन्तु वह बेचारा किसी को कुछ न कहे।उसकी दशा यह हो गई कि बच्चे उसे खेल खेल में घसीटने लग पड़े और वह घायल हो गया। वह महात्मा फिर कभी उधर आ निकले और सर्प की ऐसी दुर्दशा देखकर वे बड़े दुःखी हुए। सर्प ने महात्मा जी से कहा कि महाराज! आपकी आज्ञा पालन करने से मेरी यह दुर्दशा हो गई है। इस पर महात्मा जी बोले- "ऐ नादान! हमने तो तुम्हें यह कहा था कि तूने किसी को डसना नहीं' परन्तु यह तो नहीं कहा था कि तू अपनी फुंकार करना भी छोड़ दे। उसी दिन से उसने फुंकार मारना शुरु किया जिससे लोग उसे छेड़ते न थे और वह सुख पूर्वक रहने लगा। इसी तरह संसार में रहते हुए भक्तों को भी अपनी सर्पवाली फुँकार नहीं छोड़नी।
     इतिहास बताता है कि दसवीं पातशाही श्री गुरु गोबिन्दसिंह जी महाराज ने भी लड़ाइयां लड़ीं। परन्तु क्या वे किसी के दिल से शत्रु थे? कदापि नहीं-वे तो धर्म और न्याय की रक्षा के लिये लड़े थे। कहते हैं कि युद्ध भूमि में एक भाई कन्हैया विरोधी पक्ष के घायलों के मुँह में पानी डाला करता था। कुछ सिखों ने यह देखकर श्री गुरु महाराज जी के आगे उसकी शिकायत की कि महाराज! वह तो हमारे शत्रुओं के मुँह में पानी डाल कर उन्हें जीवित कर देता है। वे फिर लड़ने को तैयार हो जाते हैं। श्री गुरु महाराज जी ने कन्हैया को बुलवाया और इस बात की सत्यता जाननी चाही। भाई कन्हैया हाथ जोड़कर चरणों पर गिर पड़ा और विनय की कि "हे गुरुमहाराज! मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप रणभूमि में लेटे पड़े हैं और आपको पानी की प्यास लगी है। मैं आपको पानी पिला रहा हूँ। मैं तो हरएक में आपका ही रुप देखता हूँ। श्री गुरुमहाराज जी ने जब ये शब्द कन्हैया के मुख से सुने तो वे बड़े प्रसन्न हुएऔर कहा कि भाई कन्हैया! सचमुच तू ऐसी अवस्था पर पहुंच गया है? तब तो तू बड़ा भाग्यशाली है। अब तक तो तू इन्हें पानी पिलाता था आगे से तू इनकी मरहम पट्टी भी किया कर। यह हमारी आज्ञा है।'' यह कितनी ऊँची अवस्था है। यह काम मन को वश में किये बिना नहीं हो सकता। महापुरुष फरमाते हैं कि ऐ जीव! मन ही तेरा शत्रु है। इस मन को वश में कर लेना भक्ति की अन्तिम मंज़िल है। किसी ने कहा हैः-
वैरी   तेरा   को  नहीं,  वैरी  तेरा   मन । इस मन नूं तूं वस करें, ते पावें मुक्ति धन।।
अपने मन को सब प्रकार की बुराइयों से बचा कर सब किसी से प्रेम-प्यार रखना है। इस तरह जीवन-यापन करते हुए परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करनी है और मनुष्य जीवन को सफल बनाना है।

Sunday, July 10, 2016

घृणा और बुराई से बचो


     यदि कोई मनुष्य तुम से घृणा या अहित करता है तो तुम उससे न घृणा करो; न उसका अहित चिन्तन करो। यदि हम सत्पुरुषों के छोटे से इन वचनों पर आचरण करें तो हमारी आत्मा के अन्दर जो मायावी विषैला तत्त्व भर गया है (जिसने हमें आकुल कर रखा है) वह पल भर में नष्ट हो जायेगा। उस विषैले पदार्थ का अपहार सद्गुरु वचन रूपी अमृत के सिवाय असम्भव है, हाँ जीवन का सर्वनाश कर देगा। उसका प्रभाव न केवल एक जन्म तक रहता है अपितु उसके विषमय प्रभाव से जन्म जन्मान्तरों तक जीवात्मा चौरासी के चक्र में भटकता रहता है।
     एक व्यक्ति चलती ट्रेन से गिर पड़ा और उसके पाँव का थोड़ा सा भाग कट गया। उसे डॉक्टर के पास ले जाने में जितनी देर लगी उतने में उसका विष घुटने तक चढ़ गया। डॉक्टर ने कहा कि इसकी आधी टाँग काटनी पड़ेगी। अन्यथा इसका जीवन भयसंकुल है। इसका निश्चय भी जल्दी करो नहीं तो जितनी देर करोगे उतना विष अधिक ऊपर चढ़ता जाएगा और उससे टाँग का बहुत सा भाग काटना पड़ेगा। उसके सम्बन्धी इस सोच विचार में बहुत से एकत्र हो गये। उनके परस्पर विचार-विमर्श करते करते कुछ देर लग गई। डॉक्टर साहिब ने कहा कि क्योंकि निर्णय करने में समय लगा दिया अब इसकी पूरी टांग काटनी पड़ेगी। अन्त में उसकी टांग पूरी ही काटनी पड़ी और उसको छुटकारा मिला। यदि वह कुछ घण्टे और भी देर करते तो उसके प्राणों तक से भी हाथ धो बैठते।
