Sunday, July 17, 2016

धोखे से बचो


     ""ऐ सेवक! बड़े-बड़े मनुष्यों के ठाट बाट देखकर उन्हें सुखी और शान्त न समझ यदि उनके ह्मदय में नाम का निवास नहीं है। निश्चय करके जान कि उनके अन्दर की दशा जैसी घुन खाये हुए अनाज की होती है-उसमें सार तो होता ही नहीं वह केवल खोखला होता है।''
     सेवक के भक्ति धन को बचाने के लिए समय समय पर श्री सद्गुरुदेव भगवान जी ने अपने अनुभूत वचन कहे हैं। यदि हम उन्हें सत्य सत्य कर मानेंगे तो बड़े धोखे से बच जायेंगे। प्रायः हमारा मन लोगों की तड़क-भड़क को देखकर ऐसा समझने लगता है कि यह लोग बड़े भाग्यवान और सुखी हैं। ऐसा मान कर उनकी स्पर्धा करते हुए यह भी अच्छे अच्छे खाने खाने और बढ़िया पहरावे पहनने लगता है। परिणाम यह होता है कि मनुष्य आलस्य और दम्भ के कारण स्वामी से सेवक बन जाता है। सेवक धर्म निभाने में हिचकिचाता है। सुरति उसकी शारीरिक सुखों की ओर झुक जाती है। शरीर क्योंकि एक दिन मिट्टी में मिलना ही है उसकी सारी कार्यवाही भी धूल में मिल जाती है। सेवक को सदा अपने भक्ति-धन का गर्व होना चाहिये। उसे विश्वास और मान हो ऐसा कि वह अपने तुल्य भाग्यशाली सांसारिक राजा-महाराजा को भी न समझे। कारण यह कि जगत् की जितनी भी भोग-सम्पदाएं हैं वे भक्ति की तुलना में तुच्छ हैं। वे मिथ्या हैं। यदि ऐसा न होता तो राजा-महाराजा राजपाट को त्याग कर भक्ति क्यों करते अथवा महापुरुष ऐसा क्यों कथन करते?
                सगल सृष्टि को राजा दुखीआ। हर का नाम जपत होई सुखीआ।।
क्या यह खेद की बात नहीं है कि सुखी मनुष्य दुःखियों की स्पर्धा करे! शास्त्रकारों ने विषय विकारों को गन्दगी के समान समझा है और भक्ति को अमृत तुल्य कहा है। अमृत को त्याग कर विष्ठा ग्रहण करने वाले को कौन बुद्धिमान् कहेगा? एक स्वच्छ वेषधारी मनुष्य भंगी के काम का अनुकरण करे इसे उन्नति का मार्ग थोड़ा कहा जायेगा? ऐसा ही उस सेवक के सम्बन्ध में भी समझो क्योंकि सद्गुरु के सेवक का दर्ज़ा तो सर्वोत्तम है। भगवान् का सबसे अधिक प्यार सेवक पर ही होता है। अतः सेवक का भी धर्म है कि अपने मन को कभी भी इधर उधर विक्षिप्त न करे। सांसारिक भोग-विलास में न अटकावे। परमसंत श्री कबीर साहिब जी ने भी फरमाया है कि एक मन में एक ही वस्तु समा सकती है। यदि तुम बहिर्मुखी वृत्ति वाले होकर जगत् के रसों का स्वाद लोगे तो तुमसे गुरु भक्ति सिद्ध नहीं हो सकेगी। यदि सच्ची भक्ति करने की इच्छा है तो विषय-विकारों और शारीरिक सुख-सुविधाओं को ह्मदय से तिलाञ्जलि देनी होगी।
                कबीर मन  तो  एक है , चाहे जिधर लगाय।
                चाहे गुरु की भक्ति कर, चाहे विषय कमाय।।
      संसार रुपी बाज़ार में मानव को अधिकार है कि वह कोई भी सौदा खरीद करे-कांच का अथवा रत्न का। परन्तु सन्त सत्पुरुष यही चाहते हैं कि मेरे आत्मिक पुत्र लाभ का व्यापार कर जावें जिससे परलोक मे सम्मान प्राप्त करें और यहाँ भी उनका समय मान और शान्ति पूर्वक व्यतीत हो।
