इस संसार के अन्दर दुःख तथा सुख दोनों मनुष्य के साथ हर समय रहते हैं। इस सुख-दुःख के घेरे के अन्दर से जीव कभी बाहर नहीं होता अर्थात् किसी समय दुःख और किसी समय सुख उसको व्यापते रहते हैं। जब सुख आता है तो वह प्रसन्न हो जाता है और जब दुःख आता है तो सन्तप्त होता है।यह दुःख और सुख की दशा प्रायः उसके साथ आजीवन चलती रहती है। इसमें सन्देह नहीं कि वस्तुतः जीव सुख का अभिलाषी है। उसे दुःख पसन्द नहीं है। उसके सारे प्रयत्न भी सुख के प्राप्त करने के लिये होते हैं। ऐसी दशा में उसकी जीवन-यात्रा तो समाप्त हो जाती है परन्तु वह किसी विशेष परिणाम तक नहीं पहुँचता कि ये सुख और दुःख कहां से आये थे? इस अनिश्चय में ही जीव अपना अमुल्य जीवन बिता देता है।
प्रायः सर्वसाधारण की बुद्धि जहां तक पहुंच सकती है वह यह है कि संसारी पदार्थों के मिलने में सुख और उनके प्राप्त न होने पर दुःख हुआ करता है। इन पदार्थों में जड़ भी हैं और चेतन भी। वास्तव में इन पदार्थों में न दुःख है और न ही सुख है। भला इन वस्तुओं में सुख और दुःख कहाँ? सन्तों का उपदेश है कि सुख और दुःख दोनों तेरे मन की उपज हैं। संसारी पदार्थों में दुःख या सुख दोनों नहीं भरे हैं। सुख भी तेरे मन से उत्पन्न होता है और दुःख भी मन में जन्म लेता है। अन्तरमानस से इन दोनों का सम्बन्ध है। जीव क्योंकि मन की गहराई को समझता नहीं इसलिये सुख दुःख के तत्त्व को जान नहीं पाता।
वस्तु कहीं, ढूँढे कहीं, केहि विधि आवै हाथ।
कहै कबीर तब पाइये, जब भेदी लीजै साथ।।
सुख तो जीव के अन्दर है किन्तु वह उसे बाहर के पदार्थों में खोजता है। दुःख भी इसी तरह जीव के मन से उत्पन्न होता है परन्तु वह उसका दोष किसी और वस्तु को देता है। सुख है वास्तव में प्रेम और प्यार के अन्दर। जब मन में सन्त महापुरुषों के सत्संग से प्रेम पैदा हो जाएगा तब मन को शान्ति मिलेगी। घृणा करने से मन दुःखी और अशान्त रहेगा। यह बात किसी से निर्णय कराने वाली नहीं है। प्रत्येक मनुष्य इसका अनुमान स्वयं कर सकता है। तुम्हारे मन में दूसरों के प्रति यदि घृणा है तो ठण्डे-ठण्डे कमरों में रहते हुए, अच्छे खाते-पीते हुए और सुखमय जीवन बिताते हुए भी अशान्त रहोगे। इसके विपरीत जब मन में प्रेम-प्यार, दया और परोपकार के भाव हैं तो झोंपड़ी के अन्दर रहते हुए रुखी-सूखी खाते हुए भी तुम मन में सुखी होवोगे। इसीलिये तो सन्तों का निर्णय है कि दुःख और सुख मन की क्यारी में ही उपजा करते हैं। इन्द्रियों के जिन रसों में जीव सुख मानता है वे वस्तुतः दुःख की जड़ हैं। इनसे मन दूषित होता है। मलिन मन से सुख की आशा कैसी की जा सकती है? जब मन मैला है उसमें प्रेम नहीं पनप सकता। आवश्यक है कि मन को स्वच्छ और शुद्ध बनाया जाय। सदा ही दूसरों का भला सोचो-किसी के लिये बुरा सोचना अपने लिये गढ़ा खोदना है। यदि सचमुच तुम सुख के इच्छुक हो तो दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार करो कि उन्हें सुख मिले।
भक्तों और संसारियों में यह अन्तर पाया जाता है कि भक्त लोग र्इंट का जवाब कभी पत्थर से नहीं देते। उनके अन्दर अगाध धैर्य होता है। आप इस बात की परीक्षा करके देखें कि कोई आपके साथ दुव्र्यवहार करता है और आप भी उससे बदले की भावना में बुरा ही बर्ताव करते हैं तो क्या आपको शान्ति मिलेगी? कदापि नहीं। सन्तों का वचन हैः-करगस सम दुर्जन वचन, रहै सन्त जन टारि।
बिजुरी परे समुद्र में, कहा सकेगी जारि।।
भक्तों का ह्मदय गम्भीर ठण्डे समुद्र के समान है और संसारियों का ह्मदय एक बारुद की कोठड़ी के तुल्य है। क्रोध आग की एक चिनगारी है। जब क्रोध की चिनगारी भक्तों के ह्मदय में पड़ेगी तो वह वहाँ शान्त हो जायेगी। दूसरे शब्दों में आप ऐसा समझें कि भक्तों के साथ यदि कोई कटु वचन बोले अथवा क्रोध करे तो उनके समुद्र के समान गम्भीर ह्मदय पर उसका कोई प्रभाव न पड़ेगा। यदि वही क्रोध की चिनगारी किसी संसारी के बारूद रुपी ह्मदय की कोठड़ी में जा गिरी तो आग भड़क उठेगी। फकीर हाफीज़ साहिब कथन करते हैंः- हाफज़ा गर वस्ल खाही, सुलह कुन बा ख़ासो आम।