     ऐसे ही घृणा करने से जिसके मन पर एक बार चोट लग गई यदि उसकी चिकित्सा तुरन्त कर ली गई तो ठीक नहीं तो वह घृणा का भाव पनपते हुए कलह-कल्पना का रूप धारण कर लेता है। वही कलह अनेक वर्षों तक चलता रहता है और जिसके कारण देशों के देश विनष्ट हो जाते हैं। यही घृणा ही थी जो कौरवों के मन में चिनगारी रुप में पहले लगी थी। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी ने प्रयत्न किया कि यह विषैला पदार्थ निकल जावे इस विचार से वे स्वयं  चलकर उनके  समीप गये अमृतमय  वचनों की दवाई
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उन्हें देने लगे-परन्तु कौरवों ने उनके सदवचनों का तिरस्कार कर दिया। अन्ततोगत्वा उस घृणा ने वे रंग दिखाये कि महाभारत का तुमुल संग्राम बन गया। उसमें लाखों-करोड़ों जीवनों की बलि हो गई। यदि वे कौरव भगवान के हितकर वचनों को मान लेते तो घृणा प्रेम का रुप ले लेती और झगड़े के स्थान पर समझौता हो जाता और विष अमृत बन जाता। जैसे एक आम की गुठली से लाखों-करोड़ों आम पैदा होते हैं वैसे ही विषैले बीज से विषैले फलों वाले वृक्ष उत्पन्न होते हैं। यादवों के ह्मदय में तनिक सी दुर्भावना सन्त महापुरुषों के प्रति उत्पन्न हुई। परिणाम क्या हुआ कि अगणित यादव उस छोटी सी भूल के कारण महाकाल के गाल में समा गये।
     हमें भी श्री गुरुमहाराज जी इसीलिये सावधान करते हैं कि यदि इस बीज को समाप्त न करोगे तो इसका उग्र परिणाम देखकर हाथ मलोगे। इसी विषय की और व्याख्या करते हुए श्री गुरु महाराज जी ने उदाहरण दिया कि एक मनुष्य किसी को थोड़ी सी मिठाई देकर उससे बहुमूल्य लाल ले ले तो उसने कितने लाभ का कार्य किया। भाव यह कि किसी से मीठा बोलकर,प्रेम का वर्ताव करके उससे उसके दिल रुपी अमुल्य लाल का ले लेना अर्थात् उसके मन को अपना बना लेना कितना लाभकारी काम है। इसके विपरीत दूसरा मनुष्य कड़वी बोली बोल कर दूसरे के दिल में घृणा और द्वेष भर कर उसके अमुल्य दिल रुपी लाल को चकनाचूर कर देता है तो उसने अपरिमित हानि की। इस बात का विचार गुरुमुखों को रखना चाहिये।
     द्रोणाचार्य और द्रुपद सहपाठी थे। द्रुपद को जब राजगद्दी मिली तो आचार्य द्रोण उसे विद्यालय का सखा समझकर उससे मिलने गये। जब राज दरबार में पहुँचे तो द्वारपाल के हाथ कहलवा भेजा कि ""महाराजा से कहो कि तुम्हारा बाल सखा द्रोणाचार्य तुमसे मिलने आया है।'' जब राजा को यह सन्देश मिला तो उसने प्रत्युत्तर दिया कि ""कहाँ हम और कहाँ तुम-छुटपन की बातें मूर्ख लोग याद रखते हैं।'' घृणा भरे ये शब्द सुनकर आचार्य द्रोण जी चुपचाप चले गये।
     द्रोणाचार्य जी पाण्डवों को धनुर्विद्या सिखा चुके तो पाण्डवों ने गुरुदेव के चरणों में कोई गुरु दक्षिणा देने के लिये निवेदन किया। इस पर आचार्य जी ने कहा कि ""यदि तुम हमें गुरु दक्षिणा देना चाहते हो तो राजा द्रुपद के हाथ पाँव बाँधकर उसे मेरे सम्मुख खड़ा कर दो।'' पाण्डवों ने गुरु के आदेश का पालन करते हुए द्रुपद को बन्दी के समान उनके सामने प्रस्तुत कर दिया। द्रोण बोले कि ""तुम्हें हमारा मुख देखने से घृणा थी यह उसका फल है जो आज तुम पा रहे।'' द्रुपद इस पर पानी पानी हुआ और लगा क्षमा याचना करने। आचार्य द्रोण ने उसे बड़े प्रेम से समझाया कि घृणा करने से बड़ाई नहीं मिला करती। तुम नहीं जानते क्या-कि भगवान श्री कृष्ण जी ने स्वयं मालिक होते हुए भी निर्धन सुदामा जी से घृणा नहीं की बल्कि उसे अति प्रेम प्यार से गले लगाया और फिर समझाया कि ""तुम भी प्रण करो कि भविष्य में कभी भी किसी से घृणा न करोगे। तब तुम्हें मैं अभी मुक्त किये देता हूँ।'' द्रुपद ने अपनी स्वीकृति दी और तब वह मुक्त होकर अपने राज्य में चला गया।
     इन इतिहासों से विदित होता है कि घृणा और अनिष्ट करने का फल कितनी भयंकरता से भोगना पड़ता है इसलिये महापुरुष घृणा के बीज का ही नाश कर देना चाहते हैं और अपने अमृतमय वचनों से उसके विष भरे प्रभाव को मिटाना चाहते हैं। जो भाग्यशाली पुरुष इन बचनों का अनुसरण करते हैं उनकी मनोवृत्ति में अमृत की धारा बह चलती है और जो विष के प्रभाव को बाहर निकाल देती है। बीज से जिस तरह फल पकता है वैसे ही विचार के अनुसार मनुष्य कर्म करने लगता है। बुराई करने वाले की बुराई तुम मत सोचो-जैसा करेगा वह वैसा भरेगा इस प्रसंग में एक कथा हैः-
