Saturday, July 30, 2016

सुरति को शब्द से जोड़ दो


""तुम अपनी सुरति को गुरु शब्द से जोड़ दो फिर देखो! प्रकृति और उसकी सब शक्तियां तुम्हारे आगे कैसे हाथ बाँधकर खड़ी हो जाती हैं।'' विज्ञान का यह नियम है कि सदा छोटी वस्तु अपनी सजातीय बड़ी वस्तु की ओर भागती है उदाहरणतया-आप एक पत्थर को ऊपर फैंको तो वह धरती की ओर ही दौड़ेगा क्योंकि वह उसका अंश है। पानी की नदी समुद्र की तरफ ही दौड़ी जाती है। दीये की ज्वाला अथवा मोमबत्ती की शिखा ऊपर की ओर ही लपकेगी क्योंकि वह सूर्य का अँश है। सन्तों का कथन हैः-
                रैन  समानी  भान्नु  में  , भानु  अकासे  माहीं।
                आकास समानो सबद में, सबद परे कुछ नाहीं।।
यह प्रकृति शब्द में से उत्पन्न हुई है। यह प्रसिद्ध है कि भगवान ने शब्द का उच्चारण किया कि-""एकोऽहं बहु स्याम्'' अर्थात् मैं एक हूँ अनेक हो जाऊँ इतने शब्द के कहते ही सृष्टि बन गई। गुरुवाणी का वाक हैः-              नाम के धारे सगले जन्त। नाम के धारे खण्ड ब्राहृण्ड।।
नाम से अर्थात् शब्द से ही खण्ड और ब्राहृाण्ड बन गये। उसी नाम के ही आधार पर सब स्थित हैं। इस विचार से जहाँ नाम का निवास है वहां सब पदार्थ भाग-भाग कर पहुँचते हैं सन्तों के पास यही नाम ही कल्पवृक्ष और कामधेनु है। पारजातु इहु हरि को नाम। कामधेन हरि हरि गुण गाम।।
उसी नाम के प्रताप से ऋद्धियां और सिद्धियां उनके द्वार की दासियां बनी रहती हैं। सन्त सत्पुरुषों की यही मौज होती है कि जो सेवक हमारी शरण में आये हैं-वे मायावी मिथ्या पदार्थों की दासता से मुक्त होकर उन के स्वामी बन जाएं और ऐसे शहनशाही पद को प्राप्त करने की जो सहजविधि है,"शब्दाभ्यास' है। सत्पुरुष अपने सेवकों से वही अभ्यास कराते हैं उन जैसे उपकारी संसार में और कोई नहीं है। इनसे नाम दान पाकर सदा के लिये प्रशान्त हो जाता है। आशाएँ काफूर हो जाती हैं। सुरति को सच्चा आश्रय मिल जाता है जिससे वह फिर झूठ की ओर नहीं झुकती। चौरासी का चक्र अनायास ही कट जाता है।
     आप विज्ञान का एक और उदाहरण ले लो। सूर्य की गर्मी से जब वायु हल्की होकर ऊपर को उठती है तो उसका स्थान लेने के लिये भारी हवाएँ दौड़ती हुई आती हैं।जिन्हें तूफान कहा जाता है। ऐसे ही जिस मनुष्य की सुरत शब्दाभ्यास से सूक्ष्म हो जाती है अर्थात् मायावी कीच से मुक्त हो जाती है तो वह ऊपर के चक्रों की ओर उड़ान भरती है। तभी उसके पास संसार के स्थूल पदार्थ भाग-भाग कर आते हैं। यदि त्यागवान पुरुष उन्हें स्वीकार करे तो वे पदार्थ अपने को परमधन्य मानते हैं। कारण यह कि उनका गौरव भी कई गुना अधिक हो जाता है। जैसे देखा जाता है कि जिस भूखण्ड को सन्त सत्पुरुषों ने अपना डेरा लगाने के लिये पसन्द कर लिया तो उसके एक एक कण का कितना मुल्य हो जाता है लाखों लोग उसे श्रद्धा से सीस पर चढ़ाते हैं।जिस लकड़ी के सिंहासन पर बैठने की वे कृपा करते हैं उस लकड़ी को लाखों जीव अपना मस्तक छुआते हैं और अपना भाग्य मनाते हैं। जो जल श्री चरण कमलों को छूकर चरणामृत बनने का गौरव प्राप्त करता है फिर वही अमृत रुप होकर लाखों जीवों को अमर कर देता है। ""गुरुपादोदकं पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते।''
     हज़ारों लोगों के मुख से सुना जाता है कि हमें पृथ्वी जगह नहीं देती हमारे कहीं पांवों टिकते ही नहीं-हमारा धन्धा नहीं चलता। एक जगह जाते हैं फिर दूसरे स्थान की तैयारी में होते हैं। भटक भटक कर व्याकुल हो उठे हैं। इतना अन्तर है-किसी को वह भूमि जगह ही नहीं देती और किसी के आगमन की बाट जोहा करती है।   गहु करि पकरी न आई हाथि। प्रीति करी चाली नहीं साथि।।
                कहु नानक जउ तिआग  दई।  तब ओह  चरणी आई पई।।(रामकली म.5)
