Wednesday, July 6, 2016

करनी भरनी


     प्रकृति की पांच शक्तियां आकाश, पवन, अग्नि, जल और पृथ्वी किसी चीज़ की उत्पत्ति, स्थिति और उसके विनाश में प्रतिपल कार्य करती हैं। उदाहरण रुप में देखिये-किसी पुरुष ने पृथ्वी के अन्दर बीज डाला और उसे दबा दिया। वह बीज धरती में से फूटता है; फलता-फूलता है और एक से अनेक हो जाता है। बीज के (उगाने, फलने-फूलने व एक से अनेक करने में भी उन्हीं पाँचों तत्त्वों का हाथ है। उस मनुष्य ने तो केवल बीज ही बोया है और चाहे कुछ भी नहीं किया तो भी प्रकृति के पांचों तत्त्वों ने बराबर काम करना है। उन पाँचों शक्तियों को काम करने से कोई रोक नहीं सकता।
     मनुष्य भी इस संसार में एक कृषक अथवा भूमिपति के सदृश है। वह चाहे अच्छा बीज बोवे या बुरा इस बात में वह स्वतन्त्र है। वह मात्र मानव शरीर में ही बीज बोने की क्षमता रखता है अन्यथा अन्य कोई योनि नहीं जिसमें जाकर वह भला-बुरा बीज बो सके। इसी कारण ही मनुष्य को सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अब विचारणीय बात यह है कि मनुष्य किस प्रकार का बीज बो रहा है । कड़वा या मीठा। कड़वे या मीठे बीज को उगाने में प्राकृतिक पाँचों तत्त्व तो एक समान ही सहायता करेंगे। बीज कड़वा या मीठा जैसा भी होगा उसका फल तदनुकूल ही आएगा। प्रकृति ने तो उसकी सहायता करके उसे पनपाना है। वह तो चोर को और साध को एक समान ही सहायता देगी।
     अब हम आध्यात्मिक जगत की ओर चलते हैं । जीव अगर पाप का बीज बो रहा है तो उसका फल पाप होगा यदि बीज पुण्य का है तो वह पुण्य का ही फल देगा। बीज बोने का दायित्व मनुष्य पर है। यदि कोई पाप कर्म करके यह समझे कि उसे किसी ने देखा नहीं यह उसका विचार करना मिथ्या है। प्रकृति से कुछ भी छुपाया नहीं जा सकता। वह तो उसे एक न एक दिन उसका फल देवेगी ही। इसी प्रकार से यदि कोई आठवीं गुफा में जाकर भी पुण्य या पाप कर्म करता है तो उसे भी प्रकृति किसी न किसी दिन प्रकट कर देगी। अतः मनुष्य को विश्व में गम्भीरता पूर्वक विचार करके पग बढ़ाना चाहिये। यदि प्रमाद किया अथवा संसारियों की देखा देखी भेड़चाल चला तो वह अवश्यमेव धोखा खायेगा। समय का प्रवाह बड़े वेग से चल रहा है। यदि वह मनुष्य जन्म कहीं धोखेमें ही बीत गया तो फिर क्या कोई दूसरा जन्म भला बीज बोने के लिये मिलेगा? नहीं।
     परमार्थी जीव का धर्म है कि वह अपने कत्र्तव्य को पहचाने। दूसरों का अन्धाधुन्ध अनुकरण न करे। संसारी लोग क्या कर रहे हैं क्या खा रहे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं इधर ध्यान देना उसका उद्देश्य नहीं है। परमार्थी और संसारी का मार्ग पृथक्-पृथक् है। परमार्थी जीव को तो केवल सद्गुरु के उपदेश पर चलना है। यदि वह भी साधारण जीवों की भांति सन्मार्ग को छोड़ देता है और धोखे में चला जाता है तब दूसरे उसका साथ न देंगे। यह ज्योति उसे सन्त सद्गुरुदेव जी के सत्संग से ही मिल सकती है।