      श्री गुरु नानक देव जी अकाल पुरुष का सन्देश देते हुए आसाम में जा पहुँचे। वहां एक नगर में बड़े ऊंचे और सुन्दर भवन दिखाई दे रहे थे। वहां के सभी नागरिक ठाट-बाट से घूम रहे थे। उन्हें देखकर मर्दाने का मन चंचल हो उठा। उसने श्री गुरु महाराज जी के चरणों में विनय की कि इस नगर के लोग बड़े सुखी प्रतीत होते हैं। श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया-
                बड़े बड़े जो दीसन लोग। तिन को व्यापै चिन्ता रोग।।
     श्री गुरुनानक देव जी के भी वही वचन हैं जो ऊपर श्री गुरु महाराज जी ने फरमाये हैं। कथन किया कि "मर्दाना! उनके अन्दर चिन्ता का रोग लगा हुआ है जो उन्हें दिन रात खाये जा रहा है। तू इनकी बाहरी
शान-शौकत को देखकर भूल मत जा'-किन्तु मर्दाना की तीव्र इच्छा थी कि मैं इस नगर के बाज़ारों में चक्कर लगा आऊँ पुनः प्रार्थना की "भगवन्! मैं देर नहीं लगाऊंगा-शीघ्रातिशीघ्र ही वापिस आ जाऊंगा, मुझे आज्ञा दीजिए।''
     श्री गुरु महाराज जी ने सोचा कि यह इशारे को तो समझता ही नहीं है-इसलिये कह दिया कि जैसे तुम्हारा विचार हो। इस वचन को आज्ञा समझकर मर्दाना नगर में गया-जाने की देर थी-अभी पहली ही गली में पाँव रखा था कि एक जादूगर ने जादू का धागा उसके गले में डाला और उसे भेड़ बनाकर एक खूँटे से बाँध दिया। मर्दाना मन ही मन में बड़ा पछताने लगा और अन्दर ही अन्दर श्री गुरु महाराज जी के चरणों में विनय करने लगा और अपनी भूल के लिये लगा क्षमा याचना करने।
     श्री गुरु महाराज जी अन्तर्यामी थे। उसकी पुकार को सुना और अपना विरुद जानकर वहां पहुँचे। मर्दाना ने उन्हें दूर से देखते ही अपनी भाषा में रोना और चिल्लाना शुरु कर दिया। श्री गुरु महाराज जी जैसे उसके निकट गये वह उनके श्री चरणों में लिपट गया। श्री गुरु महाराज जी ने दया करके उसके गले से धागा खोल कर उसे वास्तविक रुप दे दिया।
     यह दशा प्रायः जीवों की होती है कि वे मनमति के अधीन होकर श्री गुरु महाराज जी के वचनों का उल्लंघन करते हैं और सांसारिक तड़क-भड़क में उलझ जाते हैं। फल यह होता है कि आकृति से मनुष्य होते हुए भी वे स्वभाव से पशु बन जाते हैं। श्रीकृष्ण जी ने गीता में इसी बात को ऐसे स्पष्ट किया हैः-
                ध्यायतो    विषयान्पुंसः    संगस्तेषूपजायते ।
                संगात्संजायते कामः, कामात्क्रोधोऽभिजायते।।
                क्रोधाद् भवति संमोहः, संमोहात्स्मृति विभ्रमः।
                स्मृति भ्रंशाद् बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।(गीता-2/62-63)
     कथन किया कि पहले मनुष्य को पता नहीं लगता आदत पड़नी तो आसान परन्तु उससे छुटकारा अति कठिन है। विषयों के पीछे मन को भगाने से उनसे आसक्ति हो जाती है। संगदोष से कामना का जनम होता है। कामनाओं के पूरा न होने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मनुष्य मूर्ख बन जाता है-उसे इतना भी बोध नहीं होता कि मुझे किससे कैसा बोलना चाहिये और मैं बोल क्या रहा हूँ। ऐसी दशा में मनुष्य सच से वञ्चित रह जाता है। उसका जीवन मृतक के समान हो जाता है। यद्यपि यह दशा एकदम तो नहीं होती परन्तु शनैःशनैः एक दिन उपरवर्णित दशा मनुष्य की हो ही जाती है। ऐसी हानि से वही भाग्यवान बच जाता है जो गुरु के वचन का अतिक्रमण कदाचित् नहीं करता। अपने सेवक-धर्म को दृढ़ता से सँभालता है। शास्त्रों के प्रमाण हैंः- ""धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः''