यह एक अटल नियम है कि सांसारिक पदार्थों को मन से त्याग दो तो वे तुम्हारा पीछा न छोड़ेंगे। आमने-सामने के किवाड़ खोल दो तो वायु एक तरफ से जाने लगेगी तो दूसरी ओर से हवा आना शुरु हो जाएगी। वायु के जाने का मार्ग रोक दो तो पवन के आने का मार्ग बन्द हो जाएगा। मनुष्य का दायां हाथ क्यों बलशाली होता है? क्योंकि वह अपनी शक्ति खर्च करता रहता है-इसकी तुलना में बायां हाथ कम शक्ति खर्च करता है अतः वह कम बलवान होता है। आप पानी में तैरना चाहो तो पानी को दोनों हाथों से पीछे को फैंकते जाओ तो जल में तैर सकोगे। पानी को यदि पीछे नहीं फैंकोगे तो डूब जाओगे।
                पानी  बाढ़ै  नाव  में , घर में बाढ़ै दाम।
                दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।
     ऐसे ही सांसारिक जड़ पदार्थों को मन से बाहर फैंकते जाओ तो सहज ही भवसागर से तर जाओगे। यदि उन्हें फैंकना नहीं सीखोगे तो तरना असम्भव है। वस्तुतः तो त्यागने का नाम ही पाना है। किसी कवि ने क्या सुन्दर कहा हैः-जब तक न धन दिया था, तब तक ग़रीब था मैं।
                    सब कुछ तुझे ही देकर, अब मैं धनी हुआ हूँ।।
तब तक तो भगवान भी आराम से बैठे थे जब तक नामदेव भक्त की जेब में बीस रुपये थे। जब देखा कि नामदेव ने वे रुपये सन्तों की सेवा में खर्च कर दिये हैं तो एक दम आरी आदि बढ़ई का सामान कन्धे पर उठाया और पल भर में वहां पहुँच कर उसका टूटा हुआ छप्पर तैयार कर दिया।
     भक्त भगवान दास जी एक दिन श्री कालीदास जी के घर गये। जब तक कालीदास के घर को छोड़ेगे नहीं वे अपने घर कैसे पहुँचेंगे? ऐसे ही यह शरीर काल का घर है। इसमें थोड़े दिनों के लिये जीवात्मा(जो कि वास्तव में ईश्वर का अंश है) विहार करने आया है। जब तक यह जीवात्मा इस घर की मोह ममता का त्याग नहीं करेगा तो अकाल पुरुष के देश (निज देश) में कैसे पहुँचेगा? यदि सन्तों की आज्ञा मान कर हर्षपूर्वक इस घर की ममता को नहीं छोड़ेगा तो महाकाल देव इससे दण्ड के बल से छुड़वाएगा।
     एक बन्दर ने सुराही में पड़े हुए चनों की मुट्ठी भर ली जिससे उसका हाथ वहीं अटक गया। किसी बुद्धिमान ने कहा कि मुट्ठी खोल दो,चनों का लालच छोड़ दो तो स्वतन्त्र हो जाओगे नहीं तो मारे जाओगे और चनों से भी हाथ धो बैठोगे। उसने फिर भी कहना न माना फल यह हुआ कि मदारी आया और बन्दर के गले में फन्दा डाला और उसके सिर में दो-चार डण्डे लगा दिये मार भी खाईऔर चने भी हाथ न आये और सदा के लिये कैद भी हो गया यही दशा इस जीव की है। सन्त सद्गुरु हमें समझाते हैं कि ममता की मुट्ठी खोल दो तो बन्धनों से मुक्त हो जाओगे-जो भाग्यवान उनका आदेश मानता है वह मुक्ति का सुख पाता है। जो नहीं मानता उसका यह हाल होता है जैसा कि गुरुवाणी में कहा हैः-
                संपति रथ धन राज सिउ  अति  नेहु  लगाइओ ।
                काल फास जब गलि परी, सभ भइओ पराइओ।। (तिलंग म.9-पृ.727)
अब बुद्धिमान मनुष्य को लाभ हानि पर विचार करना चाहिये एक ओर तो है मोक्ष का सुख और दूसरी तरफ है यम का पाश। एक तरफ तो है लोक और परलोक की सुख-सम्पदा का हाथ लगना-दूसरी ओर है दोनों लोकों में खाली हाथ रहना-यह सोच कर लाभ का काम करना ही बुद्धिमत्ता की निशानी है।
    श्री गुरुमहाराज जी जैसे हमारे परम हितैषी हैं वैसा और कोई भी भूमण्डल पर नहीं है। वे बड़े दूरदर्शी हैं। उनकी दृष्टि दोनों लोकों में हमारी भलाई के लिये पहुँचती है।हमारा धर्म है और इसमें ही हमारी भलाई है कि उनके वचनों को हम सत्य सत्य करके मानें और अपनी सुरति की धारा को उनके दिये हुए शब्द से जोड़ दें। जिससे इस लोक में भी सुखी रहें और परलोक में भी मालिक के आगे निश्शंक होकर जावें।

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