परमार्थी का धर्म है कि वह सत्संग के वचनों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे और उन पर आचरण करे। मन-बुद्धि-चित्त में उन को स्थान दे। सत्संग का भी तभी लाभ है अन्यथा नहीं। हर किसी की करनी व भरनी अपने अपने साथ है। किसी का अन्धानुकरण करने अथवा किसी के दोषों को देखने की क्या आवश्यकता है? यदि कोई तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करता है तो तुम्हें बदले में बुरा बर्ताव करने की आवश्यकता नहीं। जैसे कहा हैः-     जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
                तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
जिसने तुम्हारे साथ बुरा किया है उसका फल भी उसी को भोगना पड़ेगा। कुदरत हर किसी को उसकी
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भावना के अनुसार फल देती है। तुम अपने कर्तव्य की चिन्ता करो-दूसरों की ओर देखने की आवश्यकता
ही क्या है?       बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
                जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।।
     एक मनुष्य अपने गुण और दूसरों के अवगुणों को देखता है। प्रकृति के नियमानुसार उसके अन्दर दूसरे के दोष ही आ प्रवेश करेंगे साथ ही उसके अपने गुण बाहर चले जाएँगे। इसलिये महापुरुषों ने सोच समझ कर यह सदुपदेश दिया है कि ऐ जीव! तू केवल अपने कत्र्तव्य पर ही दृष्टि रख। महापुरुषों ने जो परमावश्यक धर्म बताए हैं अर्थात् भजनाभ्यास, आरति-पूजा और सेवा तुम इन्हें नियमपूर्वक करते जाओ। ऐसा करते रहने से अवश्य ही एक दिन बेड़ा पार हो जाएगा। महापुरुष हम से ये ही शुभ कर्म करवाने और हमारा उद्धार करने के लिये प्रकट होते हैं। यदि हम उनके नियमों का परिपालन नहीं करेंगे तो हमें उनकी प्रसन्नता प्राप्त न होगी। यदि हमें वस्तुतः उनकी प्रसन्नता अभीष्ट है तो इन कत्र्तव्यों का पालन करना ही होगा। केवल बातें बनाने से संसार में चाहे काम चल जाय किन्तु मालिक के दरबार में तो करनी ही काम आएगी। वहां चतुराई व बुद्धिमत्ता काम न देगी। वहां तो केवल क्रियात्मिक जीवन और सत्यता की आवश्यकता है। "कट्टे वांग अरड़ावे, ते साहिब दे मन भावे'। महापुरुष कथन करते हैं जिसके मन में सच्चाई है और उसे बात करने का ढंग भी न आवे तो भी ऐसा जीव मालिक को प्यारा लगता है। सदाचरण से ही प्रभु को प्रसन्न किया जा सकता है। सदाचारी बन कर अपने इष्टदेव जी की प्रसन्नता प्राप्त करके मनुष्य को जीवन का यथार्थ उपयोग कर लेना है।
घृणा और बुराई से बचो
     यदि कोई मनुष्य तुम से घृणा या अहित करता है तो तुम उससे न घृणा करो; न उसका अहित चिन्तन करो। यदि हम सत्पुरुषों के छोटे से इन वचनों पर आचरण करें तो हमारी आत्मा के अन्दर जो मायावी विषैला तत्त्व भर गया है (जिसने हमें आकुल कर रखा है) वह पल भर में नष्ट हो जायेगा। उस विषैले पदार्थ का अपहार सद्गुरु वचन रूपी अमृत के सिवाय असम्भव है, हाँ जीवन का सर्वनाश कर देगा। उसका प्रभाव न केवल एक जन्म तक रहता है अपितु उसके विषमय प्रभाव से जन्म जन्मान्तरों तक जीवात्मा चौरासी के चक्र में भटकता रहता है।