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एक पण्डित जो ज्योतिष-विद्या में निपुण था एक रजवाड़ा में रहता था। उसका निवास-स्थान राज-प्रासाद से आठ-दस मील दूर एक नदी के तट पर था। राजा कर्मकाण्डी था परन्तु उसका इकलौता पुत्र गुरु भक्त था। संयोगवश उसका विवाह भी एक गुरुभक्त राजकुमारी से हो गया। उसके पिता राजा साहिब का विचार था कि कन्या की जन्मपत्री और उसका हाथ किसी ज्योतिषी को दिखा दें जिससे कुँवरी के भाग्यों का ज्ञान हो जाय किन्तु राजकुमार कहता था कि पूर्ण सतगुरु सेवक के रक्षक होते हैं यदि उसके भाग्य में सूली भी हो तो वे उसे काँटा बना देते हैं। उनका ध्यान,उनके शब्द का अभ्यास आने वाले समस्त दुःखों की औषध है। राजकन्या की जन्म कुण्डली दिखाने या न दिखाने का निर्णय नहीं हुआ था कि राजकुमारअपने साथियों को साथ लेकर शिकार खेलने चला गया। शिकारगाह भी वह नदी के किनारे नगर से चार मील की दूरी पर थी। दैववश वह ज्योतिषी जो आठ दस मील दूर रहता था राजमहल में आ पहुँचा। राजा ने उस कन्या की कुण्डली और उसका हाथ उसे दिखाया-ज्योतिषी ने जब उस कुमारी के लावण्य को देखा तो उसका मन विचलित हो गया।   काम क्रोध मद लोभ की, जब लगि घट में खान।
                      क्या  मूर्ख  क्या  पण्डिता , दोनों एक समान ।।
     वह ज्योतिषी पढ़ा लिखा तो बहुत था परन्तु शब्दाभ्यासी न होने के कारण मन के अधीन हो गया। वह महाराजा से बोला कि,""यदि यह कन्या आपके राज्य में रहेगी तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा।'' राजा ने इसका प्रतिकार पूछा-तो ज्योतिषी ने कहा, कि लकड़ी का बड़ा सन्दूक बनवाओ जिसमें वायु का भी संचार हो, उसमें इस लड़की को बन्द करके कुछ हीरे-जवाहरात भी साथ में रखकर उस सन्दूक को आज रात के पहले पहर में इस नदी में बहा दो। इस तरह तुम्हारे राज्य पर आने वाला संकट कट जाएगा।
     राजा कर्मकाण्डी तो था ही। ज्योतिषी की बात सुनकर काँप उठा और बोला कि हम आज ही ऐसा करेंगे। यह रहस्य तुम और किसी से न कहना। ज्योतिषी अपने घर चला गया और रात को नदी किनारे बैठकर उस सन्दूक की लगा प्रतीक्षा करने। उसे प्राप्त करने की पूरी पूरी व्यवस्था भी कर दी। उधर राजा ने दवाई देकर कन्या को मूर्छित करके सन्दूक में बन्द करके बहा दिया। भाग्यवश वह राजकुमार उस समय साथियों के साथ नदी के तीर पर भ्रमण कर रहा था। उन्होने जब दूर से आते हुए सन्दूक को देखा तो अपने राजपुरुषों को भेजकर वह सन्दूक बाहर निकलवा लिया। सन्दूक के खुलते ही राजकुमार चकित रह गया। राजकुमारी को पाकर कुँवर ने प्रभु को धन्यवाद दिया। भाग्य से शिकार खेलते हुए एक जीवित रीछ उनके हाथ लग गया था। राजकुमार ने उसे ही सन्दूक में बन्द करके आगे प्रवाहित कर दिया। पंडित जी उस सन्दूक की प्रतीक्षा में बैठे ही थे। उसे देखते ही गद्गद हो गये। सन्दूक को निकाला और घर में ले आये। सब को विदा किया और एक कोठी में एकान्त देखकर बड़े हर्ष से वह सन्दूक खोला परन्तु हुआ क्या-कि सन्दूक के खुलते ही एक मस्त रीछ उसमें से निकला और झपट कर पंडित जी को समाप्त कर दिया। बात फैलते फैलते राजा के कानों तक भी जा पहुँची। एक दो दिन में राजकुमार भी अपनी पत्नी के साथ राज्य में लौट आया। पंडित जी का सारा पोल खुल गया। राजपुत्र ने अपने पिता जी से कहा कि यह सब सद्गुरुदेव जी की कृपा है कि उनका अदृश्य हाथ सदा हमारे साथ है। इस घटना से राजा भी अत्यन्त प्रभावित हुआ और वह भी सद्गुरुदेव जी की शरण में गया और उनसे नामोपदेश लेकर उसकी कमाई की जिससे उसके दोनों लोक सँवर गये।
     इसलिये हमें श्री गुरुमहाराज जी ने सतर्क किया है कि किसी की भी बुराई न करो। न किसी से घृणा करो। क्योंकि जो बुराई करता है उसका अपना ही बुरा होता है। फारसी में कहा हैः-""चाह कनरा चाह दरपेश'' कुआँ खोदने वाला आप ही कुएं में गिरता है।

Wednesday, July 6, 2016

करनी भरनी


     प्रकृति की पांच शक्तियां आकाश, पवन, अग्नि, जल और पृथ्वी किसी चीज़ की उत्पत्ति, स्थिति और उसके विनाश में प्रतिपल कार्य करती हैं। उदाहरण रुप में देखिये-किसी पुरुष ने पृथ्वी के अन्दर बीज डाला और उसे दबा दिया। वह बीज धरती में से फूटता है; फलता-फूलता है और एक से अनेक हो जाता है। बीज के (उगाने, फलने-फूलने व एक से अनेक करने में भी उन्हीं पाँचों तत्त्वों का हाथ है। उस मनुष्य ने तो केवल बीज ही बोया है और चाहे कुछ भी नहीं किया तो भी प्रकृति के पांचों तत्त्वों ने बराबर काम करना है। उन पाँचों शक्तियों को काम करने से कोई रोक नहीं सकता।