भाव यह कि "मारा हुआ धर्म मारता है और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी उसकी रक्षा करता है।' धर्म के मार्ग पर चलने वालों पर कितने ही कष्ट आयें परन्तु अन्त में विजय उन धर्मात्माओं की ही हुई। राजा हरिश्चन्द्र अपने कत्र्तव्य पालन को मुख्य रखकर शासन किया करते थे। उनके श्री गुरुमहाराज जी ने उनकी परीक्षा लेनी चाही कि वह कहीं सांसारिक भोग-विलासों में अटका हुआ तो नहीं। देखें कि इनका प्यार मेरे वचनों से है या राज से। कथा प्रसिद्ध है कि हरिश्चन्द्र ने राजपाट को गुरु वचनों पर कुर्बान कर दिया और जितने भी कष्ट-क्लेश आये सहर्ष सहन किये। अन्त में उन्हें प्रतिष्ठा,सच्ची प्रसन्नता, विजय और ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। आज तक भूमण्डल पर अनेकों राजा-महाराजा राज्य कर गये परन्तु हरिश्चन्द्र का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है।"रामायण' में तनपोषक को मृतक कहा गया है। सेवक को सदा परिश्रमी और क्रियाशील रहना चाहिये। उसे सादा स्वभाव रखने से धर्म पालन में सहायता मिलती है। ये अस्त्र हैं जिनकी शक्ति से सेवक बाज़ी जीत जाता है।यदि राजा हरिश्चन्द्र भी बाहरी ठाट-बाट में अटके हुए होते तो परीक्षा के समय असफल हो जाते और आज जितनी महिमा उनकी फैली हुई है वह रत्ती भर भी न होती।
     श्री गुरु महाराज जी की पवित्र मौज है कि हमारा सेवक अन्तिम क्षण तक अपना धर्म निभावे और सच्ची कमाई कर जावे। सत्य पर न्यौछावर हो जावे। सच में समा जावे क्योंकि ऐसा सुयोग बार बार नहीं मिलता। श्री आनन्दपुर जैसे सच्चे दरबार में बैठक मिलना और परिपूर्ण सद्गुरु की शरण का प्राप्त होना एक स्वर्णिम अवसर है। अब का चूका फिर पछताएगा। सद्गुरु जैसा क्षमादाता और कोई नहीं और सद्गुरु की शरण में आए हुए को जो विषय विकारों से बचने के साधन उपलब्ध हैं वे भी किसी और को सुलभ नहीं सकते। उदाहणतः सद्गुरु का भय, सम्मान, सहनशीलता, आदि आदि। यदि सच पूछा जाये तो तथ्य यह है कि संसार की बड़ाइयों से तो सद्गुरु के दरबार की धूलि में लेटना भी भाग्य की निशानी है। वाणी का वाक हैः-घणी  विहूणा  पाट  पटंबर भाही  सेती जाले।
                धूड़ी विच लुड़ंदड़ी सोहां नानक तै सह नालै।।
                                  गुरुवाणी सलोक महला-5
इस वास्ते सेवक को सदा अपनी सुरति की सँभाल करनी चाहिए ऐसा न हो कि वह अपने ठिकाने से कभी भी भटक जावे और गुरु के पास रहता हुआ भी सेवक उनसे अलग पड़ा रहे। समय भी गुज़र जाय और पूरा लाभ भी न उठा सके। यह अत्यन्त खेद की विषय है। इसीलिए महापुरुष सेवक को पहले से चेतावनी देकर सावधान करते हैं जिससे अन्त में उसे पछताना न पड़े।

No comments:

Post a Comment