     एक व्यक्ति चलती ट्रेन से गिर पड़ा और उसके पाँव का थोड़ा सा भाग कट गया। उसे डॉक्टर के पास ले जाने में जितनी देर लगी उतने में उसका विष घुटने तक चढ़ गया। डॉक्टर ने कहा कि इसकी आधी टाँग काटनी पड़ेगी। अन्यथा इसका जीवन भयसंकुल है। इसका निश्चय भी जल्दी करो नहीं तो जितनी देर करोगे उतना विष अधिक ऊपर चढ़ता जाएगा और उससे टाँग का बहुत सा भाग काटना पड़ेगा। उसके सम्बन्धी इस सोच विचार में बहुत से एकत्र हो गये। उनके परस्पर विचार-विमर्श करते करते कुछ देर लग गई। डॉक्टर साहिब ने कहा कि क्योंकि निर्णय करने में समय लगा दिया अब इसकी पूरी टांग काटनी पड़ेगी। अन्त में उसकी टांग पूरी ही काटनी पड़ी और उसको छुटकारा मिला। यदि वह कुछ घण्टे और भी देर करते तो उसके प्राणों तक से भी हाथ धो बैठते।
     ऐसे ही घृणा करने से जिसके मन पर एक बार चोट लग गई यदि उसकी चिकित्सा तुरन्त कर ली गई तो ठीक नहीं तो वह घृणा का भाव पनपते हुए कलह-कल्पना का रूप धारण कर लेता है। वही कलह अनेक वर्षों तक चलता रहता है और जिसके कारण देशों के देश विनष्ट हो जाते हैं। यही घृणा ही थी जो कौरवों के मन में चिनगारी रुप में पहले लगी थी। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी ने प्रयत्न किया कि यह विषैला पदार्थ निकल जावे इस विचार से वे स्वयं  चलकर उनके  समीप गये अमृतमय  वचनों की दवाई उन्हें देने लगे-परन्तु कौरवों ने उनके सदवचनों का तिरस्कार कर दिया। अन्ततोगत्वा उस घृणा ने वे रंग दिखाये कि महाभारत का तुमुल संग्राम बन गया। उसमें लाखों-करोड़ों जीवनों की बलि हो गई। यदि वे कौरव भगवान के हितकर वचनों को मान लेते तो घृणा प्रेम का रुप ले लेती और झगड़े के स्थान पर समझौता हो जाता और विष अमृत बन जाता। जैसे एक आम की गुठली से लाखों-करोड़ों आम पैदा होते हैं वैसे ही विषैले बीज से विषैले फलों वाले वृक्ष उत्पन्न होते हैं। यादवों के ह्मदय में तनिक सी दुर्भावना सन्त महापुरुषों के प्रति उत्पन्न हुई। परिणाम क्या हुआ कि अगणित यादव उस छोटी सी भूल के कारण महाकाल के गाल में समा गये।
     हमें भी श्री गुरुमहाराज जी इसीलिये सावधान करते हैं कि यदि इस बीज को समाप्त न करोगे तो इसका उग्र परिणाम देखकर हाथ मलोगे। इसी विषय की और व्याख्या करते हुए श्री गुरु महाराज जी ने उदाहरण दिया कि एक मनुष्य किसी को थोड़ी सी मिठाई देकर उससे बहुमूल्य लाल ले ले तो उसने कितने लाभ का कार्य किया। भाव यह कि किसी से मीठा बोलकर,प्रेम का वर्ताव करके उससे उसके दिल रुपी अमुल्य लाल का ले लेना अर्थात् उसके मन को अपना बना लेना कितना लाभकारी काम है। इसके विपरीत दूसरा मनुष्य कड़वी बोली बोल कर दूसरे के दिल में घृणा और द्वेष भर कर उसके अमुल्य दिल रुपी लाल को चकनाचूर कर देता है तो उसने अपरिमित हानि की। इस बात का विचार गुरुमुखों को रखना चाहिये।