     मनुष्य भी इस संसार में एक कृषक अथवा भूमिपति के सदृश है। वह चाहे अच्छा बीज बोवे या बुरा इस बात में वह स्वतन्त्र है। वह मात्र मानव शरीर में ही बीज बोने की क्षमता रखता है अन्यथा अन्य कोई योनि नहीं जिसमें जाकर वह भला-बुरा बीज बो सके। इसी कारण ही मनुष्य को सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अब विचारणीय बात यह है कि मनुष्य किस प्रकार का बीज बो रहा है । कड़वा या मीठा। कड़वे या मीठे बीज को उगाने में प्राकृतिक पाँचों तत्त्व तो एक समान ही सहायता करेंगे। बीज कड़वा या मीठा जैसा भी होगा उसका फल तदनुकूल ही आएगा। प्रकृति ने तो उसकी सहायता करके उसे पनपाना है। वह तो चोर को और साध को एक समान ही सहायता देगी।
     अब हम आध्यात्मिक जगत की ओर चलते हैं । जीव अगर पाप का बीज बो रहा है तो उसका फल पाप होगा यदि बीज पुण्य का है तो वह पुण्य का ही फल देगा। बीज बोने का दायित्व मनुष्य पर है। यदि कोई पाप कर्म करके यह समझे कि उसे किसी ने देखा नहीं यह उसका विचार करना मिथ्या है। प्रकृति से कुछ भी छुपाया नहीं जा सकता। वह तो उसे एक न एक दिन उसका फल देवेगी ही। इसी प्रकार से यदि कोई आठवीं गुफा में जाकर भी पुण्य या पाप कर्म करता है तो उसे भी प्रकृति किसी न किसी दिन प्रकट कर देगी। अतः मनुष्य को विश्व में गम्भीरता पूर्वक विचार करके पग बढ़ाना चाहिये। यदि प्रमाद किया अथवा संसारियों की देखा देखी भेड़चाल चला तो वह अवश्यमेव धोखा खायेगा। समय का प्रवाह बड़े वेग से चल रहा है। यदि वह मनुष्य जन्म कहीं धोखेमें ही बीत गया तो फिर क्या कोई दूसरा जन्म भला बीज बोने के लिये मिलेगा? नहीं।
     परमार्थी जीव का धर्म है कि वह अपने कत्र्तव्य को पहचाने। दूसरों का अन्धाधुन्ध अनुकरण न करे। संसारी लोग क्या कर रहे हैं क्या खा रहे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं इधर ध्यान देना उसका उद्देश्य नहीं है। परमार्थी और संसारी का मार्ग पृथक्-पृथक् है। परमार्थी जीव को तो केवल सद्गुरु के उपदेश पर चलना है। यदि वह भी साधारण जीवों की भांति सन्मार्ग को छोड़ देता है और धोखे में चला जाता है तब दूसरे उसका साथ न देंगे। यह ज्योति उसे सन्त सद्गुरुदेव जी के सत्संग से ही मिल सकती है।परमार्थी का धर्म है कि वह सत्संग के वचनों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे और उन पर आचरण करे। मन-बुद्धि-चित्त में उन को स्थान दे। सत्संग का भी तभी लाभ है अन्यथा नहीं। हर किसी की करनी व भरनी अपने अपने साथ है। किसी का अन्धानुकरण करने अथवा किसी के दोषों को देखने की क्या आवश्यकता है? यदि कोई तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करता है तो तुम्हें बदले में बुरा बर्ताव करने की आवश्यकता नहीं। जैसे कहा हैः-     जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
                तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
जिसने तुम्हारे साथ बुरा किया है उसका फल भी उसी को भोगना पड़ेगा। कुदरत हर किसी को उसकी
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भावना के अनुसार फल देती है। तुम अपने कर्तव्य की चिन्ता करो-दूसरों की ओर देखने की आवश्यकता
ही क्या है?       बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
                जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।।
     एक मनुष्य अपने गुण और दूसरों के अवगुणों को देखता है। प्रकृति के नियमानुसार उसके अन्दर दूसरे के दोष ही आ प्रवेश करेंगे साथ ही उसके अपने गुण बाहर चले जाएँगे। इसलिये महापुरुषों ने सोच समझ कर यह सदुपदेश दिया है कि ऐ जीव! तू केवल अपने कत्र्तव्य पर ही दृष्टि रख। महापुरुषों ने जो परमावश्यक धर्म बताए हैं अर्थात् भजनाभ्यास, आरति-पूजा और सेवा तुम इन्हें नियमपूर्वक करते जाओ। ऐसा करते रहने से अवश्य ही एक दिन बेड़ा पार हो जाएगा। महापुरुष हम से ये ही शुभ कर्म करवाने और हमारा उद्धार करने के लिये प्रकट होते हैं। यदि हम उनके नियमों का परिपालन नहीं करेंगे तो हमें उनकी प्रसन्नता प्राप्त न होगी। यदि हमें वस्तुतः उनकी प्रसन्नता अभीष्ट है तो इन कत्र्तव्यों का पालन करना ही होगा। केवल बातें बनाने से संसार में चाहे काम चल जाय किन्तु मालिक के दरबार में तो करनी ही काम आएगी। वहां चतुराई व बुद्धिमत्ता काम न देगी। वहां तो केवल क्रियात्मिक जीवन और सत्यता की आवश्यकता है। "कट्टे वांग अरड़ावे, ते साहिब दे मन भावे'। महापुरुष कथन करते हैं जिसके मन में सच्चाई है और उसे बात करने का ढंग भी न आवे तो भी ऐसा जीव मालिक को प्यारा लगता है। सदाचरण से ही प्रभु को प्रसन्न किया जा सकता है। सदाचारी बन कर अपने इष्टदेव जी की प्रसन्नता प्राप्त करके मनुष्य को जीवन का यथार्थ उपयोग कर लेना है।