बा मुसल्याँ अल्लाह अल्लाह, बा हनूदां राम-राम।।
ऐ हाफज़! यदि तू ईश्वर के दर्शन का अभिलाषी है तो तू क्या कर सर्वसाधारण से प्रेम-प्रीति रख। मुसलमान के मिलने पर "अल्लाह-अल्लाह' और हिन्दु से भेंट होने पर "राम-राम' कह कर उससे बात कर। इस प्रकार दुःख का लेश भी न रहेगा-सुख ही सुख प्राप्त होगा। यदि तुम्हें आत्मिक शान्ति की इच्छा है तो दूसरों की आत्मा को शान्ति प्रदान करो। आत्मा की साक्षी अपनी आत्मा ही होती है। यह अवस्था मन को जीत लेने पर ही आ सकती है। इस भूमि पर रहते हुए ऐसा बर्ताव करना चाहिये कि किसी दूसरे को हमसे दुःख न पहुंचे। परन्तु ऐसा भी न हो कि अपनी अति कोमलता के कारण दूसरे उसका अनुचित लाभ ले लें।
एक बार एक महात्मा का एक सर्प से मिलाप हुआ। महात्मा ने सर्प से कहा कि तू किसी को डंक न मारा कर। इससे क्योंकि दूसरों को कष्ट पहुंचता है। सर्प ने महात्मा की आज्ञा मानकर डसना छोड़ दिया। वह चुपचाप सड़क के किनारे पर पड़ रहा। परिणाम यह हुआ कि जो कोई वहां से गुज़रे वह उसे देखकर रोड़ा या पत्थर मार दे किन्तु वह बेचारा किसी को कुछ न कहे।उसकी दशा यह हो गई कि बच्चे उसे खेल खेल में घसीटने लग पड़े और वह घायल हो गया। वह महात्मा फिर कभी उधर आ निकले और सर्प की ऐसी दुर्दशा देखकर वे बड़े दुःखी हुए। सर्प ने महात्मा जी से कहा कि महाराज! आपकी आज्ञा पालन करने से मेरी यह दुर्दशा हो गई है। इस पर महात्मा जी बोले- "ऐ नादान! हमने तो तुम्हें यह कहा था कि तूने किसी को डसना नहीं' परन्तु यह तो नहीं कहा था कि तू अपनी फुंकार करना भी छोड़ दे। उसी दिन से उसने फुंकार मारना शुरु किया जिससे लोग उसे छेड़ते न थे और वह सुख पूर्वक रहने लगा। इसी तरह संसार में रहते हुए भक्तों को भी अपनी सर्पवाली फुँकार नहीं छोड़नी।
इतिहास बताता है कि दसवीं पातशाही श्री गुरु गोबिन्दसिंह जी महाराज ने भी लड़ाइयां लड़ीं। परन्तु क्या वे किसी के दिल से शत्रु थे? कदापि नहीं-वे तो धर्म और न्याय की रक्षा के लिये लड़े थे। कहते हैं कि युद्ध भूमि में एक भाई कन्हैया विरोधी पक्ष के घायलों के मुँह में पानी डाला करता था। कुछ सिखों ने यह देखकर श्री गुरु महाराज जी के आगे उसकी शिकायत की कि महाराज! वह तो हमारे शत्रुओं के मुँह में पानी डाल कर उन्हें जीवित कर देता है। वे फिर लड़ने को तैयार हो जाते हैं। श्री गुरु महाराज जी ने कन्हैया को बुलवाया और इस बात की सत्यता जाननी चाही। भाई कन्हैया हाथ जोड़कर चरणों पर गिर पड़ा और विनय की कि "हे गुरुमहाराज! मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप रणभूमि में लेटे पड़े हैं और आपको पानी की प्यास लगी है। मैं आपको पानी पिला रहा हूँ। मैं तो हरएक में आपका ही रुप देखता हूँ। श्री गुरुमहाराज जी ने जब ये शब्द कन्हैया के मुख से सुने तो वे बड़े प्रसन्न हुएऔर कहा कि भाई कन्हैया! सचमुच तू ऐसी अवस्था पर पहुंच गया है? तब तो तू बड़ा भाग्यशाली है। अब तक तो तू इन्हें पानी पिलाता था आगे से तू इनकी मरहम पट्टी भी किया कर। यह हमारी आज्ञा है।'' यह कितनी ऊँची अवस्था है। यह काम मन को वश में किये बिना नहीं हो सकता। महापुरुष फरमाते हैं कि ऐ जीव! मन ही तेरा शत्रु है। इस मन को वश में कर लेना भक्ति की अन्तिम मंज़िल है। किसी ने कहा हैः-
वैरी तेरा को नहीं, वैरी तेरा मन । इस मन नूं तूं वस करें, ते पावें मुक्ति धन।।
अपने मन को सब प्रकार की बुराइयों से बचा कर सब किसी से प्रेम-प्यार रखना है। इस तरह जीवन-यापन करते हुए परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करनी है और मनुष्य जीवन को सफल बनाना है।
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