     द्रोणाचार्य और द्रुपद सहपाठी थे। द्रुपद को जब राजगद्दी मिली तो आचार्य द्रोण उसे विद्यालय का सखा समझकर उससे मिलने गये। जब राज दरबार में पहुँचे तो द्वारपाल के हाथ कहलवा भेजा कि ""महाराजा से कहो कि तुम्हारा बाल सखा द्रोणाचार्य तुमसे मिलने आया है।'' जब राजा को यह सन्देश मिला तो उसने प्रत्युत्तर दिया कि ""कहाँ हम और कहाँ तुम-छुटपन की बातें मूर्ख लोग याद रखते हैं।'' घृणा भरे ये शब्द सुनकर आचार्य द्रोण जी चुपचाप चले गये।
     द्रोणाचार्य जी पाण्डवों को धनुर्विद्या सिखा चुके तो पाण्डवों ने गुरुदेव के चरणों में कोई गुरु दक्षिणा देने के लिये निवेदन किया। इस पर आचार्य जी ने कहा कि ""यदि तुम हमें गुरु दक्षिणा देना चाहते हो तो राजा द्रुपद के हाथ पाँव बाँधकर उसे मेरे सम्मुख खड़ा कर दो।'' पाण्डवों ने गुरु के आदेश का पालन करते हुए द्रुपद को बन्दी के समान उनके सामने प्रस्तुत कर दिया। द्रोण बोले कि ""तुम्हें हमारा मुख देखने से घृणा थी यह उसका फल है जो आज तुम पा रहे।'' द्रुपद इस पर पानी पानी हुआ और लगा क्षमा याचना करने। आचार्य द्रोण ने उसे बड़े प्रेम से समझाया कि घृणा करने से बड़ाई नहीं मिला करती। तुम नहीं जानते क्या-कि भगवान श्री कृष्ण जी ने स्वयं मालिक होते हुए भी निर्धन सुदामा जी से घृणा नहीं की बल्कि उसे अति प्रेम प्यार से गले लगाया और फिर समझाया कि ""तुम भी प्रण करो कि भविष्य में कभी भी किसी से घृणा न करोगे। तब तुम्हें मैं अभी मुक्त किये देता हूँ।'' द्रुपद ने अपनी स्वीकृति दी और तब वह मुक्त होकर अपने राज्य में चला गया।
     इन इतिहासों से विदित होता है कि घृणा और अनिष्ट करने का फल कितनी भयंकरता से भोगना पड़ता है इसलिये महापुरुष घृणा के बीज का ही नाश कर देना चाहते हैं और अपने अमृतमय वचनों से उसके विष भरे प्रभाव को मिटाना चाहते हैं। जो भाग्यशाली पुरुष इन बचनों का अनुसरण करते हैं उनकी मनोवृत्ति में अमृत की धारा बह चलती है और जो विष के प्रभाव को बाहर निकाल देती है। बीज से जिस तरह फल पकता है वैसे ही विचार के अनुसार मनुष्य कर्म करने लगता है। बुराई करने वाले की बुराई तुम मत सोचो-जैसा करेगा वह वैसा भरेगा इस प्रसंग में एक कथा हैः-
एक पण्डित जो ज्योतिष-विद्या में निपुण था एक रजवाड़ा में रहता था। उसका निवास-स्थान राज-प्रासाद से आठ-दस मील दूर एक नदी के तट पर था। राजा कर्मकाण्डी था परन्तु उसका इकलौता पुत्र गुरु भक्त था। संयोगवश उसका विवाह भी एक गुरुभक्त राजकुमारी से हो गया। उसके पिता राजा साहिब का विचार था कि कन्या की जन्मपत्री और उसका हाथ किसी ज्योतिषी को दिखा दें जिससे कुँवरी के भाग्यों का ज्ञान हो जाय किन्तु राजकुमार कहता था कि पूर्ण सतगुरु सेवक के रक्षक होते हैं यदि उसके भाग्य में सूली भी हो तो वे उसे काँटा बना देते हैं। उनका ध्यान,उनके शब्द का अभ्यास आने वाले समस्त दुःखों की औषध है। राजकन्या की जन्म कुण्डली दिखाने या न दिखाने का निर्णय नहीं हुआ था कि राजकुमारअपने साथियों को साथ लेकर शिकार खेलने चला गया। शिकारगाह भी वह नदी के किनारे नगर से चार मील की दूरी पर थी। दैववश वह ज्योतिषी जो आठ दस मील दूर रहता था राजमहल में आ पहुँचा। राजा ने उस कन्या की कुण्डली और उसका हाथ उसे दिखाया-ज्योतिषी ने जब उस कुमारी के लावण्य को देखा तो उसका मन विचलित हो गया।   काम क्रोध मद लोभ की, जब लगि घट में खान।