घृणा और बुराई से बचो
     यदि कोई मनुष्य तुम से घृणा या अहित करता है तो तुम उससे न घृणा करो; न उसका अहित चिन्तन करो। यदि हम सत्पुरुषों के छोटे से इन वचनों पर आचरण करें तो हमारी आत्मा के अन्दर जो मायावी विषैला तत्त्व भर गया है (जिसने हमें आकुल कर रखा है) वह पल भर में नष्ट हो जायेगा। उस विषैले पदार्थ का अपहार सद्गुरु वचन रूपी अमृत के सिवाय असम्भव है, हाँ जीवन का सर्वनाश कर देगा। उसका प्रभाव न केवल एक जन्म तक रहता है अपितु उसके विषमय प्रभाव से जन्म जन्मान्तरों तक जीवात्मा चौरासी के चक्र में भटकता रहता है।
     एक व्यक्ति चलती ट्रेन से गिर पड़ा और उसके पाँव का थोड़ा सा भाग कट गया। उसे डॉक्टर के पास ले जाने में जितनी देर लगी उतने में उसका विष घुटने तक चढ़ गया। डॉक्टर ने कहा कि इसकी आधी टाँग काटनी पड़ेगी। अन्यथा इसका जीवन भयसंकुल है। इसका निश्चय भी जल्दी करो नहीं तो जितनी देर करोगे उतना विष अधिक ऊपर चढ़ता जाएगा और उससे टाँग का बहुत सा भाग काटना पड़ेगा। उसके सम्बन्धी इस सोच विचार में बहुत से एकत्र हो गये। उनके परस्पर विचार-विमर्श करते करते कुछ देर लग गई। डॉक्टर साहिब ने कहा कि क्योंकि निर्णय करने में समय लगा दिया अब इसकी पूरी टांग काटनी पड़ेगी। अन्त में उसकी टांग पूरी ही काटनी पड़ी और उसको छुटकारा मिला। यदि वह कुछ घण्टे और भी देर करते तो उसके प्राणों तक से भी हाथ धो बैठते।
     ऐसे ही घृणा करने से जिसके मन पर एक बार चोट लग गई यदि उसकी चिकित्सा तुरन्त कर ली गई तो ठीक नहीं तो वह घृणा का भाव पनपते हुए कलह-कल्पना का रूप धारण कर लेता है। वही कलह अनेक वर्षों तक चलता रहता है और जिसके कारण देशों के देश विनष्ट हो जाते हैं। यही घृणा ही थी जो कौरवों के मन में चिनगारी रुप में पहले लगी थी। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी ने प्रयत्न किया कि यह विषैला पदार्थ निकल जावे इस विचार से वे स्वयं  चलकर उनके  समीप गये अमृतमय  वचनों की दवाई उन्हें देने लगे-परन्तु कौरवों ने उनके सदवचनों का तिरस्कार कर दिया। अन्ततोगत्वा उस घृणा ने वे रंग दिखाये कि महाभारत का तुमुल संग्राम बन गया। उसमें लाखों-करोड़ों जीवनों की बलि हो गई। यदि वे कौरव भगवान के हितकर वचनों को मान लेते तो घृणा प्रेम का रुप ले लेती और झगड़े के स्थान पर समझौता हो जाता और विष अमृत बन जाता। जैसे एक आम की गुठली से लाखों-करोड़ों आम पैदा होते हैं वैसे ही विषैले बीज से विषैले फलों वाले वृक्ष उत्पन्न होते हैं। यादवों के ह्मदय में तनिक सी दुर्भावना सन्त महापुरुषों के प्रति उत्पन्न हुई। परिणाम क्या हुआ कि अगणित यादव उस छोटी सी भूल के कारण महाकाल के गाल में समा गये।
     हमें भी श्री गुरुमहाराज जी इसीलिये सावधान करते हैं कि यदि इस बीज को समाप्त न करोगे तो इसका उग्र परिणाम देखकर हाथ मलोगे। इसी विषय की और व्याख्या करते हुए श्री गुरु महाराज जी ने उदाहरण दिया कि एक मनुष्य किसी को थोड़ी सी मिठाई देकर उससे बहुमूल्य लाल ले ले तो उसने कितने लाभ का कार्य किया। भाव यह कि किसी से मीठा बोलकर,प्रेम का वर्ताव करके उससे उसके दिल रुपी अमुल्य लाल का ले लेना अर्थात् उसके मन को अपना बना लेना कितना लाभकारी काम है। इसके विपरीत दूसरा मनुष्य कड़वी बोली बोल कर दूसरे के दिल में घृणा और द्वेष भर कर उसके अमुल्य दिल रुपी लाल को चकनाचूर कर देता है तो उसने अपरिमित हानि की। इस बात का विचार गुरुमुखों को रखना चाहिये।