                      क्या  मूर्ख  क्या  पण्डिता , दोनों एक समान ।।
     वह ज्योतिषी पढ़ा लिखा तो बहुत था परन्तु शब्दाभ्यासी न होने के कारण मन के अधीन हो गया। वह महाराजा से बोला कि,""यदि यह कन्या आपके राज्य में रहेगी तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा।'' राजा ने इसका प्रतिकार पूछा-तो ज्योतिषी ने कहा, कि लकड़ी का बड़ा सन्दूक बनवाओ जिसमें वायु का भी संचार हो, उसमें इस लड़की को बन्द करके कुछ हीरे-जवाहरात भी साथ में रखकर उस सन्दूक को आज रात के पहले पहर में इस नदी में बहा दो। इस तरह तुम्हारे राज्य पर आने वाला संकट कट जाएगा।
     राजा कर्मकाण्डी तो था ही। ज्योतिषी की बात सुनकर काँप उठा और बोला कि हम आज ही ऐसा करेंगे। यह रहस्य तुम और किसी से न कहना। ज्योतिषी अपने घर चला गया और रात को नदी किनारे बैठकर उस सन्दूक की लगा प्रतीक्षा करने। उसे प्राप्त करने की पूरी पूरी व्यवस्था भी कर दी। उधर राजा ने दवाई देकर कन्या को मूर्छित करके सन्दूक में बन्द करके बहा दिया। भाग्यवश वह राजकुमार उस समय साथियों के साथ नदी के तीर पर भ्रमण कर रहा था। उन्होने जब दूर से आते हुए सन्दूक को देखा तो अपने राजपुरुषों को भेजकर वह सन्दूक बाहर निकलवा लिया। सन्दूक के खुलते ही राजकुमार चकित रह गया। राजकुमारी को पाकर कुँवर ने प्रभु को धन्यवाद दिया। भाग्य से शिकार खेलते हुए एक जीवित रीछ उनके हाथ लग गया था। राजकुमार ने उसे ही सन्दूक में बन्द करके आगे प्रवाहित कर दिया। पंडित जी उस सन्दूक की प्रतीक्षा में बैठे ही थे। उसे देखते ही गद्गद हो गये। सन्दूक को निकाला और घर में ले आये। सब को विदा किया और एक कोठी में एकान्त देखकर बड़े हर्ष से वह सन्दूक खोला परन्तु हुआ क्या-कि सन्दूक के खुलते ही एक मस्त रीछ उसमें से निकला और झपट कर पंडित जी को समाप्त कर दिया। बात फैलते फैलते राजा के कानों तक भी जा पहुँची। एक दो दिन में राजकुमार भी अपनी पत्नी के साथ राज्य में लौट आया। पंडित जी का सारा पोल खुल गया। राजपुत्र ने अपने पिता जी से कहा कि यह सब सद्गुरुदेव जी की कृपा है कि उनका अदृश्य हाथ सदा हमारे साथ है। इस घटना से राजा भी अत्यन्त प्रभावित हुआ और वह भी सद्गुरुदेव जी की शरण में गया और उनसे नामोपदेश लेकर उसकी कमाई की जिससे उसके दोनों लोक सँवर गये।
     इसलिये हमें श्री गुरुमहाराज जी ने सतर्क किया है कि किसी की भी बुराई न करो। न किसी से घृणा करो। क्योंकि जो बुराई करता है उसका अपना ही बुरा होता है। फारसी में कहा हैः-""चाह कनरा चाह दरपेश'' कुआँ खोदने वाला आप ही कुएं में गिरता है।

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