     द्रोणाचार्य और द्रुपद सहपाठी थे। द्रुपद को जब राजगद्दी मिली तो आचार्य द्रोण उसे विद्यालय का सखा समझकर उससे मिलने गये। जब राज दरबार में पहुँचे तो द्वारपाल के हाथ कहलवा भेजा कि ""महाराजा से कहो कि तुम्हारा बाल सखा द्रोणाचार्य तुमसे मिलने आया है।'' जब राजा को यह सन्देश मिला तो उसने प्रत्युत्तर दिया कि ""कहाँ हम और कहाँ तुम-छुटपन की बातें मूर्ख लोग याद रखते हैं।'' घृणा भरे ये शब्द सुनकर आचार्य द्रोण जी चुपचाप चले गये।
     द्रोणाचार्य जी पाण्डवों को धनुर्विद्या सिखा चुके तो पाण्डवों ने गुरुदेव के चरणों में कोई गुरु दक्षिणा देने के लिये निवेदन किया। इस पर आचार्य जी ने कहा कि ""यदि तुम हमें गुरु दक्षिणा देना चाहते हो तो राजा द्रुपद के हाथ पाँव बाँधकर उसे मेरे सम्मुख खड़ा कर दो।'' पाण्डवों ने गुरु के आदेश का पालन करते हुए द्रुपद को बन्दी के समान उनके सामने प्रस्तुत कर दिया। द्रोण बोले कि ""तुम्हें हमारा मुख देखने से घृणा थी यह उसका फल है जो आज तुम पा रहे।'' द्रुपद इस पर पानी पानी हुआ और लगा क्षमा याचना करने। आचार्य द्रोण ने उसे बड़े प्रेम से समझाया कि घृणा करने से बड़ाई नहीं मिला करती। तुम नहीं जानते क्या-कि भगवान श्री कृष्ण जी ने स्वयं मालिक होते हुए भी निर्धन सुदामा जी से घृणा नहीं की बल्कि उसे अति प्रेम प्यार से गले लगाया और फिर समझाया कि ""तुम भी प्रण करो कि भविष्य में कभी भी किसी से घृणा न करोगे। तब तुम्हें मैं अभी मुक्त किये देता हूँ।'' द्रुपद ने अपनी स्वीकृति दी और तब वह मुक्त होकर अपने राज्य में चला गया।
     इन इतिहासों से विदित होता है कि घृणा और अनिष्ट करने का फल कितनी भयंकरता से भोगना पड़ता है इसलिये महापुरुष घृणा के बीज का ही नाश कर देना चाहते हैं और अपने अमृतमय वचनों से उसके विष भरे प्रभाव को मिटाना चाहते हैं। जो भाग्यशाली पुरुष इन बचनों का अनुसरण करते हैं उनकी मनोवृत्ति में अमृत की धारा बह चलती है और जो विष के प्रभाव को बाहर निकाल देती है। बीज से जिस तरह फल पकता है वैसे ही विचार के अनुसार मनुष्य कर्म करने लगता है। बुराई करने वाले की बुराई तुम मत सोचो-जैसा करेगा वह वैसा भरेगा इस प्रसंग में एक कथा हैः-
एक पण्डित जो ज्योतिष-विद्या में निपुण था एक रजवाड़ा में रहता था। उसका निवास-स्थान राज-प्रासाद से आठ-दस मील दूर एक नदी के तट पर था। राजा कर्मकाण्डी था परन्तु उसका इकलौता पुत्र गुरु भक्त था। संयोगवश उसका विवाह भी एक गुरुभक्त राजकुमारी से हो गया। उसके पिता राजा साहिब का विचार था कि कन्या की जन्मपत्री और उसका हाथ किसी ज्योतिषी को दिखा दें जिससे कुँवरी के भाग्यों का ज्ञान हो जाय किन्तु राजकुमार कहता था कि पूर्ण सतगुरु सेवक के रक्षक होते हैं यदि उसके भाग्य में सूली भी हो तो वे उसे काँटा बना देते हैं। उनका ध्यान,उनके शब्द का अभ्यास आने वाले समस्त दुःखों की औषध है। राजकन्या की जन्म कुण्डली दिखाने या न दिखाने का निर्णय नहीं हुआ था कि राजकुमारअपने साथियों को साथ लेकर शिकार खेलने चला गया। शिकारगाह भी वह नदी के किनारे नगर से चार मील की दूरी पर थी। दैववश वह ज्योतिषी जो आठ दस मील दूर रहता था राजमहल में आ पहुँचा। राजा ने उस कन्या की कुण्डली और उसका हाथ उसे दिखाया-ज्योतिषी ने जब उस कुमारी के लावण्य को देखा तो उसका मन विचलित हो गया।   काम क्रोध मद लोभ की, जब लगि घट में खान।
                      क्या  मूर्ख  क्या  पण्डिता , दोनों एक समान ।।
     वह ज्योतिषी पढ़ा लिखा तो बहुत था परन्तु शब्दाभ्यासी न होने के कारण मन के अधीन हो गया। वह महाराजा से बोला कि,""यदि यह कन्या आपके राज्य में रहेगी तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा।'' राजा ने इसका प्रतिकार पूछा-तो ज्योतिषी ने कहा, कि लकड़ी का बड़ा सन्दूक बनवाओ जिसमें वायु का भी संचार हो, उसमें इस लड़की को बन्द करके कुछ हीरे-जवाहरात भी साथ में रखकर उस सन्दूक को आज रात के पहले पहर में इस नदी में बहा दो। इस तरह तुम्हारे राज्य पर आने वाला संकट कट जाएगा।
     राजा कर्मकाण्डी तो था ही। ज्योतिषी की बात सुनकर काँप उठा और बोला कि हम आज ही ऐसा करेंगे। यह रहस्य तुम और किसी से न कहना। ज्योतिषी अपने घर चला गया और रात को नदी किनारे बैठकर उस सन्दूक की लगा प्रतीक्षा करने। उसे प्राप्त करने की पूरी पूरी व्यवस्था भी कर दी। उधर राजा ने दवाई देकर कन्या को मूर्छित करके सन्दूक में बन्द करके बहा दिया। भाग्यवश वह राजकुमार उस समय साथियों के साथ नदी के तीर पर भ्रमण कर रहा था। उन्होने जब दूर से आते हुए सन्दूक को देखा तो अपने राजपुरुषों को भेजकर वह सन्दूक बाहर निकलवा लिया। सन्दूक के खुलते ही राजकुमार चकित रह गया। राजकुमारी को पाकर कुँवर ने प्रभु को धन्यवाद दिया। भाग्य से शिकार खेलते हुए एक जीवित रीछ उनके हाथ लग गया था। राजकुमार ने उसे ही सन्दूक में बन्द करके आगे प्रवाहित कर दिया। पंडित जी उस सन्दूक की प्रतीक्षा में बैठे ही थे। उसे देखते ही गद्गद हो गये। सन्दूक को निकाला और घर में ले आये। सब को विदा किया और एक कोठी में एकान्त देखकर बड़े हर्ष से वह सन्दूक खोला परन्तु हुआ क्या-कि सन्दूक के खुलते ही एक मस्त रीछ उसमें से निकला और झपट कर पंडित जी को समाप्त कर दिया। बात फैलते फैलते राजा के कानों तक भी जा पहुँची। एक दो दिन में राजकुमार भी अपनी पत्नी के साथ राज्य में लौट आया। पंडित जी का सारा पोल खुल गया। राजपुत्र ने अपने पिता जी से कहा कि यह सब सद्गुरुदेव जी की कृपा है कि उनका अदृश्य हाथ सदा हमारे साथ है। इस घटना से राजा भी अत्यन्त प्रभावित हुआ और वह भी सद्गुरुदेव जी की शरण में गया और उनसे नामोपदेश लेकर उसकी कमाई की जिससे उसके दोनों लोक सँवर गये।
     इसलिये हमें श्री गुरुमहाराज जी ने सतर्क किया है कि किसी की भी बुराई न करो। न किसी से घृणा करो। क्योंकि जो बुराई करता है उसका अपना ही बुरा होता है। फारसी में कहा हैः-""चाह कनरा चाह दरपेश'' कुआँ खोदने वाला आप ही कुएं में गिरता है।

Sunday, July 3, 2016

गुरु की मानें-मन की नहीं


     मनुष्य जन्म एक ऐसी विशेष जगह है जिसमें चाहे तो जीव अपनी आत्मा को यानी अपने आपको परमपद तक पहुँचा दे अथवा नीच योनियों का शिकार बना दे। दोनों प्रकार की शक्तियां इस स्थान पर पहुँच कर मनुष्य में आ जाती हैं। सन्त कथन करते हैं कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है। कर्म करने में विधाता की ओर से इस मानव पर कोई दबाव नहीं है। चाहे जीव अच्छे कर्म करे अथवा बुरे इस बात का निर्णय करने वाला यह आप है। अच्छे कर्म इसे अच्छा बना देंगे और बुरे कर्म करने से यह बुरा हो जाएगा। अच्छे और बुरे कर्म एक प्रकार के बीज हैं जिन्हें यह स्वयमेव बो रहा है। जैसा यह बोएगा वैसा ही फल इसे मिलेगा।  ""जेहा बीजै सो लुणै करमा संदड़ा खेत''
इसका अभिप्राय दूसरे शब्दों में यह हुआ कि मनुष्य ही परलोक को बनाने या बिगाड़ने वाला है। उसकी इच्छा है कि वह जीवात्मा को बन्धन में डाले अथवा उसे मुक्त कर दे। अब विचार करना है कि जीव बुरे अथवा पाप कर्म क्यों करता है? इसका कारण यह है कि वह अपने मालिक को अन्तर्यामी नहीं जान रहा। प्रभु को अगर यह अन्तर्यामी और सर्वव्यापक समझे तो अवश्य ही यह पाप कर्मों से बच सकता है।
      ईश्वर के दो स्वरुप हैं-एक निराकार और दूसरा साकार। परमात्मा घट घट वासी और सर्वशक्तिमान है यह उस परमात्मा के निराकार स्वरुप की महिमा है। दूसरा रुप परमात्मा का साकार है जिसे "अवतार अथवा "गुरु' कहते हैं।"गु' का अर्थ अन्धेरा और "रु' का अर्थ "प्रकाश' है गुरु का अर्थ यह हुआ कि जो जीव को अन्धेरे से निकाल कर प्रकाश में ले आवे। साकार रुप सदा भूले भटके जीवों या पाप कर्मों से दुःखी जीवों को अन्धकार से प्रकाश में लाते हैं। यदि एक जीव साकार रुप से छिपकर पाप करता है और
वह समझता है कि मुझे मेरा भगवान नहीं देख रहा तो ऐसी दशा में वह अपने पाप को निराकर भगवान
से कैसे छिपायेगा? निराकार रुप तो हमारे अन्दर बैठकर हमारी सारी कार्रवाही को देखता है और कर्मों
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का लेख लिखता रहता है। जब जीव परलोक में प्रभु दरबार में पेश होगा तो वहां निर्णय उसके कर्मों के चिट्ठे पर होगा। वहां किसी की साक्षी हो तो वहां साक्ष्य देने की आवश्यकता ही क्या रहेगी। सन्त फरमातें हैं कि प्रभु के दरबार में न अपील, न वकील और न दलील की ही अपेक्षा रह जाती है। यह नियम प्रत्येक जीव पर चाहे वह कोई भी हो लागू है।
     जीवात्मा कर्म चक्र में उलझा हुआ बार बार नीच योनियों का शिकार होता रहता है। मन के अधीन रहकर यह अनेक प्रकार के  कष्ट उठाता रहता है। महापुरुष इसे स्वतन्त्र कराने का प्रयत्न करते हैं। मन जीव से ऐसा कर्म करवाता है जिससे जीव उस के फन्दे से कभी भी न छूट सके। मन काल का अग्रदूत और पाँच चोरों (काम-क्रोध-मोह-अहंकार) का सरदार है। यह जीव को अनेक प्रकार के नाच नचाता रहता है। संसार में जितने कष्ट क्लेश देखे जाते हैं वे सब मन की कृपा के फल हैं। इन दुःखों से बचने का  एक यही उपाय है कि मन के सर्प को कुचल दिया जाय। जैसा कि बाबा फरीद साहिब के वचन हैंः-
                फ़रीदा मन मैदान कर, टोये-टिब्बे ढाह।
                अगै मूल न आवसी, दोजक सन्दी भाह।।
अर्थः-इस मन के टोये-टिब्बे अर्थात् ऊबड़-खाबड़ भू भागों को गिरा कर इसे समतल करके अर्थात् जब तेरा मन निर्मल हो जायेगा तब तू नरक की ज्वालाओं से बच सकेगा।
     यदि जीव स्वतन्त्र होना चाहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि वह पहले सन्त सत्पुरुषों की चरण-शरण में आवे क्योंकि जब तक उस पर काम-क्रोध आदि शत्रुओं का अधिकार है तब तक कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। महापुरुष आश्वासन देते हैं कि हम तुम्हें स्वाधीनता दिलायेंगे किन्तु तू हमारे कहने पर चलता जा। महापुरुषों का अवतार जीवों को संसार के बन्धनों से छुड़ाने के लिए ही होता है इसलिये उन्हें "बन्दी छोर' भी कहते हैं। तभी तो इसी बात पर बल दिया गया है कि जीव अपनी मन की मति को छोड़कर उनकी मति को ग्रहण करे-जैसा किः-
                गुरु की मति तू लै अयाने। भगति बिना बहु डूबे सयाने।।
इस मार्ग में केवल सद्गुरु की मति अर्थात परामर्श ही चलेगा। मन का तो स्वभाव ही यह है कि वह जीव को गुरु के मार्ग से रोकता है। अन्दर बैठकर सदैव यह जीव के साथ शत्रुता करता रहता है। एक ओर गुरु है और दूसरी ओर मन है- गुरु और मन की राय एक दूसरे के विरुद्ध होती है। सन्त महापुरुष ग्रन्थों व शास्त्रों में मन के विपरीत सदा लिखते हैं। जब सन्त सद्गुरु मन के पक्ष में नहीं बोलते तो क्या मन उनके पक्ष में बोलेगा? सद्गुरु जीव को मन की कैद से छुड़वाना चाहते हैं और छूटने के लिये सहायता भी करते हैं। साथ ही युक्तियां भी बतलाते हैं। वैरी से लड़ने का सामान भी देते हैं और वैरी की नाकाबन्दी करते हैं। जिससे शत्रु विवश होकर शस्त्र फैंक दे। इसलिये सद्गुरु को जीव का सच्चा साथी और मन को जीव का शत्रु कहा गया है जैसा किः- "मन सम सर शत्रु नहीं गुरु समान नहिं सज्जन' परन्तु जीव सद्गुरु का उपकार तभी मानेगा जब इसकी आँखे खुल जाएगी। अब देखना यह है कि हम गुरुमुख तो कहलाते हैं परन्तु क्या सद्गुरु का कहना अच्छी तरह मानते हैं? हमारे अन्दर बड़ी त्रुटियां हैं। जो आज्ञा हमारे मन मे अनुकूल होती है उसे मान लेते हैं और जो आज्ञा मन के विपरीत होती है उसे हमारा मन मनन नहीं करता गुरु की आज्ञा मानना और भक्ति करना मन को कब स्वीकार है? एक रोगी डॉक्टर के पास जाकर कहे कि मैं दवाई वह खाऊँगा जो मुझे मीठी लगेगी उस रोगी की चिकित्सा भी नहीं होसकती।  इसी तरह अपने मन के विचारों पर चलने से जीव का कल्याण नहीं हो सकता इसमें सन्देह नहीं कि जब मन गुरु की आज्ञा में रहकर विनिर्मल हो जाएगा फिर वह तुम्हारे पक्ष में बोलेगा। जब मन की रुचि संसार
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से हटकर भक्ति की तरफ झुकने लगे तो समझो मन विशुद्ध हो चुका है। जो तुम्हारा शत्रु था अब वह तुम्हारा मित्र बन गया है। आवश्यकता है जीव को अपने में शक्ति भरने की जैसा कि श्री भगवान का कथन हैः-उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं, नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्रात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु  शत्रुत्वे,  वर्तेतात्मैव  शत्रुवत्।। 6/5-9
जीव स्वयं ही संसार सागर से पार होने की चिन्ता करे और अपने को अधोगति में न डाले। क्योंकि यह मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।
    जिसने मन इन्द्रियों सहित शरीर को गुरु-कृपा से जीत लिया है वह जीव आप ही अपना मित्र है । जिसने मन इन्द्रियों सहित अपने शरीर को नहीं जीता उसके लिये वह शत्रु के समान बर्तता है। हमारा धर्म यही है कि गुरुमुख बनकर सद्गुरु की आज्ञा और मौज के बन्धन में रहते हुए अपनी मन और इन्द्रियों को वश में कर ले-जब यह दशा आ जाएगी तो फिर यह जीव भवसागर से निस्सन्देह पार हो जावेगा।